रविवार, 2 अप्रैल 2017

हिंदी और उर्दू की साझी विरासत : अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न


हिंदी और उर्दू की साझी विरासत : अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न
30 और 31 मार्च, 2017 को मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद में ‘’हिंदी और उर्दू की साझी विरासत’’ विषयक दो-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न हुई। आज के संदर्भ में जहां धर्म और मज़हब के नाम पर देश को बांटने की बात हो रही है, यह संगोष्ठी एकता के बिंदुओं को उजागर करने के संकल्प के साथ आरंभ हुई । प्रतिष्ठित कथाकार  नासिरा शर्मा ने रिबन काटकर संगोष्ठी का उद्घाटन किया । आरंभ में  सांप्रदायिक सद्भाव  पर आधारित कुछ फिल्मों की क्लिपिंग प्रदर्शित की गई और मानू का तराना पेश किया गया। हिंदी विभाग के प्रभारी अध्यक्ष मो.खालिद मुबश्शीर उज़-ज़फ़र ने मेहमानों का स्वागत किया। संयोजक डॉ. करन सिंह ऊटवाल ने संगोष्ठी का परिचय देते हुए कहा कि भाषा और मज़हब को तोड़ने वालों की बात का जिक्र न करें, उनको तवज्जो न दें क्योंकि  हमें जोड़ने वालों की बात करनी है । यूनिवर्सिटी ऑफ नार्थ कैरोलिना, चैपल हिल्स, अमेरिका के एशियाई अध्ययन विभाग के प्राध्यापक डॉ.जॉन शील्ड कॉल्डवेल  ने कहा कि दोनों भाषाओं को शुद्धता की ओर ले जाना, उन्हें अशुद्ध करना है । उसी विश्वविद्यालय के  डॉ. अफरोज ताज ने कहा कि भारत और पाकिस्तान से बाहर निकलें तो हिंदी उर्दू एक ही भाषा है । जेएनयू के प्रोफेसर नसीर अहमद खान ने कहा कि हिंदी उर्दू को अलग करने की साजिश फोर्ट विलियम कॉलेज में रची गई थी । आज इन दोनों भाषाओं के मिले-जुले रूप में इतनी शक्ति है कि हम एक हो जाएँ तो यह सार्क देशों की संपर्क भाषा बन सकती है । नासिरा शर्मा ने कहा कि हिंदी और उर्दू मेरी दो माँ हैं । हिंदी की ओर हिंदी टीचर ने आकर्षित किया और पिताजी की विरासत को समझने के लिए बाद में मैंने उर्दू सीखी । प्रो. असगर वजाहत ने कहा कि हालांकि भारत का संविधान हिंदी और उर्दू को अलग-अलग भाषाएं मानता हैं, लेकिन भाषावैज्ञानिक मानते हैं कि ये 2 भाषाएं अलग-अलग लिपियों में लिखी जाने वाली एक ही भाषा है  जिसका व्याकरण एक है । मानू के कुलपति प्रो. मोहम्मद असलम परवेज़ ने कहा कि हिंदी और उर्दू अलग नहीं हैं  बल्कि मिलकर उसे  आगे बढ़ना है ,तभी वह अपने उद्देश्यों को पूरा कर सकती है ।उन्होंने दोनों लिपियों में लिखी  गई रचनाओं के अनुवाद को एक अभियान के रूप में चलाने पर जोर दिया।
हिंदी साहित्य के मुस्लिम लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब
उद्घाटन सत्र के पश्चात मुख्य सत्र के साथ-साथ दो समानांतर सत्रों का भी आयोजन किया गया। प्रथम मुख्य सत्र का विषय था हिंदी साहित्य के मुस्लिम लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब जिसकी अध्यक्षता प्रो. ऋषभदेव शर्मा  ने की। प्रमुख वक्ता थे डॉ. अलीम अशरफ जायसी, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, डॉ .समीना ताबिश, डॉ. चंदू खंडारे, डॉ.सोनाली मेहता और डॉ. शेषु बाबु आदि। साथ ही तीन समानांतर सत्र चले जिनकी  अध्यक्षता प्रो. मोहन सिंह, प्रो.शकीला खानम और  डॉ. प्रभाकर त्रिपाठी ने की। वक्ता रहे डॉ.सुषमा देवी ,डॉ. सुभाष कुमार शर्मा ,डॉ. कामेश्वरी, प्रियंका कुमारी, हरबंस कौर ,डॉ. अली, डॉ. अर्चना झा, अपर्णा चतुर्वेदी, गीतांजलि साहू, थे डॉ. अफसर उन्निसा बेगम, डॉ. जमील अहमद  तथा अनिल आदि।  
उर्दू साहित्य के गैरमुस्लिम लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब
दूसरे मुख्य सत्र का विषय रहा उर्दू साहित्य के गैरमुस्लिम लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब। इसकी अध्यक्षता प्रो.असगर वजाहत ने की और  प्रमुख वक्ता थे  डॉ.महमूद काज़मी, अमरनाथ, मोहम्मद शाहिद आदि। समानांतर सत्र की अध्यक्षता प्रो. अबुल कलाम ने की जिसके प्रमुख वक्ता थे अंसार अहमद, सुभाष कुमार, मोहम्मद नेहाल अफरोज़ तथा रुकैया नबी आदि ।
कविसम्मलेन-मुशायरा
पहले दिन की शाम कवि सम्मेलन और मुशायरे के नाम रही। इसकी अध्यक्षता डॉ. अहिल्या मिश्र ने की। प्रो. ऋषभदेव शर्मा, प्रवीण प्रणव, नरेंद्र राय, डॉ. महमूद काज़मी, डॉ. अफरोज़ ताज, डॉ.अक़ील हाशमी, सरदार सलीम, कोकब ज़क़ी. समी सिद्दीकी, इबरार खान, आसिफ चिराग राजा ने सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता पर केंद्रित कवितायेँ प्रस्तुत कर श्रोताओं को मुग्ध कर दिया।
दोनों भाषाओं में लिखने वाले लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब
दूसरे दिन चले संगोष्ठी के तीसरे प्रमुख सत्र का केंद्रीय विषय रहा- दोनों भाषाओं में लिखने वाले लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब इसकी अध्यक्षता नासिरा शर्मा ने की और  प्रमुख वक्ता थे डॉ.अफरोज ताज नकवी, जॉन शील्ड काल्डवेल, डॉ. शम्शुल हूदा, डॉ.जी.वी. रत्नाकर, डॉ.पठान रहीम खान, डॉ.असलम परवेज, एफ.एम. सलीम तथा कहकशाँ लतीफ। समानांतर सत्रों  की अध्यक्षता प्रो.नसीमुद्दीन फरीस और डॉ वसीम बेगम ने की । वक्ता थे डॉ. मंजु शर्मा, डॉ.प्रोमिला, डॉ.निखत जहां ,अजय ,खुशबू, डॉ.तबस्सुम बेगम ,डॉ.वाजदा इशरत, डॉ. हिना कौसर, शेख अब्दुल गनी, डॉ. पी. जयलक्ष्मी तथा चिराग राजा आदि ।
गंगा-जमुनी तहज़ीब पर प्रमुख विद्वानों के विचार
चौथा सत्र था- गंगा-जमुनी तहज़ीब पर प्रमुख विद्वानों के विचार इस सत्र की अध्यक्षता प्रो.रोहिताश्व  ने की। चर्चा आरंभ करते हुए डॉ. अनीस आज़मी ने कहा कि शब्दों में सबसे अधिक ताकत होती है तथा मिली-जुली संस्कृति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आजमगढ़ में किसी घर में बच्चे का जन्म होता तो कन्हैया जी जन्म लेले जैसा गाना गाया जाता था । उन्होंने  मिली-जुली संस्कृति के लिए नाटक  तथा थिएटर के योगदान पर प्रकाश डाला  । प्रो. वहाब क़ैसर ने मौलाना आज़ाद के व्यक्तित्व को केंद्र में रखकर हिंदू मुस्लिम एकता पर प्रकाश डाला तथा भाषा की महत्ता को बताते हुए राष्ट्रीय एकता और संस्कृति पर अपने विचार रखे। डॉ. आनंद राज वर्मा ने दक्कन की गंगा-जमुनी तहज़ीब पर प्रकाश डाला। जिंदगी के अपने तजुर्बों को साझा करते हुए मिली जुली संस्कृति से अवगत कराया तथा हैदराबादी संस्कृति के माध्यम से मिली-जुली संस्कृति पर प्रकाश डाला। लक्ष्मी देवी राज ने मज़हब से बढ़कर इंसानियत को तवज्जो दी। अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए हिंदू मुस्लिम साझी संस्कृति पर प्रकाश डाला और मातृभाषा की अहमियत को बताया । डॉ. असलम फरशोरी  ने गंभीरता से बात करते हुए कहा कि आज के राजनीतिक हालात में हमारी सांप्रदायिक सद्भाव से बनी तहज़ीब कहीं खो गई है जिसमें हम  हर स्तर पर एक साथ मिलकर रहते थे।  प्रो. रोहिताश्व  ने अध्यक्षीय भाषण में विस्तारपूर्वक विभिन्न लेखकों तथा उनकी रचनाओं के उदाहरण देते हुए गंगा-जमुनीतहज़ीब पर प्रकाश डाला और ज्ञानवर्धक चर्चा करके विषय अनुकूल ज्ञान की सीमा का परिष्कार किया ।
समापन समारोह
मानू के अकादमिक डीन प्रो. रवींद्रन की अध्यक्षता में समापन सत्र संपन्न हुआ।  इसके आरंभ में अमेरिका से आए अफरोज ताज नकवी ने अपने गीत तथा जॉन शील्ड कॉल्डवेल  ने अपने हारमोनियम से महफिल में समा बांध दिया । प्रो असगर वजाहत, प्रो. नसीर अहमद खान तथा नासिरा शर्मा ने संगोष्ठी पर सकारात्मक  प्रतिक्रिया व्यक्त की। संगोष्ठी की रिपोर्ट संयोजक डॉ .करन सिंह ऊटवाल ने पेश की तथा धन्यवाद ज्ञापन  सह-संयोजक डॉ.शम्शुल हुदा ने प्रस्तुत किया। सामूहिक जन-गण-मन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
[रिपोर्ट एवं  चित्र सौजन्य :  डॉ. करन  सिंह ऊटवाल ]

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें