रविवार, 30 नवंबर 2014

[स्रवंति] ब्रिटेन में कवि सम्मेलन और संकलन-लोकार्पण


[स्रवंति] डॉ.जोराम यालाम नाबाम को प्रथम साहित्य मंथन सृजन पुरस्कार प्रदत्त



गुरुवार, 27 नवंबर 2014

अखिल भारतीय हिन्दी अधिकारी सम्मेलन


रामोजी फिल्मसिटी , हैदराबाद | 

दिनांक 14 एवं 15 नवम्बर , 2014 को हैदराबाद स्थित रामोजी फिल्मसिटी के सितारा होटल के सम्मेलन कक्ष में दि "न्यू इंडिया एश्योरंस कंपनी लिमिटेड " अखिल भारतीय हिन्दी अधिकारी सम्मेलन का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया | यह सम्मेलन प्रधान कार्यालय द्वारा प्रायोजित था जिसका आयोजन हैदराबाद क्षेत्रीय कार्यालय ने किया |


सम्मेलन की अध्यक्षता श्री पी नायक , महा प्रबन्धक प्रधान कार्यालय ने किया | श्री संजीव सिंह , उप महा प्रबन्धक प्रधान कार्यालय ने सम्मेलन की हिन्दी कार्यान्वयन में भूमिका पर प्रकाश डाला |

श्री के वी कृष्णा , उप महा प्रबन्धक हैदराबाद क्षेत्रीय कार्यालय ने स्वागत भाषण दिया |

सम्मेलन के मुख्य अतिथि प्रो. ऋषभदेव शर्मा , प्रोफेसर एवं अध्यक्ष ,उच्च शिक्षा और शोध संस्थान ,दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा , खैरताबाद , थे | श्री शर्मा ने संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी के औचित्य पर प्रकाश डाला और हिन्दी के प्रचार -प्रसार में हिन्दीतर भाषियों के योगदान की चर्चा की |

सम्मेलन में भारत के विभिन्न प्रांतों से हिन्दी अधिकारियों और प्रतिनिधियों ने भाग लिया |

सम्मेलन की शुरूआत में हैदराबाद क्षेत्रीय कार्यालय के राजभाषा अधिकरी , कुमार अनिल मलदहियार ने सभी प्रतिभागियों का अभिनंदन किया और पदाधिकारियों एवं मुख्य अतिथि को मंचासीन होने का निमंत्रण दिया | उसके बाद दीप प्रज्ज्वल्न ,सरस्वती वंदना और इतनी शक्ति हमें देना दाता गान की प्रस्तुति प्रधान कार्यालय की टीम द्वारा किया गया और सम्मेलन की कार्रवाई शुरू हो गई | 

अध्यक्षीय भाषण के पश्चात मुख्य अतिथि को स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया गया |

चायपान के बाद (क ) और (ख) क्षेत्र का पॉवर पाइंट प्रजेंटेशन हुआ | 

दिनांक 15 नवम्बर को (ग ) क्षेत्र का पॉवर पाइंट प्रजेंटेशन हुआ | उसके बाद खुला सत्र हुआ |

तत्पश्चात पुरस्कार वितरण हुआ और राष्ट्रीय गान के साथ समेलन एक खुशनुमा वातावरण में सम्पन्न हुआ | 

- कुमार अनिल मलदहियार 
राजभाषा अधिकारी , हैदराबाद क्षेत्रीय कार्यालय
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रविवार, 23 नवंबर 2014

(लोकार्पण) 'धूप ने कविता लिखी है'

ऋषभदेव शर्मा के सातवें कविता संग्रह 'धूप ने कविता लिखी है' (२०१४) का
लोकार्पण करते हुए पद्मश्री जगदीश मित्तल (दाएँ से तीसरे).
साथ में दाएँ से - विवेक नाबाम, प्रो. एन. गोपि, प्रो. एम. वेंकटेश्वर,
डॉ. जोराम यालाम नाबाम, प्रो. ऋषभदेव शर्मा, लिपि भारद्वाज,
कुमार लव, डॉ. पूर्णिमा शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा.


हैदराबाद १५ नवंबर २०१४. 

यहाँ 'साहित्य मंथन' द्वारा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सम्मलेन कक्ष में प्रो. एम. वेंकटेश्वर की अध्यक्षता में आयोजित एक समारोह में कवि ऋषभदेव शर्मा के सातवें कविता संग्रह 'धूप ने कविता लिखी है' को लोकार्पित किया गया. लोकार्पण विश्व विख्यात कला संग्राहक और समीक्षक पद्मश्री जगदीश मित्तल ने किया. इस अवसर पर पुस्तक के भूमिका लेखक प्रो. देवराज के अतिरिक्त अरुणाचल प्रदेश से आए हुए विवेक नाबाम और डॉ. जोराम यालाम नाबाम ने शुभकामनाएँ व्यक्त कीं.प्रसिद्ध तेलुगु साहित्यकार प्रो. एन. गोपि ने आशीर्वचन दिए. पुस्तक की लोकार्पित प्रति युवा कवि कुमार लव और फोटोपत्रकार लिपि भारद्वाज ने स्वीकार की. 
 
उल्लेखनीय है कि 'धूप ने कविता लिखी है' में ऋषभदेव शर्मा की १२६ तेवरियाँ संकलित हैं. स्मरणीय है कि उन्होंने तेवरी काव्यांदोलन का प्रवर्तन १९८१ में किया था और १९८२ में प्रो. देवराज ने इसका घोषणापत्र तैयार किया था. तदुपरांत प्रथम तेवरी संकलन (तेवरी) की भूमिका के अंतर्गत इन दोनों तेवारीकारों (डॉ. देवराज और ऋषभदेव शर्मा) ने तेवरी काव्यांदोलन की आधिकारिक घोषणा की थी. 'धूप ने कविता लिखी है' में इन दोनों दस्तावेजों (घोषणापत्र और आधिकारिक घोषणा) का भी समावेश किया गया है. साथ ही तेवरी काव्यांदोलन के उद्भव और विकास पर भी एक शोधपरक आलेख सम्मिलित है. 

'धूप ने कविता लिखी है' (२०१४) की भूमिका तेवरी काव्यांदोलन के घोषणापत्र के लेखक डॉ. देवराज ने लिखी है और उसे शीर्षक दिया है - 'कल धमाके में मरा जो, कौन था.......' इस भूमिका को यहाँ अविकल रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है - 



कल धमाके में मरा जो, कौन था.........
प्रो. देवराज 
धूप ने कविता लिखी है / ऋषभदेव शर्मा/ २०१४/ श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद
पृष्ठ - १६८/ मूल्य - रु. २००/ ISBN - 978-93-5174-509-9 
तेवरी आंदोलन को प्रारंभ हुए तीन दशक से अधिक बीत चुके हैं। इस अवधि में हिंदी का यह काव्यांदोलन इतिहास की पुस्तकों में तो अपनी जगह नहीं बना पाया, लेकिन इससे जुड़े रचनाकारों ने अपनी आवाज़ को किसी प्रकार के समझौते नहीं करने दिए। उन्होंने प्रारंभ में जिस तरह नगरों, गाँवों, सड़कों और खेतों से जुड़ाव घोषित किया था, वह कम नहीं हुआ। इस समय वे जहाँ-जहाँ हैं, अपने चारों ओर फैली विषाक्त हवाओं के विरुद्ध अवसर निकाल-निकाल कर आवाज उठा रहे हैं। कई बार इनकी आवाज़ें दूर तक अपनी गूँज का विस्तार करती महसूस की जाती हैं और कई बार उन्हें अनसुना कर दिया जाता है। यह तरह-तरह की सत्ताओं का प्रतिरोध की कविता के साथ किया जाने वाला व्यवहार है, जो हमेशा से होता आया है। तेवरी आंदोलन से जुड़े रचनाकार इस तथ्य को जानते हैं, इसीलिए वे सत्ता को निरंतर नकारते हैं और जनता की सही आवाज़ बनने के रास्ते तलाशते रहते हैं। उनकी संख्या कम है, और कम होती चली जाए, उनके साथ आने से सुविधाजीवी रचनाकार कतराते रहें या और जो भी हो, उनकी बला से। 

ऋषभदेव शर्मा के लिए भी सत्ता नाराज़ हो जाए, उनकी बला से, वे जनाक्रोश का पसीना पोंछ-पोंछ कर उसे उकसाते रहेंगे और मौक़ा मिलते ही जनांदोलन में बदल जाने को प्रेरित करते रहेंगे। उनके लिए सत्ता ख़ूबसूरत से ख़ूबसूरत रूप धारण करने की कोशिश करके लगातार भ्रमबिंबों का एक जाल रचती रहती है। इस जाल में असंख्य सूर्य, चंद्रमा, तारे, धरा-गोलार्ध, आपस में गड्ड-मड्ड हुए उल्टे-सीधे चक्कर काटते रहते हैं, ज्वालामुखियों से लावे की जगह बर्फ फूट-फूट कर पहाड़ों-जंगलों से उनकी असली पहचान छीनने की साजिश रचती रहती है और स्थानीयता से वैश्विकता के बीच का शोर विमर्शों की दलदल में बदलता रहता है। भ्रमबिंबों के इस जाल का शिकार भी जनता होती है और उत्तर भी वही बनती है। यहाँ से सत्ता, जनता और रचनाकार के रिश्तों का अग्नि-मार्ग निर्मित होता है, जिस पर चलना सत्ता के लिए कभी संभव नहीं होता, जबकि शेष दोनों सहयात्री बन कर आगे बढ़ते रहते हैं। 

‘धूप ने कविता लिखी है’ की तेवरियाँ मुझे इस अहसास के सामने लाकर खड़ा करती हैं। इनकी आँच को सहना मेरे लिए कठिन है। ये कभी भी, कहीं भी जला सकती हैं। किसी भी बिंदु पर असहज कर देने वाले सवालों के दायरे निर्मित करके मुझे उनके भीतर खींच सकती हैं। मुझे लगता है कि अगर आपने इन्हें एक से अधिक बार पढ़ने की हिम्मत दिखाई, तो आप भी इनके आसान शिकार बन सकते हैं, सो इन तेवरियों को अधलेटे होकर या बिस्तर पर चादर ओढ़ कर या मन समझाने के लिए न पढ़ें। इन्हें वे लोग भी न पढ़ें, जिनकी रीढ़ की हड्डी सीधी न हो और जो सत्ता की दलाली को जीवन-ध्येय बना चुके हों। जनता की पक्षधरता का हलफ उठाने वाले इन तेवरियों को पढ़ते हुए सहजता अनुभव करेंगे। उन्हें इनके संगसाथ में संघर्ष के नए रास्ते भी आवाज़ लगाते दिख जाएँगे। 

ऋषभदेव शर्मा के इस नए संग्रह की अधिकांश तेवरियाँ बरसों पहले रची गई हैं और शहरी गोष्ठियों से लेकर गंगधाडी के आसपास खलिहानों में किसानों की प्रशंसा बटोर चुकी हैं। किताब में इन्हें देर से जगह मिल रही है, इसके पीछे तेवरीकार का संकोच है या कुछ और, यह केवल रचनाकार को ही पता है। मेरे लिए यह संग्रह संतोष का बड़ा कारण इसलिए है कि इसके प्रकाशन से तेवरी काव्यांदोलन को पुनर्वार नवीन ऊर्जा प्राप्त होगी। 

शुभकामनाएँ................ 
विजयादशमी, 2014                                                                                                                   देवराज 

                                                                                         महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय 
                                                                                                         गांधी हिल्स, वर्धा-442 005 (महाराष्ट्र)


शनिवार, 22 नवंबर 2014

(लोकार्पण) 'तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय'

15 नवंबर 2014 को हैदराबाद में 'साहित्य मंथन' के तत्वावधान में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सम्मलेन कक्ष में 
आयोजित एक समारोह में 
तेलुगु के प्रमुख कवि प्रो. एन. गोपि ने 
डॉ. ऋषभदेव शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा लिखित पुस्तक 
'तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय' 
का लोकार्पण किया.
 इस अवसर पर प्रो. एम. वेंकटेश्वर (अध्यक्ष), 
पद्मश्री जगदीश मित्तल (उद्घाटनकर्ता), प्रो. देवराज (मुख्य अतिथि),
 डॉ. जोराम यालाम नाबाम और विवेक नाबाम के साथ लेखकद्वय .



परिचय वक्तव्य : डॉ. बी. बालाजी 

तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय

‘तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय’ प्रो. ऋषभदेव शर्मा जी और डॉ. जी नीरजा जी द्वारा रचित पुस्तक तेलुगु और हिंदी साहित्य के अध्येताओं, शोधार्थियों और प्रेमियों के लिए एक अभिनव भेंट है। 

भेंट इसलिए कह रहा हूँ कि एक पॉकेट डिक्शनरी की तरह मात्र 64 पृष्ठों की यह पुस्तक तेलुगु साहित्य के हिंदी अनुवाद के इतिहास को प्रस्तुत करती है। साथ ही अनुवाद के माध्यम से हिंदी साहित्य के पाठकों के समक्ष तेलुगु भाषी लोक की संस्कृति, लोकाचार और प्रथाएँ, तेलुगु प्रदेश की जीवन शैली, लोक विश्वास और लोकोक्तियाँ, नामकरण की शब्दावली का हिंदी में प्रवेश भी उद्घाटित करती है। यह समय कॉम्पैक्ट -डिजिटल का है। हमें सारी चीजें कॉम्पैक्ट में चाहिए ‘देखने में छोटे लगें, मगर प्रकट करें सारा संसार’। जी हाँ, यह पुस्तक इसी वाक्य को चरितार्थ करती है। प्रो. ऋषभदेव शर्मा जी और डॉ. जी नीरजा जी ने बहुत परिश्रम किया होगा इसे कॉम्पैक्ट बनाने के लिए। 

इस पुस्तक की एक और विशेषता की ओर आप सब का ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा। लेकिन इससे पहले यह बताना मैं अपना दायित्व समझता हूँ कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा जी चाहे कोई साधारण लेख लिख रहे हों, किसी पुस्तक की भूमिका या समीक्षा लिख रहे हों या किसी विषय पर शोध करा रहे हों, एक वैज्ञानिक की तरह काम करते हैं। हर रचना की प्रक्रिया के समय वे वैज्ञानिक दृष्टि अपनाते हैं। विषय की सैद्धांतिकी को व्यावहारिक रूप देते हैं। और डॉ. जी नीरजा जी भी इसी राह पर चल पड़ी हैं। यह पुस्तक इस बात का प्रमाण है। 

अब मैं, विशेषता की बात करूंगा। इस पुस्तक का प्रत्येक लेख अपने आप में एक स्वतंत्र लेख है। पाठक इसे कहीं से भी पढ़ना आरंभ कर सकता है। यदि मान लीजिए पाठक पुस्तक का अंतिम लेख – ‘नामकरण’ पढ़ना चाहता है तो उसे ‘ तेलुगु साहित्य के अनुवाद की परंपरा’ जो पहला लेख है, पढ़ने की मजबूरी महसूस नहीं करनी पड़ेगी। यही बात सभी लेखों पर लागू होती है। जैसे दूसरा लेख - अनुवाद की विकास यात्रा, तीसरा लेख - स्रोत भाषा की शब्दावली का प्रसार, चौथा लेख- सांस्कृतिक संदर्भ, पाँचवां लेख- लोकाचार और प्रथाएँ, छठा लेख- स्रोत भाषासमाज की जीवन शैली, सातवाँ लेख - उपपाठों की पहचान, आठवाँ लेख- सूचना संप्रेषण, नौवां लेख - लोकोक्तियाँ। इस तरह हम देखते हैं कि इस अनुपम पुस्तक में कुल मिलाकर ग्यारह संक्षिप्त लेख सम्मिलित हैं।

अंत में संदर्भ भी दिए गए हैं। यह तेलुगु से हिंदी अनुवाद पर तथा तुलनात्मक शोध की इच्छा रखने वाले शोधार्थी के लिए बहुत उपयोगी सामग्री है। यह पुस्तक अपने-आप में एक मार्ग दर्शिका है। 

विवेच्य पुस्तक ‘तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय’ के लेखन के पीछे (लिखने का कारण) हिंदी भाषा और साहित्य के लिए काम करते हुए दोनों लेखकों की कर्म भूमि - ‘तेलुगु प्रदेश और उसके साहित्य’ के प्रति दायित्व का निर्वाह है। इस दायित्व को दोनों लेखकों ने पूरी ईमानदारी से निभाया है। यह बात इस लेखकीय टिप्पणी से पुष्ट हो जाएगी – “तेलुगु से भी हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में अनेक रचनाओं का अनुवाद हुआ है। परंतु खेद का विषय है कि तेलुगु या अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं से हिंदी में अनूदित साहित्य को गंभीरता से नहीं लिया गया। प्राय: यह कहकर इन अनुवादों की उपेक्षा की जाती रही है कि अनुवाद ठीक नहीं हो रहे हैं या अनुवाद में प्रयुक्त भाषा कहीं-कहीं त्रुटिपूर्ण होती है या व्याकरण सम्मत होते हुए भी अनुवाद की भाषा पाठकों को उबाऊ लगती है। ये तमाम आलोचनाएँ अपनी जगह हैं और अनुवादकों की निरंतर साधना अपनी जगह है। इसलिए तेलुगु से हिंदी में अब तक अनेक रचनाओं का अनुवाद हो चुका है तथा अब भी हो रहा है।“

तेलुगु साहित्य के हिंदी अनुवाद के प्रदेय को पुस्तक में उद्धृत उद्दरण से बताने का प्रयास करूंगा - 

इस पुस्तक के माध्यम से लेखकद्वय ने उद्घाटित किया है कि तेलुगु साहित्य का हिंदी में अनुवाद होने से भारत की अन्य भाषाओं के साहित्य को लाभ हुआ है। इस संदर्भ में लेखक द्वारा उद्धृत प्रो. देवराज के कथन का उल्लेख करना चाहूँगा – “तेलुगु के कालजयी रचनाकार सी. नारायण रेड्डी ने काव्य में पंचपदी शैली के कुछ अद्भुत प्रयोग किए थे। उनकी पंचपदियों का हिंदी में अनुवाद प्रो. भीमसेन निर्मल ने किया था। कोई बीस साल पहले मैंने ये अनुवाद मणिपुरी भाषा के कवियों की एक सभा में पढे थे। मूल पाठ हिंदी में और व्याख्या मणिपुरी में। आयोजन स्थल से बाहर आते समय निर्मल जी के अनुवादों की वह पुस्तक मुझसे कवि लनचेनबा मीतै ने मांग ली। लगभग एक साल के बाद एक दिन लनचेनबा वह पुस्तक लौटाने आए। उनके हाथ में कागजों का एक पुलिंदा भी था। बोले, ‘सर, मेरी कुछ कविताएं सुनिए’। उन्होंने काफी देर तक जिन कविताओं का पाठ किया, वे सब पंचपदी शैली में थीं। इनमें जीवन के असंख्य अनुभव प्रभावशाली बिंबों में आकार ग्रहण करते प्रतीत हो रहे थे। मणिपुरी कविता में यह एक नवीन रचना शैली थी, जिसे तेलुगु के सी. नारायण रेड्डी की पंचपदियों से ग्रहण किया गया था। कवि लनचेनबा को इस बात का गर्व भी था कि उन्होंने अपनी मातृभाषा की काव्य परंपरा में एक नवीन वैशिष्ट्य जोड़ा। स्मरणीय है कि ‘येंङ्लु येंङ्लुबदा’ नाम से इन कविताओं का एक संग्रह छपा, जिसने मणिपुरी युवा कविता आंदोलन की महत्वपूर्ण कृति होने का गौरव प्राप्त किया और इसका हिंदी में अनुवाद सिद्धनाथ प्रसाद द्वारा किया गया, जो ‘जित देखूँ’ नाम से 1998 में प्रकाश में आया। इस घटना से तेलुगु, मणिपुरी और हिंदी के संबंध भी सामने आते हैं तथा भारतीय साहित्य के निर्माण की प्रक्रिया पर भी प्रकाश पड़ता है।“ 

तेलुगु साहित्यकारों की रचनाधर्मिता और सामाजिक यथार्थ के प्रति जागरूकता भी इस पुस्तक के माध्यम से हिंदी पाठकों के समक्ष प्रकट होती है। इस संदर्भ में पुस्तक में ‘ऋषभ उवाच’ से उद्धृत कथन दृष्टव्य है – “निखिलेश्वर का मत है कि तेलुगु साहित्यकार सामाजिक यथार्थ के प्रति अत्यंत सजग रहे हैं तथा पश्चिमी साहित्य में जो परिवर्तन 300 वर्षों में हुए, तेलुगु में वे 100 वर्ष में संपन्न हो गए।“ 

कहने का अभिप्राय यह है कि तेलुगु साहित्यकारों ने जिन विधाओं और विषयों पर अपनी लेखनी चलाई है, उन विधाओं और विषयों का अनुवाद के माध्यम से हिंदी में तथा भारत की अन्य भाषाओं में आदान-प्रदान होता है तो उन भाषाओं के साहित्य को समृद्ध होने के अवसर मिलने लगते हैं। इस कार्य में आलोचनाओं की परवाह न करते हुए साधना कर रहे सारे अनुवादक बधाई के पात्र हैं और इस महत्तर कार्य की जानकारी हिंदी पाठक तक पहुंचाने में यह कृति सफल हुई है। 

लेखकद्वय ने तेलुगु साहित्य के हिंदी अनुवाद संबंधी अनेक आलेखों तथा कतिपय अन्य स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर तेलुगु से हिंदी में अनूदित साहित्य को विधावार सूची बद्ध किया है। और 1954 से अबतक काव्य के 100, उपन्यास के 49, कहानी संग्रहों के 49 तथा विविध विधाओं जिनके अंतर्गत निबंध, एकांकी, नाटक, जीवनी, इतिहास, भाषाविज्ञान, काव्यशास्त्र, व्याख्या-टीका, दर्शनशास्त्र, आत्मकथा, समीक्षा, अनुवादशास्त्र आदि शामिल हैं के 65 अनुवादों की सूची उपलब्ध कराई गई है। 

भारत की बहुभाषिकता अनुवाद के माध्यम से ही सम भाषिकता के रूप में हमारे सामने उपस्थित होती है। भारत का हर नागरिक कम से कम तीन भाषाओं का ज्ञाता होता है और बहुभाषिकता को ग्रहण कर सम भाषिक होने के प्रमाण देता रहता है। अनुवाद के माध्यम से राष्ट्रीय एकता प्रकट होती है। इसे बहुत ही सटीक रूप में रेखांकित करती है यह पुस्तक ‘तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय’। 

अंत में मैं इतना अवश्य कहना चाहूँगा कि यह पुस्तक हिंदी पाठक के समक्ष तेलुगु साहित्य के हिंदी अनुवाद और उसके प्रदेय को बड़ी शालीनता से, बिना किसी शोर और आडंबर के उद्घाटित करती है। लेखकद्वय ने बड़े परिश्रम से विवेच्य कृति की रचना की है। दोनों को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। साथ ही, प्रकाशक परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद को भी धन्यवाद.

  • तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय, ऋषभदेव शर्मा और गुर्रमकोंडा नीरजा, 2015, परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद, 50 रु., 64 पृष्ठ, ISBN - 978-93-84068-11-0 

[समाचार] साहित्य मंथन सृजन पुरस्कार समर्पण समारोह

 [डेली हिंदी मिलाप - 21/11/2014, पृष्ठ 15]

बुधवार, 19 नवंबर 2014

डॉ. जोराम यालाम नाबाम को प्रथम साहित्य मंथन सृजन पुरस्कार प्रदत्त

प्रथम ‘साहित्य मंथन सृजन पुरस्कार’ ग्रहण करते हुए अरुणाचल प्रदेश की हिंदी लेखिका डॉ. जोराम यालाम नाबाम. साथ में – प्रो. एन. गोपि, पद्मश्री जगदीश मित्तल, प्रो. एम. वेंकटेश्वर और विवेक नाबाम. 

डॉ. जोराम यालाम नाबाम की पुस्तक के अंग्रेजी अनुवाद ‘तानी मोमेन’ का लोकार्पण करते हुए प्रो. एम. वेंकटेश्वर. साथ में – प्रो. देवराज, प्रो. एन. गोपि, पद्मश्री जगदीश मित्तल, अनुवादक विवेक नाबाम, लेखिका डॉ. जोराम यालाम नाबाम, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा और प्रो. ऋषभदेव शर्मा. 

विशिष्ट अतिथि प्रो. देवराज के संबोधन को सुनते हुए तल्लीन श्रोता.

हैदराबाद, 15 नवंबर 2014..

‘मेरी माँ कहती थी कि चमत्कार पर विश्वास मत करो बल्कि चमत्कार को देखना सीखो. आज मेरी माँ मुझे याद आ रही है क्योंकि हैदराबाद के इस सभागार में मेरे लिए चमत्कार हो रहा है. मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि प्रेम के इस शहर में मुझे इतने महत्वपूर्ण पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है. मेरे पास शब्द नहीं है कि इस खुशी को अभिव्यक्त कर सकूँ. बस महसूस कर रही हूँ. मुझे लग रहा है कि ‘साहित्य मंथन’ ने मुझ पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी डाल दी है कि मैं लगातार अधिक से अधिक लिखती रहूँ.’

ये उद्गार अरुणाचल प्रदेश की पहली हिंदी कथाकार डॉ. जोराम यालाम नाबाम ने ‘साहित्य मंथन’ के तत्वावधान में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के खैरताबाद स्थित सम्मेलन कक्ष में संपन्न सम्मान समारोह में प्रथम ‘साहित्य मंथन सृजन पुरस्कार’ ग्रहण करते हुए प्रकट किए. यह पुरस्कार उन्हें वर्ष 2013 में प्रकाशित उनकी कथाकृति ‘साक्षी है पीपल’ पर प्रदान किया गया. 

समारोह में उपस्थित सभी साहित्यप्रेमी उस समय अभिभूत हो उठे जब डॉ. यालाम ने अपने वक्तव्य का समापन करते हुए कहा कि ‘मैं अपने हृदय की पूरी श्रद्धा के साथ यह पुरस्कार शिरोधार्य करते हुए पूर्ण पवित्रता का अनुभव कर रही हूँ.’ आज जब साहित्यिक पुरस्कारों को लेकर पुरस्कारदाता संस्था और पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं के मन में केवल लेन-देन की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है वहाँ जोराम यालाम नाबाम द्वारा पुरस्कार की स्वीकृति का यह भाव एक नई आश्वस्ति को जन्म देता है. 

उल्लेखनीय है कि ‘साहित्य मंथन सृजन पुरस्कार’ का प्रवर्तन पं. चतुर्देव शास्त्री की स्मृति में इसी वर्ष किया गया है. संस्था की अध्यक्ष डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने बताया कि यह पुरस्कार प्रति वर्ष साहित्य, समाजविज्ञान और संस्कृति संबंधी प्रकाशित कृति पर एक-एक वर्ष के क्रम में प्रदान किया जाएगा. पुरस्कार के अंतर्गत 11,000 रुपए की सम्मान राशि, प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिह्न, शाल, श्रीफल और लेखन सामग्री सम्मिलित हैं. 

डॉ. यालाम को पुरस्कार प्रदान करते हुए ‘नानीलु’ के प्रवर्तक और साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत प्रतिष्ठित तेलुगु कवि प्रो. एन. गोपि ने कहा कि यह मात्र डॉ. यालाम का ही सम्मान नहीं बल्कि पूर्वोत्तर की हिंदी रचनाशीलता का सम्मान है. उन्होंने ध्यान दिलाया कि हिंदी ही भारत को अखंड बनाने वाली भाषा है. यालाम की कहानियों में मुखरित स्त्री वेदना को उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के जनजातीय परिवेश का सच बताया. 

विश्वप्रसिद्ध कला संग्राहक पद्मश्री जगदीश मित्तल ने दीप प्रज्वलन करके कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन करते हुए कहा कि डॉ. यालाम को सम्मानित कर ‘साहित्य मंथन’ ने एक अनूठी पहल की है. यह सिलसिला बना रहना चाहिए. 

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पधारे प्रो. देवराज ने अपने वक्तव्य में अरुणाचल सहित समस्त पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक विरासत और पौराणिक कथाओं का उल्लेख करते हुए आह्वान किया कि उस समस्त अलिखित संपदा को हिंदी के माध्यम से देश और दुनिया के सामने लाया जाना चाहिए. इस दिशा में पुरस्कृत लेखिका के प्रयासों की उन्होंने मुक्त कंठ से सराहना की. 

समारोह की अध्यक्षता करते हुए अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. एम. वेकटेश्वर ने कहा कि अरुणाचल में जीवन को रोज एक नई चुनौती का सामना करना पड़ता है. ऐसे में वहाँ की स्त्रियाँ अपने अदम्य साहस के बल पर विषम परिस्थितियों से दो-दो हाथ करती हैं तथा डॉ. यालाम के कहानी सग्रह ‘साक्षी है पीपल’ में अरुणाचल की जनजातियों की इसी स्त्री का दर्द अभिव्यक्त हुआ है. 

इस अवसर पर अरुणाचल प्रदेश के पौराणिक आख्यानों पर आधारित डॉ. जोराम यालाम नाबाम की हिंदी पुस्तक ‘तानी मोमेन’ (पुरखों की लीलास्थली) के विवेक नाबाम द्वारा किए गए अंग्रेजी अनुवाद को भी डॉ. एम. वेंकटेश्वर ने लोकार्पित किया. 

समारोह का संचालन डॉ. जी. नीरजा ने किया तथा ‘साहित्य मंथन’ के संस्थापक डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने आभार प्रकट किया. 

प्रस्तुति : डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा

सोमवार, 10 नवंबर 2014

साहित्य मंथन सृजन पुरस्कार समारोह 15 नवंबर को

साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था ‘साहित्य मंथन’ द्वारा स्थापित ‘साहित्य मंथन सृजन पुरस्कार’ प्रदान किए जाने के संदर्भ में आगामी 15 नवंबर (शनिवार) को अपराह्न 4 बजे दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के खैरताबाद स्थित परिसर में एक सम्मान समारोह का आयोजन किया जा रहा है. इस समारोह में अरुणाचल प्रदेश की युवा कथाकार डॉ. जोराम यालाम नाबाम को उनके 2013 में प्रकाशित कहानी संग्रह ‘साक्षी है पीपल’ के लिए प्रथम ‘साहित्य मंथन सृजन पुरस्कार’ प्रदान किया जाएगा.

पुरस्कार के संस्थापक डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने बताया कि पुरस्कृत लेखिका डॉ. जोराम यालाम नाबाम ने अपनी कहानियों के माध्यम से अरुणाचल प्रदेश की बहु-जनजातीय संस्कृति के अंकन के साथ साथ वहाँ के स्त्री समाज की दशा का जो प्रामाणिक चित्रण किया है वह हिंदी साहित्य में अपने प्रकार की पहली घटना है. उन्होंने यह भी बताया कि पुरस्कृत लेखिका स्वयं जनजातीय समुदाय से संबद्ध हैं और उन्होंने विभिन्न जनजातियों की भाषा और संस्कृति का गहन अध्ययन किया है. 

पुरस्कार समारोह की अध्यक्षता अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. एम. वेंकटेश्वर करेंगे. बतौर मुख्य अतिथि वरिष्ठ तेलुगु साहित्यकार प्रो. एन. गोपि लेखिका को पुरस्कार स्वरूप ग्यारह हजार रुपए की सम्मान राशि, प्रशस्ति पत्र, शाल और स्मृति चिह्न समर्पित करेंगे. समारोह का उद्घाटन विख्यात कला समीक्षक पद्मश्री जगदीश मित्तल करेंगे तथा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के अधिष्ठाता प्रो. देवराज विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे. 
समारोह की व्यवस्था समिति की आज संपन्न बैठक में यह भी तय किया गया कि इस अवसर पर पुरस्कृत लेखिका का हैदराबाद की विभिन्न हिंदी संस्थाओं की ओर से सारस्वत सम्मान भी किया जाएगा. समारोह की व्यवस्था समिति में गुरुदयाल अग्रवाल, ज्योति नारायण, डॉ. मंजु शर्मा, डॉ. बी. बालाजी, डॉ. पूर्णिमा शर्मा, डॉ. सय्यद मासूम रज़ा एवं वी. कृष्णा राव उपस्थित रहें. समारोह संयोजक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने समस्त साहित्य प्रेमियों से इस कार्यक्रम में पधारने की अपील की है.