शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

‘मुझे कुछ कहना है’ का लोकार्पण 19 फरवरी को ‘कादंबिनी क्लब’ में


हैदराबाद, 17 फरवरी, 2017.

कादंबिनी क्लब, हैदराबाद के तत्वावधान में रविवार दिनांक 19 फरवरी, 2017 को प्रातः 11.30 बजे सुलतान बाज़ार, हैदराबाद में दिलशाद प्लाजा के समीप स्थित श्रीकृष्णदेव राय सभागार में क्लब की 295वीं मासिक गोष्ठी एवं पुस्तक लोकार्पण समारोह का आयोजन किया जा रहा है.

इस अवसर पर अरबामिंच विश्वविद्यालय, इथियोपिया (पूर्वी अफ्रीका) के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. गोपाल शर्मा बतौर मुख्य अतिथि मंचासीन होंगे तथा केंद्रीय हिंदी संस्थान, मैसूर के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. राम निवास साहू की औपन्यासिक आत्मकथा ‘मुझे कुछ कहना है’ (प्रथम भाग) को लोकार्पित करेंगे. साथ ही, कादंबिनी क्लब द्वारा प्रकाशित ‘पुष्पक-33’ का लोकार्पण डॉ. राम निवास साहू के हाथों संपन्न होगा. लोकार्पित कृतियों का परिचय क्रमशः लक्ष्मी नारायण अग्रवाल और डॉ. मदनदेवी पोकरणा द्वारा दिया जाएगा. डॉ. अहिल्या मिश्र आशीर्वचन देंगी तथा डॉ. ऋषभ देव शर्मा अध्यक्षता करेंगे.

आरंभ में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ पर संक्षिप्त चर्चा के साथ उनकी कविता का पाठ किया जाएगा तथा अंत में ऋतुराज वसंत के संदर्भ में विशिष्ट कविगोष्ठी होगी. विभिन्न सत्रों का संयोजन प्रवीण प्रणव, अवधेश कुमार सिन्हा, डॉ. रमा द्विवेदी, मीना मुथा एवं मंगला अभ्यंकर द्वारा किया जाएगा.

सभी साहित्यप्रेमियों से अनुरोध है कि समय पर उपस्थिति प्रदान कर समारोह को सफल बनाएँ.

[प्रस्तुति : कादंबिनी क्लब, हैदराबाद]

[पुस्तक] 'मुझे कुछ कहना है' : डॉ. राम निवास साहू



मुझे कुछ कहना है (आत्मकथा) / डॉ. राम निवास साहू/ 2017/
अनन्य प्रकाशन, ई-17, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली -110032/
 192 रुपए/ 395 पृष्ठ/ सजिल्द.


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वनवासी विमर्श का  नया आयाम


डॉ. रामनिवास साहू मूलतः एक भाषा-अध्येता हैं. उन्होंने मुंडा भाषाओँ के अपने सर्वेक्षण के लिए पर्याप्त ख्याति अर्जित की है जिसका भौगोलिक क्षेत्र छतीसगढ़ रहा है. छतीसगढ़ से उनका लगाव स्वाभाविक है क्योंकि वह उनकी जन्मभूमि है तथा उसके सौंदर्य और विद्रूप के मिले-जुले अनुभवों ने उनके व्यक्तित्व को बनाया, निखारा और सँवारा है. उनके मानस में छतीसगढ़ का आंचलिक परिवेश और जीवन उसकी बोली-बानी के साथ निरंतर बजता रहता है. वे प्रायः बेचैन रहते हैं कि किस प्रकार इस अंचल की नई पीढ़ी को शिक्षा के प्रकाश के सहारे राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल किया जाए ताकि वह गरीबी, पिछड़ेपन और शोषण से मुक्त हो सके और सही अर्थ में प्रजातांत्रिक व्यवस्था का अंग बनकर विकास के लाभ अपने जन, ज़मीन और जंगल तक पहुँचा सके. यह बेचैनी ही उन्हें कथा और आत्मकथा लिखने के लिए प्रेरित करती है. 

अपनी औपन्यासिक आत्मकथा ‘’मुझे कुछ कहना है’’ में लेखक ने अपने बहाने छतीसगढ़ के वनवासी समुदायों की आंचलिक जीवनचर्या को उनकी आदिम जिजीविषा के संदर्भ में भली प्रकार उकेरा है. इस प्रक्रिया में सामने आने वाली वनवासी समुदायों के स्थापन-विस्थापन-पुनर्स्थापन की रोचक ऐतिहासिक कथा, वन के देवी-देवताओं की लोकगाथा, जनता और सत्ता के संबंध, शोषण और लोकोपकार की द्वंद्वात्मक उपस्थिति, पुरुषों की भोगवादी-वर्चस्ववादी प्रवृत्ति तथा स्त्रियों की लुटते-घुटते रहने की अनंत शोकांतिका इस आत्मकथा को वैयक्तिक निजता के द्वीप से निकालकर लोकमंगल के व्यापक कथ्य में परिणत कर देती है. 

हिंदी में वनवासी विमर्श को नया आयाम प्रदान करने वाली इस कृति के प्रणयन के लिए लेखक को भूरिशः साधुवाद! 


- प्रो. ऋषभदेव शर्मा 

पूर्व अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद केंद्र.

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एक हाशियाकृत अंचल की छटपटाहट 


भारतवर्ष अपने वर्तमान स्वरूप में इतनी अधिक विविधताओं से भरा हुआ महादेश है कि इसमें सभ्यता की आदिम अवस्था से लेकर उत्तर आधुनिक अवस्था तक को एक साथ देखा जा सकता है. खास तौर पर यदि हम वनवासी समुदायों को निकट से देखें तथा उनके जीवन-संघर्ष को समझने का प्रयास करें तो कबीलाई सभ्यता से चलकर ग्राम सभ्यता और फिर नगर सभ्यता के विकास के विविध चरणों के लोक-इतिहास को सहज ही परिलक्षित कर सकते हैं. इसी के साथ, शिक्षा और विकास के समांतर मनुष्य के हाथ से रेत की तरह भोलेपन और आनंद की संपदा का फिसलते-रिसते जाना भी एक ऐसा विषम यथार्थ है जिसे नकारा नहीं जा सकता. वनवासी समुदाय प्रकृति के सामीप्य के बावजूद कई प्रकार की विसंगतियों के भी शिकार दिखाई देते हैं; आर्थिक-राजनैतिक शोषण तो है ही. 


‘’मुझे कुछ कहना है’’ शीर्षक अपनी औपन्यासिक आत्मकथा में डॉ. रामनिवास साहू ने इन सब सामाजिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में छत्तीसगढ़ के एक वनवासी अंचल के परिवेश, संघर्ष, सौंदर्य और विद्रूप को रेखांकित करने का सफल प्रयास किया है. लेखक ने इस अंचल को किसी जिज्ञासु पर्यटक या खोजी पत्रकार की दृष्टि से बाहर-बाहर से नहीं देखा है, बल्कि वह इस अंचल का निवासी होने के कारण इसके सारे सुख-दुःख का स्वयं भोक्ता है. अतः इसकी प्रामाणिकता असंदिग्ध है. सभ्यता की दौड़ में पीछे छोड़ दिए गए एक हाशियाकृत अंचल से संबद्ध लेखक के मन की छटपटाहट का एक कारण इस द्वंद्व में भी निहित दीखता है कि वह विकास तो चाहता है पर इसके लिए निसर्ग की बलि देना उसे स्वीकार नहीं. 

आशा है, साहित्य-जगत इस वनवासी विमर्श का स्वागत करेगा; इसमें शामिल होगा. 
 - प्रो. देवराज 

अधिष्ठाता, अनुवाद विद्यापीठ, 
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी वि.वि., वर्धा

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

'अभिनव विमर्श' के लिए शोध-आलेख आमंत्रित



अभिनव विमर्श

(शोधपत्र संग्रह)
आईएसबीएन : 978-93-84068-50-9.
संपादक :
डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा
प्रायोजना निदेशक :  
डॉ. ऋषभदेव शर्मा
प्रकाशक :
परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद – 246763.
वितरक :
श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद – 500048.


नियमावली

  1. ‘अभिनव विमर्श’  एक अव्यावसायिक और परस्पर सहयोग पर आधारित प्रायोजना है.
  2. ‘अभिनव विमर्श’ का प्रकाशन हिंदी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में अभिनव अनुसंधान को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से किया जा रहा है.
  3. इसमें प्रतिष्ठित विद्वानों, प्राध्यापकों और आचार्यों के साथ-साथ हिंदी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में अनुसंधानरत एम.फिल. और पीएच.डी. के शोधार्थी शामिल हो सकते हैं.
  4. इस प्रायोजना के अंतर्गत हिंदी भाषा और साहित्य के विविध क्षेत्रों से संबंधित शोधपत्र प्रकाशित किए जाएँगे.
  5. विद्वान/ शोधार्थी अपने शोधपत्र  संपादक को ईमेल द्वारा प्रेषित कर सकते हैं.
  6. संपादक का ईमेल पता है : srisahitiprakashan@yahoo.com
  7. शोधपत्र के साथ लेखक द्वारा मौलिकता का प्रमाणपत्र देना अनिवार्य है.  
  8. शोधपत्र अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होने चाहिए तथा संदर्भ/ उद्धरण/ ग्रंथ सूची के लिए ‘APA स्टाइल’ का पालन अनिवार्य है.   
  9. प्रकाशनार्थ प्रेषित शोधपत्र अनिवार्यतः कृतिदेव 010 अथवा हिंदी यूनिकोड फॉण्ट में वर्ड फ़ाइल में ही टंकित होने चाहिए. अन्य किसी फॉण्ट या फोर्मेट में भेजे गए शोधपत्र विचारार्थ स्वीकार नहीं किए जाएँगे. पीडीएफ और स्कैन प्रतियाँ न भेजें.
  10. प्रकाशनार्थ प्रेषित शोधपत्र लगभग 3000 शब्दों के होने चाहिए.
  11. बहुत छोटे और बहुत बड़े शोधपत्र विचारार्थ स्वीकार नहीं किए जाएँगे.
  12. प्रकाशन के लिए प्राप्त आलेख ‘अभिनव विमर्श’ की विशेषज्ञ समिति के समक्ष रखे जाएँगे. समिति की स्वीकृति मिलने पर ही उन्हें प्रकाशन के लिए स्वीकार किया जाएगा.
  13. स्वीकार किए गए प्रत्येक शोधपत्र के प्रकाशन हेतु लेखक को 1000 रु. सहयोग राशि अग्रिम जमा करनी होगी.
  14. प्रकाशित होने पर ‘अभिनव विमर्श’ की 1000 रु. मूल्य की प्रतियाँ प्रत्येक सहयोगी लेखक को सादर भेंट की जाएँगी.
  15. शोधपत्र भेजने की अंतिम तिथि : 31 मार्च, 2017.

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

राजमहेंद्रवरम में प्रो. ऋषभदेव शर्मा का षष्ठिपूर्ति समारोह संपन्न



चित्र परिचय – 
1. शहनाई के साथ कल्याण मंडपम की ओर प्रस्थान. 2. गणेश वंदना : कुचिपुड़ी नृत्य.3. डॉ. ऋषभदेव शर्मा और डॉ. पूर्णिमा शर्मा : आसन पर.  4. प्रो. देवराज समीक्षात्मक उद्धरणों की दीवार का उद्घाटन करते हुए.  

5. डॉ. भागवतुल हेमलता कविता-पोस्टरों का उद्घाटन करते हुए.  6. वरमाला का आदान-प्रदान .
 7. ‘रामभक्ति काव्य का लोक पक्ष’ का समर्पण. 8. प्रो. देवराज का स्वागत-सत्कार. 

9. कुमार लव की काव्यकृति का समर्पण. 10. ‘तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा’ प्रो. ऋषभदेव शर्मा को समर्पित. 11. प्रो. देवराज का अध्यक्षीय संबोधन. 12. प्रो. देवराज द्वारा प्रो. ऋषभदेव शर्मा की पुस्तक ‘कथाकारों की दुनिया’ का लोकार्पण.



राजमहेंद्रवरम, 29 जनवरी, 2017 (मीडिया विज्ञप्ति).

यहाँ आदित्य डिग्री कॉलेज, राजमहेंद्रवरम के सभाकक्ष में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के अधिष्ठाता प्रो. देवराज की अध्यक्षता में प्रतिष्ठित तेवरीकार, कवि, समीक्षक, हिंदीसेवी एवं शोध निर्देशक प्रो. ऋषभदेव शर्मा के षष्ठिपूर्ति समारोह का आयोजन भव्यतापूर्वक संपन्न हुआ. समारोह का संयोजन डॉ. पोलवरपु जयलक्ष्मी और डॉ. सिरिपुरपु तुलसी देवी ने किया. 

दक्षिण भारत में यह परंपरा है कि परिवार के वरिष्ठ जन अथवा गुरुजन की साठवीं वर्षगाँठ पर विशिष्ट समारोह करके उनके सुखद भविष्य की कामना की जाती है. इसके अंतर्गत सम्मानित वरिष्ठ जन का ‘कल्याणम’ और ‘कनकाभिषेकम’ करते हुए उनसे संबंधित स्मृतियों का बखान किया जाता है. इसी रीति के अनुसार प्रो. ऋषभदेव शर्मा और उनकी पत्नी डॉ. पूर्णिमा शर्मा का वैदिक विधि-विधान से ‘कल्याणम’ (विवाह) संपन्न कराया गया जिसके उपरांत उनके परिवारी जन के साथ संपूर्ण दक्षिण भारत के विविध अंचलों से आए हुए पूर्व छात्रों और शोधार्थियों ने उनका अभिनंदन किया. 

वाणीश्री के कुचिपुड़ी नृत्य तथा मोहम्मद आबिद की संगीतमय प्रस्तुतियों के अलावा डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा और प्रवीण प्रणव द्वारा निर्मित लघु फिल्म भी प्रदर्शित की गई. कुल 38 मिनट की इस लघुफिल्म में प्रो. शर्मा के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व की रोचक अवं अंतरंग झांकी प्रस्तुत की गई. 

षष्ठिपूर्ति समारोह के द्वितीय सत्र में प्रो. ऋषभदेव शर्मा की विभिन्न काव्यकृतियों और समीक्षा पुस्तकों के उद्धरणों की पोस्टर-प्रदर्शनी भी तीन दीवारों पर प्रदर्शित की गई जिनका उद्घाटन प्रो. देवराज के साथ जयदीप मुखर्जी और डॉ भागवतुल हेमलता ने अलग अलग भाषाओं में हस्ताक्षर करके किया. 

तृतीय सत्र में प्रो. ऋषभदेव शर्मा की सद्यः प्रकाशित पुस्तक “कथाकारों की दुनिया” लोकार्पित की गई. साथ ही उन्हें समर्पित तीन अन्य ग्रंथों को भी लोकार्पित किया गया जिनमें डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की साहित्य-इतिहास की पुस्तक “तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा”, उत्तरआधुनिकतावादी कवि कुमार लव का कविता संग्रह “गर्भ में”, तथा पटना ,बिहार, की लेखिका डॉ. चंदन कुमारी का समीक्षाग्रंथ “राम भक्ति काव्य का लोकपक्ष” सम्मिलित हैं. 

अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. देवराज ने कहा कि दक्षिण भारत आधुनिकता और परंपरा को एक साथ साध कर चलनेवाला सांस्कृतिक क्षेत्र है और यहाँ के हिंदी विद्वानों तथा छात्रों द्वारा जिस पारिवारिक आत्मीयता के साथ ऋषभदेव शर्मा की षष्ठिपूर्ति का उत्सव मनाया जा रहा है, वह आधुनिक समय में गुरु-शिष्य संबंध की अनुकरणीय मिसाल है. राष्ट्रगान के साथ समारोह का समापन हुआ. संचालन डॉ. रविचंद्र राव और डॉ. बी. बालाजी ने किया. 

बुधवार, 4 जनवरी 2017

युगीन चुनौतियों के संदर्भ में 'राग दरबारी' आज बहुत प्रासंगिक : राजीव त्रिवेदी

डॉ. ऋषभदेव शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा संपादित 37 शोधपत्रों के संकलन 'अन्वेषी' (2016) का लोकार्पण 31 दिसंबर 2016 को  तिलक रोड, हैदराबाद स्थित तेलंगाना सारस्वत परिषद के सभागार में आयोजित श्रीलाल शुक्ल स्मारक राष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पधारे गृह विभाग, तेलंगाना सरकार के प्रधान सचिव राजीव त्रिवेदी आईपीएस के हाथों संपन्न हुआ.
समारोह की अध्यक्षता डॉ. अहिल्या मिश्र ने की तथा संयोजन डॉ. सीमा मिश्रा ने किया.
साथ में,  विशिष्ट अतिथि डॉ. गोपाल शर्मा तथा सम्माननीय अतिथि राजकुमार शुक्ल 'हंस' और अलका जैन, डॉ. बी. बालाजी,
डॉ. सुपर्णा बंद्योपाध्याय, डॉ. मंजु शर्मा , रूबी मिश्रा , अधिवक्ता अशोक तिवारी एवं अन्य.

श्रीलाल शुक्ल स्मारक राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं 
'अन्वेषी' का लोकार्पण समारोह संपन्न 


हैदराबाद, 1 जनवरी 2017. (मीडिया विज्ञप्ति).
      ‘’हिंदी एक ऐसी लचीली और उदार भाषा है जिसमें साहित्य और संस्कृति से लेकर मीडिया और बाज़ार तक को बाँध लेने की अद्भुत ताकत है. उसे यह ताकत व्यापक जनता और निष्ठावान साहित्यकारों से प्राप्त हुई है. हिंदी भाषा की इसी ताकत को पहचानकर श्रीलाल शुक्ल ने ‘राग दरबारी’ जैसा पूर्णतः व्यंग्यात्मक उपन्यास लिखा जो अपनी यथार्थपरकता के कारण आज भी युगीन चुनौतियों के संदर्भ में प्रासंगिक बना हुआ है. इसीलिए राजनीति और प्रशासन में कार्यरत हर व्यक्ति को ‘राग दरबारी’ अवश्य पढना चाहिए.’’ 

ये विचार यहाँ तिलक रोड स्थित तेलंगाना सारस्वत परिषद के सभागार में श्रीलाल शुक्ल स्मारक राष्ट्रीय संगोष्ठी समिति के तत्वावधान में संपन्न एक साहित्यिक समारोह का उद्घाटन करते हुए तेलंगाना सरकार गृह विभाग के प्रधान सचिव राजीव त्रिवेदी ने व्यक्त किए. इस अवसर पर उन्होंने डॉ. ऋषभदेव शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा संपादित 37 शोधपत्रों के संकलन ‘अन्वेषी’ को भी लोकार्पित किया तथा युवा हिंदीसेवी डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा को ‘प्रथम श्रीलाल शुक्ल स्मारक सारस्वत सम्मान’ से अलंकृत किया. 

विगत 10 वर्षों से मूर्धन्य साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल के जन्मदिन पर आयोजित किए जाने वाले इस आयोजन की अध्यक्षता वरिष्ठ लेखिका डॉ. अहिल्या मिश्र ने की. इंदौर से आए राजकुमार शुक्ल ‘हंस’ और अलका जैन ने बतौर सम्माननीय अतिथि शिरकत की. आरभ में आकाश तिवारी ने शंखनाद और अर्चना पांडे ने मंगलाचरण किया. ‘अन्वेषी’ की प्रथम प्रति डॉ. देवेंद्र शर्मा और कवयित्री विनीता शर्मा ने स्वीकार की. 

डॉ. सीमा मिश्रा ने विषय प्रवर्तन किया और कहा कि श्रीलाल शुक्ल कथा और व्यंग्य के बड़े रचनाकार हैं तथा अपने गहरे सामाजिक सरोकार के नाते पाठक को गुदगुदाते हुए समय और समाज की करुण त्रासदी से इस तरह परिचित कराते हैं कि न रोते बनता है ,न हँसते. 

विशिष्ट अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए इथियोपिया के अरबामिंच विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के आचार्य डॉ. गोपाल शर्मा ने श्रीलाल शुक्ल की रचनाओं के अंग्रेजी अनुवादों की चर्चा की तथा अरविंद अडिगा के बुकर पुरस्कृत अंग्रेजी उपन्यास ‘ द व्हाइट टाइगर’ से ‘राग दरबारी’ की तुलना करते हुए कहा कि ये कृतियाँ सामाजिक कलुष का चित्रण करने के बहाने हमें हमारे पतन की वास्तविकता से परिचित कराती हैं जो किसी भी व्यंग्यकार का प्रमुख लक्ष्य होता है. 

मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए डॉ. बी. बालाजी ने ‘’युगीन चुनौतियों के संदर्भ में श्रीलाल शुक्ल की रचनाधर्मिता’’ के विविध पहलुओं पर प्रकाश डाला और कहा कि ‘’श्रीलाल शुक्ल अपने ढंग के एक अनोखे रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य के माध्यम से राजनीति की विडंबनाओं को दिखाया। वे कथा की रोचकता के लिए जिन प्रसंगों को गढ़ते हैं, वे एक जैसे दिखते हुए भी अपनी अलग पहचाने बनाते हैं। व्यंग्य की धार उनके आरंभिक लेखन से विराम तक तेज होती गई है। उन्होंने नए कथ्य के लिए नए शिल्प गढ़े। उनकी रचनाप्रक्रिया और रचनाधर्मिता इसी से चरितार्थ हुई है। उनके साहित्य का कैनवस उनके विस्तृत जीवनानुभवों का संकलन है।‘’ 

सेंट एंस कॉलेज से संबद्ध डॉ. सुपर्णा बंद्योपाध्याय ने अपने शोधपत्र में रचनाकार की समकालीन, रचना में वर्णित युग की तथा वर्तमान युगीन सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनैतिक चुनौतियों की त्रि-आयामी कसौटी पर श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘पहला पडाव’ तथा अन्य व्यंग्य रचनाओं की पड़ताल करते हुए बताया कि मूलतः व्यंग्यकार होने के कारण अपने समय की हर विकृति पर श्रीलाल शुक्ल की पैनी निगाह थी जिसके कारण वे अपनी रचनाओं में ऐसा देश-काल रच सके जो अनेक दशक बाद आज की युगीन चुनौतियों को भी संबोधित करने में समर्थ है. 

लोकार्पित पुस्तक ‘अन्वेषी’ की समीक्षा चिरेक इंटरनेशनल से संबद्ध डॉ. मंजु शर्मा ने की. उन्होंने बताया कि अविचारणीय मान लिए गए, हाशिए पर धकेले गए, हाशियों की सीमा में कैद समुदायों के विचारों की अभिव्यक्ति का मुख्य रूप से विश्लेषण करने वाली यह पुस्तक विस्तृत फलक पर साहित्य अध्ययन की दृष्टि से अंतर्विद्यावर्ती शोधकार्यों को प्रोत्साहित करती है जिसके अंतर्गत स्त्री विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, वृद्धावस्था विमर्श और पर्यावरण विमर्श जैसे ज्वलंत विषयों पर लिखे गए शोधपत्र पाठकों तथा भावी शोधार्थियों के लिए दिशा निर्देशक हैं. 

समारोह का संचालन डॉ. सीमा मिश्रा ने किया. कार्यक्रम को सफल बनाने में अधिवक्ता अशोक तिवारी, वुल्ली कृष्णा राव, प्रवीण प्रणव, डॉ. पूर्णिमा शर्मा, डॉ. यशवंत जाधव, डॉ. सुस्मिता घोष, डॉ. जी. प्रवीणा राज, पवित्रा अग्रवाल, लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, इंद्रजीत सिंह, नितिन पाटिल, संतोष विजय मुनेश्वर, विनोद चौरसिया, माधुरी तिवारी, आशा मिश्रा मुक्ता, बनवारी लाल मीना, प्रभा कुमारी, गहनी नाथ, रूबी मिश्रा, अनिल, गीता, भंवरलाल उपाध्याय आदि साहित्यप्रेमियों और हिंदीसेवियों की उपस्थिति का महत्वपूर्ण योगदान रहा. 



रविवार, 1 जनवरी 2017

विविध विमर्शों का शोधपूर्ण समावेश :‘अन्वेषी’


डॉ. ऋषभदेव शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा संपादित 37 शोधपत्रों के संकलन 'अन्वेषी' (2016) का लोकार्पण 31 दिसंबर 2016 को  तिलक रोड, हैदराबाद स्थित तेलंगाना सारस्वत परिषद के सभागार में आयोजित श्रीलाल शुक्ल स्मारक राष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पधारे गृह विभाग, तेलंगाना सरकार के प्रधान सचिव राजीव त्रिवेदी आईपीएस के हाथों संपन्न हुआ.
समारोह की अध्यक्षता डॉ. अहिल्या मिश्र ने की तथा संयोजन डॉ. सीमा मिश्रा ने किया.
साथ में,  विशिष्ट अतिथि डॉ. गोपाल शर्मा तथा सम्माननीय अतिथि राजकुमार शुक्ल 'हंस' और अलका जैन, डॉ. बी. बालाजी,
डॉ. सुपर्णा बंद्योपाध्याय, डॉ. मंजु शर्मा , रूबी मिश्रा , अधिवक्ता अशोक तिवारी एवं अन्य.



विविध विमर्शों का शोधपूर्ण समावेश :‘अन्वेषी’ 

- डॉ. मंजु शर्मा , 
अध्यक्ष, हिंदी विभाग, 
चिरेक इंटरनेशनल, 
कोंडापुर, हैदराबाद (तेलंगाना)


['अन्वेषी' के लोकार्पण समारोह में प्रस्तुत समीक्षा]





पिछले कुछ वर्षों से यह महसूस किया जा रहा था कि हैदराबाद के हिंदी भाषा और साहित्य के शोधार्थियों और प्राध्यापकों को एक ऐसा मंच प्राप्त हो जिसके माध्यम से हमारे कार्य को हम प्रकाशित रूप में हिंदी जगत के समक्ष प्रस्तुत कर सकें. इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए ही एक सहयोगी प्रकाशन योजना के रूप में 2015 में ‘संकल्पना’ का संकल्प सामने आया. और अब उसके अगले सोपान के रूप में ‘अन्वेषी’ (2016) आपके सामने है. इस संकल्प को साकार करने का दायित्व स्वीकार किया हम सबकी परमप्रिय संपादक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा जी ने. यह काम बड़े धीरज का है और सच्चाई यह है कि कोई भी ऐसे ’थैंक-लेस’ काम को करना नहीं चाहता; पर ये कर रही हैं, किए जा रही हैं क्योंकि इस योजना को प्रधान संपादक के रूप में डॉ. ऋषभदेव शर्मा जी की निरंतर प्रेरणा प्राप्त है. उम्मीद करती हूँ कि आज ही मैडम इस यात्रा के अगले सोपान की भी घोषणा करेंगी.

‘अन्वेषी’ (2016 ) विचारों-विश्लेषणों का विमर्श है, कहना अतिशयोक्ति न होगा. अविचारणीय मान लिए गए, हाशिए पर धकेले गए, हाशियों की सीमा में कैद समुदायों के विचारों की अभिव्यक्ति का मुख्य रूप से विश्लेषण करने वाली यह पुस्तक विस्तृत फलक पर साहित्य अध्ययन की दृष्टि से अंतर्विद्यावर्ती शोधकार्यों को प्रोत्साहित करती है जिसके अंतर्गत स्त्री विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, वृद्धावस्था विमर्श और पर्यावरण विमर्श जैसे ज्वलंत विषयों पर लिखे गए शोधपत्र पाठकों तथा भावी शोधार्थियों के लिए दिशा निर्देशक भी हो सकते हैं.

‘अन्वेषी’ में वृद्धों के मनोजगत में होने वाले विचलन को महसूस किया जा सकता है. दलित जीवन की नारकीय स्थिति और स्त्री अभिव्यक्ति को भी रेखांकित किया गया है. इस पुस्तक में कविता विमर्श, भाषा विमर्श, कहानी विमर्श, उपन्यास विमर्श तथा मीडिया विमर्श पर भी शोधपरक आलेख हैं. 240 पृष्ठों के कलेवर में 7 खंड; तथा सात खंडों में 37 विषयों पर विचार विमर्श का अनोखा संगम.

‘हाशिया विमर्श’ में वृद्ध, दलित तथा स्त्री के जीवन में झाँका गया है . परिवार का वट वृक्ष जो स्वार्थ की कुल्हाड़ी की मार झेलता है! अपनों से अपनों के हाथों वृद्धों के मानस पटल पर होने वाले अत्याचार को शिवकुमार राजौरिया ने बख़ूबी पढ़ा है . यहाँ वृद्धों के मानसिक त्रास का दर्दभरा आभास मिलता है, इतना ही नहीं आज की पीढ़ी से सवाल करती वे बूढ़ी गद्मलाई आँखें कि समय तो सबका आता होगा .. खैर! झकझोर देती हैं . इन्हें कबाड़ की तरह एक कोने में फेंक दिया जाता है . वृद्ध परायेपन तथा अलगाव का शिकार हो रहे हैं .

हाशिया विमर्श की इसी कड़ी में जहाँ दलित जीवन की भयावहता और विवशता है वहीं स्त्री चेतना तथा उसकी अभिव्यक्ति को भी वाणी दी गई है जिसे टी. सुभाषिणी, डॉ. पोलवरपु जयलक्ष्मी, डॉ. सुरैया परवीन, डॉ. सुस्मिता घोष, उषा यादव, सुबोध कुमार सिंह (बेंगलूरु) और डॉ. अर्पणा दीप्ति ने बखूबी अंजाम दिया है. 

दूसरे खंड ‘भाषा विमर्श’ में हिंदी–मराठी भाषा की संरचना, भाषा विज्ञान के सामाजिक स्वरूप के साथ ही दक्खिनी भाषा के उद्भव और विकास पर चिंतन किया गया है . डॉ. मिलिंद पाटिल (वर्धा), डॉ. जोराम यालाम नाबाम (अरुणाचल प्रदेश) और डॉ. जी.प्रवीणा के ये शोधपत्र पारंपरिक और अधुनातन भाषाविज्ञान के शोधार्थियों के बड़े काम के हैं. 

तीसरे खंड ‘कविता विमर्श’ में साहित्य के कोमल रूप अर्थात काव्य का विश्लेषण शामिल है. सिरिपुरपु तुलसी देवी ने भक्तिकाव्य को प्रेम और सौंदर्य की खोज के लिए खंगाला है तो इंद्रजीत सिंह ने सूफ़ियाना अंदाज़ में प्रेमाख्यानों के वर्ण्य विषयों को स्पष्ट किया है . नितिन पाटिल रामविलास शर्मा की कविता के मार्क्सवादी तेवर को उभारते हैं, तो सुशील कुमार शैली (नाभा, पंजाब) कुमार विकल की कविताओं में अँधेरे और प्रकाश के द्वंद्व को बिंब-विश्लेषण के सहारे रेखांकित करते हैं. इसी खंड में अमन कुमार त्यागी ने डॉ. देवराज की राजनैतिक कविताओं में व्यंजित देश की समस्याओं तथा अकर्मण्यता पर खीज को चीन्हा है. पंद्रह राजनैतिक कविताओं का यह संक्षिप्त अवलोकन पाठक में उनकी कविताओं को पढ़ने की ललक जगाता है. 

कहानी तथा उपन्यास विमर्श विषयक खंडों में मानवाधिकार, आर्थिक संरचना, आंचलिकता, मनोविश्लेष्ण, पत्रकारिता, संस्कृति और सामाजिक यथार्थ की कथात्मक अभिव्यक्ति की नई दिशाओं की पहचान की गई है . डॉ. कोमल सिंह (नजीबाबाद), डॉ. एन. ललिता (कोयंबत्तूर), डॉ. अनुपमा तिवारी (विशाखपट्टनम), संतोष विजय मुनेश्वर, मोहम्मद माजिद मिया (दार्जिलिंग), समला देवी (दिल्ली), विनोद चौरसिया, माधुरी तिवारी, आशा मिश्रा ‘मुक्ता’ और डॉ. सुपर्णा मुखर्जी के साथ-साथ डॉ. ऋषभदेव शर्मा की उपस्थिति इसकी विशेषता है. ‘रंगभूमि’ और ‘गोदान’ जैसी कृतियों का वर्तमान संदर्भ में पुनर्पाठ सचमुच आँख खोलने वाला है.

छठे खंड मीडिया विमर्श में तीन शोधपत्र शामिल हैं. प्रतिष्ठित पत्रकार अरविंद कुमार सिंह (आजमगढ़), वर्षा कुमारी और डॉ. सुनीता जाजोदिया (चेन्नई) ने इन शोधपत्रों में क्रमशः गुंजेश्वरी प्रसाद, रामवृक्ष बेनीपुरी और तमिलनाडु की हिंदी पत्रकारिता पर खोजपूर्ण दृष्टि डाली है. 

इस पुस्तक के अंतिम खंड ‘विविधा’ में एक ओर तो डॉ. हर्षवर्धन सिंह (बिजनौर) ने वैदिक और स्मृतिकालीन नीति, न्याय, समाज तथा राजनीति की स्थितियों को रेखांकित किया है तथा दूसरी ओर प्रभाकुमारी और बनवारी लाल मीना ने भाषा और संस्कृति के संदर्भ में भारतीय शिक्षा नीतियों का विश्लेषण किया है. गहनीनाथ ने जानकीवल्लभ शास्त्री तथा आनंद कुमार यादव (बाँदा) ने रामविलास शर्मा के प्रदेय का मूल्यांकन किया है. यहीं डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा का शोधपत्र भी है – ‘आधुनिक तेलुगु साहित्य में रामकथा’, जिसमें विश्वनाथ सत्यनारायण, रंगनायकम्मा और ओल्गा की कृतियों का संदर्भ शामिल है. मैं महसूस करती हूँ कि उनका यह आलेख एक ब्लू-प्रिंट सरीखा है जिसमें आधुनिक राम-साहित्य संबंधी कई सारी शोध योजनाओं की संभावनाओं की ओर इशारा है – बशर्ते कि आप भारतीय साहित्य और तुलनात्मक अध्ययन के क्षेत्र में कुछ करना चाहते हों!

अब तक की चर्चा से आप समझ गए होंगे कि ‘अन्वेषी’ नाम की यह पुस्तक गागर में सागर भरने वाली कहावत को चरितार्थ करती है. इसमें अरुणाचल प्रदेश से लेकर चेन्नई तक के विविध विश्वविद्यालयों के अध्येता और अध्यापकों ने सहयोग किया है. सभी सम्मिलित लेखक एवं शोधार्थीगण बधाई के पात्र है जो इस दुर्लभ पुस्तक के सहयोगी रहे है . मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि यह पुस्तक शोधार्थियों के लिए पथ प्रदर्शक का काम करने में समर्थ है . निश्चय ही यह संपादकद्वय प्रो. ऋषभदेव शर्मा जी और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा जी के अथक परिश्रम, सूक्ष्म दृष्टिकोण तथा गहन ज्ञान का उत्कृष्ट परिणाम है . 



समीक्षित कृति : अन्वेषी / 
संपादक : डॉ. ऋषभदेव शर्मा एवं डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा / 
प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन, वालिया मार्केट, 
निकट साहू जैन कॉलेज, कोतवाली मार्ग,नजीबाबाद – 246763/ 
 वितरक : श्रीसहिती प्रकाशन, हैदराबाद; मो. 09849986346./
 पृष्ठ : 240 / 
मूल्य : 250 रुपए.