बुधवार, 1 मई 2019

शोध प्रविधि पर व्याख्यान



29 अप्रैल, 2019 से 1 मई, 2019 की अवधि में डॉ. बी. आर. अंबेडकर सार्वत्रिक विश्वविद्यालय, हैदराबाद में हिंदी भाषा और साहित्य के शोधार्थियों के निमित्त आयोजित व्याख्यानमाला के अंतर्गत प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने चार सत्रों में - शोध के उपागम, हिंदी अनुसंधान में उपागमों का अनुप्रयोग, शोधप्रबंध लेखन  तथा हिंदी में अनुसंधान का विकास - पर व्याख्यान दिए। इस अवसर पर अधिष्ठाता प्रो. शकीला खानम, अकादमिक सहयोगी डॉ. अविनाश तथा प्रतिभागी शोधर्थियों के साथ सामूहिक चित्र। 

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

(पुस्तक समीक्षा) जो कविता है !

 पुस्तक समीक्षा
जो कविता है ! 
- प्रो. गोपाल शर्मा 

यदि आप मेरे इस आलेख को किसी पढ़े-लिखे का समझकर पढ़ रहे हैं और गुर्रमकोंडा नीरजा को नहीं जानते तो मेरी बेशकीमती सलाह है – आप पहले इस कविता-संग्रह (कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा. गुर्रमकोंडा नीरजा. 2019. नजीबाबाद : पारिलेख प्रकाशन) का परिशिष्ट पढ़ें। डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने “नत नयन, प्रिय कर्मरत मन नीरजा” शीर्षक से सुसज्जित करके 2014 में इसे लिखा था। आप जानते हैं 2014 और 2019 में अंतर है। अब नीरजा जी का मुकुल भी इस ‘थैंकलेस’ जमाने में अच्छे दिनों की मानिंद खिल उठा है। उन्हें वह स्थान अब मिल गया है जिसकी वे मुस्तहक हैं। लखटकिया पुरस्कार और वह भी केंद्रीय हिंदी निदेशालय से, यह हुई न कोई बताने वाली बात! 

‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’ नीरजा की विविध काव्यात्मक अभिव्यक्तियों का गुलदस्ता है जिसमें किसिम किसिम के फूल हैं; कुछ मौलिक कविताएँ, कुछ अनूदित (तेलुगु और तमिल से)। बड़े अरमानों से रक्खा गया यह कदम बड़े लोगों के द्वारा सराहा गया है – अभी यह शुरूआत है (गंगा प्रसाद विमल) और अनूठे काव्य संग्रह की हर रचना मन को उकेरती है (देवी नागरानी)। 

कवि लोग होते बहुत उस्ताद हैं, कहते हैं वे कुछ कोलाहल और कुछ सन्नाटे की कविता लेकर आए हैं। मुगम्बो खुश हुआ – जब से गाँव से नाता टूटा है – किसी ब्याह बरात में बूँदी के लड्डू के साथ ‘सन्नाटा’ पीने का मौका ही नहीं मिला। पहले तो कोई अब बुलाता नहीं, दूसरे अब कोई जा नहीं पाता, तीसरे ‘सन्नाटा’ अब मिलता नहीं। जो है वह हलाहल सा कोलाहल है । 

भवानी भाई ने कहा था - मैं सन्नाटा हूँ, फिर भी बोल रहा हूँ। कहना न होगा कि इस कविता संग्रह की कविताएँ बोलती हैं – कुछ कोलाहल भी है और कुछ उद्वेग भी। और अनुवाद को चाहे कविता के शिल्प में कहने वाले – कविता कहाँ अनुवाद है – कहते रहें, फिर भी उन्हें नीरजा का शुक्रगुजार होना होगा क्योंकि उन्होंने अनुवाद करके एक नई रचना को जन्म दिया और अनुसृजन पीड़ा का भार भी वहन किया। कवि की कविता तभी सही अर्थों में कालजयी होती है जब वह किसी अनुवादक के माध्यम से काल-जायी होने का सौभाग्य प्राप्त कर सके। यह जोड़ देना जरूरी है कि इन कविताओं के अनुवादक के रूप में कविताओं को अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान का सजग प्रयोक्ता और लेखक मिला इसलिए यह नवसृजन है। कृष्ण पर देवकी से अधिक यशोदा का अधिकार हो जाता है। 

यदि मैं इन कविताओं के कथ्य को प्रस्तुत कर दूँगा तो पाठकीय आनंद में बाधक बनूँगा। फिर भी इतना तो कहना ही होगा – कोख में अपने रक्त मांस से सींचकर कवि ने कविता को जन्म दिया और इस बेटी वाली माँ ने स्त्री-मन को विवेचित ही नहीं विरेचित और विकसित भी किया है। यह विवेचन ऐमिली डिकिन्सन सी संक्षिप्तता और मार्मिकता की अभिव्यक्ति कवयित्री नीरजा से करा ले गया है और इस कोलाहल में उन्हें पता भी नहीं चला। यही खूबसूरती है इस सिरजन की – कच्ची मिट्टी हूँ / आकार दो हाथों से / ढल जाऊँगी। 

इस प्रकार से प्रस्तुत संस्करण की कविताएँ एक तरफ तो सन्नाटे को कविता के शिल्प में पिरोकर जीवन के तुमुल कोलाहल को जीने की सीख हैं, दूसरी तरफ उनका ‘बोम्मै-पसु-अडिमै’ और ‘अन्ना पिरवै’ है (!)। एक पक्ष और भी है जो गौरय्या, चिड़िया, पंखुड़ी, पंख, गाय, थन आदि का तमिल-तेलुगु पाठ रचकर हिंदी के पाठकों को जिज्ञासु बनाता है। दूसरी तरफ इस पट्टी के लोगों को हिंदी पट्टी के लोगों से मिलवाता है। समझ में आ जाता है कि सरोकार एक ही है, सरकार अलग होने के बावजूद। 

ग्लोत्फेल्टी (Glotfelty) ने कुछ वर्ष पूर्व साहित्य और उसके फिजिकल एनवायर्नमेंट के संबंध के मद्देनजर उत्तर-आधुनिक समीक्षा करने का विचार प्रस्तुत किया था। इस पुस्तक का एक पाठ उन ‘गिद्धों, शिकार, आग, बसंत, तितली, पंछी, डालियाँ और फूलों’ को लेकर भी होगा। पर उसके लिए मुझे उत्तर-आधुनिक का बाना पहनना पड़ेगा। फिर कभी, इत्यलम।

समीक्षित कृति : कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा (कविता)/ गुर्रमकोंडा नीरजा/ 2019/ नजीबाबाद : पारिलेख प्रकाशन/ वितरक : श्रीसाहती प्रकाशन, हैदराबाद : मोबाइल - +91 9849986346 

- प्रो. गोपाल शर्मा 
प्रोफेसर, अरबा मिंच विश्वविद्यालय 
अरबा मिंच, इथियोपिया 
prof.gopalsharma@gmail.com 


शनिवार, 9 मार्च 2019

‘प्रवासी हिंदी साहित्य : संवेदना के विविध संदर्भ’ विषयक द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

उद्घाटन सत्र : दीप प्रज्वलन 
मैसूर, 8 मार्च, 2019.

प्रवासी हिंदी साहित्य का परिदृश्य वैश्विक बनता जा रहा है। हिंदी में रचे जा रहे प्रवासी साहित्य का अपना वैशिष्ट्य है जो उसकी संवेदना, परिवेश, जीवन दृष्टि तथा सरोकारों में दिखाई देता है। इसी कड़ी में कर्नाटक की पारंपरिक नगरी मैसूर के हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर तथा केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के संयुक्त तत्वावधान में ‘प्रवासी हिंदी साहित्य : संवेदना के विविध संदर्भ’ विषयक द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी, मैसूर विश्वविद्यालय के बहादुर इंस्टीट्यूट ऑफ मेनेजमेंट के सभागार में आयोजित की गई। 

इस अवसर पर ब्रिटेन की प्रख्यात हिंदी लेखिका उषा राजे सक्सेना प्रमुख अतिथि रही। उद्घाटन भाषण में उन्होंने विदेशों में हिंदी साहित्य सृजन के परिवेश, स्वरूप, विषय-वस्तु, महत्वाकांक्षाओं और चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा - “प्रवासी भारतीय रचनाकारों की लेखन-शैली, शब्द-संस्कृति, संवेदना, सरोकार और स्तर मुख्यधारा के लेखन से भिन्न रही है। इसी भिन्नता के कारण प्रवासी हिंदी लेखन ने हिंदी साहित्य के मुख्यधारा के पाठकों को एक नई दृष्टि, एक नई चेतना, एक नई संवेदना और एक नई उत्तेजना भी दी है।” विदेशों में लिखे जा रहे सृजनात्मक हिंदी साहित्य पर अपने विचार प्रकट करते हुए उषा राजे सक्सेना का यह मानना है कि प्रवासी रचनाकारों को अपने साहित्य को बरकरार रखने के लिए अपने कैनवस को और अधिक विशाल करना होगा। 

उद्घाटन सत्र में प्रो.आर.शशिधरन, कुलपति, विज्ञान तथा तकनीकी विश्विविद्यालय, कोचिन ने बीज भाषण में प्रवासी साहित्यकारों की अहम भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि रचनाकारों ने अपने वतन से दूर रहकर अपनी रचनाओं के ज़रिये हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य को गौरवान्वित करने का सराहनीय कार्य किया है तथा प्रवासी जीवन की संवेदना की अभिव्यक्ति ही प्रवासी साहित्य में मुखर हुई है। 
लोकार्पण : 'प्रवासी हिंदी साहित्य : संवेदना के विविध संदर्भ' 
प्रो. प्रतिभा मुदलियार की अध्यक्षता और मार्गदर्शन में इस द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन हुआ। संगोष्ठी में मॉरीशस, फीजी, चीन और ब्रिटन से प्रतिभागी आए थे। अध्यक्षीय भाषण में प्रो. प्रतिभा मुदलियार ने संगोष्ठी के मूल उद्देश्य को प्रतिपादित करते हुए कहा कि विदेशों में बसे भारतीय मूल के लेखकों के साहित्य को समझने के लिए उनका जीवन संघर्ष, मानवीय जीवन तथा सामाजिक परिवेश आदि को जानना जुरूरी है। इस अवसर पर उनके द्वारा संपादित पुस्तक ‘प्रवासी हिंदी साहित्य : संवेदना के विविध संदर्भ’ का लोकार्पण भी संपन्न हुआ। 

मुख्य अतिथि के रूप में मंचासीन केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के प्रो. रामवीर सिंह ने कहा कि प्रवासी साहित्य नोस्टेलिजिया का साहित्य होते हुए भी विभिन्न संवेदनाओं को लेकर चलता है। 

उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष्य प्रो. लिंगराज गांधी, कुलसचिव, मैसूर विश्वविद्यालय, मैसूर ने हिंदी विभाग को इस प्रकार के आयोजन के लिए बधाई दी और साहित्य में प्रवासी लेखकों के योगदान को रेखांकित किया। 

समापन सत्र 
समापन सत्र के प्रमुख अतिथि के रूप में प्रो.ऋषभदेव शर्मा ने द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का मूल्यांकन करते हुए कहा कि प्रवासी साहित्य हिंदी सहित कई और भारतीय भाषाओं में भी लिखा जा रहा है और उसका महत्व आज के युग में बहुत अधिक है। उनका यह कहना था कि इस साहित्य की ओर आलोचकों को व्याख्याकार के दृष्टिकोण से देखना आवश्यक है। इस संगोष्ठी के दौरान प्रो.ऋषभदेव शर्मा की पुस्तक ‘संपादकीयम्’ का लोकार्पण भी हुआ। समापन सत्र में प्रो. टी. आर भट्ट, मुखय अतिथि और प्रो. शशिधर एल. गुडिगेनवर अध्यक्ष के रूप में उपस्थित थे। 

संगोष्ठी के अंतर्गत आठ अकादमिक और समांतर सत्रों में सत्तर शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। इन सत्रों की अध्यक्षता डॉ. ऋषभदेव शर्मा, डॉ. रामनिवास साहु, डॉ. रामप्रकाश, डॉ. शशिधर एल. जी., डॉ. शुभदा वांजपे, डॉ. सतीश पांडेय, डॉ. नामदेव गौड़ा और उषा राजे सक्सेना ने की।
👆🏽मैसूर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में आयोजित "प्रवासी हिंदी साहित्य : संवेदना के विविध संदर्भ" विषयक द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन पर विभाग के छात्रों अतिथियों का समूह-चित्र। रेखा अग्रवाल, प्रतिभा मुदलियार, राम वीर सिंह, जी शशिधर, टी आर भट्ट, उषा राजे सक्सेना, ऋषभदेव शर्मा, हरविंदर सिंह एवं अन्य...👆🏽

पहले दिन रंगारंग सांस्कृतिक संध्या का आयोजन मुख्य रूप से आकर्षण का केंद्र रहा जिसमें कर्नाटक की लोक संस्कृति को व्यक्त करने वाली संगीतमय प्रस्तुतियों के अलावा ‘अंधेर नागरी’ और ‘वापसी’ के नाट्य रूपांतरण ने समां बाँध दिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रेखा अग्रवाल एवं अन्य प्राध्यापकों ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. एम. वासंति ने किया। 

 डॉ. प्रतिभा मुदलियार 
विभागाध्यक्ष 
हिंदी अध्ययन विभाग 
मैसूर विश्वविद्यालय 
मानसगंगोत्री 
मैसूर – 570006

गुरुवार, 7 मार्च 2019

ऋषभदेव शर्मा की पुस्तक 'संपादकीयम्' लोकार्पित




मैसूर विश्वविद्यालय और केंद्रीय हिंदी संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतर्गत उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के पूर्व आचार्य डॉ. ऋषभदेव शर्मा की सद्यःप्रकाशित पुस्तक 'संपादकीयम्' का लोकार्पण ब्रिटेन से पधारी प्रख्यात प्रवासी हिंदी साहित्यकार उषा राजे सक्सेना के हाथों संपन्न हुआ। पुस्तक की प्रथम प्रति छत्तीसगढ़ी कथाकार डॉ. रामनिवास साहु ने ग्रहण की। कार्यक्रम संयोजक प्रो. प्रतिभा मुदलियार ने कहा कि यह पुस्तक समसामयिक विषयों पर निष्पक्ष संपादकीय टिप्पणियों का ऐसा संग्रह है जिसमें वर्तमान समय के सभी विमर्श विद्यमान हैं। अवसर पर फिजी से पधारे खेमेंद्र कमल कुमार तथा सुभाषिणी शिरीन लता, चीन से पधारे प्रो. बलविंदर सिंह राणा और मॉरीशस से पधारी लेखिका दिया लक्ष्मी बंधन ने लेखक को शुभकामनाएँ दी। 

केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के प्रो. रामवीर सिंह ने पुस्तक पर बातचीत में कहा कि संपादकीय टिप्पणियों का प्रकाशन एक अच्छी शुरूआत है क्योंकि इनसे समकालीन इतिहास लेखन के लिए पर्याप्त आधार सामग्री मिल सकती है। 

रविवार, 3 मार्च 2019

(पुस्तक) संपादकीयम् : प्राक्कथन



प्राक्कथन 

उनके शब्द बोलते हैं, चिल्लाते नहीं। अभिव्यक्ति चोट नहीं करती, बल्कि मरहम लगाती है। तल्ख़ी और तुर्शी कभी-कभार ही झलकती है। किंतु अधिकतीक्ष्णहोने से पहले ही सँभल जाती है। ऋषभ के लेखन में आक्रोश कम है। आसक्ति अधिक है। ‘संपादकीयम्’ इन्हीं सबका ‘कॉक्टेल’ है। हिंदी भाषा पर उनका असाधारण अधिकार है। चाहते तो विशुद्ध हिंदी में लिखकर भी पाठकों तक पहुँच सकते थे। किंतु आम बोलचाल की भाषा, जिसमें अन्य भाषाओं के भी शब्द होते हैं, उनके लेखन को ‘सर्वग्राह्य’ बना देती है। हाँ, कभी-कभी ठेठ हिंदीदाँ होने का आभास मिलता है और कतिपयआंचलिकता भी झलकती है। लेकिन किसी उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के सर्वेसर्वा रह चुकने वाले किसी शिक्षाविद् को ‘अखबारी’ दुनिया से जुड़ने के बाद भाव, भाषा, भंगिमा और भूमिका आदि को नए सिरे से साधना पड़ता है। और इस मुहिम में वे सफल हुए हैं। 

ऋषभ के आलेखों की एक और विशेषता है। उनकी ‘पत्रकारिता’ में ‘पक्षकारिता’ फ़िलहाल तो नहीं मिलती। ऐसे में, जबकि पूरा मीडिया जगत ‘पक्षकारिता’ का शिकार है, ऋषभ अपने लेखन में किसी का पक्षकार होने से बचते हैं। हमारा मानना है कि ‘संपादकीयम्’ का यही रंग होना चाहिए। ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।‘ उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि मोदी को लाओ या हटाओ। शेर-ओ-शायरी तथा कविताओं के अंश उद्धृत करके वे अपनी बात को, अपने निष्कर्ष को, धार देते हैं। 

विषय के चयन से स्पष्ट हो जाता है कि वे रस्म-अदायगी के लिए नहीं, सोद्देश्य लिखते हैं। चयनित विषय को, शैलीगत सौंदर्य में लपेट कर वे आलेख को पठनीय बना देते हैं। चुटीलापन होता है, मगर वह चुभता नहीं। उनके लेखन में कर्कशता नहीं है, लावण्य है। 

व्यंग्य, उनके संपादकीय लेखों में कभी-कभार ही आटे में नमक जैसा रहता है। पता नहीं, लेख का ताना-बाना बनाने में वे क्या मशक़्क़त करते हैं, किंतु शैलीगत मर्मज्ञता बता देती है कि कच्ची कपास को धुन-धुनाकर वे विषय को कोमल फाहा और गाला बना लेते हैं। कभी-कभार ऐसे विषय भी उन्होंने चुने हैं, जिनपर कलम चलाते वक़्त शायद ग़ुस्सा, झुँझलाहट, झल्लाहट ज़रूर उभरी होगी। किंतु शब्द-संयम के सहारे उन्होंने उन तमान विकारों को दूर रखा। 

और अंत में, अपनी बात। अनेक कारणों से हम ऋषभदेव जी को ‘मित्र’ कम, ‘हितैषी’ ज़्यादा मानते हैं। उन्हें ‘मिलाप’ से जोड़ने के पीछे भी ‘स्वहित-सिद्धि’ का भाव प्रबल रहा है। ‘अख़बार’ में उनके लायक ‘स्पेस’ बनाने में हमें काफ़ी समय लगा। अन्यथा ‘संपादकीयम्’ का कलेवर बहुत बड़ा हो जाता। उनकी उत्तरोत्तर वृद्धि और समृद्धि की कामना के साथ, हमें यह स्वीकारने में संकोच नहीं है कि उन्होंने हमारी थकन को विश्राम दिया है। इसके लिए धन्यवाद। 


26 जनवरी, 2019                                                                                       - रवि श्रीवास्तव 
संयुक्त संपादक, डेली हिंदी मिलाप 
हैदराबाद।

(पुस्तक) संपादकीयम् : आभार/अनुक्रम





आभार
संपादकीयम् पिछले कुछ महीनों में समसामयिक विषयों पर लिखी मेरी कुछ टिप्पणियों का संग्रह है। इन टिप्पणियों को हैदराबाद के प्रतिष्ठित और यशस्वी दैनिक समाचार पत्र डेली हिंदी मिलाप ने अपने संपादकीय पृष्ठ पर स्थान दियाइस हेतु संपादक महोदय सहित समस्त मिलाप’ परिवार के प्रति आभारी हूँ। साथ ही, इस दिशा में प्रेरित करने वाले रवि श्रीवास्तव जी के समक्ष शब्दहीन हूँ।

बिखरी हुई सामग्री को पुस्तक का रूप प्रदान करने के लिए सौभाग्यवती डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा को तो मेरा रोम-रोम असीसता है। 

26 जनवरी, 2019                                                               - ऋषभ




अनुक्रम
      खंड 1
1.       नोबेल शांति पुरस्कार : एक असाधारण वीरांगना को
2.      बोलने वाली औरतें बनाम पुरुष प्रधान समाज
3.      जबकि हर पुरुष स्वयं आयोग है
4.      विवाहेतर संबंध : निजता बनाम नैतिकता
5.      परंपरा के नाम पर भेदभाव कब तक
6.      समानता और पूजा-पद्धति के अधिकारों का टकराव
7.      सुपौल से बॉलीवुड तक पीड़ित बेटियाँ
8.      बेटियों के सामने शर्मिंदा एक महादेश
9.      सबसे खतरनाक जगह : घर?
10.   अमानुषिक है प्रथा के नाम पर औरत पर बर्बरता
11.    एक स्त्री-विरोधी कुप्रथा से मुक्ति
12.   मुस्लिम स्त्री के मानवाधिकार की खातिर
खंड 2
13.   भारतीय संविधान के बावजूद अन्य संविधान क्यों?
14.   उपेक्षित लद्दाख का दर्द
15.   रिश्ता वोट का शराब से
16.   मतदाता की उदासीनता का अर्थ
17.   राजनीति की भाषा में बढ़ती अशिष्टता
18.   जाति और गोत्र की वेदी पर लोकतंत्र
19.   क्या बदल रहा है भाजपा का भी चरित्र
20.  सवर्ण आरक्षण :  हल या छल?
21.   विरोध भी, समर्थन भी : खूबी लोकतंत्र की
22.  ज़ोर-आजमाइश से पहले शक्ति-प्रदर्शन
23.  चुनाव का मौसम और डांस बार
खंड 3
24.  सबका अन्नदाता हड़ताल पर है !?
25.  अन्नदाता से दिल्ली दूर क्यों ?
26.  कर्ज माफ करने की राजनीति
27.  आत्महत्याओं का इलाज़ कर्जमाफ़ी नहीं
खंड 4
28.  अब जिसे भी देखिए, उस पर गुलेलें हैं
29.  लोकतंत्र को कलंकित करता भीड़-न्याय
30.  अब  किसके पिता की बारी है?
31.   न्याय का शासन
32.  कैसे टूटेगा फेक न्यूज़ का चक्रव्यूह?
33.  ऊपरवाला देख रहा है
खंड 5
34.  अल्पसंख्यकों का स्वर्ग
35.  इंतज़ाम की पोल खोलती पहली बारिश
36.  ये मौत की सड़कें...
37.  बिन पानी सब सून
38.  ये सेप्टिक टैंक साफ करने वाले...
39.  हिंसा के महिमामंडन का दुष्परिणाम
खंड 6
40.  हिंसा और हताशा
41.   आधुनिक गुलामी और हम
42.  क्यों होती हैं बुराड़ी जैसी भीषण घटनाएँ
43.  तो शब्दकोश में नहीं रहेगा दलित ?
44. प्रणय की हत्या, प्रतिष्ठा के नाम पर !
45.  तुम्हारी जाति क्या है, डॉक्टर?
46.  मंदिर प्रवेश : समाज सुधार या राजनीति
खंड 7
47.  ये बच्चे भारत के नागरिक नहीं?
48.  सुरक्षित नहीं हैं हमारे बच्चे
49.  असहाय और असुरक्षित बुढ़ापा
50.  भुखमरी : सब पर अभिशाप !
51.   विकास बनाम भुखमरी
52.  धरती का बढ़ता बुखार
53.  ...तो क्या समुद्र में समा जाएँगे तटीय शहर?
54.  जलाओ पटाखे पर रहे ध्यान इतना...
खंड 8
55.  दुर्गा पूजा में विदेशी रुचि का अर्थ
56.  लद गए वैश्वीकरण के दिन ?
57.  आतंक बनाम सभ्य रिश्तों का पाखंड
58.  हथियार चमका रहा ड्रैगन!
59.  संयुक्त राष्ट्र की बंधक स्थिति
60.  अंतरिक्ष पर कब्जे की खातिर
61.   युद्ध करना नहीं, शांति लाना है बहादुरी
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