सोमवार, 15 मार्च 2021

'राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के आलोक में हिंदी की विकास यात्रा' पर एकदिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन


हैदराबाद, 14 मार्च, 2021 (प्रेस विज्ञप्ति).

डॉ. योगेंद्र नाथ शर्मा 'अरुण'
प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय 

                    यहाँ जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा-आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना के सचिव श्री जी. सेल्वराजन ने यह स्पष्ट किया कि 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के आलोक में हिंदी की विकास यात्रा' विषयक एकदिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली और दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के संयुक्त तत्वावधान में आगामी 16 मार्च, 2021 को खैरताबाद स्थित सभा परिसर में संपन्न होगा।  इस कार्यक्रम की अध्यक्षता केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक एवं श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमेश कुमार पांडेय जी करेंगे और मुख्य अतिथि हैं रुड़की के प्रख्यात साहित्यकार और भारतविद्या के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले प्रो. योगेंद्र नाथ शर्मा 'अरुण'  जी। विशिष्ट अतिथि के रूप में उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, हैदराबाद के पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष प्रो. ऋषभदेव शर्मा, नई दिल्ली के प्रख्यात हिंदी विद्वान डॉ. बेचैन कंडियाल, प्रो. गोपाल शर्मा और केंद्रीय हिंदी निदेशालय के उपनिदेशक तथा 'भाषा' पत्रिका के संपादक डॉ. राकेश कुमार शर्मा उपस्थित रहेंगे। संयोजक ने नगरद्वय के हिंदी प्रेमियों को इस सारस्वत आयोजन में भाग लेने का आग्रह किया है.

डॉ. बेचैन कंडियाल 
डॉ. राकेश कुमार शर्मा 
 



- कार्यक्रम संयोजक
जी. सेल्वराजन
सचिव एवं संपर्क अधिकारी
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा - आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना
खैरताबाद, हैदराबाद - 500004

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

ऋषभदेव शर्मा की पुस्तक ‘साहित्य, संस्कृति और भाषा’ लोकार्पित


“साहित्य संस्कृति और भाषा” का लोकार्पण करते हुए प्रो. अबुल कलाम (निदेशक, दूरस्थ शिक्षा निदेशालय, मानू, हैदराबाद)। साथ में, बाएँ से : प्रो. ऋषभदेव शर्मा, डॉ. बी. एल मीना, डॉ. आफताब आलम बेग, डॉ. वाजदा इशरत, डॉ. मोहम्मद नेहाल अफ़रोज, डॉ. इबरार खान और डॉ. मोहम्मद अकमल खान। 000 

हैदराबाद, 19 जनवरी, 2021(मीडिया विज्ञप्ति)। 

आज यहाँ मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय स्थित दूरस्थ शिक्षा निदेशालय में डॉ. ऋषभदेव शर्मा की सद्यः प्रकाशित आलोचना कृति ‘साहित्य, संस्कृति और भाषा’ को लोकार्पित किया गया। पुस्तक का लोकार्पण करते हुए निदेशक प्रो. अबुल कलाम ने कहा कि “भाषा और साहित्य दोनों का मूल आधार संस्कृति होती है। इस पुस्तक में इन तीनों के भीतरी रिश्ते की बखूबी पड़ताल और व्याख्या की गई है।“ 

डॉ. आफताब आलम बेग ने विमोचित पुस्तक में राष्ट्रीयता और समकालीन विमर्शों की उपस्थिति पर चर्चा की। डॉ. मोहम्मद नेहाल अफ़रोज़ ने भारतीय और तुलनात्मक साहित्य की विवेचना के क्षेत्र में लेखक के दृष्टिकोण की व्याख्या की, तो डॉ. अकमल खान ने प्रवासी साहित्य संबंधी अंशों का परिचय दिया। डॉ. इबरार खान ने पुस्तक में दक्षिण भारत की पत्रकारिता और आंध्र प्रदेश के हिंदी रचनाकारों पर केंद्रित शोधपत्रों पर अपने विचार प्रकट किए। डॉ. बी. एल. मीना ने हिंदी की बदलती चुनौतियों के संबंध में लेखक की विचारधारा पर प्रकाश डाला तथा डॉ. वाजदा इशरत ने लेखक के व्यक्तित्व और कृतित्व का परिचय दिया। अंत में डॉ. शर्मा ने सभी विद्वानों का धन्यवाद ज्ञापित किया। 000 

शनिवार, 2 जनवरी 2021

श्रीलाल शुक्ल का साहित्य और उनका जीवन' पर राष्ट्रीय वेबिनार संपन्न



हैदराबाद, 31 दिसंबर, 2021 (प्रेस विज्ञप्ति)।

श्रीलाल शुक्ल स्मारक राष्ट्रीय संगोष्ठी समिति, हैदराबाद, तेलंगाना राज्य और लिटिल फ्लावर डिग्री कालेज, उप्पल, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में “श्रीलाल शुक्ल का साहित्य और उनका जीवन विषय पर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन सफलता पूर्वक संपन्न हुआ। 


वेबिनार के अध्यक्ष, प्रो. गोपाल शर्मा, आचार्य, अंग्रेज़ी विभाग, अरबामिंच विश्वविद्यालय, इथियोपिया (पूर्वी अफ्रीका), ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि  श्रीलाल शुक्ल का व्यक्तित्व पहेली से कम नहीं।  व्यंग्य सत्य की खोज नहीं, झूठ की खोज है। आगे उन्होंने कहा कि  श्रीलाल शुक्ल विकृति की सृष्टि नहीं करते, बल्कि विकृति की खोज करके उस पर चोट करते हैं।


मुख्य अतिथि अखिल भारतीय कान्यकुब्ज ब्राह्मण महासभा (रजि.) कानपुर, के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष पं. शिव सहाय मिश्रा ने अपने वक्तव्य में श्रीलाल शुक्ल के साहित्य का सटीक वर्णन किया। 'राग दरबारी'  का संक्षिप्त विवरण देते हुए, श्रीलाल शुक्ल जी को एक सफल व्यंग्यकार बताया तथा  श्रीलाल शुक्ल जी के अपने पुराने संस्मरण व्यवहार को साझा भी किया।


मुख्य वक्ता अमन कुमार त्यागी (संपादक: शोधादर्श), परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद,  उत्तर प्रदेश, ने श्रीलाल शुक्ल जी के साहित्य को विस्तार देते हुए उनके उपन्यासों का संक्षिप्त विवरण दिया साथ ही उन्होंने बताया कि “अभाव और तनाव, व्यक्ति को जोड़ भी देते हैं और तोड़ भी देते हैं।” श्रीलाल शुक्ल जी के अभावों ने उन्हें जोड़ा और कालजयी लेखक बना दिया।


साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल के पुत्र, लखनऊ, उत्तर प्रदेश निवासी, पंडित आशुतोष  शुक्ल ने सम्मानित अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए अपने पिता के गुणों की चर्चा कर उनकी यादों को साझा किया। उन्होंने  डॉ. सीमा मिश्र के हिंदीतर प्रांत में इस अद्भुत कार्य की प्रशंसा की कि वे विगत 14 वर्ष से निरंतर ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध उपन्यासकार पद्मभूषण  श्रीलाल शुक्ल  की जन्मोत्सव- संगोष्ठी के रूप में यह आयोजन करती आ रही हैं, जिसमें अपने जीवनकाल में स्वयं श्रीलाल शुक्ल फोन पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे।

    

विशेष अतिथि आंध्र प्रदेश सरकार के पूर्व आईपीएस अधिकारी पं. श्रीराम तिवारी ने अपने वक्तव्य में बताया कि श्रीलाल शुक्ल का ध्येय था, अपने व्यंग्य साहित्य के माध्यम से बुराइयों का अंत कर अच्छाइयों को बढ़ावा देना। इस प्रकार उन्होंने समाज को एक सही दिशा व अच्छी दशा प्रदान करने का भी कार्य किया।


विशिष्ट अतिथि के रूप में साहित्य गरिमा पुरस्कार समिति, हैदराबाद की संस्थापक अध्यक्ष, डॉ. अहिल्या मिश्रा ने कहा कि कान्यकुब्ज शिरोमणि डॉ. सीमा और पं. अशोक कुमार तिवारी ने निरंतर 14 वर्षों से विश्व के विद्वान अतिथियों  को कार्यक्रम में आमंत्रित कर एवं अलग-अलग विषयों पर साहित्यिक चर्चाएँ  करवा कर एक नया इतिहास रच डाला है और श्रीलाल शुक्ल जी को मानव से महामानव बना दिया है। उन्होंने आगे उत्तर भारतीय संघ के संस्थापक कर्मठ सदस्य एवं प्रथम महामंत्री पं. बाला प्रसाद जी तिवारी, को भी याद करते हुए उनके कई सामाजिक कार्यों  एवं  उनके सरल व्यवहार को अपने विचारों के माध्यम से साझा किया।


आत्मीय अतिथि अखिल भारतीय कान्यकुब्ज ब्राह्मण महासभा (रजि.) कानपुर, के राष्ट्रीय महामंत्री पं. महेश  मिश्रा ने अपने संबोधन में कहा कि कान्यकुब्ज रत्न पं. श्रीलाल शुक्ल ने साहित्य के क्षेत्र में जो सेवाएँ  प्रदान कीं, उनकी साहित्यिक सेवाओं की प्रशंसा पूरा साहित्य जगत आज भी करता है।


वेबिनार के निदेशक प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने श्रीलाल शुक्ल के बाल साहित्य का विशेष उल्लेख करते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी आस्था  तथा व्यंग्य को एक परिपूर्ण विधा बनाने में उनके योगदान पर चर्चा की। लेखक के साहित्य में जीवन के प्रक्षेपण के बारे में उन्होंने कहा कि सच्चा लेखक जो रचता है, उसमें जीता है। जो जीता है, भोगता है, झेलता है, वही रचता है। तब कहीं जाकर वह एक 'स्वस्थ साहित्य' समाज को सौंप पाता है। इसी विशेषता ने श्रीलाल शुक्ल को कालजयी रचनाकार बना दिया है। 

विषय प्रवर्तन करते हुए संयोजिका डॉ. सीमा मिश्रा ने अपने समाजशास्त्रीय अध्ययन, शोध अनुभवों एवं व्यंग्य सम्राट पं. श्रीलाल शुक्ल जी से पारिवारिक आत्मीयता और समय-समय पर भेंटवार्ता, पत्राचार  एवं शोध संसाधनों में भरपूर सहयोग को अपनी  साहित्यिक चेतना में विशेष वृद्धि का हेतु बताया और आगे कहा कि समाज साहित्य को प्रभावित करता है तो, साहित्य भी समाज  को प्रभावित करता है, दिशा देता है। आगे उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि श्रीलाल शुक्ल एक साधारण व्यक्तित्व के असाधारण लेखक थे। वे सामाजिक बुराइयों/ कुरीतियों को समझते या यह कहिए उसको जीते और व्यंग्य के माध्यम से उसे दूर करने और करवाने में सदा प्रयासरत रहते थे।

आरंभ में मल्ला रेडडी इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी साइंस, मेडचल, हैदराबाद महानगर के  बी.टेक. विद्यार्थी पं. आकाश तिवारी ने शंखनाद एवं मंगलाचरण किया। अखिल भारतीय कान्यकुब्ज ब्राह्मण महासभा (रजि.) कानपुर की राष्ट्रीय अध्यक्ष (महिला प्रकोष्ठ) डॉ. सीमा मिश्रा ने कार्यक्रम में सभी गणमान्य अतिथियों का स्वागत किया।


राष्ट्रीय वेबिनार का सफल संचालन मिश्र धातु निगम (मिधानि),  हैदराबाद, राजभाषा विभाग के उप-प्रबंधक डॉ. बी. बालाजी ने कुशलतापूर्वक पूर्ण किया। संयोजिका डॉ. सीमा मिश्रा ने इस राष्ट्रीय वेबसंगोष्ठी में देश-विदेश के 193 रजिस्ट्रेशन माध्यम से जुड़े एवं अखिल भारतीय कान्यकुब्ज ब्राह्मण महासभा (रजि.) कानपुर एवं विशेष कर महिलाओं की सक्रिय भूमिका एवं राष्ट्रीय वेबसंगोष्ठी को  चरम सीमा तक ले जाने के लिए अध्यक्ष का आभार व्यक्त किया।

 

देश-विदेश के साहित्यकारों, विद्वानों, कलाकारों, शोधार्थियों तथा पत्रकारों की सक्रिय सहभागिता एवं वंदे मातरम के साथ करतल ध्वनि से कोरोना वैक्सीन के शुभ आगाज एवं नूतन वर्ष की शुभकामनाओं के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। ★

                                                                प्रस्तुति: डॉ. सीमा मिश्रा,


बुधवार, 2 सितंबर 2020

(पुस्तक समीक्षा) जिंदगी को चाहिए दोनों ही - 'कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा'



 

कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा (कविता)
गुर्रमकोंडा नीरजा
पृष्ठ 120/ मूल्य : 150 रु
प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद
वितरक : श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद (9849986346) 

पुस्तक समीक्षा 

जिंदगी को चाहिए दोनों ही – ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’ 

- प्रवीण प्रणव

गद्य साहित्य और शोध प्रबंधों के संपादन में गुर्रमकोंडा नीरजा जाना-माना नाम है। यूँ तो नीरजा छिटपुट कविताएँ भी लिखती रही हैं, लेकिन परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद से प्रकाशित कविता संग्रह ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’, उनकी कविताओं का पहला पुस्तकाकार प्रकाशन है। तीन खंडों में संकलित कविताओं में पहला खंड उनकी मौलिक कविताओं का है, दूसरे खंड में तेलुगु से हिंदी में अनूदित कविताएँ हैं और तीसरे खंड में हिंदी से तमिल में अनूदित कविताएँ हैं। नीरजा की मातृभाषा तेलुगु है लेकिन इस संग्रह के तीनों खंड दर्शाते हैं कि हिंदी, तमिल और तेलुगु तीनों पर उनका समान अधिकार है। मैं तमिल और तेलुगु से अनभिज्ञ हूँ तो मेरी समीक्षा उनके मौलिक हिंदी कविताओं तक ही सीमित है। 

पुस्तक की भूमिका में गंगा प्रसाद विमल लिखते हैं कि ‘अच्छी कविता की यही पहचान है कि वह अपने भाषिक जादू से थोड़ी देर विचलित कर फिर फुर्र हवा में न उड़ जाए।‘ देवी नागरानी ने भी भूमिका में डॉ. किशोर काबरा की पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए लिखा है ‘सच्ची कविता की पहली शर्त है कि हमें उसका कोई भार नहीं लगता। जिस प्रकार पक्षी अपने परों से स्वच्छंद आकाश में विचरण करता है, उसी प्रकार कवि स्वांतःसुखाय और लोक हिताय के दो पंखों पर अपनी काव्य यात्रा का गणित बिठाता है।‘ नीरजा की कविताएँ इन सभी पैमानों पर खड़ी उतरती हैं। बिना लच्छेदार भाषा का प्रयोग किए, बिना बिंब और प्रतीक में अपनी बात उलझाए, उन्होंने सरल और सहज भाषा में अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है और यही वजह है बिना किसी आवरण में लिपटी ये भावनाएँ सीधे हृदय में उतरती हैं। कहीं ये भावनाएँ कोलाहल बन उद्वेलित करती हैं, कुछ करने को तो कहीं ये गहरे सोच में छोड़ जाती हैं, नीरव सन्नाटे की तरह। 

मुझे बालस्वरूप राही की कविता ‘कोलाहल के बाद’ की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं: 

जब कोलाहल में बात नहीं खोती
वह घड़ी हमेशा रात नहीं होती 

सन्नाटा नहीं, तोड़नी है जड़ता
वह चाहे भीतर हो या बाहर हो
रचना है ऐसा वातावरण हमें
काँटों का नहीं, फूल का आदर हो

हमको सूरज की तरह दहकना है
जब तक हर स्याही मात नहीं होती। 

नीरजा की कविताएँ सिर्फ प्रकृति या सौंदर्य वर्णन तक अपने को सीमित नहीं करतीं। ये कविताएँ उनकी आकुलता को, उनकी विवशता को, उनकी आकांक्षा को और उनके सपने को आवाज़ देती हैं। यह आवाज इतनी वास्तविक है, इतनी सरल भाषा में है और इतने गंभीर विषय पर है कि नीरजा की कविताएँ सिर्फ उनकी न रह कर पाठकों की आवाज़ बन जाती हैं और यही इनकी सफलता है। 

‘माँ’ शीर्षक कविता में जब वे लिखती हैं: 

आज वह मेरी राह देख रही है 

मेरा माथा चूमने के लिए तरस रही है 

आखिरी बार मुझसे बात करने के लिए 

आँखों में प्रतीक्षा सँजोए। 



मैं काले कोसों बैठी हूँ 

सात समंदर पार, 

लाचार। 



मन तो कभी का पहुँच चुका उसके पास, 

तन काट नहीं पा रहा 

परिस्थिति का पाश। 

उदास हूँ। 

दास हूँ न ? 

स्वामी की अनुमति नहीं! 


इन पंक्तियों में नीरजा सिर्फ अपने भावों की अभिव्यक्ति नहीं करतीं, वरन न जाने कितनी महिलाओं की आवाज़ बन जाती हैं जो चाह कर भी अपने माता-पिता के लिए तब उपलब्ध नहीं हो पाती जबकि उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है। 

नीरजा अपनी कविताओं में संबंधों और उनसे जुड़े भावनाओं का ताना-बना बुनती हैं। ‘बेटी वाली माँ’ कविता में तीन पीढ़ियों से एक सी ही समस्या को रेखांकित करते हुए वे लिखती हैं: 

आज तक काट रही हो तुम 

बेटी जनने की सज़ा 

बिना उफ़ किए। 

पर मैं कराहती हूँ कभी जब दर्द से 

मुझे अपने गोद में लेकर 

सींच देती हो आँसुओं से मेरा माथा। 

आँखों-आँखों में देती हो नसीहत – 

‘बेटी की माँ हो, कमजोर मत पड़ना!’ 

नीरजा अपने पिता से बहुत प्रभावित रही हैं। अपने पिता को समर्पित कविता में वे लिखती हैं: 

काल को पीछे धकेलते 

जिजीविषा से भरे 

तुम ही तो हो सच्चे योद्धा 

धरती के सुंदरतम पुरुष, 

मेरे पापा ! 

नीरजा ने एक बेटी, एक माँ, एक पत्नी सबका धर्म निभाया है इसलिए इनकी कविताएँ भी इस सभी संबंधों को अपने अंदर आत्मसात करती हैं। समाज में छोटी बच्चियों के साथ हो रहे अनाचार पर ‘माँ नीरजा’ व्यथित हो कर लिखती हैं: 

जब कभी किसी नन्ही गुड़िया को देखते हैं 

बेसाख्ता चीख उठते हैं – 

‘गुड़िया घर से बाहर न जा 

यह समाज तेरे लिए नहीं बना है 

बाहर न जा 

तुझे नोचकर खाने के लिए गिद्ध इंतज़ार कर रहा है 

तू बाहर न जा।‘ 

प्रेम के कई रंग होते हैं और नीरजा ने प्रेम के कई आयाम अपनी कविताओं के माध्यम से व्यक्त किए हैं। सबसे पहले तो प्रेम में होने की जो मधुर अनुभूति है उसे बड़ी खूबसूरती से बयाँ करते हुए अपनी कविता ‘रेशमी स्पर्श’ में लिखती हैं: 

मेरी देह पर तैरती तुम्हारी उँगलियाँ 

मन के तार को छेड़ गई 

एक रेशमी स्पर्श ने जगा दी 

रोमरोम में नई उमंग 

तुमने जब-जब मुझको छुआ 

तब-तब तन-मन में ऊर्जा का संचार हुआ 


और में पागल हो गई ! 

लोक-लाज खो गई !! 

जब प्यार होता है तो मन में प्यार धीरे-धीरे घुलता है और ये उन खामोशियों की जगह लेता जाता है जो वर्षों से मन में घर कर गई होती हैं और भावनाओं को खुल कर व्यक्त नहीं होने देतीं। अपनी कविता ‘निःशब्द’ में प्यार में होने के खुशनुमा एहसास को आवाज़ देती हुई लिखती हैं: 

उस अनुभूति को व्यक्त करने के लिए 

शब्द नहीं हैं 

मौन का साम्राज्य है चारों ओर 


भीतर तो तुमुलनाद है 

भीगी हूँ प्यार में 

जब प्यार होता है तो साथ ही होता है उस प्यार में नोक-झोंक। ये नोक-झोंक कई बार प्यार को पटरी से उतार देते हैं तो कई बार इनसे प्यार और मजबूत होता है। प्यार के नोक-झोंक में जरूरी है अहं का न होना। नीरजा अपनी कविता ‘संधिपत्र’ के माध्यम से दिखलाती हैं कि नोक-झोंक के बाद वापस प्यार को पटरी पर लाने के लिए क्या किया जाना चाहिए। 

चाहूँ तो तुम्हारी तरह मैं भी 

कोस सकती हूँ सारी दुनिया को 

पर ऐसा भी क्या गुस्सा 

कि जीवन बीत जाए, गुस्सा न बीते। 


इसलिए भेजा करती हूँ हर सुबह 

तुम्हारे लिए दोस्ती के गुलाब। 

तुम विजेता हो – चिर विजेता; 

मैं पराजित हूँ – प्रेम में पराजित। 

कभी तो मैं बनकर देखो........... 

प्यार कई बार वह मोड़ नहीं लेता जो हम चाहते हैं। प्यार में होना जितनी सुखद अनुभूति है उससे कहीं ज्यादा दुखद है दिल का टूटना। प्यार में होना आवाज़ देता है भावनाओं को लेकिन दिल का टूटना भावनाओं का उबाल लाता है दिल के अंदर लेकिन जुबाँ खामोश रहती है। ऐसे में बहुत मुमकिन है टूट जाना लेकिन नीरजा अपनी कविता में दुहराती हैं कि दिल का टूटना अंत नहीं। अपनी कविता ‘आशियाना’ में वे इस टूटन के बाद के संकल्प को दर्शाती हैं ये कहते हुए: 

उसके लिए मैंने सारी दुनिया से टक्कर ली 

लेकिन उसने मुझे बैसाखियों के सहारे छोड़ दिया। 


हवाओं से लड़ता रहा देर तक मेरा घोंसला 

बिखर गया मेरा सपना । 

पर मैं नहीं बिखरी। न बिखरूँगी। 

एक-एक तिनका जोड़कर 

फिर बनाऊँगी अपना आशियाना, 

सजाऊँगी-सँवारूँगी। 

नीरजा अपनी कविताओं को सिर्फ अपनी आवाज़ नहीं बनाना चाहतीं। उनकी कविताओं की ज़िम्मेदारी है कि वे उन सभी औरतों की आवाज़ बनें जो इन हालात से गुज़रती हैं और जब अपनी कविता ‘तपिश’ में वो लिखती हैं: 

मेरी चाभी मुझे दे दो 

रोक दो अब तो चाबुक 

चाहती हूँ मैं 

मैं बन कर जीऊँ 

सदियों तक 

सदियों तक जीने की कल्पना नीरजा की अपने लिए नहीं हो सकती, वे आज़ादी की तलबगार हैं सभी औरतों के लिए जो किसी बंधन में फँस कर अपनी आकांक्षाओं को दबा देती हैं, वे हर संभव प्रयास करती हैं कि ख़ुद पर हुए ज़ुल्म के बाद भी किसी तरह साथ बना रहे। लेकिन ज़ुल्म सहने की भी एक सीमा होती है और इस सीमा के बाद होती है आज़ादी की ख़्वाहिश। 

डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने नीरजा के परिचय में लिखा है, उनके पिता साहित्यकार थे, उन्होंने कई पत्रिकाओं का संपादन किया। साथ ही वे आंध्र प्रदेश के लोकप्रिय नेता श्री एन० टी० रामाराव के पी० आर० ओ० के रूप में कार्यरत रहे। नीरजा ने साहित्य और राजनीति का ये सम्मिश्रण बचपन से देखा और ये उनकी कविता में भी परिलक्षित होता है। अपनी कविता ‘राजनीति’ में नीरजा लिखती हैं: 

लोग अकसर कहते हैं 

राजनीति एक खेल है 

पर मेरे पापा कहते हैं 

यह एक कमर्शियल फिल्म है 


और इसी कविता के अंत में लिखती हैं: 

इस फिल्म के बारे में खूब सुना है 

लेकिन देखने के लिए सेंसर का कहना है 

- ‘ओनली फॉर क्रिमिनल्स’। 

- ‘भले मानुषों का प्रवेश वर्जित’। 


साहित्य में आने से पहले नीरजा ने विज्ञान की पढ़ाई की, माइक्रोबायोलॉजी में उन्होंने बी० एससी० किया और एक वर्ष तक अपोलो अस्पताल में कार्यरत रहीं। उनका ये अनुभव उनकी कविता ‘दर्द’ में दिखता है: 

मैंने दर्द को दबाने की कोशिश की 

वह गिद्ध बन 

मेरा शिकार करता रहा 

मैंने 

उससे छुटकारा पाने के लिए 

स्लीपिंगपिल्स लीं 

ट्रैंक्विलाइज़र लिए 

और न जाने क्या क्या लिया 

पर वह इम्यून हो गया। 

आज 

मैं सोचती हूँ – 

यदि सीने में यह दर्द नहीं होता 

तो मेरा क्या होता। 

नीरजा ने इस संकलन में कुछ अच्छे हाइकु भी लिखे हैं। सीमित शब्दों में विभिन्न विषयों पर लिखे हुए हाइकु प्रभावित करते हैं। 

कन्या भ्रूण ने 

लगाई है गुहार 

मुझे न मार। 



टेसू फूले हैं 

बौराया यह मन 

आया फागुन। 



अलमारी में 

किताबों का ढेर है 

निद्रा में लीन। 



नुकीला काँटा 

धँसा पाँव में मेरे, 

रोये तुम थे। 



कच्ची मिट्टी हूँ 

आकार दो हाथों से 

ढल जाऊँगी। 


अपनी कविता ‘सीखना’ में उन्होंने अपने गुरुओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए लिखा है: 

तुमसे सीख ही लिया मैंने 

तुमुल कोलाहल के बीच सन्नाटे को जीना; 

सन्नाटा जो कविता है – 

कविता जो जीवन है ! 

लेकिन मेरी ख़्वाहिश है कि नीरजा न सिर्फ सन्नाटे को जीना सीखें बल्कि कोलाहल को भी अपनाए रखें। न तो सन्नाटे की कोई सीमा है, न ही कोलाहल की, लेकिन जरूरी है कि हम इन दोनों में सामंजस्य बनाए रखें और इनसे सीखते रहें। मुझे राजेश रेड्डी की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं: 

दरवाज़े के अंदर इक दरवाज़ा और 

छुपा हुआ है मुझ में जाने क्या क्या और 

कोई अंत नहीं मन के सूने-पन का 

सन्नाटे के पार है इक सन्नाटा और। 

इस पहले कविता संग्रह के लिए गुर्रमकोंडा नीरजा को बहुत बहुत शुभकामनाएँ। 



- प्रवीण प्रणव 
सीनियर प्रोग्राम मैनेजर, माइक्रोसॉफ़्ट 
B-415, गायत्री क्लाससिक्स 
लिंगमपल्ली, हैदराबाद 

(पुस्तक समीक्षा) संपादकीयम् - भविष्य का आईना, वर्तमान की नज़र



संपादकीयम् (लेख/ पत्रकारिता)/ ऋषभदेव शर्म
पृष्ठ 136/ मूल्य : 140 रु
प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद
वितरक : श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद (9849986346)

पुस्तक समीक्षा

संपादकीयम्— भविष्य का आईना, वर्तमान की नज़र

- प्रवीण प्रणव

डॉ॰ ऋषभदेव शर्मा ने बहुत स्नेह के साथ अपनी ये पुस्तक लगभग एक महीने पहले भेंट की, लेकिन इसे पढ़ने का अवसर अब मिला। इन दिनों व्यस्तता बहुत रही लेकिन ऐसा नहीं कि इस बीच कुछ पढ़ा ही नहीं। कुछ मिठाई ऐसी होती है जिसे आप स्वाद ले कर खाना चाहते हैं, और यही वजह है कि डॉ॰ ऋषभदेव शर्मा की कोई रचना मैं जल्दबाजी में नहीं पढ़ता।

यदि इस किताब की बात करूँ तो सबसे पहले इसके मुख्य पृष्ठ पर अंकित मोर पंख ध्यान आकृष्ट करता है और बरबस ही पौराणिक काल के पांडुलिपियों की याद ताज़ा हो उठती है, जिसमें कलम की जगह मोर पंख का इस्तेमाल होता था। जैसा कि इस किताब की भूमिका में आदरणीय योगेंद्रनाथ मिश्र ने लिखा है कि ‘सामान्यतः संपादकीय एक बार ही पढ़ा जाता है’, लेकिन संपादकीय यदि ऐसे विषयों पर लिखी गई हो जिसका दीर्घकालिक प्रभाव हो, तो फिर ऐसे लेख की उम्र एक दिन की नहीं हो सकती और यदि ये लेख ऐसी तटस्थता और निरपेक्षता से लिखे गए हों कि कलम की स्याही के किसी खास रंग में रंगे होने का भ्रम तक न हो तो फिर ये किसी पौराणिक पांडुलिपि की तरह ही संग्रहणीय हो उठती है।

ऋषभदेव शर्मा की विनम्रता और ख़ुद से पहले दूसरों की सुविधा का ख़्याल रखने की कला का लोहा उनके सभी जानने वाले मानते हैं, इस पुस्तक में भी उन्होंने पाठकों की सुविधा के लिए संपादकीय लेखों को आठ खंडों में संकलित किया है। हर लेख के बाद उन्होंने इसके प्रकाशन की तिथि भी दी है जिससे भविष्य में शोधार्थियों को इस लेख की पृष्ठभूमि समझने में सहूलियत होगी।

पहले खंड ‘स्त्री संदर्भ’ के पहले लेख में ही वे डेनिस मुक्केगे और नादिया मुराद को 2018 का नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने पर लेख लिखते हुए, इराक में जन्मी नादिया मुराद पर इस्लामिक स्टेट द्वारा किए गए ज़ुल्मों का विवरण देते हैं। 2014 में इस्लामिक स्टेट द्वारा नादिया के गाँव को घेर कर 600 (यज़ीदी) पुरुषों को मार डाला गया और सभी औरतों और बच्चियों को यौन दासी बना लिया गया। नादिया तब सिर्फ़ 15 साल की थी। औरतों को न मारे जाने पर जब वो लिखते हैं “औरतों को मारने के बजाय ‘भोगना’ अधिक पौरुषपूर्ण (!) होता है न।“ तो ये एक पंक्ति आपको देर तक रोक लेती है और बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है। यही एक अच्छे संपादकीय की पहचान है।

13 अक्तूबर 2018 को ‘मी टू’ विषय पर लिखते हुए जहाँ एक ओर वे महिलाओं के इस प्रयास की ये कहते हुए सराहना करते हैं कि “आज भी उन्हें अपने इस बोलने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है लेकिन फिर भी अब वे साहस (दुस्साहस?) पूर्वक बोलने लगी हैं और इससे बहुत से चमकीले चेहरों के आवरण उतरने के कारण कुछ न कुछ असहजता अवश्य महसूस की जा रही है।“ तो लगे हाथ वे महिलाओं को नसीहत देते हुए कहते हैं “स्त्री-देह को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करने वाली महिलाएँ भी समाज में सदा रही हैं। उनकी भी पहचान की जानी चाहिए और ख़ुद को ‘लुभाने वाली वस्तु’ की तरह पेश करने की प्रवृत्ति की भी निंदा की जानी चाहिए।“ और संपादकीय ज़िम्मेदारी का निर्वाह करते हुए लिखते हैं, “स्त्री और पुरुष दोनों ही अगर एक दूसरे की किसी भी प्रकार की स्वाभाविक कमजोरी का शोषण करते हैं, तो इसे वांछनीय नहीं माना जा सकता।“

मुस्लिम महिलाओं के तीन तलाक का मामला हो या महिलाओं के ख़तना जैसी कुप्रथा, ‘संपादकीयम्’ बेबाकी से अपनी राय रखता है। धारा 497 पर डॉ॰ शर्मा न्यायालय के आदेश का समर्थन तो करते हैं लेकिन साथ ही ये कहते हुए आगाह करना नहीं भूलते कि ‘अनैतिक संबंधों की इस वैधानिक स्वीकृति का परिणाम भारत की सामाजिक व्यवस्था के लिए घातक भी हो सकता है।‘ ऐसे मामलों में न्यायालय की सीमा रेखा को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि ‘भले ही न्यायपालिका ने व्यभिचार को वैधता प्रदान कर दी हो, किंतु उसे नैतिकता प्रदान करना उसके वश की बात नहीं।‘ वहीं शबरीमला में महिलाओं के प्रवेश के मामले पर वे पूरी तरह से न्यायालय के फैसले से साथ खड़े नज़र आते हैं और लिखते हैं “भक्तों पर प्रतिबंध लगाने वाली कोई भी प्रथा उनके आराध्य देव को जड़-रूढ़ियों का बंदी बनाने के समान है। देवता तो लोक का है, उसे लोक से दूर करना हर प्रकार से अनुचित है - लोकद्रोह है।“

दूसरा खंड ‘लोकतंत्र और राजनीति’ संभवतः भविष्य की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण हो क्योंकि इस खंड में 12 संपादकीय लेखों के माध्यम से डॉ॰ शर्मा आज के ज्वलंत मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुंबई में डांस बार को पुनः खोलने की अनुमति देने के बाद 21 जनवरी 2019 के अपने लेख में वे चुभते हुए व्यंग से इस घटना को आज की राजनीति से जोड़ते हैं। उन्होंने लिखा है “चुनावी राजनीति ने देश को डांस बार बना रखने में कोई कोर-कसर तो छोड़ी नहीं है। जिधर देखिए उधर ही डांस चल रहा है। प्रत्यक्ष में तो नेता जनता को रिझाने के लिए नाचते-कूदते दिखाई देते हैं। पर है ये नज़रों का फेर ही। असल में तो वे खुद अपनी धुन और ताल पर जनता को नचा रहे होते हैं। ग्राहक को लगता है कि बार-बाला नाच रही है लेकिन सच में तो वह अपने संकेतों पर ग्राहक को नचा रही होती है।“ इस घटना को सामान्य संपादकीय की तरह न लिख कर जिस तरह से उन्होंने इसे आज की राजनीति से जोड़ते हुए इस पर व्यंग्य किया है, इसे न सिर्फ पठनीय बनाता है अपितु राजनीति के गिरते स्तर को भी हमारे सामने ला खड़ा करता है। उन्होंने लिखा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि डांस बार में सीसीटीवी लगाने की अनिवार्यता नहीं है क्योंकि इससे ‘निजता’ का उल्लंघन होता है तो क्यों न नेताओं के करतूतों की भी रिकॉर्डिंग की इजाजत नहीं होनी चाहिए। बेचारे वोटरों को रिझाने के लिए न जाने क्या-क्या करते हैं और लोग इसे रेकॉर्ड कर उन पर बाद में हमला बोलते हैं। ये उनकी ‘निजता’ का हनन है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बार-बालाओं पर पैसे बरसाए नहीं जा सकते, हाँ उन्हें टिप दिया जा सकता है। नेताओं के लिए भी इसकी अनिवार्यता जताते हुए वो लिखते हैं, जनता पर बरसाए पैसे का हिसाब रखने में दिक्कत होती है, तो बेहतर है कि सीधे-सीधे जनता के हाथ में टिप दिए जाएँ ताकि बाद में गला पकड़ने में सहूलियत हो। डांस बार के धार्मिक स्थानों से एक किलोमीटर की दूरी पर होने के नियम को भी सुप्रीम कोर्ट ने हटा दिया तो डॉ॰ शर्मा ‘राजनीति के नचनियों’ के लिए भी ये सुविधा चाहते हैं जहाँ वे धार्मिक स्थानों और शिक्षण संस्थानों का अपने मतलब के लिए उपयोग कर सकें। वो लिखते हैं, “चुनाव नृत्य में धर्म और शिक्षा की जुगलबंदी के बिना मजा ही कहाँ आता है। इसके बिना उन्माद नहीं जागता और उन्माद जगाए बिना चुनाव नृत्य पूरा नहीं हो सकता।“ लेख के अंत में वो लिखते हैं “खूब नाच-गाना हो, शराब बहें, उपहार लिए-दिए जाएँ, उन्माद की वर्षा हो, वशीकरण के लिए यह जरूरी है - बार में भी, और चुनाव में भी।“

एक राजनीतिक विश्लेषक द्वारा लिखे गए लेख से राजनीति की जटिलताएँ समझने में शायद मदद मिले लेकिन जब डॉ॰ शर्मा जैसे साहित्यकार इस विषय पर लिखते हैं तो इसकी पठनीयता कई गुणा बढ़ जाती है। 22 दलों के साथ आकर महागठबंधन बनाने पर वो लिखते हैं, “संकल्प के सहारे बड़े-बड़े लक्ष्य प्राप्त किए जाने की कहानियाँ मिलती हैं। पर यह तभी हो पाता है जब समस्याओं के ‘जाल’ में फँसे सारे ‘कबूतर’ एक ही दिशा में उड़ें। इसके लिए एक दिशा में ले जाने वाला ‘मुखिया कबूतर’ भी चाहिए होता है। प्रस्तावित महागठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि ‘मुखिया कबूतर’ नदारद है।“

रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा “समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध। जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।“ डॉ॰ शर्मा ये अपराध नहीं करते। मुद्दा चाहे कश्मीर का हो, लद्दाख का, आरक्षण का या राजनीति के गिरते स्तर का, सभी विषयों पर डॉ॰ शर्मा न सिर्फ वस्तु-स्थिति को सरल भाषा में पाठकों के सामने रखते हैं बल्कि हर मुद्दे पर अपने विचार भी सामने रखते हैं। संपादकीय में अमूमन कविता देखने को नहीं मिलती लेकिन जब संपादकीय लिखने वाले ‘कवि’ ऋषभदेव शर्मा हों तो वे इस बंधन को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते। जातिगत राजनीति का दर्द बयान करते हुए वो लिखते हैं -

मानचित्र को चीरती, मज़हब की शमशीर

या तो इसको तोड़ दो, या टूटे तस्वीर।

मुहर-महोत्सव हो रहा, पाँच वर्ष के बाद

जाति पूछ कर बंट रही, लोक तंत्र की खीर।

किसानों की समस्याओं पर आधारित तीसरे खंड में चार लेखों के माध्यम से उन्होंने ‘अन्नदाता से दिल्ली दूर क्यों?’ और ‘आत्महत्याओं का इलाज़ कर्जमाफ़ी नहीं’ जैसे सटीक शीर्षक से लेख लिखे हैं।

‘शहर में दावानल’ नाम से लिखे गए खंड चार में 6 लेखों का संकलन है जिसमें भीड़-तंत्र द्वारा कानून अपने हाथ में लिए जाने पर चिंता व्यक्त की गई है। ‘अब किसके पिता की बारी है?’ शीर्षक, हालात की भयावहता के बारे में सोचने को विवश करता है। इसी विषय पर ‘अब जिसे भी देखिए, उस पर गुलेले हैं’ शीर्षक से लिखे लेख में उन्होंने अपनी कविता की पंक्तियों को रेखांकित किया है -

ईंट, ढेले, गोलियाँ, पत्थर, गुलेलें हैं

अब जिसे भी देखिए, उस पर गुलेलें हैं

क्या पाता क्या दंड दे, यह आज क़ातिल को

भीड़ पर तलवार हैं, खंजर गुलेलें हैं।

‘ऊपरवाला देख रहा है’ शीर्षक से भारत सरकार द्वारा पारित आदेश जिसमें 10 सरकारी एजेंसियों को अधिकार दिया गया है कि ये किसी भी नागरिक के फोन और कंप्यूटर की निगरानी बिना किसी अतिरिक्त आदेश के कर सकते हैं, पर लेख लिखते हुए उन्होंने लिखा है “इसमें दो राय नहीं कि किसी भी देश की सुरक्षा सर्वोपरि है और उसके समक्ष नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकार गौण एवं स्थगित हो जाने चाहिए। लेकिन ऐसा केवल असामान्य स्थिति या आपात स्थिति में ही स्वीकार्य है। साधारण परिस्थितियों में भी यदि नागरिक को यह लगता है कि कोई एक आँख लगातार उसकी हर गतिविधि को ताक-झांक कर देख रही है, तो सरकार का यह अबाध अधिकार नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार का अतिक्रमण है।“ सनद रहे कि ऐसा कहने वाले डॉ॰ शर्मा खुद इंटेलिजेंस ब्यूरो के लंबे समय तक अधिकारी रह चुके हैं।

अगले तीन खंड ‘व्यवस्था का सच’, ‘हमारी बेड़ियाँ’ और ‘अस्तित्व के सवाल’ हैं जिनमें कई समसामयिक विषय जैसे सड़कों की बदहाली, पानी की किल्लत, जातिगत समस्याएँ, बच्चों की सुरक्षा, बुढ़ापे की असुरक्षा और ग्लोबल वार्मिंग पर महत्वपूर्ण लेख संकलित हैं।

अंतिम खंड में उन्होंने ‘वैश्विक संदर्भ’ के नाम से 7 लेख रखे हैं। ये ऐसे विषय हैं जिनमें गंभीरता की आवश्यकता है और डॉ॰ शर्मा इनके साथ पूर्ण न्याय करते हैं। इस खंड में वो सिर्फ साहित्यकार न होकर वैश्विक राजनीति के जानकार के तौर पर नज़र आते हैं और अपने लेखों में अमेरिका, चीन, फ्रांस, संयुक्त राष्ट्र, उत्तर कोरिया जैसे विषयों पर ऐसे लेख लिखे हैं जिनकी उपयोगिता आने वाले समय में बढ़ती जाएगी।

महाभारत के युद्ध में जैसे कौरव और पांडव दो पक्ष थे लेकिन संजय ने इस युद्ध का हाल किसी एक पक्ष के तौर पर नहीं सुनाया। संजय ने वो सुनाया जो उन्होंने देखा और समझा। समाचार में भी हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। ‘संपादकीयम्’ इन दोनों पक्षों को उजागर तो करता ही है, साथ ही संजय की तरह डॉ॰ शर्मा इसमें अपने विचार रखकर इन दो पक्षों में एक तीसरा आयाम जोड़ते हैं। इस पुस्तक के विषय ऐसे हैं जिन्हें वर्षों बाद भी इसलिए देखा जाएगा कि अमुक विषय पर डॉ॰ शर्मा के विचार क्या थे और क्या उनका आकलन सही निकला। इस मायने में ये पुस्तक निश्चय ही संग्रहणीय है। पुस्तक की बाइंडिंग और बेहतर हो सकती थी। एक बार आद्योपांत पढ़ने से ही यदि किताब से पन्ने, शरीर से आत्मा की तरह निकलने को मचलने लगे तो लंबे समय तक इसकी संग्रहणीयता मुश्किल हो जाएगी।

‘संपादकीयम्’ पुस्तक का सही आकलन भविष्य में होगा जब डॉ॰ शर्मा के विभिन्न विषयों पर रखे विचार मूर्त रूप लेंगे। इस पुस्तक के लिए उन्हें मेरी बहुत बहुत शुभकामनाएँ इस उम्मीद के साथ कि ‘संपादकीयम्’ सिर्फ एक पुस्तक न हो कर इस नाम से एक शृंखला होगी जिसमें ऐसे कई महत्वपूर्ण लेख संग्रहीत किए जाएँगे।


- प्रवीण प्रणव
सीनियर प्रोग्राम मैनेजर
माइक्रोसॉफ्ट
B-415, गायत्री क्लासिक्स
लिंगमपल्ली, हैदराबाद

बुधवार, 26 अगस्त 2020

हिंदी भाषा के विकास में पत्र-पत्रिकाओं का योगदान' विषयक ऑनलाइन व्याख्यानमाला संपन्न



'हिंदी भाषा के विकास में पत्र-पत्रिकाओं का योगदान' विषयक ऑनलाइन व्याख्यानमाला संपन्न
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हैदराबाद, 25 अगस्त, 2020।
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के आंतरिक गुणवत्ता प्रमाणन प्रकोष्ठ (IQAC) एवं पी जी विभाग, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘हिंदी भाषा के विकास में पत्र-पत्रिकाओं का योगदान’ विषयक ऑनलाइन व्याख्यानमाला संपन्न हुई।  
आंतरिक गुणवत्ता प्रमाणन प्रकोष्ठ के संयोजक डॉ. सुभाष जी. राणे की अध्यक्षता में संपन्न इस व्याख्यानमाला में बतौर मुख्य वक्ता प्रमुख कवि, तेवरीकार, समीक्षक, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद के पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने हिंदी भाषा के विकास में पत्र-पत्रिकाओं के योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता की शुरूआत बंगाल से हुई और इसका श्रेय राजा राममोहन राय को जाता है। राजा राममोहन राय ने ही प्रेस को सामाजिक उद्देश्य से जोड़ा। उन्होंने 1819 में भारतीय भाषा का पहला समाचार-पत्र ‘संवाद कौमुदी’ (बांग्ला भाषा) प्रकाशित किया। 1822 में गुजराती भाषा का साप्ताहिक ‘मुंबईना समाचार’ प्रकाशित हुआ। प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने जोर देकर कहा  कि हिंदी पत्रकारिता और हिंदी भाषा के विकास में हिंदीतर भाषियों का योगदान उल्लेखनीय है। प्रो. शर्मा ने अनेक उदाहरण देकर यह प्रतिपादित किया कि नए युग के नए विषयों की अभिव्यक्ति के लिए नई संप्रेषणीय भाषा के निर्माण में हिंदी पत्रकारिता सदा सृजनात्मकता को साथ लेकर चली है। उन्होंने बताया कि सृजनात्मकता के अभाव में लोकप्रिय नई भाषा निर्मित नहीं हो सकती तथा इस अभाव ने ही प्रशासनिक हिंदी को जटिल और अबूझ बना दिया है।
इस कार्यक्रम में विशेष अतिथि डॉ. शोडषीमोहन दां (कुलपति, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास) और मुख्य अतिथि प्रो. प्रदीप कुमार शर्मा (कुलसचिव, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास) ने शुभाशंसा प्रस्तुत की।  इस अवसर पर 70 से  अधिक विद्यार्थी और शोधार्थी उपस्थित होकर व्याख्यान से लाभान्वित हुए।     
कार्यक्रम का संयोजन पी जी विभाग, हैदराबाद की आचार्य एवं अध्यक्ष डॉ. पी. राधिका ने किया तथा डॉ. गोरखनाथ तिवारी ने धन्यवाद ज्ञापित किया। ●
(रिपोर्ट: 
डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा)