सोमवार, 1 जून 2020

तकनीकी और डिजिटल संप्रेषण की दुनिया में हिंदी साहित्य के बढ़ते कदम : अंतरराष्ट्रीय वेबिनार संपन्न


हैदराबाद, 1 जून 2020 (मीडिया विज्ञप्ति)।

हिंदी हैं हम विश्व मैत्री मंच, हैदराबाद के तत्वावधान में 1 जून, 2020 को मध्याह्न 3 बजे से 5 बजे तक "तकनीकी व डिजिटल संप्रेषण की दुनिया में हिंदी साहित्य के बढ़ते क़दम" विषय पर एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेबिनार सफलतापूर्वक आयोजित किया गया।

मुख्य वक्ता के रूप में प्रसिद्ध कवि-समीक्षक प्रो. ऋषभदेव शर्मा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार तेजेंद्र शर्मा उपस्थित थे। हैदराबाद केंद्र से संचालित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में दोनों विद्वानों ने महत्वपूर्ण विचार रखे।

प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने अंतरराष्ट्रीय  स्तर पर हिंदी साहित्य के क्षेत्र में हैदराबाद नगर को एक विशेष स्थान दिलाया है। उन्होंने तकनीकी संप्रेषण के माध्यम से हिंदी साहित्य की बढ़ोतरी के बारे में अपने विचर अभिव्यक्त किए। प्रो. ऋषभ ने कहा कि वर्तमान समाज सही अर्थ में 'सूचना समाज' है। अब साहित्य पुस्तकों की दहलीज लाँघ कर डिजिटल मल्टीमीडिया के सहारे अधिक लोकतांत्रिक बनने की ओर अग्रसर है। उन्होंने मुक्त वितरण के लिए तकनीकी के उपयोग की जानकारी देने के साथ ही विभिन्न आधुनिक संचार माध्यमों में स्टोरी-टेलिंग की तुलना करते हुए 'डिगिंग' और 'स्प्रेडिंग' की अवधारणाओं का खुलासा किया।

वरिष्ठ साहित्यकार तथा विदेशों में हिंदी के प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में अपना परचम लहराने वाले तेजेंद्र शर्मा  ने अपने विचारों में डिजिटल रूप से हिंदी के विकास के बारे में अपनी राय रखी। डिजिटल एवं ऑनलाइन संचार ऐसी क्रांति है, जो नि:संदेह देश को प्रगति के पथ पर त्वरित गति से ले जा सकती है। इसी का लाभ आज हिंदी साहित्य उठा रहा है। आज इतनी सारी वेबसाइटें, ब्लाग हैं कि वे हिंदी की कथा, कहानी, कविताएँ, निबंध, जीवनी, आत्मकथा, रिपोर्ताज, संस्मरण, एकांकी, नाटक तथा अन्य विधाओं को सुंदर मंच प्रदान कर रहे हैं। डिजिटल एवं ऑनलाइन संचार में भाषा का संयम, शब्दों का चयन उपयुक्त होना चाहिए। भावनाओं की अभिव्यक्ति के साथ-साथ दूसरों की भावनाओं का सम्मान भी अवश्य होना चाहिए। ऐसा करने पर ही हिंदी साहित्य का विकास तकनीकी तथा डिजिटल रूप में हो सकता है। आज रचनाकार, हिंदी कुंज, कविताकोश, गद्यकोश, प्रतिलिपि जैसे कई साइट इन बातों का ध्यान रखते हिंदी साहित्य की सेवा में निरंतर लगे हुए हैं। पढ़ने को तो कई किताबें हैं, लेकिन गुलजार के शब्दों में कहना हो तो सारी किताबें अलमारी में पड़े-पड़े अपनी बेबसी पर रो रही हैं। हम यह सोच रहे हैं कि किताबें अलमारी में बंद हैं, जबकि सच्चाई यह है कि हम कहीं न कहीं अपनी मजबूरियों में बंद हैं।

मंच के महासचिव डॉ. डी. विद्याधर ने अपने स्वागत भाषण में हिंदी के विकास को लेकर अपनी कटिबद्धता व्यक्त की। साथ ही कोरोना महामारी के काल में भी हिंदी का अलख जगाने की पुरजोर अभिव्यक्ति की। अध्यक्ष डॉ. मो. रियाजुल अंसारी ने मंच के हिंदी के प्रचार-प्रसार कार्यक्रमों की जानकारी दी। इसके अतिरिक्त वेबिनार में मंच की ओर से उपाध्यक्ष डॉ. राजेश अग्रवाल, डॉ. राकेश शर्मा, डॉ. सुषमा देवी, डॉ. डी. जयप्रदा तथा डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उपस्थित थे। गौरतलब है कि इस वेबिनार में प्रत्यक्ष रूप से 500 प्रतिभागियों ने तो यूट्यूब के सीधे प्रसारण पर 2500 प्रतिभागियों ने ज्ञानवर्धन किया। सभी तीन हजार प्रतिभागियों को ई-प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।  

प्रस्तुति : 
डॉ. विद्याधर, महासचिव
हिंदी हैं हम विश्व मैत्री मंच
हैदराबाद।



मंगलवार, 5 मई 2020

(आलेख) यूँ ही नहीं बन जाते सांस्कृतिक मिथक : बी.एल.आच्छा



यूँ ही नहीं बन जाते सांस्कृतिक मिथक 
                      - बी.एल.आच्छा 

        लोग पढ़े लिखे हों या अनपढ़ ।मगर अनेक कथाएँ लोक विश्वासों में पीढ़ियों तक चलती रहती हैं। यों भारत में उनके आधार उपनिषद् और  रामायण -महाभारत जैसे इतिहास ग्रंथ तो हैं ही ।लोग भले ही रामायण और महाभारत को इतिहास न मानते हों,पर वे भारत की सांस्कृतिक आत्मा में इतिहास से भी ज्यादा गढ़े हुए हैं ।वे इतिहास के तथ्यों की तुलना में भावात्मक इतिहास और संस्कारों का जीवंत प्रवाह हैं।फिर कितने ही कथानक हैं। वेदों में यम -यमी संवाद से लेकर यमराज के द्वार पर  तीन दिन भूखे रहकर अमृत तत्व को पाने वाले नचिकेता तक।  नल -दमयंती से लेकर सावित्री -सत्यवान तक । सावित्री तो यमराज से  मत्यु के मुँह में गये अपने पति जीवित  लौटा लाई  थी।

          इन मिथकों की जीवट मुझे कोरोना परिदृश्य की ओर जबरन ले जा रही है। एक मजदूर माँ अपने चार बच्चों को लेकर  अपने गाँव जाने के लिए पैदल ही छह सौ किलोमीटर की दूरी तय कर रही है। न खाने को राशन । न रास्ते में बनाने के संसाधन। पल्लू में  न पैसा ।गिरवी रखने को कीमती सोना- चाँदी  भी नहीं।  चाय- दूध के साधन भी नहीं। ऊपर से माथे पर लदा सामान । कभी छोटे बच्चे को तोकना भी।रास्ते में खाने -पीने की सारी दुकाने बंद। तब भी यह मां अपने चार बच्चों को लेकर अपने पर्णकुटी वाली जमीन तक पहुंचती है।   

          उदाहरण और भी हैं।तेलंगाना की एक विधवा माँ स्कूटर पर पंद्रह सौ किलोमीटर यात्रा करकेअपनी बेटी को पराये शहर से ले आती है।और उदाहरण एक पति का भी है , जो  कैंसरग्रस्त पत्नी को साइकिल पर बिठाकर छह सौ किलोमीटर दूर अस्पताल ले जा रहा है। आखिर इन भूखे प्यासे बच्चों के साथ अपनी धरती की और लौट रही मां की तार तार पीड़ा को देखकर यमराज भी गीली हर बार लौट गया  होगा। जीवट के ऐसे कई अनाम  पात्र हैं कोरोना काल में।
             और  समूह को भी लीजिए। कितने ऐसे मजदूर चल दिए थे अहमदाबाद से राजस्थान। दिल्ली से गाजीपुर।  दिल्ली से उत्तराखंड ।और उनके तेवर भी  ईमान को ईमान दिखा दे ।जहां कहीं आश्रय मिला मुफ्त रोटी तोड़ने के बजाय दरियादिल मालिक से कहा- हम यहाँ घासफूस साफ कर दें ,मजदूरी के बदले। कुछ नए मजदूर बच्चों को भी आश्रय मिला स्कूल में । बोल दिया- हम स्कूल को पेंट ही कर दें ,आश्रय के बदले।इन मजदूरों को कौन सी पॉश कॉलोनियों से दरियादिली मिली होगी। ना होटल ,न पानी।  जनहित में ढंडेवाली पुलिस का डर भी। पर इनके डर की तुलना में अपने गांव की झोपड़ी और जमीन तक पहुंचना ही एकमात्र अरमान। रिश्तों को तरसती सूनी आँखें।  आखिर गरीब लोगों ने ही अपने राशन से इनकी भूख मिटाई होगी । क्या इनमें सावित्री जैसी पत्नी या मां की जीवट नहीं थी।  या कि इनमें सत्यवान जिंदा नहीं है।ये अनपढ़  लोग किताबों से  मिथ को नहीं समझते।रिश्तों को प्राणपण से जीकर जीवन की जयकार कर देते हैं ।क्या दशरथ मांझी अपने समय का जीवित मिथ नहीं है ,जिसने पहाड़ काटकर कैंसर से जूझती  पत्नी के साथ गांव की जिंदगी के लिए भी राह बना दी। वरुण देवता का अंश ही तो है वह ,जो बिना सरकारी कृपा के अपने गाँव में तालाब बना देता है। स्कूली बच्चों के लिए नदी पर लकड़ी का पुल बना देता है ।और पूर्वांचल का वह ग्रामीण पर्यावरण पुरुष क्या देवता नहीं है ,जो अपने बूते पंद्रह हजार पेड़ लगा देता है ।
      मुझे तो लगता है दुनिया के पास किताबों का तत्व दर्शन है ।संगोष्ठियां और सेमिनार हैं ।जरूरी भी हैं ज्ञान और तकनीक के लिए। मगर ये किसान मजदूर बिना अनुलोम- विलोम के अपनी लंबी साँसों  से ही कोरोना वायरस  को झटकार देते हैं।आँकड़े भी कहते हैं  कि इन मजदूरों और किसानों में एक प्रतिशत भी कोरोना रोगी नहीं थे।  कोरोना की दिन-रात की   बेचैनियों की काली चादर को सुबह  की  ललाई दिखाने वालों इन मजदूरों में  यह जीवट अपने रिश्तों में अटूट समर्पण का जीवंत मिथक रचती है।

बी.एल.आच्छा
Balulal Achha
Tower-27Flat-701
North Town( Old BinnyMill)
Stefenson Road
Perambur
Chennai (T.N)
Pin-600012
Mob.-94250-83335

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

"कारवाँ गुजर गया" पर एक टिप्पणी : प्रो गोपाल शर्मा


(कर्नाटक के स्नातक द्वितीय सत्र के हिंदी छात्रों के निमित्त तैयार पाठ्य पुस्तक 'काव्य मधुवन' में  सम्मिलित गोपालदास 'नीरज' के प्रसिद्ध गीत 'स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से' के प्रतिपाद्य के बारे में संपादक डॉ. विनय कुमार यादव ने अध्यापकों के संशय के बारे में बताया, तो हमने प्रो. गोपाल शर्मा से समाधान स्वरूप कुछ शब्द लिख देने का अनुरोध किया। उनकी यह टिप्पणी उसी का परिणाम है। साभार उद्धृत। - ऋषभ)

कारवां गुजर गया 
- प्रो. गोपाल शर्मा 


‘कारवां गुजर गया’ कविवर गोपालदास नीरज द्वारा लिखित एक ऐसा गीत है जिसे उनका जीवन- दर्शन(?) कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी। इस गीत की प्रसिद्धि का यह हाल है कि इसी गीत की पंक्ति को देकर भारतीय प्रिंट मीडिया ने इनके निधन की सूचना दी थी । कवि और दार्शनिक के वक्तव्यों में से किसे प्राथमिकता दी जाए इस विवाद को प्लेटो और अरस्तू भी हल न कर पाए। भारत में कवि को मनीषी और प्रजापति कहकर उसके वर्चस्व को स्वीकार किया गया। आज भी कवि के वचनों को इसी कारण अबूझ और उलटबाँसी कह दिया जाता है । 


जीवन के प्रति एक तो दृष्टिकोण है रॉबर्ट ब्राउनिंग का ( ग्रो ओल्ड अलोंग विद मी / द बेस्ट इज़ यट टू बी ) आशावादी और दूसरा है थॉमस हार्डी का ( इन लाइफ हैप्पिनेस इज़ बट एन ओकेजनल एपिसोड इन द जनरल ड्रामा ऑफ पेन ) एक दम निराशावादी। शेक्सपीयर भी जीवन को मूर्खालाप कह गए हैं । कवि नीरज भी अनेक उदाहरण देकर यही कह रहें हैं कि जीवन रूपी कारवां गुजर जाता है और हम केवल गुबार देखते रह जाते हैं । ईश्वर द्वारा प्राप्त इस जीवन की रंगभूमि में चकित, भ्रमित, और निरुपाय सा खड़ा इंसान जीवन के सुख-दुख को खड़ा होकर देखता रह जाता है और इस ‘अद्भुत अनुपम बाग’ का वसंत कब पतझड़ में पलट जाता है , पता ही नहीं चलता । मनुष्य ठगा सा खड़ा दृष्टा मात्र बना रह जाता है । कवि नीरज ने यहाँ जीवन को दुल्हन का रूपक देकर स्वयं को जीवन के प्रेमी के रूप में चित्रित करके जो दृश्य बिंब प्रस्तुत किए हैं वे अपने आप में बड़े रोमानी और चित्ताकर्षक हैं। क्या नीरज का स्वर हताशावादी है ? विचार करना होगा । विचार करते हैं तो ऐसा लगता है कि जीवन के जिस स्टेज पर जो पाठक है यह इन पंक्तियों का अलग अर्थ लेगा। युवक- युवतियाँ इसमें प्रेम की असफलता का चित्रण देख सकते हैं, जैसा फिल्म के चित्रांकन में भी है, किन्तु कविता का सदाशय पाठ करने पर यही लगता है कि जीवन में बहुधा मनुष्य दृष्टा होकर निरुपाय रह जाता है। 

मैंने गोपाल दास नीरज को केवल एक बार देखा है । वे हैदराबाद के हिन्दी महाविद्यालय में आए थे । आ तो वे गए थे समय पर ही , पर पता नहीं क्यों वे कुछ पढ़ नहीं रहे थे , कह भी नहीं रहे थे। उन्हे एक सफ़ेद लिफाफा भी दिया गया किन्तु उसके बाद भी वे स्फुट स्वर में कुछ बोलते बतियाते भर रहे । मैंने अवसर का लाभ उठाकर उनसे बात की और यह भी पूछा कि उनके सर्वप्रसिद्ध गीत ‘कारवां गुजर गया’का निहितार्थ क्या है । तब उन्होने मुझे एक रुबाई सुनाई –

ज़िंदगी अजब सराय फ़ानी देखी ।
हर चीज़ यहाँ की आनी जानी देखी । 
जो आके ना जाए वो बुढ़ापा देखा । 
जो जाके न आए वो जवानी देखी । । 

यह रुबाई किसकी है, वे बता ही रहे थे कि उनके द्वारा जल्दबाज़ी में होटल के रिसेप्शन में छोड़ दिये गए डेंचर्स लेकर एक व्यक्ति आ गया । उन्होने मुँह फेर कर उसे फिट किया और फिर एक के बाद एक अनेक संस्मरण सुनाए । फिल्मी गीत सुनाए । ‘ए भाई जरा देख के चलो’ पर खूब ताली बजी। तब स्मार्ट फोन न था, अफसोस।...

मंगलवार, 10 मार्च 2020

(तकनीकी संगोष्ठी) रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण और डीआरडीओ

हैदराबाद, 5 मार्च 2020. अनुसंधान केंद्र इमारत (आरसीआई) में रक्षा अनुसंधान एवं विकस संगठन की आठ प्रयोगशालाओं की द्वि दिवसीय अखिल भारतीय संयुक्त तकनीकी संगोष्ठी "रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण और डीआरडीओ " का उद्घाटन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित प्रो.ऋषभदेव शर्मा ने किया। (चित्र सौजन्यः- काज़िम अहमद, हिंदी अधिकारी, आरसीआई)
संगोष्ठी अध्यक्ष अरविंद कुमार पाठक, वैज्ञानिक 'जी' आरसीआई ने मुख्य अतिथि प्रो. ऋषभदेव शर्मा को सम्मान चिह्न समर्पित किया।  

आठों प्रयोगशालाओं के निदेशकों के साथ दीप प्रज्वलन 

मुख्य अतिथि का उद्बोधनः सरल भाषा में वैज्ञानिक साहित्य रचें

 मुख्य अतिथि प्रो.ऋषभदेव शर्मा ने 'रक्षा अनुसंधान राजभाषा पोर्टल' लोकार्पित किया।

 
दीप ज्योति नमोस्तु ते : मुख्य अतिथि ने उद्घाटन-दीप प्रज्वलित किया 

डॉ.अर्चना पांडेय द्वारा संपादित काव्य संकलन "गुलमोहर" का विमोचन 

आयोजक प्रयोगशाला (आरसीआई) को शील्ड प्रदान की गई।

मुख्य अतिथि के हाथों सभी प्रयोगशाला निदेशकों को सम्मान चिह्न प्रदान किए गए।

मुख्य अतिथि का संबोधन : वैज्ञानिक और तकनीकी साहित्य सृजन के लिए हिंदी पूर्णतः समर्थ भाषा 
 :
आरसीआई की हिंदी गृह-पत्रिका 'इमारत' का विमोचन

आरसीआई, एएसएल, डीआरडीएल, डीएलआरएल, डीएमआरएल, अनुराग, चेस हैदराबाद एवं एनएसटीेल विशाखापट्टणम के निदेशकों के साथ मुख्य अतिथि

एक्सपोजिशन हॉल में... 

।। तमसो मा ज्योतिर्गमय ।।

आरंभ से पहले...
-प्रस्तुतिडॉ.बी.बालाजी, 
उप प्रबंधक, 
हिंदी अनुभाग एवं निगम संचार, 
मिश्र धातु निगम लिमिटेड

मंगलवार, 3 मार्च 2020

भाषा और संस्कृति पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न


दीप प्रज्वलन :
गोवा की पूर्व राज्यपाल मृदुला सिन्हा। साथ में, डॉ. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी, प्रो. दिलीप सिंह, प्रो. विनय कुमार, डॉ, विनय कुमार, डॉ. विद्योत्तमा कुंजल एवं ऋषभदेव शर्मा। 


नई दिल्ली, 29 फरवरी, 2020.
"आज का समय पूरी दुनिया में मानवीय मूल्यों के संकट, आसुरी शक्तियों के आतंक और आदर्शों के अभाव का समय है। ऐसे में पूरी दुनिया भारत की ओर उम्मीद की नज़रों से देख रही है। भारत के पास राम और कृष्ण जैसे आदर्श चरित्र उपलब्ध हैं, जो विश्व कल्याण की प्रेरणा दे सकते हैं। इनके माध्यम से दुनिया भर में मानवमूलक संस्कृति की पुनः स्थापना की जा सकती है। तरह-तरह के खंड-खंड विमर्शों के स्थान पर 'परिवार विमर्श' आज की आवश्यकता है और इसी के साथ रामत्व और कृष्णत्व की प्रतिष्ठा जुड़ी है।" ये विचार प्रख्यात साहित्यकार, लोक संस्कृति विशेषज्ञ और गोवा की पूर्व राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने नई दिल्ली महानगर निगम  के विशाल कन्वेंशन हॉल में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रकट किए।
पुस्तक लोकार्पण सत्र :
पूर्व सांसद सुनील शास्त्री, डॉ. लीना सरीन, डॉ. ऋषभदेव शर्मा, डॉ. विपिन कुमार, प्रो. दिलीप सिंह एवं डॉ. यंतु देव बुधु

सम्मेलन का आयोजन साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था (मुंबई), इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (अमरकंटक) तथा विश्व हिंदी परिषद (दिल्ली) ने संयुक्त रूप से किया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता अमरकंटक से पधारे कुलपति डॉ. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी ने की और बीज वक्तव्य प्रो. दिलीप सिंह ने दिया। समारोह में देश भर से आए विद्वानों और साहित्यकारों के अलावा रूस की डॉ. लीना सरीन तथा हिंदी प्रचारिणी सभा, मॉरीशस के अध्यक्ष डॉ. यंतुदेव बुधु, महात्मा गांधी संस्थान, मॉरीशस की निदेशक डॉ. विद्योत्तमा कुंजल तथा प्रो.अलका धनपत और लिथुआनिया की कत्थक नृत्यांगना कैटरीना ने विभिन्न विचार सत्रों को संबोधित किया। पटना विश्वविद्यालय के प्रो. विनय कुमार ने अतिथियों का स्वागत-सत्कार करते हुए संगोष्ठी के विचारणीय विषयों का परिचय दिया। समारोह के विचारणीय विषय 'आधुनिक समय में रामकथा और कृष्णकथा का वैश्विक संदर्भ' तथा 'नई शिक्षा नीति और हिंदी भाषा' रहे। 

समापन सत्र के मुख्य अतिथि पूर्व सांसद सुनील शास्त्री।
साथ में- डॉ. लीना सरीन, डॉ. ऋषभदेव शर्मा, प्रो. दिलीप सिंह, डॉ. यंतु देव बुधु, डॉ. विद्योत्तमा कुंजल एवं प्रो- गिरीश जोशी। 

समापन सत्र में बतौर  मुख्य अतिथि पधारे पूर्व सांसद सुनील शास्त्री ने राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण में राम और कृष्ण की लोक कल्याणकारी संघर्षगाथाओं के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा और संस्कृति का सीधा संबंध हमारी भाषाओं के साथ है तथा हमारी भाषाओं में ही जीवन मूल्यों की जड़ें होती हैं, इसलिए यह जरूरी है कि हम भारतीय लोग अपनी भाषाओं का सम्मान करें। उन्होंने हिंदी के साथ साथ अन्य भारतीय भाषाओं को शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाने पर ज़ोर दिया।
भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के तृतीय सुपुत्र सुनील शास्त्री के हाथों 'संपादक रत्न' सम्मान ग्रहण करते हुए डॉ. ऋषभदेव शर्मा। साथ में - प्रो. दिलीप सिंह, डॉ. यंतु देव बुधु, डॉ. विद्योत्तमा कुंजल एवं अन्य। 

अवसर पर कई हिंदीसेवियों,साहित्यकारों और शिक्षाविदों को अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत किया गया, जिनमें प्रो.दिलीप सिंह, प्रो. विनय कुमार, प्रो. टी वी कट्टीमनी, प्रो ऋषभदेव शर्मा, ज्ञानचंद्र मर्मज्ञ, डॉ. श्रीराम परिहार, डॉ. कैलाश नाथ पांडे, डॉ. मधुकर पाड़वी, और डॉ. भावेश जाधव आदि सम्मिलित हैं। समारोह का समापन  डॉ.प्रदीप कुमार सिंह के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ।0

बुधवार, 29 जनवरी 2020

एकदिवसीय राष्ट्रीय शिक्षक उन्नयन कार्यशाला संपन्न

बैंगलोर, 29 जनवरी (मीडिया विज्ञप्ति)।
बिशप कॉटन वीमेन्स क्रिश्चियन कॉलेज की ओर से एकदिवसीय राष्ट्रीय शिक्षक उन्नयन कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमें विभिन्न महाविद्यालयों के लगभग 75 हिंदी शिक्षक-शिक्षिकाओं और छात्राओं ने प्रतिभागिता निभाई। अवसर पर बेंगलुरु केंद्रीय विश्वविद्यालय एवं बेंगलुर विश्वविद्यालय के बी.काम. द्बितीय सेमेस्टर की पाठ्यपुस्तक 'काव्य मधुवन' एवं 'काव्य निर्झर' की कविताओं व उनके कवियों पर विशेषज्ञों के साथ चर्चा की गई। 

कार्यशाला का उद्घाटन मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के परामर्शी प्रो.ऋषभदेव शर्मा ने बतौर मुख्य अतिथि किया। उन्होंने दोनों कार्यसत्रों की अध्यक्षता भी की।

मुख्य अतिथि प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने सभी आमंत्रित जनों के बारे में अपने स्नेह को प्रदर्शित करते हुए सभी को शुभकामनाएं दीं व सभी प्रतिभागियों को कार्यक्रम के विषय पर वार्ता के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कविता की ताकत को सभी भिन्नताओं व कुंठाओं के तालों को खोलने की चाबी बताया व इसे व्यक्तित्व के विकास की संभावनाओं का हिस्सा बताया। हिंदी कविता के शिक्षण के क्षेत्र में इस प्रकार के कार्यक्रमों से छात्रों व अध्यापकों के मार्गदर्शन के लिए मुख्य अतिथि ने ऐसे कार्यक्रमों के बार बार होने पर बल दिया । 

बिशप कॉटन वीमेन्स क्रिश्चियन कॉलेज की प्रधानाचार्या प्रोफेसर एस्थर प्रसन्नकुमार व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. विनय कुमार यादव ने भी कविता-शिक्षण की आवश्यकता और पेचीदगियों पर सूक्ष्म चर्चा की। 

दो कार्यसत्रों के दौरान डॉ. रेणु शुक्ला, डॉ. अरविंद कुमार, डॉ कोयल बिस्वास, डॉ. ज्ञान चंद मर्मज्ञ, डॉ. राजेश्वरी वीएम, डॉ. जी नीरजा डॉ. एम. गीताश्री ने बतौर विषय विशेषज्ञ निर्धारित कविताओं की बारीकियों पर विस्तार से चर्चा की। 

प्रथम सत्र में हरिवंशराय बच्चन की कविता - जुगनू, जगदीश गुप्त की कविता - सच हम नहीं ,सच तुम नहीं, नागार्जुन की कविता -कालिदास सच सच बतलाना, अटल बिहारी वाजपेयी की कविता - मन का संतोष और जयशंकर प्रसाद की कविता -- अशोक की चिंता पर चर्चा व वार्ता की गई। द्वितीय सत्र कवि गोपाल दास नीरज की कविता -स्वप्न झरे फूल से गीत चुभे शूल से, रामधारी सिंह दिनकर की कविता - पुरुरवा और उर्वशी पर केंद्रित रहा। 

प्रतिभागियों ने बताया कि कार्यशाला छात्रों व अध्यापकों के लिए बहुत ज्ञानवर्धक रही। कार्यक्रम की सफल प्रस्तुति का अंत राष्ट्रगान से हुआ । 

प्रस्तुति- 
डॉ . विनय कुमार यादव 
अध्यक्ष,हिंदी विभाग 
बिशप कॉटन वीमेन्स क्रिश्चियन कॉलेज 
बैंगलोर।