मंगलवार, 5 मई 2020

(आलेख) यूँ ही नहीं बन जाते सांस्कृतिक मिथक : बी.एल.आच्छा



यूँ ही नहीं बन जाते सांस्कृतिक मिथक 
                      - बी.एल.आच्छा 

        लोग पढ़े लिखे हों या अनपढ़ ।मगर अनेक कथाएँ लोक विश्वासों में पीढ़ियों तक चलती रहती हैं। यों भारत में उनके आधार उपनिषद् और  रामायण -महाभारत जैसे इतिहास ग्रंथ तो हैं ही ।लोग भले ही रामायण और महाभारत को इतिहास न मानते हों,पर वे भारत की सांस्कृतिक आत्मा में इतिहास से भी ज्यादा गढ़े हुए हैं ।वे इतिहास के तथ्यों की तुलना में भावात्मक इतिहास और संस्कारों का जीवंत प्रवाह हैं।फिर कितने ही कथानक हैं। वेदों में यम -यमी संवाद से लेकर यमराज के द्वार पर  तीन दिन भूखे रहकर अमृत तत्व को पाने वाले नचिकेता तक।  नल -दमयंती से लेकर सावित्री -सत्यवान तक । सावित्री तो यमराज से  मत्यु के मुँह में गये अपने पति जीवित  लौटा लाई  थी।

          इन मिथकों की जीवट मुझे कोरोना परिदृश्य की ओर जबरन ले जा रही है। एक मजदूर माँ अपने चार बच्चों को लेकर  अपने गाँव जाने के लिए पैदल ही छह सौ किलोमीटर की दूरी तय कर रही है। न खाने को राशन । न रास्ते में बनाने के संसाधन। पल्लू में  न पैसा ।गिरवी रखने को कीमती सोना- चाँदी  भी नहीं।  चाय- दूध के साधन भी नहीं। ऊपर से माथे पर लदा सामान । कभी छोटे बच्चे को तोकना भी।रास्ते में खाने -पीने की सारी दुकाने बंद। तब भी यह मां अपने चार बच्चों को लेकर अपने पर्णकुटी वाली जमीन तक पहुंचती है।   

          उदाहरण और भी हैं।तेलंगाना की एक विधवा माँ स्कूटर पर पंद्रह सौ किलोमीटर यात्रा करकेअपनी बेटी को पराये शहर से ले आती है।और उदाहरण एक पति का भी है , जो  कैंसरग्रस्त पत्नी को साइकिल पर बिठाकर छह सौ किलोमीटर दूर अस्पताल ले जा रहा है। आखिर इन भूखे प्यासे बच्चों के साथ अपनी धरती की और लौट रही मां की तार तार पीड़ा को देखकर यमराज भी गीली हर बार लौट गया  होगा। जीवट के ऐसे कई अनाम  पात्र हैं कोरोना काल में।
             और  समूह को भी लीजिए। कितने ऐसे मजदूर चल दिए थे अहमदाबाद से राजस्थान। दिल्ली से गाजीपुर।  दिल्ली से उत्तराखंड ।और उनके तेवर भी  ईमान को ईमान दिखा दे ।जहां कहीं आश्रय मिला मुफ्त रोटी तोड़ने के बजाय दरियादिल मालिक से कहा- हम यहाँ घासफूस साफ कर दें ,मजदूरी के बदले। कुछ नए मजदूर बच्चों को भी आश्रय मिला स्कूल में । बोल दिया- हम स्कूल को पेंट ही कर दें ,आश्रय के बदले।इन मजदूरों को कौन सी पॉश कॉलोनियों से दरियादिली मिली होगी। ना होटल ,न पानी।  जनहित में ढंडेवाली पुलिस का डर भी। पर इनके डर की तुलना में अपने गांव की झोपड़ी और जमीन तक पहुंचना ही एकमात्र अरमान। रिश्तों को तरसती सूनी आँखें।  आखिर गरीब लोगों ने ही अपने राशन से इनकी भूख मिटाई होगी । क्या इनमें सावित्री जैसी पत्नी या मां की जीवट नहीं थी।  या कि इनमें सत्यवान जिंदा नहीं है।ये अनपढ़  लोग किताबों से  मिथ को नहीं समझते।रिश्तों को प्राणपण से जीकर जीवन की जयकार कर देते हैं ।क्या दशरथ मांझी अपने समय का जीवित मिथ नहीं है ,जिसने पहाड़ काटकर कैंसर से जूझती  पत्नी के साथ गांव की जिंदगी के लिए भी राह बना दी। वरुण देवता का अंश ही तो है वह ,जो बिना सरकारी कृपा के अपने गाँव में तालाब बना देता है। स्कूली बच्चों के लिए नदी पर लकड़ी का पुल बना देता है ।और पूर्वांचल का वह ग्रामीण पर्यावरण पुरुष क्या देवता नहीं है ,जो अपने बूते पंद्रह हजार पेड़ लगा देता है ।
      मुझे तो लगता है दुनिया के पास किताबों का तत्व दर्शन है ।संगोष्ठियां और सेमिनार हैं ।जरूरी भी हैं ज्ञान और तकनीक के लिए। मगर ये किसान मजदूर बिना अनुलोम- विलोम के अपनी लंबी साँसों  से ही कोरोना वायरस  को झटकार देते हैं।आँकड़े भी कहते हैं  कि इन मजदूरों और किसानों में एक प्रतिशत भी कोरोना रोगी नहीं थे।  कोरोना की दिन-रात की   बेचैनियों की काली चादर को सुबह  की  ललाई दिखाने वालों इन मजदूरों में  यह जीवट अपने रिश्तों में अटूट समर्पण का जीवंत मिथक रचती है।

बी.एल.आच्छा
Balulal Achha
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