शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

ऋषभदेव शर्मा को श्री वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक हिंदी साहित्य पुरस्कार – 2015 : अभिनंदन पत्र

श्री वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक ट्रस्ट, हैदराबाद
हिंदी साहित्य पुरस्कार – 2015 


ऋषभदेव शर्मा को समर्पित 

अभिनंदन पत्र



समकालीन हिंदी साहित्य के क्षेत्र में तेवरी काव्य-आंदोलन के प्रवर्तक के रूप में सुपरिचित डॉ. ऋषभदेव शर्मा एक संवेदनशील कवि, तत्वाभिनिवेशी समीक्षक, प्रांजल गद्यकार और सृजनशील मीडियालेखक होने के साथ-साथ राष्ट्रभाषा-संपर्कभाषा-राजभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित सक्रिय कार्यकर्ता, आदर्श अध्यापक और निष्ठावान शोध निर्देशक हैं. 


डॉ. ऋषभदेव शर्मा का जन्म 4 जुलाई, 1957 को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गाँव गंगधाड़ी, जिला मुजफ्फरनगर, में हुआ. आपकी माताजी श्रीमती लाडो देवी लोक-संस्कृति में रची-पगी घरेलू महिला थीं और पिताजी श्री चतुर्देव शर्मा शास्त्री संस्कृत साहित्य, व्याकरण और ज्योतिष के प्रकांड पंडित थे. आपने इन दोनों से विरासत में लोक-संस्कृति और साहित्य की चेतना प्राप्त की तथा प्राथमिक शिक्षा के दौरान ही कविता और निबंध लेखन आरंभ कर दिया. 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों ने आपके भावुक बाल-मन को अत्यंत विचलित किया जिससे आप राष्ट्रीय चेतना प्रधान लेखन की ओर उन्मुख हुए. यों तो आपकी प्रवृत्ति बचपन से ही अंतर्मुखी रही लेकिन आपके संवेदनशील मानस पर देश के विषमतापूर्ण सामाजिक-आर्थिक यथार्थ ने गहरा प्रभाव डाला जिसके कारण अपनी किशोरावस्था से ही आप गरीबों, पिछड़ों, वंचितों और स्त्रियों के मानवाधिकारों के प्रति विशेष सजग रहे. परिणामस्वरूप आपके लेखन में आक्रोश और व्यंग्य प्रमुख स्थान पाते गए जिसकी परिणति 1981 में तेवरी काव्य-आंदोलन के प्रवर्तन के रूप में सामने आई.



डॉ. ऋषभदेव शर्मा का जीवन सरलरेखीय रहा है – बस दो तीन स्वाभाविक से मोड़ अवश्य आए. आपने स्नातकोत्तर स्तर तक भौतिक विज्ञान का अध्ययन करने के बाद अपनी मूल प्रवृत्ति को पहचानकर हिंदी में एम.ए. और पीएच.डी. किया. आपका विवाह 1984 में डॉ. पूर्णिमा शर्मा से हुआ जो स्वयं साहित्यिक विदुषी हैं. आपकी दो संतानें हैं – पुत्र कुमार लव नई पीढ़ी के सशक्त कवि हैं और पुत्री लिपि भारद्वाज एक सफल फोटो-जर्नलिस्ट हैं. इस प्रकार आपका पारिवारिक परिवेश सही अर्थों में सृजनात्मक परिवेश है. आजीविका के लिए आपने सात वर्ष तक जम्मू और कश्मीर राज्य में भारत सरकार के गुप्तचर विभाग के अधिकारी के रूप में कार्य किया और उसे अपनी मूल प्रवृत्ति के अनुरूप न पाकर 1990 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में प्राध्यापक के रूप में चले आए. सभा में 25 वर्ष से अधिक तक कार्य करने के दौरान आपने दक्षिण भारत ही नहीं, समस्त हिंदी जगत में एक निष्ठावान अध्यापक, प्रखर वक्ता, सुधी समालोचक, आदर्श शोधनिर्देशक एवं निःस्वार्थ हिंदी-सेवी का प्रभूत यश अर्जित किया. 


!! अभिनंदन पत्र का वाचन वेमूरि ज्योत्स्ना कुमारी ने किया !!

डॉ. ऋषभदेव शर्मा का कृतित्व अत्यंत हृदयग्राही और प्रेरक है. आपकी रचनाओं में आपका मानवतावादी व्यक्तित्व और सुसंस्कृत सौंदर्यबोध साफ झलकता है. जीवन और लेखन दोनों में ही आप हर प्रकार की कृत्रिमता और पाखंड के विरोधी हैं. इसीलिए जो भी कहते या लिखते हैं, सीधे-सीधे दो-टूक कहते और लिखते हैं. आपकी अब तक प्रकाशित 15 मौलिक पुस्तकों में 7 कविता संग्रह और 8 आलोचना ग्रंथ सम्मिलित हैं. आपकी ‘तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ’ और ‘तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय’ शीर्षक पुस्तकें तेलुगु साहित्य और संस्कृति के प्रति आपके प्रेम का प्रतीक हैं. विशेष बात यह है कि आपके एक कविता संग्रह ‘प्रेम बना रहे’ के एक साथ दो तेलुगु अनुवाद प्रकाशित हुए हैं. आपकी कुछ रचनाओं का तमिल, पंजाबी, मैथिली, मणिपुरी और जर्मन भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है. 



डॉ. ऋषभदेव शर्मा की मान्यता है कि हिंदी को विश्व-भाषा के रूप में प्रतिष्ठा मिलने के मूल में हिंदीतर भाषी हिंदी प्रेमियों का योगदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. इसीलिए आप हिंदीतर भाषी लेखकों और शोधकर्ताओं को निरंतर प्रेरित करते रहते हैं. आपने अनेक रचनाकारों के लेखन को परिमार्जित तो किया ही, 100 से अधिक पुस्तकों की भूमिका लिखकर प्रकाशन हेतु प्रोत्साहित भी किया है. आपने लगभग 20 पुस्तकों का संपादन किया है और 8 पत्र-पत्रिकाओं के भी संपादन कार्य से जुड़े रहे हैं. आपकी इंटरनेट पर सक्रियता भी देखते ही बनती है. देश भर के अनेक विश्वविद्यालयों और संस्थानों के लिए आपने पाठ-सामग्री का लेखन एवं संपादन किया है जिसमें दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विभिन्न पाठ्यक्रमों के लिए तैयार की गई 18 पुस्तकें शामिल हैं. आपने डीलिट, पीएच.डी. और एम.फिल. के कुल 135 शोधकार्यों का सफलतापूर्वक निर्देशन किया है और अब भी कई शोधार्थी आपके निर्देशन में शोध कर रहे हैं. आपने अतिथि आचार्य के रूप में भी विभिन्न संस्थाओं को अपनी सेवाएँ प्रदान की हैं तथा वर्तमान में स्वतंत्र लेखन के साथ-साथ आप एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में विदेशी छात्रों को हिंदी पढ़ाने में व्यस्त हैं. 



डॉ. ऋषभदेव शर्मा मृदुभाषी, सरल चित्त, सहज संतोषी, लोकप्रिय और पारदर्शी व्यक्तित्व के धनी हैं. श्री वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक ट्रस्ट की ओर से हम आज आपको ‘वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक पुरस्कार – 2015’ से सम्मानित करते हुए गौरव और हर्ष का अनुभव कर रहे हैं.



हैदराबाद-22.10.2015