मंगलवार, 11 अक्तूबर 2016

[शताब्दी समारोह संपन्न] अखंड हिंदी भक्ति के प्रतीक वेमूरि आंजनेय शर्मा

हैदराबाद, 10 नवंबर,2016 [महानवमी].  श्री वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक ट्रस्ट  ने आज रवींद्र भारती सम्मलेन कक्ष में हिंदी सेवी वेमूरि आंजनेय शर्मा  शताब्दी समारोह का आयोजन किया. समारोह की अध्यक्षता डॉ. के. शिवा रेड्डी ने की तथा मुख्य अतिथि मंडलि बुद्ध प्रसाद रहे. विशेष वक्ता के रूप में डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने वेमूरि आंजनेय शर्मा के व्यक्तित्व और अवदान पर प्रकाश डाला. प्रस्तुत है उनका  वक्तव्य जो इस अवसर पर प्रकाशित और लोकार्पित ''शतजयंती विशेषांक'' में सम्मिलित है.  

जन्मशती के संदर्भ में वेमूरि आंजनेय शर्मा जी की मानसिक छवि मेरे समक्ष आज अखंड हिंदी भक्ति के विग्रह के रूप में उभरती है. पीढ़ियाँ उन्हें राष्ट्रभाषा के ऐसे समर्पित साधक के तौर पर याद करेंगी जिन्होंने अपना सारा जीवन हिंदी की सेवा के लिए समर्पित कर दिया. अपनी किशोरावस्था में वे स्वतंत्रता आंदोलन के अंग के रूप में स्वभाषा और स्वदेशी की ओर आकृष्ट हुए. उस काल में एक ओर तो आंध्र प्रदेश में हिंदी को तुरुक भाषा कहकर हिकारत की नज़र से देखा जाता था तथा दूसरी ओर उसे सीखना-सिखाना राजद्रोह के समान वर्जित कर्म था. शर्मा जी ने इन दोनों ही बातों की परवाह नहीं की और न केवल हिंदी सीखी बल्कि उसके प्रचार में भी सक्रियता से संलग्न हो गए. राष्ट्रभाषा प्रचार के प्रति उनकी निष्ठा के कारण ही उन्हें व्यावहारिक भाषा के नैसर्गिक वातावरण में हिंदी अध्ययन के लिए उत्तर भारत भेजा गया, जहाँ से उन्होंने हिंदी के मुहावरे पर मातृभाषावत अधिकार अर्जित किया. इस वातावरण के प्रभाव से वे अटल हिंदीव्रती बन गए और अपने बाद आने वाले असंख्य हिंदी सेवियों व प्रचारकों के प्रेरणास्रोत भी. हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ के बीच परस्पर आदान-प्रदान के लिए जो वे आजीवन सचेष्ट रहे, इसके पीछे भी उनके इसी काल के अनुभव विद्यमान थे.

मैंने वेमूरि आंजनेय शर्मा को पहली बार यों तो दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास में प्राध्यापक पद के अपने साक्षात्कार के समय देखा था. उन्होंने ही मुझसे यह प्रश्न किया था कि मैं आसूचना ब्यूरो छोड़कर सभा में क्यों आना चाहता हूँ. पर तब मुझे उनका नाम और पद ज्ञात न था. जब 15 मार्च, 1990 की सुबह मैं कार्यभार ग्रहण करने के उद्देश्य से सभा में पहुँचा तो द्वारपाल मुझे कुल सचिव के आवास पर ले गया और जिस विभूति ने वहाँ सहज घरेलू शिष्टाचार के साथ मेरा स्वागत किया वह शर्मा जी थे. कुछ ही मिनट की मुलाकात में उन्होंने यह दर्शा दिया कि उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के कुल सचिव के रूप में उनकी पहली चिंता शिक्षा के स्तर और भाषा के सम्यक व्यवहार की है. वे सच्चे अर्थ में भारतीय थे और उत्तर-दक्षिण या हिंदी-अहिंदी के भेदभाव से घृणा करते थे. वे ऐसे ही विचार वाले शिक्षकों को चाहते थे. उँगलियों से बाँसुरी सी बजाते हुए बोले थे – हमने तो विशेषज्ञों से कह दिया था कि सबसे उत्तम कैंडीडेट चुनकर हमें दें; हम कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे. विद्वत्ता का वे ह्रदय से सम्मान करते थे और आयु-भेद की सारी सीमाओं को लांघकर लघुतम व्यक्ति की भी सही बात को सहर्ष स्वीकार करते थे. अफ़सोस की बात है कि उनके जैसा उदार राष्ट्रीय सोच अब वहाँ नहीं रहा! 

वेमूरि आंजनेय शर्मा दिग्गज विद्वान होते हुए भी स्वयं को सदा विद्यार्थी समझने वाले आदर्श के रूप में भी याद आते हैं. पहले ही दिन उन्होंने मुझे ‘तमिल स्वयंशिक्षक’ पुस्तक दिखाते हुए बताया था कि कैसे वे ज़रुरत पड़ने पर उसका उपयोग करते हैं. उनके साधारण पहनावे और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के ज़माने के संस्मरण सुनाते जाने से यह भ्रम होने की पूरी गुंजाइश थी कि वे अतीत में ठहरे हुए होंगे. लेकिन ऐसा था नहीं. उनके निकट जाने पर मुझे पता चला कि उनका व्यक्तित्व तो सतत प्रवाहशील सदानीरा नदी जैसा था. वे अधुनातन ज्ञान-विज्ञान से सीधे जुड़े हुए थे. अस्तित्ववाद के सैद्धांतिक और साहित्यिक पक्षों से उनका गहरा परिचय था. इस विषय को उन्होंने मौलिक लेखन और अनुवाद द्वारा भी तेलुगु पाठकों तक पहुँचाया. आज भी ऐसे ‘महापुरुषों’ की कमी नहीं जो कंप्यूटर और प्रौद्योगिकी से अछूतों सा बरताव करते हैं; लेकिन शर्मा जी भारत में कंप्यूटर की चौथी पीढी के अवतरण के ज़माने से ही उसे हिंदी और भारतीय भाषाओं के लिए सक्षम बनाने के लिए उद्यमशील थे. वे इस बारे में उत्साही और आशावान थे कि शायद देशभर में हिंदी माध्यम से कंप्यूटर की उच्चस्तरीय शिक्षा (एम सी ए) आरंभ करने की चुनौती सभा ने उनके नेतृत्व में सफलतापूर्वक स्वीकार की. एक और चुनौती उन्होंने एम ए हिंदी का भाषाविज्ञान प्रधान पाठ्यक्रम चलाने की भी उस वक़्त स्वीकार की थी जब अनेक पोंगापंथी संस्थाओं को ऐसा करना पागलपन लगता था. शर्मा जी इन चुनौतियों को स्वीकार सके क्योंकि उन्हें भाषा और शिक्षा के उस भविष्य का अनुमान था जिसमें प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलकता को केंद्रीय महत्त्व मिलने वाला था. अतः कहना ही होगा कि वेमूरि आंजनेय शर्मा क्रांतदृष्टा भाषाचिंतक और शिक्षाविद थे.

मुझे याद आता है कि एक बार शर्मा जी ने हिंदी प्रचार और मीडिया के संबंध की चर्चा छिड़ने पर बताया था कि हिंदी प्रचार के आरंभिक दशकों में नाटक जैसे परंपरागत मीडिया का भी उपयोग किया जाता था और कि वे स्वयं ऐसी नाटक मंडलियों से जुड़े थे और कई नाटकों में उन्होंने अभिनय भी किया था. हिंदी को राजभाषा के रूप में अखिल भारतीय स्वीकृति मिलने के लिए वे संवैधानिक व्यवस्था को नाकाफी मानते थे. साथ ही, वे चाहते थे कि सारे देश में त्रिभाषा सूत्र ‘ईमानदारी’ और सख्ती से लागू किया जाए. इसके अलावा, वे अनुवाद के साथ ही हिंदीतर भाषियों के सृजनात्मक लेखन को भी हिंदी साहित्य में सही (हाशिए पर नहीं) स्थान दिए जाने की माँग के समर्थक थे. 

अंततः इतना ही कि गंगाशरण सिंह और रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के संस्मरण सुनाते समय शर्मा जी की गद्गद हो उठते थे; आज शर्मा जी का स्मरण करते हुए मैं उसी भाव की अनुभूति कर रहा हूँ. 



- डॉ. ऋषभदेव शर्मा, 
पूर्व प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद – 500 004.