मंगलवार, 29 नवंबर 2016

अन्वेषी : भूमिका

अन्वेषी 
संपादक : ऋषभदेव शर्मा/  गुर्रमकोंडा नीरजा
परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद
2016
पृष्ठ : 240
मूल्य : रु. 250/-  
'अन्वेषी' शोधपत्र संकलन. 
प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद 
वितरक : श्रीसाहिती प्रकशन, 303 मेधा टॉवर्स, राधाकृष्ण नगर, अत्तापुर रिंग रोड, हैदराबद - 500048 

पुस्तक की प्रतियाँ  प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र : 
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‘संकल्पना’ (2015) का सुधी पाठकों ने खुले मन से स्वागत किया। इस स्वीकृति से हमें प्रोत्साहन मिला। विद्वान मित्रों और शोधार्थियों के आग्रह ने उद्दीपन की भूमिका निभाई। ... और हम जुट गए एक नए संकलन के काम में। उसी की निष्पत्ति ‘अन्वेषी’ के रूप में आपके सामने है।

इक्कीसवीं शताब्दी को यदि सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और साहित्यिक क्षेत्रों के समान ही अनुसंधान के क्षेत्र में भी बहु-केंद्रीयता के उभार की शताब्दी कहें, तो शायद अनुचित न होगा। यह बहु-केंद्रीयता विभिन्न हाशियाकृत समुदायों के संदर्भ से जुड़कर शोध में चरितार्थ होती दिखाई दे रही हैं। इससे साहित्य अध्ययन की दृष्टियों का विस्तार हुआ है और अंतर्विद्यावर्ती शोधकार्यों को प्रोत्साहन मिला है। हमारे विचार से स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, वृद्धावस्था विमर्श, पर्यावरण विमर्श आदि मूलतः अंतर्विद्यावर्ती शोध के ही विषय हैं। ऐसे शोधकार्य एक बार फिर साहित्य को ज्ञान की अन्य शाखाओं से जोड़कर समाज के लिए उसकी उपादेयता को रेखांकित करते हैं। ‘अन्वेषी’ में वृद्ध मनोविज्ञान, दलित जीवन, आंचलिक परिवेश, स्त्री पाठ और स्त्री भाषा के अवलोकन बिंदुओं से कहानी साहित्य, दलित साहित्य, स्त्री आत्मकथा, काव्य और उपन्यास साहित्य पर जो अनुसंधान प्रस्तुत किया गया है, अंतर्विद्यावर्ती शोध के पाट को वह नया आयाम प्रदान करने वाला है।

इस पुस्तक के भाषा विमर्श विषयक खंड में जहाँ एक ओर हिंदी और मराठी के सर्वनामों की रूप संरचना और उनके प्रकार्य के विश्लेषण द्वारा तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध का एक नमूना प्रस्तुत किया गया है, वहीं समाजभाषाविज्ञान और दक्खिनी भाषा से संबंधित शोधपत्रों में क्रमशः समाजभाषिकी और ऐतिहासिक भाषाविज्ञानपरक दृष्टि सहज ही पहचानी जा सकती है।

सभ्यता चाहे जितनी संश्लिष्ट होती जाए, संस्कृति चाहे जितने नए-नए रूपों में ढलती जाए, कविकर्म चाहे कितना भी जटिल होता जाए साहित्य सृजन का उत्कृष्टतम और भाषा व्यवहरा का सबसे नाजुक रूप कल भी कविता थी, आज कविता है और कल भी कविता रहेगी। इतना ही नहीं, कविता को शोध का विषय बनाना आज भी चुनौतीपूर्ण माना जाता है। भक्ति काव्य और प्रेमाख्यानों से लेकर आधुनिक और समकालीन कविता तक को इस पुस्तक के कविता विमर्श विषयक खंड में शोधपूर्ण दृष्टि से एक बार फिर जाँचा-परखा गया है।

कहानी और उपन्यास संबंधी शोधपत्रों के अंतर्गत ‘अन्वेषी’ में एक बार फिर साहित्यिक दृष्टियों के साथ-साथ अंतर्विद्यावर्ती दृष्टियों का समावेश द्रष्टव्य है। मानवाधिकार, आर्थिक संरचना, वर्गीय संबंध, आंचलिकता, वर्तमानता, मनोविश्लेषण, पत्रकारिता, संस्कृति और सामाजिक यथार्थ यदि कथासाहित्य को इतर ज्ञान शाखाओं से जोड़कर नया पाठ रचते हैं तो व्यंग्य और भाषण पाठ-विश्लेषण को अलग-अलग दिशाएँ देते हैं।

कहा जाता है कि आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता का प्रवेश और प्रसार हमारे समाज में मुख्यतः मीडिया द्वारा संभव हुआ। पत्रकारिता के क्षेत्र में गुंजेश्वरी प्रसाद और रामवृक्ष बेनीपुरी के अवदान की पड़ताल जहाँ उत्तर प्रदेश और बिहार के परिप्रेक्ष्य में उभरकर सामने आती हैं, वहीं हिंदी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता के हाशिए पर अलग-थलग स्थित प्रतीत होने वाले तमिलनाडु में हिंदी पत्रकारिता के स्वरूप पर केंद्रित शोधपत्र निश्चित रूप से हिंदी के अक्षेत्रीय तथा सार्वदेशिक चरित्र को एक बार फिर रेखांकित करता है।

इस पुस्तक के अंतिम खंड विविधा में जहाँ एक ओर वैदिक और स्मृति कालीन नीति, न्याय और समाज को संक्षेप में सामने लाने का प्रयास किया गया है वहीं शिक्षा नीति की भी भाषा और संस्कृति के अवलोकन बिंदु से विवेचना की गई है। रामविलास शर्मा और जानकी वल्लभ शास्त्री पर केंद्रित शोधपत्र अपने विवेच्य साहित्यकारों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता प्रतिपादित करते हैं। इसी क्रम में, हिंदीतर भाषाओं के आधुनिक और उत्तर आधुनिक युगीन साहित्यकारों द्वारा रामकथा के नए-नए पाठों के अध्ययन की आवश्यकता की पूर्ति का एक बहुत छोटा और विनम्र-सा प्रयास ‘आधुनिक तेलुगु साहित्य में रामकथा’ विषयक शोधपत्र में किया गया है, जो इस दिशा में योजनाबद्ध विस्तृत शोधकार्य की आवश्यकाता जताता है।

हिंदी में चल रहे शोधकार्य की झलक प्रस्तुत करने वाले इस संग्रह को आप तक पहुँँचाने में हमें जिन मित्रों और शुभचिंतकों का मार्गदर्शन और सहयोग मिला है उनमें प्रो. देवराज (वर्धा), प्रो. एम. वेंकटेश्वर (हैदराबाद) और अमन कुमार त्यागी (परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद) के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। साथ ही, शोधार्थी संतोष विजय मुनेश्वर और टी. सुभाषिणी ने समय-समय पर जो श्रम किया है उससे भी ‘अन्वेषी’ की प्रस्तुति में सुविधा हुई है। 

गांंधी जयंती                                                                                                               - ऋषभदेव शर्मा
2 अक्टूबर, 2016                                                                                                           गुर्रमकोंडा नीरजा