रविवार, 11 दिसंबर 2016

[पुस्तक समीक्षा] एक अध्यापक को छात्रों का तोहफा


-    डॉ.बी.बालाजी
सहायक प्रबंधक (राजभाषा)
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जिन व्यक्तियों के शुभकार्यों का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है, उनमें अध्यापक का स्थान सर्वोपरि है. समाज का यह कर्तव्य है कि ऐसी विभूतियों के कार्यों का सम्मान करे ताकि आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा प्राप्त हो सके. पश्चिमी उत्तरप्रदेश के एक विशाल भौगौलिक क्षेत्र के लोगों के बीच ‘गुरुजी’ के रूप में विख्यात, अपभ्रंश भाषा, जैन आगम और मध्यकालीन साहित्य के विशेषज्ञ आचार्य प्रेमचंद्र जैन एक ऐसी ही विभूति हैं जिन्होंने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व द्वारा केवल छात्रों ही नहीं बल्कि समाज पर भी व्यापक प्रभाव डाला है. लगभग अस्सी वसंत देख चुके डॉ.प्रेमचंद्र जैन को उनके प्रिय शिष्य प्रो.देवराज (अधिष्ठाता, अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा) के नेतृत्व में तैयार किया गया 448 पृष्ठों का ग्रंथ “निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक” गत दिनों, 3 दिसंबर 2016 को, गलगोटिया विश्वविद्यालय, नोएडा में संपन्न एक कार्यक्रम में समर्पित किया गया. इस ग्रंथ का संपादन डॉ.गुर्रमकोंडा नीरजा एवं अन्य ने किया है तथा प्रधान संपादक डॉ.ऋषभ देव शर्मा हैं.           
“निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक” की सामग्री पाँच खंडों में सुनियोजित रूप में प्रस्तुत की गई है. पहले खंड में ‘प्रेम का अंत नहीं’ में सम्मानित विभूति के अंतरंग मित्रों एवं शिष्यों के अत्यंत रोचक संस्मरण हैं, जबकि खंड-2 में स्वयं डॉ. प्रेमचंद्र जैन की सृजनयात्रा के विविध पक्षों की बानगी प्रस्तुत की गई है. ‘कविता में कहा बहुत कुछ’ में उनकी 44 कविताएँ संकलित हैं. ‘विमर्श से विमर्श तक’ में 8 शोधपत्र हैं. ‘अंतरिक्ष में भेजे हुए शब्द’ में 7 रेडियो वार्ताएं हैं. ‘मैं यहाँ से बोल रहा हूँ’ में 2 व्याख्यान हैं. ‘निर्वचन के सीमांत’ में 15 पुस्तकों की भूमिकाएं हैं  तथा ‘कहानी’ में ‘बरगद ढह गया’ शीर्षक एक कहानी दी गई है. यह सारी सामग्री ‘सृजनयात्रा’ खंड में शामिल है. पुस्तक के तीसरे खंड का शीर्षक है ‘संवाद के सशक्त हस्ताक्षर’. इसमें प्रेमचंद्र जैन को मुख्य रूप से डॉ. शिवप्रसाद सिंह और डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखे गए पत्रों के साथ स्वयं डॉ. जैन द्वारा समय-समय पर लिखे गए पत्र संगृहीत किए गए हैं. चौथे खंड ‘मेरा काबा मेरी काशी’ में डॉ. प्रेमचंद्र जैन की आत्मकथा का अंश प्रकाशित किया गया है जो एक अध्यापक के सृजन और संघर्ष का जीवंत दस्तावेज है. पाँचवें खंड में एक अभिनंदन पत्र उद्धृत किया गया है.
कुल मिलाकर, यह एक ऐसा संदर्भ ग्रंथ बन गया है जो एक ओर तो डॉ.प्रेमचंद्र जैन के जीवन और रचना कर्म को पाठकों के सामने लाता है तथा दूसरी ओर अपभ्रंश भाषा और मध्यकालीन साहित्य पर अत्यंत शोधपूर्ण एवं अन्यत्र दुर्लभ सामग्री को प्रस्तुत करता है. किसी अध्यापक को अपने छात्रों की ओर से दिया जा सकने वाला यह उपहार निश्चय ही अत्यंत श्लाघनीय है जिससे अनेक अध्यापकों और उनके शिष्यों को ईर्ष्या होनी चाहिए!

समीक्षित कृति : “निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक”,
संपादक : गुर्रमकोंडा नीरजा एवं अन्य, संपर्क :09849986346.
प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन, वालिया मार्केट, निकट साहू जैन कॉलेज, कोतवाली मार्ग, नजीबाबाद-246763,
पृष्ठ : 448 (सजिल्द),
मूल्य : 200/- रुपए.