रविवार, 1 जनवरी 2017

विविध विमर्शों का शोधपूर्ण समावेश :‘अन्वेषी’


डॉ. ऋषभदेव शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा संपादित 37 शोधपत्रों के संकलन 'अन्वेषी' (2016) का लोकार्पण 31 दिसंबर 2016 को  तिलक रोड, हैदराबाद स्थित तेलंगाना सारस्वत परिषद के सभागार में आयोजित श्रीलाल शुक्ल स्मारक राष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पधारे गृह विभाग, तेलंगाना सरकार के प्रधान सचिव राजीव त्रिवेदी आईपीएस के हाथों संपन्न हुआ.
समारोह की अध्यक्षता डॉ. अहिल्या मिश्र ने की तथा संयोजन डॉ. सीमा मिश्रा ने किया.
साथ में,  विशिष्ट अतिथि डॉ. गोपाल शर्मा तथा सम्माननीय अतिथि राजकुमार शुक्ल 'हंस' और अलका जैन, डॉ. बी. बालाजी,
डॉ. सुपर्णा बंद्योपाध्याय, डॉ. मंजु शर्मा , रूबी मिश्रा , अधिवक्ता अशोक तिवारी एवं अन्य.



विविध विमर्शों का शोधपूर्ण समावेश :‘अन्वेषी’ 

- डॉ. मंजु शर्मा , 
अध्यक्ष, हिंदी विभाग, 
चिरेक इंटरनेशनल, 
कोंडापुर, हैदराबाद (तेलंगाना)


['अन्वेषी' के लोकार्पण समारोह में प्रस्तुत समीक्षा]





पिछले कुछ वर्षों से यह महसूस किया जा रहा था कि हैदराबाद के हिंदी भाषा और साहित्य के शोधार्थियों और प्राध्यापकों को एक ऐसा मंच प्राप्त हो जिसके माध्यम से हमारे कार्य को हम प्रकाशित रूप में हिंदी जगत के समक्ष प्रस्तुत कर सकें. इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए ही एक सहयोगी प्रकाशन योजना के रूप में 2015 में ‘संकल्पना’ का संकल्प सामने आया. और अब उसके अगले सोपान के रूप में ‘अन्वेषी’ (2016) आपके सामने है. इस संकल्प को साकार करने का दायित्व स्वीकार किया हम सबकी परमप्रिय संपादक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा जी ने. यह काम बड़े धीरज का है और सच्चाई यह है कि कोई भी ऐसे ’थैंक-लेस’ काम को करना नहीं चाहता; पर ये कर रही हैं, किए जा रही हैं क्योंकि इस योजना को प्रधान संपादक के रूप में डॉ. ऋषभदेव शर्मा जी की निरंतर प्रेरणा प्राप्त है. उम्मीद करती हूँ कि आज ही मैडम इस यात्रा के अगले सोपान की भी घोषणा करेंगी.

‘अन्वेषी’ (2016 ) विचारों-विश्लेषणों का विमर्श है, कहना अतिशयोक्ति न होगा. अविचारणीय मान लिए गए, हाशिए पर धकेले गए, हाशियों की सीमा में कैद समुदायों के विचारों की अभिव्यक्ति का मुख्य रूप से विश्लेषण करने वाली यह पुस्तक विस्तृत फलक पर साहित्य अध्ययन की दृष्टि से अंतर्विद्यावर्ती शोधकार्यों को प्रोत्साहित करती है जिसके अंतर्गत स्त्री विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, वृद्धावस्था विमर्श और पर्यावरण विमर्श जैसे ज्वलंत विषयों पर लिखे गए शोधपत्र पाठकों तथा भावी शोधार्थियों के लिए दिशा निर्देशक भी हो सकते हैं.

‘अन्वेषी’ में वृद्धों के मनोजगत में होने वाले विचलन को महसूस किया जा सकता है. दलित जीवन की नारकीय स्थिति और स्त्री अभिव्यक्ति को भी रेखांकित किया गया है. इस पुस्तक में कविता विमर्श, भाषा विमर्श, कहानी विमर्श, उपन्यास विमर्श तथा मीडिया विमर्श पर भी शोधपरक आलेख हैं. 240 पृष्ठों के कलेवर में 7 खंड; तथा सात खंडों में 37 विषयों पर विचार विमर्श का अनोखा संगम.

‘हाशिया विमर्श’ में वृद्ध, दलित तथा स्त्री के जीवन में झाँका गया है . परिवार का वट वृक्ष जो स्वार्थ की कुल्हाड़ी की मार झेलता है! अपनों से अपनों के हाथों वृद्धों के मानस पटल पर होने वाले अत्याचार को शिवकुमार राजौरिया ने बख़ूबी पढ़ा है . यहाँ वृद्धों के मानसिक त्रास का दर्दभरा आभास मिलता है, इतना ही नहीं आज की पीढ़ी से सवाल करती वे बूढ़ी गद्मलाई आँखें कि समय तो सबका आता होगा .. खैर! झकझोर देती हैं . इन्हें कबाड़ की तरह एक कोने में फेंक दिया जाता है . वृद्ध परायेपन तथा अलगाव का शिकार हो रहे हैं .

हाशिया विमर्श की इसी कड़ी में जहाँ दलित जीवन की भयावहता और विवशता है वहीं स्त्री चेतना तथा उसकी अभिव्यक्ति को भी वाणी दी गई है जिसे टी. सुभाषिणी, डॉ. पोलवरपु जयलक्ष्मी, डॉ. सुरैया परवीन, डॉ. सुस्मिता घोष, उषा यादव, सुबोध कुमार सिंह (बेंगलूरु) और डॉ. अर्पणा दीप्ति ने बखूबी अंजाम दिया है. 

दूसरे खंड ‘भाषा विमर्श’ में हिंदी–मराठी भाषा की संरचना, भाषा विज्ञान के सामाजिक स्वरूप के साथ ही दक्खिनी भाषा के उद्भव और विकास पर चिंतन किया गया है . डॉ. मिलिंद पाटिल (वर्धा), डॉ. जोराम यालाम नाबाम (अरुणाचल प्रदेश) और डॉ. जी.प्रवीणा के ये शोधपत्र पारंपरिक और अधुनातन भाषाविज्ञान के शोधार्थियों के बड़े काम के हैं. 

तीसरे खंड ‘कविता विमर्श’ में साहित्य के कोमल रूप अर्थात काव्य का विश्लेषण शामिल है. सिरिपुरपु तुलसी देवी ने भक्तिकाव्य को प्रेम और सौंदर्य की खोज के लिए खंगाला है तो इंद्रजीत सिंह ने सूफ़ियाना अंदाज़ में प्रेमाख्यानों के वर्ण्य विषयों को स्पष्ट किया है . नितिन पाटिल रामविलास शर्मा की कविता के मार्क्सवादी तेवर को उभारते हैं, तो सुशील कुमार शैली (नाभा, पंजाब) कुमार विकल की कविताओं में अँधेरे और प्रकाश के द्वंद्व को बिंब-विश्लेषण के सहारे रेखांकित करते हैं. इसी खंड में अमन कुमार त्यागी ने डॉ. देवराज की राजनैतिक कविताओं में व्यंजित देश की समस्याओं तथा अकर्मण्यता पर खीज को चीन्हा है. पंद्रह राजनैतिक कविताओं का यह संक्षिप्त अवलोकन पाठक में उनकी कविताओं को पढ़ने की ललक जगाता है. 

कहानी तथा उपन्यास विमर्श विषयक खंडों में मानवाधिकार, आर्थिक संरचना, आंचलिकता, मनोविश्लेष्ण, पत्रकारिता, संस्कृति और सामाजिक यथार्थ की कथात्मक अभिव्यक्ति की नई दिशाओं की पहचान की गई है . डॉ. कोमल सिंह (नजीबाबाद), डॉ. एन. ललिता (कोयंबत्तूर), डॉ. अनुपमा तिवारी (विशाखपट्टनम), संतोष विजय मुनेश्वर, मोहम्मद माजिद मिया (दार्जिलिंग), समला देवी (दिल्ली), विनोद चौरसिया, माधुरी तिवारी, आशा मिश्रा ‘मुक्ता’ और डॉ. सुपर्णा मुखर्जी के साथ-साथ डॉ. ऋषभदेव शर्मा की उपस्थिति इसकी विशेषता है. ‘रंगभूमि’ और ‘गोदान’ जैसी कृतियों का वर्तमान संदर्भ में पुनर्पाठ सचमुच आँख खोलने वाला है.

छठे खंड मीडिया विमर्श में तीन शोधपत्र शामिल हैं. प्रतिष्ठित पत्रकार अरविंद कुमार सिंह (आजमगढ़), वर्षा कुमारी और डॉ. सुनीता जाजोदिया (चेन्नई) ने इन शोधपत्रों में क्रमशः गुंजेश्वरी प्रसाद, रामवृक्ष बेनीपुरी और तमिलनाडु की हिंदी पत्रकारिता पर खोजपूर्ण दृष्टि डाली है. 

इस पुस्तक के अंतिम खंड ‘विविधा’ में एक ओर तो डॉ. हर्षवर्धन सिंह (बिजनौर) ने वैदिक और स्मृतिकालीन नीति, न्याय, समाज तथा राजनीति की स्थितियों को रेखांकित किया है तथा दूसरी ओर प्रभाकुमारी और बनवारी लाल मीना ने भाषा और संस्कृति के संदर्भ में भारतीय शिक्षा नीतियों का विश्लेषण किया है. गहनीनाथ ने जानकीवल्लभ शास्त्री तथा आनंद कुमार यादव (बाँदा) ने रामविलास शर्मा के प्रदेय का मूल्यांकन किया है. यहीं डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा का शोधपत्र भी है – ‘आधुनिक तेलुगु साहित्य में रामकथा’, जिसमें विश्वनाथ सत्यनारायण, रंगनायकम्मा और ओल्गा की कृतियों का संदर्भ शामिल है. मैं महसूस करती हूँ कि उनका यह आलेख एक ब्लू-प्रिंट सरीखा है जिसमें आधुनिक राम-साहित्य संबंधी कई सारी शोध योजनाओं की संभावनाओं की ओर इशारा है – बशर्ते कि आप भारतीय साहित्य और तुलनात्मक अध्ययन के क्षेत्र में कुछ करना चाहते हों!

अब तक की चर्चा से आप समझ गए होंगे कि ‘अन्वेषी’ नाम की यह पुस्तक गागर में सागर भरने वाली कहावत को चरितार्थ करती है. इसमें अरुणाचल प्रदेश से लेकर चेन्नई तक के विविध विश्वविद्यालयों के अध्येता और अध्यापकों ने सहयोग किया है. सभी सम्मिलित लेखक एवं शोधार्थीगण बधाई के पात्र है जो इस दुर्लभ पुस्तक के सहयोगी रहे है . मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि यह पुस्तक शोधार्थियों के लिए पथ प्रदर्शक का काम करने में समर्थ है . निश्चय ही यह संपादकद्वय प्रो. ऋषभदेव शर्मा जी और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा जी के अथक परिश्रम, सूक्ष्म दृष्टिकोण तथा गहन ज्ञान का उत्कृष्ट परिणाम है . 



समीक्षित कृति : अन्वेषी / 
संपादक : डॉ. ऋषभदेव शर्मा एवं डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा / 
प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन, वालिया मार्केट, 
निकट साहू जैन कॉलेज, कोतवाली मार्ग,नजीबाबाद – 246763/ 
 वितरक : श्रीसहिती प्रकाशन, हैदराबाद; मो. 09849986346./
 पृष्ठ : 240 / 
मूल्य : 250 रुपए.