बुधवार, 2 सितंबर 2020

(पुस्तक समीक्षा) जिंदगी को चाहिए दोनों ही - 'कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा'



 

कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा (कविता)
गुर्रमकोंडा नीरजा
पृष्ठ 120/ मूल्य : 150 रु
प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद
वितरक : श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद (9849986346) 

पुस्तक समीक्षा 

जिंदगी को चाहिए दोनों ही – ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’ 

- प्रवीण प्रणव

गद्य साहित्य और शोध प्रबंधों के संपादन में गुर्रमकोंडा नीरजा जाना-माना नाम है। यूँ तो नीरजा छिटपुट कविताएँ भी लिखती रही हैं, लेकिन परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद से प्रकाशित कविता संग्रह ‘कुछ कोलाहल, कुछ सन्नाटा’, उनकी कविताओं का पहला पुस्तकाकार प्रकाशन है। तीन खंडों में संकलित कविताओं में पहला खंड उनकी मौलिक कविताओं का है, दूसरे खंड में तेलुगु से हिंदी में अनूदित कविताएँ हैं और तीसरे खंड में हिंदी से तमिल में अनूदित कविताएँ हैं। नीरजा की मातृभाषा तेलुगु है लेकिन इस संग्रह के तीनों खंड दर्शाते हैं कि हिंदी, तमिल और तेलुगु तीनों पर उनका समान अधिकार है। मैं तमिल और तेलुगु से अनभिज्ञ हूँ तो मेरी समीक्षा उनके मौलिक हिंदी कविताओं तक ही सीमित है। 

पुस्तक की भूमिका में गंगा प्रसाद विमल लिखते हैं कि ‘अच्छी कविता की यही पहचान है कि वह अपने भाषिक जादू से थोड़ी देर विचलित कर फिर फुर्र हवा में न उड़ जाए।‘ देवी नागरानी ने भी भूमिका में डॉ. किशोर काबरा की पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए लिखा है ‘सच्ची कविता की पहली शर्त है कि हमें उसका कोई भार नहीं लगता। जिस प्रकार पक्षी अपने परों से स्वच्छंद आकाश में विचरण करता है, उसी प्रकार कवि स्वांतःसुखाय और लोक हिताय के दो पंखों पर अपनी काव्य यात्रा का गणित बिठाता है।‘ नीरजा की कविताएँ इन सभी पैमानों पर खड़ी उतरती हैं। बिना लच्छेदार भाषा का प्रयोग किए, बिना बिंब और प्रतीक में अपनी बात उलझाए, उन्होंने सरल और सहज भाषा में अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है और यही वजह है बिना किसी आवरण में लिपटी ये भावनाएँ सीधे हृदय में उतरती हैं। कहीं ये भावनाएँ कोलाहल बन उद्वेलित करती हैं, कुछ करने को तो कहीं ये गहरे सोच में छोड़ जाती हैं, नीरव सन्नाटे की तरह। 

मुझे बालस्वरूप राही की कविता ‘कोलाहल के बाद’ की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं: 

जब कोलाहल में बात नहीं खोती
वह घड़ी हमेशा रात नहीं होती 

सन्नाटा नहीं, तोड़नी है जड़ता
वह चाहे भीतर हो या बाहर हो
रचना है ऐसा वातावरण हमें
काँटों का नहीं, फूल का आदर हो

हमको सूरज की तरह दहकना है
जब तक हर स्याही मात नहीं होती। 

नीरजा की कविताएँ सिर्फ प्रकृति या सौंदर्य वर्णन तक अपने को सीमित नहीं करतीं। ये कविताएँ उनकी आकुलता को, उनकी विवशता को, उनकी आकांक्षा को और उनके सपने को आवाज़ देती हैं। यह आवाज इतनी वास्तविक है, इतनी सरल भाषा में है और इतने गंभीर विषय पर है कि नीरजा की कविताएँ सिर्फ उनकी न रह कर पाठकों की आवाज़ बन जाती हैं और यही इनकी सफलता है। 

‘माँ’ शीर्षक कविता में जब वे लिखती हैं: 

आज वह मेरी राह देख रही है 

मेरा माथा चूमने के लिए तरस रही है 

आखिरी बार मुझसे बात करने के लिए 

आँखों में प्रतीक्षा सँजोए। 



मैं काले कोसों बैठी हूँ 

सात समंदर पार, 

लाचार। 



मन तो कभी का पहुँच चुका उसके पास, 

तन काट नहीं पा रहा 

परिस्थिति का पाश। 

उदास हूँ। 

दास हूँ न ? 

स्वामी की अनुमति नहीं! 


इन पंक्तियों में नीरजा सिर्फ अपने भावों की अभिव्यक्ति नहीं करतीं, वरन न जाने कितनी महिलाओं की आवाज़ बन जाती हैं जो चाह कर भी अपने माता-पिता के लिए तब उपलब्ध नहीं हो पाती जबकि उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है। 

नीरजा अपनी कविताओं में संबंधों और उनसे जुड़े भावनाओं का ताना-बना बुनती हैं। ‘बेटी वाली माँ’ कविता में तीन पीढ़ियों से एक सी ही समस्या को रेखांकित करते हुए वे लिखती हैं: 

आज तक काट रही हो तुम 

बेटी जनने की सज़ा 

बिना उफ़ किए। 

पर मैं कराहती हूँ कभी जब दर्द से 

मुझे अपने गोद में लेकर 

सींच देती हो आँसुओं से मेरा माथा। 

आँखों-आँखों में देती हो नसीहत – 

‘बेटी की माँ हो, कमजोर मत पड़ना!’ 

नीरजा अपने पिता से बहुत प्रभावित रही हैं। अपने पिता को समर्पित कविता में वे लिखती हैं: 

काल को पीछे धकेलते 

जिजीविषा से भरे 

तुम ही तो हो सच्चे योद्धा 

धरती के सुंदरतम पुरुष, 

मेरे पापा ! 

नीरजा ने एक बेटी, एक माँ, एक पत्नी सबका धर्म निभाया है इसलिए इनकी कविताएँ भी इस सभी संबंधों को अपने अंदर आत्मसात करती हैं। समाज में छोटी बच्चियों के साथ हो रहे अनाचार पर ‘माँ नीरजा’ व्यथित हो कर लिखती हैं: 

जब कभी किसी नन्ही गुड़िया को देखते हैं 

बेसाख्ता चीख उठते हैं – 

‘गुड़िया घर से बाहर न जा 

यह समाज तेरे लिए नहीं बना है 

बाहर न जा 

तुझे नोचकर खाने के लिए गिद्ध इंतज़ार कर रहा है 

तू बाहर न जा।‘ 

प्रेम के कई रंग होते हैं और नीरजा ने प्रेम के कई आयाम अपनी कविताओं के माध्यम से व्यक्त किए हैं। सबसे पहले तो प्रेम में होने की जो मधुर अनुभूति है उसे बड़ी खूबसूरती से बयाँ करते हुए अपनी कविता ‘रेशमी स्पर्श’ में लिखती हैं: 

मेरी देह पर तैरती तुम्हारी उँगलियाँ 

मन के तार को छेड़ गई 

एक रेशमी स्पर्श ने जगा दी 

रोमरोम में नई उमंग 

तुमने जब-जब मुझको छुआ 

तब-तब तन-मन में ऊर्जा का संचार हुआ 


और में पागल हो गई ! 

लोक-लाज खो गई !! 

जब प्यार होता है तो मन में प्यार धीरे-धीरे घुलता है और ये उन खामोशियों की जगह लेता जाता है जो वर्षों से मन में घर कर गई होती हैं और भावनाओं को खुल कर व्यक्त नहीं होने देतीं। अपनी कविता ‘निःशब्द’ में प्यार में होने के खुशनुमा एहसास को आवाज़ देती हुई लिखती हैं: 

उस अनुभूति को व्यक्त करने के लिए 

शब्द नहीं हैं 

मौन का साम्राज्य है चारों ओर 


भीतर तो तुमुलनाद है 

भीगी हूँ प्यार में 

जब प्यार होता है तो साथ ही होता है उस प्यार में नोक-झोंक। ये नोक-झोंक कई बार प्यार को पटरी से उतार देते हैं तो कई बार इनसे प्यार और मजबूत होता है। प्यार के नोक-झोंक में जरूरी है अहं का न होना। नीरजा अपनी कविता ‘संधिपत्र’ के माध्यम से दिखलाती हैं कि नोक-झोंक के बाद वापस प्यार को पटरी पर लाने के लिए क्या किया जाना चाहिए। 

चाहूँ तो तुम्हारी तरह मैं भी 

कोस सकती हूँ सारी दुनिया को 

पर ऐसा भी क्या गुस्सा 

कि जीवन बीत जाए, गुस्सा न बीते। 


इसलिए भेजा करती हूँ हर सुबह 

तुम्हारे लिए दोस्ती के गुलाब। 

तुम विजेता हो – चिर विजेता; 

मैं पराजित हूँ – प्रेम में पराजित। 

कभी तो मैं बनकर देखो........... 

प्यार कई बार वह मोड़ नहीं लेता जो हम चाहते हैं। प्यार में होना जितनी सुखद अनुभूति है उससे कहीं ज्यादा दुखद है दिल का टूटना। प्यार में होना आवाज़ देता है भावनाओं को लेकिन दिल का टूटना भावनाओं का उबाल लाता है दिल के अंदर लेकिन जुबाँ खामोश रहती है। ऐसे में बहुत मुमकिन है टूट जाना लेकिन नीरजा अपनी कविता में दुहराती हैं कि दिल का टूटना अंत नहीं। अपनी कविता ‘आशियाना’ में वे इस टूटन के बाद के संकल्प को दर्शाती हैं ये कहते हुए: 

उसके लिए मैंने सारी दुनिया से टक्कर ली 

लेकिन उसने मुझे बैसाखियों के सहारे छोड़ दिया। 


हवाओं से लड़ता रहा देर तक मेरा घोंसला 

बिखर गया मेरा सपना । 

पर मैं नहीं बिखरी। न बिखरूँगी। 

एक-एक तिनका जोड़कर 

फिर बनाऊँगी अपना आशियाना, 

सजाऊँगी-सँवारूँगी। 

नीरजा अपनी कविताओं को सिर्फ अपनी आवाज़ नहीं बनाना चाहतीं। उनकी कविताओं की ज़िम्मेदारी है कि वे उन सभी औरतों की आवाज़ बनें जो इन हालात से गुज़रती हैं और जब अपनी कविता ‘तपिश’ में वो लिखती हैं: 

मेरी चाभी मुझे दे दो 

रोक दो अब तो चाबुक 

चाहती हूँ मैं 

मैं बन कर जीऊँ 

सदियों तक 

सदियों तक जीने की कल्पना नीरजा की अपने लिए नहीं हो सकती, वे आज़ादी की तलबगार हैं सभी औरतों के लिए जो किसी बंधन में फँस कर अपनी आकांक्षाओं को दबा देती हैं, वे हर संभव प्रयास करती हैं कि ख़ुद पर हुए ज़ुल्म के बाद भी किसी तरह साथ बना रहे। लेकिन ज़ुल्म सहने की भी एक सीमा होती है और इस सीमा के बाद होती है आज़ादी की ख़्वाहिश। 

डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने नीरजा के परिचय में लिखा है, उनके पिता साहित्यकार थे, उन्होंने कई पत्रिकाओं का संपादन किया। साथ ही वे आंध्र प्रदेश के लोकप्रिय नेता श्री एन० टी० रामाराव के पी० आर० ओ० के रूप में कार्यरत रहे। नीरजा ने साहित्य और राजनीति का ये सम्मिश्रण बचपन से देखा और ये उनकी कविता में भी परिलक्षित होता है। अपनी कविता ‘राजनीति’ में नीरजा लिखती हैं: 

लोग अकसर कहते हैं 

राजनीति एक खेल है 

पर मेरे पापा कहते हैं 

यह एक कमर्शियल फिल्म है 


और इसी कविता के अंत में लिखती हैं: 

इस फिल्म के बारे में खूब सुना है 

लेकिन देखने के लिए सेंसर का कहना है 

- ‘ओनली फॉर क्रिमिनल्स’। 

- ‘भले मानुषों का प्रवेश वर्जित’। 


साहित्य में आने से पहले नीरजा ने विज्ञान की पढ़ाई की, माइक्रोबायोलॉजी में उन्होंने बी० एससी० किया और एक वर्ष तक अपोलो अस्पताल में कार्यरत रहीं। उनका ये अनुभव उनकी कविता ‘दर्द’ में दिखता है: 

मैंने दर्द को दबाने की कोशिश की 

वह गिद्ध बन 

मेरा शिकार करता रहा 

मैंने 

उससे छुटकारा पाने के लिए 

स्लीपिंगपिल्स लीं 

ट्रैंक्विलाइज़र लिए 

और न जाने क्या क्या लिया 

पर वह इम्यून हो गया। 

आज 

मैं सोचती हूँ – 

यदि सीने में यह दर्द नहीं होता 

तो मेरा क्या होता। 

नीरजा ने इस संकलन में कुछ अच्छे हाइकु भी लिखे हैं। सीमित शब्दों में विभिन्न विषयों पर लिखे हुए हाइकु प्रभावित करते हैं। 

कन्या भ्रूण ने 

लगाई है गुहार 

मुझे न मार। 



टेसू फूले हैं 

बौराया यह मन 

आया फागुन। 



अलमारी में 

किताबों का ढेर है 

निद्रा में लीन। 



नुकीला काँटा 

धँसा पाँव में मेरे, 

रोये तुम थे। 



कच्ची मिट्टी हूँ 

आकार दो हाथों से 

ढल जाऊँगी। 


अपनी कविता ‘सीखना’ में उन्होंने अपने गुरुओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए लिखा है: 

तुमसे सीख ही लिया मैंने 

तुमुल कोलाहल के बीच सन्नाटे को जीना; 

सन्नाटा जो कविता है – 

कविता जो जीवन है ! 

लेकिन मेरी ख़्वाहिश है कि नीरजा न सिर्फ सन्नाटे को जीना सीखें बल्कि कोलाहल को भी अपनाए रखें। न तो सन्नाटे की कोई सीमा है, न ही कोलाहल की, लेकिन जरूरी है कि हम इन दोनों में सामंजस्य बनाए रखें और इनसे सीखते रहें। मुझे राजेश रेड्डी की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं: 

दरवाज़े के अंदर इक दरवाज़ा और 

छुपा हुआ है मुझ में जाने क्या क्या और 

कोई अंत नहीं मन के सूने-पन का 

सन्नाटे के पार है इक सन्नाटा और। 

इस पहले कविता संग्रह के लिए गुर्रमकोंडा नीरजा को बहुत बहुत शुभकामनाएँ। 



- प्रवीण प्रणव 
सीनियर प्रोग्राम मैनेजर, माइक्रोसॉफ़्ट 
B-415, गायत्री क्लाससिक्स 
लिंगमपल्ली, हैदराबाद 

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