शुक्रवार, 27 मार्च 2026

अवधेश कुमार सिन्हा के ग्रंथ 'काली स्याही सूर्य शब्द' की समीक्षा



एफ्रो-एशियाई साहित्य की चमक 
‘काली स्याही सूर्य शब्द’
- डॉ. रक्षा मेहता

कितना अच्छा हो यदि कोई साहित्यप्रेमी या कलाप्रेमी विश्व साहित्य से जुड़ना चाहे और इसके लिए उसे देश-विदेश के विविध पुस्तकालयों की खाक न छाननी पड़े। साहित्य-सागर में से सबसे चमकीले तथा बहुमूल्य मोतियों का भंडार उसके सामने प्रस्तुत कर दिया जाए, तो इससे बड़ा उपहार एक साहित्यप्रेमी  के लिए और कुछ हो ही नहीं सकता। ऐसी ही अमूल्य निधि के रूप में सृजित की गई है, विश्व साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान और समीक्षक अवधेश कुमार सिन्हा (1950) विरचित पुस्तक ‘काली स्याही सूर्य शब्द’ (2026: संभावना प्रकाशन, हापुड़: पृष्ठ 288, पेपरबैक: 499 रुपए), जिसमें एशिया तथा अफ्रीका के नोबेल पुरस्कार विजेता दस लेखकों व कवियों की कालजयी रचनाओं के साथ-साथ पाँच अन्य बेहतरीन साहित्यकारों की रचनाओं का हिंदी रूपांतरण प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक का अत्यंत रोचक पक्ष यह है कि पाठक न केवल इन कविताओं, कहानियों, नाटकों तथा उपन्यासों के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंशों को पढ़ता है, अपितु इनके मूल रचनाकारों के जीवन से भी अत्यंत गहराई से जुड़ता है। 

प्रत्येक रचनाकार की रचना से पूर्व उनके जन्म, शिक्षा-दीक्षा, पारिवारिक परिवेश, व्यक्तिगत समस्याएँ, चुनौतियाँ, लेखन की प्रेरणा, लेखन विषय, रचनाकर्म, भाषा-शैली, तत्कालीन परिस्थितियाँ आदि महत्त्वपूर्ण विषयों पर इतनी गहनता से लिखा गया है कि पाठक स्वतः ही उस देश-काल में पहुँचकर इन रचनाकारों से इस प्रकार जुड़ जाता है मानो वह इन्हें निजी रूप से जानता हो। इस सामग्री को अत्यंत रोचकतापूर्वक शब्दबद्ध किया गया है तथा रचनाकारों के निजी जीवन से प्रामाणिक उदाहरण देकर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से पाठकों को रू-ब-रू कराया गया है। कथा साहित्य की बात करें तो, इस पुस्तक में रवींद्रनाथ ठाकुर (भारत) की भावनात्मक गहनता पर आधारित बांग्ला कहानी ‘काबुलीवाला’ के साथ-साथ गुरना (जंजीबार/ इंग्लैंड) के उपन्यास ‘पैराडाइज़’ के एक अंश, नागीब महफूज (मिस्र) की कहानी ‘हाफ ए डे’, सैमुएल योसेफ़ एग्नॉन (इज़राइल) की हिब्रू भाषा में लिखी कहानी ‘ऑर्केस्ट्रा’, हॉन कांग (दक्षिण कोरिया) द्वारा कोरियन भाषा में रचित उपन्यास ‘द वेजिटेरियन’ का एक अंश, ओरहान पामुक (तुर्की) के उपन्यास ‘माई नेम इज़ रेड’ का अंश, यासूनारी कवाबाता (जापान) की जापानी कहानी ‘मदर’, वोले सोयिङ्का (नाइजीरिया) का नाटक ‘ए डांस ऑफ द फोरेस्ट्स’, मो यान (चीन) के चीनी उपन्यास ‘रेड सोरघम’ का अंश, नादिन गॉर्डिमर (दक्षिण अफ्रीका) के उपन्यास ‘बर्गर्स डॉटर’ के एक अंश का उत्कृष्ट हिंदी रूपांतरण पढ़ने को मिलता है।   

जब पाठक रवींद्रनाथ ठाकुर की कहानी ‘काबुलीवाला’ या उनकी कविताएँ ‘मैं अनेक वासनाओं को चाहता हूँ प्राणपन से’ अथवा ‘भजन, पूजन, साधना, आराधना’ पढ़ता है, तब वह केवल इस कहानी या इन कविताओं से ही नहीं जुड़ता अपितु उनका जीवन-परिचय पढ़कर इस तथ्य से भी अवगत होता है कि कवींद्र रवींद्र अमानवीयता के विरोधी थे, मानवतावाद को राष्ट्रवाद से ऊपर रखते थे किंतु राष्ट्रविरोधी कतई नहीं थे। अवधेश सिन्हा एक स्थान पर लिखते हैं– “13 अप्रैल, 1919 को ब्रिटिश शासन द्वारा किए गए जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के विरोध में रवींद्रनाथ ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अपनी नाइटहुड की उपाधि लौटाकर दिखा दिया कि वे अराष्ट्रीय नहीं थे।” (पृ. सं. 27)। इस पुस्तक के माध्यम से यह ज्ञात होता है कि रवींद्र कबीरदास की ही भाँति आत्मा-परमात्मा के मिलन में विश्वास करते थे, मृत्यु को भय नहीं, वरदान मानते थे, संगीत प्रेमी थे तथा आध्यात्मिक रहस्यवाद उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देता है। 

गुरना के रचनाकर्म में उनके समय की सामाजिक, सांस्कृतिक तथा व्यापारिक परिस्थितियों का स्पष्ट चित्र खींचते हुए अवधेश जी लिखते हैं– “अपनी सभी कृतियों में गुरना ने पूर्व-औपनिवेशिक अपरिवर्तित अफ्रीका के लिए सर्वमत विषाद से बचने का प्रयास किया है । उनकी स्वयं की पृष्ठभूमि हिंद महासागर में सांस्कृतिक विविधताओं से भरे एक ऐसे द्वीप की है, जिसका पुर्तगाली, अरब, जर्मन व ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्तियों के अधीन गुलामों के व्यापार एवं दमन के भिन्न रूपों का तथा पूरी दुनिया के साथ व्यापारिक संबंध का इतिहास रहा है।” (पृ. सं. 57)। सुखद अंत होने की पाठकों की अपेक्षाओं को निराश कर देने के गुरना के वैशिष्ट्य से यह पुस्तक परिचित कराती है। इसी प्रकार नागीब महफूज़ के अस्तित्ववादी, मार्क्सवादी, यथार्थवादी, रहस्यवादी, समाजवादी, राष्ट्रवादी, लोकतांत्रिक तथा दार्शनिक दृष्टिकोण से लेखक अपनी इस पुस्तक के माध्यम से पाठक को सहज ही जोड़ देते हैं। 

सैमुएल योसेफ़ एग्नॉन की हिब्रू भाषा में लिखी कहानी ‘ऑर्केस्ट्रा’ में एक स्थान पर लिखा है– “मेरी आदत प्रतिदिन सूर्योदय के समय टहलने की थी, लेकिन उस दिन मैं सुबह तीन बजे ही जाग गया क्योंकि यह ज़ेखोर ब्रिट (रोश हशना का पूर्व दिन) की रात थी, एक रात जब सामान्य से पहले ही लोग सेलीचोट (हिब्रू एलुल के महीने के दौरान प्रायश्चित के दिन की जाने वाली अतिरिक्त क्षमा प्रार्थनाएँ) पढ़ने के लिए उठ जाते हैं।” (पृ. सं. 97) यहाँ अवधेश सिन्हा  यह समझाना नहीं भूलते कि रोश हशना यहूदी नववर्ष होता है तथा उससे पहले के दिन व उस महीने लोग क्या-क्या महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं। इस तरह वे पाठकों को हिब्रू सांस्कृतिक तथा धार्मिक मान्यताओं से जोड़ देते हैं, जो निश्चित रूप से उनकी प्रखर मेधा तथा साहित्यिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता का प्रमाण है। साथ ही वे एग्नॉन की यथार्थवादी रचनाओं में आध्यात्मिक रहस्यवाद के दर्शन भी कराते चलते हैं। 

हान कांग के उपन्यास ‘द वेजिटेरियन’ के अनूदित पाठ में  एक स्थान पर ‘गरम-गरम शाबू-शाबू शोरबे का ज़िक्र आता है, जिसका अर्थ ‘मांस व सब्जियों को एक साथ एक विशेष प्रकार के सुगंधित शोरबे में पकाया गया भोजन’ है। यह इस बात की पुष्टि करता है कि अन्य देशों के खान-पान (जो कि भारत से सर्वथा भिन्न हैं) की बारीकियों को भी इस पुस्तक में उकेरा गया है।

पामुक के जीवन से ली गई कहानी पर आधारित उपन्यास ‘माई नेम इज़ रेड’ के अनूदित अंश में एक स्थान पर व्हाइट शीप का ज़िक्र आता है, जहाँ यह समझाया गया है कि ‘व्हाइट शीप’ तुर्कमान फ़ारस की संस्कृति से प्रभावित सुन्नी तुर्कों का एक जनजातीय परिसंघ था। यह उल्लेख पाठक को एक भिन्न सांस्कृतिक तथा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जोड़ देता है; और यही है इस पुस्तक के रचनाकार का विलक्षण कौशल। 

अवधेश कुमार सिन्हा पाठक को कहीं ‘यासूनारी कवाबाता’ के अलगाववाद तथा एकाकीपन से जोड़ देते हैं, तो कहीं ‘वोले सोयिङ्का’ के काव्यात्मक प्रतीकवाद व राजनीतिक व्यंग्य से। वोले सोयिङ्का की कविता ‘भोर में मौत’ में प्रयुक्त विशुद्ध भारतीय शब्द ‘अनुष्ठान’ अपने आप में एक विलक्षण प्रयोग है। लेखक कहीं ‘मो यान’ के लेखन काल की वैचारिक मुक्ति व साहित्यिक उत्साह से परिचित कराते हैं, तो कहीं ‘नादिन गॉर्डिमर’ के राज्य नियंत्रण विरोधी विचारों से। इन सबके अतिरिक्त अदूनीस (लेबनान/ फ्रांस), महमूद दरवेश (फ़िलिस्तीन), जीन अरसनायगम (श्रीलंका), क्वामे सेनु नेविल डॉज़ (घाना) तथा अफ़गानी स्त्री कविताओं की सटीक हिंदी प्रस्तुति भी इस पुस्तक को पठनीय, मननीय और संग्रहणीय बनाती है। अंग्रेजी से इतर रचनाओं के हिंदी अनुवाद हेतु उनके प्रामाणिक अंग्रेज़ी अनुवादों को आधार बनाया गया है। 

यह देखकर सुखद विस्मय होता है कि लेखक अवधेश कुमार सिन्हा ने विश्व साहित्य की इतनी विशद वैचारिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमियों को अपनी सरल, सुसंस्कृत, सुस्पष्ट एवं विद्वत्ता से परिपूर्ण भाषा में एक जिल्द के भीतर समाविष्ट कर लिया है! यह केवल एक पुस्तक नहीं, अपितु रचनाकार की प्रबुद्धता, विश्लेषणात्मकता तथा गहन संवेदनशीलता का जीवंत उदाहरण होने के साथ-साथ विश्व साहित्य में एफ्रो-एशियाई साहित्यकारों के योगदान का प्रामाणिक दस्तावेज़ भी है।   अवधेश कुमार सिन्हा की इस पुस्तक में अफ्रीका और एशिया के ये काली स्याही से लिखे गए सूर्य के समान चमकते शब्द अनेक शोधार्थियों, अनुसंधित्सुओं तथा विश्व साहित्य प्रेमियों के जीवन को अवश्य प्रकाशमान करेंगे। 

- डॉ. रक्षा मेहता 
विभागाध्यक्ष (हिंदी विभाग), आर्मी पब्लिक स्कूल, गोलकोंडा, हैदराबाद/ मोबाइल: 7729879054.

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