मंगलवार, 12 मई 2026

पुस्तक समीक्षा : उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन


बेमिसाल हरिहरन

- आर्या झा (हैदराबाद)

ग़ज़ल के कहन की विविधता से भला कौन अनजान होगा यह तो कोमल मन को सहजता से छूकर ज़ेहन में उतरने में दक्ष होती हैं और उस पर मखमली मुलामियत लिए श्री हरिहरन जी की रुहानी आवाज़ हो तो कमाल होना तो बनता ही है।

हम बात कर रहे हैं सर्व भाषा ट्रस्ट से प्रकाशित कहकशां फाउंडेशन के अध्यक्ष श्री आनंद कक्कड़ द्वारा लिखित साहित्य आजतक के मंच पर स्वयं हरिहरन के हाथों विमोचित पुस्तक “उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन” की। 


उनके पचास वर्षों के अद्भुत योगदान को इस पुस्तक के ग्यारह अध्याय के अन्तर्गत समाहित किया गया है जो ग़ज़ल के विभिन्न घरानों से गुज़रते हुए हरिहरन घराने पर आकर रुकती है जिसमें हरिहरन के आरंभिक जीवन व उनके ग़ज़ल के प्रति अतिरिक्त रुझान के राज़ खोलती है और ताज्जुब की बात तो यह है कि आज इन ऊँचाइयों पर पहुँच कर भी वे विद्यार्थी समान सतत प्रयत्नशील रहते हैं शायद यही उनकी सफलता का राज़ भी है और वह बड़ी ही सादगी से इसका श्रेय अपने तीनों गुरुओं, माँ श्रीमती अलामेलु, उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान साहब एवं रुहानी गुरु जनाब मेंहदी हसन साहब को देते नहीं थकते हैं जो उन्हें और भी अनूठा बनाती है।

जिस तरह से उन्होंने अपने गीतों व ग़ज़लों के माध्यम से संपूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोया है उन्हें सांस्कृतिक राजदूत कहना पूर्णतया न्यायोचित है। जहाँ एक ओर पूरे विश्व में क्षेत्रवाद की लहर चरम पर है वहीं वह दिलों को जोड़ने की बात करते हैं।

इतना ही नहीं उनके गायन की तकनीकी विविधता ने हमेशा से जेनरेशन गैप को भी कम किया है। शायद ही कोई ऐसा हो जिसकी ज़ुबान पर “काय झाल” न चढ़ा हो। एक ओर मेंहदी हसन साहब की तर्ज़ पर बेमिसाल ग़ज़ल गायिकी तो दूसरी ओर कोलोनियल कजिंस, जैज़ और उर्दू ब्लूज और इस तरह से हर वर्ग हर क्षेत्र के लोगों को एक छत के नीचे लाने में सक्षम है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ हरिहरन ही कर सकते हैं। यहाँ तक कि स्वयं की गायन शैली में निरंतर बदलाव करते हुए जिस प्रकार पिछले पाँच दशकों से सतत क्रियाशील हैं वह एक पद्मश्री नहीं बल्कि अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित होने योग्य हैं!

इस किताब की उपयोगिता की बात करें तो जावेद अख़्तर साहब ने कहा है कि “ इस किताब की जो सबसे बड़ी अहमियत है,वह यह है कि आनन्द कक्कड़ ने इसमें हरिहरन की उन बातों को समेट कर बताया है जो 50 सालों से बिखरी हुई थीं।” आगे यह भी कहा कि उन्हें यक़ीन है कि इसे पढ़ते हुए पाठकों को हरिहरन का असली योगदान समझ में आएगा। उनकी बात से सौ फ़ीसदी ताल्लुक़ रखते हुए मुझे भी यह लगता है कि यह किताब करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बनेगी और परिस्थितियों को अपनी मेहनत के बल पर बदलने वाले हरिहरन एक सच्चे आदर्श के रूप में उभर कर सामने आएँगे।

सरोद सम्राट अमजद अली खान ने हरिहरन की संगीत सेवा को देखते हुए जिन तीन उपाधियों से नवाज़ा उनमें एक उस्ताद हरिहरन था तो उनके कहे का अमल करते हुए पुस्तक का नाम, “उस्ताद -ए-ग़ज़ल हरिहरन” रखा गया। हरिहरन साहब की एकदम साफ़ तलफ़्फ़ुज़ उर्दू ज़बान पर उन्होंने यह भी कहा कि “एक दक्षिण भारतीय होते हुए कोई ग़ज़ल गाए और उर्दू से डील करे यह अपने आप में बहुत बड़ा करिश्मा है, खुदा की देन है और एक बड़ी कामयाबी है।”

पुस्तक में सर्वप्रथम ग़ज़ल और उसके घरानों से होते पाठक जब हरिहरन घराने पर ठहरते हैं तो हरिहरन साहब के गुरु, उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान साहब के कुशल प्रशिक्षण, उनकी सलाहियत पर उर्दू ज़बान सीखने की कोशिश इत्यादि की जानकारी मिलती है। हरिहरन साहब के रियाज़ की निरंतरता एवं ग़ज़लों के कंपोज़िशन पर अथक परिश्रम के परिणामस्वरूप विश्वस्तरीय सफलताओं का ज़िक्र बेहद सुखद प्रतीत होता है । आगे लेखक एक श्रोता के तौर पर जब उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन के साथ संवाद कर उनके जीवन के अनुभवों को कलमबद्ध करते हैं तो उनसे गुज़रते हुए पाठकों की जिज्ञासा शांत होती है।

इसके विभिन्न अध्यायों में लेखक ने हरिहरन के जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों एवं उपलब्धियों का उल्लेख किया है तथा गायिकी के सफ़र के प्रतिनिधि साथियों का उनके प्रति उद्गार को भी प्रस्तुत किया है जो हरिहरन के सम्पूर्ण व्यक्तित्व व कृतित्व के रेशे-रेशे से परिचित कराते हैं।

पुस्तक की एक विशेषता यह भी है कि इसे आज की पीढ़ी को मद्देनज़र रखते हुए लिखा गया है ताकि वह ग़ज़ल की गहराइयों में उतर सकें उन्हें महसूस कर सकें और उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतार सकें ।

अध्याय ‘रुबरु’ के दौरान रचयिता के प्रश्न यूँ प्रतीत होते हैं जैसे लंका पार करने के पूर्व हनुमान जी को उनकी शक्तियां याद दिलाई गईं हों जो इस बात का द्योतक है कि कुछ और बेहतरीन ग़ज़ल अल्बम अवश्यंभावी हैं और वे भी हमेशा की तरह कुछ नये प्रयोगों के साथ प्रस्तुत होगी ।

किताब शुरुआत से लेकर आख़िर तक बेहद रुचिकर बन पड़ी है जिसे पढ़ते हुए जाने-अनजाने हरिहरन के मधुर स्वर में गाई ग़ज़लें ज़ेहन में उतर आती हैं जो किताब पढ़ने की प्रक्रिया को सुर देती महसूस होती हैं और आख़िरी अध्याय में पचास सुपरहिट ग़ज़लों से गुज़रना बोनस साबित होता है।

अंत में यह किताब न केवल पठनीय है बल्कि संग्रहणीय भी है। मैं तो यह कहूँगी कि यह पुस्तक एक अनोखी अभिव्यक्ति है जो एक लीजेंड को एक प्रशंसक की ओर से भेंट किया गया फूलों का गुलदस्ता है जिसकी ख़ुशबू कभी कम न होगी।

आखिर में उस्ताद ए ग़ज़ल - हरिहरन पुस्तक हरिहरन जी के ग़ज़ल प्रेम और संगीत के लिए लिए अनवरत तपस्या का एक ऐसा जीवंत दस्तावेज़ है जो आज के श्रोताओं को आपका समग्र परिचय है। मौलिक ग़ज़ल कंपोजर और गायक के रूप में हरिहरन के लिए उन्हीं को ग़ज़ल का एक मतला समर्पित है:-

वो सरफिरी हवा थी संभलना पड़ा मुझे
मैं आखिरी चराग़ था जलना पड़ा मुझे। 000




शुक्रवार, 27 मार्च 2026

अवधेश कुमार सिन्हा के ग्रंथ 'काली स्याही सूर्य शब्द' की समीक्षा



एफ्रो-एशियाई साहित्य की चमक 
‘काली स्याही सूर्य शब्द’
- डॉ. रक्षा मेहता

कितना अच्छा हो यदि कोई साहित्यप्रेमी या कलाप्रेमी विश्व साहित्य से जुड़ना चाहे और इसके लिए उसे देश-विदेश के विविध पुस्तकालयों की खाक न छाननी पड़े। साहित्य-सागर में से सबसे चमकीले तथा बहुमूल्य मोतियों का भंडार उसके सामने प्रस्तुत कर दिया जाए, तो इससे बड़ा उपहार एक साहित्यप्रेमी  के लिए और कुछ हो ही नहीं सकता। ऐसी ही अमूल्य निधि के रूप में सृजित की गई है, विश्व साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान और समीक्षक अवधेश कुमार सिन्हा (1950) विरचित पुस्तक ‘काली स्याही सूर्य शब्द’ (2026: संभावना प्रकाशन, हापुड़: पृष्ठ 288, पेपरबैक: 499 रुपए), जिसमें एशिया तथा अफ्रीका के नोबेल पुरस्कार विजेता दस लेखकों व कवियों की कालजयी रचनाओं के साथ-साथ पाँच अन्य बेहतरीन साहित्यकारों की रचनाओं का हिंदी रूपांतरण प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक का अत्यंत रोचक पक्ष यह है कि पाठक न केवल इन कविताओं, कहानियों, नाटकों तथा उपन्यासों के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंशों को पढ़ता है, अपितु इनके मूल रचनाकारों के जीवन से भी अत्यंत गहराई से जुड़ता है। 

प्रत्येक रचनाकार की रचना से पूर्व उनके जन्म, शिक्षा-दीक्षा, पारिवारिक परिवेश, व्यक्तिगत समस्याएँ, चुनौतियाँ, लेखन की प्रेरणा, लेखन विषय, रचनाकर्म, भाषा-शैली, तत्कालीन परिस्थितियाँ आदि महत्त्वपूर्ण विषयों पर इतनी गहनता से लिखा गया है कि पाठक स्वतः ही उस देश-काल में पहुँचकर इन रचनाकारों से इस प्रकार जुड़ जाता है मानो वह इन्हें निजी रूप से जानता हो। इस सामग्री को अत्यंत रोचकतापूर्वक शब्दबद्ध किया गया है तथा रचनाकारों के निजी जीवन से प्रामाणिक उदाहरण देकर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से पाठकों को रू-ब-रू कराया गया है। कथा साहित्य की बात करें तो, इस पुस्तक में रवींद्रनाथ ठाकुर (भारत) की भावनात्मक गहनता पर आधारित बांग्ला कहानी ‘काबुलीवाला’ के साथ-साथ गुरना (जंजीबार/ इंग्लैंड) के उपन्यास ‘पैराडाइज़’ के एक अंश, नागीब महफूज (मिस्र) की कहानी ‘हाफ ए डे’, सैमुएल योसेफ़ एग्नॉन (इज़राइल) की हिब्रू भाषा में लिखी कहानी ‘ऑर्केस्ट्रा’, हॉन कांग (दक्षिण कोरिया) द्वारा कोरियन भाषा में रचित उपन्यास ‘द वेजिटेरियन’ का एक अंश, ओरहान पामुक (तुर्की) के उपन्यास ‘माई नेम इज़ रेड’ का अंश, यासूनारी कवाबाता (जापान) की जापानी कहानी ‘मदर’, वोले सोयिङ्का (नाइजीरिया) का नाटक ‘ए डांस ऑफ द फोरेस्ट्स’, मो यान (चीन) के चीनी उपन्यास ‘रेड सोरघम’ का अंश, नादिन गॉर्डिमर (दक्षिण अफ्रीका) के उपन्यास ‘बर्गर्स डॉटर’ के एक अंश का उत्कृष्ट हिंदी रूपांतरण पढ़ने को मिलता है।   

जब पाठक रवींद्रनाथ ठाकुर की कहानी ‘काबुलीवाला’ या उनकी कविताएँ ‘मैं अनेक वासनाओं को चाहता हूँ प्राणपन से’ अथवा ‘भजन, पूजन, साधना, आराधना’ पढ़ता है, तब वह केवल इस कहानी या इन कविताओं से ही नहीं जुड़ता अपितु उनका जीवन-परिचय पढ़कर इस तथ्य से भी अवगत होता है कि कवींद्र रवींद्र अमानवीयता के विरोधी थे, मानवतावाद को राष्ट्रवाद से ऊपर रखते थे किंतु राष्ट्रविरोधी कतई नहीं थे। अवधेश सिन्हा एक स्थान पर लिखते हैं– “13 अप्रैल, 1919 को ब्रिटिश शासन द्वारा किए गए जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के विरोध में रवींद्रनाथ ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अपनी नाइटहुड की उपाधि लौटाकर दिखा दिया कि वे अराष्ट्रीय नहीं थे।” (पृ. सं. 27)। इस पुस्तक के माध्यम से यह ज्ञात होता है कि रवींद्र कबीरदास की ही भाँति आत्मा-परमात्मा के मिलन में विश्वास करते थे, मृत्यु को भय नहीं, वरदान मानते थे, संगीत प्रेमी थे तथा आध्यात्मिक रहस्यवाद उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देता है। 

गुरना के रचनाकर्म में उनके समय की सामाजिक, सांस्कृतिक तथा व्यापारिक परिस्थितियों का स्पष्ट चित्र खींचते हुए अवधेश जी लिखते हैं– “अपनी सभी कृतियों में गुरना ने पूर्व-औपनिवेशिक अपरिवर्तित अफ्रीका के लिए सर्वमत विषाद से बचने का प्रयास किया है । उनकी स्वयं की पृष्ठभूमि हिंद महासागर में सांस्कृतिक विविधताओं से भरे एक ऐसे द्वीप की है, जिसका पुर्तगाली, अरब, जर्मन व ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्तियों के अधीन गुलामों के व्यापार एवं दमन के भिन्न रूपों का तथा पूरी दुनिया के साथ व्यापारिक संबंध का इतिहास रहा है।” (पृ. सं. 57)। सुखद अंत होने की पाठकों की अपेक्षाओं को निराश कर देने के गुरना के वैशिष्ट्य से यह पुस्तक परिचित कराती है। इसी प्रकार नागीब महफूज़ के अस्तित्ववादी, मार्क्सवादी, यथार्थवादी, रहस्यवादी, समाजवादी, राष्ट्रवादी, लोकतांत्रिक तथा दार्शनिक दृष्टिकोण से लेखक अपनी इस पुस्तक के माध्यम से पाठक को सहज ही जोड़ देते हैं। 

सैमुएल योसेफ़ एग्नॉन की हिब्रू भाषा में लिखी कहानी ‘ऑर्केस्ट्रा’ में एक स्थान पर लिखा है– “मेरी आदत प्रतिदिन सूर्योदय के समय टहलने की थी, लेकिन उस दिन मैं सुबह तीन बजे ही जाग गया क्योंकि यह ज़ेखोर ब्रिट (रोश हशना का पूर्व दिन) की रात थी, एक रात जब सामान्य से पहले ही लोग सेलीचोट (हिब्रू एलुल के महीने के दौरान प्रायश्चित के दिन की जाने वाली अतिरिक्त क्षमा प्रार्थनाएँ) पढ़ने के लिए उठ जाते हैं।” (पृ. सं. 97) यहाँ अवधेश सिन्हा  यह समझाना नहीं भूलते कि रोश हशना यहूदी नववर्ष होता है तथा उससे पहले के दिन व उस महीने लोग क्या-क्या महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं। इस तरह वे पाठकों को हिब्रू सांस्कृतिक तथा धार्मिक मान्यताओं से जोड़ देते हैं, जो निश्चित रूप से उनकी प्रखर मेधा तथा साहित्यिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता का प्रमाण है। साथ ही वे एग्नॉन की यथार्थवादी रचनाओं में आध्यात्मिक रहस्यवाद के दर्शन भी कराते चलते हैं। 

हान कांग के उपन्यास ‘द वेजिटेरियन’ के अनूदित पाठ में  एक स्थान पर ‘गरम-गरम शाबू-शाबू शोरबे का ज़िक्र आता है, जिसका अर्थ ‘मांस व सब्जियों को एक साथ एक विशेष प्रकार के सुगंधित शोरबे में पकाया गया भोजन’ है। यह इस बात की पुष्टि करता है कि अन्य देशों के खान-पान (जो कि भारत से सर्वथा भिन्न हैं) की बारीकियों को भी इस पुस्तक में उकेरा गया है।

पामुक के जीवन से ली गई कहानी पर आधारित उपन्यास ‘माई नेम इज़ रेड’ के अनूदित अंश में एक स्थान पर व्हाइट शीप का ज़िक्र आता है, जहाँ यह समझाया गया है कि ‘व्हाइट शीप’ तुर्कमान फ़ारस की संस्कृति से प्रभावित सुन्नी तुर्कों का एक जनजातीय परिसंघ था। यह उल्लेख पाठक को एक भिन्न सांस्कृतिक तथा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जोड़ देता है; और यही है इस पुस्तक के रचनाकार का विलक्षण कौशल। 

अवधेश कुमार सिन्हा पाठक को कहीं ‘यासूनारी कवाबाता’ के अलगाववाद तथा एकाकीपन से जोड़ देते हैं, तो कहीं ‘वोले सोयिङ्का’ के काव्यात्मक प्रतीकवाद व राजनीतिक व्यंग्य से। वोले सोयिङ्का की कविता ‘भोर में मौत’ में प्रयुक्त विशुद्ध भारतीय शब्द ‘अनुष्ठान’ अपने आप में एक विलक्षण प्रयोग है। लेखक कहीं ‘मो यान’ के लेखन काल की वैचारिक मुक्ति व साहित्यिक उत्साह से परिचित कराते हैं, तो कहीं ‘नादिन गॉर्डिमर’ के राज्य नियंत्रण विरोधी विचारों से। इन सबके अतिरिक्त अदूनीस (लेबनान/ फ्रांस), महमूद दरवेश (फ़िलिस्तीन), जीन अरसनायगम (श्रीलंका), क्वामे सेनु नेविल डॉज़ (घाना) तथा अफ़गानी स्त्री कविताओं की सटीक हिंदी प्रस्तुति भी इस पुस्तक को पठनीय, मननीय और संग्रहणीय बनाती है। अंग्रेजी से इतर रचनाओं के हिंदी अनुवाद हेतु उनके प्रामाणिक अंग्रेज़ी अनुवादों को आधार बनाया गया है। 

यह देखकर सुखद विस्मय होता है कि लेखक अवधेश कुमार सिन्हा ने विश्व साहित्य की इतनी विशद वैचारिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमियों को अपनी सरल, सुसंस्कृत, सुस्पष्ट एवं विद्वत्ता से परिपूर्ण भाषा में एक जिल्द के भीतर समाविष्ट कर लिया है! यह केवल एक पुस्तक नहीं, अपितु रचनाकार की प्रबुद्धता, विश्लेषणात्मकता तथा गहन संवेदनशीलता का जीवंत उदाहरण होने के साथ-साथ विश्व साहित्य में एफ्रो-एशियाई साहित्यकारों के योगदान का प्रामाणिक दस्तावेज़ भी है।   अवधेश कुमार सिन्हा की इस पुस्तक में अफ्रीका और एशिया के ये काली स्याही से लिखे गए सूर्य के समान चमकते शब्द अनेक शोधार्थियों, अनुसंधित्सुओं तथा विश्व साहित्य प्रेमियों के जीवन को अवश्य प्रकाशमान करेंगे। 

- डॉ. रक्षा मेहता 
विभागाध्यक्ष (हिंदी विभाग), आर्मी पब्लिक स्कूल, गोलकोंडा, हैदराबाद/ मोबाइल: 7729879054.

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

चेन्नै में “महाप्रभु वल्लभाचार्य और पुष्टिमार्ग” पर द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न


















चेन्नै, 22 फरवरी, 2026। (प्रेस विज्ञप्ति)। यहाँ अरुंबक्कम स्थित द्वारका दास गोवर्धन दास वैष्णव कॉलेज में “महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य और पुष्टिमार्ग: एक मानवीय दृष्टि” विषयक द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय (हाइब्रिड) संगोष्ठी धूमधाम से संपन्न हुई।

उद्घाटनकर्ता  मुख्य अतिथि गोस्वामी 108 श्री मधुसूदन जी महाराज ने पुष्टिमार्ग के सिद्धांतों, ब्रह्म-जीव संबंध तथा वल्लभाचार्य के मानवीय दर्शन पर प्रकाश डालते हुए उनके विचारों को अपनाने का आह्वान किया तथा अष्टछाप कवियों, विशेषतः सूरदास के काव्य में व्यक्त भक्ति-भाव का उल्लेख किया।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य कैप्टन डॉ. एस. संतोष बाबू ने भारतीय दार्शनिक परंपरा को जीवन-मूल्यों का मार्गदर्शक बताते हुए ऐसे आयोजनों को समाज और शिक्षा के बीच सेतु बताया।

सचिव डॉ. अशोक कुमार मूँधड़ा ने महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य के सिद्धांतों को अपनाने का संदेश देते हुए कहा कि कृष्ण-भक्ति से मातृशक्ति, प्रेम, आनंद और ईश्वर-कृपा की अनुभूति प्रबुद्ध होती है।

विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचासीन प्रो. पी. राधिका (कुलपति, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा), प्रो. विवेक मणि त्रिपाठी (ग्वांगतोंग विश्वविद्यालय, चीन) और डॉ. मनोज कुमार सिंह ने दक्षिण भारत की कृष्ण भक्ति धारा और पुष्टिमार्ग की वैश्विक प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए करुणा, अनुग्रह और सेवा-भाव को विश्व-मानवता के साझा मूल्य बताया।

संयोजक डॉ. मनोज कुमार द्विवेदी ने संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की और कहा कि यह आयोजन भक्ति, कृपा, सेवा-भाव तथा समकालीन जीवन में पुष्टिमार्ग की प्रासंगिकता पर वैश्विक अकादमिक विमर्श स्थापित करने का प्रयास है।

दो दिनों में 1 अंतरराष्ट्रीय सत्र आभासी माध्यम से और कुल 3 अकादमिक सत्र प्रत्यक्ष माध्यम से संपन्न हुए। इन सत्रों की अध्यक्षता प्रो. निर्मला एस. मौर्य (पूर्व कुलपति, जौनपुर विश्वविद्यालय), प्रो. ऋषभदेव शर्मा, प्रो. जयशंकर बाबु और प्रो. मंजुनाथ अंबिग ने की। मुख्य वक्ताओं और विषय विशेषज्ञों के रूप में प्रो. साकेत कुशवाहा (कुलपति, लद्दाख विश्वविद्यालय, लद्दाख), डॉ. पीबी वनिता, उमेश पाठक (सोरों, सूकरक्षेत्र), डॉ. सुधा त्रिवेदी, डॉ. विजया सिंह (प्रयागराज), प्रो. राजशेखर (मॉरीशस) तथा प्रो. चंद्रशेखर सिंह (पूर्व निदेशक,, समाज कार्य, काशी विद्यापीठ, वाराणसी), प्रो. मुकेश मिश्रा (बस्ती) तथा प्रो. डॉ. आलोक पांडेय (हैदराबाद) सम्मिलित हुए। चारों सत्रों में देश-विदेश से लगभग 100 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।

सभी सत्रों का सफल संचालन महाविद्यालय के प्राध्यापकों डॉ. सरोज सिंह, डॉ. प्रवीण कुमार मिश्र, डॉ. कुमार अभिषेक, डॉ. हर्षलता वी. शाह और डॉ. सुनील पाटिल ने मनोयोगपूर्वक किया। लगभग 200 छात्रों की निरंतर और सक्रिय उपस्थिति ने बाहर से आए विद्वानों को विशेष रूप से प्रभावित किया। 000