शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

(डॉ. सुपर्णा मुखर्जी) अंतरिक्षीय शब्दों को समझने का प्रयास

अंतरिक्षीय शब्दों को समझने का प्रयास

डॉ. सुपर्णा मुखर्जी 

प्रेमचंद्र जैन जिनको देखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त नहीं हुआ लेकिन प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा के कारण से उन्हें पढ़ने  का सौभाग्य तो प्राप्त हुआ ही; साथ ही साथ उन पर रचनात्मक आलेख भी लिखने का सुअवसर प्राप्त हुआ। “निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक” (शर्मा, ऋषभदेव. सं. 2016.  नजीबाबाद : परिलेख) नामक ग्रंथ को पढ़ने का अवसर मिला तो पढ़ते- पढ़ते प्रेमचंद्र जैन जी के लेखन और उनके व्यक्तित्व को समझने के प्रयास करती रही। “निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक” नामक पुस्तक पाँच खंडों में विभाजित है। इन पाँच खंडों में 17 संस्मरण, 44 कविताएं (प्रेमचंद्र जैन द्वारा लिखित), 8 विमर्श, 7 रेडियो वार्ताओं  2 अध्यक्षीय भाषण, 15 संपादकीय, 1 कहानी (प्रेमचंद्र द्वारा लिखित), 4 पत्र, आत्मकथा और पुरस्कार सूची को देखा पढ़ा जा सकता है। प्रेमचंद्र जैन साहित्यकार थे, अध्यापक थे, समाज में चेतना लाने वाले, समाज सुधारक थे। इन सब के अलावा और भी न जाने वे किन-किन दायित्वों का निर्वाह जीवन पर्यंत करते रहें।

पहले बात करते हैं  उनके गुरु रूप की। गुरु और शिष्य का संबंध कैसा होना चाहिए? यह प्रश्न अनादिकाल से महत्वपूर्ण रहा है और यह प्रश्न अनादिकाल तक महत्वपूर्ण रहेगा। “डॉ. प्रेमचंद्र जैन गुरु रूप में भी आदर्श हैं और शिष्य के रूप में भी। शिष्य के रूप में उनकी अनन्यता को आचार्य द्विवेदी और डॉ. शिवप्रसाद सिंह ने अपना अनन्य स्नेह देकर परिपूर्णता प्रदान की है तो गुरु के रूप में अपने शिष्यों को संतानवत मानकर डॉ। प्रेमचंद्र जैन ने स्वयं को गुरु परंपरा के ऋण से मुक्त कर लिया है। वे सच में वैसे गुरु हैं जिनके मन में अपने शिष्यों को सभ कुछ देने का भाव रहता है, लेना कुछ भी नहीं”। (1)

 शिक्षक हो या साहित्यकार, समाज सुधारक हो या राजनीतिज्ञ ये कोई अलग ग्रह के निवासी नहीं होते। ऐसा मेरे गुरु प्रोफेसर ऋषभ देव शर्मा जी हमेशा कहते हैं। उनके इसी बात को ध्यान में रखते हुए मई प्रयास करती हूँ कि व्यक्ति के व्यक्तित्व को समझने का प्रयास पहले करूँ। इसी प्रयास में जब मैंने प्रेमचंद्र जैन जी के व्यक्तित्व को समझने का प्रयास किया तो मैंने पाया कि उन्होंने कभी भविष्य की चिंता नहीं की। स्वयं उन्होंने लिखा है “बात यह थी कि ज़मीन का आदमी था, समाज से जुड़ा था। तमाम सारे छात्र-छात्राओं की समस्याएं, उनके निदान और दूर करने के उपाय : विवध शैक्षणिक सामाजिक संस्थाओं में होने वाले समारोहों – आयोजनों में शिरकत करने ले लिए : अपने अध्ययन – अध्यापन के उत्तरदायित्व को मनसा – वाचा – कर्मणा निभाते हुए समय देना – हर किसी के लिए संभव नहीं होता। मुझ में इस प्रकार के बहुचर्चित गुण – दोष थे। अतएव भविष्य के संबंध में सोचने का अवसर ही नहीं मिला।” (2) वे गुरुवर डॉ. शिवप्रसाद सिंह तथा आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के शिष्य थे। इस बात का उन्हे बहुत गर्व था कि इन दोनों के साथ समय बिताने का उन्हें  सुअवसर मिला। सम्पूर्ण जीवन उन्होंने यही प्रयास किया कि उनसे मिली शिक्षा चाहे वह किताबी हो, सामाजिक हो या फिर पारिवारिक अंतिम समय तक उनके साथ ही बनी रहें। नजीबाबाद उनका कर्मस्थल था। साधारणतया होता यह है कि लोग कर्म करने ही कर्मस्थल जातें है और माह के अंत में कर्म का प्रतिदान पाकर कर्मस्थल को धन्य मान लेते है। परंतु प्रेमचंद्र जैन के लिए नजीबाबाद केवल कर्मस्थल मात्र नहीं था वे इस शहर के साथ ऐसे ही घुलमिल गए जैसे प्रण वायु प्राण के साथ घुलीमिली रहती है। वैसे तो, उनके पिता चाहते थे कि वे काशी में रहकर जैन धर्म – दर्शन के विद्वान बनें और जोतिश विद्या का प्रशिक्षण लेकर आजीविका का माध्यम उसे ही बनाए। बहरहाल, वे ज्योतिष विद्या को अपनी आजीविका का साधन नहीं बना सकें। वे हिन्दी के अग्रगण्य प्रोफेसर बनें। इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें जैन धर्म का ज्ञान नहीं था। उन्होंने तो दूसरे धर्मों का भी गंभीर अध्ययन करके उन धर्मों के अच्छाइयों और बुराइयों  पर सपाट तरीके  से बात करने की योग्यता प्राप्त की। उनका ज्ञान कोरा ज्ञान नहीं था। उनमें विश्लेषण और तर्क करने की अद्भुत क्षमता थी। प्रोफेसर देवराज के शब्दों में, “आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जैसे – जैसे गुरु जी के साथ मेरा संपर्क बढ़ा, वैसे – वैसे ही, चाहे गुरु जी का घर हो या और कोई स्थान, जहाँ हम दोनों अकेले हो, हम जैन धर्म और वैदिक श्रम सहित सभी धर्मों की चीर  - फाड़ करने लगते थे। कभी उन पर हँसते थे कभी व्यंग्य करते थे।” (3) उनके लिए धर्म केवल ईश्वर – ईश्वर चिल्लाते रहने का साधन नहीं था धर्म उनके लिए मानवता, समरसता को जन्म देनेवाला साधन था। जो व्यक्ति सहृदय के तरह ज्ञान प्राप्त करने को तैयार रहता है और जो ज्ञान को चरित्र निर्माण का अंग मान पता है वही यह लिख पाता है ------

“कवि छोड़ो कुंठा – क्रांति

नव -नव रस कूप भरे है।

खालि घट को डुबकी दें

ये कूप बहुत गहरे है।।

कृषि करते कृषक थका है:

श्रमिकों पर भी पहरे है।

न्याय की करते रहो पुकार

यहाँ शासन – सत्ता बहरे है।।

कवि कलम बने तलवार:

कहर बरपा दें जो मोहरे है ।।

जनतंत्र में जनता त्रस्त:

लुटेरे हर पग पर ठहरे है ।।

करें अब क्रांति, नहीं अब भ्रांति:

चतुर दिक आतंकी चहरे है।

न देंगे अस्मत आजादी

प्राप्ति के घाव बढ़े गहरे है।।

कवि छोड़ो कुंठा – क्रांति:

नव -नव रस कूप भरें हैं।। ” (4)

जैसा कि मैंने पहले ही कहा डॉ. प्रेमचंद्र जैन के व्यक्तित्व पर डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का बहुत अधिक प्रभाव था। द्विवेदी जी को प्रतीकों में सबसे प्रिय जो प्रतीक लगता था वह था “बीजांकुर”। “पृथ्वी पर पड़े हुए बीच का जब अंकुर फूटता है तो अंकुर की नोक पर वे दोनों दल जमीन के ऊपर सूर्य को करबद्ध प्रणाम की मुद्रा में दृष्टिगत होते है। यही बीच की ईश्वर के प्रति विनयान्जली  होती है, जन्म देनेवाले के प्रति कृतज्ञता होती... आदि।” (5) “बीजांकुर” के प्रति इसी श्रद्धा भाव को हजारीप्रसाद द्विवेदी के शिष्य डॉ. प्रेमचंद्र जैन में कुछ इस प्रकार से दिखाई पड़ता है ----- 

“प्रदत्त 

सम्मानित मनुज से –

डायरी के पृष्ट खाली

भर रहे मन को

अतुल आमोद से ।

मैं अकिंचन

कर सकूँ उपयोग – इनका

सत्य से

तथ्य से और

दिल के दर्द से इनको भरूँ

अभाव में सद्भाव के ये पृष्ठ पूरे हो

नमन करता हूँ तुम्हें

विश्राम दो।” (6)

प्रेमचंद्र जैन अपने गुरु हजारीप्रसाद द्विवेदी के विचारों से प्रभावित थे लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने किसी और साहित्यकार के विचारों का अनुकरण नहीं किया। अपनी रेडियो वार्ताओं के द्वारा उन्होंने समय समय पर अनेक विद्वानों के विचारों का विश्लेषण किया। भारतेन्दु हरिश्चंद्र का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा, “नाटककार के रूप में उनकी एक विशेषता यह थी कि वे अपने नाटकों को संस्कृत लक्षणवादों के नाटक के भेदानुरूप नाम भी देते थे। जैसे उन्होंने अपने किसी नाटक को रुपक लिखा है, किसी को व्यायोम तो किसी को सहक किसी को नाट्य रासक, गीति रुपक, प्रहसन, नाटिका इत्यादि लिखा है”।(7) 

भारतेन्दु जी को उद्धृत करते हुए उन्होंने यह भी लिखा, “इस भारतवर्ष में उत्पन्न और इन्हीं हम लोगों के पूर्व पुरुष महाराज हरिश्चंद्र भी थे। यह समझकर इस नाटक के पढ़ने वाले कुछ अपना चरित्र सुधारेंगे तो कवि का परिश्रम सफल होगा”। (8) भारतेन्दु का विश्लेषण ही केवल उन्होंने नहीं किया बल्कि भारतेन्दु ने अपनी कम आयु में जिस साहस के साथ अन्याय का विरोध किया वही साहस भाव प्रेमचंद्र जैन जी के आचरण में भी तब स्पष्ट रूप में दिखाई पड़ा, “जब साहू जैन महाविद्यालय की प्रबंध समिति ने राजनीति शस्त्र के प्राध्यापक और स्वतंत्रता सेनानी एस. सी. जैन के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किया, तो विवश होकर वे चौक बाजार में धरने पर बैठ गए। गुरु जी ने पहला कार्य यह किया कि जनपद विजनौर के समस्त शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारियों के संघों को एक मंच पर एकत्र करके एक ‘संयुक्त कर्मचारी समन्वय समिति’ का गठन कराया”।(9)

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यासों में कौटुंबिक मर्यादा का संरक्षण किस प्रकार से हुआ? यह हमेशा से सही एक विवादास्पद विषय रहा। प्रेमचंद्र जैन जी ने अपनी प्रखर विश्लेषण शक्ति के द्वारा जोर देकर कहा, “शरतचंद्र सदैव रवींद्र को गुरु मानते रहे। वे ही उनके आदर्श थे। परंतु फिर भी शरत की विचार धारा अपनी थी। अपनी विचार धारा को उन्होंने अपने पात्रों द्वारा प्रतिपादित कराया है। ‘शेष प्रश्न’ में कमल एवं आशु के वार्तालाप का अद्वितीय सौन्दर्य एवं कहत्व है। प्रेम और विवाह पर कमल का अपना दृष्टिकोण है। प्रेम को वह विशुद्ध मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से देखना चाहती है। आंतरिक प्रेम की प्राण से और विवाह की देह से सापेक्ष्य तुलना करती हुई वह कहती है, ‘जैसे प्राण भी सत्य है, देह भी सत्य है – किन्तु प्राण जब निकल जाता है – अर्थात विवाह की सार्थकता दोनों पक्षों पर आधारित है। शरतचंद्र व  अति संयम  की बात से सहमति व्यक्ति की है’।”(10) प्रेमचंद्र जैन जी शरतचंद्र के विचारों से न केवल प्रभावित थे बल्कि उनका कहना था, “मुझे ऐसा लगता है, वस्तुतः है ही दो जातियाँ। पुरुष यदि पुरुष न होते नारी यदि कोमला न होती तो शायद मानव और मानवी संज्ञा ही होती। इनके पर्यायवाची शब्द ही नहीं होते। परंतु अन्य पर्यायवाची शब्द है तो इनके अर्थ और कार्य भी होंगे ही। अतः मई अर्थ और अनर्थ की पकड़ से दूर दो ही जातियाँ स्वीकार कर रहा हूँ – ने और मादा। इसे आप महिला समाज और पुरुष समाज की संज्ञा भी दे सकते हैं। समाज की कुछ रचना – प्रक्रिया ऐसी है की महिला एवं पुरुष दो अलग अलग जातियाँ अथवा समाज होते हुए भी एक ही समाज है”। (11)

साहित्यकार को कैसा होना चाहिए? माखनलाल चतुर्वेदी जी के संदर्भ में रेडियो वार्ता के दौरान जिस वक्तव्य को उन्होंने रक्खा वह आज के नवोदित साहित्यकारों का मार्ग प्रशस्त कर सकता है, “विशिष्ट कवि वही होता जो युगद्रष्टा हो। उसके वर्तमान में अतीत की सीख और भविष्यत का फल भी झाँकता है। उनके वर्तमान का हमारे वर्तमान से तलमेली बैठता है तो हमारे लिए वे प्रासंगिक है, और नहीं तो अप्रासंगिक अथवा outdated”। (12) साथ ही इसी क्रम में निर्मल वर्मा के संबंध में उनके द्वारा कहे गए कथन को रेखांकित करना आवश्यक हो जाता है। उन्होंने कहा था, “निर्विवाद सत्य है कि एक श्रेष्ठ रचनाकार की मौत कभी नहीं होती। पार्थिव देह जाती है तो ‘अक्षर देह’ बनी रहती है – रचना संसार जीवित रहता है। निर्मल वर्मा ने अपनी डायरी में लिखा है, ‘हर रोज कोई मेरे भीतर कहता है, तुम मृत हो। यही एक आवाज है, जो मुझे विश्वास दिलाती है कि मा अब भी जीवित हूँ।’ उनकी ‘अब कुछ नहीं’ अंतिम कहानी के साथ – साथ अब कुछ नहीं है, फ भी वह सब कुछ है, जिसे उनका रचना संसार कहा जाता है। इसी रूप में वे जीवित रहेंगे”। (13)

इन दोनों वक्तव्यों  के द्वारा साहित्यकार और उनकी रचनाओं को प्रेमचंद्र जैन जी समाज के लिए कितना महत्वपूर्ण मानते थे इसे हम समझ सकतें है। साहित्यकार का कोई जाती – धर्म नहीं होता। साहित्यकार का एक ही धर्म होता है मानवता इसे प्रेमचंद्र जैन जी पूरे मन से मानते थे। “सर सैयद अहमद खाँ के जन्मदिन के अवसर पर” कविता की पंक्तियाँ इसी बात की प्रतीक है – 

“हम तेरी रहमतों पे हुए है सदा कुरबान 

लायक हुए है इतने कि पढ़ सकते है कूर-आन

सैयद से गर हमको न मिली होती शमा तो

सच मानते है हम कि गए होते कहीं खो”(14)

    अंत में उनके रेडियो वार्ता के महत्वपूर्ण अंग “हल की रेखा से उपजी आग” की चर्चा किए बिना तो आलेख को drसमाप्त किया ही नहीं जा सकता। आदि कवि वाल्मीकि ने जब रामायण की रचना की तो नायक के रूप में राम को प्रतिस्थापित करना उनका उद्देश्य रहा। राम काव्य रहे हो या कोई दूसरा काव्य प्रायः नारी को उसका समुचित स्थान नहीं मिल पाता। पद्मश्री श्रद्धेय रघुवीर शरण ‘मित्र’ जी ने ‘भूमिजा’ के माध्यम से न केवल सीता के चरित्र को चरमोत्कर्ष तक पहुंचाया बल्कि इस ग्रंथ के एक सर्ग ‘हाथ बढ़े फूल लिखे’ के माध्यम से नारी के श्रम और साहस के द्वारा राष्ट्र का विकास कैसे सुनिश्चित होता है इसका सुंदर वर्णन किया है। ‘भूमिजा’ के रचनाकार ने स्वयं स्वीकारा है कि, “भूमिजा के माध्यम से मैं मानव के अहं को द्रवित करना चाहता हूँ। चाहता हूँ आज का मनुष्य किसी की पीड़ा से खेल न करें। सबल, निर्बल और निर्दोष को सताये नहीं। प्राणी, प्राणी के प्रति उदार हो। निराश और दुर्बल पलायन न करके शक्ति संचित करें। साहस अन्याय को पराजित कर दो कोई यदि किसी के स्वत्व पर आक्रमण करें तो उसे मुँह की खानी पड़े”। (15) आज के युग  में ऐसी रचनाओं की बड़ी आवश्यकता है। “राम राजा हाथ पसारे रह गए और सीता धरती में समा गईं। राज सत्ता के मद को चूर-चूर करने के उद्देश्य से ही ‘भूमिजा’ सार्थक है”। (16)

    ऐसी वार्ताएं ऐसा विश्लेषण डॉ. प्रेमचंद्र जैन के द्वारा ही संभव था। मुख पृष्ट पर लिखित कबीर का दोहा – 

सब धरती कागद करूँ, लेखनी सब बनराय। 

सात समुंद की मसि करूँ, गुरु गुन लिख्यो न जाय।। 

डॉ. प्रेमचंद्र जैन के लिए सटीक एवं सार्थक है। 

 

संदर्भ सूची 

(1) निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक - पृ. सं. 58-59 

(2) निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक – पृ. सं. 404 

(3) निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक - पृ. सं. 62 

(4) निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक - पृ. सं. 132 

(5) निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक - पृ. सं. 197 – 198 

(6) निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक - पृ. सं. 77 

(7) निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक - पृ. सं. 209 

(8) निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक - पृ. सं. 210 

(9) निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक - पृ. सं. 66 

(10) निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक - पृ. सं. 214 

(11) निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक - पृ. सं. 149 

(12) निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक - पृ. सं. 215 

(13) निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक - पृ. सं. 222 

(14) निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक - पृ. सं. 129 

(15) निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक - पृ. सं. 226 

(16) निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक - पृ. सं. 228 

-  डॉ. सुपर्णा मुखर्जी 

हिन्दी प्राध्यापिका, सेंट एन्स  जूनियर एण्ड डिग्री कॉलेज फॉर गर्ल्स एण्ड वुमन, मलकाजगिरी, हैदराबाद। मो. 9603224007.  ईमेल : drsuparna.mukherjee.81@gmail.com 

द्रष्टव्य: 

इतिहास हुआ एक अध्यापक/ संपादक- दानिश सैफ़ी/ अविचल प्रकाशन, ऊँचा पुल हल्द्वानी-263139/ 2022/ पृष्ठ 177-182.


(डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा) और जितने दीप हैं, मैं सभी में हूँ!

और जितने दीप हैं, मैं सभी में हूँ!

  • गुर्रमकोंडा नीरजा  

                    [1]

“मैं चला नजीबाबाद -

नसीबाबाद समझकर आया 

सर्वत्र प्रेम ही पाया 

'गर मिलता भी है गरल 

उसे जगदीश निगल जाते हैं।” (प्रेमचंद्र जैन, गरल जगदीश निगल जाते हैं)।


सच में नजीबाबाद धन्य है। धन्य क्यों नहीं होगा, उसने ‘गुरु जी’ का असीम प्रेम जो पाया! ‘गुरु जी’! हाँ, इसी नाम से जाने जाते हैं डॉ. प्रेमचंद्र जैन जी - मेरे गुरु के गुरु के गुरु। इस अर्थ में वे मेरे परदादा गुरु हुए। इस गुरु-शिष्य परंपरा के कारण ही मुझे परदादा गुरु का अहेतुक स्नेह और आशीर्वाद प्राप्त हुआ।  

जब 2015 में गुरु जी के सम्मान में ‘निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक’ ग्रंथ की तैयारी हो रही थी, तो मुझे भी उस सारस्वत यज्ञ में गिलहरी के समान सहयोग करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 2016 में जब ग्रंथ प्रकाशित होकर आया, तो उन्हें समर्पित करने का निश्चय किया गया था। 3 दिसंबर, 2016 को अभिनंदन समारोह का आयोजन दिल्ली में हुआ था। सुबह 8 बजे दिल्ली पहुँचना था। लेकिन मेरा भाग्य का खेल कि गाड़ी रात को 8 बजे दिल्ली स्टेशन पहुँची। मैं विचलित होती रही कि गुरु जी से मिले बिना ही मुझे वापस लौटना पड़ेगा। लेकिन देवराज जी और ऋषभदेव शर्मा जी ने मुझे हिम्मत नहीं हारने दी। जब आयोजन स्थल पहुँची तो देखा, गद्दी बिछे हुए मंच पर गुरु जी शांत मुद्रा में बैठे हुए थे, लेकिन चेहरे पर थोड़ी सी परेशानी दिखाई दी। मेरे कारण गुरु जी को परेशानी जो झेलनी पड़ी। पहली बार गुरु जी का साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ। (अखण्डमण्डलाकारम् व्याप्तम् येन चराचरम्। तत्पदम् दर्शितम् येन तस्मै श्रीगुरुवे नमः॥)

गुरु जी का भरपूर आशीर्वाद बटोरकर मैं वापस हैदराबाद लौटी। उसके बाद से समय-समय पर गुरु जी से फोन पर बात हो ही जाती थी। त्योहार के दिन तो गुरु जी के फोन से नींद खुलती थी। उनके आशीर्वाद और स्नेह की वर्षा में मैं भीग चुकी हूँ। (कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आइ।/ अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराइ।) आज भले ही गुरु जी भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आत्मा हमारे साथ है और हमें असीसती रहती है। पग-पग पर उनकी उपस्थिति का अहसास होता है, क्योंकि गुरु जी के साथ आत्मिक रिश्ता जो बन गया था- जो अटूट है। गुरु जी के शब्दों में कहूँ तो -

‘भावनाओं से जुड़ा प्रेम

अटूट होता है’ (प्रेमचंद्र जैन, प्रेम) 

                   [2]

प्रेम के पीर   

डॉ. प्रेमचंद्र जैन स्वाभिमानी, कर्मठ और अदम्य साहसी थे। उनके स्वभाव के संबंध में डॉ. देवराज का यह कथन उल्लेखनीय है- “स्वभाव से खिलंदड़ और हँसोड़।” (शर्मा:2016:61)। नित्यानंद मैठाणी कहते हैं कि शरीर से तो वे दुबले-पतले थे किंतु उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि सभी उनसे डरते थे। उनसे एक बार यदि कोई मिलते तो उन्हें आजीवन भूल नहीं सकते। ऐसे थे गुरु जी। अपरिचित व्यक्ति से भी ऐसे मिलते जैसे उन्हें बरसों से जानते हों। उनके व्यक्तित्व में विद्वत्ता और वत्सलता के संगम को देखा जा सकता है। उन्हें यदि प्रेम का 'पीर’ कहें तो अतिशयोक्ति नहीं।   

जैन परंपरा के मर्मज्ञ विद्वान थे डॉ. प्रेमचंद्र जैन। जैन धर्म अपनी मान्यताओं, स्थापनाओं, कर्मकांड और रूढ़ियों के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन वे इस धर्म में घुस आए पाखंडों और रूढ़ियों का खुलकर विरोध करते थे। इतना ही नहीं, वे जैन लोगों के जीवन में जमी कुरीतियों की धज्जियाँ भी उड़ाते थे। वे धर्म को लोकहित-कारक के अर्थ में स्वीकारते थे। उनके अनुसार धर्म कर्तव्य है। वे बार-बार यही कहते थे कि “धर्म का लोकहित-कारक अर्थ ‘कर्तव्य’ को ही स्वीकार करना चाहिए। हिंदू-मुस्लिम-ईसाई आदि संप्रदाय या मत मानने से विवादों को विराम देने का मार्ग प्रशस्त नहीं होता है। मेरा इसी प्रकार का विश्वास है। कर्तव्य और धर्म शब्द प्रायः एक ही संदर्भ में प्रयुक्त करने से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।... मैं अपने अनुभव के आधार पर कहूँगा कि वर्तमान में धर्म और कर्तव्य की व्याख्या ही बदल गई। इसी के कारण व्यक्ति अपने पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति घनघोर उपेक्षा के लिए लेशमात्र शर्मसार होने को तैयार नहीं है।” (शर्मा:2016:406)    

प्रेमचंद्र जैन जीवन भर ढाई आखर प्रेम को ही महत्व देते रहे। उनके अनुसार “प्रेम सदैव अनुभूति परक रहा है, अतएव प्रेम को किसी परिभाषा के घेरे में अनुकूलित नहीं किया जा सकता। प्रेम मानव-स्वभाव की ही संपत्ति हो ऐसी बात नहीं है। वह तो पशु-पक्षियों में भी विद्यमान है और यदि प्रेम की सत्ता को प्राणिमात्र में भी स्वीकार किया जाए तो वह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।” (शर्मा:2016:139)। उनके अनुसार जिस व्यक्ति में प्रेम की पीर जागृत हो गई, उसका जीवन सार्थक है। वे भावनाओं से जुड़े हुए प्रेम को ही महत्व देते थे।   

डॉ. प्रेमचंद्र जैन मानवता के पक्षधर थे। धर्म और संप्रदाय के कटघरे में वे फिट ही नहीं होते। वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे। वे सही अर्थों में सामाजिक थे। उनके गुणों के बारे में उन्हीं के शब्दों से जान लें - “ज़मीन का आदमी था, समाज से जुड़ा था। तमाम सारे छात्र-छात्राओं की समस्याएँ, उनके निदान और दूर करने के उपाय; विविध शैक्षणिक सामाजिक संस्थाओं में होने वाले समारोहों-आयोजनों में शिरकत करने के लिए; अपने अध्ययन-अध्यापन के उत्तरदायित्व को मनसा-वाचा-कर्मणा निभाते हुए समय देना - हर किसी के लिए संभव नहीं होता। मुझमें इसी प्रकार के बहुचर्चित गुण-दोष थे।” (शर्मा:2016:404)। अपने इन्हीं गुण-दोषों के कारण वे अपने विद्यार्थियों और नजीबाबाद वासियों के निकट थे और उन्हें बहुत प्रिय थे। नजीबाबाद में न ही उनका जन्म हुआ और न ही शिक्षा-दीक्षा। यह तो उनकी कर्मभूमि थी। लेकिन वे नजीबाबाद के ही होकर रह गए - उनका काबा और काशी यही नजीबाबाद था। उन्होंने इस बात को स्पष्ट किया कि “यहाँ मेरे बस जाने या रुक जाने के निजी कारण हैं और पूर्णतः स्वांतः सुखाय हैं।” (शर्मा:2016:406) 

                   [3]

सदैव तत्परता 

डॉ. प्रेमचंद्र जैन एक ऐसे व्यक्ति थे जिनमें अदम्य जिजीविषा और कुछ करके दिखाने की भरपूर इच्छा शक्ति थी। यह बात उनके गुरु डॉ. शिवप्रसाद सिंह के कुछ पत्रों से भी स्पष्ट होती है- “तुम संकल्प को यथासमय सही ढंग से पूरा करने में सदैव तत्पर रहे हो।” (शर्मा:2016:330)। प्रेमचंद्र जैन कहते तो कुछ नहीं, बल्कि करके अवश्य दिखा देते थे। वे बहुत ही साहसी थे। वे जो कार्य हाथ में लेते थे, उसे पूरा करने तक दिन-रात एक कर देते थे। शिवप्रसाद सिंह के अभिनंदन ग्रंथ के लिए आलेख संग्रहीत करते समय उन्हें बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ा होगा। गुरु अपने शिष्य को परेशान होते नहीं देख सकते, इसीलिए शायद शिवप्रसाद सिंह ने उन्हें एक पत्र (8.8.88) लिखा था- “तुम इतना अस्वस्थ रहते हुए भी शिवप्रसाद नामक व्यक्ति के लिए क्यों छटपटा रहे हो? क्या किया शिवप्रसाद सिंह ने? पूरी ज़िंदगी बस एक अपढ़ गँवार व्यक्ति के अनुभव ही तो मिले- वह भी सिर्फ उन्हें जो अपने को पाठक कहते हैं।” (शर्मा:2016:331)। लेकिन प्रेमचंद्र जैन जिद्दी भी कम नहीं थे। उसी जिद के परिणाम स्वरूप हिंदी साहित्य जगत को शिवप्रसाद सिंह का अभिनंदन ग्रंथ ‘बीहड़ पथ के यात्री’ प्राप्त हुआ। (जेहि का जेहि पर सत्य सनेहू, सो तेहि मिलहिं न कछु संदेहू। - मानस)

                   [4] 

गुरु बिन भवनिधि तरहिं न कोई 

प्रेमचंद्र जैन शिष्य वत्सल गुरु थे। माता-पिता से प्राप्त सुलभ संस्कारों के साथ-साथ गुरुजनों द्वारा प्रदत्त ज्ञानराशि से वे आजीवन बँधे रहे। उन्होंने स्वयं यह स्वीकृत और घोषित किया कि “गुरुवर डॉ. शिवप्रसाद सिंह और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व और कृतित्व के नैकट्य से जो मूल मंत्र ग्रहण किए थे, वे मेरे अंतिम समय तक साथ रहेंगे।” (शर्मा:2016:406)। इन मंत्रों में एक मूल मंत्र है- “अपने आपको दलित द्राक्षा की भाँति निचोड़कर जब तक सर्व के लिए निछावर नहीं कर दिया जाता, तब तक स्वार्थ खंड सत्य है, मोह को बढ़ावा देता है, तृष्णा को उत्पन्न करता है और मनुष्य को दयनीय कृपण बना देता है। कार्पण्य दोष से जिसका स्वभाव उपहृत हो गया है, उसकी दृष्टि म्लान हो जाती है, वह स्पष्ट नहीं देखा पाता, वह स्वार्थ भी नहीं समझ पाता, परमार्थ तो दूर की बात है।” (शर्मा:2016:406)। इन मंत्रपूत वाक्यों से प्रेमचंद्र जैन हमेशा ही सामाजिक उत्तरदायित्वों को पूरा करने की शक्ति प्राप्त करते रहे। इसीलिए शिष्यों के लिए दलित द्राक्षा की तरह अपने आपको निचोड़कर प्रस्तुत कर सके। वे शिक्षकों से यह प्रश्न करते थे कि “यदि वे स्वयं गहन अध्ययन पूर्वक कृपणता और पक्षपातयुक्त व्यवहार छोड़कर अपने उत्तरदायित्व का ईमानदारी से पालन करेंगे तो उन्हें उनके कार्य में क्यों बाधा आएगी?” (शर्मा:2016:407)। उनका मानना था कि शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच शिष्टाचार के मर्यादित आचरण के अतिरिक्त अन्य दूरियाँ नहीं होनी चाहिए। तभी एक स्वस्थ परंपरा पनपेगी। 

प्रेमचंद्र जैन की कथनी और करनी में कहीं कोई अंतर नहीं दीखता। अपने शिष्यों के लिए वे कैसे गुरु थे, यह तो उन लोगों के वक्तव्यों से ही जाना जा सकता है। “गुरु जी के अध्यापन के समय कक्षा का वातावरण कभी बोझिल या उबाऊ नहीं रहता था। विषय को इतना रोचक बना देते थे कि कोई छात्र विषय से भटक नहीं सकता था। ... सारा ज्ञान छात्रों के मस्तिष्क में उड़ेलने का प्रयत्न करते थे और छात्र भी पूरे मनोयोग के साथ ज्ञान प्राप्त करना चाहते थे। छात्र दूसरे अध्यापकों की कक्षा अवश्य छोड़ देते थे किंतु गुरु जी की कक्षा छोड़ने का दुःसाहस कभी नहीं करते थे। दूसरी कक्षा के छात्र भी गुरु जी की कक्षा में बैठने का प्रयास करते थे।” (डॉ. निर्मल शर्मा)। “मैंने गुरु जी को कभी गुरु जी नहीं कहा, एक इकलौती शिष्या मैं ही हूँ, जिसने हमेशा उन्हें अंकल कहा।” (डॉ. हेमलता राठौर)। देवराज जी और गुरु जी तो हमेशा एक साथ ही पाए जाते थे। “नजीबाबाद के लोग बरसों यह विश्वास करते हुए रहे कि देवराज का पता करना है, तो गुरु जी से पूछो और गुरु जी के बारे में कुछ जानना है, तो देवराज से पूछो।” प्रेमचंद्र जैन की इस शिष्य वत्सलता को गुरु मंत्र की तरह डॉ. देवराज जैसे उनके शिष्यों ने भी अर्जित किया है। (गुरु बिन भवनिधि तरहिं न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥)

प्रेमचंद्र जैन माता-पिता और गुरुओं से प्राप्त संस्कारों का पालन आजीवन करते रहे। वे भविष्य की चिंता नहीं करते थे। शिष्यों की समस्याओं को सुलझाने में व्यस्त गुरु के पास भविष्य के संबंध में सोचने का अवसर कहाँ होता! “अध्यापन में भी तीनों कालों में वर्तमान को सँवारने के लिए अधिकतम क्षमताओं का उपयोग करने पर बल दिया। मजबूत नींव, भूतकाल में तलाशने के बाद ही वर्तमान पर ध्यान केंद्रित कर लिया जाए तो भविष्य की चिंताओं को लादे रखना बुद्धिमत्ता नहीं है।” (शर्मा:2016:404)। यह उनकी दृढ़ मान्यता थी। 

                    [5]

चश्म नम हैं मुफ़लिसों को देखकर   

प्रेमचंद्र जैन परिवार और रिश्तों को महत्व देते थे। उनकी मान्यता है कि जब व्यक्ति आत्मिक स्तर पर एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं तो किसी भी तरह की समस्याएँ नहीं होतीं। एक समय ऐसा था जब भारत भर में संयुक्त परिवार की परंपरा को सामाजिक मान्यता मिली थी। लेकिन “अब उसके समाप्तप्राय हो जाने से पारिवारिक, कौटुंबिक, यहाँ तक कि वैयक्तिक समस्याएँ दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं। उधार ली गई व्यक्तिवादी संस्कृति स्वार्थपरता, असहिष्णुता, हिंसा तथा पाशविक आचरण को बढ़ावा देने में सहायक ही हुई है।” (शर्मा:2016:405)। 

व्यक्ति स्वार्थलोलुप होता जा रहा है। मोह-माया में पड़कर इतना अंधा होता जा रहा है कि वह सही और गलत की पहचान ही नहीं कर पा रहा है। काला धन, चोर बाजारी, रिश्वत, महंगाई, बलात्कारियों की दुनिया है चारों ओर। प्रेमचंद्र जैन इस दुनिया को छोड़ आने की बात करते हैं। आदमी को आदमी की तरह जीने पर बल देते हैं। उनका मन विद्रूपताओं को देखकर व्यथित हो जाता है। उनकी दृष्टि में कोई हिंदू-मुस्लिम-ईसाई-जैन नहीं है, बल्कि सब केवल मनुष्य हैं। जब इन पर विपत्ति आती है, तो उनका मन द्रवित हो जाता है। राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद के बाद जब अयोध्या में मंदिर तोड़ने की अघटनीय घटना हुई, तब नजीबाबाद में भी नाजुक स्थितियाँ पैदा हुईं। गुरु जी ने अपनी सूझबूझ से वहाँ शांति का वातावरण कायम किया। “फिरकापरस्त और सांप्रदायिक ताकतों को अहसास हो गया कि इस नगर में दंगा करवाना आसान काम नहीं है। .... नजीबाबाद हिंदू- मुस्लिम सांप्रदायिक दंगों की आग में बरबाद होने से बच गया।” (शर्मा:2016:66)। वे आदमी को इनसान के रूप में बदलने के लिए आग्रह करते हैं। हैवानियत छोड़कर इनसानियत को अपनाने की अपील करते हैं। (शर्मा:2016:127)           

[6]

इष्ट फल 

डॉ. प्रेमचंद्र जैन अपने दायित्व को बखूबी जानते थे। उन्होंने न ही अपने दायित्वों से मुँह मोड़ा और न ही पलायन का रास्ता अपनाया। शिक्षक- शिक्षार्थियों के बिगड़ते रिश्तों के बात जब आती, तो वे डंके की चोट पर कहते थे कि “हम सबको मिलकर इन परिवर्तनों पर गंभीरता से सोचने- विचारने और चर्चा करने की आवश्यकता है। साथ ही जागरूक होना और जागरूक करना है। अब भी बिगड़ा कुछ नहीं है। अलबत्ता अपनी- अपनी स्वार्थपरता एवं प्रलोभन का नियंत्रण करना है। अपने सामाजिक तथा व्यक्तिगत दायित्वों को ईमानदारी से निभाने की आवश्यकता है। हमें राष्ट्रीय भावनाओं को शून्य होते देख वेदना होनी चाहिए और एक नागरिक के कर्तव्यों से विमुख नहीं होना चाहिए। विद्यार्थी, अभिभावक और शिक्षक का आपसी संबंध निकटता का रहेगा और वे अपने- अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहेंगे तो समस्याएँ स्वतः नज़र नहीं आएँगी। निःसंदेह शिक्षकों का उत्तरदायितव अपेक्षाकृत बड़ा है। प्रथमतः उन्हें कर्तव्यनिष्ठ, कर्मठ एवं सच्चरित्र होने की अनिवार्यता है।” (शर्मा:2016:434)। यदि कहीं भी कभी भी एक शिक्षक दुराचार में लिप्त पकड़ा जाएगा, तो समाज की निगाहें संपूर्ण शिक्षक जगत पर ही उठती हैं।   

साहित्यकारों के दायित्व के संबंध में भी प्रेमचंद्र जैन का यह कथन उल्लेखनीय है कि 'जो उपेक्षित है, वह साहित्य का विषय होना ही चाहिए।' उनकी मान्यता थी कि “संवेदना ही कविता की जननी है। अपनी रचना को कवि संतानवत सँवारता, दुलारता और सहेजता है। न केवल इतना ही बल्कि उन्हें संरक्षित करना भी निजधर्म मानता है।” (शर्मा:2016:389)। शोषक की व्यथा से शोषित की व्यथा भिन्न और विकट होती है। इसलिए प्रेमचंद्र जैन सहृदयों से यह अपील करते हैं कि “इसी विकटता का, दो टूक उत्तर - / साहित्यकार का दायित्व है।” (प्रेमचंद्र जैन, अहसास)। 

संवेदनाओं के अभाव में तो रचनाएँ जन्म ले ही नहीं सकतीं। संवेदना से ही साहित्यकार का अनुभूति कोश समृद्ध होगा। प्रेमचंद्र जैन का अनुभूति कोश बहुत समृद्ध था। वे कोरे भाग्यवाद में विश्वास नहीं रखते थे। उनकी माँ की सीख उनके साथ चलती थी- ‘होकर सुख में मगन न फूले, दुख में कभी न घबरावे।’ वे अकेले चलते गए और लोग उनके साथ चलते गए और कारवां बनता गया -

    आएगा सवेरा 

    अब नहीं हूँ मैं अकेला 

    और जितने दीप हैं 

    मैं सभी में हूँ 

    पी रहा हूँ सब अँधेरा 

    थको तुम मत मीत 

    मृत्यु से भयभीत 

    अमरत्व की श्रम की - 

    सदा ही जीत। (नेह बाती चुक रही है)   

‘गुरु जी’ अपने गुरु शिवप्रसाद सिंह द्वारा प्राप्त गुरुमंत्र को हमें विरासत में दे गए- “चिंताएँ छोड़कर नियति से लड़ो ... लड़ना ही धर्म है। सारा जीवन बन जाए युद्ध। ... तभी मृत्यु का भय भाग जाता है।”   000

संदर्भ ग्रंथ-

शर्मा, ऋषभदेव सं. (2016). निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक. नजीबाबाद : परिलेख         


- डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, सह-संपादक ‘स्रवंति’, असिस्टेंट प्रोफेसर, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, खैरताबाद, हैदराबाद- 500004, ईमेल: neerajagkonda@gmail.com 

द्रष्टव्य: इतिहास हुआ एक अध्यापक/ संपादक- दानिश सैफ़ी/ अविचल प्रकाशन, ऊँचा पुल हल्द्वानी-263139/ 2022/ पृष्ठ 334-340.


गुरुवार, 14 अप्रैल 2022

(प्रो. गोपाल शर्मा) पुरुष कहाणी हौं कहौं जसु पत्थावे पुन्नु

पुरुष कहाणी हौं कहौं जसु पत्थावे पुन्नु 

(अपभ्रंश कथाकाव्य से हिंदी प्रेमाख्यानक तक)

  • गोपाल शर्मा 

“सिद्ध, नाथों और जैन कवियों, रासउ रचनाकारों आदि के कृतित्व में आदिकाल हिंदी क्षेत्र के रचनात्मक वैविध्य को यौं अपनी सच्ची प्रस्तावना प्रस्तुत करता है।” यदि मेरी तरह आपको भी आचार्य रामस्वरूप चतुर्वेदी के द्वारा अनुत्तरित छोड़ दिये गए  ‘यौं’ का निहितार्थ जानने की इच्छा है तो  उस कालावधि में जाना होगा जब हिंदी साहित्य बनना शुरू हुआ था। भारतीय पांडित्य ईसा की एक सहस्राब्दी के पश्चात आचार-विचार और भाषा के क्षेत्र में लोक की ओर झुकता चला गया था । इसका परिचय अपभ्रंश या लोकभाषा की कविता में मिल सकता है। अपभ्रंश के पाणिनी जर्मन वैयाकरण  रिचर्ड पिशेल (1849-1908) ने ‘माटेरियालियन सुर केंटिश डेस अपभ्रंश’(1902) में इस भाषा की अनेक रचनाओं का उल्लेख करते समय यह चिंता व्यक्त की थी कि अपभ्रंश का साहित्य एकदम खो गया सा लगता है । फिर डॉ. हरमन याकोबी ने 1912 में अनेक ग्रन्थों को प्राप्त किया  और स्वतन्त्रता के मिलते मिलते तो अनगिनत  पांडुलिपियाँ मिलती चली गईं । एक नए आख्यान से साक्षात्कार हुआ जिसका सघन पाठ विद्वानों के द्वारा ज्ञान के नए आगार खोलता चला गया। 

इक्कीसवीं  शताब्दी के चार चरणों में से एक के लगभग बीत जाने पर  भी आज के गंभीर अध्येता के लिए प्रेमाख्यान के प्रति बालसुलभ उत्सुकता होना स्वाभाविक है। कथाकाव्य के प्रति तो जिज्ञासा रहती ही है । किन्तु जैसे ही इन दोनों पदों से पूर्व ‘अपभ्रंश’ आकर पसर  जाता  है तो कोई नामवर ही टिक सकता है । अब तो इस विषय को जाँचने वाले परीक्षक तक न मिल सकेंगे। यदि कोई जिज्ञासावश या ज्ञानार्जन हेतु इन तीन बीज शब्दों को ‘गूगलार्पित’ करे तो उसे एक पुस्तक दिखाई देगी जिसका प्रथम पृष्ठ गायब होगा । यह भी पता चल सकेगा कि 16 एम बी स्थान घेरने वाली 382 पृष्ठ की इन बीज शब्दों के द्वारा उपलब्ध  पुस्तक बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी द्वारा पीएच. डी. की उपाधि के लिए स्वीकृत शोध प्रबंध है  (Digital Library of India Item 2015.347734) और इसके लेखक डॉ. प्रेमचन्द्र जैन हैं । डॉ. जैन ने “रहस्यवादी जैन अपभ्रंश काव्य का हिंदी पर प्रभाव” (वाणी प्रकाशन से 1991 में प्रकाशित) एम. ए. लघु शोध प्रबंध लिखकर अपने गुरु से कहलवाया था  कि ‘इस कार्य के  पीछे एक अद्भुत निष्ठा और फलाकांक्षा बिना निरंतर कार्य करते जाने की निष्कामता विद्यमान रही’ और फिर उन्हें ‘इस अभियान के प्रथम सेनानी’ होने का विरुद प्राप्त हुआ। डॉ. प्रेमचंद जैन ने अपने शिक्षा गुरु डॉ. शिव प्रसाद सिंह और उन्होंने अपने गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के सपनों को ‘तटस्थ भाव से’  पूरा किया और होते देखा। 

उनकी  यह  कृति  पाठक को उस काल में ले जाती  है जिसे हिंदी साहित्य के इतिहास में आदि काल, आरंभिक काल,  वीरगाथा काल, वीर काल, चारण काल, बीजवपन काल, सिद्ध सामंत काल आदि कई नामों से पुकारा जाता है । इस समय का साहित्य मुख्यतः सिद्ध-साहित्य तथा नाथ-साहित्य, जैन-साहित्य, चारणी साहित्य, रासो साहित्य  और प्रकीर्णक साहित्य रूपों में मिलता है। यह काल अपभ्रंश काल का विकास ही है, पर भाषा की दृष्टि से यह परिनिष्ठित- अपभ्रंश से आगे बढ़ी हुई भाषा की सूचना भी  देता है।

इस विवेचनापूर्ण ग्रंथ के पारायण का नवनीत-प्रसाद यह आलेख है । यह डॉ. प्रेमचंद जैन का पाठ इस दृष्टि से है कि इसमें एक ओर तो इस लुप्त होते जा रहे विषय पर प्रामाणिक शोधपरक सामग्री का उपयोग है, दूसरी ओर इस आलेख के पाठक के लिए भविष्य में अध्ययन के लिए दिग्दर्शन और दिशाबोध  है। शोधार्थी की गवेषणात्मक दृष्टि का कायल होने के लिए आपको यह जानने की आवश्यकता चाहे न भी हो कि यह कार्य किसके निर्देशन में सम्पन्न हुआ और इस शोध प्रबंध का शीर्षक क्या था , फिर भी यह ज्ञान आपको हो ही जाएगा । 

     कुछ  हिचकिचाहट से ही सही किन्तु बहुत से विद्वान यह मानते हैं कि अपभ्रंश कथाकाव्यों की परंपरा का विकास ही हिंदी के प्रेमाख्यानक काव्य हैं।  परंतु अपभ्रंश के कथा-काव्य   अधिकतर जैन कवियों के द्वारा लिखे जाने के कारण उन्हें बहुत समय तक ‘धार्मिक’ ग्रंथ माना जाता रहा था। अनेक मुसलमान कवियों द्वारा फारसी कविता परंपरा को अपनाते हुए लिखे गए ग्रन्थों को भी ‘सूफी’ मत से जोड़कर देखते रहे । इन परम्पराओं से हट कर भी कई प्रेमाख्यानक काव्य मिले किन्तु उन पर शोधपरक दृष्टि डालने वाले विद्वानों ने सावधानी से सतर्क दृष्टि प्रायः नहीं ही डाली। इस कार्य का सफल निष्पादन डॉ. प्रेमचंद्र जैन द्वारा हुआ। वे लगभग 5 वर्ष तक तो शोध कार्य ही करते रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि वे एक लंबी परंपरा का संधान कर सके। इस परंपरा के संधान का संधान मेरा लक्ष्य नहीं, मेरा लक्ष्य है ‘प्रेम’ के प्रति आपकी सहजात जिज्ञासा और ‘प्रेम’चंद्र के प्रति आपकी सहज श्रद्धा को समझते हुए यह जानकर सुख प्राप्त कर लूँ कि क्या हिंदी का प्रेमाख्यान साहित्य भी पूर्व प्रेमाख्यानों की शृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी है । क्या विश्व साहित्य में जिस प्रकार प्रेमाधारित ‘रोमांस’ का जिक्र होता है , वैसा ही कुछ यहाँ भी द्रष्टव्य है ? 

‘अर्धकथानक’ (1641) के प्रणेता बनारसी दास ने अपने जमाने में मनोरंजन के व्यक्तिगत साधनों का वर्णन करते हुए संकेत किया था कि कुछ लोग प्रेमकथाओं को बाँचकर अथवा दूसरों से सुनकर भी अपना समय बिताया करते थे । 

तब घर में बैठे रहें , जांहि न हाट  बाज़ार । 

मधुमालति मिरगावति, पोथी दोई उदार ॥ 335 ॥ 

इन कथाओं की सत्रहवीं शताब्दी में जब मांग इतनी थी तभी तो  श्रीमाल जैन परिवार के आगरा निवासी बनारसीदास  जिन्हें कम उम्र में ही ‘आसिखी’ अर्थात इश्कबाज़ी और ‘लिखत-पढ़त’ का शौक लग गया था उन्होंने एक के बाद एक चार किताबें लिखकर दिखाईं ।  यह वह लेखन परंपरा थी जिसका संधान करने के लिए डॉ. जैन संस्कृत की कथा-आख्यायिकाओं से शुरू करके जैन-ग्रन्थों से होते हुए और सूफी मत से प्रभावित कथानकों के गुजरते हुए  ‘अर्धकथानक’ तक आते हैं या यह भी कह सकते हैं कि ‘अर्धकथानक’ से शुरू करके अतीत के व्यतीत  से वर्तमान की गति तक आते हैं । 

हिंदी प्रेमाख्यानों की वर्णन परिपाटी की लीक पर चलकर लिखे गए अपभ्रंश कथाकाव्यों की कथानक रूढ़ियों को पढ़ने का अभ्यस्त हुए पाठक स्त्री के नख शिख वर्णन और पुरुष के शौर्य युक्त क्रिया कलापों को पढ़कर मुग्ध होता रहा है । वेश्यागामी के शब्द चित्र उसे लुभाते रहे हैं । डॉ. जैन ने सही कहा है, “हिंदी प्रेमाख्यानक अपनी सम्पूर्ण आत्मा और कलेवरगत विशिष्टताओं के कारण हमारे साहित्य की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है । इस काव्य रूप के भीतर प्राचीन और नवीन अनेक प्रकार के तत्वों का मिश्रण हुआ है । यह मिश्रण इस काव्य रूप को पुराने काव्यरूपों के जोड़-तोड़ से बना एक अलग काव्य रूप ही नहीं बनाता बल्कि इस मिश्रण की रासायनिक प्रक्रिया ने हिंदी प्रेमाख्यानक के रूप में एक ऐसी विधा (फॉर्म) को जन्म दिया जो किंचित पुराने उपदानों को स्वीकार करते हुए भी नई लोकात्मक भाव-भूमियों का स्पर्श करने वाली बिल्कुल विलक्षण शिल्पभंगिमा वाली वस्तु बन गई “ (पृष्ठ 344)। 

“अपभ्रंश कथाकाव्यों का हिन्दी प्रेमाख्यानों के शिल्प पर प्रभाव” शीर्षक द्वारा शोधोपाधि के निमित्त प्रस्तुत डॉ प्रेमचंद्र जैन के इस प्रबंध के सात अध्यायों में शिल्पगत अध्ययन से “उनमें पायी जाने वाली कथानकगत एवं काव्यगत रूढ़ियों का, विभिन्न श्रेणियों के अभिप्रायों का तथा प्रतीकों का बहुत अच्छा विश्लेषण किया है और एक लंबी परंपरा का संधान पाया है” हजारी प्रसाद द्विवेदी (पुस्तक का प्राक्कथन, वाराणसी, 16-6-73)। वस्तुतः भारतीय साहित्य में ही नहीं अपितु विषय साहित्य में प्रेम प्रसंग अधिकांश काव्यों की विषय वस्तु रहा है। भारतीय साहित्य में वैदिक काल से अब तक प्रेम को लेकर अबाध गति से चर्चा हुई है । आख्यानक, चरित, चंपू एवं कथा काव्यों से लेकर उपन्यास , कहानी और वार्ताएं तक लिखी गईं। हिंदी का प्रेमाख्यानक साहित्य भी पूर्व प्रेमाख्यानकों के साथ जोड़ा जाता है । इन प्रेम-कथानकों में कथा का आधार लोक से मिलता रहा है। हिंदी के आम पाठकों को लगता है कि हिंदी प्रेमाख्यानों का प्रारम्भ हिंदी के रासो ग्रन्थों से हुआ होगा और पृथ्वीराज रासो इस परंपरा का मुखर वक्तव्य है। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी (हिंदी साहित्य , पृष्ठ 261) ने भी यही माना है, “ मूलतः ये सभी प्रेम कथानक हैं। इनमें प्रेम कथानकों की सभी विशेषताएँ प्राप्त होती हैं। अंतर इतना ही है  कि यहाँ नायक की युद्धपटुता और शौर्य प्रदर्शन मुख्य हो गया है और प्रेम व्यापार गौण।” यह ठीक वैसा ही है जैसा पाश्चात्य  जगत में ‘रोमांस’ (आम लोगों के लिए उनकी ही अपरिष्कृत बोली में लिखा गया कथा साहित्य)  साहित्य बारहवीं शताब्दी में फ्रांस से आरंभ होकर यूरोप भर में फैला और जिसका उत्स प्राचीन ग्रीक रोमांसों में ढूंढा गया। वहाँ  कालांतर से रोमांस का अर्थ ही कल्पना और वीरता  से भरी पर यथार्थ से दूर कथा से लिया जाने लगा ।पहली शताब्दी के ग्रीक भाषा में लिखे गए ‘नीनस रोमांस’ से लेकर मिडिल इंग्लिश के स्पेन्सेरियन रोमांसों तक लगभग वही ‘प्रेमाख्यान’ है जो संस्कृत के ‘पुरुरवा-उर्वशी’ से लेकर ‘चन्दप्पहचरिउ’ तक में  है।

हिंदी प्रेमाख्यानों की विशुद्ध भारतीय या हिंदू प्रेमाख्यान और सूफी प्रेमाख्यानक दोनों धाराएँ डॉ. जैन के शोध का आधार रही हैं। साथ ही वे जैन धार्मिक रचनाओं को भी अपने अध्ययन क्षेत्र में लेते हैं। उनका स्पष्ट मत है, “संस्कृत कथाकाव्यों की भांति हिंदी प्रेमाख्यानकों को किसी एक परिभाषा के वृत्त में नहीं घेरा जा सकता। हिंदी प्रेमाख्यान अपनी पृष्ठभूमि में जहां एक ओर भारतीय प्राचीन परंपरा को सुरक्षित रखे हुए हैं, वहाँ दूसरी ओर अभारतीय विशेषकर सूफी परंपरा के प्रभाव  से अछूते नहीं रह सके हैं।”(पृष्ठ 16) । 

‘हिंदी प्रेमाख्यानों का अपना एक निजी और नया काव्यरूप है” मानते हुए वे इनके अध्ययन के लिए ‘अपभ्रंश’ भाषा के ज्ञान की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं । यह वांछनीय भी है क्योंकि हिंदी कविता के खड़ी बोली रूप के चलन से पूर्व उसके मुखयतः छह अंग थे –डिंगल कवियों की वीर गाथाएँ , निर्गुणिया संतों की वाणियाँ , कृष्ण भक्त या रागानुरागा भक्ति मार्ग के साधकों के पद, राम भक्त या वैधी भक्ति मार्ग के उपासकों की कविताएँ, सूफी साधना से पुष्ट मुसलमान कवियों के तथा ऐतिहासिक हिन्दू कवियों के रोमांस और रीति काव्य। इन सभी धाराओं में अपभ्रंश कविता का स्वाभाविक विकास है, ऐसा आचार्य द्विवेदी ने हिंदी साहित्य की भूमिका (1948) में उल्लेख किया है ।आचार्य शुक्ल भी अपने इतिहास के पहले प्रकरण के पहले वाक्य में यही बयान करते हैं – प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिंदी साहित्य का आविर्भाव माना जाता है। वे उसे ‘प्राकृताभास’ कहते हैं। इसी तरह राम स्वरूप चतुर्वेदी भी अपने इतिहास ‘हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास’ की शुरुआत में ही लिख डालते हैं, ‘कई अपभ्रंशों और कई जनपदों का संस्कार हिंदी काव्य भाषा में अंतर्भुक्त हुआ है।’

डॉ. जैन की मान्यता है कि हिंदी प्रेमाख्यानों के शिल्पगठन पर वास्तविक प्रभाव अपभ्रंश कथा काव्यों का पड़ा। वे शिल्प को सिर्फ शैली नहीं मानते बल्कि इसमें कथा की गठन (स्ट्रक्चर) , रूढ़ियाँ (मोटिफ), वस्तुवर्णन, साजसज्जा तथा कथा काव्यों के  पूरे  रचाव को भी शामिल करते हैं । वे प्रभाव को भी व्यापक अर्थ में लेते हुए उसे योगदान से जोड़ते हैं। साथ ही यह भी जोड़ देते हैं कि यह प्रभाव या योगदान "हू –ब –हू उन्हीं की नकल नहीं हैं” (पृष्ठ 97)। डॉ. जैन ने शिल्प का विस्तृत विवेचन करते हुए जो सूत्र रूप में कहा है, वह एक ओर तो उनके पाश्चात्य और भारतीय ‘स्टाइल, टेकनीक, रीति, वृत्ति, स्थापत्य’ आदि पारिभाषिक शब्दों की समझ से आगे की बात है, दूसरे उनके देरिदीय अंतर (differance- यह वर्तनी की भूल नहीं है, पारिभाषिक शब्द है ) को भी रेखांकित करती है । 

शिल्प एक व्यापक शब्द है जिसमें वस्तु के मूल गठन, स्थापन -संगठन, विधा-आकृति, तथा शैली सभी का समावेश हो जाता है। चूंकि यह शब्द केवल कथ्य वस्तु की अभिव्यक्ति– प्रणाली से ही सीमित नहीं है , इसलिए इसे साहित्यिक कोटियों में विभक्त करना भी पूर्णतः संगत न होगा। शिल्प में किसी भी जाति का पूर्णा प्रतिबिंब देखा जा सकता है। भारतीय साहित्य में कथा साहित्य का शिल्प भारतीय मानस की मनोवृत्ति का परिचायक है । सूफी आख्यानों में इसी कारण शुद्ध भारतीय शिल्प से किंचित भिन्न मनोवृत्ति का रूप दिखाई पड़ता है। (पृष्ठ 109)

आज के पाठक को शिल्प की ठीक-ठाक   समझ हो, इससे तो किसी को इंकार न हो सकेगा । डॉ. जैन ने शिल्प के व्यापक अर्थ को ग्रहण करने की चेष्टा करते हुए अनुशंसा की है – 

शिल्प के अंतर्गत शैली, काव्यरूप, कथाविन्यास और कथातत्वों को भी समाविष्ट करना चाहिए। यद्यपि वट वृक्ष का बीज़ अत्यधिक सूक्ष्म होता है तथापि उसके अंदर एक विशाल वट वृक्ष का रूप छिपा रहता है। ठीक वैसे ही ‘शिल्प’ शब्द के उल्लेख मात्र से रचना (कथा वार्ता, चरित, आख्यान, आदि) की रचना प्रक्रिया का – भाव से अभिव्यक्ति और उसके माध्यम तक की रचना प्रक्रिया का बोध होता है। मानव शरीर पृथ्वी, जल , वायु और आकाश पाँच तत्वों से निर्मित होता है, हाथ पैर, आँख, कान आदि उसके अंग-प्रत्यंग होते हैं, यदि शरीर का एक भी अंग-भंग है तो वह पूर्ण सुख से वंचित रहेगा। कथा का निर्माण भी अलग अलग तत्वों के मेल से होता है। कथा के उन तत्वों में से यदि किसी तत्व का शिल्प गठन कमजोर हुआ तो वही कथा का दोष बन जाएगा। दूसरे शब्दों में यह कि कथा के विभिन्न अंगों में सामंजस्य ही कथा को प्रभावोत्पादक और ग्राह्य बनाता है। कथा को विभिन्न तत्वों के माध्यम से उसकी पूर्णता को समझने का एक शिल्प होता है (पृष्ठ 117)। 

एक महत्वपूर्ण बात जो डॉ. जैन ने कही है वह प्रतीकों के प्रयोग के संबंध में है। प्रतीक भारतीय दर्शन , धर्म, और शास्त्रों के बहुपरिचित तत्व हैं जिनका उपयोग हमारे देश में ऋग्वेद से लेकर आज तक अनेक रूपों में होता रहा है। हाँ, दार्शनिक प्रतीकों को काव्य का अनिवार्य उपादान बनाने की सायास कोशिश नहीं की गई। वे इस बात को कहते ही नहीं  ज़ोर देकर दुहराते  हैं  कि प्रतीकों  की अपनी एक भारतीय परंपरा थी जो वैदिक  काल से सूफी काव्यों के समय तथा उसके बाद यानी आज तक चली आ रही है। उन्हीं के शब्द हैं – पुनः मैं इस बात को दोहराना चाहूँगा कि सूफियों की रचनाओं पर भारतीयता की छाप विदेशीपन की अपेक्षा कहीं अधिक है।  ...यदि बिना आयस के हमें वेदों में भी अपनी बात की पुष्टि मिलती है और उससे हमारी शृंखला विघटित होने से बच जाती है तो निरर्थक क्या है? हाँ , हमें तथ्यों को नकारने भर का दुःसाहस नहीं करना चाहिए। (पृष्ठ 194)। 

वे यह बात एक ओर तो डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल जैसे मूर्धन्य विद्वानों के विवेचन (कादम्बरी : एक सांस्कृतिक अध्ययन) को आधार और प्रमाण मानते हैं दूसरी ओर स्वयं ‘मयणपराजयचरिउ’ आदि ग्रन्थों से प्रमाण प्रस्तुत करते हुए सूफी कथाकाव्यों की प्रतीक पद्यति को अपभ्रंश कथा काव्यों की प्रतीक पद्धति से जोड़ते हैं। 

कथा-विन्यास , चरित, कथा के उद्देश्य, वस्तु वर्णन, कथाभिप्राय (मोटिफ), निजंधरी तत्व, मंगलाचरण, सर्गनिबंध, ऋतु वर्णन, छन्दप्रयोग तथा  कथा को भराव देने वाले जीवन के विभिन्न तत्व, खेल-क्रीडा, मनोरंजन आदि सांस्कृतिक मनबहलाव के साधनों के वर्णन में अपभ्रंश और हिंदी प्रेमाख्यानों में बहुतेरी समानताएं हैं। दोनों के बीच समानधर्मा प्रवृत्तियों के उदघाटन के इस अनुष्ठान के पाठ से कुछ नए क्षितिज तो उद्घाटित होते ही हैं यह भी रेखांकित होता है कि भारतीय प्रेमाख्यानक सम्पूर्ण एशियाई संस्कृति की प्रतिफलन पीठिका हैं। और जैसा डॉ जैन के सुयोग्य शोध निर्देशक डॉ शिवप्रसाद सिंह ने अपनी पुस्तक ‘रसरतन की भूमिका’ (पृष्ठ 73) में लिखा है और जिसे डॉ जैन ने अपने प्रबंध की ‘प्रास्ताविक’ में उद्धृत किया है वह कथन इस ग्रंथ के लेखक के लिए तो मार्ग दर्शक रहा ही , आज के पाठक को भी गर्व से भर देगा, “भारतीय प्रेमाख्यानक में अनुस्यूत तत्वों के समाजशास्त्रीय, पुरातात्विक और ऐतिहासिक अध्ययन का अभी आरंभ ही हुआ है । यह विपुल गईं राशि अनेकानेक सुधीजनों  के श्रम और शक्ति का आह्वान करती है।” (पृष्ठ 5)।   

किन्तु वह ‘श्रम और शक्ति’ जिसकी दरकार इस लेखन के लिए है, वह अब कहाँ है? क्योंकि जो यहाँ है वह केवल सहेज कर अलमारी में रखने या स्कैन करके  ‘क्लाउड’ में रखने मात्र के लिए नहीं है। यह कृति पारायण मांगती है , पाठ की अभिलाषा रखती है । क्योंकि इस पाठ से ही ज्ञात होता है कि कहाँ क्या रहा  है और है।  पाश्चात्य जगत में अँग्रेजी के प्रसिद्ध कवि टी एस एलियट ने भोक्ता और रचयिता के अलगाव को श्रेष्ठ काव्य रचना के लिए एक जरूरी शर्त माना है किन्तु भारतीय परंपरा के जैन कवियों ने अपभ्रंश कथाकाव्यों में जैन धर्म के निवृत्ति मार्ग की अपेक्षा लोक पक्ष और परलोक पक्ष का संतुलन और समन्वय है। डॉ जैन के शब्दों में, “अपभ्रंश काव्यों में लौकिक आनंद की दृष्टि से एक ओर शृंगारी पक्ष का चमत्कार मिलेगा तो दूसरी ओर संयम की यथार्थता का बयान भी” (पृष्ठ 214)। डॉ जैन ने महापंडित राहुल सांकृत्यायन आदि के खोजपूर्ण कार्य को आगे बढ़ाया। अनेक अन्य विद्वानों के निष्पक्ष वक्तव्यों से अपभ्रंश साहित्य की प्रतिष्ठा की। यह तर्क भी दिया कि यदि जैनेतर कहानियों की धार्मिक रचनाएँ कथा-कोटि में रखी जा सकती हैं तो न्यायोचित यही है कि हमें पक्षपात रहित होकर अपभ्रंश कथाकाव्यों की धार्मिक रचनाओं पर विचार करना चाहिए। आचार्य शुक्ल ने अपने इतिहास में कुछेक रचनाओं को धार्मिक कहकर परे सरका दिया था किन्तु आचार्य द्विवेदी ने ऐसी मनोभावना को व्यर्थ मानते हुए कहा कि धार्मिक प्रेरणा या आध्यात्मिक उपदेश होना काव्यत्व का बाधक नहीं समझा जाना चाहिए। इसी मत को डॉ जैन ने पल्लवित किया। उनका मानना है कि कथाकाव्य के अंतर्गत रास, चरित, पुराण, के अतिरिक्त धर्म कथाओं तथा कथात्मक काव्यों का भी समावेश किया जाना चाहिए। उन्ही के शब्दों में- असल में जो लोग सिर्फ इतना जानते हैं कि जैन धर्म निवृत्ति मार्ग का पोषक है, वे ही जैन धर्म की अपूर्ण जानकारी होने के कारण धर्म एवं साहित्य पर अनेक दोषारोपण थोपते हैं। जैन साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि उसमें भारतीय कला, विद्या एवं अन्य लोक पक्ष अथवा परलोक पक्ष आदि विषयों के अंतर्गत एक व्यवस्थित अध्ययन प्रस्तुत किया गया है (पृष्ठ 213)। कथा और प्रबंध को किस प्रकार छंदोबद्ध करके प्रस्तुत किया गया इसका उल्लेख समयसुंदर( सीताराम चउपइ) की पंक्तियाँ देकर डॉ. जैन ने संकेत में ही बता दिया है - 

साँव पजुनक कथा सरस प्रत्येक बुद्ध प्रबंध । 

नलदमयंती मृगावती चउपई चार संबंध ॥ 

डॉ. जैन ने हिंदी प्रेमाख्यानकों की कथानक रूढ़ियों और अपभ्रंश काव्यों की रूढ़ियों का विस्तार से वर्णन विवेचन और विश्लेषण किया है । यह तो रेखांकित किया ही गया है कि अनेक कथानक रूढ़ियाँ संस्कृत साहित्य से ज्यों की त्यों पहले अपभ्रंश में और फिर हिंदी  में आ गईं। यह भी बताया कि अनेक तत्कालीन लोक मानस की उपज हैं। एक उदाहरण देना मेरी चपलता न समझी जाए तो मैं ‘दोहद’ का उदाहरण  दूंगा। भारतीय मान्यता में ‘दोहद’ किसी गर्भिणी स्त्री की इच्छा है। इस संकेत को समझते हुए डॉ. जैन के उस कथन की ओर दृष्टिपात करना श्रेयष्कर है, “हिंदी प्रेमाख्यानकों की वर्णन परिपाटी अपभ्रंश कथाकाव्यों की नींव पर ही खड़ी हुई। कुछ कथानकों को उदाहरण स्वरूप सामने रखकर विचार करने पर वर्णन परिपाटी का प्रश्न और भी  स्पष्ट हो जाएगा। हिंदी प्रेमाख्यानकों का शिल्प अपभ्रंश कथा काव्यों के शिल्प का ही ऐतिहासिक विकास है (पृष्ठ 342)। 

अपभ्रंश और हिन्दी के प्रेमाख्यानकों के इस अध्ययन के पाठ से यह समझ में आता है कि हिंदी की जननी भाषा अपभ्रंश ने लोकभाषा के रूप में अपना स्थान ही नहीं बनाया था बल्कि सर्जनात्मक रूप से भी इसे समृद्ध किया । पालि, प्राकृत, और संस्कृत की तुलना में अपभ्रंश भाषा कहीं अधिक लोकजीवनसंपृक्त भाषा रही। इसका पूरा कथा-साहित्य विशेषकर प्रेमाश्रित कथा-साहित्य इसी लोकमानस की देन है। अपभ्रंश कथा में ग्रहीत लक्षण आगे चलकर हिंदी के प्रेमाख्यानकों में पूरी तरह विकसित और पल्लवित हुए। अपभ्रंश के काव्यरूपों ने हिंदी में विकास पाया । 

संदर्भ –

अपभ्रंश कथाकाव्य एवं हिंदी प्रेमाख्यानक (1973) 

लेखक –डॉ प्रेमचंद्र जैन , एम ए पी-एच.डी. 

प्रकाशक – सोहनलाल जैनधर्म प्रचारक समिति, अमृतसर 

प्राप्ति-स्थान -  पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संस्थान, वाराणसी -5 

  • प्रो. गोपाल शर्मा, अरबा मींच यूनिवर्सिटी, इथोपिया prof.gopalsharma@gmail.com 

द्रष्टव्य- 

इतिहास हुआ एक अध्यापक/ संपादक- दानिश सैफ़ी/ अविचल प्रकाशन, ऊँचा पुल हल्द्वानी-263139/ 2022/ पृष्ठ 135-142.