गुरुवार, 10 जनवरी 2013

हिंदी केवल भाषा नहीं, हमारी संस्कृति है - ऋषभ देव शर्मा

'भाषा में संस्कृति' पर 

ऋषभ देव शर्मा का व्याख्यान संपन्न 

सीपत [बिलासपुर,छत्तीसगढ़], 8 जनवरी, 2013 .

एनटीपीसी लिमिटेड, सीपत के मानव संसाधन–राजभाषा अनुभाग के तत्वावधान में आज यहाँ 2 विशेष हिंदी कार्यशालाओं का आयोजन  क्रमशः परियोजना के वरिष्ठ अधिकारियों तथा बॉयलर अनुरक्षण विभाग के कर्मचारियों हेतु किया गया। इन कार्यशालाओं का विधिवत उद्घाटन कार्यकारी निदेशक (सीपत) श्री वाई.वी. राव के करकमलों से संपन्न हुआ। संकाय सदस्य के रूप में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद के विश्वविद्यालय विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष डॉ. ऋषभदेव शर्मा सादर आमंत्रित थे। 

सर्वप्रथम कार्यकारी निदेशक (सीपत) श्री वाई.वी. राव द्वारा डॉ. ऋषभदेव शर्मा का स्वागत पुष्पगुच्छ से किया गया। तत्पश्चात् श्री अरविंद कुमार भारद्वाज, अपर महाप्रबंधक (मानव संसाधन) ने श्री राव साहब का स्वागत किया। कार्यकारी निदेशक (सीपत) श्री राव ने अपने संबोधन में डॉ. शर्मा का सीपत परियोजना की ओर से स्वागत करते हुए कहा कि हिंदी कार्यशालाओं से हमारे कर्मचारियों को राजभाषा में कार्यालयीन कामकाज करने हेतु एक नई ऊर्जा प्राप्त होती है तथा इससे राजभाषा कार्यान्वयन को भी अत्यधिक बल मिलता है। उन्होंने डॉ. शर्मा को एनटीपीसी सीपत की ओर से पारंपरिक अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया। 

कार्यशाला के अंतर्गत अपने चिंतनपरक व्याख्यान ''भाषा में संस्कृति'' में प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा ने राजभाषा हिंदी के विकासात्मक चरणों पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए प्रतिभागियों को हिंदी के प्रयोग की प्रेरणा देते हुए कहा कि हिंदी भाषा केवल एक भाषा ही नहीं, अपितु यह हमारी संस्कृति का द्योतक भी है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक भाषा की अपनी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि ही नहीं अपनी संस्कृति होती है जिसके द्वारा उसके प्रयोक्ता समाज के सांस्कृतिक व्यक्तित्व का निर्माण होता है। अतः हर भाषा हमारे लिए समादरणीय है। प्रो.शर्मा ने अनेक उदाहरण देकर यह दर्शाया कि हिंदी में एक विशिष्ट शिष्टाचार और लोकव्यवहार अंतर्गुंफित है। राजभाषा के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने कहा कि भारत संघ की राजभाषा राष्ट्र को जोड़ने का कार्य करती है। उन्होंने अनुवाद पर आश्रित कृत्रिम हिंदी की अपेक्षा बोलचाल की हिंदी को कार्यालय के कामकाज में अपनाने का आह्वान करते हुए भवानी प्रसाद मिश्र के इस आदर्श को आचरण में उतारने की बात कही कि ''जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख, और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख।''

डॉ. शर्मा जी ने कार्यशाला में सम्‍मिलित प्रतिभागियों के अनुरोध पर अपनी कुछ मौलिक काव्य-रचनाओं का पाठ कर लोगों को मन्त्रमुग्ध कर दिया। अंत में श्री अविनाश पाठक, राजभाषा अधिकारी द्वारा धन्यवाद ज्ञापन से कार्यशाला का समापन हुआ।

[प्रस्तुति- रमा कांत सिंह चंदेल, एन टीपी सी, सीपत,बिलासपुर,छत्तीसगढ़]