शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

ज्ञानपीठ पुरस्कृत साहित्यकारों पर राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

दीप-प्रज्वलन : [दाएँ से] डॉ. रेणु शुक्ल, डॉ. आरसु, डॉ. ऋषभ देव शर्मा, डॉ. विनय यादव, डॉ. कोयल विश्वास .

बीज भाषण : प्रो. ऋषभ देव शर्मा 

बैंगलूर, 22 फरवरी, 2013. 

‘रेवा विज्ञान एवं प्रबंधन संस्थान’ बैंगलूर के हिंदी विभाग के तत्वावधान में हिंदी के ज्ञानपीठ पुरस्कृत चार साहित्यकारों पर एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई जिसमें सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, अज्ञेय और निर्मल वर्मा के भारतीय साहित्य को योगदान पर प्रकाश डाला गया. उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता संस्थान के अध्यक्ष पी.श्यामराजु ने की. मुख्य अतिथि के रूप में प्रो.आरसु (कालीकट) ने भारतीय संस्कृति और भारतीयता को बांसुरी के दृष्टांत द्वारा समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार कई सारे छेद मिलकर एक संगीत की सृष्टि करते हैं उसी प्रकार सारी भारतीय भाषाएँ मिलकर भारतीय साहित्य रूपी सरगम का निर्माण करती हैं. प्रो.ऋषभ देव शर्मा (हैदराबाद) ने बीज भाषण में हिंदी के ज्ञानपीठ पुरस्कृत साहित्यकारों की भारतीय चेतना को रेखांकित किया और समय तथा समाज से उनके जुड़ाव को उनकी कालजयी कीर्ति का आधार बताया. प्राचार्य डॉ.एन.रमेश और प्राचार्या डॉ.बीना ने विज्ञान और प्रबंधन के युग में साहित्य की प्रासंगिकता और मूल्यवत्ता की चर्चा की. 

राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रथम सत्र में प्रो.आरसु ने ‘प्रकृति सत्य और मानवीय सत्य : चिदंबरा के अमृत घट में’ विषय पर तथा डॉ.रेणु शुक्ला (बैंगलूर) ने ‘अज्ञेय के साहित्य का सामाजिक संदर्भ’ विषय पर शोध पत्र प्रस्तुत किए. अध्यक्षीय भाषण में प्रो.ऋषभ देव शर्मा ने पंत और अज्ञेय की वैचारिकता के निर्माण में देशी–विदेशी विचारधाराओं के योगदान की चर्चा करते हुए इन कवियों को युगप्रवर्तक साहित्यकार बताया. 

प्रो. ऋषभ देव शर्मा का सारस्वत सम्मान करते हुए प्राचार्य डॉ.बीना 
द्वितीय सत्र में भी दो शोध पत्र प्रस्तुत किया गए. डॉ.विनय कुमार यादव ने ‘निर्मल वर्मा का युगबोध : रात का रिपोर्टर’ पर तथा प्रो.ऋषभ देव शर्मा ने ‘महादेवी वर्मा के साहित्य में लोकतत्व’ पर प्रकाश डाला. अध्यक्षता करते हुए प्रो.आरसु ने कहा कि लोकतत्व की दृष्टि से महादेवी के साहित्य का मूल्यांकन लीक से हटकर सर्वथा मौलिक चिंतन का द्योतक है. उन्होंने ‘रात का रिपोर्टर’ में चित्रित मानसिक घुटन की तुलना वर्तमान मीडिया जगत पर पड़ रहे राजनैतिक और व्यावसायिक दबावों  से करते हुए कहा कि निर्मल वर्मा ने इसका प्रामाणिक चित्रण किया है. 

समाकलन सत्र की अध्यक्षता प्रो. एन.रमेश ने की तथा डॉ.बीना ने अतिथि विद्वानों का स्वागत-सत्कार किया. इस अवसर पर ज्ञानपीठ पुरस्कृत साहित्यकारों से संबंधित वीडियो भी प्रदर्शित किए गए. विभिन्न सत्रों का संयोजन संगोष्ठी की सूत्रधार डॉ. रत्न प्रभा दास और उनके सहयोगियों निशा भारद्वाज, कोयल विश्वास, लता माली और एम.वसंत ने सफलतापूर्व किया. रेवा विश्वविद्यालय के छात्रों के अतिरिक्त बैंगलूर के विभिन्न महाविद्यालयों के पाध्यापक, शोधार्थी और छात्रों की उपस्थिति ने आयोजन को गरिमा प्रदान की. 

प्रस्तुति – डॉ.गुर्रमकोंडा नीरजा