मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

(डॉ. रक्षा मेहता का आलेख) विसंगति और विडंबना के विलक्षण चितेरे - श्रीलाल शुक्ल



जन्मशती पर विशेष आलेख :
विसंगति और विडंबना के विलक्षण चितेरे 
श्रीलाल शुक्ल

'श्रीलाल शुक्ल' और' व्यंग्य' मानो एक-दूसरे के पर्याय हों। जिस प्रकार सुगंध बिना पुष्प व्यर्थ है, चमक बिना मोती व्यर्थ है, चाँदनी बिना चाँद व्यर्थ है, ठीक उसी प्रकार 'श्रीलाल शुक्ल' के बिना साहित्य संसार में व्यंग्य व्यर्थ है, अस्तित्वहीन है, निरर्थक है, बेमानी है। कोई भी साहित्य-प्रेमी 'शुक्लजी' की रचनाओं के बिना व्यंग्य की कल्पना भी नहीं कर सकता।

31 दिसंबर, 1925 को जन्मे श्रीलाल शुक्ल समकालीन कथा साहित्य में सशक्त, सटीक व अत्यंत प्रभावशाली व्यंग्य लेखन के लिए सुविख्यात साहित्यकार हैं। ‘विसंगति' तथा ‘विडंबना' प्रत्येक साहित्यकार, कला-मर्मज्ञ‍ तथा दार्शनिक को विचलित करती हैं तथा प्रत्येक काल में अनेकानेक बुद्धिजीवियों ने राजनीति, समाज तथा धर्म में व्याप्त विसंगतियों तथा विडंबनाओं के प्रति अपने-अपने ढंग से चिंता जताई है और क्रोध व आक्रोश व्यक्त किया है, किंतु विसंगति तथा विडंबना को देखने, समझने तथा अनुभूत करने का 'शुक्ल' जी का अंदाज़ सभी से विलक्षण है। यही कारण है कि हम सब उन्हें 'विसंगति और विडंबना के विलक्षण चितेरे' मानते हैं।

'शुक्ल' जी का नाम आते ही मनस पटल पर सबसे पहले जो रचना अपने रंग बिखेर देती है, वह है - राग दरबारी। शायद ही ऐसा कोई साहित्य-प्रेमी होगा, जिसने 'राग दरबारी' न सुना-पढ़ा हो। इस उपन्यास का नाम लेते ही हम सब ‘शिवपालगंज’ पहुँच जाते हैं। जहाँ भ्रष्टाचार रूपी राक्षस न केवल मनुष्य को दबोचे बैठा है अपितु समस्त राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक व आर्थिक व्यवस्था के साथ-साथ समूचे शिक्षा-तंत्र को निगलने के लिए तैयार है। दुनियाभर की गंदगी तथा धूल-धक्कड़ से पटे पड़े शिवपाल गंज की मिठाइयों का वर्णन अत्यंत व्यंग्यात्मक ढंग से करते हुए शुक्ल जी लिखते हैं-

"वे हमारे देसी कारीगरों के हस्तकौशल और उनकी वैज्ञानिक दक्षता का सबूत देती थीं। वे बताती थीं, कि हमें एक अच्छा रेज़र-ब्लेड बनाने का नुस्खा भले ही न मालूम हो, पर कूड़े को स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों में बदल देने की तरकीब सारी दुनिया में अकेले हमीं को आती है।"

ऐसा करारा व्यंग्य, जो पाठक को जहाँ एक ओर गुदगुदा देता है, वहीं दूसरी ओर यह सोचने पर भी बाध्य करता है कि हमारे देश के पिछड़े गाँव, जो मिठाइयों के नाम पर ज़हर खा कर अपनी खुशियाँ मना रहे हैं, उन्हें स्वस्थ जीवन जीने का अधिकार आखिर कैसे प्राप्त होगा? प्रशासन की विडंबना का पर्दाफ़ाश करने के लिए शुक्ल जी का केवल एक वाक्य ही पर्याप्त है-

"स्टेशन वैगन से एक अफ़सरनुमा चपरासी और चपरासीनुमा अफ़सर उतरे।"

व्यंग्यात्मकता का यह चरमोत्कर्ष हम सबको अवाक् कर देता है।

समूची शिक्षा प्रणाली की दुर्गति की अभिव्यक्ति केवल इस एक वाक्य में सहज ही हो जाती है-

"वर्तमान शिक्षा पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है, जिसे कोई भी लात मार सकता है।"

आम जनता का नेतृत्व करने वाले नेता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सभी को एक दृष्टि से देखे। 'राग दरबारी' के रुप्पन बाबू भी सभी को एक निगाह से देखते थे। थाने में दारोगा और हवालात में बैठा हुआ चोर,  दोनों उनकी निगाह में एक थे। उसी तरह इम्तहान में नकल करने वाला विद्यार्थी और कॉलेज के प्रिंसीपल उनकी निगाह में एक थे।

राजनीति तथा समाज में व्याप्त ऐसी विसंगति, विडंबना तथा कुरूपता को इतने विलक्षण अंदाज में प्रस्तुत करने का कौशल 'शुक्ल जी' के अलावा भला और किस व्यंग्यकार में हो सकता है? राजनीतिक तथा सामाजिक व्यवस्था पर तीखा व करारा व्यंग्य करता हुआ उनका उपन्यास ‘बिस्रामपुर  का संत’, मानवीय विसंगतियों, कुंठाओं व चरमराती सामाजिक व्यवस्था पर आधारित उपन्यास 'आदमी का ज़हर', शहरी जीवन के प्रति ललक, संघर्ष तथा मानवीय मूल्यों की गिरावट पर आधारित उपन्यास 'मकान', सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन के अंतर्द्वंद्व पर आधारित उपन्यास 'अज्ञातवास' शुक्ल की बेजोड़ साहित्यिक कृतियाँ हैं।

उनकी कुछ सुप्रसिद्ध कहानियाँ हैं- इस उम्र में, इतिहास का अंत, अपनी पहचान, चंद अखबारी घटनाएँ, तथा एक चोर की कहानी। 'एक चोर की कहानी’ बाल कहानी है और उसमें भी समाज व प्रशासन की विसंगतियों  तथा विडंबनाओं को इतनी विलक्षणता से चित्रित किया गया है कि इस कहानी को पढ़कर एक छोटा, किंतु संवेदनशील बालक भी देश की व्यवस्था की कमियों को बड़ी सरलता व गहराई से समझ सकता है। एक बेचारा गूँगा चोर जो केवल थोड़े से चने और एक पीतल का लोटा गठरी में बाँधे गन्ने के खेतों में छिप रहा था, गाँव वालों द्वारा पकड़े जाने पर पुलिस के हवाले कर दिया जाता है, जो पहले ही छह महीने की जेल काट चुका था और अब एक साल के लिए अंदर कर दिया जाता है। वह ऐसे निरीह व कमज़ोर वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जो अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। जिस देश में बड़े-बड़े पदों पर आसीन प्रशासक, जनता की खून-पसीने की कमाई, दूसरों के अधिकार का पैसा और भोली-भाली जनता के स्वप्नों तक को निगल जाते हैं और डकार तक नहीं लेते, उस देश का गरीब यदि अपने भूखे-तड़पते पेट के लिए रोटी का एक निवाला भी उठा ले तो उसे 'चोर’ की उपाधि से नवाज़ा जाता है। यह है घोर अन्याय के पालने में झूलता हमारा प्रजातंत्र, जिसे एक ओर से विसंगति धकेल रही है, तो दूसरी ओर से विडंबना। स्थिरता के कोई आसार नज़र नहीं आते और दिशाहीनता की इसी नब्ज़ को अपनी रचनाओं में बखूबी पकड़ा है, श्रीलाल शुक्ल ने ।

उपन्यासों तथा कहानियों के अतिरिक्त शुक्लजी के अनेक निबंध-संग्रह भी हैं, जैसे- सामाजिक व राजनीतिक विडंबनाओं पर आधारित ‘अंगद का पाँव', समकालीन समाज पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ करता निबंध-संग्रह 'कुछ ज़मीन पर, कुछ हवा में', मीडिया तथा समाचारों की अतिशयोक्ति व झूठ में लिपटी दुनिया पर आधारित 'ख़बरों की जुगाली' आदि।

'अंगद का पाँव’ रचना का शीर्षक तक अत्यंत सशक्त, सार्थक व सटीक है। इसमें रेल के इंजन की सीटी कई बार बजती है, लेकिन रेल टस से मस नहीं होती। मित्र को स्टेशन पर छोड़ने आए परिजन इधर-उधर बुकस्टाल्स  पर बिकते अखबार पलटने लगते हैं, नाना विषयों पर बातचीत करते हैं, भारतीय संस्कृति पर व्यंग्य तक कस डालते हैं; किंतु, रेलगाड़ी 'अंगद के पाँव' की तरह वहीं डटी रहती है, न उसे समय रूपी मेघनाद हिला पाता है और न ही जनता रूपी रावण-सेना। क्योंकि हमारा प्रशासन ऐसे 'अंगद' को जन्म देता है, जिसका पाँव हिला पाना किसी के बस की बात नहीं। रवींद्र कालिया, जिन्हें श्रीलाल शुक्ल का सान्निध्य प्राप्त हुआ, के अनुसार शुक्ल जी में मुक्त कंठ से प्रशंसा करने की जितनी उदारता थी, उससे कहीं अधिक फटकारने की भी। यही कारण है कि प्रशासन तंत्र का हिस्सा होने के बावजूद वे कभी भी प्रशासन का कच्चा चिट्ठा खोलने से नहीं चूके। उनके व्यंग्य ने भ्रष्टाचारी व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ा दीं। 

श्रीलाल शुक्ल का नाम हिंदी के शीर्षस्थ व्यंग्यकारों की श्रेणी में है। वे अपनी तरह के अनूठे व्यंग्यकार हैं, जिनका पूरे हिंदी-साहित्य में कोई सानी नहीं। उनकी रचनाएँ जहाँ एक ओर हमें बार-बार उन्हें पढ़ते रहने के लिए बाध्य करती हैं, वहीं दूसरी ओर समाज तथा व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों व विडंबनाओं के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित भी करती हैं। कालजयी कृतियों के रचनाकार ‘श्रीलाल शुक्ल’ को कोटि-कोटि नमन। 

- डॉ. रक्षा मेहता
हिंदी विभागाध्यक्षा, 
आर्मी पब्लिक स्कूल, गोलकोंडा, हैदराबाद 


मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

रवि वैद का बाल उपन्यास 'जादूगर' लोकार्पित















हैदराबाद के उपन्यासकार, कथाकार एवं कवि रवि वैद के बाल-उपन्यास ‘जादूगर’ का लोकार्पण कार्यक्रम पायनियर इंस्टीट्यूट ऑफ़ होटल मैनेजमेंट में संपन्न हुआ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के पूर्व आचार्य डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने की। विवेकवर्धिनी महाविद्यालय  की पूर्व प्राचार्य  डॉ. रेखा शर्मा मुख्य अतिथि रहीं, और मुख्य वक्तव्य अलीना खल्गाथ्यान (आर्मेनिय्या)  ने दिया।  

प्रवीण प्रणव ने 'जादूगर' की सांगोपांग समीक्षा कर इसे 'रामचरित मानस' के कई प्रसंगों के साथ जोड़ा। डॉ. आशा मिश्रा मुक्ता, एफ.एम. सलीम और  उड़ीसा स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी (संबलपुर, उड़ीसा)  से पधारे डॉ. जितेंद्र मौर्य ने लोकार्पित पुस्तक के कथ्य और शिल्प पर विचार व्यक्त किए। डॉ. मंजु शर्मा और डॉ.  रक्षा मेहता ने अपनी टिप्पणी सहित रोचक अंशों का वाचन किया। चिरेक इंटरनेशनल स्कूल के कक्षा 11 के छात्रों अनिका दुग्गर और देव अग्रवाल की सधी पाठकीय समीक्षा और जिज्ञासाओं ने सबका दिल जीत लिया।

सभी वक्ताओं का यही मत था कि इस बाल उपन्यास को पढ़ते  हुए वे अपने बचपन में लौट गए थे। उन्हें अपने बचपन में पढ़ी बाल पुस्तकें और चंदा मामा, नंदन जैसी बाल पत्रिकाएँ याद आ गईं। ‘जादूगर’ की कहानी हर आयु के पाठक को आकर्षित करती है, ऐसा सब का विचार था। इस कहानी में नैतिक मूल्यों और भारतीय परंपराओं के अनेक उदाहरण हैं। यह बाल उपन्यास मनोरंजन के साथ-साथ आज की पीढ़ी - जो मोबाइल और इंटरनेट में खो चुकी है - को पुन: अपने दायित्व और जीवन मूल्यों का बोध कराती है। 

अवसर पर  मोहिनी गुप्ता, मोनिका भट्ट, रोशनी वैद, अरविंद शर्मा, डॉ. राजश्री दुगड़,  डॉ. बी. बालाजी, प्रियंका पांडे, सुभाष पाठक और डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने लेखक को शुभकामनाएँ दीं। रवि वैद ने अपनी भावी योजनाओं और भारत-पाकिस्तान पर आने वाले उपन्यास के बारे में अपने विचारों से  अवगत कराते हुए सबका धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन कवयित्री शिल्पी भटनागर ने बहुत रोचक ढंग से किया। ■






सोमवार, 15 दिसंबर 2025

डॉ. देवेंद्र शर्मा का काव्य संग्रह ‘अनुभव के आखर’ लोकार्पित




डॉ. देवेंद्र शर्मा का काव्य संग्रह ‘अनुभव के आखर’ लोकार्पित

हैदराबाद, 14 दिसंबर, 2025।

अपने दौर के अंतरराष्ट्रीय स्तर के वनस्पति शास्त्र वैज्ञानिक व कवि स्व. डॉ. देवेंद्र शर्मा का सचित्र काव्य संग्रह 'अनुभव के आखर' सिकंदराबाद स्थित इक्रीसेट कॉलोनी में आयोजित समारोह में लोकार्पित किया गया।

लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए साहित्यकार एवं मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के हिंदी परामर्शी प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि डॉ. देवेंद्र शर्मा ने वनस्पति शास्त्री के रूप में विभिन्न भारतीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में कार्य किया, वे हिंदी साहित्य, दर्शन और विज्ञान में विशेष अभिरुचि रखते थे। उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण, दार्शनिक चिंतन और काव्य की संवेदनशीलता को एकसूत्र में पिरोकर अपने ख़ास अंदाज़ में साहित्य को समृद्ध किया है। उनकी कविताएँ मानव जीवन के विविध आयामों - आदिम संघर्ष से लेकर आधुनिक समाज की विसंगतियों तथा आध्यात्मिक खोज से लेकर प्रेम की सर्वव्यापकता तक - को सहजता और गहनता के साथ उकेरती हैं। उनकी कविताएँ पाठक को न केवल भावनात्मक स्तर पर छूती हैं, बल्कि बौद्धिक और दार्शनिक स्तर पर भी आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती हैं।

ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि डॉ. देवेंद्र शर्मा की कविताएँ मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को एक साथ संबोधित करती हैं। यह उनकी व्यापक दृष्टि और संवेदनशील चेतना का परिचायक है। उनकी रचनाएँ चार प्रमुख विषयों - मानव सभ्यता का विकास, सामाजिक विसंगतियाँ, आध्यात्मिक खोज और प्रेम की सर्वव्यापकता - के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं, जिन्हें वे प्रतीकात्मकता और दार्शनिक गहराई के साथ प्रस्तुत करते हैं। कवि डॉ. देवेंद्र शर्मा ने मानव सभ्यता की प्रारंभिक यात्रा को किसी सहज आस्तिक रहस्यदर्शी के बजाय वैज्ञानिक चिंतक की तरह देखा है। ऐसे स्थलों पर कवि का मानस प्रागैतिहासिक मानव की प्रकृति के साथ एकाकार होने की चेष्टा करता है। उनकी कविता ‘मानव सभ्यता’ अग्नि की खोज व सामूहिकता के महत्व को सभ्यता की नींव के रूप में प्रस्तुत करती है।

डॉ. देवेंद्र शर्मा की सहधर्मिणी व गीतकार विनीता शर्मा ने इन कविताओं को संकलित किया है। उन्होंने इस अवसर पर कुछ संस्मरण सुनाए और उनके निधन के बाद लिखा अपना गीत सुनाया। यह अंतरंग समारोह डॉ. देवेंद्र शर्मा के काव्य और डॉ. विनीता शर्मा के साथ उनके जीवन एवं दुनिया के विभिन्न देशों में रहकर वैज्ञानिक शोध और विश्व की विभिन्न संस्कृतियों और भाषाओं के साथ मेलजोल की जीवन यात्रा के संस्मरणों को साझा करने का साक्षी बना।

इस अवसर पर प्रवीण प्रणव, एफ एम सलीम, एलिजाबेथ कुरियन मोना, रवि वैद, रोशनी वैद और डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने लोकार्पित काव्य संग्रह से विभिन्न कविताओं का वाचन किया। 
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सिकंदराबाद स्थित इक्रीसेट कॉलोनी में आयोजित कार्यक्रम में वनस्पति वैज्ञानिक व कवि स्व. देवेंद्र शर्मा के सचित्र काव्य संग्रह 'अनुभव के आखर' को लोकार्पित करते हुए प्रो. ऋषभदेव शर्मा एवं अन्य।
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‘अनुभव के आखर’ के लोकार्पण के अवसर पर विनीता शर्मा ने लोकार्पणकर्ता प्रो. ऋषभदेव शर्मा का भावभीना स्वागत-सत्कार किया। 
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गुरुवार, 13 नवंबर 2025

‘क से कविता’ का बाल-कविता समारोह संपन्न



हैदराबाद, 13 नवंबर, 2025। (मीडिया विज्ञप्ति)।
हिंदी-उर्दू कविता को नई पीढ़ी में लोकप्रिय बनाने के लिए समर्पित संस्था “क से कविता” ने यहाँ मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू विश्वविद्यालय के दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र के पुस्तकालय में, “बाल दिवस” के संदर्भ में विशेष समारोह आयोजित किया। इस सुरुचिपूर्ण समारोह में 5 वर्ष के नन्हें बच्चे से लेकर 75 वर्षीय बुजुर्ग तक ने अपने प्रिय कवियों की चुलबुली बाल कविताओं का अत्यंत उत्साहपूर्वक वाचन किया। हैदराबाद-सिकंदराबाद के विभिन्न स्कूलों से आए विद्यार्थियों में तो अपनी पसंद की बाल कविता पढ़ने का उत्साह था ही, अभिभावकों, शिक्षकों और अन्य सदस्यों ने भी अपने विद्यार्थी जीवन में पढ़ी बाल कविता का सस्वर पाठ कर एक बार पुनः अपने बचपन के दिनों को याद किया।

कार्यक्रम के संयोजक-द्वय प्रवीण प्रणव और मोहित ने बताया कि ‘क से कविता’ और दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र द्वारा हर महीने के दूसरे शनिवार को सायं 3 से 5 बजे तक कविता-केंद्रित कार्यक्रम का आयोजन किया जाता‌ है, जिसमें उपस्थित सदस्य पहले से चयनित किसी कवि या शायर‌ की रचनाओं का पाठ करते हैं।‌ यह विशेष रूप से पाठकों का मंच है, जहाँ स्वरचित कविताओं को पढ़ने की अनुमति नहीं है। मंच का उद्देश्य हिंदी-उर्दू के साहित्यिक पुरोधाओं और उनकी रचनाओं से परिचित होना‌ है। ‘क से कविता’ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध चैनल 'हिंदी कविता' का उपक्रम है, जहाँ देश-विदेश की जानी-मानी हस्तियों ने हिंदी कविता का पाठ किया है।

बाल दिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम में स्कूली बच्चों के अलावा कॉलेज के विद्यार्थियों, विभिन्न स्कूल से शिक्षकों, विभिन्न विभागों में कार्यरत युवाओं, साहित्यकारों, गृहिणियों और सेवानिवृत्त लोगों ने भाग लिया। कार्यक्रम में ‘फिर क्या होगा उसके बाद’, ‘हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ’ ‘जीना जिलाना मत भूलना’, ‘चिड़िया का संसार’, ‘हाथी आया, हाथी आया’, ‘चाँद का कुर्ता’, ‘बादल’, ‘मुझे यह बात समझ में नहीं आई’, ‘बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी’, ‘अक्कड़ मक्कड़’, ‘आराम करो’, ‘खिलौने वाला’, ‘हम पंछी उन्मुक्त गगन के’, ‘चूहे की दिल्ली यात्रा’, ‘चेतक’, ‘पर्यावरण बचाओ’, ‘पुष्प की अभिलाषा’, ‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती’ और ‘पन्ना धाय’, जैसी प्रसिद्ध बाल कविताओं का पाठ किया गया।

बाल कविताओं का पाठ करने वालों में स्वाधि मिश्रा, रीत आहूजा, सानवी लोहिया, अथर्व लीला, विवान प्रसाद, रूमी पुरी, रिधान यादव, ओज वीर लोधा, डॉ. इरशाद अहमद, अमृता मिश्रा, धनभद्र लपसिरिकुल, डॉ. रक्षा मेहता, अमरीश कुमार, मोहम्मद सिराजुद्दीन 'असीम', हर्षित रस्तोगी, अनुराग मुस्कान, हीना आहूजा, शकुंतला मिश्रा, दीपा, विशाल कुमार, स्वाति बालूरकर, मऊ मल्लिक डे, डॉ. संगीता शर्मा, टी. गायत्री, मुस्कान कुमारी, शैली सिंह, गरिमा गौतम, प्रो. छाया‌ राय, सरिता दीक्षित, अभिषेक, मधु शर्मा, विशाल, वरुण पुरी, शिल्पा गोयल और पल्लवी पुरी सम्मिलित हैं। ‘क से कविता’ कोर टीम से ज़ीनत ने कार्यक्रम का संचालन किया। सुदर्शन ने फ़ोटो-वीडियोग्राफी की ज़िम्मेदारी सँभाली।

आरंभ में सभी आगंतुकों का चॉकलेट से स्वागत किया गया और अंत में अल्पाहार की व्यवस्था की गई। सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र और बाल दिवस का उपहार भी दिया गया।‌ 000

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

‘कुछ राब्ता है तुमसे’ पर ऑनलाइन परिचर्चा संपन्न


हैदराबाद, 31 अक्टूबर, 2025।
“किसी साहित्यिक कृति में जितना महत्व कथ्य और कथन का होता है, उतना ही सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक और ऐतिहासिक प्रभावों तथा सांस्कृतिक संदर्भों का भी होता है।”

ये विचार मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के दूरस्थ-ऑनलाइन शिक्षा केंद्र के हिंदी परामर्शी प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने युवा लेखक प्रवीण प्रणव की पुस्तक “कुछ राब्ता है तुमसे” पर बोलते हुए प्रकट किए। वे फटकन, आखर और हिंदी मैत्री मंच के तहत इस पुस्तक पर आयोजित ऑनलाइन परिचर्चा में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। डॉ. शर्मा ने विवेच्य पुस्तक की गहन पड़ताल करते हुए इसमें निहित सीमापार, लोकतत्व, स्त्रीपक्ष, पराधीनता, विभाजन, मोहभंग और लोकप्रियता के पाठों-उपपाठों पर चर्चा की।

भारतीय साहित्य की विदुषी, अनुवादक और समीक्षक प्रो. प्रतिभा मुदलियार ने पुस्तक की बहुआयामी उपादेयता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसमें संगृहीत निबंध भली-भाँति यह दर्शाते हैं कि रचनाकारों की निजी दुनिया और वास्तविक दुनिया के रिश्ते कितने संश्लिष्ट हुआ करते हैं।

कथाकार-कवयित्री रेणु यादव ने लेखक की रचना प्रक्रिया और भावी योजनाओं के बारे में जिज्ञासाएँ प्रकट कीं, जिनका समाधान करते हुए प्रवीण प्रणव ने जीवनीपरक आलोचना के लिए खोजी प्रवृत्ति और गहन अध्ययन के महत्व पर प्रकाश डाला। परिचर्चा का संचालन शोधार्थी संगीता ने सुचारु रूप से किया। ■

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2025

‘कुछ राब्ता है तुमसे’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न








‘कुछ राब्ता है तुमसे’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

हैदराबाद, 8 अक्टूबर, 2025 (मीडिया विज्ञप्ति)। मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के गच्ची बावली स्थित दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र के हिंदी प्रभाग के तत्वावधान में, केंद्र के पुस्तकालय भवन में, प्रवीण प्रणव की सद्यःप्रकाशित समीक्षा-कृति ‘कुछ राब्ता है तुमसे’ का लोकार्पण समारोह एक-दिवसीय (हाइब्रिड मोड) राष्ट्रीय संगोष्ठी के साथ संपन्न हुआ।

इस अवसर पर अरबा मींच विश्वविद्यालय (पूर्व अफ्रीका) के पूर्व आचार्य एवं समारोह के मुख्य वक्ता प्रो. गोपाल शर्मा ने विस्तार से ‘कुछ राब्ता है तुमसे’ के लेखकीय सरोकार और विश्व दृष्टि की पड़ताल करते हुए यह घोषित किया कि इसके भीतर सामाजिक परिवर्तन की कामना अंतर्निहित है और सलीके से सहेजे गए इसके 18 अध्याय पुराण-कथा के पाँचों लक्षणों से युक्त हैं।

मणिपुर विश्वविद्यालय और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य डॉ. देवराज ने ऑनलाइन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा कि प्रवीण प्रणव की इस कृति का ताना-बाना बहुत ही बारीक है, जो केवल साहित्यिक मान-मूल्यों तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और लोक मानस के वर्तमान में प्रासंगिक बहुरंगी धागों से निर्मित है।

लगातार सात घंटे तक चले संपूर्ण समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रतिष्ठित लेखिका डॉ. अहिल्या मिश्र ने लेखक प्रवीण प्रणव के साहित्यिक संस्कार की जड़ों की पड़ताल करते हुए भावविभोर होकर कहा कि उन्होंने गंभीरता से एक-एक साहित्यकार के समग्र साहित्य रूपी सागर की तह तक जाकर अपने पाठकों को सुंदर और बेशकीमती मोती लाकर दिए हैं।

वीर बहादुर सिंह विश्वविद्यालय जौनपुर की पूर्व कुलपति प्रो. निर्मला एस. मौर्य ने किताब के निबंधों में संरचनात्मक स्पष्टता की बात करते हुए सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्मा से जुड़े आलेखों की चर्चा की। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस किताब का अगला भाग भी आना चाहिए जिससे पाठक कई और साहित्यकारों के विषय में सारगर्भित जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।

चेक गणराज्य (यूरोप) स्थित प्राग से ऑनलाइन सम्मिलित प्रमुख मनोचिकित्सक एवं कवि डॉ. विनय कुमार ने लक्षित किया कि यह किताब विभिन्न कवियों की निजी जिंदगी के रोचक प्रसंगों को इस तरह बयान करती है कि लेखक और पाठक के बीच सहज राब्ता कायम हो जाता है। उन्होंने इसके सभी अध्यायों को ऑडियो बुक के रूप में प्रसारित करने की ज़रूरत बताई, तो संभावना प्रकाशन के अभिषेक अग्रवाल ने लेखक की पूर्वग्रह-विहीनता को इस पुस्तक की बड़ी ताक़त बताया।

चेन्नै से ऑनलाइन जुड़ीं डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने पुस्तक पर चर्चा का प्रवर्तन करते हुए ‘कुछ राब्ता है तुमसे’ को चर्चित 18 रचनाकारों की मार्मिक उक्तियों और लेखक प्रवीण प्रणव के सूत्रवाक्यों के संग्रहणीय कोश की संज्ञा दी।

दिल्ली से ऑनलाइन जुड़े लेखक अवधेश कुमार सिन्हा ने कहा कि यह किताब प्रवीण प्रणव के विगत 10 वर्षों के अध्ययन का सार है तथा मुश्किल विषय को भी कहानी की शक्ल में परोसने की उनकी कला पाठकों से सीधा संवाद स्थापित करने में सहायक है।

महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा की उपाचार्य डॉ. अनीता शुक्ल ने पुस्तक में शामिल तल्ख़ ग़ज़ल के दो पुरोधाओं दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी के बहाने प्रवीण प्रणव की सहज कथात्मक शैली पर चर्चा की।

प्रसिद्ध कवि लाल्टू ने विशेषज्ञ टिप्पणी देते हुए इस बात को रेखांकित किया कि लेखक ने इस पुस्तक में तरह-तरह के तत्कालीन और समकालीन तनावों को उजागर करने का जोख़िम कुछ इस तरह उठाया है कि किताब को पढ़ते हुए लेखक के साथ हम भी उन तनावों को दोबारा जीते हैं।

मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के सहायक कुलसचिव और संगोष्ठी के संयोजक डॉ. आफ़ताब आलम बेग़ ने पुस्तक की पठनीयता की प्रशंसा करते हुए कहा कि इसमें शामिल जोश मलीहाबादी की गाथा हमें सिखाती है कि प्रवास केवल दूरी का नाम नहीं, बल्कि अस्वीकार्यता और पहचान के संकट का भी पर्याय होता है।

आरंभ में समारोह के सूत्रधार प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने पुस्तक का सामान्य परिचय देते हुए बताया कि इसमें लेखक ने चंद्रधर शर्मा गुलेरी, भिखारी ठाकुर, जोश मलीहाबादी, सुभद्रा कुमारी चौहान, मखदूम मुहिउद्दीन, महादेवी वर्मा, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, नागार्जुन, गोपाल सिंह नेपाली, कैफी आज़मी, फणीश्वरनाथ रेणु, साहिर लुधियानवी, गोपाल दास नीरज, दुष्यंत कुमार, केदारनाथ सिंह, धूमिल, अदम गोंडवी और परवीन शाकिर जैसे हिंदी-उर्दू के कुल 18 साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व की, कथारस में भीगी जीवनीपरक आलोचना प्रस्तुत की है।

संगोष्ठी के दोनों सत्रों में 25 विद्वान समीक्षकों ने अपने शोध पत्रों में विवेच्य पुस्तक का अलग-अलग नज़रिए से गहन विवेचन किया। डॉ. जमाल ख़ान, सुनीता लुल्ला, एफएम सलीम, वेणुगोपाल भट्टड़, रवि वैद, डॉ. इरशाद नैयर, डॉ. आशा मिश्र, डॉ. रेखा शर्मा, डॉ. रक्षा मेहता, डॉ. सुपर्णा मुखर्जी, डॉ. सुषमा देवी, डॉ. बी. बालाजी, शीला बालाजी, डॉ. अनिल लोखंडे, डॉ.वाजदा इशरत, लविका, कुशाग्र और किरण सिंह सहित सभी वक्ताओं ने लेखक को इस पुस्तक के दूसरे भाग के भी यथाशीघ्र प्रकाशन हेतु शुभकामनाएँ दीं। समारोह का सफल संचालन कवि-कथाकार रवि वैद ने किया। 000


शुक्रवार, 4 अप्रैल 2025

'धूप और चाँदनी' (हलधर) की समीक्षा



कभी हलधर से पूछो 
किस तरह सरसों उगी है!

समीक्षक : रवि वैद

राम नारायण ‘हलधर‘ (1970) का नाम पहली बार सुनकर सबसे पहले मेरे हृदय में जनता पार्टी के चुनाव चिह्न ‘हलधर किसान’ की याद ताज़ा हो गई। उसी दिन उन्हें हैदराबाद में  ‘सिया सहचरी काव्य सम्मान-2024’ ग्रहीता के रूप में देखने और सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। हलधर जी  एक प्रभावशाली व्यक्तित्व के  कवि  और गज़लकार हैं। अपनी बुलंद आवाज़ और मंच पर बोलने की कला  द्वारा वे अपने श्रोताओं पर एक अमिट छाप छोड़ देते हैं।

जब मुझे उनका ग़ज़ल संग्रह “धूप और चाँदनी” पढ़ने के लिए मिला तो मैं उसे पढ़ने के लिए उतावला हो उठा। उनके जीवन और उपलब्धियों के बारे में जानकर मैं बहुत अधिक प्रभावित हुआ। क्योंकि मैं स्वयं ग़ज़ल कहता हूँ तो मेरा हृदय इस ग़ज़ल संग्रह को बारीकी से पढ़ने और ग़ज़ल के शिल्प को परखने का हुआ। मैंने कुछ गजलों की तख़्तीअ कर बहरें निकालीं। मात्रा गिराने की विधा भी देखी। सभी ग़ज़लें, ग़ज़ल लेखन के  शिल्प पर खरी उतरीं। अधिकांश ग़ज़लें ग़ैर-मुसलसल हैं तो कुछ मुसलसल भी हैं। अधिकांश ग़ज़लें छोटी बहरों में लिखी गई हैं, जो अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। लंबे-लंबे मिसरों में अपनी बात कहना आसान होता है,  परंतु छोटे मिसरों में बहुत कुछ कह देना एक मँजे हुए ग़ज़ल-गो का परिचायक है।

राम नारायण ‘हलधर‘ ग्रामीण परिवेश से आते हैं और आज भी अपनी मिट्टी  से जुड़े हुए हैं। इनकी ग़ज़लों  में  ग्रामीण परिवेश व ग्रामीण जीवन की  समस्याओं को साफ़ देखा जा सकता है। इनकी  ग़ज़ल का एक शेर देखिए :

हमारी फस्ल का, इस क़र्ज़ का कुछ कीजिये साहिब ,
हमें हर साल का घाटा किसी दिन मर डालेगा।

दूसरे मिसरे में ‘मार डालेगा’ के स्थान पर ‘मर डालेगा’ का प्रयोग हुआ है। बहर बरक़रार रखने  के चलते नया प्रयोग ही कर डाला! इसी प्रकार नए शब्द चलन में आकर रूढ़ हो जाते हैं। असंभव नहीं कि यह विचलन सहेतुक न होकर मुद्राराक्षस भर हो!

आज भी बुनियादी सुविधाओं   को तरसता गाँव ‘हलधर’ के लेखन का अभिन्न अंग है।  जैसे-

कहीं मंदिर बनाते हैं, कहीं मस्जिद बनाते हैं,
दवाख़ाना अभी भी गाँव में एक खंडहर सा है।

एक और शेर  देखिए-

मेरे खेतों में एक ऋण का कुआँ है,
उसे हर साल गहरा देखता हूँ।

एक दो जगह देशज शब्दों का भी प्रयोग किया गया है, जो ग़ज़ल में आत्मीयता भर देते हैं। जैसे-

इक लड़की मिलते ही हमसे झगड़े  है,
उससे मिलकर जी नहीं भरता दिन भर में।

एक  शेर ने तो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की मशहूर नज़्म ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत…’ के मिसरे  ‘और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा, राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा’ की याद ताज़ा करवा दी;  देखिए-

ये माना प्यार है ज़रूरी,
मगर ये भूख इससे भी बड़ी है।

राम नारायण ‘हलधर‘ की अधिकांश गजलों में छह अशआर हैं। यह दर्शाता है कि इन्हें काफ़िया तलाशने में कोई खास मेहनत-मशक्कत नहीं करनी पड़ती। लफ्ज़ इनके ज़हन में इस्तेमाल होने के लिए तैयार रहते हैं। रील बनाने वाली नई पीढ़ी पर तंज़ कसते हुए लिखते हैं :

बहुत आसान है खेतों में यूँ फ़ोटो खिंचाना,
कभी ‘हलधर’ से पूछो किस तरह सरसों उगी है।

और अंत में वह मार्मिक शेर जो मेरे हृदय को वेध  गया। नारी जीवन की त्रासदी की झलक देखिए- 

गुल-ए-उम्मीद थक कर सो गए सब, 
अभी तितली रसोई में खड़ी है।

राम नारायण ‘हलधर‘ का ग़ज़ल संग्रह ‘धूप और चाँदनी’ केवल ख्याति प्राप्त करने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। इसमें किसानों की पीड़ा, आम आदमी की जिजीविषा और भारतीय लोकतंत्र की सियासी विफलता को प्रकाश में लाकर ‘हलधर’ द्वारा हल   तलाशने पर बल दिया गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस ग़ज़ल संग्रह में लोक-कल्याण की भावना साफ़ दिखाई देती है।  

राम नारायण ‘हलधर‘ से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपनी लेखनी से इसी तरह समाज में चल रही बुराइयों को सामने लाकर उनके निवारण का हल खोजने का प्रयास करेंगे। राम नारायण ‘हलधर‘ को   ‘धूप और चाँदनी के लिए हार्दिक बधाई। ◆◆◆

समीक्षित पुस्तक: धूप और चाँदनी
विधा: ग़ज़ल
कवि: राम नारायण ‘हलधर’
प्रकाशन वर्ष: 2023
प्रकाशक: इंडिया नेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड
कुल पृष्ठ: 112
मूल्य: ₹ 225/-

                                               

                                                      समीक्षक: 
रवि वैद, हैदराबाद
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