मंगलवार, 28 अगस्त 2012

तेलुगु कवयित्री सी.भवानीदेवी कृत ‘अक्षर मेरा अस्तित्व’ का लोकार्पण संपन्न


हैदराबाद, 28 अगस्त 2012

आज यहाँ ‘बिंदु आर्ट्स’ के तत्वावधान में प्रो.ऋषभ देव शर्मा की अध्यक्षता में आंध्रप्रदेश हिंदी अकादमी के सभा कक्ष में संपन्न साहित्यिक समारोह में तेलुगु की समकालीन वरिष्ठ कवयित्री डॉ.चिल्लर भवानीदेवी की प्रतिनिधि कविताओं के हिंदी अनुवाद ‘अक्षर मेरा अस्तित्व’ को ज्ञानपीठ पुरस्कार ग्रहीता पद्मभूषण डॉ.सी.नारायण रेड्डी ने लोकार्पित किया. 

‘अक्षर मेरा अस्तित्व’ को लोकार्पित करते हुए डॉ.सी.नारायण रेड्डी ने कहा कि साहित्य के विकास के लिए अनुवाद की भूमिका महत्वपूर्ण होती है इसलिए विभिन्न भारतीय भाषाओं की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया जाना बहुत आवश्यक है. उन्होंने  नारी संवेदना और भाषा विषयक सजगता के लिए कवयित्री की प्रशंसा की और उनकी कुछ पंक्तियों का विवेचन भी किया. उन्होंने कहा कि भवानीदेवी ऐसी साहित्यकार हैं जिन्होंने अपने अस्तित्व को रचनाओं में ढालकर ‘अक्षरत्व’ प्रदान कर दिया है. डॉ.सी.नारायण रेड्डी ने उनका एक ‘नानी’ (लघु मुक्तक) भी पढ़कर सुनाया – विवाह, तुमने/ यह क्या किया/ मायके में मुझे/ मेहमान बना दिया.” 

इसी क्रम में समारोह के विशेष अतिथि के रूप में बोलते हुए साहित्य अकादमी पुरस्कृत एवं ‘नानी’ विधा के प्रवर्तक तेलुगु कवि प्रो.एन.गोपि ने सी.भवानीदेवी के साहित्य की विशेषताओं पर चर्चा की और कहा कि वे समकालीन तेलुगु कविता की विभिन्न प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करने में समर्थ रचनाकार हैं. 

अनुवादिका आर.शांता सुंदरी भी इस अवसर पर उपस्थित थीं. उन्होंने अपने वक्तव्य में अनुवाद प्रक्रिया का खुलासा करते हुए बताया कि काव्य का अनुवाद करना अपेक्षाकृत कठिन होता है. उन्होंने कहा कि जब तक अनुवादक रचना की संवेदना को आत्मसात नहीं कर लेता तब तक अनुवाद शाब्दिक स्तर का होने के कारण निष्प्राण रहता है. 

उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की प्राध्यापक एवं हिंदी-तेलुगु द्विभाषी पत्रिका ‘स्रवन्ति’ की संपादक डॉ.जी.नीरजा ने लोकार्पित कृति की विस्तार से समीक्षा करते हुए मूल तेलुगु कवयित्री डॉ.सी.भवानीदेवी और हिंदी अनुवादिका आर.शांता सुंदरी को प्रभावी सृजन और संप्रेषणीय अनुसृजन के लिए बधाई दी. उन्होंने मूल पाठ और अनूदित पाठ की तुलना करते हुए यह कहा कि इस संकलन की कविताओं में विषय और शिल्प की दृष्टि से विविधता है, वर्तमान समय की जटिल अनुभूतियों की व्यंजनापूर्ण अभिव्यक्ति निहित है तथा अनुवाद मूल रचनाओं के अनुरूप एवं लक्ष्य भाषा हिंदी के प्रकृति के अनुकूल है. 

इस अवसर पर मूल रचनाकार और हिंदी अनुवादिका ने क्रमशः तेलुगु और हिंदी में काव्य पाठ किया तथा लोकार्पित कृति की प्रथम प्रति डॉ.बी.वाणी ने स्वीकार की. 

अध्यक्षीय भाषण में डॉ.ऋषभ देव शर्मा ने राष्ट्रीय और वैश्विक समझ के विकास में अनुवाद की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए बलपूर्वक यह कहा कि अनुवाद किसी भी भाषा-समाज के सदस्यों को कूपमंडूकता और कट्टरवाद से मुक्त करता है. उन्होंने सी.भवानीदेवी की कविता के मानवीय सरोकारों की व्याख्या की और कहा कि वे सी.नारायण रेड्डी एवं एन.गोपि की मानवतावादी काव्यधारा को आगे बढ़ाने वाली समर्थ कवयित्री हैं. 

समारोह का संचालन उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, एरणाकुलम (केरल) से पधारे प्राध्यापक डॉ.पेरिसेट्टि श्रीनिवास राव ने किया.


इस समारोह पर दिए गए मुख्य वक्तव्य नीचे दिए जा रहे लिंकों पर क्लिक करके सुने जा सकते हैं -


Dr.C.Narayan Reddy On Bhavani Devi

N.gopi on bhavanidevi