शनिवार, 7 सितंबर 2013

ऋषभदेव शर्मा की छठी काव्यकृति ‘सूँ साँ माणस गंध’ लोकार्पित

हैदराबाद, 7 सितंबर 2013 (मीडिया विज्ञप्ति)
‘सूँ साँ माणस गंध’ के लोकार्पण के अवसर पर बाएँ से : लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, डॉ. राधे श्याम शुक्ल, प्रो. दिलीप सिंह, प्रो. एम. वेंकटेश्वर, प्रो. ऋषभ देव शर्मा तथा डॉ. एम.रंगैया 
‘साहित्य मंथन’ और ‘श्रीसाहिती प्रकाशन’ के संयुक्त तत्वावधान में प्रो.एम.वेंकटेश्वर की अध्यक्षता में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में संपन्न एक भव्य समारोह में वरिष्ठ भाषाचिंतक प्रो.दिलीप सिंह ने कवि प्रो.ऋषभदेव शर्मा की छठी काव्यकृति ‘सूँ साँ माणस गंध’ को लोकार्पित किया. प्रो.दिलीप सिंह ने लोकार्पित पुस्तक की विवेचना करते हुए कहा कि मनुष्यता की शाश्वत गंध, लोकतंत्र और सृजन की बेचैनी इसका केंद्रीय कथ्य है तथा इन कविताओं को काव्य सौष्ठव की दृष्टि से श्रेष्ठ रचनाओं की पंक्ति में रखा जा सकता है. उन्होंने मृत्यु और रचना प्रक्रिया से संबंधित कविताओं को भी इस संग्रह की विशेष उपलब्धि माना. 

विशिष्ट अतिथि डॉ.राधेश्याम शुक्ल ने कवि की काव्ययात्रा का मूल्यांकन करते हुए कहा कि समकालीन युगबोध की दृष्टि से उनकी कविताएँ आज के समय की आवश्यकता की पूर्ति करती हैं और रचनाधर्म के निर्वाह की दृष्टि से यह कवि भारतीयता और लोकचेतना से अनुप्राणित प्रतीत होता है. 

शुभकामनाएँ देते हुए वरिष्ठ कवि गुरुदयाल अग्रवाल ने कहा कि हर पीढ़ी को अपनी आवाज बुलंद करने वाला एक कलमकार चाहिए होता है और ऋषभदेव शर्मा ऐसे ही कलमकार है तथा ‘सूँ साँ माणस गंध’ की कविताएँ आज के आतंक ग्रस्त माहौल में मशाल की तरह जलती हुई कविताएँ हैं. 

लोकार्पित पुस्तक का परिचय देते हुए लक्ष्मीनारायण अग्रवाल ने ‘सूँ साँ माणस गंध’ की व्याख्या की और इन कविताओं को मिट्टी और शौर्य की कविताएँ बताया. 

अध्यक्षीय भाषण में प्रो.एम.वेंकटेश्वर ने लोकार्पित संग्रह की विविधता और कलात्मकता की प्रशंसा करते हुए खासतौर से लंबी कविताओं के शिल्प की दृष्टि से ‘सृजन का पल’ और ‘मैं सृजन की टेक धारे हूँ’ कविताओं का विश्लेषण किया तथा कहा कि समकालीन काव्य परिदृश्य में ‘सूँ साँ माणस गंध’ की कविताएँ एक सार्थक हस्तक्षेप करती हैं और अपनी एक अलग जगह की माँग करती हैं. 


इस अवसर पर कवि ऋषभदेव शर्मा ने लोकार्पित पुस्तक से कुछ चुनी हुई कविताओं का वाचन किया. साथ ही साहित्य मंथन, विश्वंभरा, श्रीसाहिती प्रकाशन, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, कादम्बिनी क्लब आदि संस्थाओं तथा कवि के प्रशंसकों और मित्रों ने उनका पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ सारस्वत सम्मान किया. 
प्रो. ऋषभदेव शर्मा का सारस्वत सम्मान करते हुए विश्वंभरा के संरक्षक द्वारका प्रसाद मायछ 

कार्यक्रम के दूसरे चरण में डॉ.ऋषभदेव शर्मा द्वारा संपादित एवं प्रो.दिलीप सिंह को समर्पित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ ‘भाषा की भीतरी परतें’ की मानार्थ प्रतियाँ ग्रंथ के सहयोगी लेखकों को भेंट की गईं. संपादक मंडल के सदस्यों ने पुस्तक के मुख चित्र की अनुकृति प्रो. दिलीप सिंह को समर्पित की. 
‘भाषा की भीतरी परतें’ की लेखकीय प्रति ग्रहण करते हुए प्रो.जे.पी.डिमरी

इस समारोह में बड़ी संख्या में हिंदी अध्यापकों, शोध छात्रों, प्रचारकों और लेखकों ने भाग लिया जिनमें डॉ.गोरखनाथ तिवारी, प्रो.जे.पी.डिमरी, डॉ.के.बी.मुल्ला, वेणुगोपाल भट्टड, नरेंद्र राय, डॉ.विनीता शर्मा, डॉ.देवेंद्र शर्मा, भंवरलाल उपाध्याय, डॉ.पूर्णिमा शर्मा, लिपि भारद्वाज, राजेश प्रसाद, डॉ.एम.रंगैया, जी.परमेश्वर, डॉ.शकीला खानम, डॉ.शकुंतला रेड्डी, डॉ.अनिता गांगुली, डॉ.एम.लक्ष्मीकांतम, पवित्रा अग्रवाल, डॉ.किशोरीलाल व्यास, डॉ.बी.एल.मीणा, प्रतिभा कुमारी, डॉ.रोहिताश्व, डॉ.टी.मोहन सिंह, शशिनारायण स्वाधीन, डॉ.मृत्युंजय सिंह, डॉ.साहिराबानू बी. बोरगल, डॉ.बलविंदर कौर, डॉ.रजनी धारी, डॉ.विनीता सिन्हा, डॉ.बी.बालाजी, वी.ज्योत्स्ना कुमारी, वी.कृष्णा राव, द्वारका प्रसाद मायछ, वेंकटेश्वर राव, राधाकृष्ण मिरियाला, जूजू गोपीनाथ, खदीर, जी.संगीता, मंजु शर्मा, जे. रामकृष्ण, निर्मला सुमिरता, पी.पावनी, पेरिके झांसी लक्ष्मीबाई, टी.सुभाषिनी, गहनीनाथ, बाबासाहब, एन.अप्पल नायुडु, शुभदा, के.नागेश्वर राव, वी. शंकर, संतोष विजय मुनेश्वर, फातिमुन्निसा, नाजिया बेगम, राजु, वर्षा ठाकर, रेणु कुमारी, डॉ.ए.जी.श्रीराम, श्रीराम श्रीनिवास, शंकर सिंह ठाकुर, सुरेश, संतोष काम्बले, मोहम्मद कासिम, मोहम्मद अंसारी, अनामिका आदि के नाम सम्मिलित हैं. 

समारोह का संचालन लक्ष्मीनारायण अग्रवाल ने किया और धन्यवाद डॉ.जी.नीरजा ने प्रकट किया. 

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