बुधवार, 4 मार्च 2015

आयोजन नए मिज़ाज की एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का

उद्घाटन सत्र में दीप प्रज्वलित करते हुए
प्रो. जी. एस. एन. राजु (कुलपति, आंध्र विश्वविद्यालय, विशाखपट्णम).
साथ में 
प्रो. एस. एम. इकबाल, प्रो. चितरंजन मिश्र, डॉ. उमर अली शाह और डॉ. वी. रामाराव
विभिन्न विश्वविद्यालयों, संस्थानों और महाविद्यालयों में फरवरी-मार्च के महीने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों के होते हैं. इसलिए अगर विशाखपट्णम में भी हिंदी की कई संगोष्ठियाँ इस दौरान हो रही हैं तो यह सामान्य सी बात है. लेकिन अगर कोई राष्ट्रीय संगोष्ठी ऐसी हो जिसमें भाग लेने वाले विद्वान – अध्यक्ष और मुख्य अतिथि से लेकर प्रतिनिधि और प्रतिभागी तक – देश भर के दूर-पास के क्षेत्रों से अपने खर्चे पर आए, तो ऐसी संगोष्ठी को लीक से हटकर एक नए आरंभ के रूप में देखा ही जाना चाहिए. यही वह मुख्य बात है जिसने 1 और 2 मार्च 2015 को विशाखा हिंदी परिषद और केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को विशिष्ट बना दिया. 

'21वीं सदी में हिंदी : उपलब्धियाँ एवं संभावनाएँ' विषयक इस द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी की दूसरी विशेषता यह रही कि इसमें परंपरागत ढंग से आलेख वचन नहीं हुआ. बल्कि विभिन्न सत्रों में विशेषज्ञ मंडल ने संक्षेप में सत्र के विषय पर केंद्रित अपने विचार व्यक्त किए और बाद में उपस्थित प्रतिनिधियों ने खुली चर्चा में भाग लिया. इस प्रकार प्रत्येक सत्र एक परिसंवाद की तरह संपन्न हुआ जिसकी संपन्नता में उस सत्र के संचालक ने समन्वयक की भूमिका निभाई. निश्चय ही इसका श्रेय विशाखा हिंदी परिषद के अध्यक्ष प्रो. एस. एम. इकबाल और उनके आत्मीय साथी प्रो. एम. वेंकटेश्वर को जाता है. इन दोनों के प्रयास से यह पूरा कार्यक्रम अत्यंत जीवंत संवाद के रूप में संपन्न हुआ. 

पहले दिन 10.30 बजे उद्घाटन सत्र आरंभ हुआ. इस अवसर पर प्रो. एस. एम. इकबाल के एक अन्य रोचक प्रयोग की भी खूब सराहना हुई. वह यह कि आयोजक संस्था की ओर से सब विद्वानों को उद्घाटन सत्र के लिए श्वेतवर्णी धोती-कुर्ता का सांस्कृतिक परिधान उपहार स्वरूप प्रदान किया गया – इस ड्रेस कोड को यथासंभव सभी ने प्रमुदित भाव से अंगीकार किया. 

उद्घाटन सत्र में प्रो. जी. एस. एन. राजु (कुलपति, आंध्र विश्वविद्यालय, विशाखपट्णम), प्रो. चितरंजन मिश्र (प्रति-कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा), डॉ. उमर अली शाह (पीठाधिपति, विश्वविज्ञान विद्या आध्यात्मिक पीठम, पिठापुरम), डॉ. वी. रामाराव (सचिव एवं संरक्षक, एम. वी. आर. डिग्री एवं पी. जी. कॉलेज, गाजुवाका, विशाखपट्णम) और डॉ. एस. एम. इकबाल (संगोष्ठी संयोजक, अध्यक्ष, विशाखा हिंदी परिषद) मंचासीन हुए. प्रो. जी. एस. एन. राजु ने दीप प्रज्वलित करके संगोष्ठी का उद्घाटन किया. बीज वक्तव्य देते हुए प्रो. चितरंजन मिश्र ने कहा कि 21वीं सदी में हिंदी ने अब तक पिछली शताब्दी की तुलना में बड़ी तेजी से नई उपलब्धियाँ हासिल की है और साहित्य से लेकर तकनीक तक की भाषा के रूप में वह एक संभावनाशील सर्वसमर्थ भाषा सिद्ध हुई है. उन्होंने भाषा को राष्ट्रीयता और संस्कृति का प्रतीक बताते हुए यह भी कहा कि भीतर से सारा भारत देश सांस्कृतिक रूप से एक है तथा हिंदी भारतीय जीवन पद्धति का प्रतीक है. इसलिए भारतीयता को बचाना है तो भाषा को बचाना चाहिए. इस अवसर पर वरिष्ठ हिंदी सेवी, समीक्षक, कवि और अनुवादक प्रो. आदेश्वर राव को 'जीवन साफल्य पुरस्कार' से सम्मानित किया गया. 

संगोष्ठी में दोनों दिन दो-दो विचार सत्र या परिसंवाद संपन्न हुए. पहला सत्र ‘साहित्य की पठनीयता : समस्याएँ और समाधान’ पर केंद्रित रहा. इसके समन्वयक प्रो. ऋषभदेव शर्मा (हैदराबाद) रहे. विषय के विविध पक्षों पर प्रो. चितरंजन मिश्र (वर्धा), प्रो. दिनेश चौबे (शिलंग), डॉ. पटनायक (भुवनेश्वर) और प्रो. के. वनजा (कोचीन) ने आधार वक्तव्य प्रस्तुत किए. ‘भारतीय साहित्य और अनुवाद’ शीर्षक दूसरे सत्र के समन्वयक रहे प्रो. एम. वेंकटेश्वर (हैदराबाद). इस सत्र में आधार वक्तव्य प्रो. आर. एस. सर्राजू (हैदराबाद), प्रो. शंकरलाल पुरोहित (भुवनेश्वर), प्रो. मोहनन (कोचीन) और डॉ. वेन्ना वल्लभराव (विजयवाडा) ने रखे. तीसरे सत्र का विषय था ‘नए गद्य रूपों की प्रासंगिकता’. इसका समन्वयन डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा (हैदराबाद) ने किया और आधार वक्तव्य डॉ. रविकुमार (पटियाला), डॉ. के. वनजा (कोचीन) और डॉ. एम. वेंकटेश्वर (हैदराबाद) ने प्रस्तुत किए. चौथे सत्र में ‘देवनागरी लिपि बनाम रोमन लिपि’, ‘सोशल मीडिया’ तथा ‘सिनेमा की भाषा’ जैसे विविध पहलुओं पर खुली चर्चा प्रो. एम. वेंकटेश्वर (हैदराबाद) के सूत्रधारत्व में निष्पन्न हुई. विभिन्न चर्चाओं में प्रो. आदेश्वर राव (विशाखपट्णम), डॉ. कृष्ण बाबू (विशाखपट्णम), डॉ. अरविंद गुरु, डॉ. मंजरी गुरु (मंडला), डॉ. पूर्णिमा शर्मा (हैदराबाद), डॉ. बी. सत्यानारण (हैदराबाद), डॉ. राधा (हैदराबाद), डॉ. हेमलता (विशाखपट्णम), डॉ. सुमन (भुवनेश्वर), डॉ. दीपा गुप्ता (विशाखपट्णम) आदि ने सक्रिय भूमिका निभाई. 
परिसंवाद के दौरान प्रो. रविकुमार, प्रो. एम.वेंकटेश्वर
प्रो. के. वनजा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा 

सभी चर्चाएँ अत्यंत सौहार्दपूर्ण वातावरण में तथा गहन अकादमिक गंभीरता के साथ संपन्न हुईं. कुल मिलाकर यह महसूस किया कि विविध प्रयोजनवती होकर नई सदी में हिंदी नए रूप में उभर रही है. हिंदी का यह नया रूप सब प्रकार की कट्टरताओं से मुक्त और अलग अलग प्रयोजनों के लिए अलग अलग रूप वाला तथा संप्रेषण को सर्वोपरि मानने वाला है. 

यह विवरण अधूरा रहेगा अगर यह न बताया जाए कि अकादमिक चर्चाओं के अतिरिक्त एक ओर तो गंगा जमुनी कवि सम्मलेन और संगीत सभा तथा दूसरी ओर सिम्हाचलम, कैलाशगिरि, ऋषिकोंडा समुद्र तट और पोर्ट के पर्यटन के कारण यह संगोष्ठी सभी प्रतिनिधियों के लिए अविस्मरणीय बन गई. पिछले साल आए चक्रवाती तूफान हुदहुद की विनाशलीला के चिह्न मनुष्यों के मन और पर्यावरण के तन पर अभी भी शेष है – लेकिन यह वसंत उन पर हरियाली का परचम फैरता हुआ जिजीविषा का संदेश दे रहा है. 

दूसरे दिन दोपहर बाद ढाई बजे से समापन सत्र आरंभ हुआ. इस सत्र के मुख्य अतिथि आंध्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. वी. उमा महेश्वर राव के साथ डॉ. एस. एल. पुरोहित (भुवनेश्वर), डॉ. दिनेश चौबे (शिलांग), डॉ. चितरंजन मिश्र (वर्धा) और संगोष्ठी-संयोजक डॉ. एस. एम. इकबाल मंचासीन थे. इस सत्र के संचालाक थे डॉ. एम. वेंकटेश्वर. अगले वर्ष फिर किसी और शहर में मिलने के संकल्प के साथ सब ने एक-दूसरे से विदा संदेशों का लेन-देन किया. प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने भरोसा दिलाया कि इस शृंखला का अगला आयोजन हैदराबाद में होगा.