शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

[पुस्तक] 'मुझे कुछ कहना है' : डॉ. राम निवास साहू



मुझे कुछ कहना है (आत्मकथा) / डॉ. राम निवास साहू/ 2017/
अनन्य प्रकाशन, ई-17, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली -110032/
 192 रुपए/ 395 पृष्ठ/ सजिल्द.


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वनवासी विमर्श का  नया आयाम


डॉ. रामनिवास साहू मूलतः एक भाषा-अध्येता हैं. उन्होंने मुंडा भाषाओँ के अपने सर्वेक्षण के लिए पर्याप्त ख्याति अर्जित की है जिसका भौगोलिक क्षेत्र छतीसगढ़ रहा है. छतीसगढ़ से उनका लगाव स्वाभाविक है क्योंकि वह उनकी जन्मभूमि है तथा उसके सौंदर्य और विद्रूप के मिले-जुले अनुभवों ने उनके व्यक्तित्व को बनाया, निखारा और सँवारा है. उनके मानस में छतीसगढ़ का आंचलिक परिवेश और जीवन उसकी बोली-बानी के साथ निरंतर बजता रहता है. वे प्रायः बेचैन रहते हैं कि किस प्रकार इस अंचल की नई पीढ़ी को शिक्षा के प्रकाश के सहारे राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल किया जाए ताकि वह गरीबी, पिछड़ेपन और शोषण से मुक्त हो सके और सही अर्थ में प्रजातांत्रिक व्यवस्था का अंग बनकर विकास के लाभ अपने जन, ज़मीन और जंगल तक पहुँचा सके. यह बेचैनी ही उन्हें कथा और आत्मकथा लिखने के लिए प्रेरित करती है. 

अपनी औपन्यासिक आत्मकथा ‘’मुझे कुछ कहना है’’ में लेखक ने अपने बहाने छतीसगढ़ के वनवासी समुदायों की आंचलिक जीवनचर्या को उनकी आदिम जिजीविषा के संदर्भ में भली प्रकार उकेरा है. इस प्रक्रिया में सामने आने वाली वनवासी समुदायों के स्थापन-विस्थापन-पुनर्स्थापन की रोचक ऐतिहासिक कथा, वन के देवी-देवताओं की लोकगाथा, जनता और सत्ता के संबंध, शोषण और लोकोपकार की द्वंद्वात्मक उपस्थिति, पुरुषों की भोगवादी-वर्चस्ववादी प्रवृत्ति तथा स्त्रियों की लुटते-घुटते रहने की अनंत शोकांतिका इस आत्मकथा को वैयक्तिक निजता के द्वीप से निकालकर लोकमंगल के व्यापक कथ्य में परिणत कर देती है. 

हिंदी में वनवासी विमर्श को नया आयाम प्रदान करने वाली इस कृति के प्रणयन के लिए लेखक को भूरिशः साधुवाद! 


- प्रो. ऋषभदेव शर्मा 

पूर्व अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद केंद्र.

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एक हाशियाकृत अंचल की छटपटाहट 


भारतवर्ष अपने वर्तमान स्वरूप में इतनी अधिक विविधताओं से भरा हुआ महादेश है कि इसमें सभ्यता की आदिम अवस्था से लेकर उत्तर आधुनिक अवस्था तक को एक साथ देखा जा सकता है. खास तौर पर यदि हम वनवासी समुदायों को निकट से देखें तथा उनके जीवन-संघर्ष को समझने का प्रयास करें तो कबीलाई सभ्यता से चलकर ग्राम सभ्यता और फिर नगर सभ्यता के विकास के विविध चरणों के लोक-इतिहास को सहज ही परिलक्षित कर सकते हैं. इसी के साथ, शिक्षा और विकास के समांतर मनुष्य के हाथ से रेत की तरह भोलेपन और आनंद की संपदा का फिसलते-रिसते जाना भी एक ऐसा विषम यथार्थ है जिसे नकारा नहीं जा सकता. वनवासी समुदाय प्रकृति के सामीप्य के बावजूद कई प्रकार की विसंगतियों के भी शिकार दिखाई देते हैं; आर्थिक-राजनैतिक शोषण तो है ही. 


‘’मुझे कुछ कहना है’’ शीर्षक अपनी औपन्यासिक आत्मकथा में डॉ. रामनिवास साहू ने इन सब सामाजिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में छत्तीसगढ़ के एक वनवासी अंचल के परिवेश, संघर्ष, सौंदर्य और विद्रूप को रेखांकित करने का सफल प्रयास किया है. लेखक ने इस अंचल को किसी जिज्ञासु पर्यटक या खोजी पत्रकार की दृष्टि से बाहर-बाहर से नहीं देखा है, बल्कि वह इस अंचल का निवासी होने के कारण इसके सारे सुख-दुःख का स्वयं भोक्ता है. अतः इसकी प्रामाणिकता असंदिग्ध है. सभ्यता की दौड़ में पीछे छोड़ दिए गए एक हाशियाकृत अंचल से संबद्ध लेखक के मन की छटपटाहट का एक कारण इस द्वंद्व में भी निहित दीखता है कि वह विकास तो चाहता है पर इसके लिए निसर्ग की बलि देना उसे स्वीकार नहीं. 

आशा है, साहित्य-जगत इस वनवासी विमर्श का स्वागत करेगा; इसमें शामिल होगा. 
 - प्रो. देवराज 

अधिष्ठाता, अनुवाद विद्यापीठ, 
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी वि.वि., वर्धा