सोमवार, 31 मार्च 2014

बेलगाम - राष्ट्रीय संगोष्ठी - विचार सत्र 4

बाएं से - डॉ. रामजन्म शर्मा, डॉ, हीरालाल बाछोतिया, डॉ. दिलीप सिंह, डॉ. एम. वेंकटेश्वर और डॉ. ऋषभ देव शर्मा 

30 मार्च 2014.

भाषाविद डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया पर केंद्रित चौथे विचार सत्र की अध्यक्षता प्रमुख समाजभाषाविज्ञानी प्रो. दिलीप सिंह ने की. साथ में, डॉ. रामजन्म शर्मा, डॉ. एम. वेंकटेश्वर, डॉ. ऋषभ देव शर्मा और डॉ. हीरालाल बाछोतिया मंचासीन थे. 

प्रो. एम. वेंकटेश्वर 
डॉ. एम. वेंकटेश्वर ने डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया के कोशकार रूप को रेखांकित किया. उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि भाटिया जी के कोश 'अंग्रेजी-हिंदी अभिव्यक्ति कोश', 'हिंदी-अंग्रेजी मुहावरा लोकोक्ति कोश', 'अंग्रेजी-हिंदी प्रशासनिक कोश' आदि बहुत ही महत्वपूर्ण हैं तथा उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अनुवाद, राजभाषा, प्रयोजनमूलक क्षेत्र, प्रशासन आदि क्षेत्रों से जुड़े लोगों के लिए ये महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं. विशिष्ट प्रयुक्तिगत क्षत्रों में शब्द चयन के लिए मानक कोश हैं. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि कैलाशचंद्र भाटिया कोश निर्माण और कोश प्रयोग पर बल देते थे. वे जूनून के साथ काम करते थे. भाटिया जी ने द्वितीय भाषा शिक्षण के लिए भी सहायक सामग्री तैयार की थी. वे कुशल शिक्षक थे. 

प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने यह भी स्पष्ट किया कि इन हस्ताक्षरों के जाने से हिंदी भाषा, साहित्य और भाषाविज्ञान के क्षेत्र में रिक्तता पैदा हो गई है चूंकि दूसरी पीढ़ी अभी तक तैयार नहीं हो पाई. अतः उन्होंने साहित्य, भाषा, शिक्षण आदि क्षेत्रों से जुड़े हस्ताक्षरों से यह अपील की कि वे दूसरी पीढ़ी को तैयार करें. उन्होंने इस अवसर पर उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के कुलसचिव प्रो. दिलीप सिंह को बधाई दी क्योंकि वे निरंतर अगली पीढ़ी को तैयार करने में जुटे हुए हैं. इतना ही नहीं उन्होंने युवा पीढ़ी से कहा कि अहंकार को त्याग कर कार्य करने में जूनून के साथ जुट पड़े. उन्होंने आगे यह भी कहा कि यह सिर्फ गुरु के समक्ष अपने आपको समर्पित करने से संभव होगा.

डॉ. हीरालाल बाछोतिया 
डॉ. हीरालाल बाछोतिया ने कैलाशचंद्र भाटिया के अनुवाद चिंतन को उदाहरणों के साथ स्पष्ट किया और कहा कि भाटिया जी भाषा की मानकता की रक्षा करने के पक्षधर थे. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भाटिया जी ने प्रयोजनमूलक रूप को पारिभाषित करने के लिए विविधतापूर्ण सामग्री तैयार की और उनकी दृष्टि हमेशा भाषा के अनुप्रयोग पक्ष पर  रहती थी. आगे उन्होंने भाटिया जी के अनुवाद चिंतन को स्पष्ट करते हुए कहा कि वे अनुवाद और अनुवादक को दोयम दर्जे का न मानकर उच्च कोटि का मानते थे तथा उन्होंने हिंदी भाषा के आधुनिकीकरण के आलोक में अनुवाद की चर्चा की है. उनकी मान्यता है कि हर भाषा की अपनी निजी क्षमताएँ होती हैं. वे लोक बोलियों के पक्षधर थे. वे मानते थे कि भाषा मूलतः शब्द है और शब्द 'संस्कृति' के वाहक.  वे अक्सर इस बात पर बल देते थे कि जिस भाषा से अनुवाद कर रहे हैं उस भाषा से टकराना अनिवार्य है चूंकि दो शब्दोंकी  टकराहट से ही अर्थ की आग पैदा होती है. उन्होंने कैलाशचंद्र भाटिया के साथ गुजारे हुए क्षणों को भी याद किया.

प्रो. ऋषभ देव शर्मा 
डॉ. ऋषभ देव शर्मा ने कैलाशचंद्र भाटिया के काव्य भाषा संबंधी विचारों की व्याख्या करते हुए कहा कि भाटिया जी साहित्य के मर्मज्ञ ऋषि थे. उनकी स्मरण शक्ति विलक्षण थी. उन्हें प्राचीन कवियों से लेकर आधुनिक कवियों तक की अनेक काव्य पंक्तियाँ कंठस्थ थीं. काव्यभाषा के अध्ययन के लिए उन्होंने अपना निजी मॉडल अपनाया जो  ऐतिहासिक भाषाविज्ञान का अनुप्रयुक्त मॉडल है. वे यह मानते थे कि अनुभूति और अभिव्यक्ति में अन्योन्याश्रय संबंध है. उनकी मान्यता है कि वस्तु और रूप को अलग अलग नहीं देखा जा सकता. उनकी पुस्तक 'हिंदी काव्य भाषा की प्रवृत्तियाँ' में राउलवेल (शिलांकित काव्य) से लेकर नई कविता तक 22 निबंध सम्मिलित हैं. वे इन निबंधों में भाषा विकास के वर्तन बिंदुओं  को बार बार रेखांकित करते चलते हैं. वे साधारणता की ओर जाते हैं. वे मानते हैं की सृजनात्मकता के लिए तद्भवता और देशजता अनिवार्य है. वे हर निबंध के अंत में निर्भ्रांत टिप्पणी के रूप में अपनी स्थापना देते हैं. उनकी भाषा में वागाडम्बर नहीं है. वे मानते हैं  कि  काव्यभाषा के रूप में समय समय पर जनभाषा को ही अपनाया गया.

प्रो. रामजन्म शर्मा 
डॉ. रामजन्म शर्मा ने कैलाशचंद्र भाटिया के साथ बिताए हुए क्षणों को याद करते हुए कहा कि वे सरल और कोमल व्यक्ति थे; साथ ही कठोर, नियमबद्ध और अनुशासनप्रिय व्यक्ति भी. वे हालात से समौझाता नहीं करते. वे मानते थे कि  समाज ही भाषा का वास्तविक रजिस्टर होता है.

अत्यंत भावपूर्ण अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. दिलीप सिंह ने कहा कि कैलाशचंद्र भाटिया ने ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की धारा बदल दी. वे बोलीविज्ञान और क्षेत्रीय भाषाविज्ञान पर बल देते थे. उन्होंने यह आक्रोश वक्त किया कि कैलाशचंद्र भाटिया के बाद भाषाविज्ञान विशेष रूप से अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान में बहुत बड़ा गैप पैदा हो चुका है जिसे कवर पाना बहुत ही कठिन कार्य है. उन्होंने बल देते हुए कहा कि धीरेंद्र वर्मा और भाटिया जी ने हिंदी के लिए बहुत काम किया है जिसे देखना और समझना हमारा कर्तव्य है. उन्होंने आगे यह कहा कि आज वे भी लड़खड़ाते हुए उन्हीं पगडंडियों पर चलते हैं. उन्होंने कहा  कि सबकी अपनी अपनी मातृभाषाएँ हैं. इन मातृभाषाओं में  क्षेत्रीय विकल्प हैं. उन्होंने सबके सामने प्रश्न चिह्न लगाया कि उन बोलियों की ओर कितने लोगों का ध्यान जा रहा है. क्या उन विकल्पों पर कोई काम करेगा, उन बोलियों में लिखे गए साहित्य का अनुवाद किया जाएगा, या फिर पिछड़ों और दलितों की भाषा कहकर उन्हें यों ही नष्ट होने दिया जाएगा. ये ऐसे प्रश्न हैं जो बार बार प्रो. दिलीप सिंह को कचोट रहे हैं. वे इस बात से विचलित हैं कि आगे इन भाषाओं का क्या होगा! उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि भाषाविज्ञान के क्षेत्र में कितना शोधकार्य हो रहा है? उन्होंने कहा कि भाटिया जी के साथ साथ दस लोगों ने इस क्षेत्र में कार्य किया अपने निजी मॉडल के साथ, पर उनकी भी अपनी अपनी सीमा थी.

प्रो.दिलीप सिंह के साथ
प्रो. एम. वेंकटेश्वर और प्रो. ऋषभ देव शर्मा
 
प्रो. दिलीप सिंह ने यह याद दिलाया कि रमानाथ सहाय, कैलाशचंद्र भाटिया और रवींद्रनाथ श्रीवास्तव ने मिलकर एन सी ई आर टी के लिए हिंदी का व्याकरण तैयार किया था जिसमें कामताप्रसाद गुरु जी के व्याकरण की सीमाओं को पहचान कर आधुनिक और व्यावहारिक व्याकरण का निर्धारण किया गया था  क्योंकि गुरु जी के समय तक  आधुनिक हिंदी का इतना विकास नहीं हुआ था. लेकिन आज तक भी व्याकरण की यह किताब एन सी ई आर टी के गोदाम में  धूल फाँक रही है.  उन्होंने यह भी कहा कि भाटिया जी बोली के बिना भाषा की बात स्वीकार नहीं करते. उनकी मान्यता है कि बोलियों का एसेंस/ स्वाद/ ज़ायका किसी भी साहित्य के लिए अनिवार्य तत्व है.

इस सत्र का संचालन स्नातकोत्तर कॉलेज, बेलगाम के प्राध्यापक डॉ. माधव बागी ने किया.
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