रविवार, 12 जनवरी 2014

चेन्नई अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मलेन : विचार सत्र 3

आज के चौथे सत्र का विषय रहा 'आज के संदर्भ में नारी के प्रति पुरुषों की मानसिकता'. इस सत्र के अध्यक्ष थे डॉ. गंगा प्रसाद विमल. डॉ. शौरीराजन, डॉ. बालकृष्ण शर्मा रोहिताश्व, डॉ. ललिताम्बा, डॉ. एन. लक्ष्मी, डॉ. साई प्रसाद, संतोष परिहार, सुशीला सिंह और संपत देवी मुरारका मंचासीन थे. इस सत्र में कुल 19 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए. 

अपनी अध्यक्षीय टिप्पणी में डॉ. गंगा प्रसाद विमल ने कहा कि यह बहुरंगी विमर्श है. पुरुष की स्त्री- दृष्टि को देखने के लिए साहित्यिक प्रमाणों के आधार पर ठोस निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं, परंतु ऐसे प्रयास बहुत कम मिलते हैं. उन्होंने यह कहा कि स्त्री-पुरुष के बिना युग्म सृष्टि का निर्माण नहीं हो सकता है. इस समूची सृष्टि में हम लोग कैद हैं. हम समझ नहीं पा रहे हैं कि स्त्री-पुरुष क्या है. स्त्री-पुरुष का असंतुलन विनाश पैदा करता है. विकृत मानसिकता के कारण ही इस समाज में बलात्कार जैसे  जघन्य अपराध हो रहे हैं. 

उन्होंने आगे कहा कि इस समाज में पितृसत्तात्मक और मातृसत्तात्मक पक्ष हैं. मातृसत्तात्मक समाज में बलात्कार नहीं होते. वहाँ वरण की स्वतंत्रता है. स्त्री-पुरुष के झगड़े स्वतंत्रता को लेकर है. स्वतंत्रता के हनन के कारण ही लड़ाई हो रही है. आजादी के बाद के हिन्दुस्तान की तस्वीर में पिछडा हुआ कानून है. आज भी उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में कन्या भ्रूण हत्या की संख्या ज्यादा है. स्त्रियों का सामूहिक रूप में इसके विरोध न उठ खड़े होना भी इसका बड़ा कारन है. पुरुष वर्चस्व से दबी स्त्रियाँ पंचायतों में उपस्थित होकर भी स्त्री विरोधी फैसलों का प्रतिरोध नहीं कर पातीं. पश्चिम में यह स्थिति नहीं है. 

प्रो. गंगा प्रसाद विमल ने आगे कहा कि आज के स्त्री लेखन को यदि देखें तो पता चलता है कि स्त्री को देह बनाने में पुरुष के जाल का विस्तार किया जा रहा है. स्त्री को देह बनाने का धंधा कॉरपोरेट जगत का है. कॉर्पोरेट जगत, फिल्मी दुनिया, मेडिकल फील्ड, व्यवसाय आदि क्षेत्रों में स्त्रियों के प्रति भयंकर वीभत्स मनोवृत्ति विद्यमान है. स्त्रियों को उनके अधिकार का लाभांश बहुत कम मिल रहा है. इस तरह के धंधे में जो शामिल हैं उन्हें सजा मिलनी चाहिए. 

उन्होंने यह भी कहा कि स्त्री-पुरुष में मोह/ संवेदना का संबंध यदि न हो तो समाज का विकास नहीं हो सकता है. अतः इन्हें अलग करके देखना नहीं चाहिए. प्रेम और संवेदना नष्ट हो जाएगी तो स्त्री देह भर रह जाएगी. अपराध बढ़ जाएगा. सृजनात्मक दृष्टि के लिए स्त्री और पुरुष के बीच संतुलन की आवश्यकता है. यह संतुलन युग्म सृष्टि के लिए अनिवार्य है. 
- जी. नीरजा