सोमवार, 13 जनवरी 2014

चेन्नई अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मलेन : विचार सत्र 4

12 जनवरी 2014.

'विदेशों में हिंदी का स्वरूप' विषय पर केंद्रित इस विचार सत्र की अध्यक्षता डॉ. हबीबुल्लो रजाबोव (तजकिस्तान) ने की. प्रो. ऋषभ देव शर्मा, कृष्ण कुमार ग्रोवर, डॉ. साई प्रसाद, डॉ. प्रणातार्तिहरण, डॉ. अनिरुद्ध सेंगर, डॉ. नरेंद्र मिश्र, डॉ. मुकेश  मिश्र, डॉ. व्यास नारायण दुबे, डॉ. वत्सला किरण और डॉ. जगन्नाथ रेड्डी मंचासीन थे. इस सत्र में कुल 14 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए. 

प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि जो भारतवंशी अंग्रेजों के समय भारत से मारीशस- सूरीनाम आदि स्थानों में  गए , वे अपने साथ अपनी भाषा तथा अपनी बोली को भी  लेकर गए और वहाँ की भाषा से भी प्रभावित हुए. परिणामस्वरूप  वहाँ नए भाषा रूपों अथवा कोड़ों का विकास हुआ. मारीशस में फ्रेंच के दबाव के कारण पिजिन विकसित हुई. बाद में वह मातृबोली के रूप में प्रतिष्ठित होकर क्रियोल बन गई. कोड मिक्सिंग की प्रवृत्ति उनकी व्यावहारिक भाषा में परिलक्षित है तथा एक सीमा तक साहित्य में भी. परन्तु व्यापक रूप में वहां के लेखन में भी मानक हिंदी ही प्रयुक्त दिख रही है क्योंकि उसकी रचना भारत के पाठक को ध्यान में रखकर की जा रही है.उन्होंने आगे कहा कि हिंदीतर देश में एक भिन्न प्रकार की हिंदी प्राप्त होनी चाहिए लेकिन ऐसा बहुत कम देखने में आया है. सूरीनाम आदि में भोजपुरी के पुराने रूप के संरक्षण की प्रवृत्ति पर भी डॉ. ऋषभ ने सोदाहरण प्रकाश डाला.     

दूसरा वर्ग वह है जिसने आजादी के पश्चात विदेश जाकर कॉर्पोरेट जगत में अपने आपको स्थापित कर लिया है. वे अब अपनी तीसरी पीढी को भारतीय संस्कृति से जोड़ने की खातिर अपनी भाषा को कायम रखना चाहते हैं. इस वर्ग के लेखकों की हिंदी  में अधिक तत्समता दिखाई देती है. उन्होंने आगे कहा कि विदेशों में हिंदी के स्वरूप पर बहुत गंभीर और सूक्ष्म अध्ययन की जरूरत है.  तीसरे वर्ग में डॉ. ऋषभ देव शर्मा ने कई देशों में  उर्दू शैली के रूप में हिंदी के व्यवहार की भी चर्चा की.  

अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. हबीबुल्लो रजबोव  ने कहा कि हिंदी सबकी सहोदरा भाषा है. उन्होंने आगे कहा कि एक भाषा महात्मा गांधी की भाषा है, एक जवाहरलाल नेहरू की भाषा है और एक प्रेमचंद की भाषा है. उन्होंने यह सूचना दी कि तजाकिस्तान के तीन विश्वविद्यालयों में हिंदी सिखाई  जा रही  है और वहाँ के लोग हिंदी भाषा से बहुत प्यार करते हैं
   
-जी. नीरजा