सोमवार, 7 जून 2021

केवल शिक्षामंत्री नहीं हैं रमेश पोखरियाल 'निशंक'

पुस्तक समीक्षा

 

केवल शिक्षामंत्री नहीं हैं रमेश पोखरियाल 'निशंक'

- समीक्षक: डॉ. सुपर्णा मुखर्जी


समकालीन भारत में अगर आपको चर्चित होना है, तो आप राजनेता और अभिनेता बन जाइए, रातों रात आप प्रसिद्धि के चरमशिखर पर पहुँच जाएँगे। पर साहित्यकार बनकर प्रसिद्धि पाने में समय और संयम दोनों की आवश्यकता पड़ती है। उसमें भारतीय भाषाओं के साहित्यकार को प्रसिद्धि के साथ-साथ पाठकों की संख्या बढ़ोतरी के लिए भी प्रतीक्षा करनी पड़ती है। चेतन भगत, शोभा डे आदि अंग्रेज़ी-लेखकों के बारे में यहाँ बात नहीं हो सकती, वे दूसरे कारणों से अपवाद हैं। यह भारत का सौभाग्य और दुर्भाग्य दोनों है। अब देखिए, हमें पता है रमेश पोखरियाल 'निशंक' केंद्रीय शिक्षा मंत्री हैं, पर पूरे देश में कितने लोगों को पता है कि 'निशंक' जी यशस्वी साहित्यकार भी हैं? शायद बहुत कम। '1990 में साहित्यांचल संस्था (कोटद्वार) ने उन्हें 'निशंक' उपनाम दिया'। (तत्त्वदर्शी निशंक, पृष्ठ 293)। 'निशंक' शब्द का अर्थ है शंकाहीन; निडर। हिमालय पुत्र रमेश पोखरियाल वाकई इस उपनाम को सुशोभित करने का सामर्थ्य रखते हैं। केवल देश ही नहीं विदेशों तक उनकी पहचान है। लेकिन अभी भी उन्हें लेकर जितनी गहन चर्चा होनी चाहिए, नहीं हुई है। संपादक प्रो. ऋषभदेव शर्मा और सह संपादक शीला बालाजी के नेतृत्व में छपी विवेच्य पुस्तक 'तत्वदर्शी निशंक' (2021) इस शून्य को भरने का एक सार्थक और सफल प्रयास है। जैसा कि डॉ. योगेंद्र नाथ शर्मा 'अरुण' जी ने आशीर्वचन देते हुए लिखा है, 'हिमालय-पुत्र रमेश पोखरियाल 'निशंक' की साहित्य-साधना का जैसा अभूतपूर्व भावभिनंदन 'तत्त्वदर्शी निशंक' ग्रन्थ के माध्यम से किया गया है, वैसा अभी तक नहीं हुआ है।' आगे अरुण जी ने यह भी लिखा है, 'कुल छह खंडों में विनयस्त करके बहुआयामी साहित्य-साधक रमेश पोखरियाल 'निशंक' के सम्पूर्ण रचना-कर्म का गहन मूल्यांकन दक्षिण भारत के हिन्दी-सेवी साहित्य-साधकों द्वारा कराया जाना, स्वयं में ही एक विलक्षण कार्य कहा जा सकता है।' (तत्त्वदर्शी निशंक, पृष्ठ 7)। निजी अनुभवों से 'निशंक' ने जो साहित्य-विवेक अर्जित किया है, संघर्ष उसका बीज-शब्द है। वे मानते हैं कि, "संघर्ष और चुनौतियों से जो रिश्ता हमारे जीवन का है, वही रिश्ता सार्थक साहित्य का भी है। प्रतिबद्धता की मशाल जलाए निरंतर अन्याय व अँधेरे से जूझना इन दोनों का धर्म है। जीवन और साहित्य तभी सार्थक हैं, जब ये जनोन्मुखी और जन-सरोकारी हों। लोकहित की भावना से अनुप्राणित हों। साहित्य की भी इसलिए कलागत उपयोगिता से जीवनगत उपयोगिता ज्यादा है।" (पृष्ठ 11)।


साहित्य की बात हो और सौन्दर्य की चर्चा न हो, ऐसा कैसे हो सकता है? आत्मवादी दार्शनिक क्रोचे मानते हैं, 'Aesthetics is the science of the expressive activity'. प्रसिद्ध आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा कहते हैं, 'सौन्दर्यशास्त्र दर्शन का एक अंग है, जिसका उद्देश्य सौन्दर्य तथा उसकी अनुभूति की व्याख्या करना है'। 'निशंक' ने साहित्य और सौन्दर्य के इस सहसंबंध को न केवल समझा, बल्कि उसे स्वीकार भी किया है। उनकी रचनाओं में बलपूर्वक सौन्दर्य को नहीं खोजना पड़ता। उन्होंने अपनी रचनाओं में साहित्यिक सौन्दर्य को मानवीय मूल्यों में स्थापित किया है। कवि की संवेदना इन शब्दों में व्यक्त होती है - 'सदा शांति पथ पर चलना है,/हमने ध्येय बनाया था।/ राग द्वेष हिंसा को तज कर,/ स्नेहिल विश्व बनाया था।।' (पृष्ठ 53)।


'प्रतीक्षा' खंडकाव्य के 'क्रांति पर्व' में कवि की सामाजिकता में मानवीय सौन्दर्य के दर्शन होते हैं- 'मानवता के नाते हमने,/ सबको ही सम्मान दिया।/ छल बल करनेवालों से तो, /हम निपट आएँगे ठान लिया।।' (पृष्ठ 59)। सौन्दर्यशास्त्र के प्रमुख अंग हैं- कल्पना, प्रतीक, बिम्ब, अलंकार, नव रस आदि। 'निशंक' की कविताओं में सौन्दर्य के इन सभी प्रतिमानों को भली भाँति देखा जा सकता है और डॉ. निर्मला एस. मौर्य ने 'उद्देश्य की महानता में सौन्दर्य का रहस्य' नामक आलेख के द्वारा 'निशंक' की रचनाओं में व्याप्त सौन्दर्य का विस्तृत विश्लेषण किया है।

जहाँ डॉ. एन. लक्ष्मीप्रिया ने यह दर्शाया है कि, 'निशंक जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज और साहित्य के बीच सेतु का कार्य किया है।" (पृष्ठ 88)। वहीं 'देशप्रेम की चेतना' में डॉ. सुपर्णा मुखर्जी ने लक्षित किया है कि, 'आज के यांत्रिक युग में जब किसी के घर में बच्चे के जन्म के होने पर वह डॉक्टर बनेगा या इंजीनियर, वकील या कलाकार, इन बातों को लेकर हँसी-मज़ाक, वाद-विवाद का माहौल बन जाता है, ऐसे समय में 'प्रतीक्षा' (खंडकाव्य) की माँ ईश्वर से प्रार्थना कर रही है -हे ईश्वर मेरे दीपू को/ परम शक्तिशाली कर दो।/ रहे देश-सेवा में तत्पर/ ममता भी मन में भर दो।।/ अरमानों को कुचल न देना।/ हे प्रभु, इतना तो सुन लो।।/ बेटा वीर बने मेरा फिर/ मुझको तुम जितना दुख दो।।' (पृष्ठ 69)। इसी प्रकार डॉ. भागवतुल हेमलता का मत है कि, 'निशंक की कविताओं में एक खास तरह की सृजनात्मकता एवं रचनात्मक ऊर्जा दिखाई पड़ती है। उनकी प्रत्येक पंक्ति एक प्रेरणा होती है और प्रत्येक प्रेरणा मार्गदर्शी होती है।' (पृष्ठ 84)।

'निशंक' का हिन्दी साहित्य में पदार्पण कवि के रूप में हुआ। उनके काव्य का मूल स्वर राष्ट्रीयता होने के कारण उनकी गणना राष्ट्रीय कवि के रूप में की जाती है।' (पृष्ठ 45)। लेकिन कहानीकार तथा उपन्यासकार के रूप में भी उनकी पहचान कुछ कम नहीं है। उनकी कहानियों में 'आदर्श और यथार्थ' के सम्मिलित रूप को देखा जा सकता है। 'रमेश पोखरियाल 'निशंक' एक ऐसे समसामयिक साहित्यकार हैं जिन्होंने अपनी अनुभूत सच्चाइयों को अपनी रचनाओं की विषय-वस्तु बनाया है। उनकी कहानियों में एक ओर आदर्श का प्रतिफलन है तो दूसरी ओर यथार्थ का।' (पृष्ठ 104)। डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने उनकी कहानियों में व्याप्त 'आदर्श और यथार्थ' से सम्बन्धित चेतना का गहन अध्ययन इस पुस्तक में किया है। उन्होंने अपने आलेख को 13 भागों में बाँटकर, 'निशंक' की कहानियाँ 'आदर्श और यथार्थ' के धरातल पर कितनी खरी उतरती है, इसका गंभीर अध्ययन किया है। उनके इस अध्ययन के सहारे ही हम पाठक इस तथ्य से अवगत हो सके हैं कि 'निशंक' विवेकानंद के विचारों से प्रभावित हैं, अतः उनकी सोच सकारात्मक है।

'निशंक' विवेकानंद के विचारों से कितने प्रभावित हैं, यह समझने के लिए उनकी रचना 'संसार कायरों के लिए नहीं' का अध्ययन करना बहुत आवश्यक है। सन् 2014 में यह रचना प्रकाशित हुई, जिसमें 72 लेखों के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण से संबंधित तथ्यों पर प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक को ही डॉ. सुरेश भीमराव गरुड़ ने अपने आलेख का विषय बनाया है। इस पुस्तक की महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें 'स्वामी विवेकानंद के उन मृत्युंजयी विचारों को लिया गया है, जिनसे आज के संदर्भों में कायाकल्प लाया जा सकता है।' (पृष्ठ 281)। 'स्वामी विवेकानंद ने 1897 में ही यह घोषित किया था कि भारत अगले पचास वर्षों में स्वतंत्र हो जाएगा। उन्हें यह चिंता कदापि नहीं थी कि भारत स्वतंत्र होगा कि नहीं होगा, पर उनकी चिंता यह थी कि क्या भारत यह स्वतन्त्रता कायम रख सकेगा। इस दिशा में ही उन्होंने कार्य किया। प्रत्येक भारतवासी को भीतर से संस्कारित करने का कार्य स्वामी जी ने किया।' (पृष्ठ 283)। 'निशंक' जी ने स्वामीजी के इन विचारों का गहन अध्ययन किया। इस अध्ययन का प्रभाव उनके व्यक्तित्व तथा उनकी रचनाओं पर भी पड़ा। वे सकारात्मक बन सके और इसी सकारात्मक सोच के कारण उन्होंने अपनी कहानियों के अनेक मानवीय पात्रों के साथ-साथ जीव-जन्तुओं में भी समर्पण भाव को दिखाया है। 'और मैं कुछ नहीं कर सका' शीर्षक कहानी का डब्बू (घोड़ा) अपने मालिक दयाल की जान बचाने के लिए अपनी जान दाँव पर लगा देता है। यह इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प के सहारे ही सम्भव है। (पृष्ठ 107)। दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ ही बलिदान भाव, श्रद्धा और समर्पण भाव का होना भी आवश्यक है। 'निशंक' ने अपनी कहानी 'अंतिम क्षण तक' में इन भावनाओं को दर्शाया है। जंगल में लगे दावानल को बुझाने के लिए जब कोई आगे नहीं आता, तब चंदू अकेले ही जूझ पड़ता है। जंगल ही मानो उसका घर है- 'आदमी को अपनी औलाद से जितना लगाव होता है, उससे भी अधिक लगाव उसे इन पेड़-पौधों से हो गया था। सारा जीवन ही उसने इसमें बिता दिया था।' (पृष्ठ 107)।

डॉ. डॉली मौर्य ने इस प्रसंग को लेकर चर्चा की है कि 'निशंक' जी की कहानियाँ 'समकालीन परिवेश' के साथ कैसे जुड़ती हैं। आज के लॉकडाउन की परिस्थिति में उनकी कहानी 'आशियाना' को देखना प्रासंगिक है। 'इसमें यह दिखाया गया है कि ये मजदूर जहाँ बस जाते हैं, वहीं अपना घर बना लेते हैं।' (पृष्ठ 127)। रुक्मिणी, उसकी बहू और बेटा शहर आकर एक औद्योगिक निर्माण में मजदूरी करने लगते हैं। वे जिस बस्ती में रहते थे, उस बस्ती की ज़मीन को सेठ रतनलाल हथियाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने बस्ती में आग लगवा दी। उन्होंने लोगों की जान की भी परवाह नहीं की। अंत में यह दिखाया गया है कि मजदूर इतना सब होने के बाद भी हताश नहीं होते, 'बस कर उजड़ना और फिर से बसना ही उनकी जैसे नियति बन गई है।' (पृष्ठ127)।

डॉ. श्रीलता विष्णु और डॉ. सुषमा देवी ने 'निशंक' की 'टूटते दायरे', 'जग की रीत', 'अतीत की परछाइयाँ,' 'खड़े हुए प्रश्न', 'अंतहीन', 'कैसे संबंध', 'एक थी जूही', 'अनजान रिश्ता' आदि अनेक कहानियों का गहन अनुशीलन किया और इस अनुशीलन का निष्कर्ष यही निकला कि, 'लेखक की पैनी दृष्टि से जीवन का कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहा है। उन्होंने समाज की सदियों की परम्परा को आगे बढ़ानेवाली इन सारी बातों को अपनी कहानियों में उकेरा है।' (पृष्ठ 172)। ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने 'समाज दर्शन और राष्ट्रवाद' नामक अपने आलेख में बहुत सही प्रतिपादन किया है कि, 'निशंक का समाज दर्शन और राष्ट्रवाद उन कोणों पर टिका हुआ है, जो सामाजिकता के सतरंगी सपनों से निर्मित होते हैं, परन्तु इन सपनों को धड़कने के लिए अमानवीय वेदना से गुजरना पड़ता है। ये सपने कभी टूटते भी हैं, बिखरते भी हैं, रोते और बिलखते भी हैं, परन्तु वे अपने साथ एक सशक्त और उन्नत राष्ट्र की अवधारणा लेकर चलते हैं। इन सपनों के रंगों में ऊँच-नीच, अमीर-गरीब और छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं है।' (पृष्ठ 141)।

प्रो. गोपाल शर्मा 'तत्वदर्शी निशंक' के सम्बन्ध में लिखते हैं,"निशंक के कथा-सागर में समाज भी है और समाज की अच्छी-बुरी रीतियाँ भी, पर जनरुचि को विकृत करनेवाले प्रसंग नहीं। समाज के विद्रूप का चित्रण है तो इसलिए, क्योंकि परिदृश्य समकालीन है।" (पृष्ठ 344)। इस संदर्भ में उनकी 'कैसे संबंध' कहानी की चर्चा डॉ. संगीता शर्मा ने की है। उसके मूल तत्व को यहाँ देखना समीचीन होगा। 'लिव- इन- रिलेशनशिप को न्यायिक प्रक्रिया द्वारा वैध ठहराया गया है। भावी पीढ़ी धीरे-धीरे विवाह जैसी संस्था को निरस्त कर देगी और सामाजिक मूल्यों का पतन हो जाएगा। हमारी संस्कृति का ह्रास हो जाएगा, जिसकी चिंता लेखक को भी है, इसलिए उन्होंने 'कैसे संबंध' जैसी कहानी द्वारा एक तरह से चेतावनी दी है और यह जताने की कोशिश की है कि यदि हमारी संस्कृति और हमारे संस्कारों को नकारा जाएगा तो वह आनेवाली पीढ़ी के लिए हज़ारों मुश्किलों को न्योता देने के समान होगा।" (पृष्ठ 313)।

'बालपन से ही कर्मठ रहे बालक रमेश को विद्याध्ययन के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। बचपन से पढ़ाई में रुचि होने के कारण वे प्रतिदिन ऊँची पहाड़ी की सात किलोमीटर की पैदल यात्रा किया करते थे। गाँव से स्कूल के बीच घने जंगल और गाड़-गधेरों को पार करना पड़ता था। एक बार तो वे उफनते गधेरे में बह गए थे। मगर अपने विवेक और ईश्वर की कृपा से बच गए।' (पृष्ठ 40)। उनके साहित्य के गंभीर अध्येता प्रवीण प्रणव ने 'आपदा के वह भयावह दिन' और 'प्रलय के बीच' नामक निशंक जी के दो संस्मरणों को अपने आलेख का विषय बनाया है। प्रवीण प्रणव लिखते हैं, "निशंक का लेखन सरल और प्रभावी है। मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत संदर्भों का विवरण इस बारीकी से किया गया है कि पाठक अपने आप को भी 'निशंक' के साथ आपदा की इस घड़ी में गाँववालों के साथ खड़ा पाते हैं।" (पृष्ठ 227)। 'आपदा के वह भयावह दिन' नामक संस्मरण में 'निशंक' जी ने उत्तराखंड के बारे में लिखा है, "भारत के मस्तक पर सुशोभित हिमालय के हृदय, इस उत्तराखंड का कण-कण इसी हिमालय से पोषित, पल्लवित और पुष्पित है। यहाँ की अलौकिक छटा, प्राकृतिक सम्पदाओं का अनुपम खजाना और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत संसार इसी दिव्य हिमालय की देन है। दिखने में भले ही मिट्टी, पत्थर और बर्फ से निर्मित प्रकृति की बेजान कृति लगता है, मगर है यह साक्षात् 'शिव स्वरूप', 'जाग्रत और चैतन्यशील', इसलिए शिव की तरह सृजन और संहार इसके स्वभाव में है।" (पृष्ठ 226)। 'निशंक' ने इस सृजन तथा संहार दोनों को बहुत पास से देखा। इसी कारण से ये संस्मरण केवल संस्मरण न होकर 'आपदा प्रबंधन और आपदा की स्थिति में बचाव कार्य कैसे किया जाना चाहिए, इस दिशा में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। दोनों संस्मरण न केवल उत्तराखंड प्रशासन और सरकार से जुड़े सभी लोगों के लिए, बल्कि किसी भी पर्वतीय राज्य के निवासियों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि आपदा की घटनाओं में ये सफलता और विफलता दोनों की कहानी समेटे हैं।' (पृष्ठ 255)।

ऐसे जीवटभरे रचनाकार के उपन्यासों में 'पहाड़ी जीवन का जीवंत दस्तावेज' न दिखाई पड़े, यह कैसे हो सकता है? विवेच्य ग्रंथ 'तत्वदर्शी निशंक' के चतुर्थ खंड 'उपन्यास सृष्टि' में डॉ. बी. बालाजी और डॉ. मंजु शर्मा ने निशंक के उपन्यासों में वर्णित विभिन्न पहाड़ी आयामों का विश्लेषण किया है। डॉ. बी. बालाजी ने मेजर निराला, बीरा, निशांत, कृतघ्न, प्रतिज्ञा, छूट गया पड़ाव आदि उपन्यासों का गहन अध्ययन करने के बाद निष्कर्षतः बहुत अच्छी बात कही है कि, 'रमेश पोखरियाल 'निशंक' समकालीन संदर्भ में पहाड़ी जनजीवन की पृष्ठभूमि पर भारतीय संस्कृति और सभ्यता के अंकन का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने एक ओर जहाँ पर्वतीय जनसमुदाय की जीवन-शैली के विभिन्न रूप-रंग, संस्कृति को अपनी लेखनी से उकेरा है, वहीं उसके उत्थान के लिए जीवन की विभिन्न समस्याओं के समाधान भी खोज निकाले हैं। हिंदी साहित्य में प्रेमचंद, बाबा नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, शिवप्रसाद सिंह, रामदरश मिश्र, मिथिलेश्वर आदि ग्रामीण परिवेश की कथा लिखने में सिद्धहस्त साहित्यकारों की सूची में रमेश पोखरियाल 'निशंक' के रूप में एक और नाम जोड़ा जा सकता है।" (पृष्ठ 206)।

डॉ. मंजु शर्मा ने डॉ. बी. बालाजी की विचार-शृंखला को आगे बढ़ाते हुए इस विषय को ठोस तथ्यों के द्वारा प्रेषित किया है कि पहाड़ी जीवन में 'चेतना के विविध आयाम' कैसे उभरते हैं और उन्हें 'निशंक' ने अपने उपन्यासों में कैसे उभारा है। 'लेखक ने पहाड़ी जीवन का अध्ययन बहुत नजदीक से किया है, तभी वे लिख सके कि पहाड़ की अर्थव्यवस्था को मनीआर्डर-व्यवस्था कहते हैं। प्रायः पहाड़ के हर परिवार का एक आदमी फौज में होता है, जो छुट्टियों में कैंटीन से सस्ती शराब लाता है और पूरा गाँव संग बैठकर उसका आनंद उठाता है, लेकिन यह क्षणिक आनंद युवाओं संग अन्यों को भी शराब का आदी बना देता है, जिससे नशे की हालत में वे दुष्कर्म तक का प्रयत्न करते हैं। उनकी कुचेष्टा का शिकार प्रत्यक्ष रूप से लड़कियों को होना पड़ता है। दूर-दराज जाकर पढ़नेवालों की पढ़ाई तक रोक दी जाती है, सुरक्षा के नाम पर।' (पृष्ठ 304)।

उल्लेखनीय है कि साहित्यकार 'निशंक' जी का मानना है कि, 'उनके लिए रचनाकार होने की कोई बुनियादी शर्त नहीं है; बस इतना ही कि संवेदनशील कल्पना और सपनों को साकार करने के संकल्प ने उन्हें साहित्य की विविध विधाओं से जोड़ा है। उनके लिए लिखना बस लिखना नहीं, बल्कि ज़िन्दगी के तमाम उतार-चढ़ावों को जीवंतता से अपनी रचनाओं में उड़ेलना है- उनके सारे सृजन की बुनियाद अंतःस्थल की यही संवेदनशीलता है।" (भूमिका: तत्वदर्शी 'निशंक', ऋषभदेव शर्मा)। प्रो. गोपाल शर्मा ने, तत्वान्वेषी साहित्यकार की क्या पहचान होती है, इस विषय में कहा है कि ,'एक तत्वान्वेषी साहित्यकार के लिए जीवन का ध्येय सत्य से साक्षात्कार होता है।' (पृष्ठ 333)। आगे प्रो. गोपाल शर्मा लिखते हैं, 'उपनिषदों के सार तत्व श्रीमद्भगवद्गीता में जीवन के दो आदर्श बताए गए हैं- आत्म-लाभ और लोक-संग्रह। 'निशंक' को इस अर्थ में तत्वदर्शी कहा जा सकता है, क्योंकि वे एक ओर तो व्यक्तित्व विकास और आत्म-कल्याण के लिए साहित्य और साहित्येतर लेखन करते हैं, दूसरी ओर लोक में मर्यादा बनाए रखने के लिए लोक-संग्रह की भावना से रचनात्मक लेखन की ओर प्रवृत्त होते हैं।' (पृष्ठ 336)। यह स्थापना शत-प्रतिशत सही है और 'निशंक' जी इस निकष पर खरे उतरते हैं। उनके कविता संग्रह 'मुझे विधाता बनना है' में मनुष्य के अदम्य साहस की पराकाष्ठा है। 'ऋतुपर्ण' शीर्षक कविता में कवि ने अपने देशप्रेम की ऊंचाइयों को छूते हुए कहा है कि- जिसने मुझको जन्म दिया है/ और महत मानव का तन/ उसी राष्ट्र को है मेरा/ सदा समर्पित यह तन-मन।" (पृष्ठ 311)।

डॉ. रमेश पोखरियाल की 'विश्व दृष्टि' अत्यंत प्रशस्त और उदार है। मिलन विश्नोई ने 'निशंक की विश्व दृष्टि पर प्रकाश डालते हुए कहा है,'निशंक की कहानियों को पढ़कर पहले-पहल यकीन नहीं होता कि एक राजनेता के दिल में इतनी संवेदनाएँ हो सकती हैं। 'निशंक' के साहित्य को पढ़ने से अनुभव होता है कि लेखक ने गरीब मजदूरों और महिलाओं की करुण कहानी को यथार्थ अनुभव के आधार पर गढ़ा है।' (पृष्ठ 318)। निशंक 'अब गाँव चलें' कविता के माध्यम से समाज के युवाओं के साथ संवाद स्थापित करने की कोशिश करते हैं- 'बाट तुम्हारी राह जोहती,/ नदियाँ हैं अकुलाई,/ पवन के झोंके तो ठहरे हैं, कलियाँ भी मुरझाई।/ ईर्ष्या की लपटों से बचकर तरु की छाँव चलें/ छोड़ सभी आडंबर जग के, आ अब गाँव चलें।' (तत्वदर्शी निशंक, पृष्ठ संख्या-319)।

डॉ. उषा रानी राव ने 'निशंक' की विश्व दृष्टि पर चर्चा करते हुए बड़ी अच्छी बात कही है, 'एक लेखक साहित्यिक मूल्यों की सजीवता को व्यक्त करने के लिए संवेदना जगत के परिवर्तित जगत में विचरण करता है, जहाँ उसे कविता, कहानी, खंडकाव्य उपन्यास आदि विभिन्न विधाओं में जीवन और जगत के चाक्षुष तानों-बानों से विकसित अपनी अनुभूति को शब्द देना होता है। रमेश पोखरियाल 'निशंक' इसी प्रकार के सार्थक रचनाकर्म में निरत व्यक्तित्व रहे हैं।' (पृष्ठ 330)। यही कारण है कि उनके समग्र साहित्य का अनुशीलन करके डॉ. चंदन कुमारी इस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं कि, 'रमेश पोखरियाल निशंक का साहित्य जीवन में आस्था बढ़ानेवाला है। वह विपरीत परिस्थितियों से जूझने की प्रेरणा देते हुए मानव मन में अदम्य साहस भरता है और जीने का उल्लास जगाता है।' (पृष्ठ 308)

यहाँ एक बात और कहना चाहूँगी कि यह एक दुष्प्रचार ही है कि 'दक्षिण में हिंदी को लेकर काम नहीं होता या हिंदीभाषियों को ही हिन्दी की अच्छी समझ होती है। प्रस्तुत पुस्तक में लिखनेवाले लेखक हिंदीभाषी ही नहीं, मराठीभाषी, तेलुगुभाषी, बांग्लाभाषी, मलयालमभाषी, कन्नड़भाषी और तमिलभाषी हैं। ये सभी तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल तथा सुदूर अंडमान और निकोबार में हिंदी की सेवा अध्यापक, पत्रकार और लेखक के रूप में समर्पण-भाव से कर रहे हैं। इस प्रकार यह ग्रंथ दक्षिण में हिंदी की स्थिति को दर्शाने वाला प्रामाणिक ग्रंथ भी है। ///

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समीक्षित पुस्तक- "तत्त्वदर्शी निशंक"

संपादक- प्रो. ऋषभदेव शर्मा

प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली

संस्करण- प्रथम, 2021

मूल्य- सात सौ रुपए

पृष्ठ- 352 (सजिल्द)।

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समीक्षक- 

डॉ. सुपर्णा मुख़र्जी,

हिंदी प्राध्यापक,

सेंट ऐंस जूनियर एंड डिग्री कॉलेज फॉर गर्ल्स एंड वीमेन

मल्काजगिरी, हैदराबाद - 500047.

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बुधवार, 5 मई 2021

(पुस्तक समीक्षा) डॉ. निशंक के साहित्य का समग्र विवेचन : तत्त्वदर्शी निशंक'

डॉ. निशंक के साहित्य का समग्र विवेचन 

तत्त्वदर्शी निशंक'

समीक्षक : डॉ सुषमा देवी

जब एक साहित्यकार मनुष्य की संवेदना को जीवन के थपेड़ों में भी संजोए रखने का साहस करे तो समझ जाना चाहिए कि वह हर विपरीत दिशा को मोड़ने में सक्षम है | जीवन तत्वों को अपनी रचनाधर्मिता में विन्यस्त करते हुए ‘तत्वदर्शी निशंक’ जब विविध विद्वानों की लेखनी की धार से पार होकर प्रकट होते हैं, तो वे राष्ट्रवादी, विश्व मानवतावादी डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ बनकर कालजयी साहित्यकार बन जाते हैं| भारत देश के वर्तमान शिक्षामंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का राजनीतिक क्षेत्र में आना, वह भी शिक्षामंत्री के रूप में कार्यरत होना, सोने पर सुहागा हो गया है| क्योंकि भारत के स्वर्णिम वर्तमान एवं भविष्य के लिए ऐसे ही तत्वदर्शी की आवश्यकता है, जो ‘सार सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय’ की राह पर चलने का आकांक्षी हो| वे राजनीति के क्षेत्र में एक ऐसे अभिमन्यु हैं , जो चक्रव्यूह के घेरे को तोड़ने में सतत सन्नद्ध हैं| उन्हीं के शब्दों में- ‘दुष्प्रचार की आंधी में भी, निशंक अकेले खड़ा हुआ हूँ| राजनीति के चक्रव्यूह में, अभिमन्यु-सा घिरा हुआ हूँ | (संघर्ष जारी है - पृष्ठ 74)।

‘तत्वदर्शी निशंक’ ग्रंथ को आकार देने में भारत के कई राज्यों के विद्वज्जनों ने सार्थक प्रयत्न किए हैं| इस पुस्तक को छह खंडों में कुछ इस प्रकार विभाजित किया गया है कि साहित्यकार के समस्त गुणों से पाठकों एवं जिज्ञासुओं को परिचित कराया जा सके| खंड - एक में विषय प्रवेश के अंतर्गत गोपाल शर्मा ‘भूमिका दर भूमिका’' में जर्मन दार्शनिक हेगेल का उद्धरण देते हुए कहते हैं, ‘भूमिका किसी परियोजना की घोषणा मात्र है और कोई परियोजना संपूर्ण होने तक कुछ भी तो नहीं है|' (पृष्ठ 23)। इस अंश में रचनाकार निशंक के रचनात्मक वैविध्य को बताते हुए प्रोफेसर गोपाल शर्मा ने निशंक के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत भूमिका बांधी है तथा उन्हें भारतीय एवं विश्व साहित्य में रचनात्मक उद्देश्य के साथ स्थापित किया है| सक्रिय राजनीति के साथ-साथ साहित्यिक क्षेत्र के संघर्षों के बहुविध संतुलन का नाम निशंक है| ’संभावनाओं की तलाश अर्थात लेखक का जीवन मर्म’ शोधपत्र में ग्रंथ की सह-संपादक शीला बालाजी ने रचनाकार निशंक के पारिवारिक, राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक जीवन की गंभीरता से पड़ताल करते हुए इस सन्दर्भ में भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के इस वाक्य को उद्धृत किया है- ‘हिमालय से निकली निशंक की गंगामयी काव्यधारा राष्ट्र निर्माण में नींव का पत्थर बनेगी।’ (पृष्ठ 46 )।

रचनाकार की संवेदनशीलता मात्र समस्याओं के विश्लेषण तक ही सीमित नहीं है, अपितु उसके समाधान की राहों के अन्वेषण में भी तत्पर है। इसलिए ‘जड़ में चेतन तलाशने निकले निशंक की पुस्तक ‘प्रलय के बीच’ असल में निशंकजी की संवेदनाओं का प्रतीक है|’ (पृष्ठ 47)।

खंड दो ‘काव्य जगत’ नाम से अभिहित है, जिसमें चार विद्वानों के शोधपत्र संकलित हैं| प्रो. निर्मला एस. मौर्य द्वारा ‘उद्देश्य की महानता में सौंदर्य का रहस्य’ आलेख में लेखिका ने रचनाकार निशंक की काव्यपंक्तियों के उद्धरण देते हुए उनके काव्य सौंदर्य के हर कोण से पाठक को परिचित कराने का सफल प्रयत्न किया है| काव्य के उदात्त पक्ष को 'प्रतीक्षा' खंडकाव्य की इन पंक्तियों में देखा जा सकता है- ‘खुली हुई हैं आंखें उसकी/ अभी किसी प्रतीक्षा में,/ प्राण पखेरू उड़ा छोड़ जग/ एक नई अन्वीक्षा में|' (पृष्ठ 56)। लेखिका ने रचनाकार की सौंदर्य दृष्टि, निर्वेद भावना, कठोर पहाड़ी जीवन से पलायन करने की पीड़ा को अभिव्यक्ति दी है| कवि निशंक समाज के ढोंग, पाखंड , अनाचार को मानव कल्याण का सबसे बड़ा रोड़ा मानते हैं। लेखक के विश्व मानवतावाद को रचनाधर्मिता का प्राण कहा जाए तो अन्यथा न होगा| लेखिका ने कवि निशंक की कविताओं में प्रयुक्त काव्य के अन्तर्वाह्य सौंदर्य पक्ष को सोदाहरण निरूपित किया है| रस, छंद, अलंकार, रहस्यवादिता से मंडित कवि की कविताओं का सम्यक चित्रण लेखिका ने किया है| लेखिका के शब्दों में- ‘इनकी कविताओं में हमें जिस सौंदर्य के दर्शन होते हैं, वह यथार्थ, समकालीन और समसामयिकता से परिपूर्ण है|' (पृष्ठ66)। डॉ. सुपर्णा मुखर्जी कृत ‘देशप्रेम की चेतना’ आलेख के अंतर्गत कवि निशंक की देशप्रेमयुक्त काव्य रचनाओं की सुरुचिपूर्ण अभिव्यक्ति का विवेचन किया गया है| वीरप्रसू भारतभूमि की माताएँ अपनी संतान को देशसेवा के लिए समर्पित करके कैसे ईश्वर से प्रार्थना करती हैं, इसका उदाहरण कवि की इन पंक्तियों में मिल जाता है- ‘हे ईश्वर मेरे दीपू को/ परम शक्तिशाली कर दो/ रह देश-सेवा में तत्पर/ ममता भी मन में भर दो। (‘प्रतीक्षा’ खंडकाव्य, पृष्ठ 24)। साहित्यकार के त्रिकालदर्शी रूप, स्त्री चेतना के उन्नायक रूप के द्वारा समरसता भाव को लेखिका ने सुदर्शन अभिव्यक्ति दी है- ‘ऐसा क्या कार्य जगत में,/नारी जिसे न कर सकती?/दूजे पर क्यों निर्भर हो वह,/ कष्ट स्वयं निज हर सकती|' (पृष्ठ 71)।

कवि का स्वार्थहीन जीवन देशप्रेम में राष्ट्र के हित हेतु सदैव समर्पित र है| ‘किसी भी देश, समाज, परिवार और संपूर्ण विश्व को नया मार्ग युवा ही दिखा सकता है- ‘मेरे निखिल ‘समर्पण’ से अंकुर/बने हैं तो लो यह ऋतुपर्ण।/मैंने अर्पण में कभी न देखा,/जात - पात क्या कोई वर्ण./ था मेरा यह विश्व समर्पण,/ जिसको सबने ही अपनाया।' (पृष्ठ - 73)। लेखिका ने कवि के राष्ट्रप्रेम को विश्व कल्याणोन्मुखी बताया है।

डॉ. भागवतुल हेमलता कृत ‘है अंधेरा यदि कहीं तो सूर्य से तुम तेज लो’ आलेख में लेखिका ने कवि निशंक की कविता में देश की रक्षा , प्रगति तथा उन्नति हेतु कलम को कृपाण बनाकर पाषाण को भी कर्तव्योन्मुखी बनाने की क्षमता को ढूंढ निकाला है| कवि के काव्य की पावन धार में धरती को स्वर्ग बनाने की क्षमता को दिखाया गया है| ‘संघर्ष जारी है’, ‘समर्पण’, ‘मातृभूमि के लिए’ आदि कविताओं के विवेचन के साथ ही लेखिका ने तेलुगु कवि श्रीश्री द्वारा वर्णित काव्य गुणों को कवि निशंक की कविताओं में पाया है – ‘कदिलेदी कदिलिंचेदी – मारेदी मर्पिंचेदी/ पाडेदी पादिंचेदी – पेनु निद्दुरा वदिलिंचेदी /मुनुमुन्दुकु सांगिंचेदी – परिपूर्णपु ब्रतुकिच्चेदी'। (तेलुगु साहित्य चरित्र, पृष्ठ- 423)। सारांशतः लेखिका ने कवि निशंक की कविता को हिलने-हिलाने , बदलने – बदलवाने, गाने–नींद भगाने, आगे बढ़ाने के साथ ही जीवन की पूर्णता का मर्म कवि कर्म में पाया है|

‘आंधियों में जलता एक शब्द-दीप’ आलेख में डॉ. एन. लक्ष्मीप्रिया ने कवि निशंक का परिचय देते हुए उनकी रचनाओं के उद्देश्य पर प्रकाश डाला है| निशंक की काव्य रचनाओं में शब्द प्रयोग के सौंदर्य को ढूंढते हुए लेखिका ने विविध तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी, अरबी - फारसी, संख्यासूचक, पूर्ण पुनरुक्ति, अपूर्ण पुनरुक्ति शब्द तथा क्रिया रूप आदि की उदाहरण सहित विवेचना की है| लेखिका कविता में संवाद एयर एकालाप के विविध उदाहरण भी प्रस्तुत किए हैं| कवि निशंक ने संवाद शैली में अनेक कविताएँ सृजित की हैं| लेखिका ने रचनाकार के भाषिक बोध को हर कोण से विश्लेषित करते हुए उनकी बहुआयामी रचनाधर्मिता को प्रस्तुत किया है।

खंड –तीन ‘कहानियों का संसार’ में पांच लेखकों ने डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के कहानीकार रूप का विस्तृत विवेचन किया है| लेखिका डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने ‘आदर्श और यथार्थ’ आलेख के अंतर्गत बताया है कि किस प्रकार कहानीकार निशंक विविध कहानियों के माध्यम से भ्रष्टाचार और अमानवीयता की कलई खोलने का कार्य करते हैं| उनकी ‘केदारनाथ आपदा की सच्ची कहानियां’ तथा ‘प्रलय के बीच’ यात्रावृत्त में केदारनाथ में घटित विभीषिका का जीवंत चित्रण हुआ है| ‘उनकी कथनी और करनी में कहीं भी अंतर दिखाई नहीं देता| आपदा पीड़ितों की सहायता करने के लिए निशंक ही नहीं, बल्कि उनकी कहानियों के पात्र भी हमेशा तैयार रहते हैं | (पृष्ठ- 106)। लेखिका ने देवभूमि के प्रति समर्पित कहानीकार डॉ. निशंक की कहानियों में सत्तालोलुपता, महानगरीय समस्या, स्त्री पर होने वाले अत्याचार, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था आदि से जुड़े यथार्थ का विस्तृत विवेचन किया है|

‘समकालीन परिवेश’ से संबद्ध कहानियों में तीव्रतम परिवर्तित युगीन परिप्रेक्ष्य को कहानीकार निशंक के दो कहानी संग्रहों को केंद्र में रखकर डॉ. डॉली ने आद्योपांत विवेचित किया है। वे कहती हैं– चाहे आम आदमी का वर्णन हो या मध्यवर्गीय समस्या, हाशिए का समाज वर्णन हो या बाजारवाद, नई सदी का समाज हो या नैतिक मान्यताओं का विघटन, व्यवस्थाओं के प्रति घोर असंतोष की भावना हो या पारिवारिक विघटन, आम आदमी के जीने की विषम आर्थिक स्थितियां हों, चाहे निराशा और कुंठा हो अथवा राजनीति- अर्थ, धर्म व संस्कृति के बदलते स्वरूप को कहानीकार ने जीवंत अभिव्यक्ति दी है| (पृष्ठ 139)।

कहानीकार निशंक के ‘समाजदर्शन और राष्ट्रवाद’ को ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने उनके ‘एक और कहानी’ , ‘अंतहीन’ और ‘क्या नहीं हो सकता’ कहानी संग्रहों के माध्यम से व्यक्त किया है| लेखक उन्हें प्रेमचंद की परंपरा में खड़े करते हुए मानवीय मूल्यों के प्रबल पक्षधर के रूप में चित्रित करते हैं |

प्रो. श्रीलता विष्णु ने ‘मानवीयता का चतुर चित्रांकन’ आलेख में कहानीकार निशंक के ‘टूटते दायरे’ कहानी संग्रह की विस्तृत व्याख्या की है| बात टूटते दायरे की हो तो वे पहाड़ी जीवन के सौंदर्य एवं विद्रूपता की विसंगति के साथ-साथ भूमंडलीकरण तक टूटते हैं| लेखिका ने रचनाकार के द्रवित मन को टटोलने का प्रयत्न उनकी विविध कहानियों में किया है|

‘टूटता बिखरता समाज बनाम आशावादी स्वर’ आलेख में डॉ. सुषमा देवी ने ‘अंतहीन’, ‘क्या नहीं हो सकता’ तथा ‘एक कहानी और’ कहानी संग्रह की विविध कहानियों को क्रमवार रूप में विश्लेषित किया है| लेखिका ने कहानीकार निशंक के इन तीनों संग्रहों की समस्त कहानियों को आद्योपांत विवेचित करते हुए दुर्दम्य परिस्थितियों में भी रचनाकार के अखंड व्यक्तित्व को विश्व मानवतावाद के सर्वथा योग्य सिद्ध किया है|

खंड - चार ‘उपन्यास सृष्टि’ में डॉ. निशंक के उपन्यासकार रूप का विवेचन किया गया है| डॉ. बी. बालाजी ने ‘पहाड़ी जीवन का ज्वलंत दस्तावेज’ शोधपत्र के अंतर्गत डॉ. निशंक के ‘मेजर निराला’, ‘बीरा’, ‘निशांत’, ‘छूट गया पड़ाव’, ‘प्रतिज्ञा’, ’कृतघ्न’ आदि उपन्यासों को विविध कोणों से विवेचित किया है | इन उपन्यासों में पहाड़ी जीवन की दुर्दमनीयता में भी राष्ट्रभक्ति, समाजसेवा तथा उत्तरदायित्वपूर्ण भावना का सुन्दर विकास दिखाया है| उपन्यासकार ‘निशंक’ द्वारा अपने पात्रों में समाज के प्रति प्रतिबद्धता का भरपूर प्रयोग किया गया है| वे भावी पीढ़ी से सामाजिक विद्रूपताओं से समाज की मुक्ति की पूर्ण अपेक्षा करते हैं| लेखक ने उपन्यासकार निशंक की उपन्यास दृष्टि में समाजसुधार एवं पर्यावरणिक शुद्धीकरण पर अधिक जोर दिया है और दर्शाया है कि पहाड़ी जीवन की कठिनाइयों के कारण नई पीढ़ी के पलायन, शिक्षा के अभाव, स्त्री शोषण तथा शराब तस्करी में वहां की सुंदर संस्कृति विलीन होती जा रही है, जिसे बचाने का प्रयास लेखक ने अपने विविध उपन्यासों में किया है|

डॉ. मंजु शर्मा द्वारा ‘चेतना के आयाम’ आलेख में ‘बीरा’, ‘छूट गया पड़ाव’, ‘प्रतिज्ञा’ आदि उपन्यासों में उपन्यासकार निशंक की विविध आयामी चेतना दृष्टि को रूपायित किया गया है| रिश्ते-नातों के आदर्श तथा विकृत स्वरूप, लोकजीवन तथा लोक संस्कृति की दृष्टि, पहाड़ी जीवन से पलायन तथा पुनर्वास को प्रमुखता से बताया गया है| स्त्री जीवन एवं पहाड़ी जीवन की समस्याओं को ही नहीं, समाधान को भी इंगित किया गया है|

खंड-पांच ‘अकाल्पनिक गद्य’ के अंतर्गत लेखक प्रवीण प्रणव द्वारा ‘प्राकृतिक आपदा में संवेदना का मरहम : संस्मरण साहित्य’ आलेख में ‘आपदा के वह भयावह दिन’, ‘प्रलय के बीच’ संस्मरणों की परत दर परत पड़ताल की गई है| डॉ. निशंक के शब्दों में– ‘यदि समय रहते 14 या 15 जून को भी तीर्थयात्रियों को ऋषिकेश, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग और गुप्तकाशी आदि प्रमुख पडावों पर ही रोक दिया जाता तो केदारधाम , गौरीकुंड तथा रामबाड़ा में एक साथ इतने यात्री एकत्रित नहीं होते| इससे जनहानि कई गुना कम हो सकती थी , किंतु प्रबंध तंत्र की निष्क्रियता और असंवेदनशीलता ने हजारों यात्रियों की जान जोखिम में डालने का कार्य किया, जिसकी परिणति इस भयंकर त्रासदी के रूप में सामने आई|’ (पृष्ठ 243)। मौत के तांडव के बीच मानव के लोभ की पराकाष्ठा को बताते हुए , बाजारीकरण और मीडिया की भूमिका को ऐसे समय में संस्मरणकार ने उपयोगी माना है| लेखक प्रवीण प्रणव ने ‘पहाड़ों से स्नेह,संस्कृति का पुल: यात्रावृत्तांत’ शोधपत्र में ‘मॉरीशस की स्वर्णिम स्मृतियां’, ‘केदारनाथ से पशुपतिनाथ तक’, ‘एक दिन नेपाल में’, ‘खुशियों का देश भूटान’, ‘भारतीय संस्कृति का संवाहक इंडोनेशिया’ आदि यात्रावृत्तांतों का व्यापक विश्लेषण किया है| इन यात्रावृत्तांतों में यात्री के सूक्ष्म जीवन की संवेदनाओं को वहां के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक परिवेश के चित्रण में देखा जा सकता है|

डॉ. सुरेश भीमराव गरुड़ ने ‘व्यक्तित्व निर्माण के लिए : प्रेरणास्पद गद्य’ आलेख में रचनाकार के व्यक्तित्व विषयक चिंतन की सूक्ष्मता को अंकित किया है| स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर ‘संसार कायरों के लिए नहीं’ रचना में निशंक ने आज की भौतिकतावादी अंधी दौड़ में व्यक्ति को नवचेतना तथा मनुष्यता के गुणों से सराबोर किया है| (पृष्ठ 290)।

‘तत्वदर्शी निशंक’ ग्रंथ के अंतिम भाग अर्थात खंड – छह ‘विश्व दृष्टि’ के अंतर्गत ‘महामानव व्यक्तित्व के धनी निशंक’ का विविध धरातल पर परिचय दिया गया है | डॉ. चंदन कुमारी के ‘तू धरा पर फ़ैल इतना लौ तेरी आकाश ले’ शोधपत्र में रचनाकार के विविध साहित्य रूपों को विवेचित किया गया है | ‘इनके साहित्य में वृद्धावस्था विमर्श, स्त्री विमर्श, हरित (पर्यावरण) विमर्श, संस्कृति विषयक चिंतन, अस्तित्व-रक्षण बनाम प्रगति इत्यादि विषय सहज प्राप्य हैं |’ (पृष्ठ 293)।

डॉ. संगीता शर्मा के ‘समकालीन समाज की धड़कन’ आलेख में रचनाकार निशंक के बहुआयामी व्यक्तित्व को उनकी रचनाओं के माध्यम से दर्शाया गया है| मिलन विश्नोई के ‘संवेदना के धरातल’ पाठ में रचनाकार के राष्ट्रप्रेम, मानव संघर्ष और संवेदना को उकेरा गया है| डॉ. उषारानी राव के आलेख ‘आत्म मंथित तरलता की प्राणवान धारा’ में रचनाकार के विभिन्न रचनात्मक सौंदर्य को दर्शाया गया है| रचनाकार का आत्मसंघर्ष, जीवनानुभूति, परिवर्तन की आस्था के साथ व्यक्त हुआ है|

प्रो. गोपाल शर्मा कृत शोधपत्र ‘तत्वदर्शी निशंक’ में तत्वान्वेषी साहित्यकार की ध्येय दृष्टि का मंथन किया गया है| वे अपनी कृतियों में मैं रूप में प्रकट होते हैं| रचनाकार के संस्कारित व्यक्तित्व पर स्वामी विवेकानंद से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक के व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ा है| रचनाकार के भाषिक संस्कार और देशज संस्कार को उनकी रचनाओं में गहरे तक देखा जा सकता है| रचनाकार के निजी अनुभव उनके साहित्यिक विवेक का परिमार्जन करते हैं|

कुल मिलाकर ‘तत्वदर्शी निशंक’ पुस्तक को लगभग 355 पृष्ठों के साथ सजिल्द सजाया गया है, जिसमें पाठकों और शोधार्थियों को रचनाकार के वृहद् व्यक्तित्व एवं लेखन का परिमार्जित स्वरूप सहज में प्राप्त होता है| पुस्तक के संपादक प्रो. ऋषभदेव शर्मा के शब्दों में– ‘तुच्छताओं और हीनताओं के विषम अनुभव भी साहित्यकार निशंक की मनुष्यता में निष्कंप आस्था को विचलित नहीं कर पाते हैं| वे घृणा को करुणा से काटते हैं और साहित्य की उस भूमिका की साधना में जुट जाते हैं, जहाँ जननी और जन्मभूमि की अनन्य भक्ति की उदात्त भावना ही ‘विश्वबंधुत्व’ की भावना को साकार करने का आधार बनती है|’ (पृष्ठ 13)। ★

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समीक्ष्य कृति : तत्वदर्शी निशंक

सम्पादक तथा सह सम्पादक : डॉ ऋषभदेव शर्मा, श्रीमती शीला बालाजी

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन, प्रा.लि., 4/19 आसफ अली रोड, नई दिल्ली -110002

मूल्य : 700/- मात्र

प्रथम संस्करण : 2021

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समीक्षक : डॉ सुषमा देवी असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, बद्रुका कॉलेज, हैदराबाद -27, तेलंगाना।★

(पुस्तक समीक्षा) हिंदी साधक डॉ. निशंक का भावाभिनंदन

हिंदी साधक डॉ. निशंक का भावाभिनंदन

- डॉ. चंदन कुमारी

भारत के शिक्षामंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक (1959) का व्यक्तित्व बहुआयामी है| वे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं| इससे पूर्व वे स्वयंसेवक, शिक्षक एवं पत्रकार की भूमिका का निर्वाह कर चुके हैं| राजनीति के क्षेत्र में उनका पदार्पण माननीय अटल बिहरी वाजपेयी के स्नेहादेश से हुआ| उनके कार्यकाल के दौरान उनकी सेवाभावना और कर्तव्यपरायणता से सभी स्वतः परिचित हो रहे हैं| तथापि एक संवेदनशील और भावुक व्यक्ति हमेशा सेवा और कर्तव्य का पालन करके ही संतुष्ट नहीं हो जाता| वह अपने अनुभवों को सबके साथ साझा करना चाहता है| अपने साहित्य के माध्यम से डॉ. निशंक ने भी यह किया है| उनका साहित्य अनुभव से उपजा है| वैश्विक स्तर पर अपनी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए उन्हें बारंबार विविध सम्मानों से नवाजा गया है| देश-विदेश की कई भाषाओँ में उनके साहित्य का अनुवाद किया गया है। साथ ही वैश्विक स्तर पर उनकी बहुत-सी रचनाएँ पाठ्यक्रम में भी शामिल की गई हैं| एक सामान्य मनुष्य जिसने संघर्षों में तपकर अपने जीवन को प्रकाशवान बनाया है, निश्चित ही वह राष्ट्र के भावी कर्णधारों के लिए प्रेरणास्रोत है| अभावों और विपदाओं को अपने संघर्षशील जुनून से मात देकर जिस तरह डॉ. निशंक ने उन्नति और उच्चता तक का सफर तय किया है; वह उनकी कर्मठता का द्योतक है| उनकी कर्मठता एवं संवेदनशीलता का साक्षात्कार देशवासियों ने केदारनाथ के भयावह जलप्लावन के दौर में भी किया है| उन्होंने अपने साहित्य में दिखाया है कि आज किस तरह सुविधाभोगी और दिशाहीन जीवन जीने की मानसिकता के बोझ से मनुष्यता कराह रही है| स्वार्थांधता ने अपनत्व को दबोच रखा है| अपने ही दुःख से व्याकुल प्राणी नीतिशून्य और मर्यादापतित-सा आचरण कर रहा है| सामाजिक परिवेश के यथार्थ चित्रण के साथ इनके साहित्य में जो पक्ष प्रबलता से उभरा है, वह है ‘जिजीविषा’| इसलिए इनके साहित्य में मनुष्यता जिंदा है| आत्मीयता जिंदा है| नीति और मर्यादा जिंदा है। साथ ही प्रतिभाएँ निखरी हुई और सफलता की पराकाष्ठा को चूमनेवाली हैं| यहाँ असहाय और लाचार व्यक्ति भी ईमानदारी और कर्मठता का संदेश देता है| जीवन से पलायन आवश्यक नहीं, आवश्यक है जीवन में छाए दुखों और अनिष्टों का उन्मूलन या उनका स्वरूप परिवर्तन|

निशंक के साहित्य में निहित इन्हीं आशावादी स्वरों की समेकित पड़ताल के रूप में ‘तत्त्वदर्शी निशंक’(2021) ग्रंथ का प्रणयन हुआ है| इसके संपादक दक्षिण भारत के मूर्धन्य हिंदीसेवी, शिक्षाविद, समीक्षक एवं साहित्यकार डॉ. ऋषभदेव शर्मा हैं एवं सह संपादक शीला बालाजी हैं| यह ग्रंथ दक्षिण के अध्येताओं की ओर से यशस्वी राजनेता एवं साहित्यकार डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक को ही समर्पित है| यह डॉ. निशंक का भावाभिनंदन है|

विवेच्य ग्रंथ में छह खंड हैं जो क्रमशः इस प्रकार हैं- विषय प्रवेश, काव्य जगत, कहानियों का संसार, उपन्यास सृष्टि, अकाल्पनिक गद्य और विश्व दृष्टि| पहले खंड में सबसे पहले लेखक की विभिन्न पुस्तकों की भूमिकाओं का वैदुष्यपूर्ण विवेचन प्रो. गोपाल शर्मा ने किया है| इसमें उन्होंने देश और विदेश के विद्वानों द्वारा पुस्तक की भूमिका संबंधी विचारों पर प्रकाश डालते हुए निशंक के साहित्य की रचना प्रक्रिया, उद्देश्य एवं विभिन्न विद्वानों द्वारा लिखी गई उनकी पुस्तकों की भूमिकाओं से महत्वपूर्ण सूत्रों को निकालकर सामने रखा है| इसी खंड में शीला बालाजी ने अपने शोधपत्र के माध्यम से निशंक के साहित्यिक और राजनीतिक जीवन पर प्रकाश डाला है|

दूसरे खंड में प्रो. निर्मला एस. मौर्य ने निशंक के काव्य संसार के भाव पक्ष और कला पक्ष में निहित सौंदर्य का विश्लेषण किया है| डॉ. एन. लक्ष्मीप्रिया ने कविता के कला पक्ष के अंतर्गत ही शब्द प्रयोग, संवाद, देह भाषा, संबोधन एवं स्थिति चित्रण इत्यादि विषयों पर प्रकाश डाला है| डॉ. सुपर्णा मुखर्जी और डॉ. भागवतुल हेमलता ने निशंक की कविताओं में राष्ट्रभूमि और संस्कृति के प्रति अनन्य प्रेम देखा है|

तीसरा खंड कहानी केंद्रित है| इस खंड में डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने यथार्थ और आदर्श के आलोक में कहानियों की समर्थता का आकलन किया है| इस क्रम में कथ्य के साथ कहानियों के शिल्प पर भी प्रकाश पड़ा है| इनके साथ डॉ. डॉली, श्री ज्ञानचंद मर्मज्ञ, प्रो. श्रीलता विष्णु एवं डॉ. सुषमा देवी ने कहानियों में व्यक्त मानवीय संवेदनाओं की जटिलता, राष्ट्र-समाज से जीवन की घनिष्ठता, मानवता, और आशावादी स्वर को समसामयिक परिवेश से जोड़कर विश्लेषित किया गया है|

चौथा खंड उपन्यास केंद्रित है| इसके अंतर्गत डॉ. बी.बालाजी ने स्थापित किया है कि पहाड़ी लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का यथार्थ चित्रण डॉ. निशंक के उपन्यासों में सर्वाधिक जीवंत बन पड़ा है| साहित्य और भाषा के अंतःसंबंध को व्याख्यायित करते हुए उन्होंने डॉ. निशंक की कथाभाषा गठन प्रक्रिया की ओर भी ध्यान खींचा है| डॉ. मंजु शर्मा ने चेतना की दृष्टि से जीवन और संस्कृति को केंद्र में रखकर डॉ. निशंक के उपन्यासों का अनुशीलन किया और पात्रों की आत्मनिर्भरता और दृढ़ता को लक्षित किया है|

पाँचवाँ खंड यात्रा वृत्तांत और संस्मरण केंद्रित है| इस खंड के दो शोधपत्र ‘केदारनाथ सहित अन्य आपदाओं पर आधारित संस्मरण’ एवं ‘नेपाल, भूटान, इंडोनेशिया और मारीशस की यात्रा आधारित यात्रा-वृत्तांत’ पर केंद्रित हैं। ये दोनों श्री प्रवीण प्रणव द्वारा लिखे गए हैं| इनमें यथार्थ के अंकन का तटस्थ विश्लेषण निश्चित ही विशिष्ट है| स्वामी विवेकानंद की व्यक्तित्व निर्माण वाली शिक्षाओं पर आधारित डॉ. निशंक की पुस्तक ‘संसार कायरों के लिए नहीं’ पर डॉ. सुरेश भीमराव गरुड़ ने प्रेरणास्पद चर्चा की है|

अंतिम और छठे खंड में यथार्थ और संवेदना की दृष्टि से डॉ. निशंक के साहित्य का मूल्यांकन किया गया है| डॉ. संगीता शर्मा एवं मिलन बिश्नोई के अनुसार डॉ. निशंक ने देशप्रेम, ग्रामीण चेतना, समसामयिक समस्यायों, स्त्री की स्थिति और वर्ग संघर्ष को अपने साहित्य में चित्रित किया है| इन सबके साथ ही देशप्रेम की कविताओं में उषारानी राव ने अनुभूति की अभिव्यक्ति में सौंदर्यबोध देखा है| इस खंड में ‘तू धरा पर फ़ैल इतना लौ तेरी आकाश ले’ शीर्षक शोधपत्र शोधपत्र में डॉ. चंदन कुमारी ने डॉ. निशंक के साहित्य में निहित उदात्त जीवन मूल्यों की पड़ताल की है|

ग्रंथ का अंतिम शोधपत्र है ‘तत्वदर्शी निशंक’। इसमें डॉ. निशंक के लिए प्रयुक्त ‘तत्त्वदर्शी’ विशेषण का विश्लेषण करते हुए प्रो. गोपाल शर्मा ने डॉ. निशंक के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विशिष्टताओं पर सोदाहरण चर्चा की है| इस ग्रंथ की ‘भूमिका’ में प्रो. ऋषभदेव शर्मा एवं ‘आशीर्वचन’ में गुरुवर प्रो. योगेंद्रनाथ शर्मा 'अरुण' ने भी इन बिंदुओं पर पर्याप्त प्रकाश डाला है| ‘निशंक की दृढ़ मान्यता है कि युवा वर्ग किसी भी राष्ट्र की नींव होता है, युवा वर्ग की ऊर्जा और क्षमता को सही दिशा में प्रवाहित करते हुए राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की आधारशिला तैयार करना समाज और संस्कृति की पहली आवश्यकता होती है|’(भूमिका से उद्धृत)| कुल मिला कर यह ग्रंथ इस निष्कर्ष को भली भाँति प्रतिपादित करता है कि डॉ. निशंक का साहित्य साधारण से जुड़ा हुआ है, पर उसका लक्ष्य विशिष्ट व्यक्तित्व के निर्माण पर टिका हुआ है| डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के साहित्यिक अवदान को समझने और परखने के लिए यह एक अनिवार्य ग्रंथ है। 000


समीक्षित कृति: तत्वदर्शी निशंक
संपादक: प्रो. ऋषभदेव शर्मा
सह संपादक: शीला बालाजी
संस्करण: प्रथम, 2021
प्रकाशन: प्रभात प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य: 700 रुपए

समीक्षक : डॉ. चंदन कुमारी,
द्वारा श्री संजीव कुमार, 
आईएफए, एयर फ़ोर्स स्टेशन, 
जामनगर_361003 (गुजरात)
chandan82hindi@gmail.com
मोबाइल 8210915046

रविवार, 2 मई 2021

'बस एक ही इच्छा' का संदर्भ : गोपाल शर्मा







आलेख

‘बस एक ही इच्छा’ का संदर्भ

- गोपाल शर्मा

(देश की प्रसिद्ध संस्था ‘स्याही ब्लू’ की रविवारीय पुस्तक वार्ता के पार्ट -5 में दिनांक 14 मार्च 2021 को डॉ निशंक के प्रारम्भिक कहानी संग्रह ‘बस एक ही इच्छा’ पर देश के कई विद्वान समीक्षकों ने चर्चा की। इस वार्ता शृंखला में प्रति-सप्ताह डॉ निशंक के रचना संसार से एक पुस्तक लेकर उस पर केन्द्रित चर्चा होती है। यू ट्यूब से इसे सुनकर डॉ गोपाल शर्मा के वक्तव्य का पाठ डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने लिपिबद्ध किया है।– संपादक)

“जो उसको जानता है, उसके लिए वह अज्ञात है । जो उसको नहीं जानता उसके लिए वह ज्ञात है- केन उपनिषद का ब्रहम के लिए कहा गया यह कथन डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ पर मेरे लिए सौलह आने सही बैठता है। निशंक जी ने कुछ सोचकर ही अपना उपनाम ‘निशंक’ रखा हो । दरअसल उनको जानने वाले देश के करोड़ों लोग उन्हें राजनेता के रूप में जानते हैं, पर उन्हें कवि-साहित्यकार के रूप में जानने वाले अभी उतनी बड़ी संख्या में नहीं हैं। मैं उन्हें व्यक्ति के रूप में नहीं जानता, न मैं राजनेता के रूप में ही उनसे परिचित हूँ। पर उनको उनकी रचनाओं से अब पहचानने लगा हूँ। मेरा डॉ. निशंक व्यक्ति से कोई साक्षात परिचय नहीं है, पर मैं उनके साहित्यिक व्यक्तित्व से उसी प्रकार परिचित हूँ जैसा परिचय हंस राज रहबर का प्रेमचंद से रहा होगा। उन्हें दूर से देखा जरूर है और यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि डॉ. निशंक ज़्यादातर पुराने हिंदी लेखकों की तरह दीन हीन नहीं एक दम कुलीन और भद्र दिखाई देते हैं।

साहित्यकार के रूप में निशंक के दो रूप हैं । एक तो कवि रूप ही है जहाँ कविता और निज देश एकाकार हो गए हैं। दूसरी ओर कथाकार निशंक हैं और इस रूप में वे अपने 'परिवेश के कथाकार' हैं। वे "जादुई यथार्थ" के स्थान पर "जमीनी यथार्थ" के पुरस्कर्ता हैं। यदि केवल दस मिनट में निशंक जी केप्रारंभिक कहानी संग्रह “बस एक ही इच्छा” की कहानियों पर चर्चा की जाए तो सबसे पहले यह कहना होगा कि यहाँ प्रस्तुत दर्जन भर कहानियाँ, कहानियाँ कम आप-बीती अधिक हैं। इन कहानियों में कथाकार के रूप में निशंक जी की उपस्थिति तो है ही, वे कई कहानियों में एक पात्र के रूप में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

किसी ने ठीक ही कहा था – We are just stories in the end. Just make it a good one. शेक्सपियर तो जीवन को ही किसी मूर्ख के द्वारा कही गई कहानी कह डालता है। कहानियाँ सर्वत्र हैं। हम ही कहानियाँ नहीं कहते, कहानियाँ भी हमें कहतीं हैं। यदि कहानियाँ सर्वत्र हैं तो हम भी इन कहानियों में सर्वत्र हैं। कहानी एक नहीं होती, कहानियाँ होती हैं। एक वह जो कहानीकार लिख कर हमें देता है और दूसरी वह जो उसने देखी होती है, सुनी होती है या स्वयं भोगी होती है।

अब एक कहानी को लें। “ बस एक ही इच्छा” कहानी में कहानी तो बस इतनी ही है कि होटल में काम करने वाला वेटर लड़का “मैं” को अपना दुख दर्द सुना देता है। वह ऐसा इसलिए करता है क्योंकि वह ‘मैं’ के साथ उसके उपनाम “पोखरियाल” के कारण ‘पहाड़ी’ होने से बादरायण संबंध मान लेता है। ‘मैं’ इस कहानी को इसलिए लिखता है क्योंकि वह इस संघर्षशील लड़के के आत्मविश्वास से प्रभावित होता है – बाबूजी, मेरी तो बस एक ही इच्छा है कि चाहे मैं जिस हाल में भी रहूँ किंतु अपने भाइयों को खूब पढ़ाऊँगा। इतना पढ़ाऊँगा कि वे एक दिन बहुत बड़े साहब बन जाएँ। हर कहानी में कोई न कोई इच्छा है जिसका कोई न पात्र किसी न किसी इच्छा प्राप्ति के लिए कर्मरत है। विक्रम जैसे पात्र आपको अपने इर्दगिर्द मिल जाएँगे । स्वार्थ का परमार्थ में परिवर्तन हो जाना इन पात्रों की विशेषता है।

मासूम चेहरा जो इस कथा का नायक है वह अब पाठक के स्मृति पटल पर ज्यों का त्यों अंकित हो जाता है। "उसने कहा था" के रचनाकार को तो जीवन में केवल तीन चार कहानियाँ लिखनी थीं इसलिए पहली कहानी में ही वे सब कुछ बाँच गए। "ग्यारह वर्ष का समय" लिखकर रामचंद्र शुक्ल इस राह से किनारा कर गए। पर युवक रमेश पोखरियाल ने "निशंक" बनकर संख्या की दृष्टि से प्रेमचंद के समकक्ष आ जाने का यत्न किया। दूसरी कहानी ‘मैं ओर तुम’ में ‘मैं’ का एक नाम है – शशांक । और तुम का नाम है –दीप्ति । शशांक दहेज रहित विवाह करना चाहता है। पर उसके भाई भाभी ही नहीं दीप्ति और उसके परिवार वाले भी मानते हैं कि "दहेज न देकर अपने आप को अपने रिश्तेदारों व समाज के बीच अपमानित महसूस कराना घाटे का सौदा होगा।" किसी को भी यह मंजूर नहीं। कथित आदर्शवादियों के बीच आदर्शवादी कथानायक अपनी दुर्गति पर खिन्न है और मेरे जैसा कुलीन पाठक सोचता है – मैंने अपनी शादी के समय चुप रहकर एक तरह से अच्छा ही किया। पहाड़ का यह आम व्यक्ति कैसे उदात्त व्यक्तित्व बन जाता है, अद्भुत है।

तीसरी कहानी है ‘कितना संघर्ष और’। इस कहानी में कथानायक है – रमेश । वह श्वेता नामक संघर्षशील लड़की की कहानी सुनाता है। पर मैं चौथी कहानी “संकल्प” पर बात करके अपनी बात समाप्त करना चाहूँगा । इस कहानी में “मैं” का नाम “निशीथ” है और यहाँ तब के उभरते युवा कथाकार और शिक्षक रमेश पोखरियाल इस कहानी के द्वारा अपनी बनती और बदलती मनस्थिति का आभास देते हैं। आम व्यक्ति के हितों की बात करना, शोषितों के लिए जूझना उसे अच्छा लगने लगा था। समाज में फैली अराजकता, अव्यवस्था और दुराचार के खिलाफ उसके मन में भारी आक्रोश पैदा होता है। और फिर उसे वह मार्ग दिखाई देता है जिसे वह सहर्ष अपना लेता है । वह अपनी जन्मदात्री माता को अपना संकल्प प्रेषित कर देता है । वह अपना सम्पूर्ण जीवन मातृभूमि को सौंपने का संकल्प करते हुए एक श्लोक पढ़ता है –

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम् ।
महामंगले पुण्यभूमे त्वदर्थे पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ॥

(हे प्यार करने वाली मातृभूमि! मैं तुझे सदा (सदैव) नमस्कार करता हूँ। तूने मेरा सुख से पालन-पोषण किया है। हे महामंगलमयी पुण्यभूमि! तेरे ही कार्य में मेरा यह शरीर अर्पण हो। मैं तुझे बारम्बार नमस्कार करता हूँ।)

दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं – एक तो कथाकार कवि-हृदय है और दूसरे संवेदना के धरातल पर वह इतना आंदोलित है कि अभिव्यक्ति के लिए छटपटाहट अनुभव करता है इसलिए भाषाई उछलकूद के स्थान पर सहजता को शैली बनाने का प्रयत्न करता है। शिक्षक से शिक्षामंत्री तक के इस सफर में यह लेखकीय “संकल्प” रेखांकित किया जा सकता है , किया जाना चाहिए। आज इस कहानी को पढ़ना इस संकल्प को आत्मार्पित करना भी तो है। इसलिए यह रचना इन अर्थों में कालजयी कही जा सकती है। अब मैं और किसी कहानी का जिक्र न करके यह कहकर अपनी बात समाप्त करूंगा कि इस संग्रह की सब कहानियाँ उस समय की हैं जब कथाकार ने लिखना शुरू भर किया था। वह लगभग सभी कहानियों में “मैं” बनकर उपस्थित है।

कई बार भाषा-प्रयोग में "मूकता” जैसे शब्द चौंका देते हैं। वह किसी शायर या कवि को उद्धृत भी करता है तो अपनी तरह से और स्मृति के आधार पर । एक आलोचक ने विश्व-विख्यात कथाकार जेन ऑस्टिन की प्रारम्भिक रचनाओं को "ओपिन, अम्यूज्ड, ईज़ी इंटेलेक्चुयल" का लेखन कहा था। मैं भी इन प्रारम्भिक कथाओं "बस एक ही इच्छा और अन्य कहानियाँ" के रचनाकार को इसी तर्ज़ पर “सहज-पारिवारिक, देशानुरागी-चिंतक” कहने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। आप शेष कहानियों को पढ़कर मेरे इस कथन की परीक्षा स्वयं करेंगे , यह मैं जानता हूँ। धन्यवाद।

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अंग्रेजी प्रोफेसर, अरबा मींच विश्वविद्यालय, इथियोपिया # आवास – 6-3-120/23, एनपीए कालोनी, शिवरामपल्ली, हैदराबाद – 500 052

प्रेमचंद्र जैन की कविताएँ













मध्यांतर

प्रेमचंद्र जैन की कविताएँ


फासला

आत्मा-आर्मात्मा

है एक ही

बीच दोनों के बहुत कम फासला है

फासला उतना कि जितना

आदमी से और उसकी छाँव से ही

या समझ लो यों कि –

जितना चंद्रमा और ज्योत्सना में

या कहो उतना कि जितना

इक नदी के पार से उस पार में है

ज्ञान-दर्शन-चरित बाल की नाव से

फासला यदि दूर हो जाए

तभी

हर आत्मा, बहिरात्मा, परमात्मा है।

 

अवचेतन मन

चाँदनी रात में भी

उमस जैसी प्यास है

ताप-संताप –

विरह-विदग्ध भी नहीं हूँ मैं

हर इंसान

अपने मन की बात जानता है

अनजाने, अनचाहे में ही

मन बहुत उदास है

समाधान नहीं होता – तो

सोचते-सोचते

खीझ उठता हूँ अपने पर ही

नींद लेने का होता विफल प्रयास है

प्यास बराबर बढ़ती है

प्रत्यक्ष नहीं कारण कुछ

तो क्या माँ लूँ?

अवचेतन मन का यह –

शाप है।
 

मैं चलता हूँ एक अकेला

प्रदत्त

सम्मानित मनुज से –

डायरी के पृष्ठ खाली

भर रहे मन को

अतुल आमोद से।

मैं अकिंचन

कर सकूँ उपयोग – इनका

सत्य से

तथ्य से और

दिल के दर्द से इनको भरूँ

अभाव से सद्भाव के ये पृष्ठ पूरे हों

नमन करता हूँ तुम्हें

विश्राम दो।



एक और अवधारणा

पूरा किया

एक और अध्याय

जिसका था उसको सौंपकर

चेहरे के बाल धुलवाए

हँसे –

दूसरों की हंसी

पेट भरकर मिल गई

खो गए लेकर किसी की नींद : आधी रात खासे

तुम नहीं आए –

अच्छा किया

दूसरा बिस्तर नहीं था


इष्ट फल

जागते-सोते

सदा ‘शिव’ हो

तुम्हारा और –

सबका

साध्य –

साधन –

इष्ट फल।


ध्रुव पौरुष

‘अज्ञेय' व्यक्तित्व

ध्रुव पौरुष

वेदना-तप्त

यातना-पूत

दृष्टा

युग-निर्माता

‘अज्ञेय’ को

जानने के लिए –

जिज्ञासा;

खोजना पड़ेगा


वह धरातल पर नहीं

‘तल’ में मिलता है।

 
नौकरी


नौकरी की है

मालिक की दया पर –

जो काम लिया

अनथक किया

मालिक का काम

माह के अंत में

मांगने पर दाम –

मिल गए तो खुश

नहीं तो उदास

बीवी के पास

खाने का घास
 

जनतंत्र

नारा समाजवाद का

दूध : गए-बछेड़े का

वोट हिंदुस्तानी का

नहीं पड़ा जहाँ पड़ना था

और ..

वही हुआ जो होना था

जातिवाद, भाई-भतीजावाद

खंड-खंड बिखर गए

समय की करवट से

फिर पिसेगी जनता

सुबह तक नई कांग्रेस और बढ़ेगी सर्वत्र

जीत-हार, हार-जीत का जनतंत्र।
 

रे कलियुग के देव

रे कलियुग के देव!

तुम्हारा काम भेंट पाने का

मानवता की बलि लेना

पर-छीन स्वयं खाने का

मनु ने भी आँसू पोंछे

जब दी गई मानवता

पर देवोचित्त प्रतिभा से

कब झुकी नहीं दानवता

साहित्यिक बन गए तो छोड़ो –

नोक-झोंक की आदत

लाओ तलवार कलम की

हो चोट, बचो भी साफ

कितने तांडव हो चुके

प्रलय के कितने झोंके आए

कुछ ही खुशहालों ने मिल –

बेहद बेहाल बनाए

हम मनु की हैं संतान

सृजन से करते हैं कल्याण

बढ़ेगा या जो नहीं रुका है

इतिहास कहे –

संहार सृजन के आगे सदा झुका है।

मरी स्मृति का पटल

आज है कुंद

न लेता साँस

वाष्प से गला हुआ वरुद्ध

मौत की छाया लहराई

कल का साहस का विश्वास

मौन सब करते हैं उपहास

यह है जग देखी रीति

शक्ति के मीत सभी भाई

न धन की शक्ति

कर्म की –

मन की शक्ति है

इसी पर सोता-खाता हूँ

इसी को रोज बजाता हूँ


मुझे पर्वत की इच्छा नहीं

यह बस शेष रहे राई।
 

प्रेम

सारीरिक संबंधों के रिश्ते

टूट ही जाते हैं – एक दिन

भावनाओं से जुड़ा प्रेम

अटूट होता है

लेकिन –

यह तुम्हें दर्शन की बात लगती है

क्योंकि

तुम्हारे मिकत भावना निर्मूल है

यह मेरा नसीब है

जिसे बदलना असंभव जैसा है

व्यर्थ की मृगतृष्णा है

चूँकि मैं जिस मिट्टी से बना हूँ –

वह रेतीली कतई नहीं है

अपने स्तर को गिराने का अहसास

अब कई बार हो चुका है

होता ही रहता है – और

आज तो प्रतिक्षण-प्रतिपाल हो रहा है

क्या मैं अपने को क्षणा कर लूँ

अथवा

आत्मदाह!
 

मैं आदमी हूँ

मैं आदमी हूँ

खाने के लिए जीता हूँ

जीने के लिए खाता हूँ

कौन जाने?

एक साथ कितने जीवन जीता हूँ

सुनाने के लिए –

नहीं कह पाऊँगा अपनी बात

नौकरी करता हूँ

ऑफिस के नाम से नहीं

घर के नाम से डरता हूँ

मरने को है नौकरी

या

नौकरी के लिए मारना है

कौन जाने – एक साथ

इसीलिए कहता हूँ –

इन जानवर हूँ –

खटता हूँ

टेबलेट सुलाती है

चक्की जगाती है

भूख चलाती है

आबकी अपनी –

अपनी कहानी है।

 

अहसास

दूसरों की व्यथा के अहसास से -

निज मन का व्यथित हो जाना

अहेतुक द्वित होना भी;

शोषक की व्यथा भिन्न है और विकट भी;

इसी विकटता का, दो टूक उत्तर –

साहित्यकार का दायित्व है!


नियति

शिशु के मन सम मन मेरा

मुकरवत् हृद है

वज़्रांगलोह सम देह

कुटिलता कम है

सब कुछ झिलमिल हो जाता

दीपक लौ जब जलती है

पर अंधकार का मोह

पुनः डस लेता

यह और नहीं कुछ मित्र!

मात्र नियति है।

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

'तत्वदर्शी निशंक’ : साहित्य साधना का समग्र मूल्यांकन

पुस्तक समीक्षा 

'तत्वदर्शी निशंक’ : साहित्य साधना का समग्र मूल्यांकन 

हुडगे नीरज



देवभूमि हिमालय के वरद पुत्र के नाम से प्रख्यात साहित्यकार रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का जन्म १५ अगस्त, १९५९ को हुआ। निशंक जी का बचपन अत्यंत गरीबी में गुजरा। उन्होंने कई कठिनाइयों और संघर्षों का सामना कर अपने सपनों को साकार किया। सर्वप्रथम शिक्षक के रूप में जाने गए। इसके बाद उन्होंने पत्रकारिता जगत में अपने कदम बढ़ाए और फिर राजनीति की ओर उन्मुख हुए। वर्तमान में वे भारत के शिक्षा मंत्री हैं और उन्हें ‘नई शिक्षा नीति-२०२०’ का श्रेय प्राप्त है। साहित्यिक क्षेत्र के साथ-साथ राजनीतिक क्षेत्र में भी उनकी ख्याति में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ोतरी हुई है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं बल्कि अपने सतत कर्म का ही सुफल ‘निशंक’ जी को मिल रहा है।

हिंदी साहित्य जगत को प्रख्यात साहित्यकार रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने अनेक साहित्यिक रचनाएँ दी हैं। कविता, कहानी, उपन्यास, बाल साहित्य, पर्यटन, तीर्थाटन तथा व्यक्तित्व विकास जैसी अनेक विधाओं में अब तक उनकी पाँच दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं। उत्कृष्ट साहित्य सृजन के लिए उन्हें देश के तीन राष्ट्रपतियों द्वारा सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। उन्हें भारत गौरव, राष्ट्र गौरव, साहित्य भारती, साहित्य गौरव, साहित्यचेता सम्मान के साथ-साथ मॉरीशस सरकार द्वारा प्राप्त मॉरीशस सम्मान एवं अंतरराष्ट्रीय असाधारण उपलब्धि सम्मान तथा राहुल सांकृत्यायन राष्ट्रीय पर्यटन पुरस्कार सम्मान से भी विभूषित किया गया है। ऐसे साहित्यकार को समर्पित ग्रंथ ‘तत्वदर्शी निशंक’ (2021) हिमालय पुत्र डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की साहित्य-साधना का दक्षिण भारत की ओर से हिंदी सेवी प्रतिभाओं द्वारा पहली बार किया गया समग्र विवेचनात्मक व विश्लेषणात्मक मूल्यांकन है।

इस ग्रंथ के संपादक प्रो. ऋषभदेव शर्मा कहते हैं कि आपदाओं को अवसरों में बदलने का संकल्प इस ग्रंथ के नायक रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को ‘तत्वदर्शी निशंक’ बनाता है। (पृ.9) कहना ही होगा कि निशंक जी अपने संघर्षमय जीवन को एक नया मोड़ देकर सारे दुखों को अवसरों में रूपांतरित कर संवेदनशीलता और सृजनात्मकता को साहित्यिक रचनाओं के द्वारा प्रतिफलित कर साहित्यिक व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं। ‘तत्वदर्शी निशंक’ ग्रंथ में उनकी समग्र साहित्यिक रचनाओं का सूक्ष्म विवेचन करते हुए समग्र साहित्यिक मूल्यांकन किया गया है।

रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की रचनाएँ एक ऐसे दस्तावेज के रूप में है, जिसका समग्र अनुशीलन करने पर ज्ञात होता है कि उन्होंने जीवन को सिर्फ देखा नहीं, बल्कि उसे भोगा भी है। इस बात का पता हमें उनकी इन पंक्तियों से चलता है- “प्रतिक्षण मैं संघर्षों की मालाओं से बँधा हुआ हूँ/ राजनीति के चक्रव्यूह में अभिमन्यु सा घिरा हुआ हूँ।” (पृ.12) तभी जाकर उन्होंने साहित्यिक व्यक्तित्व के रूप में अपनी छाप छोड़ी और साहित्यिक रचनाओं को केंद्र में लाकर सुशोभित कर दिया।

प्रो. ऋषभदेव शर्मा के संपादकत्व में ‘तत्वदर्शी निशंक’ ग्रंथ को कुल 6 खंडों में विभक्त कर साहित्य-साधक रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के संपूर्ण रचनाकर्म का गहन अनुशीलन एवं मूल्यांकन किया गया है। इस समग्र मूल्यांकन के अंतर्गत कुल मिलाकर 19 लेखकों ने विलक्षण कार्य किया है। डॉ. योगेंद्र नाथ शर्मा ‘अरुण’ ‘तत्वदर्शी निशंक’ ग्रंथ के बारे में कहते हैं कि- “नि:संदेह, यह भावाभिनंदन ग्रंथ दक्षिण भारत की हिंदी सेवी प्रतिभाओं द्वारा देवभूमि हिमालय के वरद पुत्र रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का भावभीना अविस्मरणीय अभिनंदन ही है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह ग्रंथ उत्तर और दक्षिण के हिंदीसेवियों के बीच स्नेह-सेतु बनेगा।” (पृ.8)। विवेच्य ग्रंथ के विषय प्रवेश के रूप में जो पहला खंड है, उसके अंतर्गत प्रो. गोपाल शर्मा ने ‘भूमिका-दर-भूमिका’ में ‘निशंक’ जी की सभी पुस्तकों में स्वयं निशंक जी एवं विभिन्न विद्वानों द्वारा लिखित भिन्न-भिन्न भूमिकाओं को बहुत ही सुंदर ढंग से विवेचित किया है। इसके अलावा उन्होंने ‘निशंक’ जी की रचना प्रक्रिया को बखूबी बताया है। साथ ही साथ उनके साहित्य सृजन के उद्देश्य को प्रतिपादित किया है। प्रो. गोपाल शर्मा ने निशंक जी की रचनाओं को लोक जीवन की संवेदनाओं से जोड़ा है। इसके अलावा निशंक की उदात्त दृष्टि का विवेचन भी किया है। सह संपादक शीला बालाजी ने ‘निशंक’ जी का जीवन परिचय देते हुए, उनके पारिवारिक, राजनीतिक, साहित्यिक परिवेश और सृजनशील व्यक्तित्व को बतलाते हुए उनकी समग्र रचनाओं की जानकारी उपलब्ध कराई है। दूसरे खंड का शीर्षक ‘काव्य जगत’ है। इस खंड के अंतर्गत प्रो. निर्मला एस. मौर्य ने रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के कृतित्व की महत्ता में निहित सौंदर्य का रहस्य जीवन सत्य को बताया है। उन्होंने सत्य और शिव को साहित्य से जोड़कर विशिष्ट सौंदर्य की सृष्टि की है। यथा- “खुली हुई हैं आँखें उसकी/ अब भी किसी प्रतीक्षा में/ प्राण पखेरू उड़ा छोड़ जग/ एक नई अन्वीक्षा में।” (पृ.56)। रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की अनेक काव्य कृतियों में करुण रस, वीभत्स रस, भयानक रस, वात्सल्य रस, वीर रस, रौद्र रस आदि रसों की सौंदर्य सृष्टि को दिखाते हुए उन्हें कवि को ‘रसराज’ के रूप में प्रतिष्ठित किया है। अंत में प्रो. निर्मला एस. मौर्य ने निशंक जी के जीवन दर्शन का सौंदर्यपरक विवेचन और विश्लेषण किया है। डॉ. सुपर्णा मुखर्जी ने निशंक के काव्य में देशप्रेम की चेतना को प्रतिपादित कर उन्हें राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के समान बताया है। वहीं दूसरी ओर डॉ. भागवतुल हेमलता ने निशंक जी को काव्य जगत का प्रजापति कहा है। इन्होंने निशंक की कविताओं में सृजनात्मक एवं रचनात्मक ऊर्जा को उजागर किया है। डॉ. एन. लक्ष्मीप्रिया ने निशंक की रचनाओं के उद्देश्य और उनमें शब्द प्रयोग के निजीपन को रेखांकित करते हुए संवाद और एकालाप के कई उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। निशंक जी ने मानव समुदाय से बातचीत करने के लिए जिस देह-भाषा का प्रयोग किया है, उसे भी डॉ. लक्ष्मीप्रिया ने बखूबी बतलाते हुए उनकी रचनाओं में संबोधन प्रयोग, चित्रात्मक शैली, गाँव के लोगों की मन:स्थिति के चित्र और दुखियारी स्त्री के चित्रण को भी बखूबी विवेचित किया है।

विवेच्य ग्रंथ के तृतीय खंड का शीर्षक ‘कहानियों का संसार’ है। इस खंड के अंतर्गत डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की कहानियों में आदर्श और यथार्थ का परत दर परत विवेचन किया है। डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा कहती हैं कि “रमेश पोखरियाल निशंक एक ऐसे समसामयिक साहित्यकार हैं जिन्होंने अपनी अनुभूत सच्चाइयों को अपनी रचनाओं की विषयवस्तु बनाया है।” (पृ.104)। अंत में इन्होंने आदर्श और यथार्थ की स्थिति को उजागर करते हुए निशंक की रचनाओं में द्रष्टव्य यथार्थ की अभिव्यक्ति और आक्रोश की अभिव्यक्ति को उदाहरण सहित विवेचित- विश्लेषित किया है। डॉ. डॉली ने रमेश पोखरियाल निशंक की कहानियों में समकालीन परिवेश को दिखलाते हुए ग्रामीण और नगरीय परिवेश की समस्याओं को विवेचित किया है। ज्ञानचंद 'मर्मज्ञ' ने निशंक जी की कहानियों में निहित समाज दर्शन और राष्ट्रवाद को रेखांकित किया है। डॉ. श्रीलता विष्णु ने निशंक की कहानियों की भाषा और तेवर को विलक्षण बतलाते हुए उन्हें मानवीयता का चतुर चितेरा सिद्ध किया है। अंत में उन्होंने कहा है कि ‘निशंक की दृष्टि कबीर की दृष्टि के समान पूर्णत: चरितार्थ है। डॉ. सुषमा देवी ने निशंक की कहानियों में टूटते बिखरते समाज बनाम आशावादी स्वर को भिन्न-भिन्न संदर्भों के द्वारा विवेचित किया है।

चतुर्थ खंड का शीर्षक ‘उपन्यास सृष्टि’ है। इस खंड के अंतर्गत डॉ. बी. बालाजी ने रमेश पोखरियाल निशंक के उपन्यासों में पहाड़ी जीवन के जीवंत दस्तावेज को बखूबी दिखलाने का प्रयास किया है। अंत में इन्होंने कहा है कि निशंक अपने उपन्यासों के अंतर्गत बहुत ही सरलता से मुहावरों, लोकोक्तियों, बिंबों, उपमानों, रूपों का प्रयोग कर कलात्मक शैली का अद्भुत रूप प्रतिफलित करते हैं। डॉ. मंजु शर्मा ने निशंक के उपन्यासों में चेतना के आयाम को प्रतिपादित करते हुए ‘रिश्ते नाते : आदर्श भी विकृत भी’, ‘लोक जीवन और लोक संस्कृति’, ’पलायन और पुनर्वास’, ‘स्त्री जीवन और उसकी समस्याएँ’, ‘पर्वतीय जीवन और उसकी समस्याएँ’ जैसे आयामों द्वारा प्रत्येक मनुष्य के जीवन मूल्य से जोडकर दिखलाने का प्रयास किया है।

पाँचवे खंड का शीर्षक ‘अकाल्पनिक गद्य’ है। इस खंड में प्रवीण प्रणव ने रमेश पोखरियाल निशंक के संस्मरण साहित्य के अंतर्गत प्राकृतिक आपदा में संवेदना के मरहम को परत दर परत दिखाया है। इसके अंतर्गत उन्होंने उत्तराखंड में आई आपदा का चित्रण, आपदा प्रबंधन की खामियों, मौत के तांडव के बीच लोभ की पराकाष्ठा, बाजारीकरण और मीडिया की भूमिका और तीन चार महीने बाद की स्थिति को यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में दिखलाने का प्रयास किया है। इसके आगे प्रवीण प्रणव ने निशंक के यात्रा वृत्तांत के अंतर्गत गोचर पहाड़ों से स्नेह और संस्कृति का पुल बखूबी बाँधकर प्रतिफलित किया है। डॉ. सुरेश भीमराव गरुड़ ने निशंक के गद्य में व्यक्तित्व निर्माण के लिए प्रेरणास्पद ओज को विवेचित-विश्लेषित किया है।

छठे खंड का शीर्षक ‘विश्व दृष्टि’ है। इस खंड के अंतर्गत डॉ. चंदन कुमारी ने रमेश पोखरियाल निशंक की रचनाओं को इस विषय-पंक्ति के द्वारा प्रगाढ़ बना दिया है- “तू धरा पर फैल इतना लौ तेरी आकाश ले।” (पृ.293)। अंत में इन्होंने कहा है कि साहित्य जीवन में आस्था बढ़ाने वाला काम करता है और निशंक की साहित्यिक रचनाओं में भी आस्था बढ़ाने वाले तत्व अदम्य साहस भरकर जीने का उत्साह जगाते हैं। डॉ. संगीता शर्मा ने रमेश पोखरियाल की रचनाओं को समकालीन समाज की धड़कन बताया है। इनके साहित्य में राष्ट्रप्रेम की गरिमा झलकती है और यही गरिमा समकालीन समाज में राष्ट्रप्रेम की धड़कन बन प्रतिफलित हुई है। मिलन बिश्नोई ने निशंक की रचना को ऐसे धरातल के रूप में प्रतिष्ठित किया है जिसमें भावात्मक और संवेदनात्मक तरलता प्रगाढ़ रूप में द्रष्टव्य है। डॉ. उषारानी राव ने रमेश पोखरियाल निशंक की रचनाओं में आत्ममंथन तरलता की प्राणवान धारा को प्रतिष्ठित किया है। निशंक जी अपने व्यक्तित्व को बनाने के लिए आत्म संघर्ष करते हुए साहित्यिक कृति कर्म के द्वारा अपने जीवन मूल्यों को परिष्कृत और परिमार्जित कर प्राणवान धारा बन बह रहे हैं। प्रो. गोपाल शर्मा ‘तत्वदर्शी निशंक’ की भावधारा को प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि “शिक्षक, राजनेता, समाजसेवी, पत्रकार आदि भूमिकाओं के निर्वहन से प्राप्त होते हुए संस्कारों और चेतना के फलस्वरूप जब उन्होंने गद्य और उसकी अनेक विधाओं के माध्यम से भी सृजनात्मक लेखन किया तो प्रेमचंद से अधिक कहानियाँ और उपन्यास हिंदी जगत को प्राप्त हो गए।” इन्होंने तत्वदर्शी निशंक नाम इसलिए भी दिया चूंकि निशंक की साहित्यिक रचनात्मक दृष्टि ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ से ओतप्रोत है। निशंक साहित्य जीवन के कल्याणकारी स्तंभ के रूप में वर्तमान जगत को अपने ओज से प्रकाशवान कर रहे हैं। दक्षिण भारत की ओर से हिंदी सेवी प्रतिभाओं द्वारा पहली बार किया गया यह समग्र मूल्यांकन ही अंततः ‘तत्वदर्शी निशंक’ ग्रंथ कहलाया।

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पुस्तक का नाम : ‘तत्वदर्शी निशंक’
संपादक : प्रो. ऋषभदेव शर्मा
सह-संपादक : शीला बालाजी
प्रकाशन : प्रभात प्रकाशन प्रा. लि. नई दिल्ली- 110002
संस्करण : प्रथम , 2021
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हुडगे नीरज,
पीएच.डी. शोधार्थी,
उच्च शिक्षा एवं शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद- 500 004.

सोमवार, 15 मार्च 2021

'राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के आलोक में हिंदी की विकास यात्रा' पर एकदिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन


हैदराबाद, 14 मार्च, 2021 (प्रेस विज्ञप्ति).

डॉ. योगेंद्र नाथ शर्मा 'अरुण'
प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय 

                    यहाँ जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा-आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना के सचिव श्री जी. सेल्वराजन ने यह स्पष्ट किया कि 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के आलोक में हिंदी की विकास यात्रा' विषयक एकदिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली और दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के संयुक्त तत्वावधान में आगामी 16 मार्च, 2021 को खैरताबाद स्थित सभा परिसर में संपन्न होगा।  इस कार्यक्रम की अध्यक्षता केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक एवं श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमेश कुमार पांडेय जी करेंगे और मुख्य अतिथि हैं रुड़की के प्रख्यात साहित्यकार और भारतविद्या के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले प्रो. योगेंद्र नाथ शर्मा 'अरुण'  जी। विशिष्ट अतिथि के रूप में उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, हैदराबाद के पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष प्रो. ऋषभदेव शर्मा, नई दिल्ली के प्रख्यात हिंदी विद्वान डॉ. बेचैन कंडियाल, प्रो. गोपाल शर्मा और केंद्रीय हिंदी निदेशालय के उपनिदेशक तथा 'भाषा' पत्रिका के संपादक डॉ. राकेश कुमार शर्मा उपस्थित रहेंगे। संयोजक ने नगरद्वय के हिंदी प्रेमियों को इस सारस्वत आयोजन में भाग लेने का आग्रह किया है.

डॉ. बेचैन कंडियाल 
डॉ. राकेश कुमार शर्मा 
 



- कार्यक्रम संयोजक
जी. सेल्वराजन
सचिव एवं संपर्क अधिकारी
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा - आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना
खैरताबाद, हैदराबाद - 500004

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

ऋषभदेव शर्मा की पुस्तक ‘साहित्य, संस्कृति और भाषा’ लोकार्पित


“साहित्य संस्कृति और भाषा” का लोकार्पण करते हुए प्रो. अबुल कलाम (निदेशक, दूरस्थ शिक्षा निदेशालय, मानू, हैदराबाद)। साथ में, बाएँ से : प्रो. ऋषभदेव शर्मा, डॉ. बी. एल मीना, डॉ. आफताब आलम बेग, डॉ. वाजदा इशरत, डॉ. मोहम्मद नेहाल अफ़रोज, डॉ. इबरार खान और डॉ. मोहम्मद अकमल खान। 000 

हैदराबाद, 19 जनवरी, 2021(मीडिया विज्ञप्ति)। 

आज यहाँ मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय स्थित दूरस्थ शिक्षा निदेशालय में डॉ. ऋषभदेव शर्मा की सद्यः प्रकाशित आलोचना कृति ‘साहित्य, संस्कृति और भाषा’ को लोकार्पित किया गया। पुस्तक का लोकार्पण करते हुए निदेशक प्रो. अबुल कलाम ने कहा कि “भाषा और साहित्य दोनों का मूल आधार संस्कृति होती है। इस पुस्तक में इन तीनों के भीतरी रिश्ते की बखूबी पड़ताल और व्याख्या की गई है।“ 

डॉ. आफताब आलम बेग ने विमोचित पुस्तक में राष्ट्रीयता और समकालीन विमर्शों की उपस्थिति पर चर्चा की। डॉ. मोहम्मद नेहाल अफ़रोज़ ने भारतीय और तुलनात्मक साहित्य की विवेचना के क्षेत्र में लेखक के दृष्टिकोण की व्याख्या की, तो डॉ. अकमल खान ने प्रवासी साहित्य संबंधी अंशों का परिचय दिया। डॉ. इबरार खान ने पुस्तक में दक्षिण भारत की पत्रकारिता और आंध्र प्रदेश के हिंदी रचनाकारों पर केंद्रित शोधपत्रों पर अपने विचार प्रकट किए। डॉ. बी. एल. मीना ने हिंदी की बदलती चुनौतियों के संबंध में लेखक की विचारधारा पर प्रकाश डाला तथा डॉ. वाजदा इशरत ने लेखक के व्यक्तित्व और कृतित्व का परिचय दिया। अंत में डॉ. शर्मा ने सभी विद्वानों का धन्यवाद ज्ञापित किया। 000 

शनिवार, 2 जनवरी 2021

श्रीलाल शुक्ल का साहित्य और उनका जीवन' पर राष्ट्रीय वेबिनार संपन्न



हैदराबाद, 31 दिसंबर, 2021 (प्रेस विज्ञप्ति)।

श्रीलाल शुक्ल स्मारक राष्ट्रीय संगोष्ठी समिति, हैदराबाद, तेलंगाना राज्य और लिटिल फ्लावर डिग्री कालेज, उप्पल, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में “श्रीलाल शुक्ल का साहित्य और उनका जीवन विषय पर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन सफलता पूर्वक संपन्न हुआ। 


वेबिनार के अध्यक्ष, प्रो. गोपाल शर्मा, आचार्य, अंग्रेज़ी विभाग, अरबामिंच विश्वविद्यालय, इथियोपिया (पूर्वी अफ्रीका), ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि  श्रीलाल शुक्ल का व्यक्तित्व पहेली से कम नहीं।  व्यंग्य सत्य की खोज नहीं, झूठ की खोज है। आगे उन्होंने कहा कि  श्रीलाल शुक्ल विकृति की सृष्टि नहीं करते, बल्कि विकृति की खोज करके उस पर चोट करते हैं।


मुख्य अतिथि अखिल भारतीय कान्यकुब्ज ब्राह्मण महासभा (रजि.) कानपुर, के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष पं. शिव सहाय मिश्रा ने अपने वक्तव्य में श्रीलाल शुक्ल के साहित्य का सटीक वर्णन किया। 'राग दरबारी'  का संक्षिप्त विवरण देते हुए, श्रीलाल शुक्ल जी को एक सफल व्यंग्यकार बताया तथा  श्रीलाल शुक्ल जी के अपने पुराने संस्मरण व्यवहार को साझा भी किया।


मुख्य वक्ता अमन कुमार त्यागी (संपादक: शोधादर्श), परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद,  उत्तर प्रदेश, ने श्रीलाल शुक्ल जी के साहित्य को विस्तार देते हुए उनके उपन्यासों का संक्षिप्त विवरण दिया साथ ही उन्होंने बताया कि “अभाव और तनाव, व्यक्ति को जोड़ भी देते हैं और तोड़ भी देते हैं।” श्रीलाल शुक्ल जी के अभावों ने उन्हें जोड़ा और कालजयी लेखक बना दिया।


साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल के पुत्र, लखनऊ, उत्तर प्रदेश निवासी, पंडित आशुतोष  शुक्ल ने सम्मानित अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए अपने पिता के गुणों की चर्चा कर उनकी यादों को साझा किया। उन्होंने  डॉ. सीमा मिश्र के हिंदीतर प्रांत में इस अद्भुत कार्य की प्रशंसा की कि वे विगत 14 वर्ष से निरंतर ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध उपन्यासकार पद्मभूषण  श्रीलाल शुक्ल  की जन्मोत्सव- संगोष्ठी के रूप में यह आयोजन करती आ रही हैं, जिसमें अपने जीवनकाल में स्वयं श्रीलाल शुक्ल फोन पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे।

    

विशेष अतिथि आंध्र प्रदेश सरकार के पूर्व आईपीएस अधिकारी पं. श्रीराम तिवारी ने अपने वक्तव्य में बताया कि श्रीलाल शुक्ल का ध्येय था, अपने व्यंग्य साहित्य के माध्यम से बुराइयों का अंत कर अच्छाइयों को बढ़ावा देना। इस प्रकार उन्होंने समाज को एक सही दिशा व अच्छी दशा प्रदान करने का भी कार्य किया।


विशिष्ट अतिथि के रूप में साहित्य गरिमा पुरस्कार समिति, हैदराबाद की संस्थापक अध्यक्ष, डॉ. अहिल्या मिश्रा ने कहा कि कान्यकुब्ज शिरोमणि डॉ. सीमा और पं. अशोक कुमार तिवारी ने निरंतर 14 वर्षों से विश्व के विद्वान अतिथियों  को कार्यक्रम में आमंत्रित कर एवं अलग-अलग विषयों पर साहित्यिक चर्चाएँ  करवा कर एक नया इतिहास रच डाला है और श्रीलाल शुक्ल जी को मानव से महामानव बना दिया है। उन्होंने आगे उत्तर भारतीय संघ के संस्थापक कर्मठ सदस्य एवं प्रथम महामंत्री पं. बाला प्रसाद जी तिवारी, को भी याद करते हुए उनके कई सामाजिक कार्यों  एवं  उनके सरल व्यवहार को अपने विचारों के माध्यम से साझा किया।


आत्मीय अतिथि अखिल भारतीय कान्यकुब्ज ब्राह्मण महासभा (रजि.) कानपुर, के राष्ट्रीय महामंत्री पं. महेश  मिश्रा ने अपने संबोधन में कहा कि कान्यकुब्ज रत्न पं. श्रीलाल शुक्ल ने साहित्य के क्षेत्र में जो सेवाएँ  प्रदान कीं, उनकी साहित्यिक सेवाओं की प्रशंसा पूरा साहित्य जगत आज भी करता है।


वेबिनार के निदेशक प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने श्रीलाल शुक्ल के बाल साहित्य का विशेष उल्लेख करते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी आस्था  तथा व्यंग्य को एक परिपूर्ण विधा बनाने में उनके योगदान पर चर्चा की। लेखक के साहित्य में जीवन के प्रक्षेपण के बारे में उन्होंने कहा कि सच्चा लेखक जो रचता है, उसमें जीता है। जो जीता है, भोगता है, झेलता है, वही रचता है। तब कहीं जाकर वह एक 'स्वस्थ साहित्य' समाज को सौंप पाता है। इसी विशेषता ने श्रीलाल शुक्ल को कालजयी रचनाकार बना दिया है। 

विषय प्रवर्तन करते हुए संयोजिका डॉ. सीमा मिश्रा ने अपने समाजशास्त्रीय अध्ययन, शोध अनुभवों एवं व्यंग्य सम्राट पं. श्रीलाल शुक्ल जी से पारिवारिक आत्मीयता और समय-समय पर भेंटवार्ता, पत्राचार  एवं शोध संसाधनों में भरपूर सहयोग को अपनी  साहित्यिक चेतना में विशेष वृद्धि का हेतु बताया और आगे कहा कि समाज साहित्य को प्रभावित करता है तो, साहित्य भी समाज  को प्रभावित करता है, दिशा देता है। आगे उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि श्रीलाल शुक्ल एक साधारण व्यक्तित्व के असाधारण लेखक थे। वे सामाजिक बुराइयों/ कुरीतियों को समझते या यह कहिए उसको जीते और व्यंग्य के माध्यम से उसे दूर करने और करवाने में सदा प्रयासरत रहते थे।

आरंभ में मल्ला रेडडी इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी साइंस, मेडचल, हैदराबाद महानगर के  बी.टेक. विद्यार्थी पं. आकाश तिवारी ने शंखनाद एवं मंगलाचरण किया। अखिल भारतीय कान्यकुब्ज ब्राह्मण महासभा (रजि.) कानपुर की राष्ट्रीय अध्यक्ष (महिला प्रकोष्ठ) डॉ. सीमा मिश्रा ने कार्यक्रम में सभी गणमान्य अतिथियों का स्वागत किया।


राष्ट्रीय वेबिनार का सफल संचालन मिश्र धातु निगम (मिधानि),  हैदराबाद, राजभाषा विभाग के उप-प्रबंधक डॉ. बी. बालाजी ने कुशलतापूर्वक पूर्ण किया। संयोजिका डॉ. सीमा मिश्रा ने इस राष्ट्रीय वेबसंगोष्ठी में देश-विदेश के 193 रजिस्ट्रेशन माध्यम से जुड़े एवं अखिल भारतीय कान्यकुब्ज ब्राह्मण महासभा (रजि.) कानपुर एवं विशेष कर महिलाओं की सक्रिय भूमिका एवं राष्ट्रीय वेबसंगोष्ठी को  चरम सीमा तक ले जाने के लिए अध्यक्ष का आभार व्यक्त किया।

 

देश-विदेश के साहित्यकारों, विद्वानों, कलाकारों, शोधार्थियों तथा पत्रकारों की सक्रिय सहभागिता एवं वंदे मातरम के साथ करतल ध्वनि से कोरोना वैक्सीन के शुभ आगाज एवं नूतन वर्ष की शुभकामनाओं के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। ★

                                                                प्रस्तुति: डॉ. सीमा मिश्रा,