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गुरुवार, 13 जुलाई 2023

【श्रद्धांजलि लेख】 हल्का होने का अहसास : मिलान कुंदेरा ◆ प्रो. गोपाल शर्मा

श्रद्धांजलि लेख


हल्का होने का अहसास : मिलान कुंदेरा 

  • प्रो. गोपाल शर्मा


“और जल्दी ही युवती सिसकी लेने के बजाय ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी और वह यह करुणाजनक पुनरुक्ति दोहराती चली गई, ”मैं मैं हूँ, मैं मैं हूँ, मैं मैं हूँ ....”

आज जब अचानक मिलान कुंदेरा (1929-2023) के निधन का समाचार सुना तो उनकी एक कहानी के अनुवाद की ये अंतिम पंक्तियाँ याद आ गईं।  ‘लिफ्ट लेने का खेल’ नामक यह कहानी मैंने पिछले ही दिनों ‘समालोचन’ में पढ़ी थी। न्यूयॉर्क टाइम्स में 11 जुलाई, 2023 को श्रद्धांजलि-स्वरूप  समाचार  प्रकाशित हुआ, “अपने मूल चेकोस्लोवाकिया के श्रमिकों के स्वर्ग में जीवन की दमघोंटू गैरबराबरी को दर्शाने वाले मार्मिक, यौन आधारित उपन्यासों से वैश्विक साहित्यिक सितारे बन गए कम्युनिस्ट पार्टी से निष्कासित नेता  मिलान कुंदेरा का मंगलवार को पेरिस में निधन हो गया। वह 94 वर्ष के थे।”

लेखक होने की असहनीय शिथिलता ढोनेवाले इस मजाकिया मिलान का  अब ‘मैं’ नहीं रहा; ‘अहं’ समाप्त हुआ; ‘वयं’ रह गया। उनकी ही पंक्ति है,“आदमी सोचता है, भगवान हँसता है।“और कुंदेरा का खुद-ब-खुद लगाया गया कुंदेरी ठहाका यूट्यूब पर रह गया, “लेकिन भगवान क्यों हँसते  हैं? क्योंकि मनुष्य सोचता है, और सत्य उससे दूर हो जाता है। क्योंकि जितना अधिक मनुष्य सोचते हैं, उतना ही अधिक एक मनुष्य के विचार दूसरे से भिन्न होते हैं। और अंततः सब समाप्त हो जाता है क्योंकि मनुष्य कभी भी वैसा नहीं होता जैसा वह सोचता है कि वह है।” चेक भाषा में कहे गए गए फ्रेंच से अंग्रेजी में आए और फिर मेरे द्वारा हिंदी में लाए गए इस महान साहित्यकार के ये शब्द ही तो अब बचे हैं।

  मैंने मिलान कुंदेरा का नाम  पहले पहल हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के मुखारविंद से कई दशक पहले सुना था और तब उनकी विद्वत्ता से और भी प्रभावित हो कर रह गया था। मैं उन्हें न जानता था। फिर उन्हें जानने लगा और इस जानने की इतिश्री न हो इसलिए यह लेख आज उनके नश्वर शरीर के  अंत होने के समाचार सुनने के तुरंत बाद लिख रहा हूँ।   मिलान कुंदेरा के द्वारा लिखित पुस्तकें हिंदी में आम आदमी को चाहे  आसानी से उपलब्ध न भी हों फिर भी वे विद्वत-चर्चा में रहते चले जा रहे हैं।  इस साहित्यकार का नाम  शहर "मिलान" के नाम पर नहीं है जो रोमन नाम "मेडियोलेनम" ("मैदान के बीच में") से आया है।   व्यक्ति "मिलान" स्लाव मूल "मिल" से बनकर आया है जिसका अर्थ "दया" और “प्यार” या ऐसा ही कुछ होता है। समझ लें ‘प्रेम कुमार’ या ‘दया कुमार’ जैसा ही कुछ इनका नाम  है। 

मिलान कुंदेरा एक चेक उपन्यासकार, नाटककार, निबंधकार और कवि थे। उनका जन्म 1929 में ‘ब्रनो’ (चेकोस्लोवाकिया) में हुआ था और उन्होंने प्राग विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र का अध्ययन किया था। एक प्रसिद्ध कॉन्सर्ट पियानोवादक और संगीतज्ञ, लुडविक कुंदेरा के पुत्र युवा कुंदेरा ने संगीत का अध्ययन किया, लेकिन धीरे-धीरे लेखन की ओर रुख किया।  उन्होंने 1952 में प्राग में संगीत और नाटकीय कला अकादमी में साहित्य पढ़ाना शुरू कर दिया और कई कविता-संग्रह प्रकाशित किए। 1950 के दशक में ‘पॉस्लेडनी माज’ (1955; "द लास्ट मे"), और ‘मोनोलॉजी’ (1957; "मोनोलॉग्स") अपने व्यंग्यपूर्ण और कामुकता के अतिरेकी स्वर के कारण चेक राजनीतिज्ञों और अधिकारियों द्वारा बेकार बता दिए गए। 

अपने शुरुआती करियर के दौरान वे कम्युनिस्ट पार्टी में आते-जाते रहे थे। 1948 में शामिल हुए, 1950 में निष्कासित कर दिए गए, और 1956 में फिर से शामिल हुए।  कुंदेरा  ने 1967-68 में चेकोस्लोवाकिया में हो रहे कुछ उदारवादी  आंदोलनों में भाग लिया था। देश पर सोवियत कब्जे के बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक गलतियों  को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और परिणामस्वरूप अधिकारियों के कोपभाजन बने। उनके सभी कार्यों और लेखन की भरपूर निंदा हुई और उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। यही नहीं  उन्हें उनके सभी पदों और कम्युनिस्ट पार्टी से बाहर भी कर दिया गया। दैवयोग  से 1975 में कुंदेरा को फ्रांस में रेन्नेस विश्वविद्यालय (1975-78) में अध्ययन-अध्यापन का अवसर मिल गया और वे चेकोस्लोवाकिया से अपनी पत्नी वेरा ह्राबनकोवा के साथ फ्रांस में जा बसे। 1979 में चेक सरकार ने उनसे उनकी चेक नागरिकता भी  छीन ली। वैसे 40 वर्ष तक मातृभूमि से बेदखल रहने के बाद मृत्यु से कुछ वर्ष पूर्व 2019 में बहाल कर दी गई थी। अगले वर्ष 2020 में उन्हें नागरिकता का प्रमाणपत्र भी दे दिया गया। पर  जीवन के अंतिम कुछ महीनों में वे उसका करते भी क्या ? बस उसे लेकर शून्य की ओर ताकते हुए आभार के दो शब्द भर बोले , “ डेकूजी’ (“थैंक यू!”)। मिलान का देहावसान अपने देश में नहीं, फ्रांस में हुआ। यूरोप में हुआ जिसे वे ताउम्र ‘न्यूनतम स्पेस में अधिकतम विविधता’ वाला स्थान कहते रहे और खुद के ‘अन्यत्र’ (एल्सवेयर) होने का संताप झेलते रहे।  

 उनका पहला उपन्यास, ‘द जोक’, 1967 में प्रकाशित हुआ था। इस  उपन्यास का प्रकाशन एक महत्वपूर्ण और व्यावसायिक सफलता थी, और इसने कुंदेरा को एक प्रमुख साहित्यकार के रूप में स्थापित किया। ‘जोक’ उपन्यास  चेकोस्लोवाकिया में कम्युनिस्ट शासन पर एक करारा  व्यंग्य है और 1968 के सोवियत आक्रमण के बाद उनके देश में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। कुंदेरा 1975 से 11 जुलाई, 2023 को अपनी मृत्यु तक फ्रांस में निर्वासन में रहे, साथ ही  उनके लेखन  पर चेकोस्लोवाकिया में बहुत समय तक  प्रतिबंध जारी रहा। लेकिन कुंदेरा पश्चिम में खूब  प्रकाशित होते रहे। 

1970 और 80 के दशक में उनके उपन्यास, जिनमें ‘वाल्सिक ना रोज़्लौसेनौ’ (1976; "फेयरवेल वाल्ट्ज"; द फेयरवेल पार्टी), ‘निहा स्मिचू ए जैपोम्नेनी’ (1979; द बुक ऑफ लाफ्टर एंड फॉरगेटिंग), और ‘नेस्नेसिटेलना लेहकोस्ट बायटी’ ( 1984; द अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग), आदि प्रकाशित हुए।  कुंदेरा की प्रतिभा के  व्यापक चिह्न हमें ‘एल'आर्ट डू रोमन’ (1986; द आर्ट ऑफ द नॉवेल), ‘लेस टेस्टामेंट्स ट्रैहिस’ (1993; टेस्टामेंट्स बेट्रेयड), ले रिड्यू (2005; द कर्टेन), और यूने रेनकॉन्ट्रे (2009; एनकाउंटर) आदि रचनाओं में भी दिखाई देते हैं। उन्होंने अपना अंतिम उपन्यास, "द फेस्टिवल ऑफ इनसिग्निफिसेंस" (2015) पेरिस में रहते हुए पूरा किया। कुंदेरा के लेखन  का हिंदी सहित 40 से अधिक भाषाओं में अनुवाद किया गया है।  उन्होंने फ्रांज काफ्का पुरस्कार और जेरूसलम पुरस्कार सहित कई पुरस्कार जीते हैं। उन्हें 20वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण लेखकों में से एक माना जाता है। हालांकि उन्हे साहित्य का नोबेल पुरस्कार न मिल सका, यह अजीब लगता है। 

कुंदेरा के सबसे प्रसिद्ध उपन्यासों में ‘द अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग’, ‘द बुक ऑफ लाफ्टर एंड फॉरगेटिंग’ और ‘आइडेंटिटी’ शामिल हैं। ‘द अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग’ कुंदेरा का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है। यह 1984 में प्रकाशित हुआ था और आज तक एक अंतरराष्ट्रीय बेस्टसेलर है। उपन्यास प्रेम, क्षति  और जीवन के अर्थ की प्रकृति पर एक दार्शनिक चिंतन है। ‘द बुक ऑफ लाफ्टर एंड फॉरगेटिंग’ निबंधों और कहानियों का एक संग्रह है। यह 1978 में प्रकाशित हुआ था और चेकोस्लोवाकिया में प्रतिबंधित कर दिया गया था। पुस्तक के निबंध स्मृति, इतिहास और शब्दों की शक्ति के विषयों का पता देते हैं। यह रचना  मानव स्मृति और ऐतिहासिक सत्य को नकारने और मिटाने की आधुनिक राज्य की प्रवृत्ति पर व्यंग्यपूर्ण  कटाक्ष है।  ‘आइडेंटिटी’ कुंदेरा का एक दूसरा उपन्यास है। यह 1991 में प्रकाशित हुआ था और यह पहचान की प्रकृति और हमारे आत्मबोध को आकार देने में स्मृति की भूमिका पर एक सघन चिंतन है। 2014 में उनके अंतिम उपन्यास ‘द फेस्टिवल ऑफ इनसिग्निफिसेंस’ को "आशा और ऊब के बीच की ऊहापोह" के रूप में देखा गया। 

वस्तुतः कुंदेरा का जीवन, लेखन और उनके विचार सब अजीब से ही हैं। इनका उद्देश्य क्या है? ठीक से पता नहीं चलता। 1980 में न्यूयॉर्क टाइम्स बुक रिव्यू में भी इसी ओर संकेत देकर कहा गया था  कि "इस लेखक का असली काम अपने जीवनकाल में अपने देश के विनाशकारी इतिहास की छवियां ढूंढना है।” न्यूयॉर्क टाइम्स के ही  अपने एक  मित्र  फिलिप रोथ से कुंदेरा ने एक बार कहा था, “"मुझे ऐसा लगता है कि आजकल पूरी दुनिया में लोग समझने के बजाय निर्णय करना पसंद करते हैं, पूछने के बजाय जवाब देना पसंद करते हैं।”

कुंदेरा अपने लेखन के माध्यम से अपने विचार व्यक्त करते हैं और उनकी विचारधारा सदा पहले जैसी ही रहती है। उन्होंने एक बार लिखा था, “ मेरे   हर उपन्यास का शीर्षक “द अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग” या “द जोक” या “लाफेबल लव्स” हो सकता है; शीर्षक परस्पर परिवर्तनशील हो सकते  हैं, वे उन सभी मुद्दों  की छोटी संख्या को दर्शाते हैं जो मुझ पर सदा हावी रहते चले आए हैं, मुझे परिभाषित करते हैं, और, दुर्भाग्य से, मुझे प्रतिबंधित  भी करते हैं। इन विषयों के अलावा, मेरे पास कहने या लिखने के लिए और कुछ नहीं है।” 

सही बात  है कि इनकी रचनाओं में डिकोड करने के लिए कोई प्रतीक नहीं हैं, इकट्ठा करने के लिए कोई वैकल्पिक अर्थ नहीं हैं। लेखक  पहले से ही समझाए गए, पहले से ही डिकोड किए गए उपन्यास को प्रस्तुत करता है। यह एक वास्तविक संभावना को दर्शाता है जिसमें हर उपन्यास पूरी  तरह से सक्षम है। कुंदेरा का हर उपन्यास उपन्यास की अनंत क्षमताओं  का बचाव करने और इसे अज्ञात क्षेत्र में ले जाने के बारे में होता  है। ‘द आर्ट ऑफ़ द नॉवेल’ या उनके बाद के उपन्यासेतर रचना संसार में से भी यदि आप किसी  दूसरी रचना को पढ़ते हैं तो कोई खास फ़र्क़ नहीं पड़ता। कुंदेरा का समस्त लेखन एक ही आधार पर स्थित है । 

कुंदेरा अपने उपन्यासों के महिला चरित्रों के चित्रण में विशेष रूप से इतने  निर्लज्ज और निर्दयी रहे हैं कि ब्रिटिश नारीवादी जोन स्मिथ ने अपनी 1989 की पुस्तक "मिसोजिनीज़" में घोषणा की थी कि "महिलाओं के बारे में कुंदेरा का समस्त लेखन  शत्रुता से भरा प्रतीत होता है। जब वे  अपने पुरुष पात्रों का चित्रण करते हैं, तो वह दुनिया को उनके नजरिए से देखते हैं; और जब वह अपनी स्त्रियों का चरित्र गढ़ते है, तो वे  उन्हें दर्पण के सामने रखकर उनसे कहते हैं  है कि वे सामने देखते हुए अपने कपड़े उतार दें।” एक फिनिश फेमनिस्ट कटीज कैल के अनुसार,  “ऐसा प्रतीत होता है कि कुंदेरा अपने महिला पात्रों का उपयोग मुख्य रूप से अपने दार्शनिक मत  को प्रतिपादित  करने के लिए करते हैं, और फिर उस विचार और दर्शन को अपने पुरुष-पात्रों  का वर्णन करने के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल  करते हैं।”

“द अनबियरेबल  लाइटनेस ऑफ बीइंग’ एक युवा जोड़े और उनके कुत्ते की कहानी है जो सोवियत आक्रमण के दौरान  रह रहे थे। 'अस्तित्व का हल्कापन' नीत्शे की उस अवधारणा पर ठोस  प्रतिक्रिया है कि ब्रह्मांड एक लूप में अंतहीन रूप से विद्यमान है, जिसमें सब कुछ पहले से ही उसी तरह घटित हो रहा है जैसा वह है। कुछ पात्र नीत्शे  के विचारों के बोझ तले संघर्ष करते हैं, जबकि कुछ यह मानकर चलते हैं कि सब कुछ केवल एक बार होता है - इसलिए अस्तित्ववाद  का बोझ असहनीय नहीं रहता। मिलान अपने इस प्रतिनिधि उपन्यास  (दि  अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग) के कुछ पात्रों जैसे टॉमस (एक चेक सर्जन और बुद्धिजीवी), टेरेज़ा (टॉमस की युवा पत्नी), सबीना (टॉमस की तथाकथित प्रेमिका और सबसे करीबी दोस्त), फ्रांज (सबीना का प्रेमी और जिनेवा का आदर्शवादी प्रोफेसर), कारेनिन (टॉमस और टेरेज़ा का कुत्ता), और सिमोन (टॉमस का पिछली शादी से हुआ पुत्र) के माध्यम  से   60 के दशक का चित्रण करते हैं। 1968 के प्राग वसंत से लेकर सोवियत संघ और तीन अन्य वारसा संधि वाले देशों द्वारा चेकोस्लोवाकिया पर आक्रमण के दौरान चेक समाज के कलात्मक और बौद्धिक जीवन की पड़ताल करती यह रचना प्रेम और सेक्स के हल्केपन को दिखाती है। वे प्यार को क्षणभंगुर, बेतरतीब और उलझाव भरा बताते हुए कहते हैं –

जितना अधिक बोझ होगा, हमारा जीवन उतना ही अधिक पृथ्वी के करीब आएगा, उतना ही अधिक वास्तविक और सच्चा हो जाएगा। इसके विपरीत, बोझ की पूर्ण अनुपस्थिति के कारण मनुष्य हवा से भी हल्का हो जाता है, ऊंचाइयों पर चढ़ जाता है, पृथ्वी और उसके सांसारिक अस्तित्व को छोड़ देता है, और केवल आधा वास्तविक बन जाता है, उसकी गतिविधियां जितनी स्वतंत्र होती हैं उतनी ही महत्वहीन होती हैं। तो फिर हम क्या चुनें? भारीपन या हल्कापन? ...जब हम अपने जीवन में किसी नाटकीय स्थिति को अभिव्यक्ति देना चाहते हैं, तो हम भारीपन के रूपकों का उपयोग करते हैं। हम कहते हैं कि कोई चीज़ हमारे लिए बहुत बड़ा बोझ बन गई है। हम या तो बोझ उठाते हैं या असफल होते हैं और इसके साथ नीचे चले जाते हैं, हम इसके साथ संघर्ष करते हैं, जीतते हैं या हारते हैं। और सबीना- उसके ऊपर क्या आ गया था? कुछ नहीं। उसने एक आदमी को छोड़ दिया था क्योंकि उसे ऐसा लग रहा था कि वह उसे छोड़ रही है। क्या उसने उस पर अत्याचार किया था? क्या उसने उससे बदला लेने की कोशिश की थी? नहीं, उनका नाटक भारीपन का नहीं बल्कि हल्केपन का नाटक था। जो कुछ उसके हिस्से में आया वह बोझ नहीं था, बल्कि अस्तित्व का असहनीय हल्कापन था। (पृष्ठ 364)

यदि कुछ भारी भारी सा लग रहा है और आप कुछ हल्का होना चाहते हैं तो ‘नेटफ़िलस्क’ पर इस कहानी पर आधारित फिल्म देखें। अच्छा रहेगा। ■



प्रो. गोपाल शर्मा, पूर्व प्रोफेसर, भाषा अध्ययन विभाग, अरबा मींच विश्वविद्यालय, इथियोपिया (पूर्व अफ्रीका)

prof.gopalsharma@gmail.com 

व्हाट्सएप्प- +91 89783 72911. 


शनिवार, 19 मार्च 2022

प्रेमचंद्र जैन की प्रथम पुण्यतिथि पर भावपूर्ण स्मरण

समाज निर्माण के लिए भाईचारे को बढ़ाने की आवश्यकता - डॉ. देवराज 

प्रेमचंद्र जैन शिक्षा और ज्ञान के अगाध समंदर थे -डॉ. सूर्यमणि रघुवंशी




नजीबाबाद (उत्तर प्रदेश) के साहू जैन डिग्री कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर डॉ. प्रेमचंद्र जैन की प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर 16 मार्च, 2022 को उनके विद्यार्थियों द्वारा आयोजित ‘प्रेमचंद्र जैन स्मरण’ कार्यक्रम की अध्यक्षयता करते हुए ‘चिंगारी’ के संपादक डॉ. सूर्यमणि रघुवंशी ने कहा कि डॉ. प्रेमचंद्र जैन एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि वे व्यक्तित्व थे, परंपरा थे। उन्होंने यह भी कहा कि उनके भीतर एक संत और एक ऐसा सिपाही विद्यमान था जो सागर की तरह शांत था तथा समुद्र की लहरों की तरह ही आगे बढ़ता था। प्रेमचंद्र जैन शिक्षा और ज्ञान के अगाध समंदर थे।

डॉ. देवराज ने अपने गुरु प्रेमचंद जैन का स्मरण करते हुए कहा कि उन्होंने अपने शिष्यों को सही कहना और निर्भय रहना सिखाया। उन्होंने आगे कहा कि आज समाज संकट में फँसा है। अँधेरों से लड़ना है, उजाले में इसे बदलना है। समाज के निर्माण के लिए नफरत नहीं भाईचारा बढ़ाने की जरूरत है। जब भाईचारा और आपसी प्रेम बढ़ेगा, तो एक अच्छे समाज का निर्माण होगा। प्रेमचंद्र जैन ने गुरु-शिष्य का अच्छा रिश्ता निभाने के साथ सामाजिक सरोकारों की जो चेतना पैदा की थी, उसे आज तेजी से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।

इस अवसर पर एम. दानिश सैफी द्वारा संपादित प्रेमचंद्र जैन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित स्मृति ग्रंथ ‘इतिहास हुआ एक अध्यापक’ का विमोचन भी किया गया। इसकी प्रथम प्रति प्रेमचंद्र जैन की अर्धांगिनी श्रीमती आशा जैन ने स्वीकार की। उनकी सुपत्री श्रीमती श्रद्धा भी इस अवसर उपस्थित रहीं।

इस कार्यक्रम में डॉ. ए. के. मित्तल, महमूद जफ़र, डॉ. आफताब नोमानी, शकील राज, इंद्रदेव भारती, डॉ. हेमलता राठौर, डॉ. निर्मल शर्मा, डॉ. रजनी शर्मा, पुनीत गोयल, मनोज शर्मा, आशा रजा, डॉ. शहला अंजुम, कामरेड रामपाल सिंह, जितेंद्र कुमार आदि उपस्थित रहे। कार्यक्रम का सफल संचालन दानिश सैफी ने किया।


शनिवार, 29 मार्च 2014

बेलगाम में राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन

उद्घाटन दीप प्रज्वलित करते हुए मुख्य अतिथि प्रो. एम. वेंकटेश्वर.
साथ में बाएं से - प्रो. ऋषभ देव शर्मा, वी.एन. हेगडे, प्रो. हीरालाल बाछोतिया, प्रो. दिलीप सिंह
व अन्य 

आज 29 मार्च 2014 - दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय विभाग, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के तत्वावधान में बेलगाम [कर्नाटक] में 'पुण्य स्मरण : कैलाश चंद्र भाटिया, राजेंद्र यादव, परमानंद श्रीवास्तव, ओमप्रकाश वाल्मीकि' विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन संपन्न हुआ.

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पधारे इफ्लू के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने कहा कि साहित्य का पठन-पाठन सतही स्तर पर करना या व्याख्या भर करना काफी नहीं होता. गहन अध्ययन और विश्लेषण की आवश्यकता आज की माँग है. पाठक को चिंतन एवं भावनात्मक स्तर पर किसी भी साहित्यकार के साथ तादात्म्य करना चाहिए. उन्होंने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा को बधाई देते हुए कहा कि प्रो. दिलीप सिंह जी के नेतृत्व में सभा ऐसी सफल संगोष्ठियाँ करती आ रही है और आगे यह भी कहा कि आज की यह संगोष्ठी निश्चय ही चुनौती से भरी हुई संगोष्ठी है चूंकि यह ऐसे साहित्यकारों पर केंद्रित है जिन्होंने साहित्य, भाषा, आलोचना, अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान जैसे क्षेत्रों के लिए दिशा निरेदेश्कों पर केंद्रित है. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद से प्रकाशित द्विभाषी मासिक 'स्रवंति' का मार्च 2014 का अंक इस राष्ट्रीत संगोष्ठी के लिए कर्टन रेसर है क्योंकि यह अंक विशेष रूप से परमानंद श्रीवास्तव, कैलाश चंद्र भाटिया, ओमप्रकाश वाल्मीकि, राजेंद्र यादव और अमरकांत के पुण्य स्मरण पर केंद्रित है.

बीज भाषण प्रस्तुत करते हुए प्रमुख समाजभाषावैज्ञानिक उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के कुलसचिव प्रो. दिलीप सिंह ने विजयदान देता को मनुष्य की जिजीविषा को अभिव्यक्त करने वाले तथा राजस्थानी लोककथाओं को हिंदी में लाने वाले कथाकार के रूप में याद किया तो के.सी. सक्सेना को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वे ऐसे हास्य-व्यंग्य जीवट कथाकार हैं जो अपने ऊपर भी हंस सकते हैं.

डॉ. रघुवंश के साथ जुड़ी यादों को ताजा करते हुए उन्होंने कहा कि डॉ. रघुवंश के साथ उन्होंने समसामयिक कविता पर काम किया जिससे प्रेरित होकर उन्होंने उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के एम.ए. पाठ्यक्रम के लिए 'समसामयिक हिंदी कविता' पुस्तक का संपादन किया. उन्होंने आगे कहा कि वे डॉ. रघुवंश से प्रभावित थे क्योंकि दोनों हाथों से लाचार होते हुए भी उन्होंने पैर की अंगूठी और उंगली के बीच कलम रखकर लिखने का अभ्यास किया. उन्होंने कहा कि रघुवंश अच्छे काव्यालोचक थे. वे आलोचना से ज्यादा पाठक को महत्व देते थे.

डॉ. सी. प्रसाद को अच्छी बाल साहित्यकार के रूप में याद किया तो शैलेश मटियानी के बारे में स्पष्ट करते हुए कहा कि शैलेश मटियानी ने मजदूर की जिंदगी जी. इसलिए उनकी कलम कटु यथार्थ की अभिव्यंजना का हथियार है. अमरकांत के बारे में उनका मत दो-टूक है. उन्होंने कहा कि कस्बाई जीवन के पहलुओं को अपने लेखन में समेटने में अमरकांत दक्ष थे. वे लिखते नहीं थे, बोलते थे.

डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि वे हिंदी भाषा के गहरे अध्येता एवं चिंतक थे.

'आलोचना' के संपादक परमानंद श्रीवास्तव हमेशा नए आलोचकों को केंद्र में रखते थे. उनकी 'निजता' सिर्फ उनकी ही थी. वे जीवन पर्यंत मार-काट वाली आलोचना का विरोध करते थे तथा शैलीवैज्ञानिक आधारों को लेकर काम करना पसंद करते थे. उन्होंने परमानंद श्रीवास्तव को 'नई राहों के अन्वेषी आलोचका' कहा.

राजेंद्र यादव के बारे में स्पष्ट करते उन्होंने हुए कि हिंदी साहित्य जगत में जयादा बखेड़े किसी और साहित्याकर ने नहीं की जितनी राजेंद्र यादव ने की. राजेंद्र यादव की भाषा पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि  उनकी भाषा ललकार की भाषा थी. आग की शैली थी.

हिंदी साहित्य जगत में पहली बार दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र को लाने वाले साहित्यकार के रूप में उन्होंने ओमप्रकाश वाल्मीकि को याद करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी कविताएँ वस्तुतः छोटी छोटी चित्रावलियाँ लगती हैं. उन्होंने यह भी कहा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि का सारा साहित्य स्वयं में दलित आंदोलन है.

अध्यक्षीय भाषण में दिल्ली से पधारे वरिष्ठ कवि एवं भाषाविद प्रो. हीरालाल बाछोतिया ने कहा कि प्रो. दिलीप सिंह ने बीज भाषण में बीज बोते बोते एक विशाल वटवृक्ष को खड़ा कर दिया है तथा आज की धारा को, सही नब्ज को पकड़ लिया है.

उद्घाटन सत्र का संचालन उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, धारवाड़ की अध्यक्ष प्रो. अमरज्योति ने किया.   

मंगलवार, 21 मई 2013

आधुनिकता और उत्तरआधुनिकता : (व्याख्यान : ऋषभ देव शर्मा )






16/17 मई 2013 को कर्नाटक विश्वविद्यालय [धारवाड] के हिंदी विभाग में विशेष व्याख्यानमाला के
अंतर्गत 'संरचनावाद', 'उत्तर संरचनावाद', 'आधुनिकता' और 'उत्तर आधुनिकता' पर
डॉ. ऋषभ देव शर्मा (प्रोफ़ेसर और अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद) के 4 व्याख्यान हुए.

प्रस्तुत है उनमें से चौथा व्याख्यान -
"आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता".

सोमवार, 17 सितंबर 2012

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद की स्मृति में श्रद्धांजलि-सभा संपन्न


हैदराबाद, 17 सितंबर 2012.
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सम्मलेन कक्ष में ‘विश्वंभरा’, ‘साहित्य मंथन’ और ‘हिंदी भारत’ के संयुक्त तत्वावधान में नगर के वरिष्ठ कलमकार चंद्रमौलेश्वर प्रसाद की स्मृति में श्रद्धांजलि-सभा आयोजित की गई. उल्लेखनीय है कि ‘कलम’ नामक ब्लॉग के लेखक, साहित्य समीक्षक, कवि और अनुवादक चंद्रमौलेश्वर प्रसाद का गत सप्ताह निधन हो जाने से हैदराबाद के हिंदी जगत में शोक की लहर व्याप्त है. उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए प्रो.एम.वेंकटेश्वर ने कहा कि चंद्रमौलेश्वर प्रसाद परम आत्मीय मित्र, स्नेही परिजन और मानवतावादी संत के समान थे जिनका सामाजिक और साहित्यिक योगदान चिरकालिक है. 

आंध्रप्रदेश मारवाड़ी युवा मंच के उपाध्यक्ष द्वारका प्रसाद मायछ ने प्रसाद जी की आत्मीयता और स्नेह को याद किया और अनेक प्रेरक प्रसंगों की चर्चा करते हुए उनके निधन को साहित्यिक परिवार की अपूरणीय क्षति बताया. 

कवि, समीक्षक और व्यंग्यकार लक्ष्मीनारायण अग्रवाल ने कहा कि चंद्रमौलेश्वर जी के लिए साहित्य की साधना एक गंभीर उद्देश्य थी तथा ईमानदारी और सहृदयता उनके जीवन और लेखन दोनों में झलकती थी.

आंध्रप्रदेश हिंदी अकादमी के शोध-अधिकारी प्रो.बी.सत्यनारायण ने उनकी साहित्य सेवा को अनुकरणीय बताया तो संपत देवी मुरारका ने उन्हें अपने ब्लॉग-गुरु के रूप में श्रद्धांजलि अर्पित की.

गुरुदयाल अग्रवाल ने अत्यंत भावाकुल होकर कहा कि एक मानवालंकार नहीं रहा, हम अधूरे हो गए. 

‘दस रंग’ के अध्यक्ष हास्य-व्यंग्य कवि अजित गुप्ता ने कहा कि कलम का खामोश सिपाही खामोश हो गया और झीनी सी चदरिया को ज्यों की त्यों धर कर चला गया. 

कवयित्री एलजाबेथ कुरियन मोना ने चंद्रमौलेश्वर प्रसाद के कोमल स्वभाव और मधुर मुस्कान को याद किया तो डॉ.करन सिंह ऊटवाल ने उनकी निष्ठा और ईमानदारी की प्रशंसा की. राधाकृष्ण मिरियाला ने प्रसाद जी को हिंदी का एक प्रमुख ब्लॉगर बताया और कहा कि ब्लॉग जगत के सभी छोटे-बड़े लेखकों को उनकी धारदार और संतुलित टिप्पणी की प्रतीक्षा रहती थी. 

भारत डायनामिक्स लिमिटेड से जुड़े डॉ.बी.बालाजी ने याद दिलाया कि चंद्रमौलेश्वर जी विविध विषयों के विद्वान थे तथा जटिल विषयों पर बड़ी ही साफ़, सरल और बोधगम्य भाषा में लिखने में सिद्धहस्त थे. 

चवाकुल नरसिंह मूर्ति, भंवरलाल उपाध्याय और डॉ.देवेंद्र शर्मा ने दिवंगत लेखक के सरल स्वभाव और साफ़-सुथरे लेखन पर चर्चा की तो पवित्रा अग्रवाल, जी.संगीता, विनीता शर्मा और ज्योति नारायण ने उनकी सादगी, विद्वत्ता, मिलनसारिता और हाईकू लेखन के क्षेत्र में उनके योगदान का स्मरण किया. 

प्रसाद जी के स्नेहिल व्यक्तित्व को याद करते हुए वी.कृष्णा राव ने कहा कि वे जब भी मिलते थे भरपूर शुभकामनाएं और आशीर्वाद देते थे तथा उनके वक्तव्यों को सुनकर ऐसा लगता था कि वे सारे विषय को आत्मसात करके अत्यंत सहज और बोधगम्य बनाकर पेश करने में माहिर है. 

‘स्रवन्ति’ की सह-संपादक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा तथा उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के भाषा और साहित्य संबंधी कार्यक्रमों में चंद्रमौलेश्वर प्रसाद की सदा सन्नद्ध रहने की भूमिका पर चर्चा करते हुए कहा कि उनके रूप में हमने एक सच्चे शुभचिंतक और अभिभावक को खो दिया है. 

डॉ.बलविंदर कौर ने एक सुलझे हुए ब्लॉगर तथा सफल अनुवादक के रूप में प्रसाद जी के योगदान को अविस्मरणीय बताया और कहा कि वे सदा नए लोगों को आगे आने के लिए प्रोत्साहित करते थे और स्वयं परदे के पीछे रहकर सेवा और सहयोग करते थे. 

सीमा मिश्रा और अशोक तिवारी ने कहा कि प्रसाद जी का अवसान हिंदी जगत की अपूरणीय क्षति है क्योंकि वे एक संवेदनशील साहित्यकार थे और निरंतर सहकारिता और सहयोगपूर्ण साहित्यिक परिवेश के निर्माण के लिए कार्यरत थे. 

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, आंध्र के अपर सचिव गुत्तल, प्राध्यापक गोरखनाथ तिवारी, व्यवस्थापक ज्योत्स्ना कुमारी, ग्रंथपाल संतोष कांबले और कोसनम नागेश्वर राव ने भी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की. 

प्रो.टी.मोहन सिंह ने चंद्रमौलेश्वर प्रसाद को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि हमने एक अच्छे समीक्षक और एक अच्छे साहित्यकार को खो दिया है. यह क्षति अपूरणीय है. उनके परिवार के लोगों को भगवान इस दुःख में सहारा दे. 

श्रद्धांजलि सभा के दौरान लगातार फोन पर भी संवेदना सन्देश आते रहे. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के कुलसचिव प्रो.दिलीप सिंह ने फोन पर कहा कि चंद्रमौलेश्वर जी एक अच्छे और सच्चे इंसान थे तथा उन्हें मनुष्यों के साथ-साथ साहित्य और भाषा की खरी पहचान थी. 

लन्दन से डॉ.कविता वाचक्नवी ने फोन पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि चंद्रमौलेश्वर प्रसाद के रूप में हमने एक अहेतुक स्नेही, परम आत्मीय, निस्स्वार्थ मित्र को खो दिया है. उन्होंने कहा कि प्रसाद जी जैसे निस्पृह मनुष्य विरले और दुर्लभ होते हैं. 

प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने भी प्रसाद जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में बताते हुए उनके साथ बिताए अंतरंग क्षणों को याद किया और कहा कि भाषा, साहित्य और संस्कृति के उन जैसे मौन साधक की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती. 

इस अवसर पर सभी ने एक स्वर में स्वर्गीय चंद्रमौलेश्वर प्रसाद की रचनाओं के पुस्तक के रूप में प्रकाशन की आवश्यकता बताई और कहा कि उनके द्वारा अनूदित कहानियों, सिमोन द बुआ की कृति ‘द ओल्ड एज’ के सार-संक्षेप ‘वृद्धावस्था विमर्श’, मौलिक सृजन और ब्लॉग-लेखन को अलग अलग जिल्दों में प्रकाशित करने की जरूरत है क्योंकि यह सारी सामग्री शोध और अध्ययन के लिए स्थायी महत्त्व रखती है. 

दिवंगत आत्मा की चिरशांति के लिए मौन प्रार्थना और शान्तिपाठ के साथ श्रद्धांजलि सभा का विसर्जन हुआ.

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

हैदराबाद के वरिष्ठ कलमकार चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी नहीं रहे....

चंद्र मौलेश्वर प्रसाद  : 7/4/1942 - 12/9/2012


अत्यंत शोक के साथ सूचित करना पड़  रहा है कि  श्री चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी [जन्म- 7/4/1942] अब हमारे बीच नहीं रहे. वे काफी समय से अस्वस्थ थे. अभी कुछ देर पहले उनके सुपुत्र ने फोन पर 
यह दुखद समाचार दिया कि आज 12/9/2012  को रात के 10-50 बजे 
चंद्रमौलेश्वर जी का स्वर्गवास हो गया.

!!ओम् शांतिः!!

रविवार, 2 सितंबर 2012

श्रद्धांजलि : व्यंग्यकार भगवानदास जोपट नहीं रहे

हैदराबाद.
हैदराबाद के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार और पुस्तक समीक्षक भगवानदास जोपट ने कई महीने असाध्य रोग से लड़ते हुए 29 अगस्त 2012 [बुधवार] को रात्रि 10:35 बजे अंततः पार्थिव जगत से विदा ले ली. भगवानदास जोपट का जन्म 15 अगस्त 1946 को शमशेरगंज, हैदराबाद में श्री जगन्नाथ जोपट के घर में हुआ था. हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में असिस्टैंट एकाउंटेंट रहे भगवानदास जोपट ने तत्कालीन हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. विजेंद्र नारायण सिंह की प्रेरणा से अध्ययन और स्वतंत्र लेखन आरंभ किया था. वे स्वाध्याय व्यसनी थे तथा गद्य और पद्य दोनों विधाओं में व्यंग्य रचने में माहिर. कुछ वर्ष पहले विभाग से अवकाश प्राप्त करने के बाद से जोपट जी हैदराबाद की साहित्यिक संगोष्ठियों की  नियमित उपस्थिति बन् गए थे. एक संस्था के कार्यक्रम में कविता पढते तों दूसरी के आयोजन में गद्य सुनाकर तालियाँ बटोरते तथा तीसरी संस्था के मंच पर पुस्तक समीक्षा पढकर नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करते.

भगवानदास जोपट अपने पीछे अपनी धर्मपत्नी अमिता शर्मा [56 वर्ष], दो पुत्र -संजीव कुमार जोपट [36], राजीव कुमार जोपट [33] - और एक बेटी स्वाति जोपट [35] का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं.

हँसमुख, मिलनसार और सौम्य व्यक्तित्व के धनी  जोपट जी अपने अंतिम दिन तक लिख रहे थे. उनके यों असमय चले जाने से उनके परिवार के साथ साथ हैदराबाद के साहित्यिक जगत की भी अपूरणीय क्षति हुई है. उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए  हम परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि दिवंगत आत्मा को चिर शांति और शोकाकुल परिवार को उनका विछोह सहन करने की शक्ति प्रदान करे!