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सोमवार, 20 अक्टूबर 2014

नसीम बेचैन के सम्मान में अंतरंग कवि गोष्ठी संपन्न

15  अक्टूबर  2014 को डॉ. नसीम बेचैन [दिल्ली] के हैदराबाद आगमन के अवसर पर साहित्य मंथन और श्रीसाहिती प्रकाशन ने उनके सम्मान में अंतरंग कवि गोष्ठी का आयोजन किया. अध्यक्षता सुप्रसिद्ध हास्य-व्यंग्यकार-कवि वेणु गोपाल भट्टड  ने की.
इस अवसर पर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा,आंध्र की ओर से सचिव सी. एस. होसगौडर ने  तथा हैदराबाद के कवियों की ओर से वेणुगोपाल भट्टड ने शाल  ओढाकर डॉ. नसीम बेचैन का सम्मान किया. बाएँ से - सी एस होसगौडर, वेणु गोपाल भट्टड और डॉ. नसीम बेचैन.

 हैदराबाद के हिंदी कवियों की ओर से वरिष्ठ कवि वेणुगोपाल भट्टड डॉ नसीम बेचैन को सम्मानस्वरूप शाल ओधाते हुए .

डॉ. नसीम के सम्मान में आयोजित अंतरंग कवि गोष्ठी में ; बाएँ से - डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा [संयोजक], ज्योति नारायण, कोसनम नागेश्वर राव, डॉ. देवेंद्र शर्मा और गुरुदयाल अग्रवाल.

बाएँ से - गुरुदयाल अग्रवाल, सी एस होसगौडर, वेणु गोपाल भट्टड और डॉ. नसीम बेचैन.

बाएँ से -  ज्योति नारायण, कोसनम नागेश्वर राव, डॉ. देवेंद्र शर्मा और गुरुदयाल अग्रवाल.

बाएँ से - डॉ. ऋषभ देव शर्मा, वी. कृष्ण राव और भंवर लाल उपाध्याय 

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

हिंदी दिवस पर साहित्य नभ की काव्य गोष्ठी



दिल्ली, 14 सितम्बर 2014.



हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में नांगलोई क्षेत्र में साहित्य नभ संस्था की ओर से काव्य गोष्ठी का कार्यक्रम सफलता पूर्वक संपन्न हुआ.

पेश है कार्यक्रम की  कुछ झलकिया--

कार्यक्रम की अध्यक्षता सेवानिवृत प्रवक्ता यस्शवी कवि .कहानीकार पंडित हरनाम शर्मा जी ने की. मुख्य अतिथि  श्री किशोर श्रीवास्तव जी थे. 

मेरे साथी मित्र लघु कथाकार अनिल शूर आजाद जी के किसी कारणवश न आ पाने के कारण मंच सञ्चालन का कार्यभार श्री ललित कुमार मिश्र जी को सौपा गया.

मकेश जी ने अपनी कविता "सिसकता गॉव बिलखती गलियां " से लोगो का मन मोह लिया और खूब तालिय बटोरी.वहीँ राजीव जी ने छोड़ हरकत शैतानो की, बन तू इंसान रे" के माध्यम से युआ पीड़ी को दलदल से बहार रहने का सन्देश दिया.

आलोचना और समीक्षा में महरत रखने वाले संदीप तोमर (मैं) ने सामाजिक विसंगति को आधार बना कुछ क्षणिकाएं प्रस्तुत की, लधु कथा में महारथ रखने वाले संदीप तोमर ने व्यंग्य शैली कविता पाठ करके पुराने साथियों को आश्चर्य चकित किया -
इस बस्ती का जनाब 
अजीब मटियामेट है
छत टपकती कमरों की
क्या आलिशान गेट है 
मुखी मरती जनता यहाँ 
मुखिया धन्नासेठ है .........


साथ ही गजल में भी उन्होंने हाथ आजमाए------
रिश्तों के बोझ से कब दबती है जिन्दगी
मुट्ठी के रेत सी यूँ निकलती है जिन्दगी I ........
कहीं आँखों से आंसूं ही ना छलक जाये "उमंग"
बहाना ही बना दो के कुछ खटकती है जिन्दगी I

मनोज मैथिल की कविता ---- "मेरे पास शब्द नहीं हैं .... क्या तुम मुझे दोगे उधार शब्द "
धारदार हथियार कि तरह पैनापन लिए थी.

अखिलेश द्विवेदी अकेला ने "हे नाथ शक्ति दीजिये" के माध्यम से परमेश्वर का आव्हान किया जिसने अध्यक्ष महोदय का मन मोह लिया.

ललित कुमार मिश्र जी की ने सुनाया---- " गुजर जाता हूँ मैं आज भी उन गलियों से ..... जहा तेरा आना जाना था"  उनकी दूसरी कविता "आ जाओ प्रिये" में वो अन्यास ही अपनी प्रेयसी का आह्वान करते हैं .जो निश्चित ही रचना कर्म का एक अभिन्न हिस्सा है.

शशि श्रीवास्तव ने "मेरे दो मन है" काश मेरे घर में होती एक अदद बेटी " नमक रचनाये सुनाई. पहली बार उसके मुख से कविता सुनकर अच्छा लगा.

एक और कवयित्री भावना ने " आज मैं बहुत उदास हूँ " कविता के माध्यम से लोगो कि रही सही उदासी को भी दूर किया.

संजय कुमार कश्यप ने जिस प्रकार मंच संचालक के बिना आग्रह के मंच पर " माँ "और "पिता " विषय पर काव्य पाठ किया वो बेहद प्रशंशनीय था. असल में पता चला कि कवि में अगर उर्जा अहि तो बस मंच काफी है. कविता के उद्गारों के लिए समय का क्यों इंतज़ार किया जाये. उनकी कविता "चाँद कि चांदनी गर मुझे मिल जाये" भी काफी अच्छी रचना रही.

किशोर श्रीवास्तव ने दो गीत सुनाये ----
"उसकी पल पल की ख़बरों से 
रूबरू हो जाती है सारी  दुनिया "
और 
"नहीं अलगाव की हम बात किया करते है 
हम तो हर सख्स से खुल के मिला करते है"
गीत बेहद लाजबाब थे.

अध्यक्ष महोदय ने भी आधुनिक उग की  कविता सुनाकर सभी कनिष्ठ साथियों को कविता लिखने के राज़ बताये. और उनके अध्यक्षीय भाषण से सभी को प्रेरणा मिली. और उन्होंने सभी साहित्य नभ परिवार के सदस्यों को आगामी कार्यक्रमों कि रुपरेखा के लिए भी प्रेरित किया.

प्रस्तुति -संदीप तोमर , दिल्ली 

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

हैदराबाद में हिंदी पर चर्चा

अतिथि पत्रकारों के सम्मान में साहित्यिक संगोष्ठी संपन्न


हैदराबाद, 22 अगस्त 2014.

आज हिंदी को लेकर पूरे देश में काम हो रहा है। हिंदीभाषी क्षेत्रों के अलावा हिंदीतरभाषी क्षेत्रों में भी प्रमुखता से हिंदी बढ़ रही है। साहित्य की अनेक विधाओं में रचनाएं हो रही हैं। ऐसे में भाषा को लेकर लड़ाने वाले राजनीतिज्ञ सफल नहीं हो सकते हैं। उक्त बातें दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के खैरताबाद स्थित सभाकक्ष में साहित्य मंथन और श्रीसाहिती प्रकाशन के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न साहित्यिक संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने कही। उन्होंने अपने वक्तव्य में यह भी कहा कि हैदराबाद विभिन्न भाषा-भाषियों का मिलन केंद्र है, हैदराबाद में लगभग सभी भाषाओं को बोलने वाले लोग रहते हैं तथा यहाँ आने वाले किसी भी व्यक्ति को भाषायी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है।

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने कहा कि साहित्यकारों को राजनीति से दूर नहीं जाना चाहिए, बल्कि राजनीति के निकट रहकर उसे ठीक करना चाहिए। भाषा को लेकर कोई विवाद खड़ा करना ठीक नहीं है, भाषा लोगों को जोड़ने के लिए होती है तोड़ने के लिए नहीं।

नजीबाबाद उ.प्र. से आए पत्रकार अमन कुमार त्यागी ने कहा कि हैदराबाद को नजदीक से देखने का अवसर
मिला है, यह हमारे लिए बेहद खुशी की बात है कि यहाँ हिंदी बोलने वालों और समझने वालों की कमी नहीं है। हम हिंदी क्षेत्री लोगों को हैदराबाद और यहाँ के साहित्यकारों पर गर्व हो रहा है। उन्होंने आगे कहा कि सहजता से आने वाले भारत की सभी भाषाओं के शब्दों को अपना कर हिंदी को और भी व्यापक स्वीकार्यता प्रदान की जा सकती है।

आजमगढ़ से आए पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने कहा कि मिलीजुली सभ्यता विकास का मार्ग खोलती है, हमें खुले दिल से एक दूसरे को अपनाना चाहिए। बंटवारा विकास के लिए हो तो बहुत अच्छा लगता है परंतु जब यह बंटवारा कड़वाहट लिए होता है तो नुकसान दोनों पक्षों को होता है और इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ता है। हैदराबाद सुसंस्कृति वाला प्रेम का नगर है, इसका कैसे बंटवारा होगा, दो दिलों के बीच राजनीतिक कड़वाहट वाली दीवार अधिक समय तक खड़ी न रह सकेगी।

वरिष्ठ कवि और व्यंग्यकार लक्ष्मीनारायण अग्रवाल ने कहा कि भाषा के प्रति चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, वह अपना स्थान स्वयं बना लेती है, जैसे पानी अपने बहने के लिए स्वयं रास्ता बना लेता है।

वरिष्ठ अनुवादक डॉ. एम. रंगैया ने कहा कि हिंदी और भारतीय भाषाओं के मध्य बहुत सा अनुवाद कार्य हो रहा है। किसी भी साहित्य का अनुवाद होने से उसका महत्व बढ़ जाता है और अन्य भारतीय भाषाओं की रचनाओं का अनुवाद यदि हिंदी में हो जाता है तो वे रचनाएँ राष्ट्रीय फलक पर पहुँच जाती हैं। मुझे हिंदी क्षेत्र से इतना सम्मान मिला है कि मैं अपने आप को गौरवान्वित अनुभव करता हूं। जब भी किसी हिंदी विद्वान का कोई पत्र आता है तो मुझे बेहद प्रसन्नता होती है।

कार्यक्रम की संयोजिका डॉ. जी. नीरजा ने एक कविता का अनूदित पाठ प्रस्तुत करते हुए कहा कि हिंदी और द्रविड भाषाओं में बहुत से शब्द समान हैं; ऐसे शब्दों के अर्थ की समानता और भिन्नता को ध्यान से देखते हुए प्रयोग करने से हिंदी की गुणवत्ता बढ़ जाती है।

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि हिंदी सर्वग्राह्य भाषा है, इसमें यह क्षमता है कि यह सभी भाषाओं के शब्दों को सरलता के साथ ग्रहण कर लेती है और फिर यह ग्रहण किए गए शब्द इसे अपने से लगने लगते हैं। अपनी इसी विशेषता के कारण यह किसी विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती। 

वरिष्ठ अनुवादक डॉ. सी. वसंता ने ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ और ‘अर्धनारीश्वर’ के तेलुगु अनुवाद से जुड़े अपने अनुभवों के बारे में विस्तार से बताया।

इस अवसर पर जी. परमेश्वर, भँवरलाल उपाध्याय, पवित्रा अग्रवाल, आर. शांता सुंदरी, ज्योति नारायण आदि ने काव्यपाठ किया। आरंभ में अतिथि पत्रकारों का पारंपरिक रीति से स्वागत सत्कार किया गया।

गुरुवार, 13 मार्च 2014

गीतकार ईश्वर करुण के सम्मान में होली मिलन कवि गोष्ठी संपन्न




दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सम्मलेन कक्ष में संपन्न सम्मान समारोह के अवसर पर 
‘साहित्य मंथन’ और ‘श्री साहिती प्रकाशन’ की ओर से गीतकार ईश्वर करुण को 
प्रशस्ति पत्र समर्पित करते हुए 
डॉ. राधेश्याम शुक्ल, नरेंद्र राय, डॉ. ऋषभ देव शर्मा, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, 
वेणुगोपाल भट्टड और होमनिधि शर्मा. 

फागुन का मौसम आया है/ यौवन फिर से गदराया है/ 
कामदेव के कंधे चढ़कर/ बूढ़ा छोरा बौराया है   –               ईश्वर करुण

हैदराबाद, 13 मार्च (प्रेस विज्ञप्ति). 

भारतीय संस्कृति में उत्सव और उल्लास की प्रधानता है. हमारे सभी पर्व आनंदमय हैं. होली सामूहिक आनंद का सार्वजनिक पर्व है. इसके साथ यह रोचक कथा जुड़ी है कि होलिका नाम की राक्षसी को यह वरदान प्राप्त था कि वह केवल बच्चों की हँसी की आवाज से ही मर सकती थी. आग के बीच में भी हँसते खेलते अबोध बालक प्रह्लाद की हँसी की किलकारियों ने उसे मार डाला. इसी घटना को उत्सव का रूप देकर होली को हास परिहास और रंगों की बौछार के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है. 

ये विचार ‘भास्वर भारत’ के संपादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सम्मेलन कक्ष में चेन्नै से पधारे प्रमुख गीतकार ईश्वर करुण के सम्मान में ‘साहित्य मंथन’ द्वारा आयोजित होली मिलन कवि गोष्ठी के भव्य समारोह का उद्घाटन करते हुए व्यक्त किए. डॉ. शुक्ल ने आगे कहा कि साहित्य का धर्म भी होली के साथ जुड़ी पौराणिक कथा जैसा ही है. वह हँसाता और मनोरंजन तो करता ही है, समाज में व्याप्त अमंगलकारी शक्तियों का नाश भी करता है. उन्होंने अतिथि गीतकार की रचनाओं में हास्य और शृंगार के साथ लोक रक्षण की प्रवृत्ति को लक्ष्य करते हुए उन्हें एक सफल गीतकार बताया. 

समारोह की अध्यक्षता अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त हास-व्यंग्यकार वेणुगोपाल भट्टड और वरिष्ठ वैज्ञानिक, चिंतक एवं कवि डॉ. देवेंद्र शर्मा ने की. इस अवसर पर वरिष्ठ गीतकार एवं चित्रकार नरेंद्र राय, राजभाषाकर्मी होमनिधि शर्मा, कवयित्री अहिल्या मिश्र, हिंदी सेवी सी.एस.होसगौडर, एस. वेंकटेश्वर एवं कवि-समीक्षक प्रो. ऋषभ देव शर्मा विशेष अतिथि के रूप में मंचासीन हुए. ज्योति नारयण ने सरस्वती वंदना की तथा अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम आरंभ हुआ.

संयोजक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने मुख्य अतिथि का परिचय देते हुए बताया कि ईश्वर करुण चार दशक से अधिक समय से निरंतर गीतिकाव्य की समृद्धि और हिंदी कविता के मंच की गरिमा की रक्षा के कार्य में लगे हुए हैं. उन्होंने करुण के ताजा कविता संग्रह ‘चुप नहीं है ईश्वर’ पर समीक्षात्मक चर्चा भी की. इसके पश्चात ‘साहित्य मंथन’ और ‘श्री साहिती प्रकाशन’ की ओर से ईश्वर करुण का सारस्वत अभिनंदन करते हुए उन्हें व्यक्तिगत गुणों और हिंदी सेवा के लिए प्रशस्ति पत्र समर्पित किया गया. साथ ही विश्वम्भरा, हिंदी अकादमी - संकल्य, कादम्बिनी क्लब, ऑथर्स गिल्ड, स्रवंति, सांझ के साथी, आनंदऋषि साहित्य निधि, आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी और दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के प्रतिनिधियों ने मुख्य अतिथि को स्मृति चिह्न, पुष्प गुच्छ, उत्तरीय, पुस्तकें और लेखन सामग्री भेंट कर के सम्मानित किया. 

इस अवसर पर सम्मानित कवि ईश्वर करुण ने विभिन्न चक्रों में अपने दस चुनिंदा गीतों का सस्वर वाचन किया. ‘’नेह के नगर में विश्वास की धरोहर/ लुटने न पाए कभी मीत इसे देखना’’, ‘’तुमको घायल करें जब निराशा के क्षण/ आडी तिरछी लकीरों को तुम चूम लो’’, छेड़ती है फागुनी हवा/ उसको ज़रा डाँटो भाभी जी’’, अपना गुस्सा मुझे सारा दे दो प्रिये/ माँगता हूँ यही तुमसे मैं बावला/ तुम निखर जाओगी राधिका की तरह/ मैं भी बन जाऊंगा कृष्ण सा सांवला’’, ‘’फागुन का मौसम आया है/ यौवन फिर से गदराया है/ कामदेव के कंधे चढ़कर/ बूढ़ा छोरा बौराया है’’, ‘’कौन सता गहेगा अब/ ये रामजी जाने’’, ‘’एक चिट्ठी आयी है/ मुझको मेरे घर से दोस्तो’’, ‘’कोयल की पुकार पर/ मीठी मनुहार पर/ आई होली रे / मितवा आई तेरे द्वार पर’’ – जैसी काव्य पंक्तियों ने श्रोताओं को भाव विभोर और रसमग्न कर दिया. 

कवि गोष्ठी में नगर के विशिष्ट कवियों और हिंदी सेवियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया जिनमें डॉ. बी. बालाजी, डॉ. के. बी. मुल्ला, डॉ. गोरख नाथ तिवारी, डॉ. मृत्युंजय सिंह, डॉ. ए.जी.श्रीराम, संतोष काम्बले, लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, अजित गुप्ता, पवित्रा अग्रवाल , मीना मुथा, गुरु दयाल अग्रवाल , भावना पुरोहित, भँवर लाल उपाध्याय, विनीता शर्मा, सुषमा बैद, ज्योति नारायण, तेजराज जैन, बिशन लाल संघी , आशीष नैथानी सलिल, अजित गुप्ता, जी. संगीता, उमा गौरी देवी, टी. सुभाषिनी, एस.वी.एस.एन.पल्लवी, रेणु कुमारी, संतोष विजय , गहनी नाथ और एन. अप्पल नायुडु के नाम सम्मिलित हैं. 

सारस्वत सम्मान स्वीकार करते हुए ईश्वर करुण ने हैदराबाद के साहित्य जगत का आभार व्यक्त किया और कहा कि इस आत्मीय अभिनंदन से मुझे अवर्णनीय आनंद और साहित्य सृजन के लिए ऊर्जा प्राप्त हुई है. 

कवि गोष्ठी का संचालन लक्ष्मी नारायण अग्रवाल ने किया तथा कार्यक्रम संयोजक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ समारोह का समापन हुआ.

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में निराला जयंती संपन्न


हैदराबाद, 4 फरवरी, 2014.
आज यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के पीजी विभाग में आयोजित एक सादे समारोह में वसंत पंचमी और निराला जयंती का उत्सव संपन्न हुआ. आरंभ में डॉ. साहिरा बानू बी. बोरगल ने वसंत पंचमी को भारतीयों का साहित्यिक और सांस्कृतिक पर्व बताते हुए आगंतुकों का स्वागत किया. सामूहिक सरस्वती पूजा के उपरांत नीता जाजू ने निराला कृत सरस्वती वंदना ‘वर दे वीणा वादिनी’ का सस्वर गायन किया.

इस अवसर पर डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने निराला की संक्षिप्त जीवनी पर प्रकाश डालते हुए उनके संघर्ष और साहित्य के परस्पर संबंध की चर्चा की. इसके बाद वी.एन.पी. पल्लवी और अर्चना ने निराला की कविताओं का वाचन किया. साथ ही उनके उपन्यास ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ के अंशों का पाठ भी किया गया. डॉ. बलविंदर कौर ने डॉ. रामविलास शर्मा लिखित ‘निराला की साहित्य साधना’ के भावपूर्ण अंश प्रस्तुत किए तो के. अनिल कुमार ने अमृतलाल नागर कृत ‘टुकड़े टुकड़े दास्तान’ से निराला संबंधी संस्मरण पढ़कर सुनाया. 

उत्सव का संचालन करते हुए डॉ. मृत्युंजय सिंह ने वसंत पंचमी और होली से संबंधित विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों के महत्व पर अपने विचार रखे तथा निराला को विलक्षण काव्यप्रतिभा वाला संस्कृतिचेता कवि बताया. अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने वसंत पंचमी को मनुष्य जाति की आदि-सृजनेच्छा का प्रतीक और निराला को आधुनिक हिंदी कविता में इस सृष्टि कामना का सर्वाधिक उत्फुल्ल प्रतिनिधि कवि बताया. आलोक राज सक्सेना के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ.

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

अमेरिकी शायर अशरफ गिल की उर्दू गज़लों का हिंदी अवतार लोकार्पित

'शब्द सुगंध' के तत्वावधान में आज यहाँ राजस्थानी स्नातक संघ के प्रेक्षागार में अमेरिका से पधारे पाकिस्तान मूल के वरिष्ठ साहित्यकार अशरफ़ गिल की उर्दू गज़लों के हिंदी रूपांतर का लोकार्पण प्रो. ऋषभ देव शर्मा के हाथों संपन्न हुआ. आरंभ में रऊफ़ खैर ने कवि का परिचय दिया तथा डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने लोकार्पित कृति की समीक्षा की. इस अवसर पर अशरफ़ गिल ने अपनी विशिष्ट गज़लों का सस्वर एवं संगीतबद्ध वाचन एवं गायन किया. पुस्तक के संपादक एवं अनुवादक एफ.एम. सलीम ने संचालन किया. 

लोकार्पण के अवसर पुस्तक के संबंध में दिया गया डॉ.गुर्रमकोंडा नीरजा का वक्तव्य अविकल रूप में यहाँ दिया जा रहा है. 

'सुलगती सोचों से ...' का द्रुतपाठ

आदरणीय अध्यक्ष महोदय, आज के मेहमान शायर आदरणीय श्री अशरफ गिल, परम स्नेही भाई श्री सलीम जी और सभी साहित्य प्रेमी, देवियो और सज्जनो 

आज की शाम सचमुच सुहानी शाम है क्योंकि आज हमारे बीच ग़ज़ल की दुनिया के अत्यंत प्रतिष्ठित विश्व प्रसिद्ध कवि अशरफ गिल (जन्म 1940, गुजराँवाला,) उपस्थित हैं. छोटा हिंदुस्तान समझे जाने वाले हैदराबाद शहर में आपका आना इस शहर की साहित्यिक बिरादरी के लिए अत्यंत हर्ष का विषय है. मैं अपनी ओर से तथा अपनी संस्था दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की ओर से आपका स्वागत और अभिनंदन करती हूँ. 

अभी पिछले हफ़्ते मुझे जनाब अशरफ गिल साहब की ग़ज़लों का हिंदी रूपांतर प्राप्त हुआ. इसका शीर्षक है ‘सुलगती सोचों से’ (2013). बेहद खूबसूरत और टिकाऊ गेटअप सेटअप वाली इस पुस्तक में गिल साहब की 105 ग़ज़लें शामिल हैं. इस संकलन को हिंदी में लाने का श्रेय जिन दो लोगों को है वे हैं श्री रऊफ खैर और श्री एफ. एम. सलीम. गज़लों का संकलन तरतीब और तर्जुमा एफ.एम. सलीम ने बड़ी मेहनत के साथ तैयार किया है. इसके लिए हिंदी और उर्दू दोनों ही हलकों के साहित्य प्रेमियों को उनके प्रति आभारी होना चाहिए. उर्दू साहित्य के हिंदी में रूपान्तरण और देवनागरी में लिप्यंतरण का काम मेरी नज़र में तो बड़े राष्ट्रीय महत्व का काम है. इससे दो भाषाओं के बीच की आपसी समझ तो बढ़ती ही है, दो भाषा समाजों – speech communities – के बीच आपसदारी भी बढ़ती है. इसलिए मैं भाई श्री एफ.एम. सलीम को उनके इस कार्य के लिए सच्चे हृदय से बधाई देती हूँ. 

‘सुलगती सोचों से’ के आरंभ में संक्षेप में इस पुस्तक की दो भूमिकाएँ दी गई हैं जिनसे यह पता चलता है कि – 
  • वयोवृद्ध कवि अशरफ गिल ऊर्जा और जिंदादिली से भरपूर शायर हैं. 
  • उन्हें कविता के साथ साथ संगीत और गायकी पर भी अधिकार प्राप्त है. 
  • उनकी ग़ज़लों में कई भाषाओं की मिठास समाई हुई है. 
  • वे मुख्यतः रोमान के कवि हैं 
  • लेकिन उनकी सामाजिक चेतना भी अत्यंत स्पष्ट है. 
  • वे परंपरा का निर्वाह करने के साथ साथ अपनी ग़ज़लों में नए प्रयोग भी करते रहते हैं. 
  • उनकी शायरी की विषयवस्तु प्रेम, विश्वबंधुत्व, सामाजिक यथार्थ, राजनैतिक पाखंड से लेकर आध्यात्मिक संकेतों तक व्याप्त है. 

मैं यहाँ बताना जरूरी समझती हूँ कि मैं उच्च उर्दू (High Urdu) से लगभग अपरिचित हूँ. बातचीत में या साधारण हिंदी में जितनी उर्दू (या हिंदुस्तानी) समायी हुई है, बस उतनी तक की मेरी पहुँच है. इसलिए मैं अपनी बात ‘सुलगती सोचों से’ शीर्षक ग़ज़ल संग्रह के उतने हिस्से तक ही सीमित रखूँगी जितना आम भाषा में मेरी समझ में आता है.

हम शैलीविज्ञान यानि stylistics में आमतौर पर किसी लेखक की रचनाओं में बार बार आने वाले विषयों और शब्दों की बारंबारता (frequency) खोजा करते हैं. इस दृष्टि से अशरफ गिल की ग़ज़लों में इश्क, मुहब्बत, आंसूं, अश्क, याद, आइना, गलतफहमी, दोस्ती, दुश्मनी, हादसा और माँ जैसे अनेक बीज शब्द (key words) प्राप्त होते हैं जिन्हें उन्होंने बार बार दुहराया है, frequently repeat किया है. 

कवि की श्रेष्ठता का आधर यह है कि वे इन शब्दों को जितनी बार प्रयोग करते हैं हर बार उन्हें नए अंदाज के साथ नई ध्वनि और नए अर्थ में प्रयोग करते हैं. 

समय सीमित है इसलिए व्याख्या और विस्तार की गुंजाइश नहीं है. बस कुछ नमूने देखते चलें – 

आइना कई तरह इन ग़ज़लों में प्रकट हुआ है. जैसे – 

  • एक जगह शायर ने कहा है कि ‘कभी हाथों में नादानों के आइने नहीं देते’ क्योंकि ज़रा सी असावधानी होते ही उनके टूटने का ख़तरा रहता है. 
  • अन्यत्र वे अपने प्रिय को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हम तुम्हारे अत्यंत समीप रहते हुए भी उन आइनों की तरह हैं जो तुम्हारे दर्शन को तरसते हैं. ‘अगरचे पास तेरे, इर्द गिर्द बसते हैं/ हम आइने हैं, तेरी दीद को तरसते हैं’ 
  • कहना न होगा कि पहले कथन में जहाँ दृष्टांत और सूक्ति का सौंदर्य है वहीं इस दूसरे कथन में विरोधाभास का कमाल है. बात यहीं नहीं थमती कभी ऐसा भी होता है कि प्रिय को अपना स्वरूप निहारने के लिए प्रेमी की आँखों से उजला आइना कहीं और नहीं मिलता – ‘अपनी सूरत वह देखने के लिए/ मेरी आँखों का आइना माँगे.’
  • कभी जब कवि को दार्शनिक लहजे में बात करनी होती है तब भी दिल के आइने में झाँकने का निर्देश देते हैं. यह आइना बड़ा ईमानदार है. झूठ नहीं बोलता. आपको भी अपना चेहरा दिखा देगा. दूसरों से गिला करने से पहले बस एक बार इस आइने में झाँकिए तो सही – ‘अपने अंदर ही तुम्हारे, आइना मौजूद है.’ 
ये चारों उदाहरण यह बताने के लिए काफी है कि अशरफ गिल शब्दों को दुहराते हैं पर उनके संकेतार्थ (signified meaning) हर बार नए होते हैं. इसे हम यूँ भी कह सकते हैं कि वे अपने कथन को ताज़गी से भरने की कलाकारी जानने वाले जादूगर हैं. 

विस्तार से फिर कभी बात होगी. आज बस इतना ही. धन्यवाद. 
- गुर्रमकोंडा नीरजा 

सोमवार, 12 नवंबर 2012

डॉ. अशोक भाटिया का काव्यपाठ और कथाकथन संपन्न

हैदराबाद, 12 नवंबर 2012.
नवोदित सांस्कृतिक-साहित्यिक पत्रिका ''भास्वर भारत'' के तत्वावधान में यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के खैरताबाद स्थित सम्मलेन कक्ष में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पधारे साहित्यकार डॉ. अशोक भाटिया का सारस्वत सम्मान किया गया.  कार्यक्रम की अध्यक्षता अंग्रेज़ी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. एम. वेंकटेश्वर  ने की  तथा संचालन 'स्रवंति'  की  सहसंपादक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने किया.

आयोजन का विशेष आकर्षण था 'कथाकथन', जिसके अंतर्गत  अतिथि रचनाकार अशोक भाटिया ने अपनी 'भीतर का सच', 'तीसरा चित्र ', 'रिश्ते', 'रंग', 'पीढ़ी दर पीढ़ी' और 'श्राद्ध' जैसी लघुकथाओं का भावपूर्ण वाचन किया. साथ ही उन्होंने अपनी कुछ कविताएँ भी प्रस्तुत कीं.चर्चा में उनकी रचना  'ज़िंदगी की कविता' के इस अंश को खूब सराहा गया - ''कविता/ घरैतिन के हाथों से होकर/ तवे पर पहुंचती है/ तो बनती है रोटी/ xxx / जहाँ कहीं भी कविता है/ वहाँ जीवन का/ जिंदा इतिहास रचा जा रहा है.''  पठित लघुकथाओं पर डॉ. एम. वेंकटेश्वर, डॉ. राधेश्याम शुक्ल,  लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, आशीष नैथानी, पवित्रा अग्रवाल, वेत्सा पांडुरंगा राव, संपत देवी मुरारका, ऋतेश सिंह, अशोक तिवारी, डॉ. सीमा मिश्र, वी. कृष्णा राव और नागेश्वर राव ने समीक्षात्मक टिप्पणियाँ कीं.

आरंभ में आर.राजाराव ने मंगलाचरण किया तथा आगंतुकों के परस्पर परिचय और स्वागत-सत्कार की जिम्मेदारी समारोह के संयोजक प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने निभाई.


चित्र परिचय :
'भास्वर भारत' द्वारा आयोजित 'कथाकथन' कार्यक्रम के अवसर पर लिया गया समूह चित्र. बाएँ से - डॉ. सीमा मिश्र, अशोक तिवारी, वेत्सा पांडुरंगा राव, आर.राजाराव, प्रो. ऋषभ देव शर्मा, आशीष नैथानी, डॉ. राधे श्याम शुक्ल, डॉ. अशोक भाटिया, डॉ. एम. वेंकटेश्वर, के. नागेश्वर, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, संपत देवी मुरारका, पवित्रा अग्रवाल, लक्ष्मी नारायण अग्रवाल एवं वी. कृष्णा  राव.

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