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शनिवार, 30 मई 2026

विशेष आलेख : हिंदी पत्रकारिता दिवस द्विशताब्दी

अमरतल्ला की अंधेरी गली में ‘समाचार-सूर्य’ की खोज

- प्रो. गोपाल शर्मा


आज बृहस्पतिवार है—गुरुवार। देवताओं का दिन, ज्ञान का दिन, और लोकतंत्र में—वोट का दिन। संयोग देखिए, बंगाल में आज मतदान था और मैं, जो अपने मताधिकार का ऋणी नागरिक हूँ, उस पवित्र कर्म से कोसों दूर, अपनी ही एक अप्रकाशित पुस्तक की धूल झाड़ने निकला था। यह भी एक व्यंग्य ही है—देश वोट दे रहा हो और वह अपने पात्रों से मिलने निकल पड़े!

मैं गोहाटी पहुँचा था, अपने कथानायक से मिलने—सोचा था, वह मुझे गले लगाएगा, दो-चार गंभीर वाक्य कहेगा, और मेरी पांडुलिपि को पुनर्जीवित कर देगा। परंतु वह तो BBC के संवाददाता को पेड़ा खिलाने में व्यस्त था—जैसे इतिहास नहीं, मिठाई बन रहा हो! मैंने समझ लिया—यहाँ मेरी दाल नहीं गलने वाली। सो, लेखक की आत्मा और जेब दोनों को समेटते हुए, मैं दुम दबाकर कलकत्ता—माफ़ कीजिए, Kolkata—आ पहुँचा।

और फिर, जैसे किसी भूली-बिसरी स्मृति की खोज में भटकता हुआ पुराना प्रेमी, मैं जा पहुँचा—छत्तीस, चौरंगी लेन। नहीं, सच तो यह है कि मैं निकला था एक और तीर्थ की खोज में—हिंदी पत्रकारिता के आद्य सूर्य, उदंत मार्तंड के उद्गम स्थल की तलाश में। और उसके साथ जुड़े उस भूले-बिसरे नाम की खोज में—पंडित जुगल किशोर शुक्ल।

अमरतल्ला लेन… नाम में ही एक अमरत्व का वादा था, पर गली में प्रवेश करते ही लगा—यहाँ तो स्मृतियाँ भी जर्जर होकर गिरने की प्रतीक्षा में हैं। एक टूटा-फूटा मकान—जैसे इतिहास का कंकाल खड़ा हो, और उसके भीतर अंधेरा—इतना गहरा कि उसमें अतीत की आवाज़ भी रास्ता भूल जाए। मैंने सोचा—क्या यही वह स्थान होगा जहाँ कभी छपाई की मशीनें खटर-पटर करती होंगी? जहाँ शब्द जन्म लेते होंगे, जैसे सूर्योदय होता है?

गली में बहुमंजिला इमारतें हैं—नई उम्र की, पर स्मृति-विहीन। एक पुराना अहाता दिखा—दो सौ वर्षों का साक्षी, पर मौन। जैसे उसने सब देखा हो, पर अब बोलने से इंकार कर दिया हो। गली के मोड़ से 26 नंबर का भवन दिखता है—पर वहाँ भी शुक्ल जी का कोई नामोनिशान नहीं। चारों ओर गहमा-गहमी है—व्यापार, लेन-देन, सौदेबाज़ी—पर इतिहास? वह तो जैसे यहाँ से बेदखल कर दिया गया है।

कुछ मारवाड़ी, कुछ जैन व्यापारी दिखे—व्यस्त, जैसे समय को भी मुनाफे में बदल देना चाहते हों। गली के बाहर एक भव्य मस्जिद खड़ी है—समय की तरह स्थिर, और भीतर गली में समय जैसे बिखरा हुआ। एक पोस्टर दिखा—“भरत राम तिवारी को वोट देकर सफल बनाइए।” उसके ठीक नीचे एक सरकारी नल—सरकारी वादों की तरह—अनवरत बहता हुआ। पानी भी जैसे कह रहा हो—“मुझे रोकोगे नहीं, तो मैं बहता रहूँगा; जैसे स्मृतियाँ, जिन्हें कोई रोकने वाला नहीं।” और तभी मन में एक तीखा विचार कौंधा—जिस तरह “उदंत मार्तंड” बंद हो गया, वैसे ही उसके संपादक की स्मृति भी यहाँ से लुप्त हो गई है। बच्चे इन जर्जर इमारतों के नीचे क्रिकेट खेल रहे हैं—इतिहास की नींव पर वर्तमान की पिच। उन्हें क्या पता, इसी जमीन पर कभी शब्दों की गेंदें उछली होंगी!

मैंने लोगों से पूछा—“भाई, यहाँ कहीं पंडित जुगल किशोर शुक्ल का घर…?” वे मुझे ऐसे देखने लगे, जैसे मैंने किसी प्राचीन ग्रह का पता पूछ लिया हो। किसी को कुछ पता नहीं। व्यापार के इस केंद्र में ‘शुक्ल’ नाम का कोई खाता नहीं खुला—और शायद यही सबसे बड़ा व्यंग्य है।

सोचता हूँ—यह गली तब कितनी अंधेरी रही होगी, जब उदंत मार्तंड का जन्म हुआ था। तब भी प्रकाश कम था, पर भीतर एक सूरज उग रहा था। आज रोशनी बहुत है, पर सूरज कहीं खो गया है।

पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने जब “उदंत मार्तंड” निकाला, तो वह केवल एक अखबार नहीं था—वह एक घोषणा थी कि हिंदी भी बोलेगी, लिखेगी, और सुनी जाएगी। उन्होंने लिखा था—हिंदुस्तानियों के लिए, उनकी भाषा में समाचार का कागज—क्योंकि पराई भाषा में सुख भी पराया लगता है। कितना सरल, कितना गहरा सत्य! अज्ञान तथा रूढ़ियों के अँधेरों में जकड़े हुए हिन्दुस्तानी लोगों की प्रतिभाओं पर प्रकाश डालने और 'उदंत मार्तण्ड' द्वारा ज्ञान के प्रकाशनार्थ' इस पत्र का श्री गणेश हुआ था। और, 'हिन्दुस्तान और नेपाल आदि देशों के लोगों, महाजनों तथा इंगलैंड के साहबों के बीच वितरित हुआ । इस समाचार पत्र में विभिन्न नगरों के सरकारी क्षेत्रों की विभिन्न गतिविधियाँ प्रकाशित होती थीं और उस वक्त की वैज्ञानिक खोजों तथा आधुनिक जानकारियों को भी महत्त्व दिया जाता था। इसके उद्देश्य के सम्बन्ध में बांग्ला साप्ताहिक ‘समाचार चंद्रिका' ने लिखा था कि 'नासमझी तथा रूढ़ियों के अँधेरों में जकड़े हुए हिन्दुस्तानी लोगों की प्रतिभाओं पर प्रकाश डालने और 'उदंत मार्त्तण्ड' द्वारा ज्ञान के प्रकाशनार्थ' इस पत्र का श्री गणेश हुआ था। और, 'हिन्दुस्तान और नेपाल आदि देशों के लोगों, महाजनों तथा इंगलैंड के साहबों के बीच वितरित हुआ और हो रहा है।' लगता है, खरीद कर पढ़ने वालों की संख्या उस समय (भी) कम रही होगी। इसलिए ग्राहकों की (पाठकों की नहीं) संख्या कम होने के कारण आज की लघु पत्र-पत्रिकाओं की तरह ही इसको भी दम तोड़ना पड़ा होगा। शायद यह कुछ वक्त तक और बची रहती अगर मिशन के काम में मिशनरियों का हाथ बँटाने लगती। तब इस पत्रिका को डाक महसूल में छूट मिलती। पर पहले के संपादक ठहरे ‘मिशनरी’। अब भुगतो!

इस पत्र की प्रारंभिक विज्ञप्ति इस प्रकार थी -यह "उदन्त मार्तण्ड" अब पहले-पहल हिंदुस्तानियों के हित के हेतु जो आज तक किसी ने नहीं चलाया पर अंग्रेजी ओ पारसी ओ बंगाल में जो समाचार का कागज छपता है उनका सुख उन बोलियों के जानने और पढ़ने वालों को ही होता है। और सब लोग पराए सुख से सुखी होते हैं। जैसे पराए धन धनी होना और अपनी रहते परायी आंख देखना वैसे ही जिस गुण में जिसकी पैठ न हो उसको उसके रस का मिलना कठिन ही है और हिंदुस्तानियों में बहुतेरे ऐसे हैं। इससे सत्य समाचार हिंदुस्तानी लोग देख आप पढ़ ओ समझ लेयँ ओ पराई अपेक्षा न करें ओ अपने भाषे की उपज न छोड़े। इसलिए दयावान करुणा और गुणनि के निधान सब के कल्यान के विषय गवरनर जेनेरेल बहादुर की आयस से ऐसे साहस में चित्त लगाय के एक प्रकार से यह नया ठाट ठाटा...

***

पहले तो आप इनके पत्र की प्रकृति और प्रवृत्ति उनके ही शब्दों में सुनें ;

'दिनकर कर प्रगटत दिनहि यह प्रकाश अठयाम
ऐसो रवि अब उग्यो नहि, जेहि-जेहि सुख को धाम ।
उत कमलनि विकसित करत बढ़त चाव चितवाम,
लेत नाम या पत्र का, होत हर्ष अरु काम ।

और उनका व्यंग्य—अरे, वह तो आज भी ताज़ा है। वह बूढ़ा वकील, जो मुकदमे को अपनी पीढ़ियों की जीविका बना चुका था, और दामाद ने उसे जल्दी निपटा दिया—वकील को दुख हुआ! जैसे आज भी कुछ लोग समस्याओं के समाधान से अधिक, उनके बने रहने में ही अपना लाभ देखते हैं। मुलाहिजा फरमाइए;

‘एक यशी वकील अदालत का काम करते-करते बुड्ढा होकर अपने दामाद को वह सौंप के आप सुचित हुआ। दामाद कई दिन वह काम करके एक दिन आया ओ प्रसन्न होकर बोला हे महाराज आपने जो फलाने का पुराना ओ संगीन मोकद्दमा हमें सौंपा था सो आज फैसला हुआ यह सुनकर वकील पछता करके बोला कि तुमने सत्यानाश किया। उस मोकद्दमे से हमारे बाप बड़े थे तिस पीछे हमारे बाप मरती समय हमें हाथ उठा के दे गए ओ हमने भी उसको बना रखा ओ अब तक भली-भांति अपना दिन काटा ओ वही मोकद्दमा तुमको सौंप करके समझा था कि तुम भी अपने बेटे पाते तक पालोगे पर तुम थोड़े से दिनों में उसको खो बैठे।“

परंतु इतिहास का यह सूर्य अधिक दिनों तक नहीं चमक सका। यह साप्ताहिक पत्र पुस्तकाकार (12x8) छपता था और हर मंगलवार को निकलता था। इसके कुल 79 अंक ही प्रकाशित हो पाए थे कि इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा। 19 दिसंबर 1827—वह दिन, जब “उदंत मार्तंड” अस्त हो गया। अंतिम पंक्तियाँ—“ आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तण्ड उदन्त अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अन्त।यह केवल एक पत्र का अंत नहीं था, यह एक स्वप्न का विराम था। सरकारी सहायता नहीं मिली, पाठकों का सहयोग नहीं मिला—और सूरज डूब गया- मिति पौष बदी १ भौम संवत् १८८४ तारीख दिसम्बर सन् १८२७। उन्होंने अपने संपादकीय के अन्त में ग्राहकों एवं पाठकों से निवेदन किया था कि "हमारे कुछ कहे-सुने का मन में न लाइयो जो दैव और भूधर मेरी अन्तरव्यथा और गुण को विचार सुधि करेंगे तो मेरे ही हैं। शुभमिति ।"

पर क्या सचमुच डूब गया?

मैं उस गली में खड़ा था—टूटी दीवारों, बहते नलों, और खेलते बच्चों के बीच—और मुझे लगा, “उदंत मार्तंड” कहीं न कहीं अब भी उग रहा है। हर उस शब्द में, जो अपनी भाषा में लिखा जाता है। हर उस लेखक में, जो उपेक्षा के बावजूद लिखता है।

पर एक पीड़ा भी है—क्योंकि उस गली में, उस इतिहास का कोई नामोनिशान नहीं। जैसे जयशंकर प्रसाद की ‘ममता’ कहानी का वह वाक्य—राजाओं के नाम तो अमर हो जाते हैं, पर ममता कहीं खो जाती है।

“सातों देश के नरेश हुमायूँ ने एक दिन यहाँ विश्राम किया था। उनके पुत्र अकबर ने उनकी स्मृति में यह गगनचुंबी मन्दिर बनाया।" पर उसमें ममता का कहीं नाम नहीं था।

शायद अगली सरकार आए, तो इस गली का नाम बदल दे। शायद यहाँ पंडित जुगल किशोर शुक्ल की एक प्रतिमा लग जाए। शायद…

पर तब तक, यह गली यूँ ही रहेगी—अंधेरी, जर्जर, और स्मृतिहीन।

और मैं—एक लेखक—इस स्मृति को अपने शब्दों में सँजोकर लौट जाऊँगा, जैसे कोई पुराना यात्री, अपनी झोली में इतिहास की धूल भरकर ले जाता है… ताकि कहीं तो वह चमके।

हाँ, एक बात ओर है जो मैं इन पंक्तियों के पाठकों से कहना चाहूँगा। यदि उन्हें यह मौका दिया जाए कि वे हिंदी के इन संपादक महोदय पर कुछ लिख बोल सकें तो लिखना कि आचार्य शुक्ल जी ने अपने इतिहास में इन्हें ‘पं जुगल किशोर’ लिखा है और सच में तो ये ‘शुक्ल’ नहीं बकौल डॉ लक्ष्मी शंकर व्यास के ‘सुकुल’ थे।

जमाना मेरी दादी के जमाने से नाजुक ही चल रहा है, और मेरे मरहूम चचा मरने से पहले कहा करते थे कि भतीजे नाम में क्या रखा है, आज के जमाने में तो इनका नाम ‘जुगल किसोर’ ही काफी है। 200 साल, अरे बाप रे! 000

- प्रो. गोपाल शर्मा, अरवा मींच यूनिवर्सिटी, इथियोपिया

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

(डॉ. रक्षा मेहता का आलेख) विसंगति और विडंबना के विलक्षण चितेरे - श्रीलाल शुक्ल



जन्मशती पर विशेष आलेख :
विसंगति और विडंबना के विलक्षण चितेरे 
श्रीलाल शुक्ल

'श्रीलाल शुक्ल' और' व्यंग्य' मानो एक-दूसरे के पर्याय हों। जिस प्रकार सुगंध बिना पुष्प व्यर्थ है, चमक बिना मोती व्यर्थ है, चाँदनी बिना चाँद व्यर्थ है, ठीक उसी प्रकार 'श्रीलाल शुक्ल' के बिना साहित्य संसार में व्यंग्य व्यर्थ है, अस्तित्वहीन है, निरर्थक है, बेमानी है। कोई भी साहित्य-प्रेमी 'शुक्लजी' की रचनाओं के बिना व्यंग्य की कल्पना भी नहीं कर सकता।

31 दिसंबर, 1925 को जन्मे श्रीलाल शुक्ल समकालीन कथा साहित्य में सशक्त, सटीक व अत्यंत प्रभावशाली व्यंग्य लेखन के लिए सुविख्यात साहित्यकार हैं। ‘विसंगति' तथा ‘विडंबना' प्रत्येक साहित्यकार, कला-मर्मज्ञ‍ तथा दार्शनिक को विचलित करती हैं तथा प्रत्येक काल में अनेकानेक बुद्धिजीवियों ने राजनीति, समाज तथा धर्म में व्याप्त विसंगतियों तथा विडंबनाओं के प्रति अपने-अपने ढंग से चिंता जताई है और क्रोध व आक्रोश व्यक्त किया है, किंतु विसंगति तथा विडंबना को देखने, समझने तथा अनुभूत करने का 'शुक्ल' जी का अंदाज़ सभी से विलक्षण है। यही कारण है कि हम सब उन्हें 'विसंगति और विडंबना के विलक्षण चितेरे' मानते हैं।

'शुक्ल' जी का नाम आते ही मनस पटल पर सबसे पहले जो रचना अपने रंग बिखेर देती है, वह है - राग दरबारी। शायद ही ऐसा कोई साहित्य-प्रेमी होगा, जिसने 'राग दरबारी' न सुना-पढ़ा हो। इस उपन्यास का नाम लेते ही हम सब ‘शिवपालगंज’ पहुँच जाते हैं। जहाँ भ्रष्टाचार रूपी राक्षस न केवल मनुष्य को दबोचे बैठा है अपितु समस्त राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक व आर्थिक व्यवस्था के साथ-साथ समूचे शिक्षा-तंत्र को निगलने के लिए तैयार है। दुनियाभर की गंदगी तथा धूल-धक्कड़ से पटे पड़े शिवपाल गंज की मिठाइयों का वर्णन अत्यंत व्यंग्यात्मक ढंग से करते हुए शुक्ल जी लिखते हैं-

"वे हमारे देसी कारीगरों के हस्तकौशल और उनकी वैज्ञानिक दक्षता का सबूत देती थीं। वे बताती थीं, कि हमें एक अच्छा रेज़र-ब्लेड बनाने का नुस्खा भले ही न मालूम हो, पर कूड़े को स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों में बदल देने की तरकीब सारी दुनिया में अकेले हमीं को आती है।"

ऐसा करारा व्यंग्य, जो पाठक को जहाँ एक ओर गुदगुदा देता है, वहीं दूसरी ओर यह सोचने पर भी बाध्य करता है कि हमारे देश के पिछड़े गाँव, जो मिठाइयों के नाम पर ज़हर खा कर अपनी खुशियाँ मना रहे हैं, उन्हें स्वस्थ जीवन जीने का अधिकार आखिर कैसे प्राप्त होगा? प्रशासन की विडंबना का पर्दाफ़ाश करने के लिए शुक्ल जी का केवल एक वाक्य ही पर्याप्त है-

"स्टेशन वैगन से एक अफ़सरनुमा चपरासी और चपरासीनुमा अफ़सर उतरे।"

व्यंग्यात्मकता का यह चरमोत्कर्ष हम सबको अवाक् कर देता है।

समूची शिक्षा प्रणाली की दुर्गति की अभिव्यक्ति केवल इस एक वाक्य में सहज ही हो जाती है-

"वर्तमान शिक्षा पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है, जिसे कोई भी लात मार सकता है।"

आम जनता का नेतृत्व करने वाले नेता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सभी को एक दृष्टि से देखे। 'राग दरबारी' के रुप्पन बाबू भी सभी को एक निगाह से देखते थे। थाने में दारोगा और हवालात में बैठा हुआ चोर,  दोनों उनकी निगाह में एक थे। उसी तरह इम्तहान में नकल करने वाला विद्यार्थी और कॉलेज के प्रिंसीपल उनकी निगाह में एक थे।

राजनीति तथा समाज में व्याप्त ऐसी विसंगति, विडंबना तथा कुरूपता को इतने विलक्षण अंदाज में प्रस्तुत करने का कौशल 'शुक्ल जी' के अलावा भला और किस व्यंग्यकार में हो सकता है? राजनीतिक तथा सामाजिक व्यवस्था पर तीखा व करारा व्यंग्य करता हुआ उनका उपन्यास ‘बिस्रामपुर  का संत’, मानवीय विसंगतियों, कुंठाओं व चरमराती सामाजिक व्यवस्था पर आधारित उपन्यास 'आदमी का ज़हर', शहरी जीवन के प्रति ललक, संघर्ष तथा मानवीय मूल्यों की गिरावट पर आधारित उपन्यास 'मकान', सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन के अंतर्द्वंद्व पर आधारित उपन्यास 'अज्ञातवास' शुक्ल की बेजोड़ साहित्यिक कृतियाँ हैं।

उनकी कुछ सुप्रसिद्ध कहानियाँ हैं- इस उम्र में, इतिहास का अंत, अपनी पहचान, चंद अखबारी घटनाएँ, तथा एक चोर की कहानी। 'एक चोर की कहानी’ बाल कहानी है और उसमें भी समाज व प्रशासन की विसंगतियों  तथा विडंबनाओं को इतनी विलक्षणता से चित्रित किया गया है कि इस कहानी को पढ़कर एक छोटा, किंतु संवेदनशील बालक भी देश की व्यवस्था की कमियों को बड़ी सरलता व गहराई से समझ सकता है। एक बेचारा गूँगा चोर जो केवल थोड़े से चने और एक पीतल का लोटा गठरी में बाँधे गन्ने के खेतों में छिप रहा था, गाँव वालों द्वारा पकड़े जाने पर पुलिस के हवाले कर दिया जाता है, जो पहले ही छह महीने की जेल काट चुका था और अब एक साल के लिए अंदर कर दिया जाता है। वह ऐसे निरीह व कमज़ोर वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जो अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। जिस देश में बड़े-बड़े पदों पर आसीन प्रशासक, जनता की खून-पसीने की कमाई, दूसरों के अधिकार का पैसा और भोली-भाली जनता के स्वप्नों तक को निगल जाते हैं और डकार तक नहीं लेते, उस देश का गरीब यदि अपने भूखे-तड़पते पेट के लिए रोटी का एक निवाला भी उठा ले तो उसे 'चोर’ की उपाधि से नवाज़ा जाता है। यह है घोर अन्याय के पालने में झूलता हमारा प्रजातंत्र, जिसे एक ओर से विसंगति धकेल रही है, तो दूसरी ओर से विडंबना। स्थिरता के कोई आसार नज़र नहीं आते और दिशाहीनता की इसी नब्ज़ को अपनी रचनाओं में बखूबी पकड़ा है, श्रीलाल शुक्ल ने ।

उपन्यासों तथा कहानियों के अतिरिक्त शुक्लजी के अनेक निबंध-संग्रह भी हैं, जैसे- सामाजिक व राजनीतिक विडंबनाओं पर आधारित ‘अंगद का पाँव', समकालीन समाज पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ करता निबंध-संग्रह 'कुछ ज़मीन पर, कुछ हवा में', मीडिया तथा समाचारों की अतिशयोक्ति व झूठ में लिपटी दुनिया पर आधारित 'ख़बरों की जुगाली' आदि।

'अंगद का पाँव’ रचना का शीर्षक तक अत्यंत सशक्त, सार्थक व सटीक है। इसमें रेल के इंजन की सीटी कई बार बजती है, लेकिन रेल टस से मस नहीं होती। मित्र को स्टेशन पर छोड़ने आए परिजन इधर-उधर बुकस्टाल्स  पर बिकते अखबार पलटने लगते हैं, नाना विषयों पर बातचीत करते हैं, भारतीय संस्कृति पर व्यंग्य तक कस डालते हैं; किंतु, रेलगाड़ी 'अंगद के पाँव' की तरह वहीं डटी रहती है, न उसे समय रूपी मेघनाद हिला पाता है और न ही जनता रूपी रावण-सेना। क्योंकि हमारा प्रशासन ऐसे 'अंगद' को जन्म देता है, जिसका पाँव हिला पाना किसी के बस की बात नहीं। रवींद्र कालिया, जिन्हें श्रीलाल शुक्ल का सान्निध्य प्राप्त हुआ, के अनुसार शुक्ल जी में मुक्त कंठ से प्रशंसा करने की जितनी उदारता थी, उससे कहीं अधिक फटकारने की भी। यही कारण है कि प्रशासन तंत्र का हिस्सा होने के बावजूद वे कभी भी प्रशासन का कच्चा चिट्ठा खोलने से नहीं चूके। उनके व्यंग्य ने भ्रष्टाचारी व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ा दीं। 

श्रीलाल शुक्ल का नाम हिंदी के शीर्षस्थ व्यंग्यकारों की श्रेणी में है। वे अपनी तरह के अनूठे व्यंग्यकार हैं, जिनका पूरे हिंदी-साहित्य में कोई सानी नहीं। उनकी रचनाएँ जहाँ एक ओर हमें बार-बार उन्हें पढ़ते रहने के लिए बाध्य करती हैं, वहीं दूसरी ओर समाज तथा व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों व विडंबनाओं के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित भी करती हैं। कालजयी कृतियों के रचनाकार ‘श्रीलाल शुक्ल’ को कोटि-कोटि नमन। 

- डॉ. रक्षा मेहता
हिंदी विभागाध्यक्षा, 
आर्मी पब्लिक स्कूल, गोलकोंडा, हैदराबाद 


रविवार, 12 नवंबर 2023

शोध में नवाचारी प्रवृत्तियाँ और भारत : [देवराज]


शोध, अनुसंधान, अन्वेषण, गवेषणा, खोज आदि शब्द ‘शुद्धि’, ‘परीक्षा’, ‘तलाश’, ‘कोशिश’ आदि अर्थों के द्योतक हैं। लैटिन भाषा से प्रेरणा लेकर अंग्रेजी भाषा में निर्मित शब्द ‘Research’ और फ्रांसीसी भाषा का शब्द ‘Recherche’ भी मूल रूप से ‘खोज’ और ‘देखना’ अर्थ प्रदान करते हैं, लेकिन उनके साथ ‘Re’ प्रत्यय जुड़ जाने पर खोजना या देखना अर्थ आवृत्तिवान हो जाता है--- ‘पुन:’ या ‘फिर से’ देखना अथवा खोज करना। भारतीय सौंदर्यशास्त्र के प्रख्यात अध्येता आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस Re प्रत्यय को ‘आवृत्ति’ के स्थान पर ‘बहुत गहराई से’ और ‘बहुत कोशिश’ के अर्थ में प्रयोग किए जाने पर अधिक बल दिया था और रिसर्च शब्द से ‘बहुत गहराई तथा प्रयत्नपूर्वक की गई खोज या अनुसंधान’ का अर्थ ग्रहण करने संबंधी अभिमत प्रस्तुत किया था।

भारत में बीसवीं शताब्दी के मध्य तक नवाचारी कार्यों के लिए ‘अनुसंधान’ और ‘रिसर्च’ शब्द बहुतायत से प्रचलित थे। कई बार ‘गवेषणा’ का प्रयोग भी देखने को मिलता था। वर्तमान में रिसर्च शब्द ज्यों का त्यों प्रयोग में है, लेकिन अनुसंधान और गवेषणा के स्थान पर ‘शोध’ शब्द का व्यवहार बढ़ गया है। भारतीय शब्द-संपदा में एक शब्द ‘मीमांसा’ उपलब्ध है, जो प्राचीन काल से ही नवाचारी कार्य के अर्थ में प्रयोग किया जाता रहा है। काशी नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी द्वारा प्रकाशित “संक्षिप्त हिंदी शब्द सागर” में इस शब्द का अर्थ--- ‘अनुमान, तर्क आदि द्वारा यह स्थिर करना कि कोई बात कैसी है’ दिया हुआ है। (नवम संस्करण 1987, पृ. 819)। यहाँ ‘अनुमान’ को परिकल्पना और ‘स्थिर करना’ को कार्य का/के निष्कर्ष (उपलब्धि/उपलब्धियाँ) स्वीकार कर लिया जाए (जो कि सहज-स्वाभाविक है), तो ‘तर्क’ की अर्थ-सीमा में प्रश्न, विश्लेषण, विवेचन आदि को ग्रहण करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इस प्रकार नवाचारी कार्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए मीमांसा सर्वाधिक उपयुक्त शब्द माना जाना चाहिए। सहज जिज्ञासा का विषय हो सकता है कि फिर शोध अथवा अनुसंधान के स्थान पर मीमांसा शब्द के प्रयोग को क्यों प्राथमिकता नहीं दी गई होगी? इसके दो उत्तर सूझते हैं। एक तो यह, कि भारत में ‘पूर्व मीमांसा’ तथा ‘उत्तर मीमांसा’ नाम से दो दार्शनिक धाराएँ आधुनिक युग के बहुत पहले से विद्यमान हैं, अत: मीमांसा शब्द को उसके मूल शब्दार्थ से काट कर एक दर्शन विशेष का प्रतिनिधित्व करने वाले शब्द के रूप में जाना गया होगा, और दूसरा यह, कि उपनिवेशवादी प्रभावों से आतंकित होने के चलते ऐसे शब्द से बचने का प्रयास किया गया होगा, जो सीधे-सीधे भारतीय ज्ञान और प्रज्ञा परंपरा का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करता हो। आधुनिक शिक्षा और शोध प्रणाली के अंतर्गत ‘रिसर्च’ और ‘इन्वेंशन’ शब्द उपनिवेशवादी शासकों के साथ ही आए थे, अत: हिंदी में किसी ऐसे शब्द की खोज पर अधिक ध्यान रहा होगा, जिससे शासक-बिरादरी के माथे पर बल न पड़ें; अत: रिसर्च और इन्वेंशन के अर्थ के अधिक निकट ‘शोध’ और ‘अनुसंधान’ और ‘खोज’ को महत्व दिया गया होगा। ऐसा अन्य भारतीय भाषाओं के साथ भी देखने को मिलता है। उदाहरण के लिए मराठी भाषा में रिसर्च के अर्थ में ‘संशोधन’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। अब ये शब्द अकादमिक ढाँचे के मांस-मज्जा का अनिवार्य अंग बन गए हैं, अत: उपनिवेशवाद की इस भाषिक-कलाबाजी की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता।

उपर्युक्त विवरण का उद्देश्य किसी प्रकार की रणनीति न होकर शुद्ध मनोविनोद ही है। लेखक का निवेदन है कि अकादमिक अध्येता और विद्वान यह कहते रहने में संकोच न करें कि ‘अंग्रेजी का रिसर्च शब्द दो शब्दों के मेल से निर्मित हुआ है। री, अर्थात पुन: या फिर से और सर्च, अर्थात खोज। इस प्रकार रिसर्च शब्द का अर्थ है, जो छिपा हुआ है, उसे पुन: खोजना। हिंदी में इसी रिसर्च के अनुकरण पर ‘शोध’- अर्थात अज्ञान के कूड़े-करकट में दबे-ढके सत्य का शोधन और खोज- अथवा ‘अनुसंधान’ शब्द का प्रयोग किया जाता है।’ अन्य भारतीय भाषाओं के शुभचिंतक भी ऐसा ही करते रहें। आखिर अपने भीतर के तालाब के ठहरे हुए पानी में विवेक की कंकड़ मार कर लहरें उठाने से क्या लाभ? किसी प्रकार के विवाद को जन्म देने से बचने के लिए यह लेखक भी आगे ‘शोध’ शब्द का ही प्रयोग करने वाला है।


परंपरागत दृष्टि से, शोध को एक निर्धारित वैज्ञानिक प्रविधि का प्रयोग करते हुए तार्किक निष्कर्षों के सहारे सत्य की तहों तक पहुँचने की क्रिया माना जाता है। शोध का संबंध ज्ञान के समस्त अनुशासनों से है और यह प्रत्येक ज्ञानुशासन में नवीन ज्ञान-राशि को जोड़ने के उद्देश्य से किया जाने वाला व्यवस्थित प्रयास है। मूलत: शोध मनुष्य की जिज्ञासा-वृत्ति, प्रकृति की शक्तियों और क्षमताओं का साक्षात्कार करने से मन में उठने वाले सहज प्रश्नों के उत्तर जानने की मनोवैज्ञानिक लालसा, उससे उत्पन्न परिकल्पना, उसके लिए किए जाने वाले प्रयत्नों और कार्य-विधियों के निर्धारण के माध्यम से संपन्न होने वाली प्रक्रियात्मक-घटना है। सभ्यता के ऐतिहासिक विकास-क्रम में मनुष्य की जिज्ञासाओं और आवश्यकताओं के विस्तार के साथ जीवन की जटिलताएँ बढ़ती भी रही हैं और अंतर्विरोधों, अंतर्संघर्षों, टकरावों से चुनौतीपूर्ण भी बनती रही हैं। उसी अनुपात में शोध के क्षेत्र में नवाचारों का महत्व भी बढ़ता रहा है। इससे शोध-क्षेत्र का निरंतर विस्तार हुआ है। इसी कारण शोध को सत्य और यथार्थ के निकट पहुँचने वाली निरंतर विकासमान प्रक्रिया कहा जा सकता है।

अकादमिक सुविधा के लिए शोध-कार्य का वर्गीकरण भी किया जाता है। न्यूनतम जिज्ञासाओं और प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए निर्धारित प्रविधि के अनुसार किए जाने वाले शोध-कार्य को ‘लघु’ अथवा ‘अणु’ शोध-कार्य कहा जाता है। यह प्राय: किसी औपचारिक पाठ्यक्रम का हिस्सा होता है। कुछ पाठ्यक्रमों के एक अंग के रूप में किए जाने वाले कम जिज्ञासाओं और कम प्रश्नों वाले शोध-कार्य को ‘परियोजना-कार्य’ अथवा प्रोजेक्ट (project) के अंतर्गत भी रखा जाता है। इसके शोध-प्रतिवेदन को ‘डिसर्टेशन’ (Dissertation) कहा जाता है। परंपरागत पाठ्यक्रमों में यह स्नातकोत्तर स्तर पर और विधिशास्त्र जैसे पाठ्यक्रमों में स्नातक स्तर पर भी निर्धारित होता है। इसका अधिक विकसित और केंद्रीकृत रूप एम.फिल्. पाठ्यक्रम के अंतर्गत देखा जाता है, जो किसी स्वतंत्र एकल ज्ञानानुशासन से जुड़ा होता है और जिसके फलस्वरूप एम.फिल्. उपाधि प्राप्त होती है। एम. फिल्. उपाधि के लिए संपन्न किए जाने वाले लघु शोध-कार्य के प्रतिवेदन को ‘एम.फिल्. डिसर्टेशन’ कहा जाता है। दूसरी ओर, एक स्वतंत्र शोध-कार्यक्रम के अंतर्गत शोध-उपाधि प्राप्त करने के उद्देश्य से अधिक जिज्ञासाओं और अधिक प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए निर्धारित प्रविधि का अनुपालन करते हुए किए जाने वाले शोध-कार्य के प्रतिवेदन को ‘थीसिस’ (Thesis) कहा जाता है। इसके फलस्वरूप प्राप्त होने वाली शोध उपाधि को पी-एच.डी. (डी. फिल्. और डी. एस-सी. भी) और इसके बाद प्राप्त होने वाली उपाधि को डी.लिट्. कहा जाता है। ध्यान रखना होगा कि लघु शोध के अंतर्गत किए जाने वाले शोध-कार्य और पी-एच.डी. अथवा डी. लिट्. उपाधि के लिए किए जाने वाले शोध-कार्य के बीच तार्किकता, विवेचन, विश्लेषण और ज्ञान की गहराई आदि के स्तर पर कोई अंतर नहीं होता। दोनों की ही कार्य-योजना (Research Design) में भी अंतर नहीं होता। ये दोनों शोध-विषय, जिज्ञासाओं, शोध-प्रश्नों, उद्देश्यों, संसाधनों और शोध-प्रतिवेदन के आकार के स्तर पर सीमितता एवं व्यापकता की दृष्टि से परस्पर अलग होते हैं। यह समझना कठिन नहीं है कि डिसर्टेशन सीमित होता है और थीसिस उसकी अपेक्षा व्यापक। यह भी कि, सीमितता और व्यापकता शोध-कार्य की प्रचलित परंपरा से भी निर्धारित होती है और ज्ञानानुशासन तथा विषय की प्रकृति के आधार पर भी।

शोध के संदर्भ में ‘शोध-प्रारूप’ अथवा ‘शोध योजना’ (Research Design) और ‘शोध-प्रस्ताव’ (Research Proposal) का महत्व असंदिग्ध है। शोध-प्रारूप अथवा शोध-योजना (Research Design) वह योजना-प्रारूप है, जिसका अनुपालन करते हुए शोध-कार्य व्यवस्थित एवं चरणबद्ध रूप में संपन्न किया जाता है; जबकि शोध-प्रस्ताव (Research Proposal) शोध-योजना सम्मिलित करते हुए निर्मित किया जाने वाला वह दस्तावेज है, जिसे शोध-उपाधि कार्यक्रम संचालित करने वाले विश्वविद्यालय या किसी संस्थान अथवा शोध-कार्यक्रम प्रायोजित करने और शोध-कार्य के लिए अनुदान प्रदान करने वाले किसी सरकारी/गैर-सरकारी संस्थान, शोध-कार्यक्रम एकक या संबंधित सरकारी विभाग अथवा किसी अंतरराष्ट्रीय सरकारी-गैर-सरकारी संस्थान के समक्ष स्वीकृति हेतु प्रस्तुत निर्मित किया जाता है। स्पष्ट है कि शोध-प्रारूप अथवा शोध-योजना (Research Design) शोध-प्रस्ताव (Research Proposal) का अंग होता है। शोध प्रारूप अथवा शोध योजना (Research Design) के निम्नांकित मुख्य अंग माने जाते हैं -

शोध-विषय

शोध की मुख्य समस्या और लक्ष्य

शोध-प्रश्न (Research Questions)

परिकल्पना (Hypothesis)

उपलब्ध सामग्री का मूल्यांकन (Literature Review)

शोध-प्रविधि (Research Methodology)

प्रयुक्तेय संसाधन (प्रयोगशाला, ग्रंथ, सूचनाएँ, आँकड़े, प्रतिवेदन, दस्तावेज

साक्षात्कार, मौखिक स्रोतों से संग्रहीत सामग्री, प्रौद्योगिकीय-स्रोत, अन्य)

शोध-कार्य के चरण/ अध्यायीकरण

प्रस्तावित शोध-कार्य का महत्व एवं उपयोगिता

संदर्भ एवं सहायक सामग्री

शोध-कार्य का प्रारंभ शोध-विषय के चुनाव से माना जाता है, किंतु शोध-विषय के चुनाव के पूर्व शोध-क्षेत्र का निर्धारण किया जाना अनिवार्य है। शोध के लिए इच्छुक व्यक्ति इस छद्म का सहारा नहीं ले सकता कि ‘उसे बचपन से ही ..... विषय में रुचि थी/ उसके माता-पिता या.... ने बाल्यकाल से ही .... सुना कर ... क्षेत्र में कार्य करने की भूमिका बना दी थी/कक्षा में श्री..... गुरु जी ने... प्रसंग सुना कर/अपने व्यक्तित्व से प्रभावित करके/निर्देश देकर इस शोध-क्षेत्र के प्रति रुचि उत्पन्न कर दी थी और मिलने पर विषय भी सुझा दिया था... आदि।’ यह सहारा व्यक्ति को गतानुगतिकता का दास, कुंठित और अपने विवेक का प्रयोग करने से बचने वाला सिद्ध करता है। शोध के इच्छुक व्यक्ति को जानना चाहिए कि शोध-कार्य के लिए शोध-क्षेत्र और उसके बाद शोध-विषय का चयन एक चुनौती भरा कार्य है, जिसमें स्वाधीन चिंतन, विवेकशीलता, तार्किकता, ज्ञान और समाज, दोनों के प्रति एकनिष्ठ प्रतिबद्धता, स्पष्ट निर्णय शक्ति और युग-जीवन की अधुनातन जटिलताओं से उत्पन्न प्रश्नों को पहचानने की क्षमता द्वारा ही सफल हुआ जा सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में शोध के इच्छुक व्यक्ति को प्रथमत: अपना अकादमिक ज्ञानाधारित मूल्यांकन करके बिना किसी बाहरी प्रभाव के अपनी शोध-रुचि को पहचानना चाहिए। उसके पश्चात उसे अपनी शोध-रुचि से संबंधित प्रकाशित सामग्री (ग्रंथ एवं शोध-पत्रिकाएँ), संगोष्ठियों में प्रस्तुत किए जाने वाले शोधपत्रों, संबंधित क्षेत्र में पहले से चली आ रही शोध-योजनाओं और शोध-कार्यक्रमों, उच्च शिक्षण संस्थानों/सरकारों/अन्य संस्थानों द्वारा जारी शोध-प्रतिवेदनों, सर्वे एवं डेटाबेस, परंपरागत तथा इलेक्ट्रानिक व सोशल मीडिया साधनों, आंदोलनों, राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों, समझौतों आदि का विश्लेषण करके अभी तक शोध का आधार न बन सकी उस मूल शोध-समस्या का प्रारंभिक प्रारूप तैयार करना चाहिए, जो शोध-विषय के निर्धारण के लिए अनिवार्य। अंतिम रूप से शोध-विषय निर्धारण की तैयारी करने के पूर्व यह भी देख लेना चाहिए कि मूल शोध समस्या के प्रति शोधार्थी की व्यक्तिगत रुचि, शोध करने के उसके लक्ष्य, शोध की मूल समस्या से जुड़े प्रश्नों की संभाव्यता और शोध के लिए उपलब्ध संसाधनों की क्या स्थिति है। इस प्रक्रिया का पालन किए बिना शोध-विषय का निर्धारण सफलतापूर्वक किया जाना संदिग्ध होता है।

चयनित मूल शोध-समस्या से जुड़े शोध-प्रश्न (Research Questions) और परिकल्पना (Hypothesis) शोध-कार्य को संभव बनाने वाले निर्णायक तत्व माने जाते हैं। शोध-प्रश्न चयनित शोध-क्षेत्र संबंधी अधिकतम सामग्री के अध्ययन और मूल्यांकन के आधार पर अस्तित्व में आई मूल शोध-समस्या से जुड़े वे प्रश्न होते हैं, जिनके उत्तर की खोज के लिए संपूर्ण शोध-कार्य संपन्न किया जाता है। अभिकल्पना मूलत: इन्हीं शोध-प्रश्नों के उत्तर की संभाव्यता से निर्मित होती है। इसे शोध-कार्य में प्रयोग किए जाने वाले दो या दो से अधिक चरों (Variables) के बीच कार्य-कारण संबंध पर केंद्रित माना जाता है। प्रयोग में आने वाले ये चर स्वतंत्र (जिनमें प्रभावित करने की शक्ति होती है) और आश्रित (जो प्रभावित होते हैं) कोटियों के होते हैं। परिकल्पना ऋजु, मिश्रित, वैकल्पिक, तार्किक, गणितीय आदि वर्गों में बाँटी जा सकती है। शोधार्थी को अपने शोध-कार्य में अपनी शोध-परिकल्पना की परीक्षा करनी होती है, अत: उसे प्रारंभ में ही यह देख लेना चाहिए कि परिकल्पना मूल शोध समस्या और शोध-प्रश्नों से सीधे संबंधित है या नहीं, उसका निर्माण स्वतंत्र और आश्रित चरों के आधार पर किया गया है या नहीं तथा वह परीक्षण योग्य है या नहीं। यह अनिवार्य नहीं कि शोधार्थी की परिकल्पना सही ही सिद्ध हो, यह सिद्ध नहीं भी हो सकती। सिद्ध न हो सकने वाली परिकल्पना को ‘शून्य परिकल्पना’ कहते हैं। जो शोध-कार्य शून्य परिकल्पना देने वाले होते हैं, उन्हें भी शोध की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि वे शोध-प्रश्नों के सटीक उत्तर पाने के दूसरे मार्ग अपनाने तथा भविष्य में किए जाने वाले शोध-कार्य की अधिक नवाचारी कार्य-योजनाएँ बनाने के मार्ग खोलने वाले होते हैं।

परिकल्पना की परीक्षा और शोध-प्रश्नों के उत्तर खोजने के परिप्रेक्ष्य में ही शोध-प्रविधि का निर्धारण किया जाता है। प्रत्येक शोध-कार्य एक शोध-पद्धति या एकाधिक शोध-पद्धतियों के सहारे किया जाता है, जिन्हें सामूहिक रूप में शोध-प्रविधि कहा जाता है। परंपरागत शोधार्थी सामान्य रूप से आगमनात्मक ( जिसमें नवीन सिद्धांत की खोज की जाती है और जिसे ‘बॉटम अप’ पद्धति भी कहा जाता है) अथवा निगमनात्मक (जिसमें सिद्धांतों के परीक्षण द्वारा विशेष निष्कर्ष की प्राप्ति की जाती है और जिसे ‘टॉप डाउन’ पद्धति भी कहा जाता है) शोध-पद्धति का प्रयोग करता है। इसके अतिरिक्त शोध-पद्धतियों को सैद्धांतिक, अनुप्रयुक्त, आनुभविक, मात्रात्मक, गुणात्मक, नैदानिक, तुलनात्मक, विश्लेषणात्मक, व्याख्यात्मक, ऐतिहासिक आदि के रूप में भी वर्गीकृत किया जाता है। शोधार्थी को अपनी शोध-योजना में स्पष्ट रूप से यह निर्धारित करना होता है कि वह शोध-कार्य संपन्न करने के लिए किन-किन शोध-पद्धतियों वाली शोध-प्रविधि का प्रयोग करेगा। साथ ही उसे शोध-प्रविधि के चयन के तार्किक कारण भी बताने होंगे। यदि शोध-कार्य की अवधि में किसी अन्य शोध-पद्धति की अनिवार्यता अनुभव होती है अथवा किसी पूर्व घोषित पद्धति को छोड़ देना पड़ता है, तो शोध-प्रतिवेदन तैयार करते समय इस तथ्य का भी कारण सहित उल्लेख करना होगा।

शोध-कार्य संपन्न हो जाने के पश्चात शोध-प्रतिवेदन तैयार करना एक तकनीकी कार्य है। शोध-प्रतिवेदन पूर्णत: शोध-प्रारूप/योजना (Research Design) के अनुपालन में होना अनिवार्य है। इसके अंतर्गत शोध-सामग्री के संयोजन के लिए वर्तमान में शीर्षक, उप-शीर्षक और सूक्ष्म उप-शीर्षक के लिए अंक-वर्ण पद्धति और अंक-दशमलव पद्धति का प्रयोग देखने में आता है। इसका उदाहरण इस प्रकार हो सकता है -

अंक-वर्ण पद्धति :

1. शीर्षक.........

1. क/ख/ग. उप-शीर्षक.........

1.क. (अ)/(आ)/(इ) सूक्ष्म उप-शीर्षक.......

अंक-दशमलव पद्धति :

1. शीर्षक..........

1.1. उप-शीर्षक.........

1.1.1. सूक्ष्म उप-शीर्षक

[शोध-निष्कर्ष/शोध-उपलब्धियों के अंकन के लिए गहरे बिंदुओं (बुलेट प्वाइंट्स) का प्रयोग किया जा सकता है।]

(प्रो. अनवारुल यकीन ‘लीगल रिसर्च एंड राइटिंग मैथड्स’ से प्रेरित)

सामग्री निर्मित करते समय बड़ी समस्या संदर्भ अंकन की होती है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और कुछ विश्वविद्यालयों के प्रयासों के बावजूद स्वाधीनता के दशकों बाद तक शोध-प्रतिवेदन में अन्य स्रोतों से ग्रहीत सामग्री को अलग से दर्शाए जाने और उद्धरण चिह्न लगाने के बाद संदर्भ संख्या अंकित करके भी पृष्ठ-पाद-टिप्पणी (Foot note space) अथवा पृष्ठांत टिप्पणी (End note space) के अंतर्गत संबंधित विश्वविद्यालय/संस्थान द्वारा निश्चित संदर्भ अंकन प्रणाली (Reference citation style) के अनुपालन के प्रति घोर लापरवाही और उपेक्षा का भाव देखा जाता था। दूसरी ओर पश्चिमी अकादमिक जगत इस क्षेत्र में प्रारंभ से ही बहुत सावधान और गंभीर रहा। इसके संभावित प्रभाव भी शोध की गुणवत्ता और शोध की नैतिकता पर देखे जा सकते थे। इक्कीसवीं शताब्दी की ओर बढ़ते हुए भारत के शोध-जगत में संदर्भ अंकन प्रणाली के अनुपालन के प्रति गंभीरता तो आनी प्रारंभ हुई, लेकिन इन प्रणालियों के व्यवहार के लिए अपेक्षित प्रशिक्षण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। परिणाम यह हुआ कि शोधार्थी भ्रम और भय के शिकार हुए। यहाँ कुछ संदर्भ अंकन प्रणालियों का परिचय दिया जा रहा है -

एपीए (अमेरिकन साइकॉलॉजिकल एसोसिएशन) संदर्भ अंकन प्रणाली :

एपीए संदर्भ अंकन प्रणाली का पहला प्रारूप 5 दिसंबर, 2014 को जारी किया गया था। इसके पश्चात इसके अनेक संस्करण जारी हुए। प्रत्येक संस्करण में जारीकर्ता संस्था कुछ-न-कुछ परिवर्तन कर देती है। यहाँ 28 सितंबर, 2021 को जारी सातवाँ संस्करण (एपीए-7) दिया जा रहा है---

मुख्य सामग्री के बीच में उद्धरण :

उद्धरण चिह्न “ ” बंद होने के बाद कोष्ठक ( ) में---

लेखक का कुलनाम/उपनाम/सरनेम, प्रकाशन वर्ष, पृ. सं. ।

पृष्ठ-पाद-टिप्पणी (Foot note space) :

मूल ग्रंथ :

लेखक का कुलनाम/उपनाम/सरनेम, मूल नाम के/का संक्षिप्ताक्षर, (प्रकाशन वर्ष). इटैलिक टाइप में ग्रंथ का शीर्षक. प्रकाशक का नाम ।

संपादित ग्रंथ :

लेखक का कुलनाम/उपनाम/सरनेम, मूल नाम के/का संक्षिप्ताक्षर, (प्रकाशन वर्ष). इटैलिक टाइप में ग्रंथ का नाम (संपादक के कुलनाम/उपनाम/सरनेम के/का संक्षिप्ताक्षर, मूल नाम, संपा.). प्रकाशक का नाम ।

प्रकाशित अनूदित ग्रंथ :

लेखक का कुलनाम/उपनाम/सरनेम, मूल नाम का/के संक्षिप्ताक्षर, (प्रकाशन वर्ष). इटैलिक टाइप में ग्रंथ का शीर्षक (अनुवादक के कुलनाम/उपनाम/सरनेम के/का संक्षिप्ताक्षर, मूल नाम, अनु.). प्रकाशक का नाम ।

एक ही ग्रन्थ के कई संस्करण होने पर :

लेखक का कुलनाम/उपनाम/सरनेम, मूल नाम के/का संक्षिप्ताक्षर, (प्रकाशन वर्ष). इटैलिक टाइप में ग्रंथ का शीर्षक. प्रकाशक का नाम. (प्रथम संस्करण का प्रकाशन वर्ष) ।

संपादित ग्रंथ में प्रकाशित आलेख/शोधपत्र/ अध्याय :

लेखक का कुलनाम/उपनाम/सरनेम, मूल नाम के/का सक्षिप्ताक्षर, (प्रकाशन वर्ष). आलेख/शोधपत्र/अध्याय का शीर्षक. संपादक का मूल नाम, कुलनाम/उपनाम/सरनेम के/का संक्षिप्ताक्षर (संपा.), इटैलिक टाइप में ग्रंथ का शीर्षक (आलेख की प्रथम और अंतिम पृष्ठ संख्या). प्रकाशक का नाम ।

मुद्रित शोध-पत्रिका में आलेख/शोधपत्र :

लेखक का कुलनाम/उपनाम/सरनेम, मूल नाम के/का संक्षिप्ताक्षर, (प्रकाशन वर्ष). शोधपत्र/आलेख का शीर्षक. इटैलिक टाइप में शोध पत्रिका का नाम, (अंक संख्या) ।

ऑन लाइन पत्रिका में शोधपत्र/आलेख :

लेखक का कुलनाम/उपनाम/सरनेम, मूल नाम के/का संक्षिप्ताक्षर, (प्रकाशन वर्ष, माह, तिथि). आलेख का शीर्षक. इटैलिक टाइप में पत्रिका का नाम. https://URL/ वेबसाइट विजिट करने का वर्ष/माह/तिथि ।

ब्लॉग पोस्ट से सामग्री :

लेखक का कुलनाम/उपनाम/सरनेम, मूल नाम के/का संक्षिप्ताक्षर, (प्रकाशन का वर्ष, माह, तिथि). आलेख/सामग्री का शीर्षक. इटैलिक टाइप में ब्लॉग का नाम. https://URL/ ब्लॉग विजिट करने का वर्ष, माह, तिथि ।

फिल्म से सामग्री :

फिल्म निर्देशक का कुलनाम/उपनाम/सरनेम, मूल्नाम के/का संक्षिप्ताक्षर (निर्देशक), (फिल्म रिलीज हिने का वर्ष). इटैलिक टाइप में फिल्म का नाम. फिल्म-निर्माता कंपनी का नाम ।

पेटेंट की सामग्री :

खोजकर्ता/वैज्ञानिक का कुलनाम/उपनाम/सरनेम, मूल नाम के/का संक्षिप्ताक्षर, (पेटेंट करने का वर्ष, माह, तिथि) इटैलिक टाइप में पेटेंट का शीर्षक (पेटेंट संख्या). पेटेंट करने वाली संस्था का नाम. https://URL/ ।

(स्रोत : https://apastyle.apa.org/ 2023/02/09)


शिकागो संदर्भ अंकन प्रणाली (Chicago Citation Style)

शिकागो संदर्भ अंकन प्रणाली का प्रारूप शिकागो विश्वविद्यालय की यूनिवर्सिटि ऑफ शिकागो प्रेस द्वारा सन् 1906 में जारी किया गया था। सबसे पहले इसका व्यवहार उसी विश्वविद्यालय के राजनीति विभाग द्वारा प्रारंभ किया गया। समय-समय पर इसके 17 संस्करण जारी किए गए हैं। यहाँ दिसंबर, 2022 में जारी 17 वें संस्करण से सामग्री प्रस्तुत की जा रही है----

मुख्य सामग्री के बीच में उद्धरण :

उद्धरण चिह्न “ ” बंद होने के बाद कोष्ठक ( ) में---

लेखक का कुलनाम/उपनाम/सरनेम, प्रकाशन वर्ष, पृ. सं. ।

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मूल ग्रंथ :

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संपादित ग्रंथ में आलेख/अध्याय :

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अनूदित ग्रंथ :

लेखक का मूल नाम, कुलनाम/उपनाम/सरनेम, द्व—उद्धरण चिह्नों में लेख का शीर्षक, इटैलिक टाइप में ग्रंथ का शीर्षक, अनूदित अनुवादक का नाम (प्रकाशन स्थान : प्रकाशक का नाम, संस्करण, सन्), पृ. सं. ।

एक ही ग्रंथ एक से अधिक बार :

लेखक का कुलनाम/उपनाम/सरनेम, इटैलिक टाइप में ग्रंथ का शीर्षक, पृ. सं. (संदर्भ सं..... देखें) ।

[ध्यान दें--- यदि एक ही ग्रंथ क्रमश: उद्धृत हुआ है--- ऊपरिवत, पृ. सं. ।]

मुद्रित शोध पत्रिका में आलेख/शोधपत्र :

लेखक का मूल नाम, कुलनाम/उपनाम/सरनेम, द्वि-उद्धरण चिह्नों में आलेख/शोधपत्र का शीर्षक, इटैलिक टाइप में पत्रिका का नाम, आवृत्ति, माह, वर्ष, पृ. सं. ।

ऑन लाइन सामग्री :

लेखक का मूल नाम, कुलनाम/उपनाम/सरनेम, द्वि-उद्धरण चिह्नों में सामग्री का शीर्षक, इटैलिक टाइप में वेबसाइट का नाम, संचालक का नाम, सामग्री-प्रकाशन का माह, तिथि, वर्ष, https://URL. (वेबसाइट विजिट करने का माह, तिथि, वर्ष) ।

संदर्भ ग्रंथ सूची के लिए :

लेखक का कुलनाम/उपनाम/सरनेम, मूल नाम, इटैलिक टाइप्मेन ग्रंथ का नाम, प्रकाशन-स्थान, प्रकाशक का नाम, प्रकाशन वर्ष ।

(स्रोत : https://www.chicagomanualofstyle.org/tools_citationguide.html/2023.2.9)

ओस्कोला संदर्भ अंकन प्रणाली
(Oxford University Standard for the Citation of Legal Authorities)

इस संदर्भ अंकन प्रणाली का निर्माण ऑक्स्फोर्ड विश्वविद्यालय के विधि विभाग के पीटर ब्रिक्स द्वारा विधिशास्त्र के विद्यार्थियों के सहयोग से सन् 2000 में केवल विश्वविद्यालय के विधिशास्त्रीय शोध के संदर्भ में किया गया था, लेकिन ब्रिटेन सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय विधि संस्थानों, शोध पत्रिकाओं और प्रकाशकों द्वारा इसका प्रयोग किया जाने लगा है। सन् 2012 तक इस प्रणाली के चार संस्करण जारी किए जा चुके थे।

मुख्य सामग्री के बीच उद्धरण :

उद्धरण चिह्न बंद होने के बाद केवल संदर्भ संख्या अंकित की जाती है। पूरा सदर्भ पृष्ठ-पाद-टिप्पणी के अंतर्गत लिखा जाता है।

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मूल ग्रंथ :

लेखक का मूल नाम, कुलनाम/उपनाम/सरनेम, इटैलिक टाइप में ग्रंथ का नाम (संस्करण, प्रकाशक का नाम प्रकाशन वर्ष) पृ. सं. ।

संपादित ग्रंथ में आलेख/अध्याय:

लेखक का मूल नाम, कुलनाम/उपनाम/सरनेम, एकल उद्धरण चिह्नों में आलेख/अध्याय का शीर्षक संपादक का नाम (संपा.) इटैलिक टाइप में ग्रंथ का नाम (संस्करण, प्रकाशक का नाम प्रकाशन वर्ष) आलेख/अध्याय के पहले पृष्ठ की संख्या, उद्धरण लिए जाने वाले पृष्ठ की संख्या ।

मुद्रित शोध पत्रिका :

लेखक का मूल नाम, कुलनाम/उपनाम/सरनेम, एकल उद्धरण चिह्नों में अलेख/शोधपत्र का शीर्षक (शोध पत्रिका के अंक का प्रकाशन वर्ष) अंक संख्या, शोध पत्रिका का नाम, आलेख/शोधपत्र के प्रथम पृष्ठ की संख्या, उद्धरण लिए जाने वाले पृष्ठ की संख्या ।

ऑन लाइन स्रोत :

लेखक का मूल नाम, कुलनाम/उपनाम/सरनेम, एकल उद्धरण चिह्नों में सामग्री का शीर्षक (प्रकाशन वर्ष) वेबसाइट का नाम संचालक का नाम >https:// URL> वेबसाइट विजिट करने की तिथि माह सन् । (स्रोत : https://www.law.ox.ac.uk/23.2.9)

भारत में संदर्भ अंकन प्रणाली के विकास का प्रयास :

एसआईएलसी संदर्भ अंकन प्रणाली
Standard Indian Legal Citation

सन् 2014 में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटि, दिल्ली के प्रयास और अन्य भारतीय विधि संस्थानों से जुड़े विधि अकादमीशियनों के सहयोग से एसआईएलसी का विकास हुआ। विधिशास्त्र के क्षेत्र में किए जाने वाले शोध के लिए यह पहली भारतीय संदर्भ अंकन प्रणाली मानी जाती है। प्रारंभ में इसका अधिक प्रसार नहीं था, किंतु सन् 2022 तक देश के लगभग 140 विधि संस्थान इसे व्यवहार योग्य प्रणाली मानने लगे। इसके कुछ नमूने इस प्रकार हैं---

मूल ग्रंथ :

लेखक के मूल नाम के/का संक्षिप्ताक्षर, कुलनाम/उपनाम/सरनेम, इटैलिक टाइप में ग्रंथ का नाम, पृ.सं. (संस्करण, प्रकाशन वर्ष) ।

संपादित ग्रंथ में आलेख/अध्याय :

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शोध पत्रिका में आलेख/शोधपत्र :

लेखक का मूल नाम, कुलनाम/उपनाम/सरनेम, इटैलिक टाइप में आलेख/शोधपत्र का शीर्षक, अंक संख्या, शोध पत्रिका का नाम, आलेख/शोधपत्र के पहले पृष्ठ की संख्या, संदर्भ लिये जाने वाले पृष्ठ की संख्या (सन्) ।

ऑन लाइन स्रोत :

लेखक का मूल नाम, कुलनाम/उपनाम/सरनेम, इटैलिक टाइप में सामग्री का शीर्षक, वेबसाइट का नाम, https:// URL, वेबसाइट विजिट किए जाने की तिथि, माह, सन् ।

(सोत : https://nludelhi.ac.in )

शोधार्थियों को इन अथवा अन्य किसी संदर्भ अंकन प्रणाली का उपयोग करते समय दो बातों का ध्यान रखना अनिवार्य है। एक यह, कि उन्हें यह जानकारी होनी चाहिए कि वे जिस संस्थान से जुड़ कर शोध-कार्य कर रहे हैं, उसने आधिकारिक रूप में कौन-सी प्रणाली को अपनाया है, और दूसरी यह, कि अधिकांश संदर्भ अंकन प्रणालियाँ अपने नवीनतम संस्करण के लिए भुगतान की मांग करती हैं, अर्थात व्यवहार में लाने के लिए उन्हें खरीदना होता है। कई बार शोध कार्यक्रम संचालित करने वाले विश्वविद्यालय/संस्थान अपने संसाधनों से किसी संदर्भ अंकन प्रणाली को खरीद कर शोधार्थियों को उसके प्रयोग की सुविधा दे देते हैं। यह शोध के लिए अच्छी बात है।

किसी भी संदर्भ अंकन प्रणाली का व्यवहार करने के क्रम में एक और समस्या मूल संदर्भ की पुनरावृत्ति की होती है, जिसे शोध-कार्य में प्रस्तुति-दोष माना जाता है। आधुनिक प्रौद्योगिकी ने इस समस्या के हल के लिए सॉफ्टवेयर विकसित किए हैं, जिन्हें ‘रेफरेंस मैनेजमेंट सोफ़्टवेयर’ कहा जाता है। ये सॉफ्टवेयर पहरेदार के रूप में कार्य करते हैं और संदर्भ की पुनरावृत्ति संबंधी दोष को दूर करने में शोधार्थी की सहायता करते हैं। ‘मेंडले’ (Mendeley), ‘एंडनोट’ (End Note), ‘प्रोसाइट’ (Procite), ज़ोटेरो (Zotero), रेफ वर्क्स (R’ef Works) आदि इसी प्रकार के सॉफ्टवेयर हैं। इनमें से भी किसी के व्यवहार के लिए नि;शुल्क उपलब्धता और भुगतान की अनिवार्यता के विषय में पूरी तरह सावधान रहने की आवश्यकता है।

शोध के क्षेत्र में कार्य की गुणवत्ता और उपयोगिता को प्रभावित करने वाला एक पक्ष अन्य स्रोतों से सामग्री ग्रहण करने के अधिकार और ग्रहीत सामग्री को निर्धारित व्यवस्था के अनुसार दर्शाने की बाध्यता के पालन या उसकी उपेक्षा से संबंधित है। यह अनिवार्य है कि शोधार्थी संबंधित विश्वविद्यालय/शोध-संस्थान अथवा (भारत के संदर्भ में) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा निर्धारित प्रतिशत सीमा में ही अन्य स्रोतों से आवश्यक सामग्री ग्रहण करके उसका उपयोग करे और निर्धारित व्यवस्था का पूर्णत: पालन करते हुए संदर्भ अंकन प्रणाली के माध्यम से उसकी सूचना भी अंकित करे। ग्रहीत की जाने सामग्री का प्रतिशत शोध-प्रतिवेदन की मुख्य सामग्री के आकार के अनुसार निर्धारित होता है। संभव है, कहीं यह संपूर्ण मुख्य सामग्री का 10% हो और कहीं यह प्रतिशत इससे कम या फिर अधिक। यदि अन्य स्रोतों से ग्रहीत सामग्री के निर्धारित प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन किया जाता है, तो वह ‘प्लेजरिज्म’ (Plagiarism) के अंतर्गत माना जाता है। इसी प्रकार अन्य स्रोतों से ग्रहीत सामग्री (यह विषयवस्तु, विचार, अवधारणा, अभिमत, निर्णय, निष्कर्ष आदि किसी भी रूप में हो सकती है) को बिना कोई संदर्भ अंकित किए इस प्रकार प्रयोग कर लेना कि वह शोधार्थी की मौलिक सामग्री प्रतीत हो, को भी प्लेजरिज्म का कार्य माना जाता है। इसी प्रकार यदि शोधार्थी द्वारा शोध-प्रतिवेदन में अपनी ही मौलिक सामग्री के किसी अंश का बिना कोई संदर्भ अंकित किए बार-बार उपयोग किया जाता है, तो उसे ‘सेल्फ प्लेजरिज्म’ माना जाता है। शोध के क्षेत्र में प्लेजरिज्म किसी भी रूप में एक गंभीर अपराध है; क्योंकि इससे शोध की नैतिकता ही खंडित नहीं होती, बल्कि जनता और राष्ट्र के धन का दुरुपयोग भी होता है। यही कारण है कि भारत में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग प्लेजरिज्म के विरुद्ध कठोर कदम उठा रहा है। अधिकांश विश्वविद्यालय और अन्य शोध संस्थान भी इस विषय में सावधान हुए हैं। प्लेजरिज्म का पता लगाने के लिए कुछ सॉफ्टवेयर भी बन गए हैं, जैसे--- उरकुंड (Urkund), टर्निट-इन (Turnit-in) आदि। लेकिन एक तो इनके प्रयोग के लिए भुगतान करना पड़ सकता है, दूसरे इन सभी की अपनी सीमाएँ भी हैं। ये प्राय: रोबोट की भाँति कार्य करते हैं, जिससे किसी शोधार्थी के शोध-प्रतिवेदन में अनावश्यक रूप से प्लेजरिज्म बता दिए जाने की आशंका भी हो सकती है। एक बात यह भी, कि कई शोधकर्ताओं ने प्लेजरिज्म सॉफ्टवेयर के पकड़-जाल से बचने के मार्ग भी तलाशने प्रारंभ कर दिए हैं। इस दशा में, हमें ध्यान रखना होगा कि शोध के क्षेत्र में प्लेजरिज्म पर वास्तविक अंकुश लगाने वाला सॉफ्टवेयर स्वयं शोधकर्ता के मन में बैठी नैतिकता है। अंतत: उसे सक्रिय करके ही प्रत्येक प्रकार के अपराध से बचा जा सकता है।

शोध-प्रतिवेदन निर्मित करने की प्रक्रिया में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारकों में से एक ‘भाषा’ है। शोध की दीर्घकालीन परंपरा में यह सत्य स्थापित हो चुका है कि शोध-प्रतिवेदन की भाषा अन्य किसी भी ज्ञानानुशासन की अपेक्षा विज्ञान ज्ञानानुशासन के अधिक निकट होती है। कला (अथवा मानविकी) और समाजविज्ञान ज्ञानानुशासन से प्रेरणा लेकर वह संप्रेषण-कौशल से संपन्न बन जाती है। लेकिन वर्तमान युग पर्यावरण विमर्श, स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी-विमर्श, आर्थिक-उदारवाद और वैश्वीकरण आदि का भी है। ये सभी विमर्श सामाजिक मानसिकता के साथ-साथ भाषा के क्षेत्र में भी नवीन परिवर्तनों पर अत्यधिक बल देते हैं। स्त्री-विमर्श ने ‘लैगिक-तटस्थ-भाषा’ (Gender Secular Language) की अवधारणा का विकास किया है। दलित-विमर्श और आदिवासी विमर्श ने जाति और समुदाय तथा परंपराओं संबंधी पारिभाषिक शब्दावली के प्रयोग पर सोच-समझ कर निर्णय लेने की आवश्यकता प्रतिपादित की है। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न जटिलताएँ भाषा-व्यवहार के सामान्य सामाजिक ढाँचे के साथ ही शोध-प्रतिवेदन की भाषा को भी प्रभावित कर रही हैं। आर्थिक उदारवाद और वैश्वीकरण की घटनाओं ने भोजनालय, शयन-कक्ष, शादी-ब्याह, तीज-त्योहार की भाषा के साथ ही शोध-कार्य के निष्कर्षों को प्रस्तुत करने वाली भाषा पर भी अधिकार जमाने की भरपूर कोशिश की है। एक सामान्य परिवर्तन यह भी हुआ है कि शोध के क्षेत्र में ‘व्यक्ति-केंद्रित-भाषा’ (‘मैंने किया है’/’मेरे द्वारा किया गया कार्य है’/’मुझे अनुभव होता है’ आदि) के स्थान पर ‘शोध-केंद्रित-भाषा’ (‘शोधार्थी द्वारा किए गए कार्य के आधार पर’/’शोध-कार्य से प्राप्त निष्कर्ष के आधार पर’ आदि) के व्यवहार की अनिवार्यता पर पहले की अपेक्षा बहुत अधिक बल दिया जाने लगा है।

शोध की मुख्य समस्या और शोध-कार्य से शोधार्थी के संबंध की दृष्टि से एक चौंकाने वाला विमर्श पश्चिम के बाद भारत में भी काफी चर्चा में आ गया है। परंपरागत शोध-विमर्श के अंतर्गत माना जाता रहा है कि ‘शोध की नैतिकता’ और ‘शोधार्थी होने’ की कसौटी पर खरा उतरने के लिए ‘शोध-विषय’ और ‘शोध की मुख्य समस्या’ के साथ शोधार्थी के संबंध ‘तटस्थता पर आधारित’ होने चाहिए। लेकिन अब इस मान्यता पर पुनर्विचार की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी है। इसके मूल में मुख्य तर्क इन प्रश्नों से पैदा होता है कि क्या वास्तव में शोधकर्ता ‘एक व्यक्ति इकाई’ और ‘एक शोधार्थी इकाई’ के रूप में एक ही समय पर परस्पर भिन्न होना संभव है? जब शोध-क्षेत्र से लेकर शोध-विषय के चयन तक शोधार्थी की रुचि निर्णायक होती है, तो क्या यह संभव है कि उसका शोध-कार्य उसकी व्यक्तिगत-रुचि से प्रभावित न हो? क्या शोधार्थी के दैनंदिन व्यवहार से लेकर उसके शोध-व्यवहार तक व्यक्तिगत आवश्यकताओं, समस्याओं, सुविधाओं, जटिलताओं, व्यक्तिगत और सामाजिक संबंधों के निर्वाह से प्रभावित नहीं होते? व्यक्ति का तटस्थ होना यूटोपियन-नैतिकता है अथवा उसका कोई मनोवैज्ञानिक और यथार्थवादी आधार भी है? और, क्या शोध का लक्ष्य शोधार्थी की अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता, उसके सामाजिक दायित्व और समाजार्थिक व समाज-राजनैतिक समझ तथा जीवन को अपनी धारणा के अनुसार बनाने की इच्छा से प्रभावित नहीं होता? इन और इसी प्रकार के अन्य प्रश्नों पर होने वाले अकादमिक व बौद्धिक विमर्श के कारण शोधकर्ता के लिए अनिवार्य मानी जाने वाली तटस्थता की अवधारणा विवादों और संदेहों के घेरे में आ गई है।

भारत में यही विमर्श ‘शोध के प्रदेय’ (Contribution in Return) की अवधारणा पर भी किया जाने लगा है। परंपरा से एक तो, यह माना जाता रहा है कि शोध-कार्य के निष्कर्ष अथवा उपलब्धियाँ ही उसका प्रदेय भी हैं, दूसरे इससे अधिक व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह माना जाता था कि शोधकर्ता अपने शोध-निष्कर्ष शोध कराने वाले संस्थान के माध्यम से विभिन्न संस्थाओं और सरकारों के लिए सुलभ बनाता है, जिनका उपयोग कार्यक्रम और नीतियाँ बनाने में किया जाता है--- अर्थात यह शोधकर्ता का एक महत्वपूर्ण प्रदेय है। लेकिन जब से विकास की नई अवधारणा सामने आई है, तब से शोधकर्ताओं के ये दोनों ही तर्क निर्बल पड़ गए हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर पिछली शताब्दी के अंतिम चरण (4 दिसंबर, 1986) में विकास की नवीन अवधारणा, ‘विकास का अधिकार घोषणापत्र’ (Declaration on the right to Development) शब्दावली में अस्तित्व में आई। इस घोषणापत्र के पहले ही अनुच्छेद में विकास को मनुष्य का ‘अनाहरणीय मानव-अधिकार’ घोषित किया गया है और प्रत्येक व्यक्ति को विकास में भागीदारी तथा योगदान करने का हकदार बताया गया है। इसके पश्चात सन् 2000 में जारी ‘संयुक्त राष्ट्र सहस्राब्दी घोषणापत्र’ (United Nations Millennium Declaration) और सन् 2015 में घोषित ‘हमारी दुनिया का रूपांतरण : सतत विकास के लिए कार्यसूची- 2030’ (Transforming our world : The 2030 Agenda for Sustainable Development) की बारी आती है (विशेष अध्ययन के लिए देखें, आलेख का परिशिष्ट, 1)।

इन सभी से जनता और समाज के सभी वर्गों को यह अधिकार मिला कि वे प्रत्येक शोधकर्ता से पूछें कि समाज के विभिन्न वर्गों से प्राप्त ज्ञान के बदले में उसने समाज के विकास में प्रत्यक्ष रूप में क्या भागीदारी की? वे यह भी पूछ सकते हैं कि क्या विज्ञान का शोधकर्ता अपने निष्कर्षों को लेकर साधारण जनता (जिसमें किसान मुख्य हो सकते हैं) के बीच गया? समाजविज्ञान के शोधकर्ता ने अपने शोध-कार्य के अनुसार दूरस्थ नगरीय और ग्राम्य क्षेत्रों की स्त्रियों, साक्षरता के लिए प्रतीक्षारत बालकों, राजनैतिक दिशाहीनता का शिकार मतदाताओं, सहकारिता आंदोलन की बारीकियाँ न समझने वाले निर्धन लोगों को सजग बनाने के लिए अपने स्तर् क्या पहल की? जयशंकर प्रसाद, विलियम वर्ड्सवर्थ, रवींद्रनाथ ठाकुर आदि के प्रकृति-चित्रण-वैभव पर शोध-उपाधि पाने के बाद मानविकी के शोधकर्ता ने कितना समय जंगल-खेत-गाँव में व्यतीत किया और कितने लोगों को प्रकृति के रहस्यों से परिचित कराया? साधारण जनता के सभी वर्गों (विशेषकर वंचितों) को शिक्षण संस्थाओं (विश्वविद्यालय और कॉलेज, दोनों) से यह पूछने का अधिकार भी है कि वे स्थानीय समाज और समस्याओं तथा विकास से संबंधित कितने नियतकालीन और नियमित पाठ्यक्रम संचालित कर रहे हैं? उनके शोध कार्यक्रमों में स्थानीय आवश्यकताओं (कृषि, शिक्षा, प्रौद्योगिकी, लोक-जीवन, पत्रकारिता, सामाजिक वर्ग-भेद, कौशल-विकास आदि) के लिए कितनी जगह है? शोध के प्रदेय की यह नवीन अवधारणा जनता के भौतिक और मानसिक विकास में शोधकर्ताओं, विद्वानों, बुद्धिजीवियों की सीधी भागीदारी पर बल देती है।

इसी अवधारणा के अंतर्गत यह विचार भी विमर्श का हिस्सा बनने लगा है कि आखिर शोध की दिशा क्या होनी चाहिए? इसके लिए हमें स्थानीय और वैश्विक जटिलताओं के परिप्रेक्ष्य में सोचना होगा कि हम पहले की भाँति सभी ज्ञानानुशासनों को स्वायत्त रहने देकर अपना शोध-कार्य करें अथवा अपने इस परंपरागत शोध-स्वभाव में बदलाव करें? इस प्रश्न का अचानक कोई उत्तर देने के पूर्व कुछ वास्तविकताओं पर विचार करना होगा, जैसे--- व्यक्तिगत, सामाजिक और वैश्विक जीवन का कौन-सा ऐसा पक्ष है, जो केवल किसी एक ही ज्ञानानुशासन के सहारे चल पा रहा है? साहित्य के अंतर्गत आने वाली कौन-सी ऐसी रचना है, जिसे मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, इतिहास-बोध, संस्कृति-परंपरा आदि की अवहेलना करके केवल सौंदर्यशास्त्र के सहारे पूरी तरह समझा अथवा व्याख्यायित किया जा सकता है? विज्ञान का कौन-सा ऐसा अध्ययन और शोध का विषय है, जिसे उसकी सामाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक उपयोगिता से अलग करके जनता की स्वीकृति प्राप्त हो सकती है? क्या समाज-विज्ञान का कोई शोध नृ-विज्ञान, संस्कृति और लोक की जटिल विविधताओं से परे रह कर संभव है? क्या सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी कोई शोध समाजशास्त्र की उपेक्षा कर सकता है? क्या अर्थशास्त्र का बाजारवाद पर केंद्रित कोई शोध संस्कृति में होने वाले परिवर्तनों से जुड़े होने से इंकार कर सकता है? इस प्रकार के असंख्य प्रश्नों ने यह सोचने पर विवश किया है कि शोध और ज्ञानानुशासनों के संबंध पर पुनर्विचार अनिवार्य है।

वर्तमान में मनुष्य के विचार के केंद्र में सतत-विकास की आवश्यकता, वैश्वीकरण के आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव, शीत-युद्ध की उभरती नई आशंकाएँ, विश्व की जनता पर अकारण थोपे जाने वाले युद्धों का स्त्रियों-बालकों पर प्रभाव, पर्यावरण की निरंतर चिंताजनक होती स्थिति, जलवायु परिवर्तन के परिणाम, भू-राजनीति और भू-भौगोलिकी में होने वाले बदलाव, ऊर्जा-संकट, ग्रीन-इकॉनॉमी और ब्ल्यु-इकॉनॉमी में नए विश्व-भविष्य की तलाश, शिक्षा का भू-मंडलीय स्वरूप, संस्कृति और आदिवासी जीवन की पहचान को बचाने की आवश्यकता और जल-जंगल-जमीन पर वास्तविक अधिकार तथा उनके दोहन के सवाल, वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ती धर्मांधता और सांप्रदायिकता, विचार और प्रतिरोध की प्रवृत्ति को कुंद करने की कोशिशें आदि हैं। मनुष्य के विचार के ये सभी पक्ष शिक्षा और शोध कार्यक्रमों के अंग के रूप में भी स्वीकार किए जाने चाहिए। तब हम पाएँगे कि एकल ज्ञानानुशासन केंद्रित शोध का युग कभी का बीत चुका है। बहुल ज्ञानानुशासन पर केंद्रित शोध का युग भी पुराना पड़ चुका है। अब हमारे सामने अंतरानुशासनिक अध्ययन और पार-ज्ञानानुशासनिक अध्ययन पर केंद्रित शोध के द्वार खुले हैं। भारत ने जिस प्रकार अचानक और अत्यल्प कालावधि के भीतर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास की दुनिया में प्रवेश करके उपभोक्ता और दर्शक की स्थिति को वासांसि जीर्णानि की भाँति झटक कर खोजकर्ता और विज्ञान की दिशा के निर्धारण में सक्रिय भागीदार की भूमिका और हैसियत पर दावा जताया है, वह अति चुनौतीपूर्ण है और उसके लिए राष्ट्र की पूरी शोध-बिरादरी को नवाचारों के प्रति गंभीर तथा दायित्वपूर्ण लगाव का प्रमाण देना होगा। बायो-मेडिकल, बायो-इंफॉर्मेटिक्स, ईथनॉग्राफी, एंथ्रोपॉलॉजी जैसे अनेक क्षेत्र और 5पी. (पीपुल, प्लेनेट, प्रोस्परिटि, पीस, पार्टनरशिप) के लिए अनिवार्य वैज्ञानिक, समाजवैज्ञानिक और मानविकीय अभियानों की सफलता के लिए एक सीमा तक अंतरानुशासनिक अध्ययन और शोध से काम चल सकता है, लेकिन अंतत: हमें पार-ज्ञानानुशासनिक अध्ययन व शोध का मार्ग ही अपनाना होगा। कारण यह कि अंतरानुशासनिक अध्ययन में भिन्न-भिन्न ज्ञानानुशासनों की दृष्टियाँ संगठित रूप में कार्य तो करती हैं, किंतु वे ज्ञानानुशासनिकता के ढाँचे के भीतर रहते हुए ही ऐसा कर पाती हैं, जबकि पार-ज्ञानानुशासनिकता एक ऐसी समग्रतावादी चिंतन और शोध-दृष्टि निर्मित करती है, जो ज्ञानानुशासनों की सीमाओं के पार अस्तित्व में आती है। यह ज्ञानानुशासनों की सीमाओं से मुक्त होकर व्यापक समस्याओं को समझने वाली नवाचारी अध्ययन और शोध-दृष्टि है। इसी के साथ यह भी ध्यान रखना होगा कि पार-ज्ञानानुशासनिकता शोध की प्रक्रिया में उन वर्गों को शामिल करती है, जिन पर शोध का प्रभाव पड़ने वाला होता है। (विशेष अध्ययन के लिए देखें, आलेख का परिशिष्ट, 2)।

मार्च, 2019 के आँकड़ों के अनुसार भारत में 48 केंद्रीय विश्वविद्यालय, 399 राज्य विश्वविद्यालय, 334 प्राइवेट विश्वविद्यालय, 126 डीम्ड विश्वविद्यालय तथा 39050 कॉलेज और 10011 स्वायत्तशासी संस्थाएँ हैं। शोधपत्रों के प्रकाशन की दृष्टि से सन् 2021 में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर था। कुल शोधपत्रों में भारत का हिस्सा 5.31% आँका गया था। लेकिन कॉर्नेल विश्वविद्यालय और विश्व बौद्धिक संपदा संगठन प्रति वर्ष जो ‘ग्लोबल इन्नोवेशन इंडेक्स’ तैयार करते हैं, उसमें सन् 2018 में स्विटजरलैंड पहले, चीन 17वें और भारत 57वें स्थान पर था। सन् 2022 में ग्लोबल इन्नोवेशन इंडेक्स में स्विटजरलैंड पहले, चीन 11वें और भारत 40वें स्थान पर रहा। स्मरणीय है कि यह इंडेक्स शोध कार्यक्रम संचालित करने वाले शिक्षा संस्थानों की स्थिति, शोधकर्ताओं की स्थिति, शोध की सुविधाएँ, शोध के लिए वित्त्तीय संसाधनों की उपलब्धता, बाजार और व्यापार की जटिलताओं में शोध की भूमिका, शोध के परिणामस्वरूप उपलब्ध हुए ज्ञान और प्रौद्योगिकी की स्थिति आदि के मूल्यांकन के आधार पर निर्मित किया जाता है। जब तक भारत अपना कोई ग्लोबल इन्नोवेशन इंडेक्स विकसित न कर ले, तब तक हमें पश्चिमी इंडेक्स की कसौटी पर ही मूल्यांकित होने की विवशता झेलनी होगी और उसके अनुसार हमारा मार्ग कठिन है। एक सत्य यह भी है, कि भारत में शोध कार्यक्रम विश्वविद्यालयों के दायित्व में शामिल है, जबकि कॉलेज उसमें सक्रिय हस्तक्षेप के योग्य नहीं माने जाते। इसी कारण, मात्र 3.6% कॉलेज ही शोध कार्यक्रम संचालित करते हैं। दूसरी बात यह कि भारत में अभी भी शिक्षण और शोध, कक्षा-अध्यापन और शोध, अध्यापक और शोध, जनता और शोध के बीच की दूरी को पाटा नहीं जा सका है। यह कम दुखद नहीं है कि पूर्व प्रचलित-प्रमाणित ज्ञान के व्यवहार को बरसों-बरस प्रयोग करते चले जाना अध्यापन में बने रहने का सबसे आसान और सुरक्षित रास्ता माना जाता है। यह किसी भी देश और समाज को नवाचारी मार्ग की ओर ले जाने में बाधा उत्पन्न करने वाली प्रवृत्ति है। इन समस्त समस्याओं को भी हमारे सामूहिक विचार-विमर्श का अंग बनना चाहिए।

भारत सरकार ने पिछले वर्षों में शोध के क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कई योजनाएँ प्रारंभ की हैं, जैसे---उच्चतर आविष्कार योजना (UAY), इंपैक्टिंग रिसर्च इन्नोवेशन एंड टक्नॉलॉजी (IMPRINT), प्रधानमंत्री अनुसंधान अध्येता योजना (PMRF), अटल इन्नोवेशन मिशन (AIM) आदि। सन् 2021 में भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा प्रस्तावित पाँच नई योजनाएँ स्वीकार की गई हैं--- इलैक्ट्रिक मॉबलिटि मिशन, मेथेनॉल मिशन, क्वांटम साइस एंड टक्नॉलॉजी मिशन, मैपिंग इंडिया मिशन और साइबर फिजिकल सिस्टम मिशन। सन् 2023 में भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन’ की घोषणा की है, जिसका लक्ष्य कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना है। ये सभी अध्ययन, शोध और विकास के क्षेत्र में नवाचार के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाने वाली घटनाएँ हैं। आवश्यकता इस बात की है कि विश्वविद्यालय और कॉलेज अपनी जड़ताओं को तोड़ कर नवाचार के मार्ग पर चल पड़ने की गंभीर तैयारी करें। 15-17 फरवरी तक फिजी में संपन्न होने वाले बारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन का थीम-वाक्य रखा गया है--- ‘परंपरागत ज्ञान से कृत्रिम मेधा तक’। क्या भाषा और साहित्य से जुड़े अध्यापक और विद्वान इसकी अंतर्ध्वनि को सुनने का प्रयास करेंगे ! आखिर नवाचार केवल प्रकृति विज्ञान, समाजविज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्य करने वाले शोधकर्ताओं की ही जिम्मेदारी नहीं है, उसे साहित्य, कला, भाषा, संस्कृति और लोक-जीवन जैसे अध्ययन अनुशासनों से जुड़े मीमांसकों को भी अपने व्यवहार का अंग बनाना होगा, तभी एक विकसित भारत का सपना पूरा हो सकता है।............

संपर्क : dr4devraj@gmail.com मोबा. : 7599045113


परिशिष्ट

1.  विकास का अधिकार और सतत विकास

संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा द्वारा 4 दिसंबर, सन् 1986 को प्रस्ताव संख्या 41/128 के माध्यम से ‘विकास का अधिकार घोषणापत्र’ (Declaration on the right to Development) स्वीकार किया गया। इस घोषणापत्र में मनुष्य को विकास के केंद्र में स्थापित करने वाली प्रस्तावना और 10 अनुच्छेद हैं। इनमें से पहले, दूसरे और छठे अनुच्छेदों की घोषणाएँ इस प्रकार हैं---

अनुच्छेद-1 : “विकास का अधिकार अनाहरणीय मानव-अधिकार है, जिसके बल पर प्रत्येक व्यक्ति और सभी लोग उसमें भागीदारी करने एवं योगदान करने के हकदार होते हैं और आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनैतिक विकास का उपभोग करते हैं, जिनके भीतर समस्त मानवाधिकार तथा आधारभूत स्वतंत्रताएँ पूरी तरह मूर्त हो सकती हैं।” (धारा-1)

अनुच्छेद-2 : “मानव-अधिकारों और आधारभूत स्वतंत्रताओं के पूर्ण सम्मान, साथ ही साथ समाज के प्रति जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए वैयक्तिक एवं सामूहिक रूप में सभी व्यक्तियों का विकास के प्रति दायित्व है, जिसके माध्यम से स्वतंत्र और संपूर्ण मनुष्य होने को सुनिश्चित किया जा सकता है; इसीलिए लोगों को विकास के लिए एक समुचित राजनैतिक, सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था-क्रम को प्रोत्साहित एवं संरक्षित करना चाहिए।” (धारा-2)

अनुच्छेद-6 : “सभी मानव-अधिकार और आधारभूत स्वतंत्रताएँ अविभाज्य एवं परस्पराश्रित हैं, अत: नागरिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को लागू करने, बढ़ावा देने तथा संरक्षित रखने पर समान ध्यान दिया जाना चाहिए और तुरंत प्रभाव से विचार किया जाना चाहिए।“ (धारा-2)

विश्व के सभी नागरिकों को विकास में केंद्रीय महत्व देकर एक नवीन और विकसित विश्व समाज के निर्माण की दिशा में यह संयुक्त राष्टृ संघ का अब तक का सबसे क्रांतिकारी कदम था। इसने सभी राष्ट्रों को इकाई के रूप में और राष्ट्रों के समूह के रूप में अपनी जनता की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक स्थिति में सुधार के लिए प्रेरित किया।

1992 में ब्राजील के रियो-डी-जेनेरियो में वैश्विक जीवन की परिस्थितियों में सुधार और पर्यावरण संरक्षण के साथ सतत विकास हेतु वैश्विक साझेदारी पर 178 राष्ट्रों के बीच सहमति बनी। बीसवीं शताब्दी के समाहार-बिंदु पर सन् 2000 (सितंबर) में संयुक्त राष्ट्र संघ ने न्यूयॉर्क में सहस्राब्दी शिखर सम्मेलन का आयोजन किया। इसमें 189 देशों के हस्ताक्ष्ररों वाला ‘संयुक्त राष्ट्र सहस्राब्दी घोषणापत्र’ (United Nations Millennium Declaration) जारी किया गया। इसका मोटो था, विश्व के लिए भोजन (Food for Life Global), जो सभी राष्ट्रों के बीच एक ऐसी वैश्विक- साझेदारी का प्रारंभ-बिंदु माना गया, जिसका लक्ष्य सन् 2015 तक दुनिया की सबसे गरीब जनता की गरीबी को मिटाना था।

मूल उद्देश्य की पूर्ति के लिए सन् 2002 में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव द्वारा सहस्राब्दी परियोजना जारी की गई और प्रो. जैफरे सॉकस की अध्यक्षता वाली एक स्वतंत्र समिति ने एक विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसके आधार पर आठ लक्ष्य निश्चित किए गए--- अधिकतम निर्धनता और भूख का निराकरण, सार्वभौमिक स्तर पर प्राथमिक शिक्षा की सुविधा, लैंगिक समानता को बढ़ावा और महिला सशक्तीकरण, बाल मृत्यु दर में कमी, मातृ-स्वास्थ्य में सुधार, एचआईवी/एड्स, मलेरिया और अन्य रोगों के विरुद्ध अभियान, पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करना, विकास के लिए वैश्विक साझेदारी। इन्हें ‘सहस्राब्दी विकास लक्ष्य’ (Millennium Development Goels संक्षेप में MDGs-8) कहा गया।

तमाम प्रयासों के बावजूद आर्थिक, भू-राजनैतिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों में तेजी से आने वाले परिवर्तनों के कारण संयुक्त राष्ट्र सहस्राब्दी घोषणापत्र में निर्धारित अवधि में सहस्राब्दी विकास लक्ष्य प्राप्त करने की दिशा में अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। इस सच का साक्षात्कार करने के परिणामस्वरूप सतत विकास शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। न्यूयॉर्क में सन् 2015 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 25 से 27 सितंबर तक आयोजित ‘सतत विकास शिखर-सम्मेलन’ में 193 सदस्य राष्ट्रों ने ‘सतत विकास के लिए एजेंडा- 2030’ स्वीकार किया था। इस शिखर-सम्मेलन का प्रातिपदिक (थीम) था--- हमारी दुनिया का रूपांतरण : सतत विकास के लिए कार्यसूची- 2030 (Transforming our world : The 2030 Agenda for Sustainable Development)|

इस अधिवेशन में सतत विकास कार्य-योजना के लक्ष्य प्राप्त करने की अवधि 1 जनवरी, 2016 से सन् 2030 निर्धारित की गई। सतत विकास एजेंडे में 17 लक्ष्य रखे गए--- निर्धनता उन्मूलन, भूख से मुक्ति, अच्छा स्वास्थ्य और जीवन-स्तर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, लैंगिक समानता, शुद्ध जल और स्वच्छता, किफायती और स्वच्छ ऊर्जा, संतोषजनक कार्य और आर्थिक विकास, उद्योग, नवाचार और बुनियादी ढाँचा, न्यूनतम असमानताएँ, संपोषित नगर और समुदाय, उत्तरदायित्वपूर्ण उपभोग एवं उत्पादन, जलवायु-कार्रवाई, जलीय-जीवन, स्थलीय-जीवन, शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएँ, लक्ष्य प्राप्ति के लिए साझेदारी। इन्हें प्रकृति के आधार पर वर्गीकृत करके पाँच लक्ष्य-वर्ग निर्धारित किए गए, जिन्हें सतत विकास के “5-पी” कहा गया, ये हैं--- जन (पीपल), ग्रह (प्लेनेट), समृद्धि (प्रोस्पैरिटि), शांति (पीस) और साझेदारी (पार्टनरशिप)।

(अध्ययन-स्रोत : United Nations Human Rights, Genaral Assembly Resolution 41/128, 04 December, 1986) तथा (https://www.coursera.org/lecture/sustainable-development-ban-ki-moon/summary-jvkbc)।


2. पार-ज्ञानानुशासनिक अध्ययन एवं शोध
       Trans-Disciplinary Studies and Research

पार-ज्ञानानुशासनिक अध्ययन और शोध का संबंध ज्ञानानुशासनों की सीमा के परे एक ऐसी समग्रतावादी दृष्टि से है, जो ज्ञानानुशासनों की सीमाओं को खंडित करके अस्तित्व में आती है। यह नवाचारी दृष्टि ज्ञानानुशासनों की सीमा के बाहर ज्ञान की एकता की पहचान सुनिश्चित करती है। पार-ज्ञानानुशासनिक अध्ययन-दृष्टि वैज्ञानिक ज्ञान और पूर्वजीय ज्ञान-चेतना के बीच संबंध की खोज करती है और ऐतिहासिक विकास की दशाओं, वर्तमान विश्व की समझ, प्रकृति, आध्यात्मिकता व रहस्यवादी अनुभवों, कला और सौंदर्य के मानदंडों, सांस्कृतिक वैविध्य तथा भाषा को अध्ययन के अनिवार्य कारकों के रूप में स्थापित करती है। यह भी ध्यान रखना होगा कि पार-ज्ञानानुशासनिक अध्ययन व शोध कोई ‘परम ज्ञानानुशासन’ नहीं है, बलि वह बहुल ज्ञानानुशासनिकता और अंतरज्ञानानुशासनिकता का ही विकसित रूप है। पार-ज्ञानानुशासनिकता की प्रकृति को दर्शाने वाली प्रमुख शब्दावली है--- मुक्त विमर्श, अभिमत वैविध्य, ज्ञान का रूपांतरण, यथार्थ के विविध स्तर, समग्रतावादी दृष्टिबोध, ज्ञानानुशासनों की सीमाबंदी के बाहर समस्याओं की समझ, ज्ञानानुशासनों के ढाँचे के पार ज्ञान का एकत्व, वर्तमान विश्व और उसे प्रभावित करने वाली जटिलताओं का साक्षात्कार, वैज्ञानिक ज्ञानानुशासनों और पारंपरीण पूर्वजीय प्रज्ञा से उद्भूत ज्ञान-मीमांसाओं के बीच संबंध, सामाजिक बोध और विज्ञान के बीच निकटता पर आधारित सतत विकास की संभाव्यता, अध्ययन तथा शोध की नीतियों में प्रभावित वर्गों का समावेश, हस्तक्षेप व सहभागिता आदि।

पार-ज्ञानानुशासनिकता की अवधारणा सन् 1970 के काल में जीन पियागेट (Jean Piaget) ने प्रस्तुत की थी। 1987 में ‘अंतरराष्ट्रीय पार-ज्ञानानुशासनिक शोध केंद्र’ (International Centre for Transdisciplinary Research) ने उनकी अवधारणा को स्वीकार किया। सन् 1994 में पुर्तगाल में पहली पार-ज्ञानानुशासनिक विश्व कांग्रेस आयोजित की गई। सन् 2003 में जर्मनी के गॉटिंगेन विश्वविद्यालय में पार-ज्ञानानुशासनिक अध्ययन और शोध पर केंद्रित संगोष्ठी आयोजित की गई। भारतवर्ष में सन् 2010 के काल में पार-ज्ञानानुशासनिकता पर चर्चा प्रारंभ हुई। कुछ वर्ष बाद विश्वविद्यालयों ने अपने शोध कार्यक्रमों में अंतरानुशासनिक अध्ययन के साथ पार-ज्ञानानुशासनिक अध्ययन को भी शामिल करने पर ध्यान दिया। इस प्रकार अध्ययन और शोध की यह नवाचारी अवधारणा आगे बढ़ती रही।

पार-ज्ञानानुशासनिक अध्ययन के बारे में अर्जेंटीना के पाब्लो टिगानी (Pablo Tigani) के विचार इस ज्ञानानुशासन की प्रकृति को समझने में सहायता करने वाले हैं--- ‘It is the art of combining several sciences in one person. A Transdiscilpinary is a scientist trained in various academic desciplines. This peson merged all his knowledge into one thick wire. That united knowledge wire is used to solve problems that include many problems. The decision of a transdisciplinary executive is the only one that takes into account the total resolution of a problem without leaving any loose thread.’

पार-ज्ञानानुशासनिक अध्ययन से प्रेरित होकर ‘विशद इतिहास’ (Big History) के नाम से एक प्रयोगात्मक अध्ययन-प्रणाली का विकास हुआ है। इसका अकादमिक प्रयोग लैटिन अमेरिकी और कैरिबियाई देशों, विशेषकर ब्राजील, इक्वाडोर, कोलंबिया, अर्जेंटीना आदि में किया गया है। वहाँ के अध्येताओं ने विभिन्न नृ-जाति समुदायों के अंतर्संबंधों को पार-ज्ञानानुशासनिक मूल्यों के सहारे समझने की कोशिश की है।

(अध्ययन-स्रोत : https://www.hsph.harvard.edu, https://www.cgu.edu,

सोमवार, 30 मई 2022

आंध्रप्रदेश और तेलंगाना की पत्रकारिता



आंध्रप्रदेश और तेलंगाना की पत्रकारिता 

ऋषभ देव शर्मा और गुर्रमकोंडा नीरजा 

भारत के दक्षिणपूर्व समुद्र तट पर अवस्थित अविभाजित आंध्रप्रदेश राज्य (जो अब 2 जून 2014 से आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के रूप में नवगठित हो चुका है) क्षेत्रफल की दृष्टि से 2 जून 2014 तक देश का चौथा और जनसंख्या की दृष्टि से पांचवाँ सबसे बड़ा राज्य था जिसमें तीन क्षेत्र शामिल हैं – तेलंगाना, तटीय आंध्र और रायलसीमा. अविभाजित आंध्रप्रदेश की राजधानी हैदराबाद ही फिलहाल नवगठित दोनों प्रांतों की राजधानी है. आंध्र और तेलंगाना की राजभाषा तेलुगु रही है. उर्दू यहाँ की सहराजभाषा है और हिंदी, मराठी, तमिल, कन्नड़ तथा उड़िया भाषियों की भी यहाँ बड़ी तादाद है. स्मरणीय है कि अविभाजित आंध्रप्रदेश का गठन 1 नवंबर 1956 को तत्कालीन आंध्रप्रदेश के साथ हैदराबाद राज्य के तेलुगु भाषी क्षेत्रों को सम्मिलित करके किया गया था. वर्तमान में आंध्रप्रदेश और तेलंगाना राज्य से तेलुगु, उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी की अनेक पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं. प्रमुख तेलुगु पत्र-पत्रिकाएँ हैं – ईनाडु, आंध्रभूमि, आंध्रप्रभा, आंध्रपत्रिका, आंध्रज्योति, प्रजाशक्ति, साक्षी, वार्ता, सूर्या, नमस्ते तेलंगाना और विशालांध्रा. उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में सम्मिलित हैं – अवाम, इत्तेमाद (डेली), मुंसिफ (डेली), सियासत (डेली), ब्लिट्ज़. राज्य के प्रमुख हिंदी दैनिक पत्र हैं – डेली हिंदी मिलाप और स्वतंत्र वार्ता. साथ ही अनेक पत्रिकाएँ हिंदी में प्रकाशित होती हैं. इनके अलावा अंग्रेज़ी के जिन पत्रों के संस्करण आंध्रप्रदेश से प्रकाशित होते हैं उनमें शामिल हैं – डेक्कन क्रोनिकल, हिंदू, हिंदुस्तान टाइम्स, बिजनस लाइन, इकोनॉमिक टाइम्स, न्यू इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, प्लेज और हंस इंडिया. उल्लेखनीय है कि आंध्रप्रदेश में पत्रकारिता का इतिहास बहुत पुराना है. तेलुगु पत्रकारिता तो 19वीं शताब्दी के दूसरे दशक से ही आरंभ हो गई थी. इसके बाद उर्दू पत्रकारिता का उदय 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दिनों में हुआ जबकि हिंदी पत्रकारिता स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी द्वारा चलाये गए हिंदी प्रचार अभियान के दौर में और खास तौर से ब्रिटिश और निजाम शासन के विरुद्ध आर्य समाज की राष्ट्रीय गतिविधियों के साथ बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक के आरंभिक वर्षों में उदित हुई. 

1. आंध्रप्रदेश की तेलुगु पत्रकारिता 
तेलुगुभाषी प्रांत आंध्रप्रदेश में प्रकाशन की सुविधा और पत्रकारिता के इतिहास का अवलोकन करने से ज्ञात होता है कि ईसाई मिशनरियों के प्रयास से 1747 में तेलुगु में ‘बाइबिल’ का प्रकाशन हुआ. आगे चलकर 1818 में मछलीपट्टनम (बंदरु, जिला कृष्णा) से ‘हितवादी’ और 1835 में बल्लारी से ‘सत्यदूत’ – ये दो तेलुगु पत्रिकाएँ निकलीं जो ईसाई धर्मप्रचार पर केंद्रित थीं. सुरवरम प्रताप रेड्डी ने ‘आंध्रुला सांघिक चरित्र’ (आंध्र का समग्र इतिहास) नामक ग्रंथ में यह सूचित किया है कि 19वीं शताब्दी के मध्य काल में ‘श्रीयक्षिणी’ (साप्ताहिक) प्रकाशित होती थी जिसे उन्होंने तेलुगु भाषा की प्रथम पत्रिका माना है. लेकिन यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय राजनैतिक चेतना और राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी हुई पहली तेलुगु पत्रिका 1838 में मंडिगल वेंकटराय शास्त्री के संपादन में मद्रास से प्रकाशित हुई जिसका नाम था ‘वृत्तांतिनी’. इसमें सरकार से संबंधित टिप्पणी, जुलूस तथा हड़ताल आदि से संबंधित समाचार प्रमुखता से प्रकाशित होते थे. वास्तव में ‘वृत्तांतिनी’ को पहली देसी तुलुगु पत्रिका होने का गौरव प्राप्त है. (डॉ.बालशौरि रेड्डी, ‘तेलुगु पत्रिकला चरित्र’, (तेलुगु पत्रिकाओं का इतिहास), एमएसको बुक्स, हैदराबाद, 2010).

1842 में पुव्वाड वेंकटराव के संपादकत्व में ‘वर्तमान तरंगिणी’ का प्रकाशन आरंभ हुआ जो आठ वर्ष तक चला. इस पत्रिका को संस्कृत महाकाव्यों का तेलुगु अनुवाद प्रकाशित करने का श्रेय है. इसके अतिरिक्त 1848 में ‘हितवादी’ और ‘दिन वर्तमान’ जैसी पत्रिकाएँ निकलनी शुरू हुईं जिनमें क्षेत्रीय समाचारों के साथ साहित्यिक विषयों का भी समावेश होता था. उल्लेखनीय है कि 1862 में पूर्णरूप से साहित्यिक, शैक्षणिक और वैज्ञानिक विषयों को समर्पित मासिक पत्रिका ‘सुजन रंजनी’ आरंभ हुई जो बाद में त्रैमासिक हो गई. 1863 में बल्लारी से ‘श्रीयक्षिणी’ तथा 1865 में मद्रास से ब्रह्मसमाज की पत्रिका ‘तत्वबोधिनी’ का प्रकाशन आरंभ हुआ. इन पत्रिकाओं ने विदेशी धर्मप्रचार का सामना करने के लिए भारतीय दर्शन, धर्म, निष्ठा, स्वाभिमान, राष्ट्रभक्ति और समाज सुधार पर ध्यान केंद्रित किया. ये पत्रिकाएँ अंग्रेज़ों के अत्याचार के विरुद्ध भी खुलकर लिखतीं थीं. (चर्ल अन्नपूर्णा, तेलुगु पत्रकारिता (आलेख), भारतीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन, 2000, (सं.) दिलीप सिंह और ऋषभ देव शर्मा). इस अवधि की एक अन्य पत्रिका थी ‘आंध्र भाषा संजीवनी’. इसमें भी साहित्य, समाज और राजनीति विषयक लेख और समीक्षाएँ प्रकाशित होती थीं. तेलुगु भाषा के विकास में इस पत्रिका का योगदान अत्यंत महवपूर्ण है. तेलुगु पत्रकारिता के प्रथम दौर की इन सभी पत्रिकाओं ने सामाजिक, राजनैतिक और राष्ट्रीय चेतना को उद्बुद्ध करने के साथ साथ आंध्र क्षेत्र के नए लेखकों को प्रोत्साहित करने का बड़ा काम किया. यहाँ ‘पुरुषार्थ प्रदायिनी’ (1872 से प्रकाशित/ (सं) उमा रंगनायकुलु), ‘स्वधर्म प्रकाशिनी’, सुधीरंजनी’ और ‘सकल विद्याभिवर्धिनि’ का भी उल्लेख किया जा सकता है जिनमें तेलुगु मुहावरे, लोकोक्तियाँ, प्राचीन सूक्तियाँ और ऐतिहासिक गाथाएं प्रकाशित होती थीं. 

1874 में आधुनिक तेलुगु भाषा के सुधार आंदोलन के प्रवर्तक कंदुकूरि वीरेशलिंगम द्वारा राजमहेंद्री से प्रकाशित ‘विवेकवर्धनि’ के साथ तेलुगु पत्रकारिता के नए युग का सूत्रपात हुआ. “वहीं से उन्होंने सन 1874 में ‘विवेकवर्धनि’, सन 1883 में ‘सतीहितबोधिनि’, सन 1892 में ‘सत्यसंवर्धनि’, सन 1905 में ‘सत्यवादिनि’ नामक पत्रिकाओं का क्रमश: प्रकाशन किया और सामाजिक परिवर्तन तथा राष्ट्रीय जागरण के प्रधान आधार के रूप में इन्हें स्थापित किया. इतना ही नहीं उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि लोगों की रुचि ही समाचार पत्र की असली पूंजी है. उस समय की प्रगतिविरोधी शक्तियों, मठाधीशों, धोखेबाजों और गुंडों की भी उन्होंने अच्छी ख़बर ली. उनकी पत्रिकाओं से ये असामाजिक तत्व थर-थर कांपते थे.” (वही) 

यहाँ किसी अंग्रेज़ी पत्रिका के प्रथम तेलुगुभाषी संपादक के रूप में प्रतिष्ठित नेल्लूर वासी दामपुरी नरसैया का उल्लेख आवश्यक है. उन्होंने अंग्रेज़ी में मद्रास से ‘द नेटिव एडवोकेट’ (साप्ताहिक) का संपादन किया. साथ ही अनेक समाज सुधारकों तथा ब्रह्म समाज से प्रभावित होकर 1871 में नेल्लूर से ‘नेल्लूर पायोनियर’ का प्रकाशन किया. उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर 1881 से’ 1897 तक की अवधि में ‘पीपुल्स फ्रेंडली’ (अंग्रेज़ी साप्ताहिक) का प्रकाशन किया. दामपुरी नरसैया को तेलुगु के प्रथम साप्ताहिक ‘आंध्र भाषा ग्राम वार्तामणि’ के प्रकाशन का भी श्रेय प्राप्त है जिसे उन्होंने ग्रामीण, निर्धन और दलित समुदाय के हितों के लिए समर्पित किया. 

1876 में वी.कृष्णमाचार्युलु के संपादकत्व में मद्रास स्कूल बुक एंड वर्नाकुलर लिटरेचर सोसाइटी की ओर से मद्रास से प्रथम बालोपयोगी तेलुगु पत्रिका ‘जनविनोदिनि’ निकली. इस अवधि की अन्य उल्लेखनीय पत्रिकाएँ हैं - ‘शशिरेखा’ (1874 से/ मद्रास/ (सं) गटुपल्लि शेषाचार्युलु), ‘आंध्रप्रकाशिका’ (1885 से/ (सं) ए.वी.पार्थसारथी नायुडु), ‘देशाभिमानी’ (मासिक) (1890 से/ बेजवाड़ा (विजयवाडा) : (सं) देशगुप्तम शेषाचलपति द्वारा आरंभ यह पत्र आगे चलकर दैनिक हो गया. अतः ‘देशाभिमानी’ को तेलुगु का प्रथम दैनिक समाचार पत्र माना जाता है), ‘मनोहारिणि’ (नरसापुर/ (सं) अखिलन), ‘चिंतामणि’ ((सं) न्यायपति सुब्बाराव). तेलुगु पत्र-पत्रिकाओं के इतिहास में स्त्री संबंधी प्रथम पत्रिका के रूप में ‘सतीहितबोधिनि’ (सं. वीरेशलिंगम पंतुलु) के अतिरिक्त स्वयं महिलाओं द्वारा संपादित ये पत्रिकाएँ भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं – ‘सौंदर्यवल्ली’ (मद्रास/ (सं) श्रीमती रामबाई), ‘हिंदू सुंदरी’ (काकीनाडा/ (सं.) मोसलिकंटि रामबायम्मा), ‘सावित्री’ (सं. पुलुगुर्ति लक्ष्मी नरसमाम्बा), ‘अनसूया’ (सं. विन्जमूरि वेंकट रत्नम्मा). 

बीसवीं शताब्दी में तेलुगु पत्रकारिता का बहुमुखी विकास हुआ तथा इसके माध्यम से “व्यावहारिक भाषा” को लोकप्रियता प्राप्त हुई. राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के युग में देशभक्त कोंडा वेंकटप्पय्या (1902, बंदरु – कृष्णा पत्रिका), चिलकमर्ती लक्ष्मी नरसिम्हम (मनोरमा – 1906, देशमाता – 1910) और मुट्नूरी कृष्णाराव (1907 से कृष्णा पत्रिका के संपादक) जैसे पत्रकारों के नाम प्रमुख हैं. 1905 में “वंदेमातरम आंदोलन” के प्रबल होने पर तेलुगु पत्रकारिता में राष्ट्रीयता का जमकर विकास हुआ. अंग्रेज़ विरोधी तेवर के कारण चिलकमर्ती लक्ष्मी नरसिम्हम (भारतभूमि एक दुधारू गाय है, अंग्रेज़ रूपी चालाक ग्वाले भूखे बछड़े की तरह रोती हुई भारतीय जनता के मुँह को छींके से बाँधकर इस गाय का दूध अपने लिए दुह रहे हैं.) और ‘स्वराज्य’ (1908) के संपादक गाडिचर्ल हरिसर्वोत्तम राव (अरे रे! फिरंगी! क्रूर व्याघ्र!) को जेल यात्रा करनी पड़ी. इस युग में चिल्कूरी वीरभद्रराव ने राजमहेंद्री से ‘आंध्रकेसरी’ और चिल्लरिगि श्रीनिवास राव ने मछलीपट्टनम से ‘नवयुग’ का प्रकाशन किया. जैसा कि ऊपर संकेत किया जा चुका है 1902 में देशभक्त कोंडा वेंकटप्पय्या और दासु नारायण राव द्वारा शुरू की गई ‘कृष्णा’ पत्रिका से 1907 में मुट्नूरि कृष्णा राव संपादक के रूप में जुड़े. इस पत्रिका से अवटपल्ली नारायण राव, पट्टाभि सीतारामैया, कोपल्ले हनुमंता राव और कौता राममोहन शास्त्री भी संबद्ध रहें. 

‘कृष्णा पत्रिका’ के समान ही ‘आंध्र पत्रिका’ ने भी राष्ट्रीय आंदोलन काल में संघर्षशील पत्रकारिता का इतिहास रचा. इसे 1908 में साप्ताहिक के रूप में काशीनाथुनि नागेश्वरराव पंतुलु ने मुंबई से आरंभ किया था. 1914 में इसे दैनिक पत्र के रूप में मद्रास स्थानांतरित कर दिया गया. बाद में दैनिक और साप्ताहिक ‘आंध्र पत्रिका’ के साथ साथ काशीनाथुनि नागेश्वर राव पंतुलु ने साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘भारती’ भी निकाली. पंतुलु के प्रयास से तेलुगु जनता में पठन-पाठन के संस्कार का प्रभूत विस्तार हुआ और उनकी प्रेरणा से अनेक देशभक्त युवक पत्रकारिता के क्षेत्र में आए. स्मरणीय है कि विश्वनाथ सत्यनारायण का विख्यात महाकाय उपन्यास ‘वेयीपडगलु’ (सहस्रफण) ‘आंध्र पत्रिका’ में दैनिक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुआ था. 

“बाद में ‘आंध्र साहिती परिपुष्पत्रिका’ नामक पत्रिका सन 1912 में प्रकाशित हुई. इसी युग में ‘त्रिलिंग’ नामक पत्रिका सन 1916 में निकली. इसी प्रकार सन 1923 में निकली ‘मुत्याला सरस्वती’ नामक पत्रिका ने प्राचीन प्रबंध काव्यों के प्रचार को प्रधानता दी. सन 1924 में प्रकाशित ‘आंध्र सर्वस्वम’ और ‘सारस्वत सर्वस्वम’ आदि पत्रिकाएँ उल्लेखनीय हैं. इसी वर्ष में प्रकाशित ‘प्रबुद्धान्ध्र’ नामक पत्रिका में गिडुगु राममूर्ति जी के व्यावहारिक भाषा वाद को समर्थन मिलता है.” (एल.विश्वनाथ रेड्डी, तेलुगु भाषा के विकास में पत्रिकाओं का योगदान, सहस्र वर्षों का तेलुगु इतिहास, (सं) यार्लगड्डा लक्ष्मीप्रसाद). 

महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन ने तेलुगु पत्रकारों की एक और नई पौध तैयार की. इनमें टंगुटूरी प्रकाशम पंतुलु का नाम शीर्षस्थ है जिन्होंने 1921 में मद्रास से ‘स्वराज्य’ का अंग्रेज़ी, तमिल और तेलुगु में प्रकाशन आरंभ किया. उनके बाद गोविंदराजुलु वेंकट कृष्णा राव ने भी मद्रास से ही ‘नवयुगम’ का प्रकाशन किया. उन्हें तेलुगु के प्रथम साम्यवादी पत्रकार माना जाता है. ‘मातृसेवा’ (1922, ताड़िपत्री से, गाडिचर्ल हरिसर्वोत्तम राव), ‘कांग्रेस’ (1922, राजमहेंद्री, अन्नपूर्णय्या) तथा ‘सत्याग्रही’ (एलुरु, आत्मकूरी गोविंदाचार्युलू) को ब्रिटिश सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा. ‘कांग्रेस’ के कई संपादकों को जेलयात्रा भी करनी पड़ी. राष्ट्रीय आंदोलन को तीव्रतर बनाने में एलुरु से प्रकाशित ‘गान्डीवमु’ और ‘देवदत्तमु’, मद्रास से प्रकाशित ‘जन्मभूमि’ (एक कानी – तीन कौड़ी मूल्य के कारण ‘कानी’ पत्रिका नाम से प्रसिद्ध) तथा नेल्लूरु से प्रकाशित ‘जमीनु रैतु’ (1928) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 

राष्ट्रीय आंदोलन काल में रायलसीमा और तेलंगाना क्षेत्र से भी कई तेलुगु पत्रिकाएँ प्रकाशित हुईं. ‘मातृसेवा’ (ताड़िपत्री), ‘हास्य मंजूषा’ (अनंतपुर), ‘पिनाकिनी’, ‘कौमोदिकी’ (नंदयाल), ‘इंद्रावती’ (सं. वनम शंकर शर्मा), ‘विजयवाणी’ (सं. मूलनारायण स्वामी), ‘ब्रह्मनंदिनी’ (कडपा, (सं.) स्वधानम कृष्णमुनी) रायलसीमा की प्रतिनिधि पत्रिकाएँ रहीं. यहाँ उल्लेखनीय हैं कि तेलंगाना क्षेत्र में तेलुगु पत्रकारिता का विकास अपेक्षाकृत पिछड़ा रहा क्योंकि यह इलाका निजाम शासन में दबा हुआ था. इसके बावजूद ‘हितबोधिनि’ (1913, महबूब नगर), ‘तेलुगु पत्रिका’ (1920, इन्गुर्ति), ‘नीलगिरि’ (नलगोंडा), ‘गोलकोंडा’ (1925, सुरवरम प्रताप रेड्डी) तथा ‘सुजाता’ (1927, (सं.) सुरवरम और मंडपाटि) ने तेलंगाना क्षेत्र की तेलुगु पत्रकारिता को निजी पहचान प्रधान की. आगे चलकर 1933 – 38 की अवधि में तेलंगाना क्षेत्र से ‘देशबंधु’, ‘दक्कन केसरी’, ‘आंध्र वाणी’, ‘तेलुगु तल्लि’ और ‘विभूति’ का प्रकाशन आरंभ हुआ. 1945 में राजगोपाल मुदलियार ने अंग्रेज़ी दैनिक ‘दक्कन क्रोनिकल’ के साथ साथ तेलुगु दैनिक ‘तेलंगाना’ का प्रकाशन आरंभ किया जो बाद में बंद हो गया. उन्होंने ही आगे चलकर ‘आंध्र भूमि’ तेलुगु दैनिक निकाला जो अभी तक चल रहा है. तेलुगु दैनिक ‘मिज़ान’ भी 1945 में हैदराबाद से आरंभ हुआ. इसके अलावा निज़ाम शासकों के शोषण चक्र के विरुद्ध किसानों के क्रांतिकारी आंदोलन के समर्थन में विजयवाडा से ‘प्रजाशक्ति’ (सं. रामानुजराव) का प्रकाशन आरंभ हुआ – यह दैनिक पत्र भी अब तक चल रहा है.). 

तेलुगु पत्रकारिता को उद्योग के रूप में विकसित करने का प्रथम श्रेय 1937 से प्रकाशित समाजवादी पार्टी के पत्र ‘नवशक्ति’ और 1938 से प्रकाशित रामनाथ गोयनका के पत्र ‘आंध्रप्रभा’ को जाता है. विशेष रूप से ‘आंध्रप्रभा’ दैनिक ने तेलुगु पत्रकारिता में अनेक नए आयाम जोड़े. स्वातंत्र्यपूर्व युग की तेलुगु पत्र-पत्रिकाओं में ‘जनवाणी’, ‘प्रतिभा’, ‘गृहलक्ष्मी’, ‘प्रबुद्ध आंध्र’, ‘उदयिनी’, ‘ज्वाला’’, साहिती’, ‘विज्ञानमु’, ‘बाला’ और ‘चंदामामा’ के नाम उल्लेखनीय हैं. इन्होंने तेलुगु के व्यावहारिक भाषारूप को लोकप्रियता प्रदान की तथा साहित्यिक पत्रकारिता, महिला पत्रकारिता, विज्ञान पत्रकारिता और बाल पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया. 

तेलुगु पत्रकारिता के इतिहास से पता चलता है कि 1939 से 42 तक समाजवादी दल द्वारा गुप्त रूप से ‘स्वतंत्र भारत’ का प्रकाशन किया जाता था. इसके अलावा ‘जनता’, ‘संदेशम’, ‘विशालांध्र’, ‘जनवाणी’, ‘नगारा’ जैसी पत्रिकाओं ने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए डटकर संघर्ष किया. ‘विशालांध्र’ 1952 से दैनिक हो गया. ये पत्र-पत्रिकाएँ साम्यवादी विचारधारा का प्रचार करने वाली रहीं. ‘नवयुग’ (युवाओं के लिए), ‘आंध्र वनिता’ (महिलाओं के लिए) ‘वर्कर’ (श्रमिकों के लिए) तथा ‘अभ्युदय’ (प्रगतिशील लेखक संघ) भी प्रगतिशील विचारधारा की विशिष्ट पत्रिकाएँ हैं. 

तेलुगु पत्रकारिता का नया उन्मेष तीन ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा है – भारत की आजादी (1947), आंध्र प्रांत का गठन (1953) और आंध्र प्रदेश का निर्माण (1956). पहले मद्रास से छपने वाले तेलुगु समाचार पत्र अब आंध्र प्रदेश में छपने लगे. आंध्रप्रभा (1959), आंध्रपत्रिका (1965), आंध्रज्योति (1967), प्रभा और ज्योति आदि सचित्र दैनिक और साप्ताहिक पत्र एकाधिक केंद्रों से प्रकाशित होने लगे. 1974 में विशाखपट्टनम से और 1975 में हैदराबाद से ‘ईनाडु’ दैनिक का प्रकाशन आरंभ हुआ. 

वर्तमान में आंध्रप्रदेश भर से तेलुगु की लगभग 500 पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं. इनमें प्रसार संख्या की दृष्टि से ईनाडु, आंध्रज्योति, आंध्रभूमि पहले तीन स्थानों पर हैं. वर्तमान उपलब्ध प्रमुख तेलुगु दैनिक समाचार पत्र हैं – आंध्रभूमि, आंध्रज्योति, आंध्रपत्रिका, ईनाडु, ईमाता, वार्तलु, आंध्रप्रभा, विशालांध्रा, प्रजाशक्ति, विजेता, वार्ता, साक्षी, सूर्या, नेटि तेलंगाना. साप्ताहिक तेलुगु पत्रिकाओं में आंध्रभूमि, आंध्रज्योति, आंध्रप्रभा, स्वाति, चित्रभूमि, ज्योतिचित्र, मयूरी, सितारा, शिवरंजनी, इंडिया टुडे (तेलुगु), रचना, कृष्णा पत्रिका, प्रतिभा, प्रगति के नाम उल्लेखनीय हैं. तेलुगु की मासिक पत्रिकाओं के अंतर्गत मुख्य रूप से अन्नदाता, चतुरा, स्वाति, उद्योग विजयालु, विपुला, चतुरा, आंध्रभूमि, प्रजासाहिती, पालपिट्टा, प्रतिबिंबम, माभूमि, गमनम, ग्रामस्वराज्यम, अभिनय, मनिदीपम, चिनुकु, प्रजाशक्ति, उज्वला, कापुमित्रा, कापुसत्ता, कापुयुवता, भूमिका, महिलाज्योति, माधुरी-2, रैतुनेस्तम, रैतुमित्रा, आंध्रप्रदेश, मयूरी अत्यंत उपयोगी पत्रिकाएँ हैं. इसके अतिरिक्त वेदांतभेरी, शुभवार्ता, सप्तगिरी, सनातन सारथी, अक्षरमैथिली, उषश्री, सनमार्गामु, भक्तिप्रपंचम, ज्ञानभूमि, मणिदीपम, पुण्यक्षेत्रालु, तिरुपति, ओंकारवेदमु, ऋषिपीठमु आदि आध्यात्मिक वर्ग की तेलुगु पत्रिकाओं के रूप में उल्लेखनीय है. फिल्म पत्रकारिता भी तेलुगु में अत्यंत लोकप्रिय हैं. इस कोटि की मुख्य पत्र-पत्रिकाएं हैं – सितारा (1976, मासिक), चलनचित्र (1973, मासिक), सिनी सम्राट (1997), स्टार डिटेक्टिव (1998, पाक्षिक), सिनिमा चांस (1998), संतोषम (2002, साप्ताहिक), उल्लासम (2003, मासिक), सुमांजलि (2003, साप्ताहिक), केमेरा (2003, साप्ताहिक), सिनी गूढ़ाचारी (1987, साप्ताहिक), सिनेमा (1984, मासिक), सिनीरमा (1976), ज्योतिचित्रा (1977), चित्रभूमि (1980, साप्ताहिक), सिनीविनोदमु (2002, तेलुगु – हिंदी साप्ताहिक), चित्रांजलि (2001, साप्ताहिक), चित्रम (2001, साप्ताहिक), मूवी लैंड्स (2002, साप्ताहिक), मा (1998, मासिक), शिवरंजनी (1986, मासिक; 1997, साप्ताहिक), मेघसंदेशम (1997, साप्ताहिक), सिनी मार्जिन (1986, साप्तहिक) और आंध्रभूमि (सिनेमा – 1981, साप्ताहिक). इसी प्रकार प्रमुख तेलुगु बालपत्रिकाओं में चंदामामा, बंगारुबोम्मा (1976, मासिक), चिन्नारीलोकम (1985, मासिक), आंध्रबाला (1995, मासिक), बाल जोजो वेन्नला (2000, मासिक), चिन्नारुलु (2002, मासिक), सिसिंद्रीलु (2006, मासिक) और बालतेजम (2006) के नाम सम्मिलित हैं. 

तेलुगु पत्रकारिता के इतिहास की सबसे नई ऐतिहासिक परिघटना के रूप में फरवरी 2004 से आरंभ पहले वैश्विक तेलुगु समाचार पत्र के प्रकाशन का उल्लेख किया जा सकता है. ‘तेलुगु टाइम्स’ के नाम से प्रकाशित यह समाचार पत्र भारत और विदेशों के मीडिया और व्यवसाय जगत के अनुभवी पत्रकारों द्वारा चलाया जा रहा है. इसके पृष्ठ तैयार तो हैदराबाद के कार्यालय में किए जाते हैं लेकिन उन्हें सीधे अमेरिका स्थित प्रेस को प्रेषित कर दिया जाता है और उन्हें वहीं में मुद्रित और वितरित किया जाता है. वास्तव में ‘तेलुगु टाइम्स’ का प्रकाशन उत्तरी अमेरिका में बसे हुए पांच लाख प्रवासी तेलुगुभाषियों की मीडिया और जनसंचार संबंधी अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए आरंभ किया गया है. 

2. आंध्रप्रदेश की उर्दू पत्रकारिता 
आंध्रप्रदेश में पत्रकारिता के इतिहास का दूसरा आयाम उर्दू पत्रकारिता से संबंधित है. आंध्रप्रदेश की प्रथम उर्दू पत्रिका का प्रकाशन 1857 ई में हआ जब आसफ़जाही शासन के दौरान हैदराबाद से स्वास्थ्य संबंधी पत्रिका ‘तिबाबत’ निकली. आजे चलकर 1860 में काज़ी मोहम्मद क़ुतुब के संपादन में हैदराबाद का पहला उर्दू समाचार पत्र ‘आफ़ताब दक्कन’ आरंभ हुआ जो वास्तव में हैदराबाद की सभ्यता, संस्कृति और विभिन्न प्रकार की सामाजिक, आर्थिक, साहित्यिक और राजमहल संबंधी गतिविधियों की सूचनाएँ जनता को देने का माध्यम बना. इसी प्रकार 1869 से 1948 तक हैदराबाद राज्य के गजट के प्रकाशन की भी जानकारी मिलती है. ‘आफ़ताब दक्कन’ (1860) के अलावा ‘खुर्शीद दक्कन’ (1877) को भी इस राज्य का पहला उर्दू समाचार पत्र माना जाता है. प्रथम उर्दू ‘दैनिक’ समाचार पत्र के स्थान के भी दो दावेदार हैं. पहला 1883 में सुल्तान मोहम्मद आकिल देहलवी द्वारा संपादित ‘खुर्शीद दक्कन’ तथा दूसरा 1888 में हाजी करतान द्वारा संपादित ‘शौकत उल इस्लाम’. 19वीं शताब्दी के अंतिम पच्चीस वर्षों में प्रकाशित अन्य उर्दू पत्रों में शामिल हैं ‘अखबार आसफी’ (1885), ‘अफ़सर उल अखबार’ (1886) और ‘अफ़सर’ (1897). 

‘भारतीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन’ (2000) में सम्मिलित ‘उर्दू पत्रकारिता’ विषयक निबंध में नेहपाल सिंह वर्मा यह जानकारी दी है कि “हैदराबाद के पत्रकारिता जगत के सबसे महत्वपूर्ण समाचार पत्र ‘मुशीर दक्कन’ का संपादन 1892 ई. में स्व. किशनराव ने किया. उर्दू पत्रकारिता के क्षेत्र में शायद ही कोई दूसरा समाचार पत्र इतना पुराना इतिहास रखता है. यह पत्र 22 अप्रैल 1892 से 10 दिसंबर 1898 ई. तक नियमित प्रकाशित होता रहा. कुछ दिन बंद रहा. पुनः 1899 ई. से प्रकाशित होने लगा. 1898 ई. में आपत्तिजनक निबंध के प्रकाशन के आरोप में किशनराव को शहर से निकाल दिया गया. उन्होंने इसे मद्रास से निकाला और फिर 1899 ई. से इसे पुनः हैदराबाद से प्रकाशित किया. 1902 ई. में सादिक़ हुसैन ने ‘इल्म व अमल’ प्रकाशित किया. 1901 ई. में समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं की संख्या 14 थी जिनमें 12 उर्दू के और 2 मराठी के थे. इनमें सात दैनिक पत्र थे. इनमें ‘मुशीर दक्कन’ ही ऐसा दैनिक पत्र था जो 1970 ई. तक प्रकाशित होता रहा. इस दैनिक ने पत्रकारिता को एक नया रूप दिया. उस समय लोगों की राजनैतिक समाचारों में रुचि कम थी, कोई संवादवाहिनी संस्था नहीं थी. बादशाह को ईश्वर के बाद शक्ति का अवतार मानते थे. ऐसे समय 1904 ई. में मोहब हुसैन ने ‘इल्म व अमल’ जारी किया. यह वह समय था जब राष्ट्रीय कांग्रेस की हवा हैदराबाद पहुँच गई थी. केशवराव कोरटकर, वामन नायक, मुल्ला अब्दुल कय्यूम, डॉ.रघुनाथ चट्टोपाध्याय, पं. तारानाथ, बैरिस्टर श्री किशन और बैरिस्टर मोहम्मद असगर ने निजाम राज्य में जनजागृति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण लेख लिखे.” ‘मुशीर दक्कन’ को पत्रकारिता के मूल्यों की स्थापना का श्रेय दिया जाता है.” (नेहपाल सिंह वर्मा, ‘उर्दू पत्रकारिता’ (आलेख), भातरीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन, पृ.109). 

आगे चलकर 1911 में ‘मुआरिफ’ (मुल्ला अब्दुल बासित) और ‘उस्मान गजट’ (सैयद राजा शाह) के अतिरिक्त ‘सहीफ़ा’ ने पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त की. इस पत्र ने साहित्यिक वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. बताया जाता है कि निजाम मीर उस्मान अली खान की उत्तर भारत की यात्रा के अवसर पर उनके साथ गए अकबर अली द्वारा प्रेषित ताज़ा समाचारों के कारण ‘सहीफ़ा’ को यह लोकप्रियता मिली. 1920–1948 की अवधि में अहमद मोहिउद्दीन द्वारा ‘रहबर दक्कन’ का प्रकाशन किया गया जो मजलिस इत्तहाद उल मुसलमीन का धार्मिक पत्र था. बाद में इसका नाम ‘रहनुमाये दक्कन’ कर दिया गया जो मुसलमानों और मुस्लिम धर्म के पक्षधर पत्र के रूप में आगे भी प्रकाशित होता रहा. 

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि रजाकार आंदोलन (1948) के कारण उत्पन्न विषम परिस्थितियों ने इस राज्य में हिंदू-मुस्लिम एकता के वातावरण को बहुत क्षति पहुँचाई तो आर्य समाज के आंदोलन ने राष्ट्रीय चेतना को शक्ति प्रदान की. “उस समय ‘रहबर दक्कन’, रैयत’ और ‘पयाम’ महत्वपूर्ण पत्र थे. सरकार ने जब देखा कि ‘रैयत’ राष्ट्रीयता का प्रचार कर रहा है तो उस पर रोक लगा दी गई. एम.नरसिंह राव, संपादक ने समाचार पत्र ही बंद कर दिया. ‘रैयत’ के बंद होते ही बी.रामकिशन राव और एम.नरसिंह राव (जो बाद में मुख्यमंत्री और गृहमंत्री हुए) के सहयोग से शोयब उल्लाह खान ने ‘इमरोज’ निकाला. शोयब उल्लाह खान गांधीवादी थे. उन्होंने खुलकर हैदराबाद में हो रहे सांप्रदायिक तांडव का विरोध किया. उन्होंने बादशाह उस्मान अलीखान को सलाह दी कि वह हैदराबाद को भारत में विलय कर देश की कौमी धारा से जुड़ जाएँ और रजाकारों की गतिविधियों को तुरंत बंद करा दें. रजाकारों ने उन्हें जान से मार डालने की धमकी दी और एक दिन जब वह साईकिल से काम कर वापस लौट रहे थे उन पर आक्रमण किया गया. उनका सीधा हाथ काट दिया गया और उन्होंने वहीं सड़क पर अपने प्राण छोड़ दिए. हैदराबाद की पत्रकारिता के इतिहास में यह पहले पत्रकार का बलिदान था, जो रंग लाया और भारत के गृहमंत्री सरदार पटेल को हैदराबाद पर पुलिस एक्शन कर इसे भारत में विलय कराने का कार्य करना पड़ा. उसी समय प्रगतिवादी विचारधारा के दैनिक पत्र ‘पयाम’ (सं. अख्तर हसन) के कार्यालय पर भी आक्रमण किया गया और आग लगा दी गई.” (द्रष्टव्य - नेहपाल सिंह वर्मा, ‘उर्दू पत्रकारिता’, भारतीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन, पृ. 110).

इन सब परिस्थितियों के समानांतर आंध्रप्रदेश की उर्दू पत्रकारिता की यात्रा आगे बढ़ती रही. ‘निजाम गजट’ (1927 : हबीब उल्ला रशदी, विकार अहमद), ‘सुबह दक्कन’ (1928 : अहमद आरिफ़, अली अशरफ़), ‘मज़लिस’ (1948 : हकीम गफ्फार अहमद अंसारी), ‘वक्त’ और ‘मंशूर’ (1928 : अब्दुल रहमान रईस), ‘सल्तनत’ (1930 : अहमद उल्लाह कादरी), ‘पयाम (1935 : काज़ी अब्दुल गफ़ार) के अनंतर 1942 (भारत छोड़ो आंदोलन) से 1948 (हैदराबाद का भारत में विलय) की अवधि में अनेक उर्दू पत्र-पत्रकार सामने आए. जैसे ‘मीज़ान’ (1942 : गुलाम मुहम्मद और हबीब उल्लाह ओज), ‘तन्जीम’ (1942 : अली अशरफ़), ‘इत्तहाद’ (1947 : अब्दुल इहाशमी), ‘मुस्तकबिल’ और ‘तामीर दक्कन’ (फैज़ उद्दीन ‘फैज़’), ‘इन्कलाब’ (मुरतुज़ा मुज्तहदी), ‘मुहबे वतन’ (लक्ष्मी रेड्डी), ‘आवाज़’ (अब्दुल कादर), ‘जिन्नाह’ (अज़हर रजवी), ‘हमदम’ (मुस्तफ़ा कादरी), ‘आगाज़’ (सैयद मोईन उलहक), ‘मंजिल’ (अज़हर रजवी), ‘इखदाम’ (मुरतुजा मुजतहदी), ‘नई जिंदगी’ (जे.एन.शर्मा), ‘शोईब’ (अनीस उलरहमान).

इसमें संदेह नहीं कि 1935 (‘पयाम’) से 1948 (‘इखदाम’) तक की अवधि आंध्रप्रदेश की उर्दू पत्रकारिता के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण रही. “बादशाह के समर्थक समाचार पत्रों में ‘निजाम दक्कन’ और ‘दक्कन’ प्रमुख थे. इन समाचार पत्रों में बादशाह की ओर से नज़री बाग से जारी निजाम के आदेश और फरमान छपते थे, जिन्हें बाद में हर समाचार पत्र को प्रकाशित करना पडता था. ‘रहबर दक्कन’, ‘मजलिस’, ‘इत्तहाद’, ‘जिन्नाह’, ‘आगाज़’ मजलिस के समर्थक समाचार पत्र थे. इन पत्रों ने स्वतंत्र हैदराबाद के लिए जनमत तैयार किया. ‘रैयत’, ‘पयाम’, ‘वक्त’ और ‘इमरोज़’ प्रजातांत्रिक शासन के लिए आवाज़ उठा रहे थे. ‘पयाम’ ने कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए काम किया. अंततः 1948 ई. में इन समाचार पत्रों का प्रकाशन रंग लाया और हैदराबाद राज्य का भारत में विलय हो गया.” (वही). उल्लेखनीय है कि 1948 में प्रगतिशील पत्रकार मुरतुजा मुज्तहदी द्वारा प्रकाशित ‘इखदाम’ से अनेक प्रगतिशील पत्रकार और लेखक संबंधित रहे जिनमें मखदूम मोहिउद्दीन और राज बहादुर गौड़ भी सम्मिलित थे. मुरतुजा ने 1950 में ‘अंगारा’ निकाला जिसके बंद होने पर मोईन फारुकी ने ‘अंगारे’ का प्रकाशन किया. 

1948 के बाद की अवधि में अर्थात निजामशाही के समापन के बाद अनेक नए उर्दू पत्र सामने आए जिनमें उल्लेखनीय हैं ‘नई जिंदगी’ (जे.एन.शर्मा), ‘हमदर्द’ (नक्श आलमी), ‘हमदम’ (जमाल उद्दीन और मुस्तफा कादरी), ‘ताजयाना’ (सआदत जहां), ‘हमारा इखदाम’ (शहरयार), ‘नया ज़माना’ (असद जाफ़री), ‘सल्तनत’ (सादउल्लाह कादरी), ‘पैसा अखबार’ (अहमद उल्लाह कादरी), ‘अंगारे’ (मोईन फारुकी), ‘वतन’ (रशीद बेग), ‘अमर भारत’ (पूरनचंद शाकिर), ‘सदाकत’ (वही उलहसन), ‘ज़बीह’ (इस्माईल ज़बीह), ‘हक’ (शेख चाँद), ‘नवीद दक्कन’ (अज़ीम अस्कंरी), मुंसिफ (महमूद अंसारी), ‘खून नाव’ (जी.एम.उरूज) आदि. इनके अलावा 1948 से हैदराबाद से ‘मिलाप’ (दैनिक उर्दू पत्र) निकला जिसके संपादक युद्धवीर थे. अपनी राष्ट्रीय चेतना और आर्य समाजी विचारधारा के कारण इसे हिंदुओं में खूब लोकप्रियता प्राप्त हुई. अब यह पत्र बंद हो चुका है. 

हैदराबाद की उर्दू पत्रकारिता के इतिहास में ‘सियासत’ का अपना विशिष्ट स्थान है. इसे आबिद अली खान ने महबूब हुसैन ‘ज़िगर’ के साथ मिलकर 15 अगस्त 1949 से उर्दू दैनिक के रूप में आरंभ किया. वर्तमान में दैनिक ‘सियासत’ के साथ साथ मासिक ‘सियासत’ का भी प्रकाशन किया जाता है. इस पत्र को प्रगतिशील विचारधारा के लिए जाना जाता है. दैनिक ‘सियासत’ के वर्तमान संपादक है जाहिद अली खान. इसके जैसी ही लोकप्रियता ‘मुंसिफ’ को भी प्राप्त है जिसे महमूद अंसारी ने आरंभ किया था और अब भारतीय अमेरिकी खान लतीफ़ द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है. 

इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि आंध्रप्रदेश की पत्रकारिता में उर्दू पत्रों और पत्रकारों का योगदान अविस्मरणीय है. यहाँ अंत में यह जोड़ना भी प्रासंगिक होगा कि शीर्षस्थ उर्दू पत्रकार जाहिद अली खान और नसीम आरिफी यह मानते हैं कि उर्दू मीडिया में अभी संसाधनों और प्रोफेशनलिज्म की कमी है जिसके कारण वह कुछ हद तक पिछड़ा हुआ है. इसके बावजूद वह बड़ी सीमा तक उर्दू भाषी जनता और आंध्रप्रदेश के प्रशासन के मध्य सेतु की भूमिका निभा पा रहा है. यहाँ राज्यपाल और मुख्यमंत्री के समक्ष अंग्रेज़ी और तेलुगु के अखबारों के साथ साथ उर्दू अखबारों की क्लिपिंग भी प्रस्तुत की जाती हैं. आज ‘सियासत’ दुनिया के 107 देशों में पढ़ा जाता है लेकिन यह अवश्य चिंतनीय है कि नई पीढ़ी का उर्दू के प्रति झुकाव काफी कम होता जा रहा है. 

3. आंध्रप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता 
आंध्रप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता का इतिहास पर्याप्त रोचक है तथा इस प्रांत के हिंदी प्रेम और राष्ट्रीयता का द्योतक भी. पत्रकारिता के इतिहास संबंधी शोधकर्ताओं ने इस तथ्य पर विस्मय प्रकट किया है कि जहाँ एक ओर हिंदी विरोधी समझे जाने वाले मद्रास प्रांत में हिंदी पत्रकारिता को हिंदी प्रचार के साथ जुड़कर विकसित होने का अनुकूल वातावरण मिला, वहाँ उर्दू को प्रमुखता देने वाला और दक्खिनी हिंदी को अपनाने वाला निजाम द्वारा शासित हैदराबाद प्रांत हिंदी पत्रकारिता के रास्ते में काँटे बिछाने वाला बना. इसके बावजूद यह भी रेखांकित किया गया है कि हिंदी पत्रकारिता का जो रूप हमें दक्षिण भारत में देखने को मिलता है वह अन्यत्र नहीं मिल सकता क्योंकि यहाँ हिंदी देशप्रेम की संवाहिका बनकर आई और भावों की संवाहिका कुछ देर से बनी. डॉ.गोपाल शर्मा ने हैदराबाद के प्रमुख हिंदी पत्रकार मुनींद्र जी के अमृतोत्सव के अवसर पर दिलीप सिंह और ऋषभ देव शर्मा के संपादकत्व में प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ ‘भारतीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन’ (2000) के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए अपने शोधपूर्ण निबंध ‘दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता’ में दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को चार कालों में विभक्त किया है, जिन्हें आंध्रप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता के संदर्भ में ज्यों-का-त्यों स्वीकार किया जा सकता है. यही नहीं उनके द्वारा प्रस्तुत सूचनाएँ और विश्लेषण भी अत्यंत प्रामाणिक हैं जिन्हें हम यहाँ आभार सहित इस्तेमाल कर रहे हैं. आंध्रप्रदेश में हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को जिन चार कालखंडों में बाँटा जा सकता है, वे हैं –
1. उद्भव काल (सन 1947 से पूर्व)
2. विकास काल (सन 1948 से 1972 तक)
3. नव निर्माण काल (सन 1973 से 1998 तक)
4. वर्तमान काल (सन 1999 से....)

स्वातंत्र्यपूर्व काल में स्थानीय राजनैतिक कारणों वश हैदराबाद में निजामशाही के दौरान हिंदी को ‘बगावत की भाषा’ और ‘विदेशी भाषा’ समझा जाने लगा था जबकि उर्दू यहाँ की राजभाषा थी. हिंदी में पत्र-पत्रिका प्रकाशित करने पर पाबंदी थी. 1931 में अर्जुन प्रसाद मिश्र ‘कंटक’ ने ‘भाग्योदय’ नामक मासिक पत्रिका के लिए अनुमति तो प्राप्त कर ली लेकिन भयभीत जनता का सहयोग न प्राप्त कर सके. यही कहानी और भी एक-दो हिंदी पत्रों की है. हिंदी के प्रति शासन के इस विद्वेष का कारण यह था कि यहाँ धार्मिक एवं नागरिक स्वतंत्रता के लिए आर्य समाज शासन से टकराव मोल लेता रहता था. आर्य समाज के प्रचारक हिंदी का प्रयोग करते थे अतः उनके प्रभाव को कम करने के लिए हिंदी भाषा और हिंदी पत्रकारिता को लगातार दबाया जाता था. आर्य समाजियों ने हैदराबाद की जनता के लिए बाहर से पत्र प्रकाशित करने शुरू किए, एक ऐसा ही पत्र सोलापुर से निकला. ‘आर्य संदेश’ नामक इस पत्र में जनता को न्याय-पथ पर चलने की सलाह दी जाती थी और हैदराबाद के शासन के खिलाफ संघर्ष करने के लिए तैयार किया जाता था. इस पत्र के संपादकद्वय त्रिलोकी नाथ शास्त्री और राम देव ने ‘आर्य संदेश’ को राजनीतिक चेतना फैलाने के लिए प्रयोग किया. इस पत्र का मुख्य संदेश आज भी हैदराबाद के बुजुर्गों को याद है : ‘उठ बाँध कमर, क्यों डरता है – फिर देख प्रभु क्या करता है.’ यह पत्र दो वर्ष तक भी न चल पाया. चल ही नहीं सकता था. सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया. कई वर्षों तक हैदराबाद राज्य की हिंदी पत्रकारिता में लुका-छिपी का खेल चलता रहा. आर्य प्रतिनिधि सभा अनुमति लेकर पत्र निकालती, सरकार प्रतिबंध लगा देती, इसलिए संपादकों ने कई नामों की अनुमति ले डाली. कभी कोई पत्र नागपुर से छपता, कभी सोलापुर से, कभी पत्र बड़ा होता तो कभी विवरण पत्र मात्र बन जाता. इस समय प्रकाशित पत्रों के नामों की एक लंबी सूची है जैसे आर्यभानु, दैनिक दिग्विजय, सुधाकर, हनुमान, दिवाकर, पताका, वेद प्रकाश, वैदिक ज्योति आदि. कई अन्य पत्रकारों ने भी कोशिश की जैसे बृंदावन विहारी मिश्र ने ‘व्यापार’ नामक पत्र निकाला और अपने आप को विवादों से दूर रखने का प्रयत्न किया. (गोपाल शर्मा, ‘दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता’ (आलेख), भारतीय भाषा पत्रकारिता : एक अवलोकन, पृ. 115). इस प्रकार स्वातंत्र्यपूर्व काल में हैदराबाद में हिंदी पत्रकारिता को अपने अस्तित्व के लिए घोर संघर्ष करना पड़ा. 

स्वातंत्र्योत्तर काल में उपर्युक्त स्थिति में परिवर्तन आया और हैदराबाद नवीन पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन का केंद्र बनकर उभरा. सितंबर 1948 में हैदराबाद राज्य के भारत संघ में विलय के बाद हैदराबाद से नियमित रूप से दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्र निकलने लगे. हैदराबाद से प्रकाशित ‘अजंता’ और ‘कल्पना’ जैसी मासिक पत्रिकाओं ने ‘सरस्वती’ और ‘हंस’ के समान ख्याति अर्जित की. ‘अजंता’ हिंदी प्रचार सभा हैदराबाद द्वारा प्रकाशित की जाती थी. गया प्रसाद शास्त्री, श्यामू संन्यासी, श्रीराम शर्मा, वंशीधर विद्यालंकार, हरिकृष्ण पुरोहित, राजकिशोर पांडेय और भीमसेन निर्मल जैसे दिग्गज इस पत्रिका के संपादक रहे. दूसरी ओर ‘कल्पना’ का प्रकाशन बद्री विशाल पित्ती द्वारा अगस्त 1949 से आरंभ किया गया जिसके संपादकों में डॉ.आर्येंद्र शर्मा से लेकर भवानीप्रसाद मिश्र, रघुवीर सहाय और मुनींद्र जी तक अनेक समर्पित हिंदी सेवी जुड़े थे. इसके कला विभाग से एम.एफ.हुसैन और जगदीश मित्तल जैसे चित्रकार और कला समीक्षक संबद्ध रहे. यह भारत भर के लेखकों एवं पत्रकारों की प्रिय पत्रिका बनी तथा 1978 में कोई विशेष कारण घोषित किए बिना बंद हो गई. स्मरणीय है कि आर्येंद्र शर्मा मूलतः वैयाकरण थे. उनकी पुस्तक ‘बेसिक ग्रामर ऑफ हिंदी’ भारत सरकार द्वारा प्रकाशित की गई थी जिसे आज भी हिंदी का मानक व्याकरण माना जाता है. भाषा के प्रति उनकी गंभीरता और अच्छी रचनाओं को पहचानने की विवेकी दृष्टि ने ‘कल्पना’ को अपनी एक अलग जगह बनाने में मदद की. ‘कल्पना’ के माध्यम से वे अनेक नए रचनाकारों को सामने लाए जो बाद में प्रतिष्ठित हुए. इसी अवधि में मारवाड़ी प्रेस, हैदराबाद के बालकृष्ण लाहोटी द्वारा प्रकाशित ‘दक्षिण भारती’ भी निकली जो चार-पांच वर्ष तक चली. इसके संपादक महेंद्र भटनागर थे. बाद में वेमूरि आंजनेय शर्मा भी इस पत्रिका के संपादक रहे. यह पत्रिका दक्षिण भारत के हिंदी साहित्यकारों को एक साझा मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आरंभ की गई थी.

इन साहित्यिक पत्रिकाओं के अतिरिक्त इस काल में हैदराबाद से कई समाचारबहुल पत्र भी प्रकाशित हुए. डॉ.गोपाल शर्मा ने लिखा है कि साप्ताहिकों में ‘आर्यभानु’ और ‘संगम’ उल्लेखनीय पत्र हैं. ‘आर्यभानु’ का संपादन विनायक राव विद्यालंकार और कृष्णदत्त ने किया. वंदेमातरम रामचंद्रराव ने इस पत्र को जीवित रखने का भरसक प्रयास किया. शिवनंदन शास्त्री ने ‘संगम’ का प्रकाशन 28 अप्रैल 1958 को प्रारंभ किया. इस पत्र ने पाठकों को सुरुचिपूर्ण साहित्य दिया. “हैदराबाद के दैनिक पत्रों में ‘डेली हिंदी मिलाप’ को भी इस काल की प्रमुख उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए. ‘हिंदी मिलाप’ नाम से अखबार दिल्ली और जालंधर से भी निकलते थे. ‘मिलाप’ स्वतंत्रता से पूर्व ही हैदराबाद से प्रकाशित होने लगा था. स्वतंत्रता के पश्चात श्री युद्धवीर जी के संपादकत्व में इस पत्र ने अपनी पहचान भी बनाई और हिंदी प्रेमियों के बीच जगह भी. धीरे धीरे यह पत्र दैनिक आवश्यकता बन गया. ‘मिलाप’ के प्रकाशक की हैसियत से युद्धवीर जी ने अनेक नए पत्रकारों को अवसर दिया. बाहर से भी योग्य प्रतिभाओं को बुलाया और अवसर दिया. पं.दिवाकर पांडेय इस पत्र से जुड़े. सरदार हरनाम सिंह ‘प्रवासी’ ने इस पत्र में कार्य किया. श्री रवि श्रीवास्तव इस पत्र से जुड़े. ‘मिलाप’ जब कुछ दिनों के लिए बंद हो गया तो दिवाकर पांडेय ने प्रकाश भाई के साथ मिलकर ‘दैनिक विश्व वाणी’ का प्रकाशन किया. ‘विश्व वाणी’ के साथ डी.एस.सिंह ‘लाट’ भी जुड़े. ‘साथी’ के संपादन प्रकाशन में भी दिवाकर पांडेय की महत्वपूर्ण भूमिका रही.” (वही, पृ. 117). 

आंध्रप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में एक नया मोड 1973 में तब उपस्थित हुआ जब 14 सितंबर 1973 (हिंदी दिवस) से मुनींद्र जी के संपादकत्व में ‘हैदराबाद समाचार’ का प्रकाशन आरंभ हुआ. आगे चलकर इसका नाम ‘दक्षिण समाचार’ कर दिया गया. इस पत्र की पृष्ठभूमि में मुख्य रूप से दो लक्ष्य थे. एक तो यह कि हैदराबाद के हिंदी से जुड़े हुए लोगों को परस्पर सूचनाओं के आदान-प्रदान की सुविधा प्राप्त हो. आगे चलकर इसका क्षेत्र हैदराबाद से बढ़कर आंध्रप्रदेश और फिर दक्षिण भारत तथा अंततः पूरा भारत बन गया. दूसरा महत्वपूर्ण लक्ष्य था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 351 के अनुरूप हिंदी को भारत की सामासिक संस्कृति की वाहक भाषा के रूप में विकसित करना. हिंदी के विकास, भाषा की शुद्धता, साहित्य में घटित नई रचनात्मक प्रवृत्तियों की जानकारी और अंग्रेज़ी के विरोध तथा मानक हिंदी के प्रयोग को इस पत्र ने सदा आंदोलन के रूप में प्रसारित किया. इसके साथ ही इस साप्ताहिक पत्र ने हिंदी के लेखन को प्रोत्साहित करने और दक्षिण भारत भर में हो रहे लेखन से समस्त भारत को परिचित कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. मुनींद्र जी के निधन के बाद उनके पुत्र प्रफुल्ल कुमार तथा उनके बाद वर्तमान समय में नीरज कुमार ने भी इन्हीं नीतियों पर ‘दक्षिण समाचार’ को आगे बढ़ाया है. 

हिंदी अकादमी, हैदराबाद (1956) द्वारा कई वर्ष तक हस्तलिखित पत्रिका के रूप में प्रकाशित प्रसारित ‘संकल्य’ 1974 में विधिवत पंजीकरण के बाद मुद्रित मासिक पत्रिका के रूप में निकलने लगी. उस समय इसके संपादक मुधुसूदन चतुर्वेदी थे बाद में 1977 से बैजनाथ चतुर्वेदी के संपादकत्व में इसे साहित्यिक त्रैमासिक के रूप में भारत भर में ख्याति प्राप्त हुई. 

हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार और संवर्धन की दृष्टि से हैदराबाद स्थित दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की आंध्र शाखा द्वारा प्रकाशित साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘पूर्णकुंभ’ का योगदान उल्लेखनीय है. 1977 अप्रैल से प्रकाशित ‘पूर्णकुंभ’ के संपादन से दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा-आंध्र के सचिवों के रूप में कई बड़े हिंदी प्रचारकों के नाम जुड़े रहे हैं. परंतु इस पत्रिका ने 1997 से विशेष रूप से नया स्वरूप तब प्राप्त किया जब दिलीप सिंह और ऋषभ देव शर्मा क्रमशः संपादक और सह-संपादक के रूप में ‘पूर्णकुंभ’ से जुड़े तथा कविता, कहानी, लेख, समीक्षा आदि विविध विषयों के साथ साथ इसमें अनुवाद, भाषाविज्ञान और साहित्य की विशिष्ट विधाओं को प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया. इस अवधि में ‘पूर्णकुंभ’ के कई चर्चित विशेषांक भी निकले, यथा, रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, शिवप्रसाद सिंह, नागार्जुन, नागेंद्र और रामविलास शर्मा पर केंद्रित विशेषांक. आगे चलकर अप्रैल 2003 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा – आंध्र की तेलुगु पत्रिका ‘स्रवंति’ और हिंदी पत्रिका ‘पूर्णकुंभ’ का परस्पर विलय करके उन्हें द्विभाषी साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘स्रवंति’ का रूप दे दिया गया जिसमें हिंदी और तेलुगु दोनों भाषाओं की सामग्री रहती है. सभा के सचिव इसके पदेन संपादक रहते हैं. सह-संपादक के रूप में नारायण राजु और मल्लसर्ज मंगोडी के बाद अगस्त 2008 से गुर्रमकोंडा नीरजा इस पत्रिका का संपादन कार्य देख रही हैं. हिंदी और तेलुगु की मौलिक और अनूदित सामग्री प्रस्तुत करने वाली यह पत्रिका जनवरी 2011 से इंटरनेट पर भी उपलब्ध है. इस लघुकाय पत्रिका के कई विशेषांक भी विगत वर्षों में प्रकाशित और चर्चित हुए, जैसे राष्ट्रकवि दिनकर विशेषांक (मई 2009), उत्तरआधुनिक विमर्श और समकालीन साहित्य विशेषांक (फरवरी 2011), शमशेर बहादुर सिंह विशेषांक (अप्रैल 2011), अज्ञेय जन्मशती विशेषांक – 1,2,3 (जून, जुलाई, अगस्त 2011), स्व.प्रो.रवींद्रनाथ श्रीवास्तव अमृत वर्ष विशेषांक (अक्टूबर 2011), दूरस्थ शिक्षा पर एकाग्र (मार्च 2012), पुण्य स्मृति (परमानंद श्रीवास्तव, कैलाश चंद्र भाटिया, अमरकांत, राजेंद्र यादव और ओमप्रकाश वाल्मीकि) विशेषांक (2014) और मुक्तिबोध विशेषांक (2015). 

हिंदी प्रचार सभा (नामपल्ली, हैदराबाद) द्वारा 1977 से प्रकाशित मासिक ‘विवरण पत्रिका’ भी हिंदी भाषा और साहित्य के मुद्दों को समर्पित है. इसके संपादकों के रूप में पांडुरंग ढगे, शीलम वेंकटेश्वर राव, धोंडीराव जाधव और चंद्रदेव भगवंत राव कवडे ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है. सहयोगी संपादक के रूप में सुरेश दत्त अवस्थी और अहिल्या मिश्र ने इसे साहित्यिक स्वरूप प्रदान करने के लिए पर्याप्त श्रम किया है. यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रतिष्ठान, हैदराबाद की पत्रिका ‘अग्रतारा’ का भी उल्लेख जरूरी है जिसने हिंदीतरभाषियों के लेखन को प्रमुखता से छापा. अनियतकालीन पत्रिका ‘राष्ट्रनायक’ 1963 से हरिश्चंद्र विद्यार्थी के संपादन में निकल रही है. इसके अलावा पुरुषोत्तम प्रशांत द्वारा प्रकाशित ‘काव्य वार्षिकी मध्यांतर’ ने अपने पांच अंक निकालकर देशभर के कवियों को हैदराबाद से जोड़ा. कहना न होगा कि इस अवधि (नवनिर्माण काल) में हैदराबाद की हिंदी पत्रकारिता ने चतुर्मुख विकास किया. पत्रकारिता पर चर्चाएँ भी आरंभ हुईं और शोध भी. पत्रकारीय लेखन के क्षेत्र में इस अवधि में नन्दकिशोर शर्मा (वेणु गोपाल), किशोरी लाल व्यास नीलकंठ, गोवर्धन ठाकुर, जे.वी.कुलकर्णी, विजय कुमार मलहोत्रा, मुरलीधर शर्मा, विजयराघव रेड्डी, मनोहर लाल व्यास, दुली चंद शशि (‘मुचकुंदा’ के संपादक वजन कवि), बजरंग राव बांगरे, नेहपाल सिंह वर्मा, अशोक मिश्र आदि कलमकार खास तौर से उभरकर सामने आए.

‘हिंदी पत्रकारिता : विविध आयाम’ (सं. वेदप्रताप वैदिक) में आंध्रप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता के मूल्यांकन के संदर्भ में डॉ.श्रीराम शर्मा ने 1976 में संकेत किया था कि आंध्रप्रदेश का तेलंगाना क्षेत्र आज एक ऐसे साप्ताहिक पत्र की प्रतीक्षा कर रहा है जो उसकी सांस्कृतिक और साहित्यिक आवश्यकता को पूरा कर सके. इस बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ.गोपाल शर्मा ने 2000 में लिखा कि “यूँ तो शर्मा जी के सामने ‘मिलाप’ भी था, ‘हैदराबाद समाचार’ भी और आंध्रप्रदेश सरकार का ‘आंध्रप्रदेश’ भी, आंध्रप्रदेश हिंदी अकादमी का ‘संकल्य’ भी, फिर भी वे एक बेहतर पत्र चाहते थे. इस पत्र की चाह शर्मा जी के जीवन काल में पूरी न हो सकी. नवनिर्माण काल में ‘स्वतंत्र वार्ता’ (1996 से आरंभ) ने बहुत हद तक इस चाह को पूरा किया. इस पत्र के प्रकाशन ने दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता को बहुआयामी बनाया. (1996 से मार्च 2012 तक) इसके संपादक के रूप में डॉ.राधेश्याम शुक्ल दक्षिण के लेखकों एवं पाठकों को ऐसा मंच प्रदान करने में समर्थ हुए जिसकी आवश्यकता थी. उनके द्वारा संपादित ‘स्वतंत्र वार्ता’ दैनिक किसी भी राष्ट्रीय पत्र के समकक्ष बड़े गर्व के साथ रखे जाने योग्य पत्र के रूप में स्थापित हुआ तथा स्थानीय लेखकों एवं पत्रकारों को अपनी पहचान बनाने का एक और मौक़ा मिला.” 

1999 से हैदराबाद की हिंदी पत्रकारिता का वर्तमान काल आरंभ माना जा सकता है. नवंबर 1999 से यहाँ से गोविंद अक्षय के संपादन में कविता प्रधान मासिक ‘गोलकोंडा दर्पण’ का प्रकाशन आरंभ हुआ जिसे आरंभ से ही ऋषभ देव शर्मा, गोपाल शर्मा, नेहपालसिंह वर्मा, कविता वाचक्नवी, अमृत मेहता, पूर्णिमा शर्मा, दिलीप सिंह, वेणु गोपाल और भगवान दास जोपट जैसे स्थायी स्तंभकारों के लेखन ने अलग पहचान दी. लगभग इसी समय 2000 ईस्वी से ‘संकल्य’ ने भी अपने नए रूपाकार में वसंत चक्रवर्ती के प्रधान संपादकत्व में आलोचना प्रधान त्रैमासिक के रूप में नया अवतार लिया. इसे भी ऋषभ देव शर्मा और शुभदा वांजपे जैसे संपादकों ने देश भर में प्रतिष्ठा अर्जित करने में सहयोग दिया. चक्रवर्ती जी के निधन के पश्चात 2003 से टी.मोहन सिंह इसके संपादक हैं. हिंदी अकादमी, हैदराबाद के सचीव के रूप में गोरखनाथ तिवारी इसके प्रकाशक हैं. विगत दस वर्षों में ‘संकल्य’ हैदराबाद की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका बन गई है. इसके महादेवी वर्मा (2002), प्रेमचंद (2005,2006), दिनकर (2008), बच्चन (2009), आदिवासी विमर्श (2010) और जन्मशती (2011-12) विशेषांक देश भर में साहित्यिक हलकों में काफी चर्चित हुए हैं. 

हैदराबाद की हिंदी पत्रकारिता के संवर्धन में महिला पत्रकारों का योगदान भी अविस्मरणीय है. सीता युद्धवीर, विपमा वीर, नरेश बंसल, अहिल्या मिश्र, कमला रानी संघी, सरोज बजाज, मुखविंदर कौर, कविता वाचक्नवी, गुर्रमकोंडा नीरजा, रमा द्विवेदी, प्रतिभा गर्ग आदि ने संपादन, और स्तंभ लेखन को सुपारिभाषित स्त्री-स्पर्श प्रदान किया है. यहाँ अहिल्या मिश्र के प्रधान संपादकत्व में प्रकाशित अनियतकालीन साहित्यिक पत्रिका ‘पुष्पक’ का उल्लेख भी आवश्यक है जिसके विगत पंद्रह वर्ष में 20 अंक प्रकाशित हो चुके हैं. कृष्णकुमार गोस्वामी, दिलीप सिंह, ऋषभ देव शर्मा, रमा द्विवेदी और लक्ष्मी नारायण अग्रवाल आदि के परामर्श और संपादन में ‘पुष्पक’ ने विविध विधाओं की साहित्यिक पत्रिका के रूप में दक्षिण भारत के हिंदी रचनाकारों को तो अखिल भारतीय मंच प्रदान किया ही है, देश भर के अनेक नए-पुराने रचनाकारों को भी दक्षिण में परिचित कराया है.

आंध्रप्रदेश भर में फैले हुए केंद्र सरकार के कार्यालयों, बैंकों और उपक्रमों के राजभाषा विभागों से अनेक हिंदी पत्रिकाएँ गृह पत्रिका के रूप में प्रकाशित होती हैं. इनमें यों तो अपने अपने विभाग की सूचनाएँ और गतिविधियाँ सम्मिलित होती हैं तथापि इनमें से कुछ राजभाषा पत्रिकाओं ने तकनीकी लेखन की दृष्टि से राजभाषा विभागों के बाहर भी अपना वैशिष्ट्य प्रमाणित किया है. जैसे सीसीएमबी, हैदराबाद से प्रकाशित ‘जिज्ञासा’, एनजीआरआई, हैदराबाद से प्रकाशित ‘वसुंधरा’, एनएमडीसी, हैदराबाद से प्रकाशित ‘खनिज भारती’, एनआईआरडी, हैदराबाद से प्रकाशित ‘ग्रामीण विकास समीक्षा’ और बीडीएल, हैदराबाद से प्रकाशित ‘पथिक’ आदि. 

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि आंध्रप्रदेश में हिंदी पत्रकारिता का उदय यद्यपि अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में हुआ था परंतु स्वातंत्र्योत्तर काल में इस हिंदीतर राज्य में निरंतर बढ़ती हुई हिंदी की स्वीकार्यता ने हिंदी पत्रकारिता के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान किया और दैनिक समाचार पत्रकारिता, साहित्यिक पत्रकारिता तथा राजभाषा पत्रकारिता के विविध क्षेत्रों में आज राज्य की राजधानी हैदराबाद के अलावा विजयवाडा और विशाखपट्टनम से भी अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सफलतापूर्वक प्रकाशन हो रहा है. उल्लेखनीय है कि लोगों की सामाजिक-राजनैतिक जागरूकता तथा साहित्यिक अभिरुचि के निर्माण और परिष्कार में हिंदी की इन पत्र-पत्रिकाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है तथा भारत की राष्ट्रभाषा-राजभाषा-संपर्कभाषा के रूप में हिंदी की प्रतिष्ठा में अपना-अपना योगदान दिया है.