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शनिवार, 20 नवंबर 2021

'रामकथा का विश्वसंदर्भ महाकोश' का लोकार्पण और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 30 को


 



मीडिया विज्ञप्ति

 'रामकथा का विश्वसंदर्भ महाकोश' का लोकार्पण और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 30 को 


साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था (मुंबई) के तत्वावधान में "रामकथा का विश्वसंदर्भ महाकोश" के प्रथम खंड 'लोकगीत तथा लोककथाओं में श्रीराम का संदर्भ' का लोकार्पण दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में 30 नवंबर, 2021 (मंगलवार) को केंद्रीय राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे एवं राम साहित्य के विशिष्ट विद्वानों द्वारा किया जाएगा। 

संस्था के सचिव और महाकोश के प्रधान संपादक डॉ. प्रदीप कुमार सिंह ने जानकारी दी है कि इस अवसर पर  "रामकथा में सुशासन" विषय पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी भी संपन्न होगी। कार्यक्रम सुबह साढ़े आठ बजे से शाम साढ़े छह बजे तक चलेगा। रामनामी संप्रदाय तथा ललित सिंह ठाकुर द्वारा "छत्तीसगढ़ के वनवासी राम" पर विशेष प्रस्तुति दी जाएगी। प्रतिभागिता के लिए पंजीकरण https://www.shodhsanstha.com/ लिंक पर कराया जा सकता है।

गुरुवार, 24 मई 2018

रूस के विश्वविद्यालयों और काव्यसंध्या में गूँजी राम-संस्कृति और हिंदी



मुंबई, 24 मई, 2018 (प्रदीप कुमार सिंह)। 

साहित्यिक-सांस्कृतिक शोध संस्था, मुंबई द्वारा 10 से 17 मई, 2018 तक आयोजित 17 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल की सप्ताह भर की साहित्यिक यात्रा के दौरान रूस के अलग-अलग महानगरों में दो अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियाँ और एक बहुभाषी काव्यसंध्या सफलतापूर्वक संपन्न हुईं। इन संगोष्ठियों का आयोजन संस्थान ने रूसी-भारतीय मैत्री संघ -दिशा (मास्को, रूस) तथा अयोध्या शोध संस्थान- (अयोध्या, भारत) के साथ मिलकर कजान फेडरल यूनिवर्सिटी (कजान, रूस) और मास्को स्टेट यूनिवर्सिटी (मास्को, रूस) के संयुक्त तत्वावधान में किया जिनमें भारतीय और रूसी विशेषज्ञों ने “राम संस्कृति की विश्वयात्रा : साहित्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी” विषय पर अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। काव्यसंध्या डॉ. लीना सरीन के सौजन्य से संपन्न हुई जिसमें दोनों देशों के प्रतिभागी कवियों ने रूसी और हिंदी के साथ संस्कृत, कोंकणी, पंजाबी तथा मराठी में काव्यपाठ किया। 

कजान फेडरल यूनिवर्सिटी में आयोजित प्रथम अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन कुलपति प्रो. लतीपोव ने किया। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति को जानने के लिए राम साहित्य को जानना अपरिहार्य है। समकुलपति प्रो. स्वेतलाना ने भारतीय दर्शन और रूसी संस्कृति के आपसी संबंध पर प्रकाश डाला तो साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था के संस्थापक डॉ. प्रदीप कुमार सिंह ने वर्तमान विश्व के लिए राम-संस्कृति की प्रासंगिकता को रेखांकित किया तथा रामलीलाओं तथा ललित कलाओं के माध्यम से विश्व भर में भारतीय जीवन दृष्टि के प्रसार की व्याख्या करते हुए रूस के महान रामलीला-कलाकार स्वर्गीय गेन्नाडि मिखाइलोविच पेचनिकोव (1926-2018) को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। भारतीय दूतावास से संबद्ध डॉ. जयसुंदरम ने भारत और रूस के आपसी संबंधों की दृढ़ता के लिए रामकथा की आवश्यकता बताई। प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने अपने संचालकीय वक्तव्य में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से राम-संस्कृति के वैश्विक प्रसार की संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए अमेरिका में बनी एनीमेशन फिल्म 'सीता सिंग्स द ब्ल्यूज़' की चर्चा की। इस अवसर पर डॉ. प्रदीप कुमार सिंह के प्रधान संपादकत्व में प्रकाशित ग्रंथ "राम-संस्कृति की विश्वयात्रा : साहित्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी " को कुलपति प्रो. लतीपोव ने लोकार्पित किया। साथ ही "रामलीला की विश्वयात्रा" का भी लोकार्पण संपन्न हुआ।

मास्को विश्वविद्यालय के भारत-अध्ययन विभाग में संपन्न द्वितीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी/परिसंवाद में विशेष रूप से रूसी भारतविदों प्रो.बरीस अलेक्सेइविच ज़ख़रिन, प्रो. लुदमिला खोखलोवा, प्रो.गुजेल म्रात्खूजीना और प्रो. आन्ना बाचकोश्का ने इतिहास, साहित्य, अनुवाद और ललित कलाओं के माध्यम से रूस में राम-संस्कृति के प्रति अध्येताओं की अभिरुचि पर सप्रमाण विचार-विमर्श किया। विभिन्न कार्यकमों का संचालन प्रो. ऋषभ देव शर्मा, प्रो. दिमित्री बोबकोव और स्थानीय प्रतिनिधियों ने संयुक्त रूप से हिंदी और रूसी भाषा में किया। .डॉ. सत्यनारायण ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर लगभग 50 भारतीय और विदेशी विद्वानों का सारस्वत सम्मान भी किया गया। सभी कार्यक्रमों को सफल बनाने में हिंदी भाषा और साहित्य के रूसी छात्र-छात्राओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी की केंद्रीय भूमिका रही। सभी प्रतिभागियों ने रूस के भारतविदों/ हिंदी प्राध्यापकों/ हिंदी छात्रों से भारतीय प्रतिनिधि मंडल के भाषा और संस्कृति विषयक विचार-विनिमय को इन संगोष्ठियों की विशिष्ट उपलब्धि माना। 

सप्ताह भर के इस सारस्वत अनुष्ठान की पूर्णाहुति के रूप में सेंट पीटर्सबर्ग में पाँच रूसी विद्वानों के सान्निध्य में बहुभाषी काव्यसंध्या का आयोजन किया गया। रूसी रचनाकारों और अनुवादकों ने अपनी भाषा-चेतना और सहज सहृदयता ने प्रतिनिधिमंडल का मन मोह लिया। राम संस्कृति को समर्पित इस काव्य संध्या की अध्यक्षता डॉ. वंदना प्रदीप ने की तथा संचालन डॉ. सत्यनारायण ने किया। डॉ. प्रदीप कुमार सिंह ने संस्था के उद्देश्य और योजनाओं के बारे में बताया और कहा कि हिंदी तथा राम भारतीयता के दो पर्याय हैं। मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रशियन एकेडमी ऑफ साइंस की भारतविद प्रोफेसर डॉ.एलेना सोबोलेवा ने भारत रूस संबंधों की दृढ़ता की चर्चा करते हुए दोनों देशोँ की वैश्विक चिंताओं को समान बताया और राम संस्कृति की प्रासंगिकता को रेखांकित किया। विशिष्ट अतिथि डॉ. मारिया यकोलेवा ने भरतनाट्यम और राम संस्कृति के संदेश की चर्चा रूसी भाषा में की जिसका हिंदी अनुवाद डॉ. विश्वजीत विश्वास ने किया। रूस में हिंदी अध्यापन के लिए समर्पित विदुषियों इरीना सोकोलोवा तथा यूलिया बेशुक ने धाराप्रवाह हिंदी बोलते हुए रूस में हिंदी शिक्षण की स्थिति के बारे में बताया तथा मौलिक हिंदी कविताओं के अलावा रूसी लोकगीत तथा उनका अनुवाद प्रस्तुत कर भारतीय कवियों का मन मोह लिया। संस्था की ओर से पुष्पगुच्छ समर्पित कर सभी अतिथियों का स्वागत-सत्कार किया गया तथा डॉ. अमर ज्योति, डॉ. ऋषभ देव शर्मा, डॉ. पुष्पा गुप्ता, डॉ. प्रदीप कुमार सिंह , रघुनाथ प्रसाद गुप्ता, डॉ. वंदना प्रदीप, डॉ. जगदीश प्रसाद शर्मा, शरद शिरोडकर, डॉ. मधुलता व्यास, डॉ. मीना ढोले, डॉ. सविता सिंह,सरिता नागपाल, कर्मा देवी, वीना धमीजा , किंजल पटेल, और विरंची आदि ने अपने काव्यपाठ द्वारा इस काव्यसंध्या को सफल बनाया। इन समस्त सारस्वत आयोजनों के साथ-साथ रूस के तीन महानगरों कजान, मास्को और पीटर्सबर्ग का भ्रमण तो खैर अपनी जगह अविस्मरणीय है ही। 

(प्रस्तुति : प्रदीप कुमार सिंह, मुंबई)

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

‘रामसंस्कृति की विश्वयात्रा’ पर रूस में होगी संगोष्ठी

                                                         हैदराबाद.  

मूल्यमूढ़ता से घिरे वर्तमान समय में संपूर्ण विश्व के बुद्धिजीवी भारत की ओर आशा की दृष्टि से देखते हैं तथा विश्वबंधुत्व और सह-अस्तित्व के आदर्शों की पुनः प्रतिष्ठा द्वारा मानवाधिकारों की बहाली की कामना रखते हैं. इस परिप्रेक्ष्य में रामकथा में निहित मूल्य किस प्रकार आज की दुनिया को कुटुंब के रूप में जीने की राह दिखा सकते हैं, इस विषय पर व्यापक विचार विमर्श करने के लिए रूस और भारत के हिंदी जगत से जुड़े हुए कुछ हस्ताक्षर आगामी 10 मई से 17 मई के बीच रूस के नगरों कज़ान, मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग में जुटेंगे. इस अवधि में वे “रामसंस्कृति की विश्वयात्रा : साहित्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी” विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में वैचारिक मंथन करेंगे. 

इस कार्यक्रम के संयोजन में अग्रणी साहित्यिक-सांस्कृतिक शोध संस्था, मुंबई के संस्थापक सचिव डॉ. प्रदीप कुमार सिंह ने उक्त आशय की जानकारी देते हुए बताया कि यह अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी रूस स्थित कज़ान संघीय विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय संबंध संस्थान, रूसी-भारतीय फ्रेंडशिप सोसाइटी तथा तातरस्तान-भारत पीपुल्स फ्रेंडशिप सेंटर के सहयोग से आयोजित की जा रही है. उन्होंने यह भी बताया कि अयोध्या शोध संस्थान के सौजन्य से इस अवसर पर ‘रामसंस्कृति की विश्वयात्रा’ शीर्षक एक ग्रंथ भी प्रकाशित किया जा रहा है.
डॉ. योगेंद्रप्रताप सिंह 

संस्थान के निदेशक डॉ. योगेंद्रप्रताप सिंह ने एक भेंट में बताया कि दुनिया के 120 देशों में रामकथा व रामलीलाएँ होने के साक्ष्य मिले हैं. संस्थान उन देशों के विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों व कलाकारों से यह शोध कराएगा. शोध पूरा होने के बाद दुनिया में रामायण देशों का एक समूह बनेगा जो अपने आप में पहला इतना बड़ा समूह होगा. 

डॉ. प्रदीप कुमार सिंह 
इस विशिष्ट वैचारिक मंथन में भाग लेने वाले रूसी विद्वानों में डॉ. रामेश्वर सिंह, डॉ. गुजेल म्रात्खूजीना, डॉ. मीनू शर्मा, देमात्री बोबकोव, सुशील कुमार आजाद, कुमार विनायक और डॉ. इंदिरा गजियवा के नाम शामिल हैं, तो भारतीय विद्वानों में डॉ. योगेंद्रप्रताप सिंह, डॉ. प्रदीप कुमार सिंह, डॉ. ऋषभदेव शर्मा, डॉ. सविता सिंह, डॉ. रघुनाथ प्रसाद, डॉ. अमरज्योति, डॉ. पुष्पा गुप्ता, डॉ. करमा देवी, डॉ. जगदीश प्रसाद शर्मा, डॉ. मीना डोले, डॉ. शिरोड़कर, डॉ. सत्यनारायण, डॉ. मधु व्यास और डॉ. वंदना प्रदीप  सम्मिलित हैं. 

उल्लेखनीय है कि संयोजक डॉ. प्रदीप कुमार सिंह ने ‘राम साहित्य’ पर ही दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा से डीलिट की उपाधि भी अर्जित की है. उन्होंने बताया कि राम संस्कृति को विश्व भर में पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए इस शृंखला में अन्य देशों में भी ऐसे आयोजन किए जाएँगे. 

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

प्रो. ऋषभदेव शर्मा को 'अंतरराष्ट्रीय हिंदी मित्र सम्मान'








28 -29 सितंबर,2017 को मुंबई में विले पार्ले स्थित साठ्ये महाविद्यालय में संपन्न "रामकथा और आदिवासी साहित्य" विषयक "द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी" के अवसर पर हैदराबाद के हिंदी आचार्य एवं साहित्यकार प्रो.ऋषभदेव शर्मा को मॉस्को की संस्था रूसी-भारतीय मैत्री संघ 'दिशा' एवं मुंबई की संस्था साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्थान की ओर से "अंतरराष्ट्रीय हिंदी मित्र सम्मान" से अलंकृत किया गया। यह सम्मान प्रो.ऋषभ को उनकी हिंदी भाषा, शिक्षा, साहित्य और सामाजिक कार्यों के प्रति अनवरत सेवाओं के लिए प्रदान किया गया है। साथ ही, पूर्वोत्तर भारत के सम्मान चिह्नों द्वारा भी उनका अभिनंदन किया गया। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता साठ्ये कॉलेज की प्राचार्य डॉ. कविता रेगे ने की। इस अवसर पर अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. दिलीप सिंह, महात्मा गांधी संस्थान-मॉरीशस की निदेशक डॉ. विद्योत्तमा कुंजल, हिंदी प्रचारिणी सभा-मॉरीशस के प्रधान डॉ. यंतु देव बुधु, श्रीलंका की हिंदी लेखिका डॉ. वजीरा गुणसेना, सिने अभिनेत्री पुष्पा वर्मा, हिंदी संगम फाउंडेशन-अमेरिका के निदेशक डॉ. अशोक ओझा, वैश्विक राम साहित्य के विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप कुमार सिंह, स्पाइल दर्पण-नार्वे के संपादक डॉ. सुरेश शुक्ल, संवाद पत्रिका के संपादक डॉ. अमित कुमार पांडेय, कुतुबनुमा की संपादक डॉ. राजम नटराजन पिल्लै सहित देश-विदेश के अनेक हिंदीसेवी एवं साहित्यकार उपस्थित थे। संचालन डॉ. अनिल सिंह ने किया।

(रिपोर्ट : डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा)
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गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016

रामेश्वर सिंह के हैदराबाद आगमन पर स्नेह मिलन समारोह संपन्न


एम. वेंकटेश्वर और गुर्रमकोंडा नीरजा सहित 7 लेखकों को 
अंतरराष्ट्रीय हिंदी भास्कर, 2 को हिंदी रत्नाकर तथा
 रामेश्वर सिंह को संस्कृति-सेतु सम्मान प्रदत्त


आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के गगन विहार, हैदराबाद स्थित सभाकक्ष में संपन्न सम्मान समारोह में मास्को स्थित रूसी-भारतीय मैत्री संघ ‘दिशा’ के संस्थापक डॉ. रामेश्वर सिंह को ‘साहित्य मंथन संस्कृति-सेतु सम्मान’ प्रदान करते हुए
 तेलुगु विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. एन. गोपि.
 साथ में (बाएँ से) डॉ. अनिल कुमार सिंह, डॉ. एम. वेंकटेश्वर, डॉ. ऋषभदेव शर्मा, डॉ. पूर्णिमा शर्मा, डॉ. आर. जयचंद्रन,
डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा  डॉ. बाबू जोसफ एवं डॉ. प्रदीप कुमार सिंह.


हैदराबाद, 20 अक्टूबर, 2016 (मीडिया विज्ञप्ति).

‘’हिंदी केवल भारत की ही नहीं विश्व की बेहद शक्तिशाली भाषा है जो बहुत बड़े जन-समुदाय को तरह-तरह की भिन्नताओं के बावजूद जोड़ने का काम करती है. मैंने देश-विदेश की अपनी साहित्यिक यात्राओं में कभी भी अकेलापन अनुभव नहीं किया है क्योंकि हिंदी मेरे साथ हमेशा रहती है. आज जब विश्व-पटल पर भारत और रूस के मैत्री संबंध नई दिशा की ओर बढ़ रहे हैं, ऐसे समय भारतीय-रूसी मैत्री संघ ‘दिशा’ के संस्थापक डॉ. रामेश्वर सिंह का हैदराबाद में सम्मान तथा उनकी संस्था की ओर से भारत के कुछ हिंदी सेवियों का सम्मान हिंदी के माध्यम से परस्पर मैत्री को मजबूत बनाने की खातिर एक सराहनीय कदम है.’’

ये विचार अग्रणी तेलुगु साहित्यकार प्रो. एन. गोपि ने रूसी-भारतीय मैत्री संघ 'दिशा' (मास्को), साहित्यिक-सांस्कृतिक शोध संस्था (मुंबई) तथा 'साहित्य मंथन' (हैदराबाद) के संयुक्त तत्वावधान में आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के सभाकक्ष में संपन्न 'स्नेह मिलन एवं सम्मान समारोह' की अध्यक्षता करते हुए प्रकट किए.

इस अवसर पर मास्को से आए डॉ. रामेश्वर सिंह को श्रीमती लाड़ो देवी शास्त्री की पावन स्मृति में प्रवर्तित ''साहित्य मंथन संस्कृति-सेतु सम्मान : 2016'' प्रदान किया गया. अपने कृतज्ञता भाषण में डॉ. रामेश्वर सिंह ने कहा कि कोई भी भाषा अपने बोलने वालों के दम पर विकसित होती है और विश्व भर में हिंदी अपने प्रयोक्ताओं की बड़ी संख्या तथा अपनी सर्व-समावेशी प्रकृति के कारण निरंतर विकसित हो रही है, अतः आने वाले समय में सांस्कृतिक से लेकर कूटनैतिक संबंधों तक के लिए हिंदी को बड़ी भूमिका अदा करनी है.

‘दिशा’ और ‘शोध संस्था’ की ओर से डॉ. आर. जयचंद्रन (कोचिन) और डॉ.मुकेश डी. पटेल (गुजरात) को ''हिंदी रत्नाकर अंतरराष्ट्रीय सम्मान'' से तथा डॉ. बाबू जोसेफ (कोट्टायम), डॉ. एम. वेंकटेश्वर (हैदराबाद), डॉ. अनिल सिंह (मुंबई), डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा (हैदराबाद), डॉ. वंदना पी. पावसकर (मुंबई), डॉ. सुरेंद्र नारायण यादव (कटिहार) और डॉ. कांतिलाल चोटलिया (गुजरात) को ''हिंदी भास्कर अंतरराष्ट्रीय सम्मान'' से अलंकृत किया गया. पुरस्कृत साहित्यकारों ने हिंदी भाषा के प्रति अपने पूर्ण समर्पण का संकल्प जताया.

कार्यक्रम के प्रथम चरण में आगंतुक और स्थानीय साहित्यकारों के परस्पर परिचय के साथ ‘चाय पर चर्चा’ का अनौपचारिक दौर चला तथा दूसरे चरण में सम्मान समारोह संपन्न हुआ. आरंभ में स्वस्ति-दीप प्रज्वलित किया गया तथा कवयित्री ज्योति नारायण ने वंदना प्रस्तुत की. साहित्यिक-सांस्कृतिक शोध संस्था के सचिव डॉ. प्रदीप कुमार सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया और विश्व-मैत्री के लिए हिंदी की संभावित भूमिका पर विचार प्रकट किए. 

अपनी सक्रिय भागीदारी और उपस्थिति से चर्चा-परिचर्चा को जीवंत बनाने में डॉ. बी. सत्यनारायण, डॉ. अहिल्या मिश्र, डॉ. रोहिताश्व, डॉ. करण सिंह ऊटवाल, वुल्ली कृष्णा राव, डॉ. बी, बालाजी, डॉ. मंजु शर्मा, डॉ. बनवारी लाल मीणा, प्रभा कुमारी, मो. आसिफ अली, प्रवीण प्रणव, शशि राय, भंवर लाल उपाध्याय, जी. परमेश्वर, पवित्रा अग्रवाल, लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, डॉ. राजेश कुमार, संपत देवी मुरारका, डॉ. मोनिका शर्मा, वर्षा, डॉ. सुनीला सूद, डॉ. राजकुमारी सिंह, टी. सुभाषिणी, संतोष विजय, अशोक तिवारी, आलोक राज, शरद राज, श्रीधर सक्सेना, श्रीनिवास सावरीकर, डॉ. रियाज़ अंसारी, मदन सिंह चारण और डॉ. पूर्णिमा शर्मा आदि ने महत्वपूर्ण योगदान किया.

शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

साठये महाविद्यालय में द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न


26-27 सितंबर, 2016 को विले पार्ले, मुंबई स्थित साठये महाविद्यालय में संपन्न द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में इसके केंद्रीय विषय के विविध आयामों को समटते 528 पृष्ठीय ग्रंथ ''भूमंडलीकरण  के परिप्रेक्ष्य में साहित्य, समाज, संस्कृति और भाषा'' का लोकार्पण करते हुए (बाएँ से) डॉ. सिराजुद्दीन एस. नुर्मातोव (उज्बेकिस्तान), डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर (चीन), डॉ. रामकिशोर शर्मा (बीज भाषणकर्ता), डॉ. रामेश्वर सिंह (रूस), डॉ. सुरेश चंद्र शुक्ल (नार्वे), डॉ. कविता रेगे (सत्र अध्यक्ष), डॉ. विद्योत्तमा कुंजल (मारीशस), डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह (अयोध्या), डॉ. प्रदीप कुमार सिंह (संयोजक व संपादक) एवं डॉ. ऋषभदेव शर्मा (संचालक).


26-27 सितंबर, 2016 को विले पार्ले, मुंबई स्थित साठये महाविद्यालय में संपन्न द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में इसके केंद्रीय विषय के विविध आयामों को समटते 528 पृष्ठीय ग्रंथ ''भूमंडलीकरण  के परिप्रेक्ष्य में साहित्य, समाज, संस्कृति और भाषा'' का लोकार्पण करते हुए (बाएँ से) डॉ. सिराजुद्दीन एस. नुर्मातोव (उज्बेकिस्तान), डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर (चीन), डॉ. रामकिशोर शर्मा (बीज भाषणकर्ता), डॉ. रामेश्वर सिंह (रूस), डॉ. सुरेश चंद्र शुक्ल (नार्वे), डॉ. कविता रेगे (सत्र अध्यक्ष), डॉ. विद्योत्तमा कुंजल (मारीशस), डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह (अयोध्या), डॉ. प्रदीप कुमार सिंह (संयोजक व संपादक) एवं डॉ. ऋषभदेव शर्मा (संचालक).


शनिवार, 8 मार्च 2014

21वीं शती के साहित्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

खालसा कॉलेज, मुंबई में 21 वीं शती के हिंदी साहित्य पर केंद्रित 
द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का 
उद्घाटन दीप प्रज्वलित करते हुए 
[बाएँ से] डॉ. रमेश दवे, डॉ. दामोदर खडसे, डॉ.अजीत सिंह और 
डॉ. सत्यकाम तथा [माइक पर] डॉ. मृगेंद्र राय.
मुंबई, 8 मार्च 2014. 
गुरुनानक खालसा कॉलेज के हिंदी विभाग तथा महारष्ट्र राज्य हिंदी समिति के संयुक्त तत्वावधान में ‘भूमंडलीकरण : 21वीं शती के प्रथम दशक का हिंदी साहित्य’ विषय पर द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न हुई. 

संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए ‘समीक्षा’ के संपादक और इग्नू के प्रोफ़ेसर डॉ. सत्यकाम ने हिंदी साहित्य की कालजयी कृतियों के हवाले से यह कहा कि ‘बाजार हमेशा मौजूद रहा है. वह ईमानदार आदमी को खरीदता है. हिंदी में आधी रचनाएँ विरोध से आशंकित हैं. आज हमारे समक्ष केवल बाजार का ही संकट नहीं बल्कि साहित्य और पर्यावरण का भी संकट उपस्थित है.’ उन्होंने आगे कहा कि ‘बाजार इतना मजबूत हो चुका है कि वह साहित्य से दोस्ताना करने का प्रयास कर रहा है. आज हिंदी साहित्य से गाँव लुप्त होते जा रहे हैं.’ 

भोपाल से पधारे प्रो. रमेश दवे ने कहा कि ‘आज के इस बनावटी संसार में साहित्य में जंग हो रही है, मीडिया में नहीं. भूमंडलीकरण के इस युग में साहित्य मंडी के हाथों कठपुतली बनकर रह गया है.’ 

उद्घाटन सत्र के अध्यक्षीय संबोधन में अकादमी के कार्याध्यक्ष डॉ. दामोदर खडसे ने कहा कि ‘वैश्वीकरण के इस युग में साहित्य पूरी तरह से बाजार से प्रभावित होता दिखाई दे रहा है. कलम की स्वतंत्रता बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव से बाधित है.’

शुरू में खालसा कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अजीत सिंह ने अतिथियों का स्वागत-सत्कार किया. डॉ. रत्ना शर्मा ने विषय की प्रस्तावना प्रस्तुत की. उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. मृगेंद्र राय ने किया. 

‘भूमंडलीकरण और वर्तमान परिप्रेक्ष्य’ पर आधारित प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रो. रामजी तिवारी ने की. मुख्य वक्ता डॉ. त्रिभुवन राय ने कहा कि ‘भूमंडलीकरण के इस दौर में पश्चिम की चकाचौंध से युवा वर्ग अधिक प्रभावित है. वर्तमान समय में साहित्यकारों के समक्ष अनेक चुनौतियाँ हैं जिनसे उन्हें निरंतर जूझते रहना है.’ इस अवसर पर डॉ. हूबनाथ पांडेय, डॉ. मनप्रीत कौर, डॉ. विनीता सहाय और डॉ. वंदना शर्मा ने शोधपत्र प्रस्तुत किए. 

दो दिन के इस कार्यक्रम में विभिन्न सत्रों में भूमंडलीकरण और काव्य, भूमंडलीकरण और कथासाहित्य, भूमंडलीकरण और जनसंचार तथा साहित्य की अन्य विधाओं पर विस्तार से चर्चा हुई. इस चर्चा में इलाहाबाद से आए डॉ. रामकिशोर शर्मा, हैदराबाद से पधारे डॉ. ऋषभ देव शर्मा, डॉ. रतन कुमार पांडेय, डॉ. चंद्रदेव कवडे, डॉ. सत्यदेव त्रिपाठी, डॉ. विष्णु सर्वदे, डॉ. मधुलिका पाठक, दयानंद भुबाल, डॉ. उषा श्रीवास्तव, डॉ. उषा मिश्रा, डॉ. शीला अहुजा, भुवेंद्र त्यागी और डॉ. सूर्यबाला ने विभिन्न सत्रों में अध्यक्ष तथा विषय प्रवर्तक के रूप में अपने विचार व्यक्त किए.

यहाँ भी देखें
खबर प्लस 

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

आर. के. तलरेजा महाविद्यालय में द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

उल्हासनगर.

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा संपोषित हिंदी विभाग आर. के. तलरेजा महाविद्यालय, उल्हासनगर एवं साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था, मुंबई के संयुक्त तत्वावधान में गत दिनों नवंबर 2013 को द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन ‘भक्ति साहित्य में विश्व बंधुत्व की भावना’ विषय पर किया गया. कार्यक्रम का उद्घाटन श्रद्धेय आचार्य डॉ. शिवेंद्रपुरी के करकमलों से संपन्न हुआ. पं. शांडिल्य ने अपने सुमधुर स्वर में सरस्वती वंदना प्रस्तुत की. उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ. शिवेंद्रपुरी ने कहा कि भक्ति जनमानस का मूल्य है. बीज वक्तव्य में मुंबई विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. रामजी तिवारी ने भारतीय समाज के ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना पर प्रकाश डाला. प्राचार्य डॉ. ललितांबाल नटराजन ने स्वागत भाषण देते हुए संगोष्ठी में पधारे सभी व्यक्तियों का सम्मान किया. आर. के. तलरेजा विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. दशरथ सिंह ने भक्ति साहित्य के महत्व को स्पष्ट किया. सिंधी भाषा की एकमात्र डी.लिट. उपाधि ग्रहण करने वाले डॉ. दयाल आशा ने सिंधी भक्ति साहित्य में विश्वकल्याण की भावना पर प्रकाश डाला. 

डॉ. शिवेंद्रपुरी ने उद्घाटन सत्र में सोनभाऊ बसवंत महाविद्यालय, शाहपुर के उपप्राचार्य एवं हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल सिंह द्वारा संपादित पुस्तक ‘वैश्विक परिदृश्य में साहित्य, मीडिया एवं समाज’ का विमोचन किया. इसी कड़ी में डॉ. प्रदीप कुमार सिंह, हिंदी विभागाध्यक्ष, साठेय महाविद्यालय की पुस्तक ‘सूफी साहित्य का पुनर्मूल्यांकन’ का भा विमोचन किया गया. दक्षिण कोरिया से पधारे हिंदी के विद्वान डॉ. को. जोग. किम ने भक्ति साहित्य को भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर तथा विश्वकल्याण का मार्गदर्शक माना. इसी सत्र में साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था की ओर से साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाली विभूतियों को शाल, श्रीफल और प्रशस्तिपत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया. इस अवसर पर डॉ. दिलीप सिंह ने डॉ. शिवेंद्र, डॉ.रामजी तिवारी, डॉ. दयाल आशा, डॉ. एस. एन. सिंह, डॉ. रामआह्लाद चौधरी, डॉ. बीना खेमचंदानी, डॉ. सतीश पांडेय आदि को सम्मानित किया. डॉ. किम ने साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था की वेबसाईट का उद्घाटन किया. 

प्रथम सत्र में डॉ. शीतला प्रसाद दुबे ने भक्ति साहित्य में व्यक्त विश्वकल्याण की भावना पर प्रकाश डाला. कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. रामआह्लाद चौधरी ने वर्तमान व्यावहारिकता एवं आपाधापी से भरे जीवन में भक्ति साहित्य की प्रासंगिकता को स्पष्ट किया. सत्र के सम्माननीय अतिथि डॉ. किम ने बड़ी सहजता से हिंदी भक्ति साहित्य की भावभूमि की कलातीत सार्वभौमिकता को स्वीकार किया. 

उच्च शिक्षा और शोध संस्था, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद के आचार्य एवं अध्यक्ष डॉ.ऋषभ देव शर्मा ने भक्ति को चेतना एवं व्यावहारिकता से जोड़ते हुए समय के साथ उसे गंभीरता से ग्रहण करने की अनिवार्यता पर बल दिया. 

औरंगाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. अंबादास देशमुख ने भक्ति साहित्य की भाषा को विश्व मानव से जोड़ने वाला मूल तंतु बताया. सत्र की अध्यक्षता डॉ. दिलीप सिंह ने की. डॉ. मुक्ता नायडू ने संचालन किया और सभी का आभार व्यक्त किया. 

इस सत्र के आरंभ में इस वर्ष दिवंगत हुए हिंदी साहित्यकारों को स्मरण कर श्रद्धांजलि समर्पित की गई. डॉ. राजेंद्र यादव, डॉ. के. पी. सक्सेना, डॉ. शिवकुमार आदि साहित्यकारों की आत्मा की शांति हेतु संगोष्ठी में दो मिनट का मौन रखा गया. 

संगोष्ठी के उपरांत सभी अतिथियों और प्रतिभागियों को 5000 वर्ष पुराने अंबरनाथ मंदिर, टिटवाला गणेश गणेश मंदिर (जिसे सिद्धि मंदिर माना जाता है) का भ्रमण करवाया गया. 

प्रतिभागियों की विशाल संख्या को ध्यान में रखकर संगोष्ठी के दूसरे दिन छह समानांतर स्तरों में संगोष्ठी आयोजित की गई. अस्सी से अधिक प्रपत्र प्रस्तुत किए गए जिनमें सूर, कबीर आदि के अलावा मराठी, सिंधी, तमिल, कन्नड़, पंजाबी आदि अन्य भारतीय भाषाओं के भक्तों के साहित्य में वर्णित विश्वकल्याण और विश्वबंधुत्व की भावना पर प्रकाश डाला गया. इन छह समानांतर सत्रों में विभक्त संगोष्ठी के विषय थे – साहित्य और मानव मूल्य, सूफी साहित्य और लोक संग्रह, हिंदीतर भाषाओं में विश्वबंधुत्व की भावना, भक्ति, दर्शन एवं कृष्ण काव्य, राम साहित्य और लोकमंगल आदि. इन सत्रों की अध्यक्षता क्रमशः डॉ. दिलीप सिंह, डॉ. रामआह्लाद चौधरी, डॉ. अनिल सिंह, डॉ. अंबादास देखमुख, डॉ. ऋषभ देव शर्मा और डॉ. अशोक धुलधुले ने की. 

संगोष्ठी के समानांतर सत्रों में डॉ. श्रीराम परिहार, डॉ. श्रीराम जी तिवारी, डॉ. घरत अर्जुन, डॉ. नारायण, डॉ. उत्तम भाई पटेल, डॉ. माधव पंडित, डॉ. विष्णु सर्वदे, डॉ. शेषारत्नम, डॉ. रामनाथम और डॉ. मधुकर पाडवी विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहें. उक्त सत्रों का संचालन डॉ. मोहसिन खान, प्रा. संजय निबलाकर, डॉ. एम. एच. सिद्दीकी, डॉ. शील अहुजा तथा डॉ. मिथिलेश शर्मा ने किया.

समापन सत्र में साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था द्वारा डॉ. शीला गुप्ता, डॉ. शेषारत्नम, डॉ. मुक्ता नायडू, डॉ. अशोक धुलधुले, डॉ. शेख हसीना, डॉ. शीतला प्रसाद दुबे का प्राचार्य ललितांबाल नटराजन एवं डॉ. दिलीप सिंह ने शाल, श्रीफल एवं प्रशस्तिपत्र प्रदान कर सम्मानित किया. इस सत्र के अध्यक्ष डॉ. दिलीप सिंह ने संगोष्ठी की सफलता और उपलब्धियों की चर्चा करते हुए संस्था की ओर से सभी का आभार व्यक्त किया. इस अवसर पर उपप्राचार्य नंद वघारिया, कोंकण से पधारे प्रा. अर्शद आवटे, गुजरता से आए डॉ. उत्तम भाई पटेल, प्रा. रीना सिंह एवं छात्र प्रतिनिधि डॉ. उपाध्याय सूर्यभान ने संगोष्ठी के विभिन्न पक्षों पर अपनी टिप्पणी प्रस्तुत की. 

समापन सत्र का कुशल संचालन डॉ. अनिल सिंह ने किया. संगोष्ठी को सफल बनाने में सक्रिय सहयोग देने हेतु डॉ. अनिल सिंह, सह संयोजिका प्रा. रीना सिंह, प्रा. योगेंद्र खत्री, डॉ. अजय सिंह, डॉ. पी. के. सिंह और कर्मठ छात्राओं को धन्यवाद देते हुए संगोष्ठी के संयोजक डॉ. संतोष मोटवानी ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया.