शनिवार, 20 नवंबर 2021

'रामकथा का विश्वसंदर्भ महाकोश' का लोकार्पण और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 30 को


 



मीडिया विज्ञप्ति

 'रामकथा का विश्वसंदर्भ महाकोश' का लोकार्पण और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 30 को 


साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था (मुंबई) के तत्वावधान में "रामकथा का विश्वसंदर्भ महाकोश" के प्रथम खंड 'लोकगीत तथा लोककथाओं में श्रीराम का संदर्भ' का लोकार्पण दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में 30 नवंबर, 2021 (मंगलवार) को केंद्रीय राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे एवं राम साहित्य के विशिष्ट विद्वानों द्वारा किया जाएगा। 

संस्था के सचिव और महाकोश के प्रधान संपादक डॉ. प्रदीप कुमार सिंह ने जानकारी दी है कि इस अवसर पर  "रामकथा में सुशासन" विषय पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी भी संपन्न होगी। कार्यक्रम सुबह साढ़े आठ बजे से शाम साढ़े छह बजे तक चलेगा। रामनामी संप्रदाय तथा ललित सिंह ठाकुर द्वारा "छत्तीसगढ़ के वनवासी राम" पर विशेष प्रस्तुति दी जाएगी। प्रतिभागिता के लिए पंजीकरण https://www.shodhsanstha.com/ लिंक पर कराया जा सकता है।

रविवार, 5 सितंबर 2021

साहित्यिक पत्रिका 'स्रवंति' का पावस विशेषांक लोकार्पित



हैदराबाद, 5 सितंबर, 2021।


यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा (आंध्र एवं तेलंगाना) के खैरताबाद स्थित परिसर में पधारे केंद्रीय हिंदी निदेशालय के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. राकेश कुमार शर्मा ने सभा द्वारा प्रकाशित साहित्यिक मासिक पत्रिका 'स्रवंति' के 'पावस विशेषांक-2' का लोकार्पण किया। उन्होंने लोकार्पित पत्रिका की शोधपरक दृष्टि की प्रशंसा करते हुए संस्कृत और हिंदी सहित्य में पावस ऋतु के वर्णन की परंपरा पर भी प्रकाश डाला। 


समारोह के अध्यक्ष एवं सभा के सचिव एस. श्रीधर ने कहा कि पावस ऋतु पर केंद्रित अपने दो विशेषांकों के माध्यम से पत्रिका ने साहित्य और मीडिया में वर्षा के विबिध रूपों पर शोधपरक सामग्री प्रकाशित की है। 


अवसर पर ए. जानकी, प्रो. संजय ल मादार, डॉ. बिष्णु राय और डॉ. गोरखनाथ तिवारी भी उपस्थित रहे। पत्रिका की सहसंपादक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने विशेषांक का परिचय देने के अलावा सबका धन्यवाद व्यक्त किया।

गुरुवार, 12 अगस्त 2021

"तत्त्वदर्शी निशंक" लोकार्पित



"तत्त्वदर्शी निशंक" लोकार्पित

वर्धा, 12 अगस्त, 2021 (मीडिया विज्ञप्ति)

'आज़ादी का अमृत महोत्सव' कार्यक्रम के तहत महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में आयोजित लोकार्पण समारोह में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर रजनीश कुमार शुक्ल ने पूर्व शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' पर एकाग्र समीक्षा ग्रंथ "तत्त्वदर्शी निशंक" सहित चार पुस्तकों का विमोचन किया। अध्यक्ष के रूप में बोलते हुए प्रोफेसर शुक्ल ने कहा कि निशंक राष्ट्रीय और सांस्कृतिक धारा के अग्रगण्य समकालीन साहित्यकार हैं तथा उन्हें समर्पित ग्रंथ के लोकार्पण से बिश्वविद्यालय गौरवान्वित हुआ है।

मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित महाकवि प्रोफेसर योगेंद्र नाथ शर्मा 'अरुण' ने कहा कि "तत्त्वदर्शी निशंक" दक्षिण भारत के हिंदी विद्वानों की ओर से हिमालय-पुत्र निशंक का भावपूर्ण अभिनंदन है, जिसमें उनके जीवन संघर्ष और साहित्य सृजन से लेकर उनकी विश्वदृष्टि तक का  पहली बार इतना विशद मूल्यांकन किया गया है।

कोरोना के कारण लंबे समय तक चिकित्साधीन और एकांतवास में रहने के बाद पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने पहली बार इस कार्यक्रम में आभासी माध्यम से जुड़कर अपनी उपस्थिति दर्ज की। उन्होंने कहा कि यदि कभी उन्हें राजनीति और साहित्य में से किसी एक को चुनना पड़े तो वे निश्चित रूप से साहित्य को चुनेंगे। डॉ. निशंक ने अपने समीक्षकों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की और ज़ोर देकर कहा कि हिंदी विश्व की एक सर्वसमर्थ भाषा है तथा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषाओं पर बल देने के मूल में भारतीयता का संस्कार निहित है। 

लोकार्पित ग्रंथ के प्रधान संपादक प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा ने ऑनलाइन उपस्थित होकर पुस्तक का परिचय देते हुए कहा कि प्रो. गोपाल शर्मा, प्रो. निर्मला मौर्य, प्रवीण प्रणव, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा और डॉ. बी. बालाजी सहित इस ग्रंथ में 19 लेखकों के 21 शोधपत्र शामिल हैं तथा शीला बालाजी इसकी सह-संपादक हैं। उन्होंने कहा कि इसमें डॉ. निशंक के काव्य और कथा साहित्य के अलावा पहली बार उनके अकाल्पनिक गद्य का भी विस्तृत विवेचन किया गया है।

समारोह में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति-द्वय प्रोफेसर हनुमान प्रसाद शुक्ल, प्रोफेसर चंद्रकांत तथा प्रोफेसर कृपा शंकर चौबे सहित विविध संकायों के अध्यक्ष, आचार्यगण, शोधार्थी तथा छात्र उपस्थित थे। प्रोफेसर रमा पांडेय और डॉ. बेचैन कंडियाल ने भी ऑनलाइन सहभागिता निभाई। 

समारोह के दूसरे सत्र में प्रोफेसर योगेंद्र नाथ शर्मा 'अरुण' के सम्मान में काव्य संध्या संपन्न हुई। 000

 


 


गुरुवार, 29 जुलाई 2021

प्रेमचंद की कहानियों में मनोविज्ञान : ईदगाह ( डॉ. सुपर्णा मुखर्जी)

प्रेमचंद की कहानियों में मनोविज्ञान : ईदगाह


- डॉ. सुपर्णा मुखर्जी


मनोविज्ञान, यह शब्द ही अपने आप में रहस्यमय है क्योंकि हरेक व्यक्ति अपनी सोच, अपनी विचरधारा के द्वारा अपने जीवन को चलाता है और उस जीवनशैली के द्वारा सामाजिक जीवन भी प्रभावित होता है। चूँकि, मनोविज्ञान और सामाजिक जीवन के बीच इस प्रकार से एक सहसंबंध स्थापित होता है और साहित्य समाज का दर्पण है इसी कारण से दर्पणरूपी साहित्य के साथ मनोविज्ञान का सम्बन्ध जुड़ जाना स्वाभाविक तथ्य ही है। साहित्यकार अनादिकाल से अपने साहित्य में कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष रूप में मनोविज्ञान को स्थान देते आएँ हैं। 'कथा सम्राट प्रेमचंद' इससे अछूते कैसे रह सकते थे? 'कथा सम्राट प्रेमचंद' ने वैसे तो सभी वर्गों के मनुष्यों के मनोविज्ञान को लेकर साहित्य रचना का काम किया है पर उनकी कहानियों में वर्णित बाल मनोविज्ञान की अपनी एक अलग जगह है। बच्चों के प्रति अपने विचार को व्यक्त करते हुए सन् 1930 में 'हंस' पत्रिका के सम्पादकीय में उन्होंने लिखा, 'बालक को प्रधानतः ऐसी शिक्षा देनी चाहिए कि वह जीवन में अपनी रक्षा आप कर सके। बालकों में इतना विवेक होना चाहिए कि वे हर एक काम के गुण-दोष को भीतर से देखें'। मुख्यतः प्रेमचंद बच्चों को अनुशासित और संयमित देखना चाहते थे। 


मध्यकाल में सूर और तुलसी ने बाल साहित्य को व्यापक रूप प्रदान किया। इन दोनों कवियों ने अपनी रचनाओं के द्वारा यह प्रकट किया था कि बालकों के लिए न कोई राजा होता है न प्रजा। बालक तो प्रेम के भूखे होते हैं और उनके प्रेम के सामने बड़े-बड़े राजाओं का सिर भी झुक जाता है। प्रेमचंद ने इन दोनों कवियों की इसी चिंतनशैली को अपनी कहानी रचना का आधारस्तम्भ बनाया था।  


ईदगाह, गुल्ली डंडा, कजाकी, कुत्ते की कहानी, सच्चाई का उपहार आदि प्रेमचंद द्वारा लिखित प्रमुख बाल कहानियाँ है। इनमें से 'ईदगाह' कहानी का हामिद अपने भोलेपन के साथ-साथ अपनी परिपक्वता के कारण पाठकों का वर्षों से लोकप्रिय बालक रहा है। जब भी आप दुखी हों एक बार 'ईदगाह' कहानी के हामिद के निराशाओं के बीच घिरे आशाओं के संसार को देखें, 'वह भोली सूरत का चार-पाँच साल का दुबला-पतला लड़का। उसके पिता गत वर्ष हैज़े की भेंट हो गए थे और माँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। किसी को पता न चला कि क्या बीमारी थी। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न रहता है। उसके अब्बाजान रुपये कमाने गए हैं। अम्मीजान अल्लाह मियाँ के घर से उसके लिए बहुत-सी अच्छी चीज़ें लाने गई हैं, इसलिए हामिद प्रसन्न है। आशा तो बड़ी चीज़ है। हामिद के पाँव में जूते नहीं है, सिर पर एक पुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है'।


मानव मनोविज्ञान का महत्वपूर्ण अंग है 'आशा'। कथाकार ने एक चार-पाँच साल के बालक के माध्यम से आशावान बने रहने का कैसे देखिए मूलमंत्र दे दिया है। पर है तो वह बच्चाही, तभी तो 'हामिद खिलौनों को ललचाई आँखों से देखता है'। पर जहाँ निराशा को आशा ने पराजित कर दिया है वहाँ लालच कैसे टिक सकता है?  तभी तो 'हामिद को ख्याल आता है, दादी के पास चिमटा नहीं है। तवे से रोटियाँ उतारती है तो हाथ जल जाता है, अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे, तो वे कितनी प्रसन्न होंगी! फिर उनकी उँगलियाँ कभी न जलेंगी'।


ऐसी परिपक्वता तो बहुत बार सयानों में भी नहीं मिलती। उपभोक्तावादी संस्कृति के जाल में जहाँ व्यक्ति केंद्रकता ही सब कुछ है। स्वार्थी समाज में जहाँ सब लाभ कमाने में लगे हुए हैं वहाँ हामिद वर्षों से 'ईदगाह' से बंदूक की तरह चिमटा पकड़कर मानव को मानवता का सही अर्थ समझाता हुआ आता दिखाई पड़ता है।


हम बात करते हैं त्याग, सद्भाव की, विवेक की। बड़े-बड़े ज्ञानियों ने तो बाकयदा त्याग, सद्भाव, विवेक सिखाने के पाठशालाएँ भी खोल ली हैं, लेकिन प्रेमचंद के हामिद ने तो अपने अनमोल 'तीन पैसे' खर्च करके समाज को यह ज्ञान दे दिया है। ●


डॉ. सुपर्णा मुखर्जी

हिंदी प्राध्यापिका

सेंट ऐन्स डिग्री कॉलेज फॉर विमेन

मलकाजगिरी

हैदराबाद- 500047

सोमवार, 7 जून 2021

केवल शिक्षामंत्री नहीं हैं रमेश पोखरियाल 'निशंक'

पुस्तक समीक्षा

 

केवल शिक्षामंत्री नहीं हैं रमेश पोखरियाल 'निशंक'

- समीक्षक: डॉ. सुपर्णा मुखर्जी


समकालीन भारत में अगर आपको चर्चित होना है, तो आप राजनेता और अभिनेता बन जाइए, रातों रात आप प्रसिद्धि के चरमशिखर पर पहुँच जाएँगे। पर साहित्यकार बनकर प्रसिद्धि पाने में समय और संयम दोनों की आवश्यकता पड़ती है। उसमें भारतीय भाषाओं के साहित्यकार को प्रसिद्धि के साथ-साथ पाठकों की संख्या बढ़ोतरी के लिए भी प्रतीक्षा करनी पड़ती है। चेतन भगत, शोभा डे आदि अंग्रेज़ी-लेखकों के बारे में यहाँ बात नहीं हो सकती, वे दूसरे कारणों से अपवाद हैं। यह भारत का सौभाग्य और दुर्भाग्य दोनों है। अब देखिए, हमें पता है रमेश पोखरियाल 'निशंक' केंद्रीय शिक्षा मंत्री हैं, पर पूरे देश में कितने लोगों को पता है कि 'निशंक' जी यशस्वी साहित्यकार भी हैं? शायद बहुत कम। '1990 में साहित्यांचल संस्था (कोटद्वार) ने उन्हें 'निशंक' उपनाम दिया'। (तत्त्वदर्शी निशंक, पृष्ठ 293)। 'निशंक' शब्द का अर्थ है शंकाहीन; निडर। हिमालय पुत्र रमेश पोखरियाल वाकई इस उपनाम को सुशोभित करने का सामर्थ्य रखते हैं। केवल देश ही नहीं विदेशों तक उनकी पहचान है। लेकिन अभी भी उन्हें लेकर जितनी गहन चर्चा होनी चाहिए, नहीं हुई है। संपादक प्रो. ऋषभदेव शर्मा और सह संपादक शीला बालाजी के नेतृत्व में छपी विवेच्य पुस्तक 'तत्वदर्शी निशंक' (2021) इस शून्य को भरने का एक सार्थक और सफल प्रयास है। जैसा कि डॉ. योगेंद्र नाथ शर्मा 'अरुण' जी ने आशीर्वचन देते हुए लिखा है, 'हिमालय-पुत्र रमेश पोखरियाल 'निशंक' की साहित्य-साधना का जैसा अभूतपूर्व भावभिनंदन 'तत्त्वदर्शी निशंक' ग्रन्थ के माध्यम से किया गया है, वैसा अभी तक नहीं हुआ है।' आगे अरुण जी ने यह भी लिखा है, 'कुल छह खंडों में विनयस्त करके बहुआयामी साहित्य-साधक रमेश पोखरियाल 'निशंक' के सम्पूर्ण रचना-कर्म का गहन मूल्यांकन दक्षिण भारत के हिन्दी-सेवी साहित्य-साधकों द्वारा कराया जाना, स्वयं में ही एक विलक्षण कार्य कहा जा सकता है।' (तत्त्वदर्शी निशंक, पृष्ठ 7)। निजी अनुभवों से 'निशंक' ने जो साहित्य-विवेक अर्जित किया है, संघर्ष उसका बीज-शब्द है। वे मानते हैं कि, "संघर्ष और चुनौतियों से जो रिश्ता हमारे जीवन का है, वही रिश्ता सार्थक साहित्य का भी है। प्रतिबद्धता की मशाल जलाए निरंतर अन्याय व अँधेरे से जूझना इन दोनों का धर्म है। जीवन और साहित्य तभी सार्थक हैं, जब ये जनोन्मुखी और जन-सरोकारी हों। लोकहित की भावना से अनुप्राणित हों। साहित्य की भी इसलिए कलागत उपयोगिता से जीवनगत उपयोगिता ज्यादा है।" (पृष्ठ 11)।


साहित्य की बात हो और सौन्दर्य की चर्चा न हो, ऐसा कैसे हो सकता है? आत्मवादी दार्शनिक क्रोचे मानते हैं, 'Aesthetics is the science of the expressive activity'. प्रसिद्ध आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा कहते हैं, 'सौन्दर्यशास्त्र दर्शन का एक अंग है, जिसका उद्देश्य सौन्दर्य तथा उसकी अनुभूति की व्याख्या करना है'। 'निशंक' ने साहित्य और सौन्दर्य के इस सहसंबंध को न केवल समझा, बल्कि उसे स्वीकार भी किया है। उनकी रचनाओं में बलपूर्वक सौन्दर्य को नहीं खोजना पड़ता। उन्होंने अपनी रचनाओं में साहित्यिक सौन्दर्य को मानवीय मूल्यों में स्थापित किया है। कवि की संवेदना इन शब्दों में व्यक्त होती है - 'सदा शांति पथ पर चलना है,/हमने ध्येय बनाया था।/ राग द्वेष हिंसा को तज कर,/ स्नेहिल विश्व बनाया था।।' (पृष्ठ 53)।


'प्रतीक्षा' खंडकाव्य के 'क्रांति पर्व' में कवि की सामाजिकता में मानवीय सौन्दर्य के दर्शन होते हैं- 'मानवता के नाते हमने,/ सबको ही सम्मान दिया।/ छल बल करनेवालों से तो, /हम निपट आएँगे ठान लिया।।' (पृष्ठ 59)। सौन्दर्यशास्त्र के प्रमुख अंग हैं- कल्पना, प्रतीक, बिम्ब, अलंकार, नव रस आदि। 'निशंक' की कविताओं में सौन्दर्य के इन सभी प्रतिमानों को भली भाँति देखा जा सकता है और डॉ. निर्मला एस. मौर्य ने 'उद्देश्य की महानता में सौन्दर्य का रहस्य' नामक आलेख के द्वारा 'निशंक' की रचनाओं में व्याप्त सौन्दर्य का विस्तृत विश्लेषण किया है।

जहाँ डॉ. एन. लक्ष्मीप्रिया ने यह दर्शाया है कि, 'निशंक जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज और साहित्य के बीच सेतु का कार्य किया है।" (पृष्ठ 88)। वहीं 'देशप्रेम की चेतना' में डॉ. सुपर्णा मुखर्जी ने लक्षित किया है कि, 'आज के यांत्रिक युग में जब किसी के घर में बच्चे के जन्म के होने पर वह डॉक्टर बनेगा या इंजीनियर, वकील या कलाकार, इन बातों को लेकर हँसी-मज़ाक, वाद-विवाद का माहौल बन जाता है, ऐसे समय में 'प्रतीक्षा' (खंडकाव्य) की माँ ईश्वर से प्रार्थना कर रही है -हे ईश्वर मेरे दीपू को/ परम शक्तिशाली कर दो।/ रहे देश-सेवा में तत्पर/ ममता भी मन में भर दो।।/ अरमानों को कुचल न देना।/ हे प्रभु, इतना तो सुन लो।।/ बेटा वीर बने मेरा फिर/ मुझको तुम जितना दुख दो।।' (पृष्ठ 69)। इसी प्रकार डॉ. भागवतुल हेमलता का मत है कि, 'निशंक की कविताओं में एक खास तरह की सृजनात्मकता एवं रचनात्मक ऊर्जा दिखाई पड़ती है। उनकी प्रत्येक पंक्ति एक प्रेरणा होती है और प्रत्येक प्रेरणा मार्गदर्शी होती है।' (पृष्ठ 84)।

'निशंक' का हिन्दी साहित्य में पदार्पण कवि के रूप में हुआ। उनके काव्य का मूल स्वर राष्ट्रीयता होने के कारण उनकी गणना राष्ट्रीय कवि के रूप में की जाती है।' (पृष्ठ 45)। लेकिन कहानीकार तथा उपन्यासकार के रूप में भी उनकी पहचान कुछ कम नहीं है। उनकी कहानियों में 'आदर्श और यथार्थ' के सम्मिलित रूप को देखा जा सकता है। 'रमेश पोखरियाल 'निशंक' एक ऐसे समसामयिक साहित्यकार हैं जिन्होंने अपनी अनुभूत सच्चाइयों को अपनी रचनाओं की विषय-वस्तु बनाया है। उनकी कहानियों में एक ओर आदर्श का प्रतिफलन है तो दूसरी ओर यथार्थ का।' (पृष्ठ 104)। डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने उनकी कहानियों में व्याप्त 'आदर्श और यथार्थ' से सम्बन्धित चेतना का गहन अध्ययन इस पुस्तक में किया है। उन्होंने अपने आलेख को 13 भागों में बाँटकर, 'निशंक' की कहानियाँ 'आदर्श और यथार्थ' के धरातल पर कितनी खरी उतरती है, इसका गंभीर अध्ययन किया है। उनके इस अध्ययन के सहारे ही हम पाठक इस तथ्य से अवगत हो सके हैं कि 'निशंक' विवेकानंद के विचारों से प्रभावित हैं, अतः उनकी सोच सकारात्मक है।

'निशंक' विवेकानंद के विचारों से कितने प्रभावित हैं, यह समझने के लिए उनकी रचना 'संसार कायरों के लिए नहीं' का अध्ययन करना बहुत आवश्यक है। सन् 2014 में यह रचना प्रकाशित हुई, जिसमें 72 लेखों के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण से संबंधित तथ्यों पर प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक को ही डॉ. सुरेश भीमराव गरुड़ ने अपने आलेख का विषय बनाया है। इस पुस्तक की महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें 'स्वामी विवेकानंद के उन मृत्युंजयी विचारों को लिया गया है, जिनसे आज के संदर्भों में कायाकल्प लाया जा सकता है।' (पृष्ठ 281)। 'स्वामी विवेकानंद ने 1897 में ही यह घोषित किया था कि भारत अगले पचास वर्षों में स्वतंत्र हो जाएगा। उन्हें यह चिंता कदापि नहीं थी कि भारत स्वतंत्र होगा कि नहीं होगा, पर उनकी चिंता यह थी कि क्या भारत यह स्वतन्त्रता कायम रख सकेगा। इस दिशा में ही उन्होंने कार्य किया। प्रत्येक भारतवासी को भीतर से संस्कारित करने का कार्य स्वामी जी ने किया।' (पृष्ठ 283)। 'निशंक' जी ने स्वामीजी के इन विचारों का गहन अध्ययन किया। इस अध्ययन का प्रभाव उनके व्यक्तित्व तथा उनकी रचनाओं पर भी पड़ा। वे सकारात्मक बन सके और इसी सकारात्मक सोच के कारण उन्होंने अपनी कहानियों के अनेक मानवीय पात्रों के साथ-साथ जीव-जन्तुओं में भी समर्पण भाव को दिखाया है। 'और मैं कुछ नहीं कर सका' शीर्षक कहानी का डब्बू (घोड़ा) अपने मालिक दयाल की जान बचाने के लिए अपनी जान दाँव पर लगा देता है। यह इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प के सहारे ही सम्भव है। (पृष्ठ 107)। दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ ही बलिदान भाव, श्रद्धा और समर्पण भाव का होना भी आवश्यक है। 'निशंक' ने अपनी कहानी 'अंतिम क्षण तक' में इन भावनाओं को दर्शाया है। जंगल में लगे दावानल को बुझाने के लिए जब कोई आगे नहीं आता, तब चंदू अकेले ही जूझ पड़ता है। जंगल ही मानो उसका घर है- 'आदमी को अपनी औलाद से जितना लगाव होता है, उससे भी अधिक लगाव उसे इन पेड़-पौधों से हो गया था। सारा जीवन ही उसने इसमें बिता दिया था।' (पृष्ठ 107)।

डॉ. डॉली मौर्य ने इस प्रसंग को लेकर चर्चा की है कि 'निशंक' जी की कहानियाँ 'समकालीन परिवेश' के साथ कैसे जुड़ती हैं। आज के लॉकडाउन की परिस्थिति में उनकी कहानी 'आशियाना' को देखना प्रासंगिक है। 'इसमें यह दिखाया गया है कि ये मजदूर जहाँ बस जाते हैं, वहीं अपना घर बना लेते हैं।' (पृष्ठ 127)। रुक्मिणी, उसकी बहू और बेटा शहर आकर एक औद्योगिक निर्माण में मजदूरी करने लगते हैं। वे जिस बस्ती में रहते थे, उस बस्ती की ज़मीन को सेठ रतनलाल हथियाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने बस्ती में आग लगवा दी। उन्होंने लोगों की जान की भी परवाह नहीं की। अंत में यह दिखाया गया है कि मजदूर इतना सब होने के बाद भी हताश नहीं होते, 'बस कर उजड़ना और फिर से बसना ही उनकी जैसे नियति बन गई है।' (पृष्ठ127)।

डॉ. श्रीलता विष्णु और डॉ. सुषमा देवी ने 'निशंक' की 'टूटते दायरे', 'जग की रीत', 'अतीत की परछाइयाँ,' 'खड़े हुए प्रश्न', 'अंतहीन', 'कैसे संबंध', 'एक थी जूही', 'अनजान रिश्ता' आदि अनेक कहानियों का गहन अनुशीलन किया और इस अनुशीलन का निष्कर्ष यही निकला कि, 'लेखक की पैनी दृष्टि से जीवन का कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहा है। उन्होंने समाज की सदियों की परम्परा को आगे बढ़ानेवाली इन सारी बातों को अपनी कहानियों में उकेरा है।' (पृष्ठ 172)। ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने 'समाज दर्शन और राष्ट्रवाद' नामक अपने आलेख में बहुत सही प्रतिपादन किया है कि, 'निशंक का समाज दर्शन और राष्ट्रवाद उन कोणों पर टिका हुआ है, जो सामाजिकता के सतरंगी सपनों से निर्मित होते हैं, परन्तु इन सपनों को धड़कने के लिए अमानवीय वेदना से गुजरना पड़ता है। ये सपने कभी टूटते भी हैं, बिखरते भी हैं, रोते और बिलखते भी हैं, परन्तु वे अपने साथ एक सशक्त और उन्नत राष्ट्र की अवधारणा लेकर चलते हैं। इन सपनों के रंगों में ऊँच-नीच, अमीर-गरीब और छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं है।' (पृष्ठ 141)।

प्रो. गोपाल शर्मा 'तत्वदर्शी निशंक' के सम्बन्ध में लिखते हैं,"निशंक के कथा-सागर में समाज भी है और समाज की अच्छी-बुरी रीतियाँ भी, पर जनरुचि को विकृत करनेवाले प्रसंग नहीं। समाज के विद्रूप का चित्रण है तो इसलिए, क्योंकि परिदृश्य समकालीन है।" (पृष्ठ 344)। इस संदर्भ में उनकी 'कैसे संबंध' कहानी की चर्चा डॉ. संगीता शर्मा ने की है। उसके मूल तत्व को यहाँ देखना समीचीन होगा। 'लिव- इन- रिलेशनशिप को न्यायिक प्रक्रिया द्वारा वैध ठहराया गया है। भावी पीढ़ी धीरे-धीरे विवाह जैसी संस्था को निरस्त कर देगी और सामाजिक मूल्यों का पतन हो जाएगा। हमारी संस्कृति का ह्रास हो जाएगा, जिसकी चिंता लेखक को भी है, इसलिए उन्होंने 'कैसे संबंध' जैसी कहानी द्वारा एक तरह से चेतावनी दी है और यह जताने की कोशिश की है कि यदि हमारी संस्कृति और हमारे संस्कारों को नकारा जाएगा तो वह आनेवाली पीढ़ी के लिए हज़ारों मुश्किलों को न्योता देने के समान होगा।" (पृष्ठ 313)।

'बालपन से ही कर्मठ रहे बालक रमेश को विद्याध्ययन के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। बचपन से पढ़ाई में रुचि होने के कारण वे प्रतिदिन ऊँची पहाड़ी की सात किलोमीटर की पैदल यात्रा किया करते थे। गाँव से स्कूल के बीच घने जंगल और गाड़-गधेरों को पार करना पड़ता था। एक बार तो वे उफनते गधेरे में बह गए थे। मगर अपने विवेक और ईश्वर की कृपा से बच गए।' (पृष्ठ 40)। उनके साहित्य के गंभीर अध्येता प्रवीण प्रणव ने 'आपदा के वह भयावह दिन' और 'प्रलय के बीच' नामक निशंक जी के दो संस्मरणों को अपने आलेख का विषय बनाया है। प्रवीण प्रणव लिखते हैं, "निशंक का लेखन सरल और प्रभावी है। मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत संदर्भों का विवरण इस बारीकी से किया गया है कि पाठक अपने आप को भी 'निशंक' के साथ आपदा की इस घड़ी में गाँववालों के साथ खड़ा पाते हैं।" (पृष्ठ 227)। 'आपदा के वह भयावह दिन' नामक संस्मरण में 'निशंक' जी ने उत्तराखंड के बारे में लिखा है, "भारत के मस्तक पर सुशोभित हिमालय के हृदय, इस उत्तराखंड का कण-कण इसी हिमालय से पोषित, पल्लवित और पुष्पित है। यहाँ की अलौकिक छटा, प्राकृतिक सम्पदाओं का अनुपम खजाना और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत संसार इसी दिव्य हिमालय की देन है। दिखने में भले ही मिट्टी, पत्थर और बर्फ से निर्मित प्रकृति की बेजान कृति लगता है, मगर है यह साक्षात् 'शिव स्वरूप', 'जाग्रत और चैतन्यशील', इसलिए शिव की तरह सृजन और संहार इसके स्वभाव में है।" (पृष्ठ 226)। 'निशंक' ने इस सृजन तथा संहार दोनों को बहुत पास से देखा। इसी कारण से ये संस्मरण केवल संस्मरण न होकर 'आपदा प्रबंधन और आपदा की स्थिति में बचाव कार्य कैसे किया जाना चाहिए, इस दिशा में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। दोनों संस्मरण न केवल उत्तराखंड प्रशासन और सरकार से जुड़े सभी लोगों के लिए, बल्कि किसी भी पर्वतीय राज्य के निवासियों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि आपदा की घटनाओं में ये सफलता और विफलता दोनों की कहानी समेटे हैं।' (पृष्ठ 255)।

ऐसे जीवटभरे रचनाकार के उपन्यासों में 'पहाड़ी जीवन का जीवंत दस्तावेज' न दिखाई पड़े, यह कैसे हो सकता है? विवेच्य ग्रंथ 'तत्वदर्शी निशंक' के चतुर्थ खंड 'उपन्यास सृष्टि' में डॉ. बी. बालाजी और डॉ. मंजु शर्मा ने निशंक के उपन्यासों में वर्णित विभिन्न पहाड़ी आयामों का विश्लेषण किया है। डॉ. बी. बालाजी ने मेजर निराला, बीरा, निशांत, कृतघ्न, प्रतिज्ञा, छूट गया पड़ाव आदि उपन्यासों का गहन अध्ययन करने के बाद निष्कर्षतः बहुत अच्छी बात कही है कि, 'रमेश पोखरियाल 'निशंक' समकालीन संदर्भ में पहाड़ी जनजीवन की पृष्ठभूमि पर भारतीय संस्कृति और सभ्यता के अंकन का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने एक ओर जहाँ पर्वतीय जनसमुदाय की जीवन-शैली के विभिन्न रूप-रंग, संस्कृति को अपनी लेखनी से उकेरा है, वहीं उसके उत्थान के लिए जीवन की विभिन्न समस्याओं के समाधान भी खोज निकाले हैं। हिंदी साहित्य में प्रेमचंद, बाबा नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, शिवप्रसाद सिंह, रामदरश मिश्र, मिथिलेश्वर आदि ग्रामीण परिवेश की कथा लिखने में सिद्धहस्त साहित्यकारों की सूची में रमेश पोखरियाल 'निशंक' के रूप में एक और नाम जोड़ा जा सकता है।" (पृष्ठ 206)।

डॉ. मंजु शर्मा ने डॉ. बी. बालाजी की विचार-शृंखला को आगे बढ़ाते हुए इस विषय को ठोस तथ्यों के द्वारा प्रेषित किया है कि पहाड़ी जीवन में 'चेतना के विविध आयाम' कैसे उभरते हैं और उन्हें 'निशंक' ने अपने उपन्यासों में कैसे उभारा है। 'लेखक ने पहाड़ी जीवन का अध्ययन बहुत नजदीक से किया है, तभी वे लिख सके कि पहाड़ की अर्थव्यवस्था को मनीआर्डर-व्यवस्था कहते हैं। प्रायः पहाड़ के हर परिवार का एक आदमी फौज में होता है, जो छुट्टियों में कैंटीन से सस्ती शराब लाता है और पूरा गाँव संग बैठकर उसका आनंद उठाता है, लेकिन यह क्षणिक आनंद युवाओं संग अन्यों को भी शराब का आदी बना देता है, जिससे नशे की हालत में वे दुष्कर्म तक का प्रयत्न करते हैं। उनकी कुचेष्टा का शिकार प्रत्यक्ष रूप से लड़कियों को होना पड़ता है। दूर-दराज जाकर पढ़नेवालों की पढ़ाई तक रोक दी जाती है, सुरक्षा के नाम पर।' (पृष्ठ 304)।

उल्लेखनीय है कि साहित्यकार 'निशंक' जी का मानना है कि, 'उनके लिए रचनाकार होने की कोई बुनियादी शर्त नहीं है; बस इतना ही कि संवेदनशील कल्पना और सपनों को साकार करने के संकल्प ने उन्हें साहित्य की विविध विधाओं से जोड़ा है। उनके लिए लिखना बस लिखना नहीं, बल्कि ज़िन्दगी के तमाम उतार-चढ़ावों को जीवंतता से अपनी रचनाओं में उड़ेलना है- उनके सारे सृजन की बुनियाद अंतःस्थल की यही संवेदनशीलता है।" (भूमिका: तत्वदर्शी 'निशंक', ऋषभदेव शर्मा)। प्रो. गोपाल शर्मा ने, तत्वान्वेषी साहित्यकार की क्या पहचान होती है, इस विषय में कहा है कि ,'एक तत्वान्वेषी साहित्यकार के लिए जीवन का ध्येय सत्य से साक्षात्कार होता है।' (पृष्ठ 333)। आगे प्रो. गोपाल शर्मा लिखते हैं, 'उपनिषदों के सार तत्व श्रीमद्भगवद्गीता में जीवन के दो आदर्श बताए गए हैं- आत्म-लाभ और लोक-संग्रह। 'निशंक' को इस अर्थ में तत्वदर्शी कहा जा सकता है, क्योंकि वे एक ओर तो व्यक्तित्व विकास और आत्म-कल्याण के लिए साहित्य और साहित्येतर लेखन करते हैं, दूसरी ओर लोक में मर्यादा बनाए रखने के लिए लोक-संग्रह की भावना से रचनात्मक लेखन की ओर प्रवृत्त होते हैं।' (पृष्ठ 336)। यह स्थापना शत-प्रतिशत सही है और 'निशंक' जी इस निकष पर खरे उतरते हैं। उनके कविता संग्रह 'मुझे विधाता बनना है' में मनुष्य के अदम्य साहस की पराकाष्ठा है। 'ऋतुपर्ण' शीर्षक कविता में कवि ने अपने देशप्रेम की ऊंचाइयों को छूते हुए कहा है कि- जिसने मुझको जन्म दिया है/ और महत मानव का तन/ उसी राष्ट्र को है मेरा/ सदा समर्पित यह तन-मन।" (पृष्ठ 311)।

डॉ. रमेश पोखरियाल की 'विश्व दृष्टि' अत्यंत प्रशस्त और उदार है। मिलन विश्नोई ने 'निशंक की विश्व दृष्टि पर प्रकाश डालते हुए कहा है,'निशंक की कहानियों को पढ़कर पहले-पहल यकीन नहीं होता कि एक राजनेता के दिल में इतनी संवेदनाएँ हो सकती हैं। 'निशंक' के साहित्य को पढ़ने से अनुभव होता है कि लेखक ने गरीब मजदूरों और महिलाओं की करुण कहानी को यथार्थ अनुभव के आधार पर गढ़ा है।' (पृष्ठ 318)। निशंक 'अब गाँव चलें' कविता के माध्यम से समाज के युवाओं के साथ संवाद स्थापित करने की कोशिश करते हैं- 'बाट तुम्हारी राह जोहती,/ नदियाँ हैं अकुलाई,/ पवन के झोंके तो ठहरे हैं, कलियाँ भी मुरझाई।/ ईर्ष्या की लपटों से बचकर तरु की छाँव चलें/ छोड़ सभी आडंबर जग के, आ अब गाँव चलें।' (तत्वदर्शी निशंक, पृष्ठ संख्या-319)।

डॉ. उषा रानी राव ने 'निशंक' की विश्व दृष्टि पर चर्चा करते हुए बड़ी अच्छी बात कही है, 'एक लेखक साहित्यिक मूल्यों की सजीवता को व्यक्त करने के लिए संवेदना जगत के परिवर्तित जगत में विचरण करता है, जहाँ उसे कविता, कहानी, खंडकाव्य उपन्यास आदि विभिन्न विधाओं में जीवन और जगत के चाक्षुष तानों-बानों से विकसित अपनी अनुभूति को शब्द देना होता है। रमेश पोखरियाल 'निशंक' इसी प्रकार के सार्थक रचनाकर्म में निरत व्यक्तित्व रहे हैं।' (पृष्ठ 330)। यही कारण है कि उनके समग्र साहित्य का अनुशीलन करके डॉ. चंदन कुमारी इस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं कि, 'रमेश पोखरियाल निशंक का साहित्य जीवन में आस्था बढ़ानेवाला है। वह विपरीत परिस्थितियों से जूझने की प्रेरणा देते हुए मानव मन में अदम्य साहस भरता है और जीने का उल्लास जगाता है।' (पृष्ठ 308)

यहाँ एक बात और कहना चाहूँगी कि यह एक दुष्प्रचार ही है कि 'दक्षिण में हिंदी को लेकर काम नहीं होता या हिंदीभाषियों को ही हिन्दी की अच्छी समझ होती है। प्रस्तुत पुस्तक में लिखनेवाले लेखक हिंदीभाषी ही नहीं, मराठीभाषी, तेलुगुभाषी, बांग्लाभाषी, मलयालमभाषी, कन्नड़भाषी और तमिलभाषी हैं। ये सभी तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल तथा सुदूर अंडमान और निकोबार में हिंदी की सेवा अध्यापक, पत्रकार और लेखक के रूप में समर्पण-भाव से कर रहे हैं। इस प्रकार यह ग्रंथ दक्षिण में हिंदी की स्थिति को दर्शाने वाला प्रामाणिक ग्रंथ भी है। ///

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समीक्षित पुस्तक- "तत्त्वदर्शी निशंक"

संपादक- प्रो. ऋषभदेव शर्मा

प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली

संस्करण- प्रथम, 2021

मूल्य- सात सौ रुपए

पृष्ठ- 352 (सजिल्द)।

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समीक्षक- 

डॉ. सुपर्णा मुख़र्जी,

हिंदी प्राध्यापक,

सेंट ऐंस जूनियर एंड डिग्री कॉलेज फॉर गर्ल्स एंड वीमेन

मल्काजगिरी, हैदराबाद - 500047.

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बुधवार, 5 मई 2021

(पुस्तक समीक्षा) डॉ. निशंक के साहित्य का समग्र विवेचन : तत्त्वदर्शी निशंक'

डॉ. निशंक के साहित्य का समग्र विवेचन 

तत्त्वदर्शी निशंक'

समीक्षक : डॉ सुषमा देवी

जब एक साहित्यकार मनुष्य की संवेदना को जीवन के थपेड़ों में भी संजोए रखने का साहस करे तो समझ जाना चाहिए कि वह हर विपरीत दिशा को मोड़ने में सक्षम है | जीवन तत्वों को अपनी रचनाधर्मिता में विन्यस्त करते हुए ‘तत्वदर्शी निशंक’ जब विविध विद्वानों की लेखनी की धार से पार होकर प्रकट होते हैं, तो वे राष्ट्रवादी, विश्व मानवतावादी डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ बनकर कालजयी साहित्यकार बन जाते हैं| भारत देश के वर्तमान शिक्षामंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का राजनीतिक क्षेत्र में आना, वह भी शिक्षामंत्री के रूप में कार्यरत होना, सोने पर सुहागा हो गया है| क्योंकि भारत के स्वर्णिम वर्तमान एवं भविष्य के लिए ऐसे ही तत्वदर्शी की आवश्यकता है, जो ‘सार सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय’ की राह पर चलने का आकांक्षी हो| वे राजनीति के क्षेत्र में एक ऐसे अभिमन्यु हैं , जो चक्रव्यूह के घेरे को तोड़ने में सतत सन्नद्ध हैं| उन्हीं के शब्दों में- ‘दुष्प्रचार की आंधी में भी, निशंक अकेले खड़ा हुआ हूँ| राजनीति के चक्रव्यूह में, अभिमन्यु-सा घिरा हुआ हूँ | (संघर्ष जारी है - पृष्ठ 74)।

‘तत्वदर्शी निशंक’ ग्रंथ को आकार देने में भारत के कई राज्यों के विद्वज्जनों ने सार्थक प्रयत्न किए हैं| इस पुस्तक को छह खंडों में कुछ इस प्रकार विभाजित किया गया है कि साहित्यकार के समस्त गुणों से पाठकों एवं जिज्ञासुओं को परिचित कराया जा सके| खंड - एक में विषय प्रवेश के अंतर्गत गोपाल शर्मा ‘भूमिका दर भूमिका’' में जर्मन दार्शनिक हेगेल का उद्धरण देते हुए कहते हैं, ‘भूमिका किसी परियोजना की घोषणा मात्र है और कोई परियोजना संपूर्ण होने तक कुछ भी तो नहीं है|' (पृष्ठ 23)। इस अंश में रचनाकार निशंक के रचनात्मक वैविध्य को बताते हुए प्रोफेसर गोपाल शर्मा ने निशंक के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत भूमिका बांधी है तथा उन्हें भारतीय एवं विश्व साहित्य में रचनात्मक उद्देश्य के साथ स्थापित किया है| सक्रिय राजनीति के साथ-साथ साहित्यिक क्षेत्र के संघर्षों के बहुविध संतुलन का नाम निशंक है| ’संभावनाओं की तलाश अर्थात लेखक का जीवन मर्म’ शोधपत्र में ग्रंथ की सह-संपादक शीला बालाजी ने रचनाकार निशंक के पारिवारिक, राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक जीवन की गंभीरता से पड़ताल करते हुए इस सन्दर्भ में भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के इस वाक्य को उद्धृत किया है- ‘हिमालय से निकली निशंक की गंगामयी काव्यधारा राष्ट्र निर्माण में नींव का पत्थर बनेगी।’ (पृष्ठ 46 )।

रचनाकार की संवेदनशीलता मात्र समस्याओं के विश्लेषण तक ही सीमित नहीं है, अपितु उसके समाधान की राहों के अन्वेषण में भी तत्पर है। इसलिए ‘जड़ में चेतन तलाशने निकले निशंक की पुस्तक ‘प्रलय के बीच’ असल में निशंकजी की संवेदनाओं का प्रतीक है|’ (पृष्ठ 47)।

खंड दो ‘काव्य जगत’ नाम से अभिहित है, जिसमें चार विद्वानों के शोधपत्र संकलित हैं| प्रो. निर्मला एस. मौर्य द्वारा ‘उद्देश्य की महानता में सौंदर्य का रहस्य’ आलेख में लेखिका ने रचनाकार निशंक की काव्यपंक्तियों के उद्धरण देते हुए उनके काव्य सौंदर्य के हर कोण से पाठक को परिचित कराने का सफल प्रयत्न किया है| काव्य के उदात्त पक्ष को 'प्रतीक्षा' खंडकाव्य की इन पंक्तियों में देखा जा सकता है- ‘खुली हुई हैं आंखें उसकी/ अभी किसी प्रतीक्षा में,/ प्राण पखेरू उड़ा छोड़ जग/ एक नई अन्वीक्षा में|' (पृष्ठ 56)। लेखिका ने रचनाकार की सौंदर्य दृष्टि, निर्वेद भावना, कठोर पहाड़ी जीवन से पलायन करने की पीड़ा को अभिव्यक्ति दी है| कवि निशंक समाज के ढोंग, पाखंड , अनाचार को मानव कल्याण का सबसे बड़ा रोड़ा मानते हैं। लेखक के विश्व मानवतावाद को रचनाधर्मिता का प्राण कहा जाए तो अन्यथा न होगा| लेखिका ने कवि निशंक की कविताओं में प्रयुक्त काव्य के अन्तर्वाह्य सौंदर्य पक्ष को सोदाहरण निरूपित किया है| रस, छंद, अलंकार, रहस्यवादिता से मंडित कवि की कविताओं का सम्यक चित्रण लेखिका ने किया है| लेखिका के शब्दों में- ‘इनकी कविताओं में हमें जिस सौंदर्य के दर्शन होते हैं, वह यथार्थ, समकालीन और समसामयिकता से परिपूर्ण है|' (पृष्ठ66)। डॉ. सुपर्णा मुखर्जी कृत ‘देशप्रेम की चेतना’ आलेख के अंतर्गत कवि निशंक की देशप्रेमयुक्त काव्य रचनाओं की सुरुचिपूर्ण अभिव्यक्ति का विवेचन किया गया है| वीरप्रसू भारतभूमि की माताएँ अपनी संतान को देशसेवा के लिए समर्पित करके कैसे ईश्वर से प्रार्थना करती हैं, इसका उदाहरण कवि की इन पंक्तियों में मिल जाता है- ‘हे ईश्वर मेरे दीपू को/ परम शक्तिशाली कर दो/ रह देश-सेवा में तत्पर/ ममता भी मन में भर दो। (‘प्रतीक्षा’ खंडकाव्य, पृष्ठ 24)। साहित्यकार के त्रिकालदर्शी रूप, स्त्री चेतना के उन्नायक रूप के द्वारा समरसता भाव को लेखिका ने सुदर्शन अभिव्यक्ति दी है- ‘ऐसा क्या कार्य जगत में,/नारी जिसे न कर सकती?/दूजे पर क्यों निर्भर हो वह,/ कष्ट स्वयं निज हर सकती|' (पृष्ठ 71)।

कवि का स्वार्थहीन जीवन देशप्रेम में राष्ट्र के हित हेतु सदैव समर्पित र है| ‘किसी भी देश, समाज, परिवार और संपूर्ण विश्व को नया मार्ग युवा ही दिखा सकता है- ‘मेरे निखिल ‘समर्पण’ से अंकुर/बने हैं तो लो यह ऋतुपर्ण।/मैंने अर्पण में कभी न देखा,/जात - पात क्या कोई वर्ण./ था मेरा यह विश्व समर्पण,/ जिसको सबने ही अपनाया।' (पृष्ठ - 73)। लेखिका ने कवि के राष्ट्रप्रेम को विश्व कल्याणोन्मुखी बताया है।

डॉ. भागवतुल हेमलता कृत ‘है अंधेरा यदि कहीं तो सूर्य से तुम तेज लो’ आलेख में लेखिका ने कवि निशंक की कविता में देश की रक्षा , प्रगति तथा उन्नति हेतु कलम को कृपाण बनाकर पाषाण को भी कर्तव्योन्मुखी बनाने की क्षमता को ढूंढ निकाला है| कवि के काव्य की पावन धार में धरती को स्वर्ग बनाने की क्षमता को दिखाया गया है| ‘संघर्ष जारी है’, ‘समर्पण’, ‘मातृभूमि के लिए’ आदि कविताओं के विवेचन के साथ ही लेखिका ने तेलुगु कवि श्रीश्री द्वारा वर्णित काव्य गुणों को कवि निशंक की कविताओं में पाया है – ‘कदिलेदी कदिलिंचेदी – मारेदी मर्पिंचेदी/ पाडेदी पादिंचेदी – पेनु निद्दुरा वदिलिंचेदी /मुनुमुन्दुकु सांगिंचेदी – परिपूर्णपु ब्रतुकिच्चेदी'। (तेलुगु साहित्य चरित्र, पृष्ठ- 423)। सारांशतः लेखिका ने कवि निशंक की कविता को हिलने-हिलाने , बदलने – बदलवाने, गाने–नींद भगाने, आगे बढ़ाने के साथ ही जीवन की पूर्णता का मर्म कवि कर्म में पाया है|

‘आंधियों में जलता एक शब्द-दीप’ आलेख में डॉ. एन. लक्ष्मीप्रिया ने कवि निशंक का परिचय देते हुए उनकी रचनाओं के उद्देश्य पर प्रकाश डाला है| निशंक की काव्य रचनाओं में शब्द प्रयोग के सौंदर्य को ढूंढते हुए लेखिका ने विविध तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी, अरबी - फारसी, संख्यासूचक, पूर्ण पुनरुक्ति, अपूर्ण पुनरुक्ति शब्द तथा क्रिया रूप आदि की उदाहरण सहित विवेचना की है| लेखिका कविता में संवाद एयर एकालाप के विविध उदाहरण भी प्रस्तुत किए हैं| कवि निशंक ने संवाद शैली में अनेक कविताएँ सृजित की हैं| लेखिका ने रचनाकार के भाषिक बोध को हर कोण से विश्लेषित करते हुए उनकी बहुआयामी रचनाधर्मिता को प्रस्तुत किया है।

खंड –तीन ‘कहानियों का संसार’ में पांच लेखकों ने डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के कहानीकार रूप का विस्तृत विवेचन किया है| लेखिका डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने ‘आदर्श और यथार्थ’ आलेख के अंतर्गत बताया है कि किस प्रकार कहानीकार निशंक विविध कहानियों के माध्यम से भ्रष्टाचार और अमानवीयता की कलई खोलने का कार्य करते हैं| उनकी ‘केदारनाथ आपदा की सच्ची कहानियां’ तथा ‘प्रलय के बीच’ यात्रावृत्त में केदारनाथ में घटित विभीषिका का जीवंत चित्रण हुआ है| ‘उनकी कथनी और करनी में कहीं भी अंतर दिखाई नहीं देता| आपदा पीड़ितों की सहायता करने के लिए निशंक ही नहीं, बल्कि उनकी कहानियों के पात्र भी हमेशा तैयार रहते हैं | (पृष्ठ- 106)। लेखिका ने देवभूमि के प्रति समर्पित कहानीकार डॉ. निशंक की कहानियों में सत्तालोलुपता, महानगरीय समस्या, स्त्री पर होने वाले अत्याचार, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था आदि से जुड़े यथार्थ का विस्तृत विवेचन किया है|

‘समकालीन परिवेश’ से संबद्ध कहानियों में तीव्रतम परिवर्तित युगीन परिप्रेक्ष्य को कहानीकार निशंक के दो कहानी संग्रहों को केंद्र में रखकर डॉ. डॉली ने आद्योपांत विवेचित किया है। वे कहती हैं– चाहे आम आदमी का वर्णन हो या मध्यवर्गीय समस्या, हाशिए का समाज वर्णन हो या बाजारवाद, नई सदी का समाज हो या नैतिक मान्यताओं का विघटन, व्यवस्थाओं के प्रति घोर असंतोष की भावना हो या पारिवारिक विघटन, आम आदमी के जीने की विषम आर्थिक स्थितियां हों, चाहे निराशा और कुंठा हो अथवा राजनीति- अर्थ, धर्म व संस्कृति के बदलते स्वरूप को कहानीकार ने जीवंत अभिव्यक्ति दी है| (पृष्ठ 139)।

कहानीकार निशंक के ‘समाजदर्शन और राष्ट्रवाद’ को ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने उनके ‘एक और कहानी’ , ‘अंतहीन’ और ‘क्या नहीं हो सकता’ कहानी संग्रहों के माध्यम से व्यक्त किया है| लेखक उन्हें प्रेमचंद की परंपरा में खड़े करते हुए मानवीय मूल्यों के प्रबल पक्षधर के रूप में चित्रित करते हैं |

प्रो. श्रीलता विष्णु ने ‘मानवीयता का चतुर चित्रांकन’ आलेख में कहानीकार निशंक के ‘टूटते दायरे’ कहानी संग्रह की विस्तृत व्याख्या की है| बात टूटते दायरे की हो तो वे पहाड़ी जीवन के सौंदर्य एवं विद्रूपता की विसंगति के साथ-साथ भूमंडलीकरण तक टूटते हैं| लेखिका ने रचनाकार के द्रवित मन को टटोलने का प्रयत्न उनकी विविध कहानियों में किया है|

‘टूटता बिखरता समाज बनाम आशावादी स्वर’ आलेख में डॉ. सुषमा देवी ने ‘अंतहीन’, ‘क्या नहीं हो सकता’ तथा ‘एक कहानी और’ कहानी संग्रह की विविध कहानियों को क्रमवार रूप में विश्लेषित किया है| लेखिका ने कहानीकार निशंक के इन तीनों संग्रहों की समस्त कहानियों को आद्योपांत विवेचित करते हुए दुर्दम्य परिस्थितियों में भी रचनाकार के अखंड व्यक्तित्व को विश्व मानवतावाद के सर्वथा योग्य सिद्ध किया है|

खंड - चार ‘उपन्यास सृष्टि’ में डॉ. निशंक के उपन्यासकार रूप का विवेचन किया गया है| डॉ. बी. बालाजी ने ‘पहाड़ी जीवन का ज्वलंत दस्तावेज’ शोधपत्र के अंतर्गत डॉ. निशंक के ‘मेजर निराला’, ‘बीरा’, ‘निशांत’, ‘छूट गया पड़ाव’, ‘प्रतिज्ञा’, ’कृतघ्न’ आदि उपन्यासों को विविध कोणों से विवेचित किया है | इन उपन्यासों में पहाड़ी जीवन की दुर्दमनीयता में भी राष्ट्रभक्ति, समाजसेवा तथा उत्तरदायित्वपूर्ण भावना का सुन्दर विकास दिखाया है| उपन्यासकार ‘निशंक’ द्वारा अपने पात्रों में समाज के प्रति प्रतिबद्धता का भरपूर प्रयोग किया गया है| वे भावी पीढ़ी से सामाजिक विद्रूपताओं से समाज की मुक्ति की पूर्ण अपेक्षा करते हैं| लेखक ने उपन्यासकार निशंक की उपन्यास दृष्टि में समाजसुधार एवं पर्यावरणिक शुद्धीकरण पर अधिक जोर दिया है और दर्शाया है कि पहाड़ी जीवन की कठिनाइयों के कारण नई पीढ़ी के पलायन, शिक्षा के अभाव, स्त्री शोषण तथा शराब तस्करी में वहां की सुंदर संस्कृति विलीन होती जा रही है, जिसे बचाने का प्रयास लेखक ने अपने विविध उपन्यासों में किया है|

डॉ. मंजु शर्मा द्वारा ‘चेतना के आयाम’ आलेख में ‘बीरा’, ‘छूट गया पड़ाव’, ‘प्रतिज्ञा’ आदि उपन्यासों में उपन्यासकार निशंक की विविध आयामी चेतना दृष्टि को रूपायित किया गया है| रिश्ते-नातों के आदर्श तथा विकृत स्वरूप, लोकजीवन तथा लोक संस्कृति की दृष्टि, पहाड़ी जीवन से पलायन तथा पुनर्वास को प्रमुखता से बताया गया है| स्त्री जीवन एवं पहाड़ी जीवन की समस्याओं को ही नहीं, समाधान को भी इंगित किया गया है|

खंड-पांच ‘अकाल्पनिक गद्य’ के अंतर्गत लेखक प्रवीण प्रणव द्वारा ‘प्राकृतिक आपदा में संवेदना का मरहम : संस्मरण साहित्य’ आलेख में ‘आपदा के वह भयावह दिन’, ‘प्रलय के बीच’ संस्मरणों की परत दर परत पड़ताल की गई है| डॉ. निशंक के शब्दों में– ‘यदि समय रहते 14 या 15 जून को भी तीर्थयात्रियों को ऋषिकेश, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग और गुप्तकाशी आदि प्रमुख पडावों पर ही रोक दिया जाता तो केदारधाम , गौरीकुंड तथा रामबाड़ा में एक साथ इतने यात्री एकत्रित नहीं होते| इससे जनहानि कई गुना कम हो सकती थी , किंतु प्रबंध तंत्र की निष्क्रियता और असंवेदनशीलता ने हजारों यात्रियों की जान जोखिम में डालने का कार्य किया, जिसकी परिणति इस भयंकर त्रासदी के रूप में सामने आई|’ (पृष्ठ 243)। मौत के तांडव के बीच मानव के लोभ की पराकाष्ठा को बताते हुए , बाजारीकरण और मीडिया की भूमिका को ऐसे समय में संस्मरणकार ने उपयोगी माना है| लेखक प्रवीण प्रणव ने ‘पहाड़ों से स्नेह,संस्कृति का पुल: यात्रावृत्तांत’ शोधपत्र में ‘मॉरीशस की स्वर्णिम स्मृतियां’, ‘केदारनाथ से पशुपतिनाथ तक’, ‘एक दिन नेपाल में’, ‘खुशियों का देश भूटान’, ‘भारतीय संस्कृति का संवाहक इंडोनेशिया’ आदि यात्रावृत्तांतों का व्यापक विश्लेषण किया है| इन यात्रावृत्तांतों में यात्री के सूक्ष्म जीवन की संवेदनाओं को वहां के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक परिवेश के चित्रण में देखा जा सकता है|

डॉ. सुरेश भीमराव गरुड़ ने ‘व्यक्तित्व निर्माण के लिए : प्रेरणास्पद गद्य’ आलेख में रचनाकार के व्यक्तित्व विषयक चिंतन की सूक्ष्मता को अंकित किया है| स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर ‘संसार कायरों के लिए नहीं’ रचना में निशंक ने आज की भौतिकतावादी अंधी दौड़ में व्यक्ति को नवचेतना तथा मनुष्यता के गुणों से सराबोर किया है| (पृष्ठ 290)।

‘तत्वदर्शी निशंक’ ग्रंथ के अंतिम भाग अर्थात खंड – छह ‘विश्व दृष्टि’ के अंतर्गत ‘महामानव व्यक्तित्व के धनी निशंक’ का विविध धरातल पर परिचय दिया गया है | डॉ. चंदन कुमारी के ‘तू धरा पर फ़ैल इतना लौ तेरी आकाश ले’ शोधपत्र में रचनाकार के विविध साहित्य रूपों को विवेचित किया गया है | ‘इनके साहित्य में वृद्धावस्था विमर्श, स्त्री विमर्श, हरित (पर्यावरण) विमर्श, संस्कृति विषयक चिंतन, अस्तित्व-रक्षण बनाम प्रगति इत्यादि विषय सहज प्राप्य हैं |’ (पृष्ठ 293)।

डॉ. संगीता शर्मा के ‘समकालीन समाज की धड़कन’ आलेख में रचनाकार निशंक के बहुआयामी व्यक्तित्व को उनकी रचनाओं के माध्यम से दर्शाया गया है| मिलन विश्नोई के ‘संवेदना के धरातल’ पाठ में रचनाकार के राष्ट्रप्रेम, मानव संघर्ष और संवेदना को उकेरा गया है| डॉ. उषारानी राव के आलेख ‘आत्म मंथित तरलता की प्राणवान धारा’ में रचनाकार के विभिन्न रचनात्मक सौंदर्य को दर्शाया गया है| रचनाकार का आत्मसंघर्ष, जीवनानुभूति, परिवर्तन की आस्था के साथ व्यक्त हुआ है|

प्रो. गोपाल शर्मा कृत शोधपत्र ‘तत्वदर्शी निशंक’ में तत्वान्वेषी साहित्यकार की ध्येय दृष्टि का मंथन किया गया है| वे अपनी कृतियों में मैं रूप में प्रकट होते हैं| रचनाकार के संस्कारित व्यक्तित्व पर स्वामी विवेकानंद से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक के व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ा है| रचनाकार के भाषिक संस्कार और देशज संस्कार को उनकी रचनाओं में गहरे तक देखा जा सकता है| रचनाकार के निजी अनुभव उनके साहित्यिक विवेक का परिमार्जन करते हैं|

कुल मिलाकर ‘तत्वदर्शी निशंक’ पुस्तक को लगभग 355 पृष्ठों के साथ सजिल्द सजाया गया है, जिसमें पाठकों और शोधार्थियों को रचनाकार के वृहद् व्यक्तित्व एवं लेखन का परिमार्जित स्वरूप सहज में प्राप्त होता है| पुस्तक के संपादक प्रो. ऋषभदेव शर्मा के शब्दों में– ‘तुच्छताओं और हीनताओं के विषम अनुभव भी साहित्यकार निशंक की मनुष्यता में निष्कंप आस्था को विचलित नहीं कर पाते हैं| वे घृणा को करुणा से काटते हैं और साहित्य की उस भूमिका की साधना में जुट जाते हैं, जहाँ जननी और जन्मभूमि की अनन्य भक्ति की उदात्त भावना ही ‘विश्वबंधुत्व’ की भावना को साकार करने का आधार बनती है|’ (पृष्ठ 13)। ★

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समीक्ष्य कृति : तत्वदर्शी निशंक

सम्पादक तथा सह सम्पादक : डॉ ऋषभदेव शर्मा, श्रीमती शीला बालाजी

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन, प्रा.लि., 4/19 आसफ अली रोड, नई दिल्ली -110002

मूल्य : 700/- मात्र

प्रथम संस्करण : 2021

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समीक्षक : डॉ सुषमा देवी असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, बद्रुका कॉलेज, हैदराबाद -27, तेलंगाना।★