सोमवार, 18 मई 2026

अवधेश कुमार सिन्हा की पुस्तक "काली स्याही सूर्य शब्द" की समीक्षा





ग्लोबल साउथ की आवाज़ों का साहित्यिक दस्तावेज़ :

 काली स्याही सूर्य शब्द

- प्रवीण प्रणव


विश्व साहित्य के मानचित्र पर जब हम दृष्टि डालते हैं तो एक विचित्र असंतुलन दिखाई देता है। कुछ भाषाएँ और भूभाग केंद्र में हैं, जबकि एशिया और अफ्रीका जैसे विशाल महाद्वीपों की असंख्य आवाज़ें अब भी हाशिये पर खड़ी प्रतीत होती हैं। ‘काली स्याही सूर्य शब्द’ इसी मौन को स्वर देने वाली पुस्तक है। यह केवल साहित्यकारों का परिचय नहीं कराती, बल्कि उन भूगोलों, संघर्षों और मानवीय अनुभवों से भी हमारा साक्षात्कार कराती है, जिनसे होकर विश्व साहित्य की वास्तविक आत्मा निर्मित होती है। इस किताब का शीर्षक और कलेवर दोनों ही पाठकों के मन में इसके विषय-वस्तु के बारे में जिज्ञासा जगाने में सफल है। संभावना प्रकाशन और किताब के लेखक अवधेश कुमार सिन्हा दोनों ही इसके लिए बधाई के पात्र हैं। किताब के लेखकीय में जब लेखक, साहित्य के नोबेल पुरस्कारों की बात करते हुए लिखते हैं ‘दुनिया के 197 संप्रभु देशों में से 102 संप्रभु देशों में रहने वाली दुनिया की कुल 78 प्रतिशत आबादी में मात्र 13 साहित्यकार ही हैं, जबकि अकेले फ़्रांस के 16 साहित्यकार हैं। यदि भारत की बात की जाय तो इसके हिस्से में केवल रवीन्द्रनाथ टैगोर (ठाकुर) ही हैं। निश्चित ही यह पीड़ादायक आश्चर्य की बात लगती है।’ और तब यह स्पष्ट हो जाता है कि किताब एशिया और अफ्रीका के उन साहित्यकारों से हमें जोड़ती है जिनके शब्दों की आभा सूर्य के स्वर्णिम किरणों की तरह दमक रही है। किताब की भूमिका में वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. गोपाल शर्मा ने लिखा भी है ‘पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति इसकी विस्तृत विषय-वस्तु है। इसमें एशिया और अफ्रीका के उन प्रमुख लेखकों का समावेश है जिन्होंने न केवल अपने देशों की साहित्यिक परंपराओं को प्रभावित किया, बल्कि वैश्विक साहित्य को नई दिशा भी दिखाई। यह पाठक को केवल सूचनाएँ नहीं देती, बल्कि उसे विश्व साहित्य की आत्मा से परिचित कराती है।’

आठ-नौ वर्ष पूर्व जब हम हैदराबाद से निकलने वाली प्रतिष्ठिक साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका ‘पुष्पक’ को एक नया स्वरूप देने पर कार्य कर रहे थे तब ‘पुष्पक साहित्यिकी’ परिवर्तित नाम के साथ इस पत्रिका के स्थाई स्तंभ खण्ड में विश्व साहित्य लिखने की ज़िम्मेदारी कार्यकारी संपादक अवधेश कुमार सिन्हा को दी गई। अपने खोजी स्वभाव, गुणवत्ता से कोई समझौता न करने की ज़िद, और साहित्यिक जुनून से उन्होंने पत्रिका के हर अंक में एक बेहतरीन आलेख दिया जिसे पाठक वर्ग ने बहुत सराहा। यह स्वाभाविक ही था कि पत्रिका की प्रधान संपादक डॉ. अहिल्या मिश्र और कई और लोगों ने इन आलेखों को पुस्तकाकार लाने की माँग रखी। पत्रिका के लिए आलेख लिखते समय शब्दों की सीमा होती है। किताब की शक्ल में इन आलेखों को लाने के लिए लेखक को इन पर एक बार पुनः नए सिरे से काम करना पड़ा। पुष्पक साहित्यिकी पत्रिका का संपादक होने के नाते मैं इस यात्रा का और अवधेश कुमार सिन्हा के अथक परिश्रम का साक्षी रहा हूँ।

संग्रह में दो खण्ड हैं। पहले खंड में एशिया और अफ्रीका के वैसे साहित्यकार शामिल हैं, जिन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। इनमें रवीन्द्रनाथ टैगोर (भारत), अब्दुलराजाक गुरनाह (जंजीबार/इंग्लैंड), नाग़ीब महफूज़ (मिस्र), सैमुअल योसेफ़ एग्रॉन (इज़राइल), हान कांग (दक्षिण कोरिया), ओरहान पामुक (तुर्कीए), यासूनारी कवाबाता (जापान), वोले सोयिंका (नाइजीरिया), मो यान (चीन), नादिन गॉर्डिमर (दक्षिण अफ्रीका) शामिल हैं। दूसरे खण्ड में एशिया और अफ्रीका के वैसे साहित्यकार शामिल हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार तो नहीं मिला लेकिन जिनके साहित्य ने बहुत प्रभाव डाला। इस खण्ड में अदूनीस (लेबनान/फ्रांस), महमूद दरवेश (फ़िलीस्तीन), जीन अरसनायगम (श्रीलंका), क्वामे सेनु नेविल डॉवेस(घाना) शामिल हैं। एक आलेख ‘अफ़ग़ानी स्त्री कविताएँ’ नाम से भी शामिल है। किताब में शामिल इन साहित्यकारों के लिए वरिष्ठ साहित्यकार लाल्टू ने लिखा ‘चुने गए सभी अदीब वाक़ई विश्व-साहित्य में अव्वल दर्जे के हैं। पंद्रह रचनाकारों में विचार और शैली की व्यापकता लाज़िमी है, और इस तरह एक बेहतरीन और बड़े रचना-संसार से पाठक की वाक़फ़ियत होती है।’ पुरानी कहावत है कि एक चित्र, हज़ार शब्दों जितना प्रभावी होता है। किताब के हर लेख से पहले, साहित्यकार का चित्र उनके नाम, जन्म और मृत्यु तिथि (यदि साहित्यकार जीवित नहीं हैं) के साथ दिया गया है। पाठक के लिए यह लेख पढ़ने से पहले ही साहित्यकार के साथ एक तारतम्यता बिठाने का काम करता है।

नोबेल पुरस्कार विजेताओं में भारत के हिस्से सिर्फ़ रवीन्द्रनाथ ठाकुर ही हैं, अतः स्वाभाविक है कि किताब का पहला लेख उनके नाम का ही है। बांग्ला भाषी लोगों के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं लेकिन भारत में भी अन्य प्रांतों में उनके बारे में जानकारी का अभाव है। ऐसे में यह पुस्तक बड़े रोचक तरीक़े से संक्षिप्त में उनका जीवन परिचय पाठकों के सामने रखती है। सामाजिक सौहार्द की उनकी परिकल्पना उनके एक पत्र से स्पष्ट होती है जिसमें उन्होंने लिखा “हमें सारी संकीर्ण चारदीवारियों के पार जाना चाहिए और उस दिन का स्वप्न-संधान करना चाहिए जब बुद्ध, ईसा और मुहम्मद एक हो जाएँगे।” किताब में गीतांजलि के अनुवाद और इसे नोबेल पुरस्कार मिलने तक की घटनाओं का रोचक विवरण दिया गया है। रवीन्द्रनाथ ने पहली कविता मात्र आठ वर्ष की आयु में लिखी और सोलह-सत्रह वर्ष आते-आते उन्होंने कहानियाँ व नाटक लिखना भी आरंभ कर दिया था। 58 काव्य संग्रह, 85 से भी ज़्यादा लघु कथाएँ, 50 से अधिक संगीत नाटक/ गीतिनाट्य, कई निबंध और उनके द्वारा लिखी गई आत्मकथा - इतना विपुल साहित्य है जिस पर हर भारतीय को गर्व होना चाहिए। टैगोर को संगीत से अत्यधिक अनुराग था। उन्होंने प्रकृति, आध्यात्म, मानव प्रेम, विश्व बंधुत्व, देश प्रेम आदि पर दो हज़ार से ज़्यादा गीतों की रचना की जिनमें से अधिकतर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों में लयबद्ध होकर गेय हैं। यह रविंद्र संगीत, बांग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग है और उनकी विशाल साहित्यिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस किताब में उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘काबुली वाला’ और गीतांजलि से दो कविताएँ संकलित हैं।

अब्दुलराजाक गुरनाह के परिचय के साथ ही लेखक ने जंजीबार की राजनीतिक परिस्थिति और गुरनाह का मजबूरी में वहाँ से ब्रिटेन पलायन की पृष्ठभूमि को दर्शाया है। गुरनाह के साहित्य को समझने के लिए यह पृष्ठभूमि आवश्यक है तभी पलायन की पीड़ा और मिट्टी से बिछड़ने का दर्द समझ में आ सकता है। गुरनाह ने दस उपन्यास, कई लघु कथाएं, कथेतर साहित्य, आलेख आदि लिखे। उन्होंने संपादन का काम भी बहुत किया। उपन्यासकार अब्दुलराजाक गुरनाह को उपनिवेशवाद के प्रभावों और संस्कृतियों व महाद्वीपों के बीच की खाई में शरणार्थी की स्थिति के चित्रण के लिए साहित्य में 2021 नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लेखक ने गुरनाह के दो प्रसिद्ध उपन्यास ‘पैराडाइज़’ और ‘ग्रेवल हर्ट’ के चुनिन्दा अंश का हिंदी अनुवाद पाठकों से सम्मुख रखा है जिससे हिन्दी जगत के पाठक गुरनाह के लेखन से परिचित हो सकेंगे।

धार्मिक कट्टरता समाज में किस तरह का प्रभाव डालती है यह नाग़ीब महफ़ूज़ की जीवनी पढ़ने से ज्ञात होता है। नाग़ीब महफ़ूज़ जब सात साल के थे तभी मिस्र में नवंबर 1918 से जुलाई 1919 के बीच ब्रिटिश कब्जे के ख़िलाफ़ राष्ट्रव्यापी क्रांति हुई। उन्होंने अपने घर की खिड़कियों से ब्रिटिश सैनिकों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाते हुए देखा। इसका उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा और भविष्य में यह उनके लेखन में स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ। नाग़ीब महफ़ूज़ साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले एकमात्र मिस्री एवं अरबी लेखक हैं। हालांकि उनकी साहित्यिक यात्रा आसान नहीं रही। उनके उपन्यास ‘चिल्ड्रन ऑफ गेबेलावी’ पर ईशनिंदा का आरोप लगा। उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलीं और 1994 में कट्टरपंथी हमलावरों ने उन्हें उनके घर के बाहर चाकू मारकर घायल कर दिया जिससे उनकी दाहिनी हाथ की नसों को क्षति पहुंच और उनका लेखन प्रभावित हुआ। लेखक ने संक्षेप में महफ़ूज़ के साहित्य पर प्रकाश डाला है। नोबेल पुरस्कार मिलने पर महफूज ने कहा था ‘नोबेल पुरस्कार ने मुझे पहली बार यह एहसास दिलाया कि मेरी साहित्यिक रचनाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जा सकता है। अरब जगत ने भी मेरे साथ यह नोबेल जीता है। मुझे विश्वास है कि अब अतर्राष्ट्रीय दरवाज़े खुल गए हैं और अब से पढ़े-लिखे लोग अरब साहित्य को भी महत्व देंगे। हम उस पहचान के हक़दार हैं।”

नोबेल पुरस्कार के स्वीकृति संबोधन में महफ़ूज़ ने लिखा “यह बहुतों के लिए आश्चर्य का विषय हो सकता है कि तीसरी दुनिया से आने वाला एक व्यक्ति, कैसे कहानियाँ लिखने की मानसिक शांति पा सकता है? मैं उस दुनिया से आता हूँ को कर्ज़ों के बोझ तले दबी है, और उन्हें चुकाने की कोशिश में भुखमरी के कगार पर पहुँच जाती है। एशिया में कुछ लोग बाढ़ से मरते हैं, अफ़्रीका में अकाल से। दक्षिण अफ्रीका में लाखों लोग अस्वीकृति और मानवाधिकारों से वंचित हो कर टूट चुके हैं। वेस्ट बैंक और गाज़ा में लोग अपनी ही भूमि पर रहते हुए भी खोए हुए हैं। लेकिन सौभाग्यवश कला उदार और सहानुभूतिपूर्ण होती है। जैसे वह सुखी लोगों के साथ रहती है, वैसे ही वह दुखी लोगों को भी नहीं छोड़ती। यह दोनों को ही अपने हृदय की गहराइयों को अभिव्यक्त करने का माध्यम प्रदान करती है।” लेखक ने महफ़ूज़ की प्रसिद्ध कहानी ‘निस्फ़ याम’ जो अंग्रेजी में ‘हाफ़ ए डे’ नाम से प्रकाशित हुई, का हिंदी अनुवाद ‘आधा दिन’ के नाम से किया है। किताब की भूमिका में प्रो. गोपाल शर्मा ने ठीक ही लिखा है – ‘पुस्तक पढ़ते हुए बार-बार यह महसूस होता है कि साहित्य भौगोलिक सीमाओं से कहीं बड़ा होता है। लेखक ने यह दिखाया है कि चाहे अफ़्रीका का संघर्षमय इतिहास हो या एशिया की सांस्कृतिक जटिलताएं हों, साहित्य हर जगह मानव मन की पीड़ा, जिज्ञासा, संघर्ष और आशा को व्यक्त करता है। एक लेखक को पढ़ना, उसके समाज और समय को समझने का अवसर भी होता है।’

एक तरफ़ जहाँ संघर्ष है वहीं एक साहित्यकार के तौर पर प्रतिष्ठा भी देखने को मिलती है। इज़राइली साहित्यकार सैमुएल योसेफ़ एग्रॉन अपने देश में इतने प्रसिद्ध हुए कि जब उन्होंने नगरपालिका से यह शिकायत की कि उनके घर के नजदीक यातायात के शोरगुल से उनके काम में बाधा पहुंच रही है, तो शहर में उस सड़क को गाड़ियों के लिए बंद कर एक साइनबोर्ड लगा दिया गया जिस पर लिखा था - ‘किसी भी वाहन का प्रवेश वर्जित, लेखक काम कर रहे हैं।’ अवधेश कुमार सिन्हा ने उनकी कहानी ‘ऑर्केस्ट्रा’ का हिन्दी अनुवाद (अंग्रेजी से) किया है और पाठकों के लिए इस किताब में प्रस्तुत किया है। कोरिया एवं एशिया की पहली महिला साहित्यकार हान कांग को 2024 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया। इस किताब में लेखक ने उनके उपन्यास ‘द वेजेटेरियन’ के अंश का हिंदी अनुवाद दिया है। साथ ही हान कांग की दो कविताओं का हिंदी अनुवाद भी दिया गया है। अवधेश कुमार सिन्हा जो ख़ुद एक कवि और कहानीकार हैं, उनके अनुवाद में सरलता और प्रवाह दोनों है। जब वे कविता का अनुवाद करते हैं तो उस कविता में लयात्मकता होती है। कई बार अनूदित रचनाओं को पढ़ते हुए जिस सपाटबयानी का बोध होता है, उनसे यह अलग है। लेखक को इन प्रसिद्ध रचनाकारों के व्यक्तिगत और साहित्यिक परिचय को संक्षिप्त लेकिन प्रभावी प्रस्तुति के लिए तो धन्यवाद दिया जाना ही चाहिए लेकिन इनसे भी ज़्यादा उन्हें अनुवाद कार्य के लिए धन्यवाद दिया जाना चाहिए। अंग्रेजी से हिंदी में उन्होंने जिस निपुणता से उपन्यास, कहानी, कविता आदि का अनुवाद किया है, इस क्षेत्र में उनसे और योगदान की अपेक्षा पाठकों को अवश्य रहेगी।

ओरहान पामुक जो तुर्किए के सबसे ज़्यादा बिकने वाले साहित्यकारों में शुमार हैं, ने वैश्विक सौहार्द के संदर्भ में लिखा “मैं उस तरह का लेखक बनना चाहता हूँ कि वाज इस्तांबुल के रंगों को महसूस करे, उन्हें आत्मसात करे और देखे, लेकिन यह भी माने कि दुनिया के सारे लोग किसी न किसी अर्थ में एक जैसे ही हैं, भले संस्कृति अलग है, इसीलिए वे व्यवहार अलग करते हैं।” असहमति की आवाज़ के लिए उन्होंने कहा ‘यदि केंद्रीय अधिनायकवाद, राष्ट्रीय कट्टरवाद या धार्मिक कट्टरवाद, व्यक्तिगत स्वतंत्रता तो दबाने की कोशिश करता है तो कुचले जाने के भय से बिना डरे हुए ऐसे लोग अपनी बात कहेंगे तथा सारे परिदृश्य में एक संतुलन पैदा करेंगे।’ स्वतंत्र अभिव्यक्ति के हिमायती होने की वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा। किताब में लेखक ने उनके उपन्यास ‘माई नेम इज़ रेड’ के दो अंशों का हिंदी अनुवाद किया है।

एशिया और अफ्रीका के जिन साहित्यकारों ने अपनी कलम से अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज करवाया उनकी यात्रा आसान नहीं रही। जापान के यासुनारी कवाबाता का जीवन कठिन रहा। पिता की तरफ़ से सभी सदस्यों की मौत एक के बाद एक करके उनके बचपन में ही हो गई। उनकी रचनाओं में उनके जीवन में व्याप्त अलगाव देखने को मिलता है। उन्होंने कहा उनके लेखन पर युद्ध सबसे गहरा प्रभाव डालने वाले तत्वों में से एक था और जापान में युद्ध के बाद वह केवल शोकगीत ही लिख सकते थे। साहित्य का नोबेल पुरस्कार पाने वाले वे पहले जापानी थे। 1972 में गैस से हुई उनकी मृत्यु को कई लोग आत्महत्या मानते हैं और कई दूसरे लोग इसे एक दुर्घटना। लेखक ने कहानी संग्रह ‘तेनोहीरा नो शोसेत्सू’ से एक कहानी के अंग्रेजी संस्करण का हिंदी अनुवाद कर, इस किताब में दिया है। इसका एक अंश है – ‘आज रात मैंने अपनाया जीवनसंगिनी को/ जब मैंने उसका आलिंगन किया - स्त्री सुलभ कोमलता/ मेरी माँ भी एक स्त्री थी/ छलकते हुए आँसू, मैंने अपनी नवविवाहिता को कहा/ एक अच्छी माँ बनो/ एक अच्छी माँ बनो/ क्योंकि मैंने अपनी माँ के बारे में कभी नहीं जाना।’

वॉल सोयिंका, अफ़्रीका के महानतम लेखकों में शुमार हैं लेकिन उन्हें कई बार अपने विचारों की वजह से जेल यात्रा करनी पड़ी। मो यान को सबसे प्रसिद्ध, अक्सर प्रतिबंधित और व्यापक रूप से पायरेट किए गए चीनी लेखकों में से एक माना जाता है। ग़रीबी इतनी कि बचपन में अगला खाना मिलेगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता था। उनके भेड़ चराने से ले कर साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतने तक की यात्रा यह किताब बहुत रोचक ढंग से प्रस्तुत करती है। नादिन गॉर्डिमर, दक्षिण अफ्रीका की अपने समय की सबसे सम्मानित लेखिका और राजनीतिक कार्यकर्ता रही हैं। रंगभेद के ख़िलाफ़ उन्होंने लंबे समय तक कार्य किया। अदालत में नेल्सन मंडेला द्वारा दिए गए प्रसिद्ध भाषण ‘आई एम प्रीपेयर्ड टू डाई’ का संपादन करने में नादिन गॉर्डिमर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनकी कई रचनाओं पर दक्षिण अफ़्रीका में कई वर्षों तक प्रतिबन्ध लगाया गया। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अहिल्या मिश्र ने इस किताब के लिए लिखा – ‘यह संग्रह न सिर्फ़ संस्कृतियों के बीच संवाद का माध्यम बना है बल्कि इसने विश्व साहित्य की मूल आत्मा को पुनर्जीवित किया है। ‘काली स्याही सूर्य शब्द’ वैश्विक चेतना के उन झरोखों को खोलती है, जिनसे छनकर आती रोशनी अंतर्मन को छू लेती है।’

खण्ड दो में विश्व के कुछ अन्य ऐसे साहित्यकारों को लिया गया है जिनकी साहित्यिक उपलब्धियां और साहित्यिक स्वीकार्यता किसी नोबेल पुरस्कार विजेता से कम नहीं। इस खण्ड में सबसे पहले अदूनीस है जो सीरिया में जन्मे और बाद में लेबनान के नागरिक बने। वे अरब के सबसे ख्यातिलब्ध कवि, साहित्यिक आलोचक एवं समकालीन अरब कविता के आधुनिकतावादी आंदोलन के अग्रदूत हैं। वर्ष 1985 से अदूनीस पेरिस में रह रहे हैं। अदूनीस की कविता का हिंदी अनुवाद करते हुए लेखक ने लिखा है – ‘गुम हो गया है मेरा शहर/ इसके रास्तों को इसलिए मैंने ढूंढा हड़बड़ाहट में/ और देखा चारों और - केवल क्षितिज/ और महसूस किया मैंने कि/ जो छोड़ जाते है कल, या लौटते हैं कल/ उनकी यादों को मिटाता हूँ मैं अपने पृष्ठ पर।’ विश्व साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए महमूद दरवेश कोई अनजाना नाम नहीं है। फ़िलिस्तीनी कवि एवं लेखक महमूद दरवेश को वहाँ का राष्ट्रीय कवि माना जाता है। लेखक ने उनके व्यतित्व और कृतित्व का परिचय देते हुए उनकी चुनिंदा कविताओं का हिंदी में अनुवाद कर अपने पाठकों के लिए परोसा है। ऐसे ही श्रीलंका की साहित्यकार जीन अरसनायगम और घाना के क्वामे सेनु नेविल डॉज़ के व्यक्तित्व और कृतित्व की झलक भी इन से जुड़े आलेखों में मिलती है।

इस किताब में ‘अफ़ग़ानी स्त्री कविताएँ’ लेख एक अपवाद है। अपवाद इस मामले में कि सभी आलेख किसी एक साहित्यकार के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित हैं लेकिन यह आलेख एक नहीं, बल्कि चार अफ़ग़ानी कवयित्रियों से हमारा परिचय करवाता है। अफ़ग़ानिस्तान में संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। ऐसे में महिला साहित्यकारों के लिए अपनी जगह बनाना आसान नहीं। अपने वतन की हिंसा एवं धार्मिक रूढ़ियों से त्रस्त कई अफ़ग़ानी लेखिकाएं आज विदेशों में निर्वासन की ज़िंदगी बसर कर रही हैं। किताब में नादिया अंजुमन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर बात की गई है। 1980 में अफ़ग़ानिस्तान में जन्मी नादिया की पढ़ाई स्कूल बंद कर दिए जाने से बाधित हुई। तालिबानी शासन खत्म होने के बाद 2002 में उन्होंने साहित्य में स्नातक किया। शादी के बाद ससुराल वालों ने इन्हें साहित्यिक गतिविधियों से दूर रहने को कहा लेकिन नादिया सक्रिय रहीं। 2005 में उनका पहला कविता संग्रह ‘गुल-ए-दूदी’ (धुँए का फूल) प्रकाशित हुआ जो बहुत चर्चित रहा। कहा जाता है उनके पति ने 2005 में उनकी हत्या कर दी। उनकी एक कविता का हिंदी अनुवाद लेखक ने किया है। कविता के अंश हैं - ‘धन्य है यह दुनिया जहाँ/ मैं रोऊँ या हसूँ/ जीऊँ या मरूँ मैं/ नहीं है कोई साझा करने को मेरी व्यथा/ मैं और यह बंदीगृह/ धकेल दी गई है शून्य में अभिलाषा मेरी/ मेरा जन्म हुआ व्यर्थ/ जन्म केवल चुप रहने के लिए/ दिल! मैं जानती हूँ गुज़र गया है वसंत/ और इसकी ख़ुशी भी/ किंतु मैं उड़ूँ कैसे/ इन कटे पंखों से?/ पूरे समय रही हूँ चुप भले ही/ पर सुना है नज़दीक से मैंने/ दिल मेरा गुनगुनाता है अभी भी उसके गीत/ हर क्षण जन्म लेता है नया उसके लिए/ एक दिन तोड़ दूँगी यह कैदखाना/ इसका एकाकीपन/ पीऊँगी मदिरा आनंद का/ गाऊँगी जैसे चिड़िया गाती है वसंत में।’

परवीन पज़वाक की भी चर्चा किताब में की गई है। इनका जन्म (1967) काबुल में साहित्यिक परिवार में हुआ। सोवियत रूस द्वारा आक्रमण से समय दो वर्षों तक पाकिस्तान में शरणार्थी की तरह रहीं और इसके बाद कनाडा चली गईं। वर्तमान में कनाडा रह रही हैं। इनकी कविता ‘सूरज की मौत’ के अनुवाद का अंश - ‘आपने, जिसने उम्मीद की पेड़ से/ तोड़ा नहीं है एक भी पत्ता/ आप अंधकार के महासागर से क्या/ कभी बना पाएंगे/ रोशनी का एक पुल?/ ओह, अपनी ही दुनिया के आप सभी बंदी/ क्या कभी भी, क्या कभी भी/ दौड़ पाएंगे तेजी से रोशनी की ओर?’

ऐसे ही बहर सईद और मीना किश्वर कमाल का परिचय और इनकी रचना भी शामिल है। मीना किश्वर कमाल के पति की पहले हत्या कर दी गई और 31 वर्ष की आयु में इनकी हत्या भी कट्टरपंथियों द्वारा क्वेटा में कर दी गई। मीना किश्वर कमाल आज नहीं हैं लेकिन उनका कथन ‘अफ़ग़ान की औरतें सोये हुए शेरों की तरह हैं, वे जागने पर किसी भी सामाजिक क्रांति में एक आश्चर्यजनक भूमिका अदा कर सकती हैं’ आज भी उम्मीद की एक लौ बना हुआ है। मेरे लिए यह आलेख इस किताब का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। एक तो यह महिलाओं की आवाज़ को हमारे सामने लाता है और विशेषकर ऐसी महिलाओं की आवाज़ों को जिनकी स्याही से निकले शब्द अभी सूर्य नहीं बने, यानी जिन्हें अभी मंजिल नहीं मिली, जिनका संघर्ष अभी जारी है। वैश्विक पाठकों को ऐसी महिलाओं, ऐसे साहित्य, ऐसे संघर्ष से परिचित होना और उनके हक़ में आवाज़ उठाना ही चाहिए।

किताब के लेखक अवधेश कुमार सिन्हा की रुचि इतिहास में है। यही वजह है कि इनके आलेखों को पढ़ते हुए पाठक विश्व राजनीति से भी अवगत होता रहता है। लेखक ने इस किताब के लेखों में जो विधा चुनी है उसमें नदी के दो तटबंधों की तरह एक तरफ़ राजनीतिक परिदृश्य और दूसरी तरफ़ साहित्यकार के जीवन का संघर्ष चलता रहता है और बीच में मीठी जलधारा की तरह लेखक ने साहित्यकार के साहित्य को पाठकों के लिए सुलभ किया है। विश्व साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह एक ऐसी किताब है जो उनके संग्रह में होनी ही चाहिए। प्रसिद्ध साहित्यकार अरुण कमल ने ‘काली स्याही सूर्य शब्द, एक कल्पवृक्ष की तरह है।’ कहते हुए इसकी महत्ता को रेखांकित कर दिया है। आशा की जानी चाहिए कि यह किताब सुधि पाठकों तक पहुँचे और साहित्य जगत में इस पर चर्चा हो। किताब के लेखकीय में लेखक ने नोबेल पुरस्कारों में जिस क्षेत्रीय असमानता की बात उठाई है उसे शिक्षाविद और साहित्यकार प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने भी यह कहते हुए अपना समर्थन दिया है – ‘विश्व साहित्य के मानचित्र को अधिक न्यायपूर्ण बनाने और सदियों से दबी ग्लोबल साउथ की आवाज़ों को सुनने का आमंत्रण देती सर्वथा प्रासंगिक कृति। और एक सवाल भी : विश्व साहित्य का केंद्र आख़िर कब तक यूरोप रहेगा?’ ‘काली स्याही सूर्य शब्द’ केवल विश्व साहित्य के कुछ महत्वपूर्ण रचनाकारों का परिचय नहीं है; यह उन आवाज़ों की पुनर्खोज है जिन्हें लंबे समय तक विश्व साहित्य की मुख्यधारा में अपेक्षित स्थान नहीं मिला। यह पुस्तक पाठक को यह सोचने के लिए विवश करती है कि साहित्य का वास्तविक केंद्र कहाँ है? सत्ता के स्थापित भूगोलों में या संघर्ष, विस्थापन और मानवीय जिजीविषा से भरी उन आवाज़ों में जो सीमाओं के पार भी मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती हैं। हिंदी जगत में इस तरह की पुस्तकों का स्वागत होना चाहिए, क्योंकि वे हमारे साहित्यिक क्षितिज को अधिक व्यापक, अधिक मानवीय और अधिक वैश्विक बनाती हैं। O



मंगलवार, 12 मई 2026

पुस्तक समीक्षा : उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन


बेमिसाल हरिहरन

- आर्या झा (हैदराबाद)

ग़ज़ल के कहन की विविधता से भला कौन अनजान होगा यह तो कोमल मन को सहजता से छूकर ज़ेहन में उतरने में दक्ष होती हैं और उस पर मखमली मुलामियत लिए श्री हरिहरन जी की रुहानी आवाज़ हो तो कमाल होना तो बनता ही है।

हम बात कर रहे हैं सर्व भाषा ट्रस्ट से प्रकाशित कहकशां फाउंडेशन के अध्यक्ष श्री आनंद कक्कड़ द्वारा लिखित साहित्य आजतक के मंच पर स्वयं हरिहरन के हाथों विमोचित पुस्तक “उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन” की। 


उनके पचास वर्षों के अद्भुत योगदान को इस पुस्तक के ग्यारह अध्याय के अन्तर्गत समाहित किया गया है जो ग़ज़ल के विभिन्न घरानों से गुज़रते हुए हरिहरन घराने पर आकर रुकती है जिसमें हरिहरन के आरंभिक जीवन व उनके ग़ज़ल के प्रति अतिरिक्त रुझान के राज़ खोलती है और ताज्जुब की बात तो यह है कि आज इन ऊँचाइयों पर पहुँच कर भी वे विद्यार्थी समान सतत प्रयत्नशील रहते हैं शायद यही उनकी सफलता का राज़ भी है और वह बड़ी ही सादगी से इसका श्रेय अपने तीनों गुरुओं, माँ श्रीमती अलामेलु, उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान साहब एवं रुहानी गुरु जनाब मेंहदी हसन साहब को देते नहीं थकते हैं जो उन्हें और भी अनूठा बनाती है।

जिस तरह से उन्होंने अपने गीतों व ग़ज़लों के माध्यम से संपूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोया है उन्हें सांस्कृतिक राजदूत कहना पूर्णतया न्यायोचित है। जहाँ एक ओर पूरे विश्व में क्षेत्रवाद की लहर चरम पर है वहीं वह दिलों को जोड़ने की बात करते हैं।

इतना ही नहीं उनके गायन की तकनीकी विविधता ने हमेशा से जेनरेशन गैप को भी कम किया है। शायद ही कोई ऐसा हो जिसकी ज़ुबान पर “काय झाल” न चढ़ा हो। एक ओर मेंहदी हसन साहब की तर्ज़ पर बेमिसाल ग़ज़ल गायिकी तो दूसरी ओर कोलोनियल कजिंस, जैज़ और उर्दू ब्लूज और इस तरह से हर वर्ग हर क्षेत्र के लोगों को एक छत के नीचे लाने में सक्षम है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ हरिहरन ही कर सकते हैं। यहाँ तक कि स्वयं की गायन शैली में निरंतर बदलाव करते हुए जिस प्रकार पिछले पाँच दशकों से सतत क्रियाशील हैं वह एक पद्मश्री नहीं बल्कि अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित होने योग्य हैं!

इस किताब की उपयोगिता की बात करें तो जावेद अख़्तर साहब ने कहा है कि “ इस किताब की जो सबसे बड़ी अहमियत है,वह यह है कि आनन्द कक्कड़ ने इसमें हरिहरन की उन बातों को समेट कर बताया है जो 50 सालों से बिखरी हुई थीं।” आगे यह भी कहा कि उन्हें यक़ीन है कि इसे पढ़ते हुए पाठकों को हरिहरन का असली योगदान समझ में आएगा। उनकी बात से सौ फ़ीसदी ताल्लुक़ रखते हुए मुझे भी यह लगता है कि यह किताब करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बनेगी और परिस्थितियों को अपनी मेहनत के बल पर बदलने वाले हरिहरन एक सच्चे आदर्श के रूप में उभर कर सामने आएँगे।

सरोद सम्राट अमजद अली खान ने हरिहरन की संगीत सेवा को देखते हुए जिन तीन उपाधियों से नवाज़ा उनमें एक उस्ताद हरिहरन था तो उनके कहे का अमल करते हुए पुस्तक का नाम, “उस्ताद -ए-ग़ज़ल हरिहरन” रखा गया। हरिहरन साहब की एकदम साफ़ तलफ़्फ़ुज़ उर्दू ज़बान पर उन्होंने यह भी कहा कि “एक दक्षिण भारतीय होते हुए कोई ग़ज़ल गाए और उर्दू से डील करे यह अपने आप में बहुत बड़ा करिश्मा है, खुदा की देन है और एक बड़ी कामयाबी है।”

पुस्तक में सर्वप्रथम ग़ज़ल और उसके घरानों से होते पाठक जब हरिहरन घराने पर ठहरते हैं तो हरिहरन साहब के गुरु, उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान साहब के कुशल प्रशिक्षण, उनकी सलाहियत पर उर्दू ज़बान सीखने की कोशिश इत्यादि की जानकारी मिलती है। हरिहरन साहब के रियाज़ की निरंतरता एवं ग़ज़लों के कंपोज़िशन पर अथक परिश्रम के परिणामस्वरूप विश्वस्तरीय सफलताओं का ज़िक्र बेहद सुखद प्रतीत होता है । आगे लेखक एक श्रोता के तौर पर जब उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन के साथ संवाद कर उनके जीवन के अनुभवों को कलमबद्ध करते हैं तो उनसे गुज़रते हुए पाठकों की जिज्ञासा शांत होती है।

इसके विभिन्न अध्यायों में लेखक ने हरिहरन के जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों एवं उपलब्धियों का उल्लेख किया है तथा गायिकी के सफ़र के प्रतिनिधि साथियों का उनके प्रति उद्गार को भी प्रस्तुत किया है जो हरिहरन के सम्पूर्ण व्यक्तित्व व कृतित्व के रेशे-रेशे से परिचित कराते हैं।

पुस्तक की एक विशेषता यह भी है कि इसे आज की पीढ़ी को मद्देनज़र रखते हुए लिखा गया है ताकि वह ग़ज़ल की गहराइयों में उतर सकें उन्हें महसूस कर सकें और उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतार सकें ।

अध्याय ‘रुबरु’ के दौरान रचयिता के प्रश्न यूँ प्रतीत होते हैं जैसे लंका पार करने के पूर्व हनुमान जी को उनकी शक्तियां याद दिलाई गईं हों जो इस बात का द्योतक है कि कुछ और बेहतरीन ग़ज़ल अल्बम अवश्यंभावी हैं और वे भी हमेशा की तरह कुछ नये प्रयोगों के साथ प्रस्तुत होगी ।

किताब शुरुआत से लेकर आख़िर तक बेहद रुचिकर बन पड़ी है जिसे पढ़ते हुए जाने-अनजाने हरिहरन के मधुर स्वर में गाई ग़ज़लें ज़ेहन में उतर आती हैं जो किताब पढ़ने की प्रक्रिया को सुर देती महसूस होती हैं और आख़िरी अध्याय में पचास सुपरहिट ग़ज़लों से गुज़रना बोनस साबित होता है।

अंत में यह किताब न केवल पठनीय है बल्कि संग्रहणीय भी है। मैं तो यह कहूँगी कि यह पुस्तक एक अनोखी अभिव्यक्ति है जो एक लीजेंड को एक प्रशंसक की ओर से भेंट किया गया फूलों का गुलदस्ता है जिसकी ख़ुशबू कभी कम न होगी।

आखिर में उस्ताद ए ग़ज़ल - हरिहरन पुस्तक हरिहरन जी के ग़ज़ल प्रेम और संगीत के लिए लिए अनवरत तपस्या का एक ऐसा जीवंत दस्तावेज़ है जो आज के श्रोताओं को आपका समग्र परिचय है। मौलिक ग़ज़ल कंपोजर और गायक के रूप में हरिहरन के लिए उन्हीं को ग़ज़ल का एक मतला समर्पित है:-

वो सरफिरी हवा थी संभलना पड़ा मुझे
मैं आखिरी चराग़ था जलना पड़ा मुझे। 000




शुक्रवार, 27 मार्च 2026

अवधेश कुमार सिन्हा के ग्रंथ 'काली स्याही सूर्य शब्द' की समीक्षा



एफ्रो-एशियाई साहित्य की चमक 
‘काली स्याही सूर्य शब्द’
- डॉ. रक्षा मेहता

कितना अच्छा हो यदि कोई साहित्यप्रेमी या कलाप्रेमी विश्व साहित्य से जुड़ना चाहे और इसके लिए उसे देश-विदेश के विविध पुस्तकालयों की खाक न छाननी पड़े। साहित्य-सागर में से सबसे चमकीले तथा बहुमूल्य मोतियों का भंडार उसके सामने प्रस्तुत कर दिया जाए, तो इससे बड़ा उपहार एक साहित्यप्रेमी  के लिए और कुछ हो ही नहीं सकता। ऐसी ही अमूल्य निधि के रूप में सृजित की गई है, विश्व साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान और समीक्षक अवधेश कुमार सिन्हा (1950) विरचित पुस्तक ‘काली स्याही सूर्य शब्द’ (2026: संभावना प्रकाशन, हापुड़: पृष्ठ 288, पेपरबैक: 499 रुपए), जिसमें एशिया तथा अफ्रीका के नोबेल पुरस्कार विजेता दस लेखकों व कवियों की कालजयी रचनाओं के साथ-साथ पाँच अन्य बेहतरीन साहित्यकारों की रचनाओं का हिंदी रूपांतरण प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक का अत्यंत रोचक पक्ष यह है कि पाठक न केवल इन कविताओं, कहानियों, नाटकों तथा उपन्यासों के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंशों को पढ़ता है, अपितु इनके मूल रचनाकारों के जीवन से भी अत्यंत गहराई से जुड़ता है। 

प्रत्येक रचनाकार की रचना से पूर्व उनके जन्म, शिक्षा-दीक्षा, पारिवारिक परिवेश, व्यक्तिगत समस्याएँ, चुनौतियाँ, लेखन की प्रेरणा, लेखन विषय, रचनाकर्म, भाषा-शैली, तत्कालीन परिस्थितियाँ आदि महत्त्वपूर्ण विषयों पर इतनी गहनता से लिखा गया है कि पाठक स्वतः ही उस देश-काल में पहुँचकर इन रचनाकारों से इस प्रकार जुड़ जाता है मानो वह इन्हें निजी रूप से जानता हो। इस सामग्री को अत्यंत रोचकतापूर्वक शब्दबद्ध किया गया है तथा रचनाकारों के निजी जीवन से प्रामाणिक उदाहरण देकर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से पाठकों को रू-ब-रू कराया गया है। कथा साहित्य की बात करें तो, इस पुस्तक में रवींद्रनाथ ठाकुर (भारत) की भावनात्मक गहनता पर आधारित बांग्ला कहानी ‘काबुलीवाला’ के साथ-साथ गुरना (जंजीबार/ इंग्लैंड) के उपन्यास ‘पैराडाइज़’ के एक अंश, नागीब महफूज (मिस्र) की कहानी ‘हाफ ए डे’, सैमुएल योसेफ़ एग्नॉन (इज़राइल) की हिब्रू भाषा में लिखी कहानी ‘ऑर्केस्ट्रा’, हॉन कांग (दक्षिण कोरिया) द्वारा कोरियन भाषा में रचित उपन्यास ‘द वेजिटेरियन’ का एक अंश, ओरहान पामुक (तुर्की) के उपन्यास ‘माई नेम इज़ रेड’ का अंश, यासूनारी कवाबाता (जापान) की जापानी कहानी ‘मदर’, वोले सोयिङ्का (नाइजीरिया) का नाटक ‘ए डांस ऑफ द फोरेस्ट्स’, मो यान (चीन) के चीनी उपन्यास ‘रेड सोरघम’ का अंश, नादिन गॉर्डिमर (दक्षिण अफ्रीका) के उपन्यास ‘बर्गर्स डॉटर’ के एक अंश का उत्कृष्ट हिंदी रूपांतरण पढ़ने को मिलता है।   

जब पाठक रवींद्रनाथ ठाकुर की कहानी ‘काबुलीवाला’ या उनकी कविताएँ ‘मैं अनेक वासनाओं को चाहता हूँ प्राणपन से’ अथवा ‘भजन, पूजन, साधना, आराधना’ पढ़ता है, तब वह केवल इस कहानी या इन कविताओं से ही नहीं जुड़ता अपितु उनका जीवन-परिचय पढ़कर इस तथ्य से भी अवगत होता है कि कवींद्र रवींद्र अमानवीयता के विरोधी थे, मानवतावाद को राष्ट्रवाद से ऊपर रखते थे किंतु राष्ट्रविरोधी कतई नहीं थे। अवधेश सिन्हा एक स्थान पर लिखते हैं– “13 अप्रैल, 1919 को ब्रिटिश शासन द्वारा किए गए जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के विरोध में रवींद्रनाथ ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अपनी नाइटहुड की उपाधि लौटाकर दिखा दिया कि वे अराष्ट्रीय नहीं थे।” (पृ. सं. 27)। इस पुस्तक के माध्यम से यह ज्ञात होता है कि रवींद्र कबीरदास की ही भाँति आत्मा-परमात्मा के मिलन में विश्वास करते थे, मृत्यु को भय नहीं, वरदान मानते थे, संगीत प्रेमी थे तथा आध्यात्मिक रहस्यवाद उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देता है। 

गुरना के रचनाकर्म में उनके समय की सामाजिक, सांस्कृतिक तथा व्यापारिक परिस्थितियों का स्पष्ट चित्र खींचते हुए अवधेश जी लिखते हैं– “अपनी सभी कृतियों में गुरना ने पूर्व-औपनिवेशिक अपरिवर्तित अफ्रीका के लिए सर्वमत विषाद से बचने का प्रयास किया है । उनकी स्वयं की पृष्ठभूमि हिंद महासागर में सांस्कृतिक विविधताओं से भरे एक ऐसे द्वीप की है, जिसका पुर्तगाली, अरब, जर्मन व ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्तियों के अधीन गुलामों के व्यापार एवं दमन के भिन्न रूपों का तथा पूरी दुनिया के साथ व्यापारिक संबंध का इतिहास रहा है।” (पृ. सं. 57)। सुखद अंत होने की पाठकों की अपेक्षाओं को निराश कर देने के गुरना के वैशिष्ट्य से यह पुस्तक परिचित कराती है। इसी प्रकार नागीब महफूज़ के अस्तित्ववादी, मार्क्सवादी, यथार्थवादी, रहस्यवादी, समाजवादी, राष्ट्रवादी, लोकतांत्रिक तथा दार्शनिक दृष्टिकोण से लेखक अपनी इस पुस्तक के माध्यम से पाठक को सहज ही जोड़ देते हैं। 

सैमुएल योसेफ़ एग्नॉन की हिब्रू भाषा में लिखी कहानी ‘ऑर्केस्ट्रा’ में एक स्थान पर लिखा है– “मेरी आदत प्रतिदिन सूर्योदय के समय टहलने की थी, लेकिन उस दिन मैं सुबह तीन बजे ही जाग गया क्योंकि यह ज़ेखोर ब्रिट (रोश हशना का पूर्व दिन) की रात थी, एक रात जब सामान्य से पहले ही लोग सेलीचोट (हिब्रू एलुल के महीने के दौरान प्रायश्चित के दिन की जाने वाली अतिरिक्त क्षमा प्रार्थनाएँ) पढ़ने के लिए उठ जाते हैं।” (पृ. सं. 97) यहाँ अवधेश सिन्हा  यह समझाना नहीं भूलते कि रोश हशना यहूदी नववर्ष होता है तथा उससे पहले के दिन व उस महीने लोग क्या-क्या महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं। इस तरह वे पाठकों को हिब्रू सांस्कृतिक तथा धार्मिक मान्यताओं से जोड़ देते हैं, जो निश्चित रूप से उनकी प्रखर मेधा तथा साहित्यिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता का प्रमाण है। साथ ही वे एग्नॉन की यथार्थवादी रचनाओं में आध्यात्मिक रहस्यवाद के दर्शन भी कराते चलते हैं। 

हान कांग के उपन्यास ‘द वेजिटेरियन’ के अनूदित पाठ में  एक स्थान पर ‘गरम-गरम शाबू-शाबू शोरबे का ज़िक्र आता है, जिसका अर्थ ‘मांस व सब्जियों को एक साथ एक विशेष प्रकार के सुगंधित शोरबे में पकाया गया भोजन’ है। यह इस बात की पुष्टि करता है कि अन्य देशों के खान-पान (जो कि भारत से सर्वथा भिन्न हैं) की बारीकियों को भी इस पुस्तक में उकेरा गया है।

पामुक के जीवन से ली गई कहानी पर आधारित उपन्यास ‘माई नेम इज़ रेड’ के अनूदित अंश में एक स्थान पर व्हाइट शीप का ज़िक्र आता है, जहाँ यह समझाया गया है कि ‘व्हाइट शीप’ तुर्कमान फ़ारस की संस्कृति से प्रभावित सुन्नी तुर्कों का एक जनजातीय परिसंघ था। यह उल्लेख पाठक को एक भिन्न सांस्कृतिक तथा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जोड़ देता है; और यही है इस पुस्तक के रचनाकार का विलक्षण कौशल। 

अवधेश कुमार सिन्हा पाठक को कहीं ‘यासूनारी कवाबाता’ के अलगाववाद तथा एकाकीपन से जोड़ देते हैं, तो कहीं ‘वोले सोयिङ्का’ के काव्यात्मक प्रतीकवाद व राजनीतिक व्यंग्य से। वोले सोयिङ्का की कविता ‘भोर में मौत’ में प्रयुक्त विशुद्ध भारतीय शब्द ‘अनुष्ठान’ अपने आप में एक विलक्षण प्रयोग है। लेखक कहीं ‘मो यान’ के लेखन काल की वैचारिक मुक्ति व साहित्यिक उत्साह से परिचित कराते हैं, तो कहीं ‘नादिन गॉर्डिमर’ के राज्य नियंत्रण विरोधी विचारों से। इन सबके अतिरिक्त अदूनीस (लेबनान/ फ्रांस), महमूद दरवेश (फ़िलिस्तीन), जीन अरसनायगम (श्रीलंका), क्वामे सेनु नेविल डॉज़ (घाना) तथा अफ़गानी स्त्री कविताओं की सटीक हिंदी प्रस्तुति भी इस पुस्तक को पठनीय, मननीय और संग्रहणीय बनाती है। अंग्रेजी से इतर रचनाओं के हिंदी अनुवाद हेतु उनके प्रामाणिक अंग्रेज़ी अनुवादों को आधार बनाया गया है। 

यह देखकर सुखद विस्मय होता है कि लेखक अवधेश कुमार सिन्हा ने विश्व साहित्य की इतनी विशद वैचारिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमियों को अपनी सरल, सुसंस्कृत, सुस्पष्ट एवं विद्वत्ता से परिपूर्ण भाषा में एक जिल्द के भीतर समाविष्ट कर लिया है! यह केवल एक पुस्तक नहीं, अपितु रचनाकार की प्रबुद्धता, विश्लेषणात्मकता तथा गहन संवेदनशीलता का जीवंत उदाहरण होने के साथ-साथ विश्व साहित्य में एफ्रो-एशियाई साहित्यकारों के योगदान का प्रामाणिक दस्तावेज़ भी है।   अवधेश कुमार सिन्हा की इस पुस्तक में अफ्रीका और एशिया के ये काली स्याही से लिखे गए सूर्य के समान चमकते शब्द अनेक शोधार्थियों, अनुसंधित्सुओं तथा विश्व साहित्य प्रेमियों के जीवन को अवश्य प्रकाशमान करेंगे। 

- डॉ. रक्षा मेहता 
विभागाध्यक्ष (हिंदी विभाग), आर्मी पब्लिक स्कूल, गोलकोंडा, हैदराबाद/ मोबाइल: 7729879054.

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

चेन्नै में “महाप्रभु वल्लभाचार्य और पुष्टिमार्ग” पर द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न


















चेन्नै, 22 फरवरी, 2026। (प्रेस विज्ञप्ति)। यहाँ अरुंबक्कम स्थित द्वारका दास गोवर्धन दास वैष्णव कॉलेज में “महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य और पुष्टिमार्ग: एक मानवीय दृष्टि” विषयक द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय (हाइब्रिड) संगोष्ठी धूमधाम से संपन्न हुई।

उद्घाटनकर्ता  मुख्य अतिथि गोस्वामी 108 श्री मधुसूदन जी महाराज ने पुष्टिमार्ग के सिद्धांतों, ब्रह्म-जीव संबंध तथा वल्लभाचार्य के मानवीय दर्शन पर प्रकाश डालते हुए उनके विचारों को अपनाने का आह्वान किया तथा अष्टछाप कवियों, विशेषतः सूरदास के काव्य में व्यक्त भक्ति-भाव का उल्लेख किया।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य कैप्टन डॉ. एस. संतोष बाबू ने भारतीय दार्शनिक परंपरा को जीवन-मूल्यों का मार्गदर्शक बताते हुए ऐसे आयोजनों को समाज और शिक्षा के बीच सेतु बताया।

सचिव डॉ. अशोक कुमार मूँधड़ा ने महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य के सिद्धांतों को अपनाने का संदेश देते हुए कहा कि कृष्ण-भक्ति से मातृशक्ति, प्रेम, आनंद और ईश्वर-कृपा की अनुभूति प्रबुद्ध होती है।

विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचासीन प्रो. पी. राधिका (कुलपति, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा), प्रो. विवेक मणि त्रिपाठी (ग्वांगतोंग विश्वविद्यालय, चीन) और डॉ. मनोज कुमार सिंह ने दक्षिण भारत की कृष्ण भक्ति धारा और पुष्टिमार्ग की वैश्विक प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए करुणा, अनुग्रह और सेवा-भाव को विश्व-मानवता के साझा मूल्य बताया।

संयोजक डॉ. मनोज कुमार द्विवेदी ने संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की और कहा कि यह आयोजन भक्ति, कृपा, सेवा-भाव तथा समकालीन जीवन में पुष्टिमार्ग की प्रासंगिकता पर वैश्विक अकादमिक विमर्श स्थापित करने का प्रयास है।

दो दिनों में 1 अंतरराष्ट्रीय सत्र आभासी माध्यम से और कुल 3 अकादमिक सत्र प्रत्यक्ष माध्यम से संपन्न हुए। इन सत्रों की अध्यक्षता प्रो. निर्मला एस. मौर्य (पूर्व कुलपति, जौनपुर विश्वविद्यालय), प्रो. ऋषभदेव शर्मा, प्रो. जयशंकर बाबु और प्रो. मंजुनाथ अंबिग ने की। मुख्य वक्ताओं और विषय विशेषज्ञों के रूप में प्रो. साकेत कुशवाहा (कुलपति, लद्दाख विश्वविद्यालय, लद्दाख), डॉ. पीबी वनिता, उमेश पाठक (सोरों, सूकरक्षेत्र), डॉ. सुधा त्रिवेदी, डॉ. विजया सिंह (प्रयागराज), प्रो. राजशेखर (मॉरीशस) तथा प्रो. चंद्रशेखर सिंह (पूर्व निदेशक,, समाज कार्य, काशी विद्यापीठ, वाराणसी), प्रो. मुकेश मिश्रा (बस्ती) तथा प्रो. डॉ. आलोक पांडेय (हैदराबाद) सम्मिलित हुए। चारों सत्रों में देश-विदेश से लगभग 100 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।

सभी सत्रों का सफल संचालन महाविद्यालय के प्राध्यापकों डॉ. सरोज सिंह, डॉ. प्रवीण कुमार मिश्र, डॉ. कुमार अभिषेक, डॉ. हर्षलता वी. शाह और डॉ. सुनील पाटिल ने मनोयोगपूर्वक किया। लगभग 200 छात्रों की निरंतर और सक्रिय उपस्थिति ने बाहर से आए विद्वानों को विशेष रूप से प्रभावित किया। 000


मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

(डॉ. रक्षा मेहता का आलेख) विसंगति और विडंबना के विलक्षण चितेरे - श्रीलाल शुक्ल



जन्मशती पर विशेष आलेख :
विसंगति और विडंबना के विलक्षण चितेरे 
श्रीलाल शुक्ल

'श्रीलाल शुक्ल' और' व्यंग्य' मानो एक-दूसरे के पर्याय हों। जिस प्रकार सुगंध बिना पुष्प व्यर्थ है, चमक बिना मोती व्यर्थ है, चाँदनी बिना चाँद व्यर्थ है, ठीक उसी प्रकार 'श्रीलाल शुक्ल' के बिना साहित्य संसार में व्यंग्य व्यर्थ है, अस्तित्वहीन है, निरर्थक है, बेमानी है। कोई भी साहित्य-प्रेमी 'शुक्लजी' की रचनाओं के बिना व्यंग्य की कल्पना भी नहीं कर सकता।

31 दिसंबर, 1925 को जन्मे श्रीलाल शुक्ल समकालीन कथा साहित्य में सशक्त, सटीक व अत्यंत प्रभावशाली व्यंग्य लेखन के लिए सुविख्यात साहित्यकार हैं। ‘विसंगति' तथा ‘विडंबना' प्रत्येक साहित्यकार, कला-मर्मज्ञ‍ तथा दार्शनिक को विचलित करती हैं तथा प्रत्येक काल में अनेकानेक बुद्धिजीवियों ने राजनीति, समाज तथा धर्म में व्याप्त विसंगतियों तथा विडंबनाओं के प्रति अपने-अपने ढंग से चिंता जताई है और क्रोध व आक्रोश व्यक्त किया है, किंतु विसंगति तथा विडंबना को देखने, समझने तथा अनुभूत करने का 'शुक्ल' जी का अंदाज़ सभी से विलक्षण है। यही कारण है कि हम सब उन्हें 'विसंगति और विडंबना के विलक्षण चितेरे' मानते हैं।

'शुक्ल' जी का नाम आते ही मनस पटल पर सबसे पहले जो रचना अपने रंग बिखेर देती है, वह है - राग दरबारी। शायद ही ऐसा कोई साहित्य-प्रेमी होगा, जिसने 'राग दरबारी' न सुना-पढ़ा हो। इस उपन्यास का नाम लेते ही हम सब ‘शिवपालगंज’ पहुँच जाते हैं। जहाँ भ्रष्टाचार रूपी राक्षस न केवल मनुष्य को दबोचे बैठा है अपितु समस्त राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक व आर्थिक व्यवस्था के साथ-साथ समूचे शिक्षा-तंत्र को निगलने के लिए तैयार है। दुनियाभर की गंदगी तथा धूल-धक्कड़ से पटे पड़े शिवपाल गंज की मिठाइयों का वर्णन अत्यंत व्यंग्यात्मक ढंग से करते हुए शुक्ल जी लिखते हैं-

"वे हमारे देसी कारीगरों के हस्तकौशल और उनकी वैज्ञानिक दक्षता का सबूत देती थीं। वे बताती थीं, कि हमें एक अच्छा रेज़र-ब्लेड बनाने का नुस्खा भले ही न मालूम हो, पर कूड़े को स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों में बदल देने की तरकीब सारी दुनिया में अकेले हमीं को आती है।"

ऐसा करारा व्यंग्य, जो पाठक को जहाँ एक ओर गुदगुदा देता है, वहीं दूसरी ओर यह सोचने पर भी बाध्य करता है कि हमारे देश के पिछड़े गाँव, जो मिठाइयों के नाम पर ज़हर खा कर अपनी खुशियाँ मना रहे हैं, उन्हें स्वस्थ जीवन जीने का अधिकार आखिर कैसे प्राप्त होगा? प्रशासन की विडंबना का पर्दाफ़ाश करने के लिए शुक्ल जी का केवल एक वाक्य ही पर्याप्त है-

"स्टेशन वैगन से एक अफ़सरनुमा चपरासी और चपरासीनुमा अफ़सर उतरे।"

व्यंग्यात्मकता का यह चरमोत्कर्ष हम सबको अवाक् कर देता है।

समूची शिक्षा प्रणाली की दुर्गति की अभिव्यक्ति केवल इस एक वाक्य में सहज ही हो जाती है-

"वर्तमान शिक्षा पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है, जिसे कोई भी लात मार सकता है।"

आम जनता का नेतृत्व करने वाले नेता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सभी को एक दृष्टि से देखे। 'राग दरबारी' के रुप्पन बाबू भी सभी को एक निगाह से देखते थे। थाने में दारोगा और हवालात में बैठा हुआ चोर,  दोनों उनकी निगाह में एक थे। उसी तरह इम्तहान में नकल करने वाला विद्यार्थी और कॉलेज के प्रिंसीपल उनकी निगाह में एक थे।

राजनीति तथा समाज में व्याप्त ऐसी विसंगति, विडंबना तथा कुरूपता को इतने विलक्षण अंदाज में प्रस्तुत करने का कौशल 'शुक्ल जी' के अलावा भला और किस व्यंग्यकार में हो सकता है? राजनीतिक तथा सामाजिक व्यवस्था पर तीखा व करारा व्यंग्य करता हुआ उनका उपन्यास ‘बिस्रामपुर  का संत’, मानवीय विसंगतियों, कुंठाओं व चरमराती सामाजिक व्यवस्था पर आधारित उपन्यास 'आदमी का ज़हर', शहरी जीवन के प्रति ललक, संघर्ष तथा मानवीय मूल्यों की गिरावट पर आधारित उपन्यास 'मकान', सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन के अंतर्द्वंद्व पर आधारित उपन्यास 'अज्ञातवास' शुक्ल की बेजोड़ साहित्यिक कृतियाँ हैं।

उनकी कुछ सुप्रसिद्ध कहानियाँ हैं- इस उम्र में, इतिहास का अंत, अपनी पहचान, चंद अखबारी घटनाएँ, तथा एक चोर की कहानी। 'एक चोर की कहानी’ बाल कहानी है और उसमें भी समाज व प्रशासन की विसंगतियों  तथा विडंबनाओं को इतनी विलक्षणता से चित्रित किया गया है कि इस कहानी को पढ़कर एक छोटा, किंतु संवेदनशील बालक भी देश की व्यवस्था की कमियों को बड़ी सरलता व गहराई से समझ सकता है। एक बेचारा गूँगा चोर जो केवल थोड़े से चने और एक पीतल का लोटा गठरी में बाँधे गन्ने के खेतों में छिप रहा था, गाँव वालों द्वारा पकड़े जाने पर पुलिस के हवाले कर दिया जाता है, जो पहले ही छह महीने की जेल काट चुका था और अब एक साल के लिए अंदर कर दिया जाता है। वह ऐसे निरीह व कमज़ोर वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जो अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। जिस देश में बड़े-बड़े पदों पर आसीन प्रशासक, जनता की खून-पसीने की कमाई, दूसरों के अधिकार का पैसा और भोली-भाली जनता के स्वप्नों तक को निगल जाते हैं और डकार तक नहीं लेते, उस देश का गरीब यदि अपने भूखे-तड़पते पेट के लिए रोटी का एक निवाला भी उठा ले तो उसे 'चोर’ की उपाधि से नवाज़ा जाता है। यह है घोर अन्याय के पालने में झूलता हमारा प्रजातंत्र, जिसे एक ओर से विसंगति धकेल रही है, तो दूसरी ओर से विडंबना। स्थिरता के कोई आसार नज़र नहीं आते और दिशाहीनता की इसी नब्ज़ को अपनी रचनाओं में बखूबी पकड़ा है, श्रीलाल शुक्ल ने ।

उपन्यासों तथा कहानियों के अतिरिक्त शुक्लजी के अनेक निबंध-संग्रह भी हैं, जैसे- सामाजिक व राजनीतिक विडंबनाओं पर आधारित ‘अंगद का पाँव', समकालीन समाज पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ करता निबंध-संग्रह 'कुछ ज़मीन पर, कुछ हवा में', मीडिया तथा समाचारों की अतिशयोक्ति व झूठ में लिपटी दुनिया पर आधारित 'ख़बरों की जुगाली' आदि।

'अंगद का पाँव’ रचना का शीर्षक तक अत्यंत सशक्त, सार्थक व सटीक है। इसमें रेल के इंजन की सीटी कई बार बजती है, लेकिन रेल टस से मस नहीं होती। मित्र को स्टेशन पर छोड़ने आए परिजन इधर-उधर बुकस्टाल्स  पर बिकते अखबार पलटने लगते हैं, नाना विषयों पर बातचीत करते हैं, भारतीय संस्कृति पर व्यंग्य तक कस डालते हैं; किंतु, रेलगाड़ी 'अंगद के पाँव' की तरह वहीं डटी रहती है, न उसे समय रूपी मेघनाद हिला पाता है और न ही जनता रूपी रावण-सेना। क्योंकि हमारा प्रशासन ऐसे 'अंगद' को जन्म देता है, जिसका पाँव हिला पाना किसी के बस की बात नहीं। रवींद्र कालिया, जिन्हें श्रीलाल शुक्ल का सान्निध्य प्राप्त हुआ, के अनुसार शुक्ल जी में मुक्त कंठ से प्रशंसा करने की जितनी उदारता थी, उससे कहीं अधिक फटकारने की भी। यही कारण है कि प्रशासन तंत्र का हिस्सा होने के बावजूद वे कभी भी प्रशासन का कच्चा चिट्ठा खोलने से नहीं चूके। उनके व्यंग्य ने भ्रष्टाचारी व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ा दीं। 

श्रीलाल शुक्ल का नाम हिंदी के शीर्षस्थ व्यंग्यकारों की श्रेणी में है। वे अपनी तरह के अनूठे व्यंग्यकार हैं, जिनका पूरे हिंदी-साहित्य में कोई सानी नहीं। उनकी रचनाएँ जहाँ एक ओर हमें बार-बार उन्हें पढ़ते रहने के लिए बाध्य करती हैं, वहीं दूसरी ओर समाज तथा व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों व विडंबनाओं के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित भी करती हैं। कालजयी कृतियों के रचनाकार ‘श्रीलाल शुक्ल’ को कोटि-कोटि नमन। 

- डॉ. रक्षा मेहता
हिंदी विभागाध्यक्षा, 
आर्मी पब्लिक स्कूल, गोलकोंडा, हैदराबाद 


मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

रवि वैद का बाल उपन्यास 'जादूगर' लोकार्पित















हैदराबाद के उपन्यासकार, कथाकार एवं कवि रवि वैद के बाल-उपन्यास ‘जादूगर’ का लोकार्पण कार्यक्रम पायनियर इंस्टीट्यूट ऑफ़ होटल मैनेजमेंट में संपन्न हुआ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के पूर्व आचार्य डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने की। विवेकवर्धिनी महाविद्यालय  की पूर्व प्राचार्य  डॉ. रेखा शर्मा मुख्य अतिथि रहीं, और मुख्य वक्तव्य अलीना खल्गाथ्यान (आर्मेनिय्या)  ने दिया।  

प्रवीण प्रणव ने 'जादूगर' की सांगोपांग समीक्षा कर इसे 'रामचरित मानस' के कई प्रसंगों के साथ जोड़ा। डॉ. आशा मिश्रा मुक्ता, एफ.एम. सलीम और  उड़ीसा स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी (संबलपुर, उड़ीसा)  से पधारे डॉ. जितेंद्र मौर्य ने लोकार्पित पुस्तक के कथ्य और शिल्प पर विचार व्यक्त किए। डॉ. मंजु शर्मा और डॉ.  रक्षा मेहता ने अपनी टिप्पणी सहित रोचक अंशों का वाचन किया। चिरेक इंटरनेशनल स्कूल के कक्षा 11 के छात्रों अनिका दुग्गर और देव अग्रवाल की सधी पाठकीय समीक्षा और जिज्ञासाओं ने सबका दिल जीत लिया।

सभी वक्ताओं का यही मत था कि इस बाल उपन्यास को पढ़ते  हुए वे अपने बचपन में लौट गए थे। उन्हें अपने बचपन में पढ़ी बाल पुस्तकें और चंदा मामा, नंदन जैसी बाल पत्रिकाएँ याद आ गईं। ‘जादूगर’ की कहानी हर आयु के पाठक को आकर्षित करती है, ऐसा सब का विचार था। इस कहानी में नैतिक मूल्यों और भारतीय परंपराओं के अनेक उदाहरण हैं। यह बाल उपन्यास मनोरंजन के साथ-साथ आज की पीढ़ी - जो मोबाइल और इंटरनेट में खो चुकी है - को पुन: अपने दायित्व और जीवन मूल्यों का बोध कराती है। 

अवसर पर  मोहिनी गुप्ता, मोनिका भट्ट, रोशनी वैद, अरविंद शर्मा, डॉ. राजश्री दुगड़,  डॉ. बी. बालाजी, प्रियंका पांडे, सुभाष पाठक और डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने लेखक को शुभकामनाएँ दीं। रवि वैद ने अपनी भावी योजनाओं और भारत-पाकिस्तान पर आने वाले उपन्यास के बारे में अपने विचारों से  अवगत कराते हुए सबका धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन कवयित्री शिल्पी भटनागर ने बहुत रोचक ढंग से किया। ■






सोमवार, 15 दिसंबर 2025

डॉ. देवेंद्र शर्मा का काव्य संग्रह ‘अनुभव के आखर’ लोकार्पित




डॉ. देवेंद्र शर्मा का काव्य संग्रह ‘अनुभव के आखर’ लोकार्पित

हैदराबाद, 14 दिसंबर, 2025।

अपने दौर के अंतरराष्ट्रीय स्तर के वनस्पति शास्त्र वैज्ञानिक व कवि स्व. डॉ. देवेंद्र शर्मा का सचित्र काव्य संग्रह 'अनुभव के आखर' सिकंदराबाद स्थित इक्रीसेट कॉलोनी में आयोजित समारोह में लोकार्पित किया गया।

लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए साहित्यकार एवं मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के हिंदी परामर्शी प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि डॉ. देवेंद्र शर्मा ने वनस्पति शास्त्री के रूप में विभिन्न भारतीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में कार्य किया, वे हिंदी साहित्य, दर्शन और विज्ञान में विशेष अभिरुचि रखते थे। उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण, दार्शनिक चिंतन और काव्य की संवेदनशीलता को एकसूत्र में पिरोकर अपने ख़ास अंदाज़ में साहित्य को समृद्ध किया है। उनकी कविताएँ मानव जीवन के विविध आयामों - आदिम संघर्ष से लेकर आधुनिक समाज की विसंगतियों तथा आध्यात्मिक खोज से लेकर प्रेम की सर्वव्यापकता तक - को सहजता और गहनता के साथ उकेरती हैं। उनकी कविताएँ पाठक को न केवल भावनात्मक स्तर पर छूती हैं, बल्कि बौद्धिक और दार्शनिक स्तर पर भी आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती हैं।

ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि डॉ. देवेंद्र शर्मा की कविताएँ मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को एक साथ संबोधित करती हैं। यह उनकी व्यापक दृष्टि और संवेदनशील चेतना का परिचायक है। उनकी रचनाएँ चार प्रमुख विषयों - मानव सभ्यता का विकास, सामाजिक विसंगतियाँ, आध्यात्मिक खोज और प्रेम की सर्वव्यापकता - के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं, जिन्हें वे प्रतीकात्मकता और दार्शनिक गहराई के साथ प्रस्तुत करते हैं। कवि डॉ. देवेंद्र शर्मा ने मानव सभ्यता की प्रारंभिक यात्रा को किसी सहज आस्तिक रहस्यदर्शी के बजाय वैज्ञानिक चिंतक की तरह देखा है। ऐसे स्थलों पर कवि का मानस प्रागैतिहासिक मानव की प्रकृति के साथ एकाकार होने की चेष्टा करता है। उनकी कविता ‘मानव सभ्यता’ अग्नि की खोज व सामूहिकता के महत्व को सभ्यता की नींव के रूप में प्रस्तुत करती है।

डॉ. देवेंद्र शर्मा की सहधर्मिणी व गीतकार विनीता शर्मा ने इन कविताओं को संकलित किया है। उन्होंने इस अवसर पर कुछ संस्मरण सुनाए और उनके निधन के बाद लिखा अपना गीत सुनाया। यह अंतरंग समारोह डॉ. देवेंद्र शर्मा के काव्य और डॉ. विनीता शर्मा के साथ उनके जीवन एवं दुनिया के विभिन्न देशों में रहकर वैज्ञानिक शोध और विश्व की विभिन्न संस्कृतियों और भाषाओं के साथ मेलजोल की जीवन यात्रा के संस्मरणों को साझा करने का साक्षी बना।

इस अवसर पर प्रवीण प्रणव, एफ एम सलीम, एलिजाबेथ कुरियन मोना, रवि वैद, रोशनी वैद और डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने लोकार्पित काव्य संग्रह से विभिन्न कविताओं का वाचन किया। 
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सिकंदराबाद स्थित इक्रीसेट कॉलोनी में आयोजित कार्यक्रम में वनस्पति वैज्ञानिक व कवि स्व. देवेंद्र शर्मा के सचित्र काव्य संग्रह 'अनुभव के आखर' को लोकार्पित करते हुए प्रो. ऋषभदेव शर्मा एवं अन्य।
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‘अनुभव के आखर’ के लोकार्पण के अवसर पर विनीता शर्मा ने लोकार्पणकर्ता प्रो. ऋषभदेव शर्मा का भावभीना स्वागत-सत्कार किया। 
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