शुक्रवार, 27 मार्च 2026

अवधेश कुमार सिन्हा के ग्रंथ 'काली स्याही सूर्य शब्द' की समीक्षा



एफ्रो-एशियाई साहित्य की चमक 
‘काली स्याही सूर्य शब्द’
- डॉ. रक्षा मेहता

कितना अच्छा हो यदि कोई साहित्यप्रेमी या कलाप्रेमी विश्व साहित्य से जुड़ना चाहे और इसके लिए उसे देश-विदेश के विविध पुस्तकालयों की खाक न छाननी पड़े। साहित्य-सागर में से सबसे चमकीले तथा बहुमूल्य मोतियों का भंडार उसके सामने प्रस्तुत कर दिया जाए, तो इससे बड़ा उपहार एक साहित्यप्रेमी  के लिए और कुछ हो ही नहीं सकता। ऐसी ही अमूल्य निधि के रूप में सृजित की गई है, विश्व साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान और समीक्षक अवधेश कुमार सिन्हा (1950) विरचित पुस्तक ‘काली स्याही सूर्य शब्द’ (2026: संभावना प्रकाशन, हापुड़: पृष्ठ 288, पेपरबैक: 499 रुपए), जिसमें एशिया तथा अफ्रीका के नोबेल पुरस्कार विजेता दस लेखकों व कवियों की कालजयी रचनाओं के साथ-साथ पाँच अन्य बेहतरीन साहित्यकारों की रचनाओं का हिंदी रूपांतरण प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक का अत्यंत रोचक पक्ष यह है कि पाठक न केवल इन कविताओं, कहानियों, नाटकों तथा उपन्यासों के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंशों को पढ़ता है, अपितु इनके मूल रचनाकारों के जीवन से भी अत्यंत गहराई से जुड़ता है। 

प्रत्येक रचनाकार की रचना से पूर्व उनके जन्म, शिक्षा-दीक्षा, पारिवारिक परिवेश, व्यक्तिगत समस्याएँ, चुनौतियाँ, लेखन की प्रेरणा, लेखन विषय, रचनाकर्म, भाषा-शैली, तत्कालीन परिस्थितियाँ आदि महत्त्वपूर्ण विषयों पर इतनी गहनता से लिखा गया है कि पाठक स्वतः ही उस देश-काल में पहुँचकर इन रचनाकारों से इस प्रकार जुड़ जाता है मानो वह इन्हें निजी रूप से जानता हो। इस सामग्री को अत्यंत रोचकतापूर्वक शब्दबद्ध किया गया है तथा रचनाकारों के निजी जीवन से प्रामाणिक उदाहरण देकर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से पाठकों को रू-ब-रू कराया गया है। कथा साहित्य की बात करें तो, इस पुस्तक में रवींद्रनाथ ठाकुर (भारत) की भावनात्मक गहनता पर आधारित बांग्ला कहानी ‘काबुलीवाला’ के साथ-साथ गुरना (जंजीबार/ इंग्लैंड) के उपन्यास ‘पैराडाइज़’ के एक अंश, नागीब महफूज (मिस्र) की कहानी ‘हाफ ए डे’, सैमुएल योसेफ़ एग्नॉन (इज़राइल) की हिब्रू भाषा में लिखी कहानी ‘ऑर्केस्ट्रा’, हॉन कांग (दक्षिण कोरिया) द्वारा कोरियन भाषा में रचित उपन्यास ‘द वेजिटेरियन’ का एक अंश, ओरहान पामुक (तुर्की) के उपन्यास ‘माई नेम इज़ रेड’ का अंश, यासूनारी कवाबाता (जापान) की जापानी कहानी ‘मदर’, वोले सोयिङ्का (नाइजीरिया) का नाटक ‘ए डांस ऑफ द फोरेस्ट्स’, मो यान (चीन) के चीनी उपन्यास ‘रेड सोरघम’ का अंश, नादिन गॉर्डिमर (दक्षिण अफ्रीका) के उपन्यास ‘बर्गर्स डॉटर’ के एक अंश का उत्कृष्ट हिंदी रूपांतरण पढ़ने को मिलता है।   

जब पाठक रवींद्रनाथ ठाकुर की कहानी ‘काबुलीवाला’ या उनकी कविताएँ ‘मैं अनेक वासनाओं को चाहता हूँ प्राणपन से’ अथवा ‘भजन, पूजन, साधना, आराधना’ पढ़ता है, तब वह केवल इस कहानी या इन कविताओं से ही नहीं जुड़ता अपितु उनका जीवन-परिचय पढ़कर इस तथ्य से भी अवगत होता है कि कवींद्र रवींद्र अमानवीयता के विरोधी थे, मानवतावाद को राष्ट्रवाद से ऊपर रखते थे किंतु राष्ट्रविरोधी कतई नहीं थे। अवधेश सिन्हा एक स्थान पर लिखते हैं– “13 अप्रैल, 1919 को ब्रिटिश शासन द्वारा किए गए जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के विरोध में रवींद्रनाथ ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अपनी नाइटहुड की उपाधि लौटाकर दिखा दिया कि वे अराष्ट्रीय नहीं थे।” (पृ. सं. 27)। इस पुस्तक के माध्यम से यह ज्ञात होता है कि रवींद्र कबीरदास की ही भाँति आत्मा-परमात्मा के मिलन में विश्वास करते थे, मृत्यु को भय नहीं, वरदान मानते थे, संगीत प्रेमी थे तथा आध्यात्मिक रहस्यवाद उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देता है। 

गुरना के रचनाकर्म में उनके समय की सामाजिक, सांस्कृतिक तथा व्यापारिक परिस्थितियों का स्पष्ट चित्र खींचते हुए अवधेश जी लिखते हैं– “अपनी सभी कृतियों में गुरना ने पूर्व-औपनिवेशिक अपरिवर्तित अफ्रीका के लिए सर्वमत विषाद से बचने का प्रयास किया है । उनकी स्वयं की पृष्ठभूमि हिंद महासागर में सांस्कृतिक विविधताओं से भरे एक ऐसे द्वीप की है, जिसका पुर्तगाली, अरब, जर्मन व ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्तियों के अधीन गुलामों के व्यापार एवं दमन के भिन्न रूपों का तथा पूरी दुनिया के साथ व्यापारिक संबंध का इतिहास रहा है।” (पृ. सं. 57)। सुखद अंत होने की पाठकों की अपेक्षाओं को निराश कर देने के गुरना के वैशिष्ट्य से यह पुस्तक परिचित कराती है। इसी प्रकार नागीब महफूज़ के अस्तित्ववादी, मार्क्सवादी, यथार्थवादी, रहस्यवादी, समाजवादी, राष्ट्रवादी, लोकतांत्रिक तथा दार्शनिक दृष्टिकोण से लेखक अपनी इस पुस्तक के माध्यम से पाठक को सहज ही जोड़ देते हैं। 

सैमुएल योसेफ़ एग्नॉन की हिब्रू भाषा में लिखी कहानी ‘ऑर्केस्ट्रा’ में एक स्थान पर लिखा है– “मेरी आदत प्रतिदिन सूर्योदय के समय टहलने की थी, लेकिन उस दिन मैं सुबह तीन बजे ही जाग गया क्योंकि यह ज़ेखोर ब्रिट (रोश हशना का पूर्व दिन) की रात थी, एक रात जब सामान्य से पहले ही लोग सेलीचोट (हिब्रू एलुल के महीने के दौरान प्रायश्चित के दिन की जाने वाली अतिरिक्त क्षमा प्रार्थनाएँ) पढ़ने के लिए उठ जाते हैं।” (पृ. सं. 97) यहाँ अवधेश सिन्हा  यह समझाना नहीं भूलते कि रोश हशना यहूदी नववर्ष होता है तथा उससे पहले के दिन व उस महीने लोग क्या-क्या महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं। इस तरह वे पाठकों को हिब्रू सांस्कृतिक तथा धार्मिक मान्यताओं से जोड़ देते हैं, जो निश्चित रूप से उनकी प्रखर मेधा तथा साहित्यिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता का प्रमाण है। साथ ही वे एग्नॉन की यथार्थवादी रचनाओं में आध्यात्मिक रहस्यवाद के दर्शन भी कराते चलते हैं। 

हान कांग के उपन्यास ‘द वेजिटेरियन’ के अनूदित पाठ में  एक स्थान पर ‘गरम-गरम शाबू-शाबू शोरबे का ज़िक्र आता है, जिसका अर्थ ‘मांस व सब्जियों को एक साथ एक विशेष प्रकार के सुगंधित शोरबे में पकाया गया भोजन’ है। यह इस बात की पुष्टि करता है कि अन्य देशों के खान-पान (जो कि भारत से सर्वथा भिन्न हैं) की बारीकियों को भी इस पुस्तक में उकेरा गया है।

पामुक के जीवन से ली गई कहानी पर आधारित उपन्यास ‘माई नेम इज़ रेड’ के अनूदित अंश में एक स्थान पर व्हाइट शीप का ज़िक्र आता है, जहाँ यह समझाया गया है कि ‘व्हाइट शीप’ तुर्कमान फ़ारस की संस्कृति से प्रभावित सुन्नी तुर्कों का एक जनजातीय परिसंघ था। यह उल्लेख पाठक को एक भिन्न सांस्कृतिक तथा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जोड़ देता है; और यही है इस पुस्तक के रचनाकार का विलक्षण कौशल। 

अवधेश कुमार सिन्हा पाठक को कहीं ‘यासूनारी कवाबाता’ के अलगाववाद तथा एकाकीपन से जोड़ देते हैं, तो कहीं ‘वोले सोयिङ्का’ के काव्यात्मक प्रतीकवाद व राजनीतिक व्यंग्य से। वोले सोयिङ्का की कविता ‘भोर में मौत’ में प्रयुक्त विशुद्ध भारतीय शब्द ‘अनुष्ठान’ अपने आप में एक विलक्षण प्रयोग है। लेखक कहीं ‘मो यान’ के लेखन काल की वैचारिक मुक्ति व साहित्यिक उत्साह से परिचित कराते हैं, तो कहीं ‘नादिन गॉर्डिमर’ के राज्य नियंत्रण विरोधी विचारों से। इन सबके अतिरिक्त अदूनीस (लेबनान/ फ्रांस), महमूद दरवेश (फ़िलिस्तीन), जीन अरसनायगम (श्रीलंका), क्वामे सेनु नेविल डॉज़ (घाना) तथा अफ़गानी स्त्री कविताओं की सटीक हिंदी प्रस्तुति भी इस पुस्तक को पठनीय, मननीय और संग्रहणीय बनाती है। अंग्रेजी से इतर रचनाओं के हिंदी अनुवाद हेतु उनके प्रामाणिक अंग्रेज़ी अनुवादों को आधार बनाया गया है। 

यह देखकर सुखद विस्मय होता है कि लेखक अवधेश कुमार सिन्हा ने विश्व साहित्य की इतनी विशद वैचारिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमियों को अपनी सरल, सुसंस्कृत, सुस्पष्ट एवं विद्वत्ता से परिपूर्ण भाषा में एक जिल्द के भीतर समाविष्ट कर लिया है! यह केवल एक पुस्तक नहीं, अपितु रचनाकार की प्रबुद्धता, विश्लेषणात्मकता तथा गहन संवेदनशीलता का जीवंत उदाहरण होने के साथ-साथ विश्व साहित्य में एफ्रो-एशियाई साहित्यकारों के योगदान का प्रामाणिक दस्तावेज़ भी है।   अवधेश कुमार सिन्हा की इस पुस्तक में अफ्रीका और एशिया के ये काली स्याही से लिखे गए सूर्य के समान चमकते शब्द अनेक शोधार्थियों, अनुसंधित्सुओं तथा विश्व साहित्य प्रेमियों के जीवन को अवश्य प्रकाशमान करेंगे। 

- डॉ. रक्षा मेहता 
विभागाध्यक्ष (हिंदी विभाग), आर्मी पब्लिक स्कूल, गोलकोंडा, हैदराबाद/ मोबाइल: 7729879054.

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

चेन्नै में “महाप्रभु वल्लभाचार्य और पुष्टिमार्ग” पर द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न


















चेन्नै, 22 फरवरी, 2026। (प्रेस विज्ञप्ति)। यहाँ अरुंबक्कम स्थित द्वारका दास गोवर्धन दास वैष्णव कॉलेज में “महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य और पुष्टिमार्ग: एक मानवीय दृष्टि” विषयक द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय (हाइब्रिड) संगोष्ठी धूमधाम से संपन्न हुई।

उद्घाटनकर्ता  मुख्य अतिथि गोस्वामी 108 श्री मधुसूदन जी महाराज ने पुष्टिमार्ग के सिद्धांतों, ब्रह्म-जीव संबंध तथा वल्लभाचार्य के मानवीय दर्शन पर प्रकाश डालते हुए उनके विचारों को अपनाने का आह्वान किया तथा अष्टछाप कवियों, विशेषतः सूरदास के काव्य में व्यक्त भक्ति-भाव का उल्लेख किया।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य कैप्टन डॉ. एस. संतोष बाबू ने भारतीय दार्शनिक परंपरा को जीवन-मूल्यों का मार्गदर्शक बताते हुए ऐसे आयोजनों को समाज और शिक्षा के बीच सेतु बताया।

सचिव डॉ. अशोक कुमार मूँधड़ा ने महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य के सिद्धांतों को अपनाने का संदेश देते हुए कहा कि कृष्ण-भक्ति से मातृशक्ति, प्रेम, आनंद और ईश्वर-कृपा की अनुभूति प्रबुद्ध होती है।

विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचासीन प्रो. पी. राधिका (कुलपति, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा), प्रो. विवेक मणि त्रिपाठी (ग्वांगतोंग विश्वविद्यालय, चीन) और डॉ. मनोज कुमार सिंह ने दक्षिण भारत की कृष्ण भक्ति धारा और पुष्टिमार्ग की वैश्विक प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए करुणा, अनुग्रह और सेवा-भाव को विश्व-मानवता के साझा मूल्य बताया।

संयोजक डॉ. मनोज कुमार द्विवेदी ने संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की और कहा कि यह आयोजन भक्ति, कृपा, सेवा-भाव तथा समकालीन जीवन में पुष्टिमार्ग की प्रासंगिकता पर वैश्विक अकादमिक विमर्श स्थापित करने का प्रयास है।

दो दिनों में 1 अंतरराष्ट्रीय सत्र आभासी माध्यम से और कुल 3 अकादमिक सत्र प्रत्यक्ष माध्यम से संपन्न हुए। इन सत्रों की अध्यक्षता प्रो. निर्मला एस. मौर्य (पूर्व कुलपति, जौनपुर विश्वविद्यालय), प्रो. ऋषभदेव शर्मा, प्रो. जयशंकर बाबु और प्रो. मंजुनाथ अंबिग ने की। मुख्य वक्ताओं और विषय विशेषज्ञों के रूप में प्रो. साकेत कुशवाहा (कुलपति, लद्दाख विश्वविद्यालय, लद्दाख), डॉ. पीबी वनिता, उमेश पाठक (सोरों, सूकरक्षेत्र), डॉ. सुधा त्रिवेदी, डॉ. विजया सिंह (प्रयागराज), प्रो. राजशेखर (मॉरीशस) तथा प्रो. चंद्रशेखर सिंह (पूर्व निदेशक,, समाज कार्य, काशी विद्यापीठ, वाराणसी), प्रो. मुकेश मिश्रा (बस्ती) तथा प्रो. डॉ. आलोक पांडेय (हैदराबाद) सम्मिलित हुए। चारों सत्रों में देश-विदेश से लगभग 100 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।

सभी सत्रों का सफल संचालन महाविद्यालय के प्राध्यापकों डॉ. सरोज सिंह, डॉ. प्रवीण कुमार मिश्र, डॉ. कुमार अभिषेक, डॉ. हर्षलता वी. शाह और डॉ. सुनील पाटिल ने मनोयोगपूर्वक किया। लगभग 200 छात्रों की निरंतर और सक्रिय उपस्थिति ने बाहर से आए विद्वानों को विशेष रूप से प्रभावित किया। 000


मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

(डॉ. रक्षा मेहता का आलेख) विसंगति और विडंबना के विलक्षण चितेरे - श्रीलाल शुक्ल



जन्मशती पर विशेष आलेख :
विसंगति और विडंबना के विलक्षण चितेरे 
श्रीलाल शुक्ल

'श्रीलाल शुक्ल' और' व्यंग्य' मानो एक-दूसरे के पर्याय हों। जिस प्रकार सुगंध बिना पुष्प व्यर्थ है, चमक बिना मोती व्यर्थ है, चाँदनी बिना चाँद व्यर्थ है, ठीक उसी प्रकार 'श्रीलाल शुक्ल' के बिना साहित्य संसार में व्यंग्य व्यर्थ है, अस्तित्वहीन है, निरर्थक है, बेमानी है। कोई भी साहित्य-प्रेमी 'शुक्लजी' की रचनाओं के बिना व्यंग्य की कल्पना भी नहीं कर सकता।

31 दिसंबर, 1925 को जन्मे श्रीलाल शुक्ल समकालीन कथा साहित्य में सशक्त, सटीक व अत्यंत प्रभावशाली व्यंग्य लेखन के लिए सुविख्यात साहित्यकार हैं। ‘विसंगति' तथा ‘विडंबना' प्रत्येक साहित्यकार, कला-मर्मज्ञ‍ तथा दार्शनिक को विचलित करती हैं तथा प्रत्येक काल में अनेकानेक बुद्धिजीवियों ने राजनीति, समाज तथा धर्म में व्याप्त विसंगतियों तथा विडंबनाओं के प्रति अपने-अपने ढंग से चिंता जताई है और क्रोध व आक्रोश व्यक्त किया है, किंतु विसंगति तथा विडंबना को देखने, समझने तथा अनुभूत करने का 'शुक्ल' जी का अंदाज़ सभी से विलक्षण है। यही कारण है कि हम सब उन्हें 'विसंगति और विडंबना के विलक्षण चितेरे' मानते हैं।

'शुक्ल' जी का नाम आते ही मनस पटल पर सबसे पहले जो रचना अपने रंग बिखेर देती है, वह है - राग दरबारी। शायद ही ऐसा कोई साहित्य-प्रेमी होगा, जिसने 'राग दरबारी' न सुना-पढ़ा हो। इस उपन्यास का नाम लेते ही हम सब ‘शिवपालगंज’ पहुँच जाते हैं। जहाँ भ्रष्टाचार रूपी राक्षस न केवल मनुष्य को दबोचे बैठा है अपितु समस्त राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक व आर्थिक व्यवस्था के साथ-साथ समूचे शिक्षा-तंत्र को निगलने के लिए तैयार है। दुनियाभर की गंदगी तथा धूल-धक्कड़ से पटे पड़े शिवपाल गंज की मिठाइयों का वर्णन अत्यंत व्यंग्यात्मक ढंग से करते हुए शुक्ल जी लिखते हैं-

"वे हमारे देसी कारीगरों के हस्तकौशल और उनकी वैज्ञानिक दक्षता का सबूत देती थीं। वे बताती थीं, कि हमें एक अच्छा रेज़र-ब्लेड बनाने का नुस्खा भले ही न मालूम हो, पर कूड़े को स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों में बदल देने की तरकीब सारी दुनिया में अकेले हमीं को आती है।"

ऐसा करारा व्यंग्य, जो पाठक को जहाँ एक ओर गुदगुदा देता है, वहीं दूसरी ओर यह सोचने पर भी बाध्य करता है कि हमारे देश के पिछड़े गाँव, जो मिठाइयों के नाम पर ज़हर खा कर अपनी खुशियाँ मना रहे हैं, उन्हें स्वस्थ जीवन जीने का अधिकार आखिर कैसे प्राप्त होगा? प्रशासन की विडंबना का पर्दाफ़ाश करने के लिए शुक्ल जी का केवल एक वाक्य ही पर्याप्त है-

"स्टेशन वैगन से एक अफ़सरनुमा चपरासी और चपरासीनुमा अफ़सर उतरे।"

व्यंग्यात्मकता का यह चरमोत्कर्ष हम सबको अवाक् कर देता है।

समूची शिक्षा प्रणाली की दुर्गति की अभिव्यक्ति केवल इस एक वाक्य में सहज ही हो जाती है-

"वर्तमान शिक्षा पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है, जिसे कोई भी लात मार सकता है।"

आम जनता का नेतृत्व करने वाले नेता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सभी को एक दृष्टि से देखे। 'राग दरबारी' के रुप्पन बाबू भी सभी को एक निगाह से देखते थे। थाने में दारोगा और हवालात में बैठा हुआ चोर,  दोनों उनकी निगाह में एक थे। उसी तरह इम्तहान में नकल करने वाला विद्यार्थी और कॉलेज के प्रिंसीपल उनकी निगाह में एक थे।

राजनीति तथा समाज में व्याप्त ऐसी विसंगति, विडंबना तथा कुरूपता को इतने विलक्षण अंदाज में प्रस्तुत करने का कौशल 'शुक्ल जी' के अलावा भला और किस व्यंग्यकार में हो सकता है? राजनीतिक तथा सामाजिक व्यवस्था पर तीखा व करारा व्यंग्य करता हुआ उनका उपन्यास ‘बिस्रामपुर  का संत’, मानवीय विसंगतियों, कुंठाओं व चरमराती सामाजिक व्यवस्था पर आधारित उपन्यास 'आदमी का ज़हर', शहरी जीवन के प्रति ललक, संघर्ष तथा मानवीय मूल्यों की गिरावट पर आधारित उपन्यास 'मकान', सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन के अंतर्द्वंद्व पर आधारित उपन्यास 'अज्ञातवास' शुक्ल की बेजोड़ साहित्यिक कृतियाँ हैं।

उनकी कुछ सुप्रसिद्ध कहानियाँ हैं- इस उम्र में, इतिहास का अंत, अपनी पहचान, चंद अखबारी घटनाएँ, तथा एक चोर की कहानी। 'एक चोर की कहानी’ बाल कहानी है और उसमें भी समाज व प्रशासन की विसंगतियों  तथा विडंबनाओं को इतनी विलक्षणता से चित्रित किया गया है कि इस कहानी को पढ़कर एक छोटा, किंतु संवेदनशील बालक भी देश की व्यवस्था की कमियों को बड़ी सरलता व गहराई से समझ सकता है। एक बेचारा गूँगा चोर जो केवल थोड़े से चने और एक पीतल का लोटा गठरी में बाँधे गन्ने के खेतों में छिप रहा था, गाँव वालों द्वारा पकड़े जाने पर पुलिस के हवाले कर दिया जाता है, जो पहले ही छह महीने की जेल काट चुका था और अब एक साल के लिए अंदर कर दिया जाता है। वह ऐसे निरीह व कमज़ोर वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जो अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। जिस देश में बड़े-बड़े पदों पर आसीन प्रशासक, जनता की खून-पसीने की कमाई, दूसरों के अधिकार का पैसा और भोली-भाली जनता के स्वप्नों तक को निगल जाते हैं और डकार तक नहीं लेते, उस देश का गरीब यदि अपने भूखे-तड़पते पेट के लिए रोटी का एक निवाला भी उठा ले तो उसे 'चोर’ की उपाधि से नवाज़ा जाता है। यह है घोर अन्याय के पालने में झूलता हमारा प्रजातंत्र, जिसे एक ओर से विसंगति धकेल रही है, तो दूसरी ओर से विडंबना। स्थिरता के कोई आसार नज़र नहीं आते और दिशाहीनता की इसी नब्ज़ को अपनी रचनाओं में बखूबी पकड़ा है, श्रीलाल शुक्ल ने ।

उपन्यासों तथा कहानियों के अतिरिक्त शुक्लजी के अनेक निबंध-संग्रह भी हैं, जैसे- सामाजिक व राजनीतिक विडंबनाओं पर आधारित ‘अंगद का पाँव', समकालीन समाज पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ करता निबंध-संग्रह 'कुछ ज़मीन पर, कुछ हवा में', मीडिया तथा समाचारों की अतिशयोक्ति व झूठ में लिपटी दुनिया पर आधारित 'ख़बरों की जुगाली' आदि।

'अंगद का पाँव’ रचना का शीर्षक तक अत्यंत सशक्त, सार्थक व सटीक है। इसमें रेल के इंजन की सीटी कई बार बजती है, लेकिन रेल टस से मस नहीं होती। मित्र को स्टेशन पर छोड़ने आए परिजन इधर-उधर बुकस्टाल्स  पर बिकते अखबार पलटने लगते हैं, नाना विषयों पर बातचीत करते हैं, भारतीय संस्कृति पर व्यंग्य तक कस डालते हैं; किंतु, रेलगाड़ी 'अंगद के पाँव' की तरह वहीं डटी रहती है, न उसे समय रूपी मेघनाद हिला पाता है और न ही जनता रूपी रावण-सेना। क्योंकि हमारा प्रशासन ऐसे 'अंगद' को जन्म देता है, जिसका पाँव हिला पाना किसी के बस की बात नहीं। रवींद्र कालिया, जिन्हें श्रीलाल शुक्ल का सान्निध्य प्राप्त हुआ, के अनुसार शुक्ल जी में मुक्त कंठ से प्रशंसा करने की जितनी उदारता थी, उससे कहीं अधिक फटकारने की भी। यही कारण है कि प्रशासन तंत्र का हिस्सा होने के बावजूद वे कभी भी प्रशासन का कच्चा चिट्ठा खोलने से नहीं चूके। उनके व्यंग्य ने भ्रष्टाचारी व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ा दीं। 

श्रीलाल शुक्ल का नाम हिंदी के शीर्षस्थ व्यंग्यकारों की श्रेणी में है। वे अपनी तरह के अनूठे व्यंग्यकार हैं, जिनका पूरे हिंदी-साहित्य में कोई सानी नहीं। उनकी रचनाएँ जहाँ एक ओर हमें बार-बार उन्हें पढ़ते रहने के लिए बाध्य करती हैं, वहीं दूसरी ओर समाज तथा व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों व विडंबनाओं के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित भी करती हैं। कालजयी कृतियों के रचनाकार ‘श्रीलाल शुक्ल’ को कोटि-कोटि नमन। 

- डॉ. रक्षा मेहता
हिंदी विभागाध्यक्षा, 
आर्मी पब्लिक स्कूल, गोलकोंडा, हैदराबाद 


मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

रवि वैद का बाल उपन्यास 'जादूगर' लोकार्पित















हैदराबाद के उपन्यासकार, कथाकार एवं कवि रवि वैद के बाल-उपन्यास ‘जादूगर’ का लोकार्पण कार्यक्रम पायनियर इंस्टीट्यूट ऑफ़ होटल मैनेजमेंट में संपन्न हुआ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के पूर्व आचार्य डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने की। विवेकवर्धिनी महाविद्यालय  की पूर्व प्राचार्य  डॉ. रेखा शर्मा मुख्य अतिथि रहीं, और मुख्य वक्तव्य अलीना खल्गाथ्यान (आर्मेनिय्या)  ने दिया।  

प्रवीण प्रणव ने 'जादूगर' की सांगोपांग समीक्षा कर इसे 'रामचरित मानस' के कई प्रसंगों के साथ जोड़ा। डॉ. आशा मिश्रा मुक्ता, एफ.एम. सलीम और  उड़ीसा स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी (संबलपुर, उड़ीसा)  से पधारे डॉ. जितेंद्र मौर्य ने लोकार्पित पुस्तक के कथ्य और शिल्प पर विचार व्यक्त किए। डॉ. मंजु शर्मा और डॉ.  रक्षा मेहता ने अपनी टिप्पणी सहित रोचक अंशों का वाचन किया। चिरेक इंटरनेशनल स्कूल के कक्षा 11 के छात्रों अनिका दुग्गर और देव अग्रवाल की सधी पाठकीय समीक्षा और जिज्ञासाओं ने सबका दिल जीत लिया।

सभी वक्ताओं का यही मत था कि इस बाल उपन्यास को पढ़ते  हुए वे अपने बचपन में लौट गए थे। उन्हें अपने बचपन में पढ़ी बाल पुस्तकें और चंदा मामा, नंदन जैसी बाल पत्रिकाएँ याद आ गईं। ‘जादूगर’ की कहानी हर आयु के पाठक को आकर्षित करती है, ऐसा सब का विचार था। इस कहानी में नैतिक मूल्यों और भारतीय परंपराओं के अनेक उदाहरण हैं। यह बाल उपन्यास मनोरंजन के साथ-साथ आज की पीढ़ी - जो मोबाइल और इंटरनेट में खो चुकी है - को पुन: अपने दायित्व और जीवन मूल्यों का बोध कराती है। 

अवसर पर  मोहिनी गुप्ता, मोनिका भट्ट, रोशनी वैद, अरविंद शर्मा, डॉ. राजश्री दुगड़,  डॉ. बी. बालाजी, प्रियंका पांडे, सुभाष पाठक और डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने लेखक को शुभकामनाएँ दीं। रवि वैद ने अपनी भावी योजनाओं और भारत-पाकिस्तान पर आने वाले उपन्यास के बारे में अपने विचारों से  अवगत कराते हुए सबका धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन कवयित्री शिल्पी भटनागर ने बहुत रोचक ढंग से किया। ■






सोमवार, 15 दिसंबर 2025

डॉ. देवेंद्र शर्मा का काव्य संग्रह ‘अनुभव के आखर’ लोकार्पित




डॉ. देवेंद्र शर्मा का काव्य संग्रह ‘अनुभव के आखर’ लोकार्पित

हैदराबाद, 14 दिसंबर, 2025।

अपने दौर के अंतरराष्ट्रीय स्तर के वनस्पति शास्त्र वैज्ञानिक व कवि स्व. डॉ. देवेंद्र शर्मा का सचित्र काव्य संग्रह 'अनुभव के आखर' सिकंदराबाद स्थित इक्रीसेट कॉलोनी में आयोजित समारोह में लोकार्पित किया गया।

लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए साहित्यकार एवं मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के हिंदी परामर्शी प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि डॉ. देवेंद्र शर्मा ने वनस्पति शास्त्री के रूप में विभिन्न भारतीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में कार्य किया, वे हिंदी साहित्य, दर्शन और विज्ञान में विशेष अभिरुचि रखते थे। उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण, दार्शनिक चिंतन और काव्य की संवेदनशीलता को एकसूत्र में पिरोकर अपने ख़ास अंदाज़ में साहित्य को समृद्ध किया है। उनकी कविताएँ मानव जीवन के विविध आयामों - आदिम संघर्ष से लेकर आधुनिक समाज की विसंगतियों तथा आध्यात्मिक खोज से लेकर प्रेम की सर्वव्यापकता तक - को सहजता और गहनता के साथ उकेरती हैं। उनकी कविताएँ पाठक को न केवल भावनात्मक स्तर पर छूती हैं, बल्कि बौद्धिक और दार्शनिक स्तर पर भी आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती हैं।

ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि डॉ. देवेंद्र शर्मा की कविताएँ मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को एक साथ संबोधित करती हैं। यह उनकी व्यापक दृष्टि और संवेदनशील चेतना का परिचायक है। उनकी रचनाएँ चार प्रमुख विषयों - मानव सभ्यता का विकास, सामाजिक विसंगतियाँ, आध्यात्मिक खोज और प्रेम की सर्वव्यापकता - के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं, जिन्हें वे प्रतीकात्मकता और दार्शनिक गहराई के साथ प्रस्तुत करते हैं। कवि डॉ. देवेंद्र शर्मा ने मानव सभ्यता की प्रारंभिक यात्रा को किसी सहज आस्तिक रहस्यदर्शी के बजाय वैज्ञानिक चिंतक की तरह देखा है। ऐसे स्थलों पर कवि का मानस प्रागैतिहासिक मानव की प्रकृति के साथ एकाकार होने की चेष्टा करता है। उनकी कविता ‘मानव सभ्यता’ अग्नि की खोज व सामूहिकता के महत्व को सभ्यता की नींव के रूप में प्रस्तुत करती है।

डॉ. देवेंद्र शर्मा की सहधर्मिणी व गीतकार विनीता शर्मा ने इन कविताओं को संकलित किया है। उन्होंने इस अवसर पर कुछ संस्मरण सुनाए और उनके निधन के बाद लिखा अपना गीत सुनाया। यह अंतरंग समारोह डॉ. देवेंद्र शर्मा के काव्य और डॉ. विनीता शर्मा के साथ उनके जीवन एवं दुनिया के विभिन्न देशों में रहकर वैज्ञानिक शोध और विश्व की विभिन्न संस्कृतियों और भाषाओं के साथ मेलजोल की जीवन यात्रा के संस्मरणों को साझा करने का साक्षी बना।

इस अवसर पर प्रवीण प्रणव, एफ एम सलीम, एलिजाबेथ कुरियन मोना, रवि वैद, रोशनी वैद और डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने लोकार्पित काव्य संग्रह से विभिन्न कविताओं का वाचन किया। 
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सिकंदराबाद स्थित इक्रीसेट कॉलोनी में आयोजित कार्यक्रम में वनस्पति वैज्ञानिक व कवि स्व. देवेंद्र शर्मा के सचित्र काव्य संग्रह 'अनुभव के आखर' को लोकार्पित करते हुए प्रो. ऋषभदेव शर्मा एवं अन्य।
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‘अनुभव के आखर’ के लोकार्पण के अवसर पर विनीता शर्मा ने लोकार्पणकर्ता प्रो. ऋषभदेव शर्मा का भावभीना स्वागत-सत्कार किया। 
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गुरुवार, 13 नवंबर 2025

‘क से कविता’ का बाल-कविता समारोह संपन्न



हैदराबाद, 13 नवंबर, 2025। (मीडिया विज्ञप्ति)।
हिंदी-उर्दू कविता को नई पीढ़ी में लोकप्रिय बनाने के लिए समर्पित संस्था “क से कविता” ने यहाँ मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू विश्वविद्यालय के दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र के पुस्तकालय में, “बाल दिवस” के संदर्भ में विशेष समारोह आयोजित किया। इस सुरुचिपूर्ण समारोह में 5 वर्ष के नन्हें बच्चे से लेकर 75 वर्षीय बुजुर्ग तक ने अपने प्रिय कवियों की चुलबुली बाल कविताओं का अत्यंत उत्साहपूर्वक वाचन किया। हैदराबाद-सिकंदराबाद के विभिन्न स्कूलों से आए विद्यार्थियों में तो अपनी पसंद की बाल कविता पढ़ने का उत्साह था ही, अभिभावकों, शिक्षकों और अन्य सदस्यों ने भी अपने विद्यार्थी जीवन में पढ़ी बाल कविता का सस्वर पाठ कर एक बार पुनः अपने बचपन के दिनों को याद किया।

कार्यक्रम के संयोजक-द्वय प्रवीण प्रणव और मोहित ने बताया कि ‘क से कविता’ और दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र द्वारा हर महीने के दूसरे शनिवार को सायं 3 से 5 बजे तक कविता-केंद्रित कार्यक्रम का आयोजन किया जाता‌ है, जिसमें उपस्थित सदस्य पहले से चयनित किसी कवि या शायर‌ की रचनाओं का पाठ करते हैं।‌ यह विशेष रूप से पाठकों का मंच है, जहाँ स्वरचित कविताओं को पढ़ने की अनुमति नहीं है। मंच का उद्देश्य हिंदी-उर्दू के साहित्यिक पुरोधाओं और उनकी रचनाओं से परिचित होना‌ है। ‘क से कविता’ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध चैनल 'हिंदी कविता' का उपक्रम है, जहाँ देश-विदेश की जानी-मानी हस्तियों ने हिंदी कविता का पाठ किया है।

बाल दिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम में स्कूली बच्चों के अलावा कॉलेज के विद्यार्थियों, विभिन्न स्कूल से शिक्षकों, विभिन्न विभागों में कार्यरत युवाओं, साहित्यकारों, गृहिणियों और सेवानिवृत्त लोगों ने भाग लिया। कार्यक्रम में ‘फिर क्या होगा उसके बाद’, ‘हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ’ ‘जीना जिलाना मत भूलना’, ‘चिड़िया का संसार’, ‘हाथी आया, हाथी आया’, ‘चाँद का कुर्ता’, ‘बादल’, ‘मुझे यह बात समझ में नहीं आई’, ‘बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी’, ‘अक्कड़ मक्कड़’, ‘आराम करो’, ‘खिलौने वाला’, ‘हम पंछी उन्मुक्त गगन के’, ‘चूहे की दिल्ली यात्रा’, ‘चेतक’, ‘पर्यावरण बचाओ’, ‘पुष्प की अभिलाषा’, ‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती’ और ‘पन्ना धाय’, जैसी प्रसिद्ध बाल कविताओं का पाठ किया गया।

बाल कविताओं का पाठ करने वालों में स्वाधि मिश्रा, रीत आहूजा, सानवी लोहिया, अथर्व लीला, विवान प्रसाद, रूमी पुरी, रिधान यादव, ओज वीर लोधा, डॉ. इरशाद अहमद, अमृता मिश्रा, धनभद्र लपसिरिकुल, डॉ. रक्षा मेहता, अमरीश कुमार, मोहम्मद सिराजुद्दीन 'असीम', हर्षित रस्तोगी, अनुराग मुस्कान, हीना आहूजा, शकुंतला मिश्रा, दीपा, विशाल कुमार, स्वाति बालूरकर, मऊ मल्लिक डे, डॉ. संगीता शर्मा, टी. गायत्री, मुस्कान कुमारी, शैली सिंह, गरिमा गौतम, प्रो. छाया‌ राय, सरिता दीक्षित, अभिषेक, मधु शर्मा, विशाल, वरुण पुरी, शिल्पा गोयल और पल्लवी पुरी सम्मिलित हैं। ‘क से कविता’ कोर टीम से ज़ीनत ने कार्यक्रम का संचालन किया। सुदर्शन ने फ़ोटो-वीडियोग्राफी की ज़िम्मेदारी सँभाली।

आरंभ में सभी आगंतुकों का चॉकलेट से स्वागत किया गया और अंत में अल्पाहार की व्यवस्था की गई। सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र और बाल दिवस का उपहार भी दिया गया।‌ 000

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

‘कुछ राब्ता है तुमसे’ पर ऑनलाइन परिचर्चा संपन्न


हैदराबाद, 31 अक्टूबर, 2025।
“किसी साहित्यिक कृति में जितना महत्व कथ्य और कथन का होता है, उतना ही सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक और ऐतिहासिक प्रभावों तथा सांस्कृतिक संदर्भों का भी होता है।”

ये विचार मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के दूरस्थ-ऑनलाइन शिक्षा केंद्र के हिंदी परामर्शी प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने युवा लेखक प्रवीण प्रणव की पुस्तक “कुछ राब्ता है तुमसे” पर बोलते हुए प्रकट किए। वे फटकन, आखर और हिंदी मैत्री मंच के तहत इस पुस्तक पर आयोजित ऑनलाइन परिचर्चा में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। डॉ. शर्मा ने विवेच्य पुस्तक की गहन पड़ताल करते हुए इसमें निहित सीमापार, लोकतत्व, स्त्रीपक्ष, पराधीनता, विभाजन, मोहभंग और लोकप्रियता के पाठों-उपपाठों पर चर्चा की।

भारतीय साहित्य की विदुषी, अनुवादक और समीक्षक प्रो. प्रतिभा मुदलियार ने पुस्तक की बहुआयामी उपादेयता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसमें संगृहीत निबंध भली-भाँति यह दर्शाते हैं कि रचनाकारों की निजी दुनिया और वास्तविक दुनिया के रिश्ते कितने संश्लिष्ट हुआ करते हैं।

कथाकार-कवयित्री रेणु यादव ने लेखक की रचना प्रक्रिया और भावी योजनाओं के बारे में जिज्ञासाएँ प्रकट कीं, जिनका समाधान करते हुए प्रवीण प्रणव ने जीवनीपरक आलोचना के लिए खोजी प्रवृत्ति और गहन अध्ययन के महत्व पर प्रकाश डाला। परिचर्चा का संचालन शोधार्थी संगीता ने सुचारु रूप से किया। ■