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गुरुवार, 16 जुलाई 2026

अंतरिक्ष उपयोग केंद्र में संपन्न हिंदी तकनीकी संगोष्ठी-2026 की रिपोर्ट



सैक - इसरो - अहमदाबाद में हिंदी तकनीकी संगोष्ठी संपन्न


मंच पर आसीन (बाएं से) श्री विवेक कुमार जैन भा.दू.से.,
डॉ. सी.वी.एन. राव, डॉ. अनिल भारद्वाज, श्री सौम्य सरकार,
ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला एवं श्रीमती नीलू सेठ

 

अंतरिक्ष उपयोग केंद्र में 9-10 जुलाई 2026 को "सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय : अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी" विषय पर पूल स्तरीय हिंदी तकनीकी संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह में ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला, भारतीय अंतरिक्षायात्री मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे और इस समारोह की अध्यक्षता श्री सौम्य एस. सरकार, निदेशक, सैक ने की।



प्रार्थना गीत और दीप प्रज्ज्वलन के साथ संगोष्ठी प्रारंभ की गई। मंचासीन महानुभावों का स्वागत ऑक्सीजन प्लांट भेंट कर किया गया। संगोष्ठी आयोजन समिति के अध्यक्ष श्री संजीव कुलश्रेष्ठ ने संगोष्ठी का संक्षिप्त परिचय देते हुए स्वागत-भाषण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि संगोष्ठी के लिए मुख्य विषय का सुझाव लेखकगणों से आमंत्रित कर चयन किया गया। इस संगोष्ठी में पहली बार गुजरात राज्य के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थानों के स्नातक व स्नातकोत्तर छात्रों से और नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति के सदस्य कार्यालयों से भी तकनीकी आलेख आमंत्रित किए गए। संगोष्ठी के लिए 200 लेख प्राप्त हुए थे, जिसमें से 167 लेखों का प्रस्तुति के लिए चयन किया गया। इसमें 130 लेख सैक कार्मिकों के, 8 लेख पीआरएल के, 27 लेख विद्यार्थियों के और 2 लेख नराकास सदस्य कार्यालयों से चयनित हुए।


संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह के दौरान लेख-संग्रह का विमोचन


तदुपरांत, मुख्य अतिथि ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला जी ने संगोष्ठी के संक्षिप्त लेख-संग्रह का विमोचन किया। लेख संग्रह संगोष्ठी के लेखक प्रतिभागियों द्वारा प्रस्तुत 167 लेखों का संकलन है। इसी समारोह के दौरान निदेशक, सैक द्वारा “नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति” के सुगम संचालन हेतु विकसित पोर्टल का भी विमोचन किया गया।





निदेशक, पीआरएल डॉ. अनिल भारद्वाज ने अंतरिक्ष विज्ञान जैसे गूढ़ तकनीकी विषयों पर राजभाषा हिंदी में सृजित किए जा रहे मौलिक साहित्य का उल्लेख करते हुए अपना विशेष उद्बोधन दिया। अध्यक्षीय भाषण में निदेशक, सैक श्री सौम्य एस. सरकार ने कहा कि वर्ष 1986 में प्रथम हिंदी तकनीकी संगोष्ठी का आयोजन सैक द्वारा किया गया था और तब से यह निरंतर आयोजित की जा रही है। इस वर्ष इस आयोजन के 40 वर्ष पूर्ण हुए हैं जो हम सबके लिए अत्यंत गर्व का क्षण है।
नराकास ऑनलाइन पोर्टल का विमोचन

मुख्य अतिथि ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला जी ने अपने उद्बोधन में अंतरिक्ष यात्रा के अपने अनुभव उपस्थित श्रोताओं के साथ साझा किए। उन्होंने अंतरिक्ष से लिए कई वीडियो दिखाए जिन्हें देखकर सभी मंत्रमुग्ध हो गए। श्री शरद शुक्ला ने मुख्य अतिथि का परिचय दिया। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र का मंच-संचालन डॉ. सोनू जैन, उप निदेशक (राजभाषा) द्वारा किया गया और आभार-ज्ञापन उप निदेशक (राजभाषा) श्रीमती नीलू सेठ ने किया।


संगोष्ठी में पधारे अतिथियों के लिए ऑडिटोरियम बेसमेंट में एक सेल्फी पॉइन्ट भी बनाया गया था।



विद्यार्थियों में अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए संगोष्ठी उद्घाटन सत्र के पश्चात् ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला जी के साथ एक परिचर्चा सत्र रखा गया था। इस सत्र में कक्षा 9-12 में पढ़ने वाले के.वि. सैक के 40 और सैक कर्मचारियों के 120 बच्चों को आमंत्रित किया गया था, जिन्होंने शुभांशु शुक्ला जी से विभिन्न प्रश्न पूछे।


17 समानांतर सत्रों में 167 लेख प्रस्तुत किए गए जिनके सत्राध्यक्ष क्रमशः श्री विवेक कुमार जैनभा.दू.से., श्री एम.जी. सोम शेखरन नायर, डॉ. धनी राम रजक, श्री देबज्योति धर, डॉ. सेंथिल कुमार, श्री पल्लम राजू, श्री आशीष बी. मिश्रा, डॉ. मिलिंद महाजन, डॉ. सुभाष चंद्र बेरा, डॉ. सी.वी.एन. राव, श्री मुकेश पटेल, डॉ. के.के. सूद, श्री डी.के. पटेल, डॉ. रश्मि शर्मा, डॉ. रविशंकर जे., श्री अरूप कुमार हैत और श्री मनीष मेहता थे।



उक्त सत्रों में कुल 131 लेख पावर पाइंट माध्यम से और 36 लेख पोस्टर माध्यम से प्रस्तुत किए गए। सभी लेखकों ने ज्ञानवर्धक और प्रभावपूर्ण प्रस्तुतियां दीं। प्रत्येक प्रस्तुति के लिए 8 मिनिट का समय दिया गया जिसके बाद 2 मिनिट का प्रश्नकाल भी रखा गया, जिसमें उपस्थित श्रोताओं ने अपने प्रश्न रखे।


9 जुलाई 2026 की शाम को सभी प्रतिभागियों के लिए सैक एवं पीआरएल के कर्मचारियों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए। एक घंटे के इस कार्यक्रम में प्रार्थना नृत्य, एकल गायन, समूह नृत्य, एकांकी आदि अनेक रोचक प्रस्तुतियाँ दी गईं जिनका दर्शकों ने भरपूर आनंद लिया। तत्पश्चात् निदेशक डिनर आयोजित किया गया।

संगोष्ठी के दूसरे दिन पैनल चर्चा तथा प्रतिभागिता प्रमाण-पत्र वितरण सत्र और उसके पश्चात् प्रत्येक सत्र की श्रेष्ठ प्रस्तुति के लिए प्रमाण-पत्र एवं पुरस्कार वितरण समारोह आयोजित किया गया। इसमें अंतरिक्ष विभाग के संयुक्त निदेशक श्री एम.जी. सोम शेखरन नायर ने संगोष्ठी के आयोजन के संबंध में अपने प्रतिभाव व्यक्त किए। प्रत्येक सत्र के सत्राध्यक्ष ने अपने सत्र के दौरान प्रस्तुत लेखों और उन पर की गई चर्चा के विषय में सभा को अवगत कराया। उसके पश्चात् उस सत्र के सभी प्रतिभागियों को प्रतिभागिता प्रमाण-पत्र वितरित किए गए।

प्रमाण-पत्र वितरण समारोह में संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि प्रो. (डॉ.) ऋषभदेव शर्मा ने उद्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष विज्ञान जैसे विषय को अक्सर नीरस माना जाता है, किंतु इस संगोष्ठी में जितनी सरल भाषा में इन विषयों पर चर्चा की गई है वह प्रशंसनीय है।

संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह के दौरान सभागार में उपस्थित श्रोतागण


प्रत्येक सत्र की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति के लिए प्रस्तोता लेखकों को पुरस्कार एवं विशेष प्रमाण-पत्र प्रदान करने के उपरांत, निदेशक महोदय ने सभी विजेताओं को बधाई दी व संगोष्ठी के सफलतापूर्वक संपन्न होने पर सभी प्रतिभागियों, समितियों, आदि की सराहना की और अपने मुख्यधारा के कार्यों में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देने के लिए समर्पित भाव से काम करने की प्रेरणा दी। सुश्री सोमा करनावट, कनिष्ठ अनुवाद अधिकारी ने पैनल चर्चा सत्र और श्रीमती नीलू सेठ, उप निदेशक (राभा) ने प्रमाण-पत्र वितरण समारोह के दौरान मंच संचालन किया। अंत में डॉ. सोनू जैन, उप निदेशक (राभा) द्वारा आभार-ज्ञापन के उपरांत कार्यक्रम पूर्ण हुआ।



शनिवार, 14 सितंबर 2024

वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषा का योगदान विषयक त्रि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन संपन्न

त्रिनिदाद यात्रा से डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की रिपोर्ट



वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषा का योगदान विषयक त्रि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन संपन्न

हिंदी है हृदय की भाषा : रेणुका संग्रामसिंह सुखलाल

व्यावहारिक स्तर पर हिंदी अपनाएँ, सांस्कृतिक धरोहर को अंतरित करें : डॉ. प्रदीप राजपुरोहित

सम्मेलन का उद्घाटन 


पोर्ट ऑफ स्पेन, त्रिनिदाद और टोबैगो। 

“त्रिनिदाद की जनता के लिए हिंदी हृदय की भाषा है। ऐसी हिंदी भाषा को तथा उसकी संस्कृति को सुनिश्चित रखना अनिवार्य है। भले ही यह कार्य कठिन है लेकिन असाध्य नहीं। त्रिनिदाद में बसा हुआ हर भारतीय मूल का परिवार अपनी संस्कृति और सभ्यता, विशेष रूप से अपनी भाषा हिंदी को सुरक्षित रखने के लिए संघर्ष कर रहा है।”
रेणुका संग्रामसिंह सुखलाल 


माउंट होप, त्रिनिदाद में स्थित महात्मा गांधी सांस्कृतिक सहयोग संस्था के सभागार में 6 से 8 सितंबर, 2024 तक भारतीय उच्चायोग, पोर्ट ऑफ स्पेन द्वारा आयोजित “त्रि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन” का उद्घाटन करते हुए अटॉर्नी जनरल कार्यालय और कानूनी मामलों के मंत्रालय की मंत्री रेणुका संग्रामसिंह सुखलाल ने उक्त विचार व्यक्त किए। उन्होंने यह भी चिंता व्यक्त की कि कैरेबियन देशों में भारतवंशी पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति, सभ्यता और हिंदी भाषा को अंतरित करने में असमर्थ हो रहे हैं।

डॉ प्रदीप राजपुरोहित 
भारतीय उच्चायोग, पोर्ट ऑफ स्पेन के उच्चायुक्त डॉ. प्रदीप राजपुरोहित ने सबका स्वागत करते हुए कहा कि सबको व्यावहारिक स्तर पर हिंदी को अपना चाहिए। पंडिताऊ भाषा के स्थान पर सामान्य बोलचाल की हिंदी का प्रयोग करना चाहिए। ऐसा करने से हिंदी भाषा में निहित सांस्कृतिक एवं लोक धरोहर को पीढ़ी-दर-पीढ़ी अंतरित किया जा सकता है। उन्होंने यह चिंता व्यक्त की कि त्रिनिदाद में बसे भारतीय मूल के लोग अपनी भाषा को अक्षुण्ण रख पाने में असमर्थ अनुभव करने लगे हैं। हिंदी भाषा, विशेष रूप से बोलचाल की भाषा, पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि दूतावास स्कूली स्तर पर हिंदी कक्षाएँ चलाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी सीखने के लिए प्रोत्साहन के रूप में छात्रवृत्ति देने के लिए भी तैयार है। उन्होंने त्रिनिदाद वासियों से अपील की कि हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझकर हिंदी के प्रचार-प्रसार में आगे बढ़े। उन्होंने यह प्रश्न किया कि क्या स्थानीय शिक्षण संस्थाएँ इस कार्य को अंजाम देने में उच्चायोग का सहयोग करने के लिए तैयार हैं?

पोर्ट ऑफ स्पेन स्थित राष्ट्रीय भारतीय संस्कृति परिषद (एनसीआईसी) के अध्यक्ष देवरूप तीमल ने कहा कि भाषा
देवरूप तीमल 

जीवन के साथ एकीकृत है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वैश्विक स्तर पर हिंदी को बढ़ावा देने के लिए नेटवर्किंग आवश्यक है। आगे उन्होंने कहा कि त्रिनिदाद और टोबैगो में स्थित भारतीय मूल के वासियों में भारतीय संस्कृति ‘रामचरित मानस’ के रूप में विद्यमान है। भले ही यहाँ के लोग अर्थ न जानते हों, लेकिन मानस के पद कंठस्थ करते हैं। यह इसलिए क्योंकि भारतीयता उनके डीएनए में विद्यमान है।

रवींद्र प्रसाद जायसवाल 




भारतीय विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव रवींद्र प्रसाद जायसवाल ने कहा कि भारतीयता को समझने की कुंजी है हिंदी भाषा। यदि हम सांस्कृतिक अस्मिता को अक्षुण्ण रखना चाहते हैं तो क्षेत्रीय रंगों को भी अपनाना होगा। उन्होंने भी यही चिंता व्यक्त की कि इस यात्रा में हिंदी भाषा कहीं पीछे छूट रही है।


नील पर्सनलाल 

राष्ट्रीय पुस्तकालय और सूचना प्रणाली प्राधिकरण (नालिस) के चेयरमैन नील पर्सनलाल ने हिंदी भाषा, भारतीय सभ्यता और संस्कृति के संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज की पीढ़ी में हिंदी भाषा के प्रति रुचि जगाने के लिए पुरजोर कोशिश किए जाने की ज़रूरत है।






त्रिनिदाद में स्थित हिंदी निधि के अध्यक्ष चंका सीताराम ने हिंदी भाषा को त्रिनिदाद और टोबैगो के भाषाई समाज में पुनः स्थापित करने के लिए युवा पीढ़ी से अपील की।
चंका सीताराम 


कार्यक्रम के आरंभ में वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय को श्रद्धांजलि दी गई। इस अवसर पर महात्मा गांधी सांस्कृतिक सहयोग संस्था के छात्र और अध्यापकों ने गायन तथा भरतनाट्यम नृत्य प्रस्तुत किया। ‘हिंदी, शिक्षा और संस्कृति’, पोर्ट ऑफ स्पेन के द्वितीय सचिव शिवकुमार निगम ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन आशा महाराज और ऋषा मोहम्मद ने किया।

उद्घाटन के बाद विचार सत्रों में त्रिनिदाद और टोबैगो के साहित्यकारों, समाजशास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों के साथ-साथ भारत, सूरीनाम, गयाना, अमेरिका से पधारे विद्वानों ने इस संबंध में अपने-अपने विचार व्यक्त किए। प्रथम विचार सत्र में देवरूप तीमल की अध्यक्षता में कमला रामलखन (त्रिनिदाद), सत्यानंद हेरोल्ड परमसुख (सूरीनाम), विकास रामकिसुन (सांसद, गयाना) ने कैरेबियाई क्षेत्र में बोली जाने वाली हिंदी के विभिन्न रूपों पर प्रकाश डाला। इस विचार सत्र से यह तथ्य सामने आया कि कैरेबियाई क्षेत्रों में हिंदी भाषा को सुरक्षित रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। यह भी कि सूरीनाम में आज भी ‘सूरीनामी हिंदी’ बोली जाती है जो भोजपुरी और हिंदी का मिश्रित रूप है। विद्वानों ने यह कहा कि हिंदी और भारतीय संस्कृति उनकी अस्मिता है। इन कैरेबियाई क्षेत्रों में ‘रामचरित मानस’ ने हिंदू समाज को जोड़कर रखा है। यदि यहाँ के समाज में आज भी हिंदी जीवित है तो उसका श्रेय ‘मानस’ को ही जाता है। यहाँ के लोग ‘रामायण’ और ‘वेद’ को भी अंग्रेजी में ही पढ़ते हैं। गायन और संगीत के कारण यहाँ के लोग अपनी मूल संस्कृति के निकट हैं।

डॉ. हितेन्द्र कुमार मिश्र (शिलांग) की अध्यक्षता में संपन्न द्वितीय विचार सत्र में हिंदी भाषा को सीखने के लिए उपलब्ध संसाधनों के बारे में चर्चा करते हुए हिमांचल प्रसाद (गयाना), डॉ. नवलकिशोर भाबड़ा (अजमेर), डॉ. प्रदीप के. शर्मा (सिक्किम) ने यह बताया कि गीत-संगीत, सिनेमा, लोकसंगीत, लोक नाटक आदि के माध्यम से भाषा सीखी और सिखाई जा सकती है। आज के समय में सोशल मीडिया के कारण तथा तकनीकी विकास के कारण इतने सारे मोबाइल एप्लीकेशन्स हैं कि भाषा सीखने में कोई कठिनाई नहीं होगी।

डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा (चेन्नै) की अध्यक्षता में संपन्न तृतीय विचार सत्र में डॉ. निवेदिता मिश्र (त्रिनिदाद), रफ़ी हुसैन (त्रिनिदाद), इंदिरा (त्रिनिदाद) और डॉ. मिलन रानी जमातिया (त्रिपुरा) ने हिंदी के विकास में विदेशी विद्वानों के योगदान पर प्रकाश डाला और यह सिद्ध किया कि यदि उचित वातावरण उपलब्ध हो तो भाषा सीखने में समस्या नहीं होगी। भाषा सीखने के लिए पहली शर्त है जिज्ञासा और ज़रूरत।

चतुर्थ विचार सत्र में सूरजदेव मंगरू (त्रिनिदाद और टोबैगो), डॉ. शिवानंद महाराज (यूडब्ल्यूआई), राणा मोहिप (त्रिनिदाद और टोबैगो), कृष रामखलावन (सूरीनाम) ने ‘बैठक गाना’, ‘चटनी संगीत’ और ‘शास्त्रीय संगीत’ के बारे में बताते हुए व्यावहारिक तौर पर दर्शाया कि इनके माध्यम से कैरेबियाई क्षेत्रों में हिंदी भाषा आज तक कैसे जीवित है।

हर विचार सत्र के बाद पैनल चर्चा हुई। रामप्रसाद परशुराम (त्रिनिदाद) की अध्यक्षता में संपन्न पैनल चर्चा में आशा मोर (त्रिनिदाद), नितिन जगबंधन (सूरीनाम), डॉ. नवलकिशोर भाबड़ा (अजमेर), सुनैना परीक्षा रागिनीदेवी (सूरीनाम) और स्वामी ब्रह्मस्वरूप नंदा (त्रिनिदाद और टोबैगो) ने यह प्रतिपादित किया कि रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्य कैरेबियाई क्षेत्र के लोगों की आत्मा में बसते हैं। आज की पीढ़ी अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए पुरज़ोर कोशिश कर रही हैं। अपनी भाषा हिंदी को सीखने की कोशिश कर रही है। डॉ. विद्याधर शाह की अध्यक्षता में संपन्न चर्चा में डॉ. हितेंद्र मिश्र, ईशा दीक्षित (त्रिनिदाद), कादंबरी आदेश (फ्लोरिडा) ने भाषा के विकास में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका पर प्रकाश डाला। नील पर्सनलाल की अध्यक्षता में संपन्न विचार सत्र में डॉ. प्रदीप के शर्मा, डॉ. शशिधरन (केरल), डॉ. मिलन रानी जमातिया, विकास रामकिसुन ने हिंदी भाषा सीखने में फिल्मों की भूमिका पर प्रकाश डाला।

चर्चा-परिचर्चा के उपरांत उच्चायुक्त और सांसदों ने यह घोषणा की कि कैरेबियाई क्षेत्रों में हिंदी विकास के लिए अनिवार्य कदम उठाए जाएँगे। यह भी निर्णय लिया गया कि हिंदी सीखने के लिए जो छात्र आगे आएँगे उन्हें छात्रवृत्ति देकर प्रोत्साहित किया जाएगा। इतना ही नहीं, प्राथमिक स्तर पर हिंदी भाषा को अनिवार्य रूप से पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रस्ताव भी सरकार के समक्ष रखा जाएगा।

त्रि-दिवसीय सम्मेलन के दौरान चर्चा-परिचर्चाओं के अलावा, कैरेबियाई क्षेत्रों में प्रसिद्ध बैठक गाना, चटनी संगीत, लोक नृत्य, शास्त्रीय नृत्य आदि का प्रदर्शन किया गया जिससे संपूर्ण वातावरण जीवंत हो उठा। 000


शुक्रवार, 29 दिसंबर 2023

एकदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला संपन्न



पाठ लेखन के समय लेखक को स्वयं शिक्षार्थी लर्नर बनना ही होगा - प्रो. गोपाल शर्मा

हैदराबाद, 29 दिसंबर, 2023 (मीडिया विज्ञप्ति)।

“एस एल एम (सेल्फ लर्निंग मेटीरियल) या स्व-अध्ययन सामग्री ऐसी सामग्री है जिसे आदि से लेकर अंत तक छात्रकेंद्रित होना चाहिए। इस सामग्री को तैयार करते समय लेखक से लेकर संपादक, समन्वयक, परामर्शी आदि कई लोग आपस में मिलजुलकर एक इकाई की तरह कार्य करते हैं। स्व-अध्ययन सामग्री की बात करें तो वास्तव में सबसे पहले वही सीखता है जो उस पाठ को लिखता है। इस दृष्टि से सबसे पहला लर्नर पाठलेखक ही होता है। हर इकाई उसके लिए एक चुनौती है और हर पाठ लिखते समय लेखक को स्वयं शिक्षार्थी लर्नर बनना ही होगा। अन्यथा आप अपने लक्ष्य छात्रों के साथ न्याय नहीं कर पाएँगे। लेखक के रूप में केवल पिष्टपेषण न करें। विषय पर ध्यान दें। शिक्षक के साथ-साथ शिक्षार्थी बनकर इकाई लिखने का प्रयास करें। अपने अंदर निहित विद्यार्थी को जगाइए और उसके अनुरूप, उसकी सीखने की क्षमता के अनुरूप शब्द चयन कीजिए ताकि आसानी से विषय प्रेषित और ग्रहण किया जा सके। यह सामग्री पूरी तरह से विद्यार्थियों के लिए ही होनी चाहिए। विद्यार्थी समीक्षक होते हैं, अतः लेखक कभी भी कहीं भी प्रेसक्राइब न करें। विषय को डिस्क्राइब करें। सामग्री-निर्माण के समय विधार्थी और उसकी लर्निंग स्टाइल को भी ध्यान में रखें। लिखने-पढ़ने-सीखने की यह यात्रा कभी समाप्त नहीं होती है। यह आगे भी निरंतर चलती रहेगी।”


ये विचार प्रो. गोपाल शर्मा (पूर्व प्रोफेसर, अंग्रेजी विभाग, अरबा मींच विश्वविद्यालय, इथियोपिया) ने 28 दिसंबर, 2023 को मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय में दूरस्थ शिक्षा निदेशालय के निदेशक प्रो. मोहम्मद रज़ाउल्लाह ख़ान की अध्यक्षता में संपन्न एकदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में बीज भाषण देते हुए प्रकट किए। इस कार्यशाला में दूरस्थ शिक्षा माध्यम के छात्रों के लिए हिंदी की गुणवत्तापूर्ण श्रेष्ठ स्व-अध्ययन सामग्री तैयार करने के सिद्धांत और तकनीक पर गहन विचार-विमर्श किया गया।

अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रो. मोहम्मद रज़ाउल्ला खान ने उपस्थित सभी इकाई-लेखकों और संपादन मंडल के सदस्यों को साधुवाद देते हुए हर्ष व्यक्त किए। उन्होंने दूरस्थ शिक्षा के दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए हिंदी की शिक्षण सामग्री की सराहना की और इसे दूरस्थ माध्यम के छात्रों की ज़रूरतों के मुताबिक बताया।

बतौर मुख्य अतिथि भाषा विभाग के पूर्व डीन प्रो. नसीमुद्दीन फरीस ने स्व-अध्ययन सामग्री तैयार करने में जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, उन पर चर्चा की और इकाई-लेखकों को प्रोत्साहित किया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि एस एल एम अर्थात स्व-अध्ययन सामग्री को मुख्य रूप से 'पाँच स्व' को ध्यान में रखकर निर्मित किया जाता है - स्व-व्याख्यात्मक, स्व-निहित, स्व-निर्देशित, स्व-प्रेरक और स्व-मूल्यांकनपरक।

संपादक मंडल के सदस्य प्रो. श्याम राव राठौड़ (अंग्रेज़ी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय) और डॉ. गंगाधर वानोडे (केंद्रीय हिंदी संस्थान) ने अपने विचार व्यक्त करते हुए यह आश्वासन दिया कि गुणवत्तापूर्ण सामग्री निर्माण में वे आगे भी मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी को अपना योगदान देते रहेंगे।

आमंत्रित वक्ता डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा (दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नै) ने स्व-अध्ययन सामग्री के संपादन के समय उपस्थित चुनौतियों पर व्यावहारिक रूप से प्रकाश डाला। डॉ. मंजु शर्मा (चिरेक इंटरनेशनल) और हिंदी विभाग, मानू के आचार्य डॉ. पठान रहीम खान और डॉ. अबु होरैरा आदि ने इकाई-लेखक के रूप में अपने अनुभवों को साझा किया।

कार्यशाला में डॉ. पूर्णिमा शर्मा, डॉ. शशिबाला, डॉ. वाजदा इशरत, डॉ. अनिल लोखंडे, शीला बालाजी, निलया रेड्डी, डॉ. बी. बालाजी, डॉ. अदनान बिसमिल्लाह, डॉ. इरशाद, डॉ. समीक्षा शर्मा और शेख मस्तान वली आदि ने सक्रिय सहभागिता निबाही।

इस कार्यक्रम में एमए (हिंदी) द्वितीय सत्र की पाठसामग्री के साथ-साथ डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की समीक्षा कृति “परख और पहचान” का भी लोकार्पण निदेशक प्रो. रज़ाउल्लाह ख़ान ने किया। प्रो. ख़ान ने समस्त अतिथियों का पुष्पगुच्छ और शॉल से भावभीना स्वागत-सत्कार किया, तो इकाई-लेखकों की ओर से परामर्शी और संपादक प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने निदेशक प्रो. रज़ाउल्लाह ख़ान तथा कोर्स कोऑर्डिनेटर डॉ. आफ़ताब आलम बेग का अभिनंदन शॉल ओढ़ाकर किया। प्रतिभागी इकाई-लेखकों को हिंदी विषय की प्रकाशित 14 पुस्तकों की लेखकीय प्रतियाँ ससम्मान भेंट की गईं।

पूरे कार्यक्रम का संचालन डॉ. आफताब आलम बेग ने किया तथा डॉ. अनिल लोखंडे ने धन्यवाद ज्ञापित किया। ◆

प्रस्तुति:
डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा
सह संपादक 'स्रवंति'
एसोसिएट प्रोफेसर
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास
टी. नगर, चेन्नै - 600017



तेलंगाना  समाचार 

शनिवार, 19 मार्च 2022

प्रेमचंद्र जैन की प्रथम पुण्यतिथि पर भावपूर्ण स्मरण

समाज निर्माण के लिए भाईचारे को बढ़ाने की आवश्यकता - डॉ. देवराज 

प्रेमचंद्र जैन शिक्षा और ज्ञान के अगाध समंदर थे -डॉ. सूर्यमणि रघुवंशी




नजीबाबाद (उत्तर प्रदेश) के साहू जैन डिग्री कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर डॉ. प्रेमचंद्र जैन की प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर 16 मार्च, 2022 को उनके विद्यार्थियों द्वारा आयोजित ‘प्रेमचंद्र जैन स्मरण’ कार्यक्रम की अध्यक्षयता करते हुए ‘चिंगारी’ के संपादक डॉ. सूर्यमणि रघुवंशी ने कहा कि डॉ. प्रेमचंद्र जैन एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि वे व्यक्तित्व थे, परंपरा थे। उन्होंने यह भी कहा कि उनके भीतर एक संत और एक ऐसा सिपाही विद्यमान था जो सागर की तरह शांत था तथा समुद्र की लहरों की तरह ही आगे बढ़ता था। प्रेमचंद्र जैन शिक्षा और ज्ञान के अगाध समंदर थे।

डॉ. देवराज ने अपने गुरु प्रेमचंद जैन का स्मरण करते हुए कहा कि उन्होंने अपने शिष्यों को सही कहना और निर्भय रहना सिखाया। उन्होंने आगे कहा कि आज समाज संकट में फँसा है। अँधेरों से लड़ना है, उजाले में इसे बदलना है। समाज के निर्माण के लिए नफरत नहीं भाईचारा बढ़ाने की जरूरत है। जब भाईचारा और आपसी प्रेम बढ़ेगा, तो एक अच्छे समाज का निर्माण होगा। प्रेमचंद्र जैन ने गुरु-शिष्य का अच्छा रिश्ता निभाने के साथ सामाजिक सरोकारों की जो चेतना पैदा की थी, उसे आज तेजी से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।

इस अवसर पर एम. दानिश सैफी द्वारा संपादित प्रेमचंद्र जैन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित स्मृति ग्रंथ ‘इतिहास हुआ एक अध्यापक’ का विमोचन भी किया गया। इसकी प्रथम प्रति प्रेमचंद्र जैन की अर्धांगिनी श्रीमती आशा जैन ने स्वीकार की। उनकी सुपत्री श्रीमती श्रद्धा भी इस अवसर उपस्थित रहीं।

इस कार्यक्रम में डॉ. ए. के. मित्तल, महमूद जफ़र, डॉ. आफताब नोमानी, शकील राज, इंद्रदेव भारती, डॉ. हेमलता राठौर, डॉ. निर्मल शर्मा, डॉ. रजनी शर्मा, पुनीत गोयल, मनोज शर्मा, आशा रजा, डॉ. शहला अंजुम, कामरेड रामपाल सिंह, जितेंद्र कुमार आदि उपस्थित रहे। कार्यक्रम का सफल संचालन दानिश सैफी ने किया।


मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

गुर्रमकोंडा नीरजा की पुस्तक ‘समकालीन साहित्य विमर्श’ लोकार्पित


लोकार्पित कृति को स्वीकार करते हुए प्रो.ऋषभदेव शर्मा 


हैदराबाद; 21 दिसंबर, 2021।

साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘साहित्य मंथन’ और दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा-आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना के संयुक्त कार्यक्रम में गुर्रमकोंडा नीरजा की पुस्तक ‘समकालीन साहित्य विमर्श’ का लोकार्पण संपन्न हुआ।

प्रो. गोपाल शर्मा 

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए अरबा मींच विश्वविद्यालय के पूर्व अंग्रेजी प्रोफेसर डॉ.गोपाल शर्मा ने कहा कि यह उन विमर्शों का युग है जिनको अब तक विमर्श के बाहर रखा जाता रहा और यह पुस्तक उन विमर्शों का सोदाहरण प्रस्तुतीकरण है। पुस्तक में संकलित 24 आलेखों में सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषिक मुद्दों को रेखांकित किया जा सकता है।
प्रो. शुभदा वांजपे 

लोकार्पण वक्तव्य में मुख्य अतिथि उस्मानिया विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर डॉ. शुभदा वांजपे ने कहा कि आज स्त्री और दलित विमर्श पर अधिकांश रूप से प्रकाश डाला जा रहा है, किंतु लोकार्पित पुस्तक ‘समकालीन साहित्य विमर्श’ में इन दो विमर्शों के अतिरिक्त हरित, किन्नर, आदिवासी, विस्थापन आदि पर भी गंभीर विमर्श किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि 'समकालीन साहित्यकार गति-अवरोधक मूल्यों के प्रति सदैव विद्रोही और अपनी रचनाओं में नवीन विचारों की स्थापना कर चेतना भरने वाले रहे हैं। उनकी रचनाएँ नवीन विषय वस्तु और शैलीय भंगिमा की दृष्टि से अभिनव हैं। उनके प्रयोगात्मक वैशिष्ट्य तथा आधुनिक वैचारिक दृष्टि को अभिव्यंजित करने में यह पुस्तक पूरी तरह सफल हुई है।'

श्री प्रवीण प्रणव 
मुख्य वक्ता माइक्रोसॉफ्ट के प्रोग्राम मैनेजमेंट निदेशक प्रवीण प्रणव ने कहा कि इस पुस्तक में पाँच खंडों में सम्मिलित 24 आलेखों में विभिन्न विमर्शों को पुल के अलग-अलग भागों की तरह एक साथ लाकर इस तरह जोड़ा गया है कि अपने स्वरूप में वे पूर्णता को प्राप्त कर लें। ये सभी लेख अलग-अलग समय में लिखे गए हैं इसलिए इनकी अपनी अलग पहचान तो है ही, लेकिन इस किताब में संकलित हो जाने और इन्हें एक साथ पढ़ने से पाठक इन लेखों के ‘तेरहवें स्वाद’ से भी परिचित हो सकेंगे।

प्रो. ऋषभदेव शर्मा 
लोकार्पित पुस्तक की प्रथम प्रति स्वीकार करते हुए प्रतिष्ठित साहित्यकार प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि इस पुस्तक में बोलने और लिखने की भाषा के द्वैध को मिटाने का प्रयास किया गया है तथा अधिकतर आलेखों में विविध विमर्शों की भाषा पर अलग-अलग ढंग से प्रकाश डाला गया है; और यह पहचानने की कोशिश की गई है कि अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने वाले रचनाकार किस तरह से हिंदी भाषा के दायरे को कितना विकसित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विमर्शीय लेखन ने साहित्य की भाषा को जनता की भाषा के अधिकाधिक नज़दीक लाने का काम किया है।

प्रो. करन सिंह ऊटवाल 


विशेष अतिथि मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. करन सिंह ऊटवाल ने कहा कि कहने का अंदाज अलग अलग भले ही होता है, लेकिन साहित्य हर काल में समाज सापेक्ष रहा है। अवसर पर साहित्य मंथन की ओर से प्रोफेसर ऊटवाल का अभिनंदन किया गया।

आरंभ में अतिथियों ने दीप-प्रज्वलन किया और शिक्षा महाविद्यालय की प्राध्यापक शैलेषा नंदूरकर ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। संचालन और धन्यवाद ज्ञापन की जिम्मेदारी मिश्र धातु निगम के हिंदी अनुभाग एवं निगम संचार उपनिदेशक डॉ. बी. बालाजी ने निभाई।


इस अवसर पर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा-आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना, हैदराबाद द्वारा निरंतर 66 वर्षों से प्रकाशित द्विभाषा (हिंदी-तेलुगु) मासिक 'स्रवंति' (नवंबर 2021) के अंक का लोकार्पण करते हुए प्रो. गोपाल शर्मा ने कहा कि यह पत्रिका शोध की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।  

इस अवसर पर वीरेंद्र कुमार, सुरेश राचपूड़ी, डॉ. रियाजुल अंसारी, डॉ. साहिराबानू बी. बोरगल, डॉ. बलविंदर कौर, डॉ. गोरखनाथ तिवारी, डॉ. शक्ति कुमार द्विवेदी, डॉ. सी. एन. मुगुटकर, डॉ. ए. जी. श्रीराम, खादर अली खान, जकिया परवीन, डॉ. डी. डी. देसाई, एकांबरेश्वरुडु, जुबेर अहमद, डॉ. शंकर सिंह ठाकुर, के. राजन्ना, जी. परमेश्वर, डॉ. सुपर्णा मुखर्जी, जी. संगीता, डॉ. सीमा मिश्रा, अशोक तिवारी, डॉ. श्याम सुंदर, अब्दुल हमीद खान, हुड़गे नीरज, रूपा प्रभु, फिज़ा बानू, पार्वती देशपांडे, डॉ. संतोष विजय मुनेश्वर, वी. कृष्णा राव, लोहित्या, श्रीसाहिती, राधाकृष्ण मिरियाला, किशोर बाबू, रमाकांत, नेक परवीन, जी. शिरीष बाबू, डॉ. राजेंद्र, संजय, शारदा आदि साहित्य प्रेमियों, विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों, विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों, छात्रों और शोधार्थियों ने उपस्थित होकर लेखिका को शुभकामनाएँ दीं। संकल्य, हिंदी अकादमी, साहित्य मंथन और हिंदी हैं हम विश्व मैत्री मंच ने लेखिका का सारस्वत सम्मान किया। 000




मंगलवार, 14 दिसंबर 2021

'श्रीरामकथा का विश्वसंदर्भ महाकोश' के पहले खंड का लोकार्पण संपन्न




30 नवंबर 2021 को नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन के प्लेनरी हॉल में संपन्न "रामकथा में सुशासन" विषयक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के अवसर पर 56 खंडों के 'श्रीरामकथा विश्वसंदर्भ महाकोश' के पहले खंड 'लोकगीत और लोक कथाओं में श्रीरामकथा का संदर्भ' का लोकार्पण मुख्य अतिथि जी. किशन रेड्डी (संस्कृति, पर्यटन व डोनर मंत्री, भारत सरकार) ने अतिविशिष्ट अतिथि अश्विनी कुमार चौबे (पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्यमंत्री,भारत सरकार) तथा विशिष्ट अतिथिगण साध्वी प्रज्ञा ठाकुर (सांसद,लोकसभा), स्वामी परिपूर्णानंद, विजय गोयल, श्याम जाजू, प्रोफेसर दिलीप सिंह, प्रोफेसर विनय कुमार, प्रोफेसर प्रदीप कुमार सिंह, डॉ. अमित जैन एवं समारोह अध्यक्ष लक्ष्मीनारायण भाला की गरिमामय उपस्थिति में संपन्न किया।
इस अवसर पर बोलते हुए मुख्य अतिथि जी. किशन रेड्डी ने राम संस्कृति के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार के लिए साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था के कार्यों की प्रशंसा की तथा विश्वास प्रकट किया कि 56 खंडों के महाकोश के प्रकाशन की यह विराट योजना आगे और भी तीव्र गति से विकसित होगी। महाकोश के लोकार्पित प्रथम खंड के बारे में बताते हुए जी. किशन रेड्डी ने कहा की राम भारतवर्ष के आम जन के रोम-रोम में बसे हुए हैं, इसका जीता जागता प्रमाण हमारे सभी प्रान्तों, भाषाओं और समुदायों के लोकगीतों और लोककथाओं में राम कथा के प्रसंगों के गुँथे होने से मिलता है।


समारोह के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय से पधारे भाषाचिंतक प्रो. दिलीप सिंह ने की और संचालन दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के पूर्व प्रोफेसर डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने किया। "रामकथा में सुशासन" विषय पर न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय की प्रोफेसर बिंदेश्वरी अग्रवाल, 'उपमा' केलिफोर्निया की प्रतिनिधि डॉक्टर अलका भटनागर और डॉक्टर हेमप्रभा एवं साठये महाविद्यालय, मुंबई से पधारे प्रोफेसर लोखंडे और डॉ. सतीश कनौजिया सहित विभिन्न विद्वानों ने सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए और प्रोफेसर प्रदीप कुमार सिंह के द्वारा चलाए जा रहे चलाई जा रही 56 खंडों के महाकोश की प्रकाशन योजना का हार्दिक स्वागत किया। उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री डॉ. श्याम सिंह शशि ने विस्तार से देश विदेश की रामकथाओं में उपलब्ध रामराज्य के विवेचन के आधार पर प्रजा के राज्य को सुशासन का श्रेष्ठ रूप सिद्ध किया। आरंभ में अंतरराष्ट्रीय पाक्षिक पत्रिका 'चाणक्य वार्ता' के संपादक डॉ. अमित जैन ने अतिथियों का स्वागत सत्कार किया।

कार्यक्रम के दूसरे चरण में डॉ. विनोद बब्बर, डॉ रंजय कुमार सिंह, डॉ. नारायण, डॉ. शीरीन कुरेशी तथा डॉ.आशा ओझा तिवारी ने रामराज्य और सुशासन के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला। इस सत्र की अध्यक्षता हंसराज कॉलेज, नई दिल्ली की प्रधानाचार्य प्रोफेसर रमा ने की और संचालन डॉ. भावना शुक्ल ने किया।


समापन सत्र में मुख्य अतिथि साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और अति विशिष्ट अतिथि अश्विनी कुमार चौबे के हाथों देश- विदेश के हिंदी सेवियों और राम संस्कृति के पोषक सहयोगियों का सम्मान किया गया तथा प्रो. ऋषभदेव शर्मा सहित कई विशिष्ट विद्वानों को "विश्व राम संस्कृति सम्मान" से अलंकृत किया गया। अवसर पर छत्तीसगढ़ से रामकथा की मंचीय प्रस्तुति के लिए पधारे लोक कलाकारों का भी 'चाणक्य वार्ता' और साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था की ओर से अभिनंदन किया गया। सम्मान सत्र का संचालन प्रो. माला मिश्रा ने किया।

रविवार, 5 सितंबर 2021

साहित्यिक पत्रिका 'स्रवंति' का पावस विशेषांक लोकार्पित



हैदराबाद, 5 सितंबर, 2021।


यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा (आंध्र एवं तेलंगाना) के खैरताबाद स्थित परिसर में पधारे केंद्रीय हिंदी निदेशालय के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. राकेश कुमार शर्मा ने सभा द्वारा प्रकाशित साहित्यिक मासिक पत्रिका 'स्रवंति' के 'पावस विशेषांक-2' का लोकार्पण किया। उन्होंने लोकार्पित पत्रिका की शोधपरक दृष्टि की प्रशंसा करते हुए संस्कृत और हिंदी सहित्य में पावस ऋतु के वर्णन की परंपरा पर भी प्रकाश डाला। 


समारोह के अध्यक्ष एवं सभा के सचिव एस. श्रीधर ने कहा कि पावस ऋतु पर केंद्रित अपने दो विशेषांकों के माध्यम से पत्रिका ने साहित्य और मीडिया में वर्षा के विबिध रूपों पर शोधपरक सामग्री प्रकाशित की है। 


अवसर पर ए. जानकी, प्रो. संजय ल मादार, डॉ. बिष्णु राय और डॉ. गोरखनाथ तिवारी भी उपस्थित रहे। पत्रिका की सहसंपादक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने विशेषांक का परिचय देने के अलावा सबका धन्यवाद व्यक्त किया।

मंगलवार, 10 मार्च 2020

(तकनीकी संगोष्ठी) रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण और डीआरडीओ

हैदराबाद, 5 मार्च 2020. अनुसंधान केंद्र इमारत (आरसीआई) में रक्षा अनुसंधान एवं विकस संगठन की आठ प्रयोगशालाओं की द्वि दिवसीय अखिल भारतीय संयुक्त तकनीकी संगोष्ठी "रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण और डीआरडीओ " का उद्घाटन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित प्रो.ऋषभदेव शर्मा ने किया। (चित्र सौजन्यः- काज़िम अहमद, हिंदी अधिकारी, आरसीआई)
संगोष्ठी अध्यक्ष अरविंद कुमार पाठक, वैज्ञानिक 'जी' आरसीआई ने मुख्य अतिथि प्रो. ऋषभदेव शर्मा को सम्मान चिह्न समर्पित किया।  

आठों प्रयोगशालाओं के निदेशकों के साथ दीप प्रज्वलन 

मुख्य अतिथि का उद्बोधनः सरल भाषा में वैज्ञानिक साहित्य रचें

 मुख्य अतिथि प्रो.ऋषभदेव शर्मा ने 'रक्षा अनुसंधान राजभाषा पोर्टल' लोकार्पित किया।

 
दीप ज्योति नमोस्तु ते : मुख्य अतिथि ने उद्घाटन-दीप प्रज्वलित किया 

डॉ.अर्चना पांडेय द्वारा संपादित काव्य संकलन "गुलमोहर" का विमोचन 

आयोजक प्रयोगशाला (आरसीआई) को शील्ड प्रदान की गई।

मुख्य अतिथि के हाथों सभी प्रयोगशाला निदेशकों को सम्मान चिह्न प्रदान किए गए।

मुख्य अतिथि का संबोधन : वैज्ञानिक और तकनीकी साहित्य सृजन के लिए हिंदी पूर्णतः समर्थ भाषा 
 :
आरसीआई की हिंदी गृह-पत्रिका 'इमारत' का विमोचन

आरसीआई, एएसएल, डीआरडीएल, डीएलआरएल, डीएमआरएल, अनुराग, चेस हैदराबाद एवं एनएसटीेल विशाखापट्टणम के निदेशकों के साथ मुख्य अतिथि

एक्सपोजिशन हॉल में... 

।। तमसो मा ज्योतिर्गमय ।।

आरंभ से पहले...
-प्रस्तुति: डॉ.बी.बालाजी, 
उप प्रबंधक, 
हिंदी अनुभाग एवं निगम संचार, 
मिश्र धातु निगम लिमिटेड

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

एलूरु में द्विदिवसीय त्रिभाषी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न

हिंदी भारतीय संस्कृति की संवाहक और दिल की भाषा है - को जोंग किम 

साहित्य यथार्थ की आलोचना करता है – ऋषभदेव शर्मा 

एलूरु (आंध्र प्रदेश, 15 दिसंबर)। 


प्रो. ऋषभदेव शर्मा 
साहित्य का मूल प्रयोजन लोक मंगल की साधना है, न कि मनोरंजन। समाज के लिए जो कुछ भी अशुभ और अमंगलकारी हो सकता है साहित्य उस यथार्थ की आलोचना करता है और मंगलकारी आदर्श की स्थापना करता है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं का भक्ति आंदोलन, नवजागरण आंदोलन और स्वतंत्रता आंदोलन के समय का साहित्य पूरी तरह सुधारात्मक दृष्टिकोण से प्रेरित है। इसी प्रकार समकालीन विमर्शों का साहित्य भी कर्मक्षेत्र के सौंदर्य को सामने लाते हुए सामाजिक परिवर्तन के लिए दिशा प्रदान कर सकता है।"

ये विचार सर सी.आर. रेड्डी (स्वायत्त) महाविद्यालय में आयोजित संस्कृत, तेलुगु और हिंदी के द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के हिंदी केंद्रित विचार-विमर्श के बीज भाषण के दौरान दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के पूर्व आचार्य डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने प्रकट किए। उन्होंने हर्ष व्यक्त किया कि भयंकर मूल्य विघटन और उपभोक्ता संस्कृति से ग्रसित वर्तमान परिस्थितियों में इस प्रकार एक सार्थक सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। उन्होंने कहा कि एक ठेठ तेलुगु प्रदेश में इतने बड़े पैमाने पर हिंदी में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन होना अपूर्व है। 

आंध्र प्रदेश के पूर्व सांसद और
फिल्म विकास निगम के अध्यक्ष अंबिका कृष्ण
भाषा और संस्कृति विभाग, आंध्र प्रदेश सरकार के सहयोग से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रायोजित तथा हिंदी, तेलुगु व संस्कृत विभागों के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में समाज पर भाषा एवं साहित्य के प्रभाव को लेकर कई महत्वपूर्ण चर्चाओं को स्थान मिला। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, पांडिच्चेरी आदि राज्यों के साथ-साथ अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, कोरिया और जापान से आए विद्वानों, हिंदी सेवियों और छात्रों ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर इस सम्मेलन को सफल बनाया। 

दक्षिण कोरिया से पधारे हिंदी लेखक और आलोचक डॉ. को जोंग किम ने कहा कि दक्षिण कोरिया और भारत के बीच बहुत प्राचीनकाल से अच्छे रिश्ते रहे हैं। उन्होंने हिंदी को भारतीय संस्कृति की संवाहक बताते हुए उसे ‘दिल की भाषा’ कहा। 

आंध्र प्रदेश के पूर्व सांसद और फिल्म विकास निगम के अध्यक्ष अंबिका कृष्ण ने अपने संबोधन में तेलुगु भाषा और साहित्य को संरक्षित करने की बता कही तथा उसके आंदोलनात्मक और सुधारवादी चरित्र पर प्रकाश डाला। 

प्रो.एस.वी.एस.एस.नारायण राजु 
हिंदी साहित्य संबंधी विचार सत्रों में समाज और भाषा के संबंध में आंध्र विश्वविद्यालय के प्रो. एन. सत्यनारायण, सैंट जोसेफ महिला महाविद्यालय की डॉ. पी.के.जयलक्ष्मी, नरसापुर के डॉ. कुमार नागेश्वर राव, तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. एस.वी.एस.एस.नारायण राजु, कांचीपुरम विश्वविद्यालय के डॉ. दंडिबोट्ला नागेश्वर राव, नागार्जुन विश्वविद्यालय के डॉ. काकानि कृष्ण, मानु के डॉ. डी. शेषुबाबु, काकिनाडा के डॉ. पी. हरिराम प्रसाद तथा हैदराबाद की डॉ. पूर्णिमा शर्मा सहित अनेक विद्वानों और शोधार्थियों ने शोधपत्र प्रस्तुत किए। 

सर सी.आर.रेड्डी शैक्षिक संस्थाओं के अध्यक्ष श्री कोम्मारेड्डि राम बाबू, महाविद्यालय के कॉरस्पॉन्डन्ट एवं अन्य पदाधिकारियों ने समारोह में भाषा के महत्व पर अपनी राय जताई। समापन समारोह में प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने तेलुगु में भाषण देकर श्रोताओं को अभिभूत कर दिया।


सर सी.आर. रेड्डी (स्वायत्त) महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ.आर.एन.वी.एस.राजाराव और प्राध्यापक के.शैलजा ने अतिथियों का स्वागत और धन्यवाद किया। साथ ही सम्मेलन के दौरान ही शोधपत्रों का संग्रह प्रकाशित करके अपनी कार्य-दीक्षा और लगन का परिचय दिया। 








प्रस्तुति 
डॉ. आर.एन.वी.एस. राजाराव 
सहायक आचार्य 
हिंदी विभाग, सर सी.आर. रेड्डी (स्वायत्त) महाविद्यालय
एलुरु, आंध्र प्रदेश - 5347007
....
यहाँ भी....
http://hindimedia.in/hindi-is-the-language-of-indian-culture-and-heart-language-to-jong-kim/

http://www.hindikunj.com/2018/12/hindi-sammelan.html