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रविवार, 5 सितंबर 2021

साहित्यिक पत्रिका 'स्रवंति' का पावस विशेषांक लोकार्पित



हैदराबाद, 5 सितंबर, 2021।


यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा (आंध्र एवं तेलंगाना) के खैरताबाद स्थित परिसर में पधारे केंद्रीय हिंदी निदेशालय के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. राकेश कुमार शर्मा ने सभा द्वारा प्रकाशित साहित्यिक मासिक पत्रिका 'स्रवंति' के 'पावस विशेषांक-2' का लोकार्पण किया। उन्होंने लोकार्पित पत्रिका की शोधपरक दृष्टि की प्रशंसा करते हुए संस्कृत और हिंदी सहित्य में पावस ऋतु के वर्णन की परंपरा पर भी प्रकाश डाला। 


समारोह के अध्यक्ष एवं सभा के सचिव एस. श्रीधर ने कहा कि पावस ऋतु पर केंद्रित अपने दो विशेषांकों के माध्यम से पत्रिका ने साहित्य और मीडिया में वर्षा के विबिध रूपों पर शोधपरक सामग्री प्रकाशित की है। 


अवसर पर ए. जानकी, प्रो. संजय ल मादार, डॉ. बिष्णु राय और डॉ. गोरखनाथ तिवारी भी उपस्थित रहे। पत्रिका की सहसंपादक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने विशेषांक का परिचय देने के अलावा सबका धन्यवाद व्यक्त किया।

रविवार, 2 मई 2021

'बस एक ही इच्छा' का संदर्भ : गोपाल शर्मा







आलेख

‘बस एक ही इच्छा’ का संदर्भ

- गोपाल शर्मा

(देश की प्रसिद्ध संस्था ‘स्याही ब्लू’ की रविवारीय पुस्तक वार्ता के पार्ट -5 में दिनांक 14 मार्च 2021 को डॉ निशंक के प्रारम्भिक कहानी संग्रह ‘बस एक ही इच्छा’ पर देश के कई विद्वान समीक्षकों ने चर्चा की। इस वार्ता शृंखला में प्रति-सप्ताह डॉ निशंक के रचना संसार से एक पुस्तक लेकर उस पर केन्द्रित चर्चा होती है। यू ट्यूब से इसे सुनकर डॉ गोपाल शर्मा के वक्तव्य का पाठ डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने लिपिबद्ध किया है।– संपादक)

“जो उसको जानता है, उसके लिए वह अज्ञात है । जो उसको नहीं जानता उसके लिए वह ज्ञात है- केन उपनिषद का ब्रहम के लिए कहा गया यह कथन डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ पर मेरे लिए सौलह आने सही बैठता है। निशंक जी ने कुछ सोचकर ही अपना उपनाम ‘निशंक’ रखा हो । दरअसल उनको जानने वाले देश के करोड़ों लोग उन्हें राजनेता के रूप में जानते हैं, पर उन्हें कवि-साहित्यकार के रूप में जानने वाले अभी उतनी बड़ी संख्या में नहीं हैं। मैं उन्हें व्यक्ति के रूप में नहीं जानता, न मैं राजनेता के रूप में ही उनसे परिचित हूँ। पर उनको उनकी रचनाओं से अब पहचानने लगा हूँ। मेरा डॉ. निशंक व्यक्ति से कोई साक्षात परिचय नहीं है, पर मैं उनके साहित्यिक व्यक्तित्व से उसी प्रकार परिचित हूँ जैसा परिचय हंस राज रहबर का प्रेमचंद से रहा होगा। उन्हें दूर से देखा जरूर है और यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि डॉ. निशंक ज़्यादातर पुराने हिंदी लेखकों की तरह दीन हीन नहीं एक दम कुलीन और भद्र दिखाई देते हैं।

साहित्यकार के रूप में निशंक के दो रूप हैं । एक तो कवि रूप ही है जहाँ कविता और निज देश एकाकार हो गए हैं। दूसरी ओर कथाकार निशंक हैं और इस रूप में वे अपने 'परिवेश के कथाकार' हैं। वे "जादुई यथार्थ" के स्थान पर "जमीनी यथार्थ" के पुरस्कर्ता हैं। यदि केवल दस मिनट में निशंक जी केप्रारंभिक कहानी संग्रह “बस एक ही इच्छा” की कहानियों पर चर्चा की जाए तो सबसे पहले यह कहना होगा कि यहाँ प्रस्तुत दर्जन भर कहानियाँ, कहानियाँ कम आप-बीती अधिक हैं। इन कहानियों में कथाकार के रूप में निशंक जी की उपस्थिति तो है ही, वे कई कहानियों में एक पात्र के रूप में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

किसी ने ठीक ही कहा था – We are just stories in the end. Just make it a good one. शेक्सपियर तो जीवन को ही किसी मूर्ख के द्वारा कही गई कहानी कह डालता है। कहानियाँ सर्वत्र हैं। हम ही कहानियाँ नहीं कहते, कहानियाँ भी हमें कहतीं हैं। यदि कहानियाँ सर्वत्र हैं तो हम भी इन कहानियों में सर्वत्र हैं। कहानी एक नहीं होती, कहानियाँ होती हैं। एक वह जो कहानीकार लिख कर हमें देता है और दूसरी वह जो उसने देखी होती है, सुनी होती है या स्वयं भोगी होती है।

अब एक कहानी को लें। “ बस एक ही इच्छा” कहानी में कहानी तो बस इतनी ही है कि होटल में काम करने वाला वेटर लड़का “मैं” को अपना दुख दर्द सुना देता है। वह ऐसा इसलिए करता है क्योंकि वह ‘मैं’ के साथ उसके उपनाम “पोखरियाल” के कारण ‘पहाड़ी’ होने से बादरायण संबंध मान लेता है। ‘मैं’ इस कहानी को इसलिए लिखता है क्योंकि वह इस संघर्षशील लड़के के आत्मविश्वास से प्रभावित होता है – बाबूजी, मेरी तो बस एक ही इच्छा है कि चाहे मैं जिस हाल में भी रहूँ किंतु अपने भाइयों को खूब पढ़ाऊँगा। इतना पढ़ाऊँगा कि वे एक दिन बहुत बड़े साहब बन जाएँ। हर कहानी में कोई न कोई इच्छा है जिसका कोई न पात्र किसी न किसी इच्छा प्राप्ति के लिए कर्मरत है। विक्रम जैसे पात्र आपको अपने इर्दगिर्द मिल जाएँगे । स्वार्थ का परमार्थ में परिवर्तन हो जाना इन पात्रों की विशेषता है।

मासूम चेहरा जो इस कथा का नायक है वह अब पाठक के स्मृति पटल पर ज्यों का त्यों अंकित हो जाता है। "उसने कहा था" के रचनाकार को तो जीवन में केवल तीन चार कहानियाँ लिखनी थीं इसलिए पहली कहानी में ही वे सब कुछ बाँच गए। "ग्यारह वर्ष का समय" लिखकर रामचंद्र शुक्ल इस राह से किनारा कर गए। पर युवक रमेश पोखरियाल ने "निशंक" बनकर संख्या की दृष्टि से प्रेमचंद के समकक्ष आ जाने का यत्न किया। दूसरी कहानी ‘मैं ओर तुम’ में ‘मैं’ का एक नाम है – शशांक । और तुम का नाम है –दीप्ति । शशांक दहेज रहित विवाह करना चाहता है। पर उसके भाई भाभी ही नहीं दीप्ति और उसके परिवार वाले भी मानते हैं कि "दहेज न देकर अपने आप को अपने रिश्तेदारों व समाज के बीच अपमानित महसूस कराना घाटे का सौदा होगा।" किसी को भी यह मंजूर नहीं। कथित आदर्शवादियों के बीच आदर्शवादी कथानायक अपनी दुर्गति पर खिन्न है और मेरे जैसा कुलीन पाठक सोचता है – मैंने अपनी शादी के समय चुप रहकर एक तरह से अच्छा ही किया। पहाड़ का यह आम व्यक्ति कैसे उदात्त व्यक्तित्व बन जाता है, अद्भुत है।

तीसरी कहानी है ‘कितना संघर्ष और’। इस कहानी में कथानायक है – रमेश । वह श्वेता नामक संघर्षशील लड़की की कहानी सुनाता है। पर मैं चौथी कहानी “संकल्प” पर बात करके अपनी बात समाप्त करना चाहूँगा । इस कहानी में “मैं” का नाम “निशीथ” है और यहाँ तब के उभरते युवा कथाकार और शिक्षक रमेश पोखरियाल इस कहानी के द्वारा अपनी बनती और बदलती मनस्थिति का आभास देते हैं। आम व्यक्ति के हितों की बात करना, शोषितों के लिए जूझना उसे अच्छा लगने लगा था। समाज में फैली अराजकता, अव्यवस्था और दुराचार के खिलाफ उसके मन में भारी आक्रोश पैदा होता है। और फिर उसे वह मार्ग दिखाई देता है जिसे वह सहर्ष अपना लेता है । वह अपनी जन्मदात्री माता को अपना संकल्प प्रेषित कर देता है । वह अपना सम्पूर्ण जीवन मातृभूमि को सौंपने का संकल्प करते हुए एक श्लोक पढ़ता है –

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम् ।
महामंगले पुण्यभूमे त्वदर्थे पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ॥

(हे प्यार करने वाली मातृभूमि! मैं तुझे सदा (सदैव) नमस्कार करता हूँ। तूने मेरा सुख से पालन-पोषण किया है। हे महामंगलमयी पुण्यभूमि! तेरे ही कार्य में मेरा यह शरीर अर्पण हो। मैं तुझे बारम्बार नमस्कार करता हूँ।)

दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं – एक तो कथाकार कवि-हृदय है और दूसरे संवेदना के धरातल पर वह इतना आंदोलित है कि अभिव्यक्ति के लिए छटपटाहट अनुभव करता है इसलिए भाषाई उछलकूद के स्थान पर सहजता को शैली बनाने का प्रयत्न करता है। शिक्षक से शिक्षामंत्री तक के इस सफर में यह लेखकीय “संकल्प” रेखांकित किया जा सकता है , किया जाना चाहिए। आज इस कहानी को पढ़ना इस संकल्प को आत्मार्पित करना भी तो है। इसलिए यह रचना इन अर्थों में कालजयी कही जा सकती है। अब मैं और किसी कहानी का जिक्र न करके यह कहकर अपनी बात समाप्त करूंगा कि इस संग्रह की सब कहानियाँ उस समय की हैं जब कथाकार ने लिखना शुरू भर किया था। वह लगभग सभी कहानियों में “मैं” बनकर उपस्थित है।

कई बार भाषा-प्रयोग में "मूकता” जैसे शब्द चौंका देते हैं। वह किसी शायर या कवि को उद्धृत भी करता है तो अपनी तरह से और स्मृति के आधार पर । एक आलोचक ने विश्व-विख्यात कथाकार जेन ऑस्टिन की प्रारम्भिक रचनाओं को "ओपिन, अम्यूज्ड, ईज़ी इंटेलेक्चुयल" का लेखन कहा था। मैं भी इन प्रारम्भिक कथाओं "बस एक ही इच्छा और अन्य कहानियाँ" के रचनाकार को इसी तर्ज़ पर “सहज-पारिवारिक, देशानुरागी-चिंतक” कहने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। आप शेष कहानियों को पढ़कर मेरे इस कथन की परीक्षा स्वयं करेंगे , यह मैं जानता हूँ। धन्यवाद।

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अंग्रेजी प्रोफेसर, अरबा मींच विश्वविद्यालय, इथियोपिया # आवास – 6-3-120/23, एनपीए कालोनी, शिवरामपल्ली, हैदराबाद – 500 052

प्रेमचंद्र जैन की कविताएँ













मध्यांतर

प्रेमचंद्र जैन की कविताएँ


फासला

आत्मा-आर्मात्मा

है एक ही

बीच दोनों के बहुत कम फासला है

फासला उतना कि जितना

आदमी से और उसकी छाँव से ही

या समझ लो यों कि –

जितना चंद्रमा और ज्योत्सना में

या कहो उतना कि जितना

इक नदी के पार से उस पार में है

ज्ञान-दर्शन-चरित बाल की नाव से

फासला यदि दूर हो जाए

तभी

हर आत्मा, बहिरात्मा, परमात्मा है।

 

अवचेतन मन

चाँदनी रात में भी

उमस जैसी प्यास है

ताप-संताप –

विरह-विदग्ध भी नहीं हूँ मैं

हर इंसान

अपने मन की बात जानता है

अनजाने, अनचाहे में ही

मन बहुत उदास है

समाधान नहीं होता – तो

सोचते-सोचते

खीझ उठता हूँ अपने पर ही

नींद लेने का होता विफल प्रयास है

प्यास बराबर बढ़ती है

प्रत्यक्ष नहीं कारण कुछ

तो क्या माँ लूँ?

अवचेतन मन का यह –

शाप है।
 

मैं चलता हूँ एक अकेला

प्रदत्त

सम्मानित मनुज से –

डायरी के पृष्ठ खाली

भर रहे मन को

अतुल आमोद से।

मैं अकिंचन

कर सकूँ उपयोग – इनका

सत्य से

तथ्य से और

दिल के दर्द से इनको भरूँ

अभाव से सद्भाव के ये पृष्ठ पूरे हों

नमन करता हूँ तुम्हें

विश्राम दो।



एक और अवधारणा

पूरा किया

एक और अध्याय

जिसका था उसको सौंपकर

चेहरे के बाल धुलवाए

हँसे –

दूसरों की हंसी

पेट भरकर मिल गई

खो गए लेकर किसी की नींद : आधी रात खासे

तुम नहीं आए –

अच्छा किया

दूसरा बिस्तर नहीं था


इष्ट फल

जागते-सोते

सदा ‘शिव’ हो

तुम्हारा और –

सबका

साध्य –

साधन –

इष्ट फल।


ध्रुव पौरुष

‘अज्ञेय' व्यक्तित्व

ध्रुव पौरुष

वेदना-तप्त

यातना-पूत

दृष्टा

युग-निर्माता

‘अज्ञेय’ को

जानने के लिए –

जिज्ञासा;

खोजना पड़ेगा


वह धरातल पर नहीं

‘तल’ में मिलता है।

 
नौकरी


नौकरी की है

मालिक की दया पर –

जो काम लिया

अनथक किया

मालिक का काम

माह के अंत में

मांगने पर दाम –

मिल गए तो खुश

नहीं तो उदास

बीवी के पास

खाने का घास
 

जनतंत्र

नारा समाजवाद का

दूध : गए-बछेड़े का

वोट हिंदुस्तानी का

नहीं पड़ा जहाँ पड़ना था

और ..

वही हुआ जो होना था

जातिवाद, भाई-भतीजावाद

खंड-खंड बिखर गए

समय की करवट से

फिर पिसेगी जनता

सुबह तक नई कांग्रेस और बढ़ेगी सर्वत्र

जीत-हार, हार-जीत का जनतंत्र।
 

रे कलियुग के देव

रे कलियुग के देव!

तुम्हारा काम भेंट पाने का

मानवता की बलि लेना

पर-छीन स्वयं खाने का

मनु ने भी आँसू पोंछे

जब दी गई मानवता

पर देवोचित्त प्रतिभा से

कब झुकी नहीं दानवता

साहित्यिक बन गए तो छोड़ो –

नोक-झोंक की आदत

लाओ तलवार कलम की

हो चोट, बचो भी साफ

कितने तांडव हो चुके

प्रलय के कितने झोंके आए

कुछ ही खुशहालों ने मिल –

बेहद बेहाल बनाए

हम मनु की हैं संतान

सृजन से करते हैं कल्याण

बढ़ेगा या जो नहीं रुका है

इतिहास कहे –

संहार सृजन के आगे सदा झुका है।

मरी स्मृति का पटल

आज है कुंद

न लेता साँस

वाष्प से गला हुआ वरुद्ध

मौत की छाया लहराई

कल का साहस का विश्वास

मौन सब करते हैं उपहास

यह है जग देखी रीति

शक्ति के मीत सभी भाई

न धन की शक्ति

कर्म की –

मन की शक्ति है

इसी पर सोता-खाता हूँ

इसी को रोज बजाता हूँ


मुझे पर्वत की इच्छा नहीं

यह बस शेष रहे राई।
 

प्रेम

सारीरिक संबंधों के रिश्ते

टूट ही जाते हैं – एक दिन

भावनाओं से जुड़ा प्रेम

अटूट होता है

लेकिन –

यह तुम्हें दर्शन की बात लगती है

क्योंकि

तुम्हारे मिकत भावना निर्मूल है

यह मेरा नसीब है

जिसे बदलना असंभव जैसा है

व्यर्थ की मृगतृष्णा है

चूँकि मैं जिस मिट्टी से बना हूँ –

वह रेतीली कतई नहीं है

अपने स्तर को गिराने का अहसास

अब कई बार हो चुका है

होता ही रहता है – और

आज तो प्रतिक्षण-प्रतिपाल हो रहा है

क्या मैं अपने को क्षणा कर लूँ

अथवा

आत्मदाह!
 

मैं आदमी हूँ

मैं आदमी हूँ

खाने के लिए जीता हूँ

जीने के लिए खाता हूँ

कौन जाने?

एक साथ कितने जीवन जीता हूँ

सुनाने के लिए –

नहीं कह पाऊँगा अपनी बात

नौकरी करता हूँ

ऑफिस के नाम से नहीं

घर के नाम से डरता हूँ

मरने को है नौकरी

या

नौकरी के लिए मारना है

कौन जाने – एक साथ

इसीलिए कहता हूँ –

इन जानवर हूँ –

खटता हूँ

टेबलेट सुलाती है

चक्की जगाती है

भूख चलाती है

आबकी अपनी –

अपनी कहानी है।

 

अहसास

दूसरों की व्यथा के अहसास से -

निज मन का व्यथित हो जाना

अहेतुक द्वित होना भी;

शोषक की व्यथा भिन्न है और विकट भी;

इसी विकटता का, दो टूक उत्तर –

साहित्यकार का दायित्व है!


नियति

शिशु के मन सम मन मेरा

मुकरवत् हृद है

वज़्रांगलोह सम देह

कुटिलता कम है

सब कुछ झिलमिल हो जाता

दीपक लौ जब जलती है

पर अंधकार का मोह

पुनः डस लेता

यह और नहीं कुछ मित्र!

मात्र नियति है।

शनिवार, 24 सितंबर 2016

[स्रवंति] बदलती चुनौतियाँ और हिंदी की आवश्यकता : प्रो. ऋषभदेव शर्मा


 "बदली हुई परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ और ‘राजभाषा’ जैसी नारेबाजी से दूर रखकर, ‘भाषा’ के रूप में प्रचारित-प्रसारित किए जाने की जरूरत है – जिसे मनुष्य सूचनाओं के आदान-प्रदान, जिज्ञासाओं की शांति, आत्मा की अभिव्यक्ति और संप्रेषण की सिद्धि के निमित्त सीखा करते हैं। भावुकता और बाध्यता दोनों ही अतियाँ हैं। भाषा मनुष्य की सहज आवश्यकता के रूप में सीखी जाती है। हम इस सहज आवश्यकता का अनुभव करें-कराएँ, तो हिंदी भी सहजता से पढ़ी-पढ़ाई, सीखी-सिखाई जा सकती है। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों से लेकर स्वैच्छिक हिंदी प्रचार संस्थाओं तक को चाहिए कि वे अपने घिसेपिटे रवैये को बदलें और हिंदी को अधुनातन ज्ञान की व्यावहारिक भाषा के रूप में प्रचारित-प्रसारित करें।"