मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

(डॉ. रक्षा मेहता का आलेख) विसंगति और विडंबना के विलक्षण चितेरे - श्रीलाल शुक्ल



जन्मशती पर विशेष आलेख :
विसंगति और विडंबना के विलक्षण चितेरे 
श्रीलाल शुक्ल

'श्रीलाल शुक्ल' और' व्यंग्य' मानो एक-दूसरे के पर्याय हों। जिस प्रकार सुगंध बिना पुष्प व्यर्थ है, चमक बिना मोती व्यर्थ है, चाँदनी बिना चाँद व्यर्थ है, ठीक उसी प्रकार 'श्रीलाल शुक्ल' के बिना साहित्य संसार में व्यंग्य व्यर्थ है, अस्तित्वहीन है, निरर्थक है, बेमानी है। कोई भी साहित्य-प्रेमी 'शुक्लजी' की रचनाओं के बिना व्यंग्य की कल्पना भी नहीं कर सकता।

31 दिसंबर, 1925 को जन्मे श्रीलाल शुक्ल समकालीन कथा साहित्य में सशक्त, सटीक व अत्यंत प्रभावशाली व्यंग्य लेखन के लिए सुविख्यात साहित्यकार हैं। ‘विसंगति' तथा ‘विडंबना' प्रत्येक साहित्यकार, कला-मर्मज्ञ‍ तथा दार्शनिक को विचलित करती हैं तथा प्रत्येक काल में अनेकानेक बुद्धिजीवियों ने राजनीति, समाज तथा धर्म में व्याप्त विसंगतियों तथा विडंबनाओं के प्रति अपने-अपने ढंग से चिंता जताई है और क्रोध व आक्रोश व्यक्त किया है, किंतु विसंगति तथा विडंबना को देखने, समझने तथा अनुभूत करने का 'शुक्ल' जी का अंदाज़ सभी से विलक्षण है। यही कारण है कि हम सब उन्हें 'विसंगति और विडंबना के विलक्षण चितेरे' मानते हैं।

'शुक्ल' जी का नाम आते ही मनस पटल पर सबसे पहले जो रचना अपने रंग बिखेर देती है, वह है - राग दरबारी। शायद ही ऐसा कोई साहित्य-प्रेमी होगा, जिसने 'राग दरबारी' न सुना-पढ़ा हो। इस उपन्यास का नाम लेते ही हम सब ‘शिवपालगंज’ पहुँच जाते हैं। जहाँ भ्रष्टाचार रूपी राक्षस न केवल मनुष्य को दबोचे बैठा है अपितु समस्त राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक व आर्थिक व्यवस्था के साथ-साथ समूचे शिक्षा-तंत्र को निगलने के लिए तैयार है। दुनियाभर की गंदगी तथा धूल-धक्कड़ से पटे पड़े शिवपाल गंज की मिठाइयों का वर्णन अत्यंत व्यंग्यात्मक ढंग से करते हुए शुक्ल जी लिखते हैं-

"वे हमारे देसी कारीगरों के हस्तकौशल और उनकी वैज्ञानिक दक्षता का सबूत देती थीं। वे बताती थीं, कि हमें एक अच्छा रेज़र-ब्लेड बनाने का नुस्खा भले ही न मालूम हो, पर कूड़े को स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों में बदल देने की तरकीब सारी दुनिया में अकेले हमीं को आती है।"

ऐसा करारा व्यंग्य, जो पाठक को जहाँ एक ओर गुदगुदा देता है, वहीं दूसरी ओर यह सोचने पर भी बाध्य करता है कि हमारे देश के पिछड़े गाँव, जो मिठाइयों के नाम पर ज़हर खा कर अपनी खुशियाँ मना रहे हैं, उन्हें स्वस्थ जीवन जीने का अधिकार आखिर कैसे प्राप्त होगा? प्रशासन की विडंबना का पर्दाफ़ाश करने के लिए शुक्ल जी का केवल एक वाक्य ही पर्याप्त है-

"स्टेशन वैगन से एक अफ़सरनुमा चपरासी और चपरासीनुमा अफ़सर उतरे।"

व्यंग्यात्मकता का यह चरमोत्कर्ष हम सबको अवाक् कर देता है।

समूची शिक्षा प्रणाली की दुर्गति की अभिव्यक्ति केवल इस एक वाक्य में सहज ही हो जाती है-

"वर्तमान शिक्षा पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है, जिसे कोई भी लात मार सकता है।"

आम जनता का नेतृत्व करने वाले नेता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सभी को एक दृष्टि से देखे। 'राग दरबारी' के रुप्पन बाबू भी सभी को एक निगाह से देखते थे। थाने में दारोगा और हवालात में बैठा हुआ चोर,  दोनों उनकी निगाह में एक थे। उसी तरह इम्तहान में नकल करने वाला विद्यार्थी और कॉलेज के प्रिंसीपल उनकी निगाह में एक थे।

राजनीति तथा समाज में व्याप्त ऐसी विसंगति, विडंबना तथा कुरूपता को इतने विलक्षण अंदाज में प्रस्तुत करने का कौशल 'शुक्ल जी' के अलावा भला और किस व्यंग्यकार में हो सकता है? राजनीतिक तथा सामाजिक व्यवस्था पर तीखा व करारा व्यंग्य करता हुआ उनका उपन्यास ‘बिस्रामपुर  का संत’, मानवीय विसंगतियों, कुंठाओं व चरमराती सामाजिक व्यवस्था पर आधारित उपन्यास 'आदमी का ज़हर', शहरी जीवन के प्रति ललक, संघर्ष तथा मानवीय मूल्यों की गिरावट पर आधारित उपन्यास 'मकान', सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन के अंतर्द्वंद्व पर आधारित उपन्यास 'अज्ञातवास' शुक्ल की बेजोड़ साहित्यिक कृतियाँ हैं।

उनकी कुछ सुप्रसिद्ध कहानियाँ हैं- इस उम्र में, इतिहास का अंत, अपनी पहचान, चंद अखबारी घटनाएँ, तथा एक चोर की कहानी। 'एक चोर की कहानी’ बाल कहानी है और उसमें भी समाज व प्रशासन की विसंगतियों  तथा विडंबनाओं को इतनी विलक्षणता से चित्रित किया गया है कि इस कहानी को पढ़कर एक छोटा, किंतु संवेदनशील बालक भी देश की व्यवस्था की कमियों को बड़ी सरलता व गहराई से समझ सकता है। एक बेचारा गूँगा चोर जो केवल थोड़े से चने और एक पीतल का लोटा गठरी में बाँधे गन्ने के खेतों में छिप रहा था, गाँव वालों द्वारा पकड़े जाने पर पुलिस के हवाले कर दिया जाता है, जो पहले ही छह महीने की जेल काट चुका था और अब एक साल के लिए अंदर कर दिया जाता है। वह ऐसे निरीह व कमज़ोर वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जो अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। जिस देश में बड़े-बड़े पदों पर आसीन प्रशासक, जनता की खून-पसीने की कमाई, दूसरों के अधिकार का पैसा और भोली-भाली जनता के स्वप्नों तक को निगल जाते हैं और डकार तक नहीं लेते, उस देश का गरीब यदि अपने भूखे-तड़पते पेट के लिए रोटी का एक निवाला भी उठा ले तो उसे 'चोर’ की उपाधि से नवाज़ा जाता है। यह है घोर अन्याय के पालने में झूलता हमारा प्रजातंत्र, जिसे एक ओर से विसंगति धकेल रही है, तो दूसरी ओर से विडंबना। स्थिरता के कोई आसार नज़र नहीं आते और दिशाहीनता की इसी नब्ज़ को अपनी रचनाओं में बखूबी पकड़ा है, श्रीलाल शुक्ल ने ।

उपन्यासों तथा कहानियों के अतिरिक्त शुक्लजी के अनेक निबंध-संग्रह भी हैं, जैसे- सामाजिक व राजनीतिक विडंबनाओं पर आधारित ‘अंगद का पाँव', समकालीन समाज पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ करता निबंध-संग्रह 'कुछ ज़मीन पर, कुछ हवा में', मीडिया तथा समाचारों की अतिशयोक्ति व झूठ में लिपटी दुनिया पर आधारित 'ख़बरों की जुगाली' आदि।

'अंगद का पाँव’ रचना का शीर्षक तक अत्यंत सशक्त, सार्थक व सटीक है। इसमें रेल के इंजन की सीटी कई बार बजती है, लेकिन रेल टस से मस नहीं होती। मित्र को स्टेशन पर छोड़ने आए परिजन इधर-उधर बुकस्टाल्स  पर बिकते अखबार पलटने लगते हैं, नाना विषयों पर बातचीत करते हैं, भारतीय संस्कृति पर व्यंग्य तक कस डालते हैं; किंतु, रेलगाड़ी 'अंगद के पाँव' की तरह वहीं डटी रहती है, न उसे समय रूपी मेघनाद हिला पाता है और न ही जनता रूपी रावण-सेना। क्योंकि हमारा प्रशासन ऐसे 'अंगद' को जन्म देता है, जिसका पाँव हिला पाना किसी के बस की बात नहीं। रवींद्र कालिया, जिन्हें श्रीलाल शुक्ल का सान्निध्य प्राप्त हुआ, के अनुसार शुक्ल जी में मुक्त कंठ से प्रशंसा करने की जितनी उदारता थी, उससे कहीं अधिक फटकारने की भी। यही कारण है कि प्रशासन तंत्र का हिस्सा होने के बावजूद वे कभी भी प्रशासन का कच्चा चिट्ठा खोलने से नहीं चूके। उनके व्यंग्य ने भ्रष्टाचारी व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ा दीं। 

श्रीलाल शुक्ल का नाम हिंदी के शीर्षस्थ व्यंग्यकारों की श्रेणी में है। वे अपनी तरह के अनूठे व्यंग्यकार हैं, जिनका पूरे हिंदी-साहित्य में कोई सानी नहीं। उनकी रचनाएँ जहाँ एक ओर हमें बार-बार उन्हें पढ़ते रहने के लिए बाध्य करती हैं, वहीं दूसरी ओर समाज तथा व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों व विडंबनाओं के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित भी करती हैं। कालजयी कृतियों के रचनाकार ‘श्रीलाल शुक्ल’ को कोटि-कोटि नमन। 

- डॉ. रक्षा मेहता
हिंदी विभागाध्यक्षा, 
आर्मी पब्लिक स्कूल, गोलकोंडा, हैदराबाद 


मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

रवि वैद का बाल उपन्यास 'जादूगर' लोकार्पित















हैदराबाद के उपन्यासकार, कथाकार एवं कवि रवि वैद के बाल-उपन्यास ‘जादूगर’ का लोकार्पण कार्यक्रम पायनियर इंस्टीट्यूट ऑफ़ होटल मैनेजमेंट में संपन्न हुआ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के पूर्व आचार्य डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने की। विवेकवर्धिनी महाविद्यालय  की पूर्व प्राचार्य  डॉ. रेखा शर्मा मुख्य अतिथि रहीं, और मुख्य वक्तव्य अलीना खल्गाथ्यान (आर्मेनिय्या)  ने दिया।  

प्रवीण प्रणव ने 'जादूगर' की सांगोपांग समीक्षा कर इसे 'रामचरित मानस' के कई प्रसंगों के साथ जोड़ा। डॉ. आशा मिश्रा मुक्ता, एफ.एम. सलीम और  उड़ीसा स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी (संबलपुर, उड़ीसा)  से पधारे डॉ. जितेंद्र मौर्य ने लोकार्पित पुस्तक के कथ्य और शिल्प पर विचार व्यक्त किए। डॉ. मंजु शर्मा और डॉ.  रक्षा मेहता ने अपनी टिप्पणी सहित रोचक अंशों का वाचन किया। चिरेक इंटरनेशनल स्कूल के कक्षा 11 के छात्रों अनिका दुग्गर और देव अग्रवाल की सधी पाठकीय समीक्षा और जिज्ञासाओं ने सबका दिल जीत लिया।

सभी वक्ताओं का यही मत था कि इस बाल उपन्यास को पढ़ते  हुए वे अपने बचपन में लौट गए थे। उन्हें अपने बचपन में पढ़ी बाल पुस्तकें और चंदा मामा, नंदन जैसी बाल पत्रिकाएँ याद आ गईं। ‘जादूगर’ की कहानी हर आयु के पाठक को आकर्षित करती है, ऐसा सब का विचार था। इस कहानी में नैतिक मूल्यों और भारतीय परंपराओं के अनेक उदाहरण हैं। यह बाल उपन्यास मनोरंजन के साथ-साथ आज की पीढ़ी - जो मोबाइल और इंटरनेट में खो चुकी है - को पुन: अपने दायित्व और जीवन मूल्यों का बोध कराती है। 

अवसर पर  मोहिनी गुप्ता, मोनिका भट्ट, रोशनी वैद, अरविंद शर्मा, डॉ. राजश्री दुगड़,  डॉ. बी. बालाजी, प्रियंका पांडे, सुभाष पाठक और डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने लेखक को शुभकामनाएँ दीं। रवि वैद ने अपनी भावी योजनाओं और भारत-पाकिस्तान पर आने वाले उपन्यास के बारे में अपने विचारों से  अवगत कराते हुए सबका धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन कवयित्री शिल्पी भटनागर ने बहुत रोचक ढंग से किया। ■






सोमवार, 15 दिसंबर 2025

डॉ. देवेंद्र शर्मा का काव्य संग्रह ‘अनुभव के आखर’ लोकार्पित




डॉ. देवेंद्र शर्मा का काव्य संग्रह ‘अनुभव के आखर’ लोकार्पित

हैदराबाद, 14 दिसंबर, 2025।

अपने दौर के अंतरराष्ट्रीय स्तर के वनस्पति शास्त्र वैज्ञानिक व कवि स्व. डॉ. देवेंद्र शर्मा का सचित्र काव्य संग्रह 'अनुभव के आखर' सिकंदराबाद स्थित इक्रीसेट कॉलोनी में आयोजित समारोह में लोकार्पित किया गया।

लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए साहित्यकार एवं मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के हिंदी परामर्शी प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि डॉ. देवेंद्र शर्मा ने वनस्पति शास्त्री के रूप में विभिन्न भारतीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में कार्य किया, वे हिंदी साहित्य, दर्शन और विज्ञान में विशेष अभिरुचि रखते थे। उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण, दार्शनिक चिंतन और काव्य की संवेदनशीलता को एकसूत्र में पिरोकर अपने ख़ास अंदाज़ में साहित्य को समृद्ध किया है। उनकी कविताएँ मानव जीवन के विविध आयामों - आदिम संघर्ष से लेकर आधुनिक समाज की विसंगतियों तथा आध्यात्मिक खोज से लेकर प्रेम की सर्वव्यापकता तक - को सहजता और गहनता के साथ उकेरती हैं। उनकी कविताएँ पाठक को न केवल भावनात्मक स्तर पर छूती हैं, बल्कि बौद्धिक और दार्शनिक स्तर पर भी आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती हैं।

ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि डॉ. देवेंद्र शर्मा की कविताएँ मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को एक साथ संबोधित करती हैं। यह उनकी व्यापक दृष्टि और संवेदनशील चेतना का परिचायक है। उनकी रचनाएँ चार प्रमुख विषयों - मानव सभ्यता का विकास, सामाजिक विसंगतियाँ, आध्यात्मिक खोज और प्रेम की सर्वव्यापकता - के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं, जिन्हें वे प्रतीकात्मकता और दार्शनिक गहराई के साथ प्रस्तुत करते हैं। कवि डॉ. देवेंद्र शर्मा ने मानव सभ्यता की प्रारंभिक यात्रा को किसी सहज आस्तिक रहस्यदर्शी के बजाय वैज्ञानिक चिंतक की तरह देखा है। ऐसे स्थलों पर कवि का मानस प्रागैतिहासिक मानव की प्रकृति के साथ एकाकार होने की चेष्टा करता है। उनकी कविता ‘मानव सभ्यता’ अग्नि की खोज व सामूहिकता के महत्व को सभ्यता की नींव के रूप में प्रस्तुत करती है।

डॉ. देवेंद्र शर्मा की सहधर्मिणी व गीतकार विनीता शर्मा ने इन कविताओं को संकलित किया है। उन्होंने इस अवसर पर कुछ संस्मरण सुनाए और उनके निधन के बाद लिखा अपना गीत सुनाया। यह अंतरंग समारोह डॉ. देवेंद्र शर्मा के काव्य और डॉ. विनीता शर्मा के साथ उनके जीवन एवं दुनिया के विभिन्न देशों में रहकर वैज्ञानिक शोध और विश्व की विभिन्न संस्कृतियों और भाषाओं के साथ मेलजोल की जीवन यात्रा के संस्मरणों को साझा करने का साक्षी बना।

इस अवसर पर प्रवीण प्रणव, एफ एम सलीम, एलिजाबेथ कुरियन मोना, रवि वैद, रोशनी वैद और डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने लोकार्पित काव्य संग्रह से विभिन्न कविताओं का वाचन किया। 
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सिकंदराबाद स्थित इक्रीसेट कॉलोनी में आयोजित कार्यक्रम में वनस्पति वैज्ञानिक व कवि स्व. देवेंद्र शर्मा के सचित्र काव्य संग्रह 'अनुभव के आखर' को लोकार्पित करते हुए प्रो. ऋषभदेव शर्मा एवं अन्य।
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‘अनुभव के आखर’ के लोकार्पण के अवसर पर विनीता शर्मा ने लोकार्पणकर्ता प्रो. ऋषभदेव शर्मा का भावभीना स्वागत-सत्कार किया। 
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