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शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

‘कुछ राब्ता है तुमसे’ पर ऑनलाइन परिचर्चा संपन्न


हैदराबाद, 31 अक्टूबर, 2025।
“किसी साहित्यिक कृति में जितना महत्व कथ्य और कथन का होता है, उतना ही सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक और ऐतिहासिक प्रभावों तथा सांस्कृतिक संदर्भों का भी होता है।”

ये विचार मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के दूरस्थ-ऑनलाइन शिक्षा केंद्र के हिंदी परामर्शी प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने युवा लेखक प्रवीण प्रणव की पुस्तक “कुछ राब्ता है तुमसे” पर बोलते हुए प्रकट किए। वे फटकन, आखर और हिंदी मैत्री मंच के तहत इस पुस्तक पर आयोजित ऑनलाइन परिचर्चा में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। डॉ. शर्मा ने विवेच्य पुस्तक की गहन पड़ताल करते हुए इसमें निहित सीमापार, लोकतत्व, स्त्रीपक्ष, पराधीनता, विभाजन, मोहभंग और लोकप्रियता के पाठों-उपपाठों पर चर्चा की।

भारतीय साहित्य की विदुषी, अनुवादक और समीक्षक प्रो. प्रतिभा मुदलियार ने पुस्तक की बहुआयामी उपादेयता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसमें संगृहीत निबंध भली-भाँति यह दर्शाते हैं कि रचनाकारों की निजी दुनिया और वास्तविक दुनिया के रिश्ते कितने संश्लिष्ट हुआ करते हैं।

कथाकार-कवयित्री रेणु यादव ने लेखक की रचना प्रक्रिया और भावी योजनाओं के बारे में जिज्ञासाएँ प्रकट कीं, जिनका समाधान करते हुए प्रवीण प्रणव ने जीवनीपरक आलोचना के लिए खोजी प्रवृत्ति और गहन अध्ययन के महत्व पर प्रकाश डाला। परिचर्चा का संचालन शोधार्थी संगीता ने सुचारु रूप से किया। ■

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2025

‘कुछ राब्ता है तुमसे’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न








‘कुछ राब्ता है तुमसे’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

हैदराबाद, 8 अक्टूबर, 2025 (मीडिया विज्ञप्ति)। मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के गच्ची बावली स्थित दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र के हिंदी प्रभाग के तत्वावधान में, केंद्र के पुस्तकालय भवन में, प्रवीण प्रणव की सद्यःप्रकाशित समीक्षा-कृति ‘कुछ राब्ता है तुमसे’ का लोकार्पण समारोह एक-दिवसीय (हाइब्रिड मोड) राष्ट्रीय संगोष्ठी के साथ संपन्न हुआ।

इस अवसर पर अरबा मींच विश्वविद्यालय (पूर्व अफ्रीका) के पूर्व आचार्य एवं समारोह के मुख्य वक्ता प्रो. गोपाल शर्मा ने विस्तार से ‘कुछ राब्ता है तुमसे’ के लेखकीय सरोकार और विश्व दृष्टि की पड़ताल करते हुए यह घोषित किया कि इसके भीतर सामाजिक परिवर्तन की कामना अंतर्निहित है और सलीके से सहेजे गए इसके 18 अध्याय पुराण-कथा के पाँचों लक्षणों से युक्त हैं।

मणिपुर विश्वविद्यालय और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य डॉ. देवराज ने ऑनलाइन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा कि प्रवीण प्रणव की इस कृति का ताना-बाना बहुत ही बारीक है, जो केवल साहित्यिक मान-मूल्यों तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और लोक मानस के वर्तमान में प्रासंगिक बहुरंगी धागों से निर्मित है।

लगातार सात घंटे तक चले संपूर्ण समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रतिष्ठित लेखिका डॉ. अहिल्या मिश्र ने लेखक प्रवीण प्रणव के साहित्यिक संस्कार की जड़ों की पड़ताल करते हुए भावविभोर होकर कहा कि उन्होंने गंभीरता से एक-एक साहित्यकार के समग्र साहित्य रूपी सागर की तह तक जाकर अपने पाठकों को सुंदर और बेशकीमती मोती लाकर दिए हैं।

वीर बहादुर सिंह विश्वविद्यालय जौनपुर की पूर्व कुलपति प्रो. निर्मला एस. मौर्य ने किताब के निबंधों में संरचनात्मक स्पष्टता की बात करते हुए सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्मा से जुड़े आलेखों की चर्चा की। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस किताब का अगला भाग भी आना चाहिए जिससे पाठक कई और साहित्यकारों के विषय में सारगर्भित जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।

चेक गणराज्य (यूरोप) स्थित प्राग से ऑनलाइन सम्मिलित प्रमुख मनोचिकित्सक एवं कवि डॉ. विनय कुमार ने लक्षित किया कि यह किताब विभिन्न कवियों की निजी जिंदगी के रोचक प्रसंगों को इस तरह बयान करती है कि लेखक और पाठक के बीच सहज राब्ता कायम हो जाता है। उन्होंने इसके सभी अध्यायों को ऑडियो बुक के रूप में प्रसारित करने की ज़रूरत बताई, तो संभावना प्रकाशन के अभिषेक अग्रवाल ने लेखक की पूर्वग्रह-विहीनता को इस पुस्तक की बड़ी ताक़त बताया।

चेन्नै से ऑनलाइन जुड़ीं डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने पुस्तक पर चर्चा का प्रवर्तन करते हुए ‘कुछ राब्ता है तुमसे’ को चर्चित 18 रचनाकारों की मार्मिक उक्तियों और लेखक प्रवीण प्रणव के सूत्रवाक्यों के संग्रहणीय कोश की संज्ञा दी।

दिल्ली से ऑनलाइन जुड़े लेखक अवधेश कुमार सिन्हा ने कहा कि यह किताब प्रवीण प्रणव के विगत 10 वर्षों के अध्ययन का सार है तथा मुश्किल विषय को भी कहानी की शक्ल में परोसने की उनकी कला पाठकों से सीधा संवाद स्थापित करने में सहायक है।

महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा की उपाचार्य डॉ. अनीता शुक्ल ने पुस्तक में शामिल तल्ख़ ग़ज़ल के दो पुरोधाओं दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी के बहाने प्रवीण प्रणव की सहज कथात्मक शैली पर चर्चा की।

प्रसिद्ध कवि लाल्टू ने विशेषज्ञ टिप्पणी देते हुए इस बात को रेखांकित किया कि लेखक ने इस पुस्तक में तरह-तरह के तत्कालीन और समकालीन तनावों को उजागर करने का जोख़िम कुछ इस तरह उठाया है कि किताब को पढ़ते हुए लेखक के साथ हम भी उन तनावों को दोबारा जीते हैं।

मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के सहायक कुलसचिव और संगोष्ठी के संयोजक डॉ. आफ़ताब आलम बेग़ ने पुस्तक की पठनीयता की प्रशंसा करते हुए कहा कि इसमें शामिल जोश मलीहाबादी की गाथा हमें सिखाती है कि प्रवास केवल दूरी का नाम नहीं, बल्कि अस्वीकार्यता और पहचान के संकट का भी पर्याय होता है।

आरंभ में समारोह के सूत्रधार प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने पुस्तक का सामान्य परिचय देते हुए बताया कि इसमें लेखक ने चंद्रधर शर्मा गुलेरी, भिखारी ठाकुर, जोश मलीहाबादी, सुभद्रा कुमारी चौहान, मखदूम मुहिउद्दीन, महादेवी वर्मा, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, नागार्जुन, गोपाल सिंह नेपाली, कैफी आज़मी, फणीश्वरनाथ रेणु, साहिर लुधियानवी, गोपाल दास नीरज, दुष्यंत कुमार, केदारनाथ सिंह, धूमिल, अदम गोंडवी और परवीन शाकिर जैसे हिंदी-उर्दू के कुल 18 साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व की, कथारस में भीगी जीवनीपरक आलोचना प्रस्तुत की है।

संगोष्ठी के दोनों सत्रों में 25 विद्वान समीक्षकों ने अपने शोध पत्रों में विवेच्य पुस्तक का अलग-अलग नज़रिए से गहन विवेचन किया। डॉ. जमाल ख़ान, सुनीता लुल्ला, एफएम सलीम, वेणुगोपाल भट्टड़, रवि वैद, डॉ. इरशाद नैयर, डॉ. आशा मिश्र, डॉ. रेखा शर्मा, डॉ. रक्षा मेहता, डॉ. सुपर्णा मुखर्जी, डॉ. सुषमा देवी, डॉ. बी. बालाजी, शीला बालाजी, डॉ. अनिल लोखंडे, डॉ.वाजदा इशरत, लविका, कुशाग्र और किरण सिंह सहित सभी वक्ताओं ने लेखक को इस पुस्तक के दूसरे भाग के भी यथाशीघ्र प्रकाशन हेतु शुभकामनाएँ दीं। समारोह का सफल संचालन कवि-कथाकार रवि वैद ने किया। 000


गुरुवार, 8 अगस्त 2024

प्रवीण प्रणव की पुस्तक ‘लिए लुकाठी हाथ’ पर चर्चा संपन्न



साहित्यिक समाचार:

प्रवीण प्रणव की पुस्तक ‘लिए लुकाठी हाथ’ पर चर्चा संपन्न


हैदराबाद, 8 अगस्त, 2024। 

“समीक्षा अपने आप में बेहद जटिल और ज़िम्मेदारी भरा काम है। कोई भी समीक्षा कभी पूर्ण और अंतिम नहीं होती। सच तो यह है कि किसी कृति की सबसे ईमानदार समीक्षा स्वयं रचनाकार ही कर सकता है। कोई समीक्षक किसी रचनाकार की संवेदना को जितनी निकटता से पकड़ता है, उसकी समीक्षा उतनी ही विश्वसनीय होती है।” 


ये विचार वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर (उत्तर प्रदेश) की पूर्व कुलपति प्रो. निर्मला एस. मौर्य ने आखर ई-जर्नल और फटकन यूट्यूब चैनल की ऑनलाइन परिचर्चा में प्रवीण प्रणव (हैदराबाद) की सद्यःप्रकाशित समीक्षा-कृति ‘लिए लुकाठी हाथ’ की विशद विवेचना करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि इस पुस्तक में लेखक ने ऋषभदेव शर्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व के विविध आयामों को गहन अध्ययन के आधार पर उजागर किया है। 


प्रो. मौर्य ने जोर देकर कहा कि ‘लिए लुकाठी हाथ’ में विवेच्य रचनाकार के साहित्य के ज्वलंत प्रश्नों से साक्षात्कार किया गया है और यह दर्शाया गया है कि मनुष्य, समाज, राजनीति, लोकतंत्र और संस्कृति पर गहन विमर्श इस साहित्य को दूरगामी प्रासंगिकता प्रदान करता है। 


कार्यक्रम की अध्यक्ष प्रो. प्रतिभा मुदलियार (मैसूरु) ने कहा कि प्रवीण प्रणव ने अपनी पुस्तक ‘लिए लुकाठी हाथ’ के माध्यम से पाठकों को विशेष रूप से दक्षिण भारत के हिंदी साहित्य फलक पर कवि, आलोचक और प्रखर वक्ता के रूप में प्रतिष्ठित ऋषभदेव शर्मा के साहित्य की जनवादी चेतना, स्त्री पक्षीयता, प्रेम प्रवणता और सौंदर्य दृष्टि का सहज दिग्दर्शन कराया है।


‘लिए लुकाठी हाथ’ के लेखक प्रवीण प्रणव ने अपने बेहद सधे हुए वक्तव्य में यह स्पष्ट किया कि आलोचनात्मक लेखन करते हुए लेखक स्वयं को भी समृद्ध करता चलता है। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक को लिखते हुए उन्होंने सटीक समीक्षा के लिए ज़रूरी वाक्-संयम सीखा और इससे वे  अपने लेखन को अतिवाद तथा अतिरंजना से बचा सके। अपनी रचना प्रक्रिया समझाते हुए प्रवीण प्रणव ने यह सुझाव भी दिया कि जिस दिन आप उतना लिखना सीख जाएँगे जितना वास्तव में ज़रूरी है, उस दिन आप सचमुच लेखक बन जाएँगे। उन्होंने विवेच्य पुस्तक के लिए मार्गदर्शन हेतु श्री अवधेश कुमार सिन्हा, प्रो. गोपाल शर्मा, प्रो. निर्मला एस. मौर्य और प्रो. देवराज का विशेष उल्लेख किया। 


चर्चा का समाहार करते हुए ऋषभदेव शर्मा ने यह जानकारी दी कि ‘लिए लुकाठी हाथ’ के लेखक की निजी शैली को प्रो. देवराज ने ‘आत्मीय आलोचना’ तथा प्रो. अरुण कमल ने ‘जीवनचरितात्मक आलोचना’ कहा है। 


कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी संगीता देवी ने किया तथा संयोजिका डॉ. रेनू यादव ने आभार ज्ञापित किया। 000