शनिवार, 30 मई 2026

विशेष आलेख : हिंदी पत्रकारिता दिवस द्विशताब्दी

अमरतल्ला की अंधेरी गली में ‘समाचार-सूर्य’ की खोज

- प्रो. गोपाल शर्मा


आज बृहस्पतिवार है—गुरुवार। देवताओं का दिन, ज्ञान का दिन, और लोकतंत्र में—वोट का दिन। संयोग देखिए, बंगाल में आज मतदान था और मैं, जो अपने मताधिकार का ऋणी नागरिक हूँ, उस पवित्र कर्म से कोसों दूर, अपनी ही एक अप्रकाशित पुस्तक की धूल झाड़ने निकला था। यह भी एक व्यंग्य ही है—देश वोट दे रहा हो और वह अपने पात्रों से मिलने निकल पड़े!

मैं गोहाटी पहुँचा था, अपने कथानायक से मिलने—सोचा था, वह मुझे गले लगाएगा, दो-चार गंभीर वाक्य कहेगा, और मेरी पांडुलिपि को पुनर्जीवित कर देगा। परंतु वह तो BBC के संवाददाता को पेड़ा खिलाने में व्यस्त था—जैसे इतिहास नहीं, मिठाई बन रहा हो! मैंने समझ लिया—यहाँ मेरी दाल नहीं गलने वाली। सो, लेखक की आत्मा और जेब दोनों को समेटते हुए, मैं दुम दबाकर कलकत्ता—माफ़ कीजिए, Kolkata—आ पहुँचा।

और फिर, जैसे किसी भूली-बिसरी स्मृति की खोज में भटकता हुआ पुराना प्रेमी, मैं जा पहुँचा—छत्तीस, चौरंगी लेन। नहीं, सच तो यह है कि मैं निकला था एक और तीर्थ की खोज में—हिंदी पत्रकारिता के आद्य सूर्य, उदंत मार्तंड के उद्गम स्थल की तलाश में। और उसके साथ जुड़े उस भूले-बिसरे नाम की खोज में—पंडित जुगल किशोर शुक्ल।

अमरतल्ला लेन… नाम में ही एक अमरत्व का वादा था, पर गली में प्रवेश करते ही लगा—यहाँ तो स्मृतियाँ भी जर्जर होकर गिरने की प्रतीक्षा में हैं। एक टूटा-फूटा मकान—जैसे इतिहास का कंकाल खड़ा हो, और उसके भीतर अंधेरा—इतना गहरा कि उसमें अतीत की आवाज़ भी रास्ता भूल जाए। मैंने सोचा—क्या यही वह स्थान होगा जहाँ कभी छपाई की मशीनें खटर-पटर करती होंगी? जहाँ शब्द जन्म लेते होंगे, जैसे सूर्योदय होता है?

गली में बहुमंजिला इमारतें हैं—नई उम्र की, पर स्मृति-विहीन। एक पुराना अहाता दिखा—दो सौ वर्षों का साक्षी, पर मौन। जैसे उसने सब देखा हो, पर अब बोलने से इंकार कर दिया हो। गली के मोड़ से 26 नंबर का भवन दिखता है—पर वहाँ भी शुक्ल जी का कोई नामोनिशान नहीं। चारों ओर गहमा-गहमी है—व्यापार, लेन-देन, सौदेबाज़ी—पर इतिहास? वह तो जैसे यहाँ से बेदखल कर दिया गया है।

कुछ मारवाड़ी, कुछ जैन व्यापारी दिखे—व्यस्त, जैसे समय को भी मुनाफे में बदल देना चाहते हों। गली के बाहर एक भव्य मस्जिद खड़ी है—समय की तरह स्थिर, और भीतर गली में समय जैसे बिखरा हुआ। एक पोस्टर दिखा—“भरत राम तिवारी को वोट देकर सफल बनाइए।” उसके ठीक नीचे एक सरकारी नल—सरकारी वादों की तरह—अनवरत बहता हुआ। पानी भी जैसे कह रहा हो—“मुझे रोकोगे नहीं, तो मैं बहता रहूँगा; जैसे स्मृतियाँ, जिन्हें कोई रोकने वाला नहीं।” और तभी मन में एक तीखा विचार कौंधा—जिस तरह “उदंत मार्तंड” बंद हो गया, वैसे ही उसके संपादक की स्मृति भी यहाँ से लुप्त हो गई है। बच्चे इन जर्जर इमारतों के नीचे क्रिकेट खेल रहे हैं—इतिहास की नींव पर वर्तमान की पिच। उन्हें क्या पता, इसी जमीन पर कभी शब्दों की गेंदें उछली होंगी!

मैंने लोगों से पूछा—“भाई, यहाँ कहीं पंडित जुगल किशोर शुक्ल का घर…?” वे मुझे ऐसे देखने लगे, जैसे मैंने किसी प्राचीन ग्रह का पता पूछ लिया हो। किसी को कुछ पता नहीं। व्यापार के इस केंद्र में ‘शुक्ल’ नाम का कोई खाता नहीं खुला—और शायद यही सबसे बड़ा व्यंग्य है।

सोचता हूँ—यह गली तब कितनी अंधेरी रही होगी, जब उदंत मार्तंड का जन्म हुआ था। तब भी प्रकाश कम था, पर भीतर एक सूरज उग रहा था। आज रोशनी बहुत है, पर सूरज कहीं खो गया है।

पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने जब “उदंत मार्तंड” निकाला, तो वह केवल एक अखबार नहीं था—वह एक घोषणा थी कि हिंदी भी बोलेगी, लिखेगी, और सुनी जाएगी। उन्होंने लिखा था—हिंदुस्तानियों के लिए, उनकी भाषा में समाचार का कागज—क्योंकि पराई भाषा में सुख भी पराया लगता है। कितना सरल, कितना गहरा सत्य! अज्ञान तथा रूढ़ियों के अँधेरों में जकड़े हुए हिन्दुस्तानी लोगों की प्रतिभाओं पर प्रकाश डालने और 'उदंत मार्तण्ड' द्वारा ज्ञान के प्रकाशनार्थ' इस पत्र का श्री गणेश हुआ था। और, 'हिन्दुस्तान और नेपाल आदि देशों के लोगों, महाजनों तथा इंगलैंड के साहबों के बीच वितरित हुआ । इस समाचार पत्र में विभिन्न नगरों के सरकारी क्षेत्रों की विभिन्न गतिविधियाँ प्रकाशित होती थीं और उस वक्त की वैज्ञानिक खोजों तथा आधुनिक जानकारियों को भी महत्त्व दिया जाता था। इसके उद्देश्य के सम्बन्ध में बांग्ला साप्ताहिक ‘समाचार चंद्रिका' ने लिखा था कि 'नासमझी तथा रूढ़ियों के अँधेरों में जकड़े हुए हिन्दुस्तानी लोगों की प्रतिभाओं पर प्रकाश डालने और 'उदंत मार्त्तण्ड' द्वारा ज्ञान के प्रकाशनार्थ' इस पत्र का श्री गणेश हुआ था। और, 'हिन्दुस्तान और नेपाल आदि देशों के लोगों, महाजनों तथा इंगलैंड के साहबों के बीच वितरित हुआ और हो रहा है।' लगता है, खरीद कर पढ़ने वालों की संख्या उस समय (भी) कम रही होगी। इसलिए ग्राहकों की (पाठकों की नहीं) संख्या कम होने के कारण आज की लघु पत्र-पत्रिकाओं की तरह ही इसको भी दम तोड़ना पड़ा होगा। शायद यह कुछ वक्त तक और बची रहती अगर मिशन के काम में मिशनरियों का हाथ बँटाने लगती। तब इस पत्रिका को डाक महसूल में छूट मिलती। पर पहले के संपादक ठहरे ‘मिशनरी’। अब भुगतो!

इस पत्र की प्रारंभिक विज्ञप्ति इस प्रकार थी -यह "उदन्त मार्तण्ड" अब पहले-पहल हिंदुस्तानियों के हित के हेतु जो आज तक किसी ने नहीं चलाया पर अंग्रेजी ओ पारसी ओ बंगाल में जो समाचार का कागज छपता है उनका सुख उन बोलियों के जानने और पढ़ने वालों को ही होता है। और सब लोग पराए सुख से सुखी होते हैं। जैसे पराए धन धनी होना और अपनी रहते परायी आंख देखना वैसे ही जिस गुण में जिसकी पैठ न हो उसको उसके रस का मिलना कठिन ही है और हिंदुस्तानियों में बहुतेरे ऐसे हैं। इससे सत्य समाचार हिंदुस्तानी लोग देख आप पढ़ ओ समझ लेयँ ओ पराई अपेक्षा न करें ओ अपने भाषे की उपज न छोड़े। इसलिए दयावान करुणा और गुणनि के निधान सब के कल्यान के विषय गवरनर जेनेरेल बहादुर की आयस से ऐसे साहस में चित्त लगाय के एक प्रकार से यह नया ठाट ठाटा...

***

पहले तो आप इनके पत्र की प्रकृति और प्रवृत्ति उनके ही शब्दों में सुनें ;

'दिनकर कर प्रगटत दिनहि यह प्रकाश अठयाम
ऐसो रवि अब उग्यो नहि, जेहि-जेहि सुख को धाम ।
उत कमलनि विकसित करत बढ़त चाव चितवाम,
लेत नाम या पत्र का, होत हर्ष अरु काम ।

और उनका व्यंग्य—अरे, वह तो आज भी ताज़ा है। वह बूढ़ा वकील, जो मुकदमे को अपनी पीढ़ियों की जीविका बना चुका था, और दामाद ने उसे जल्दी निपटा दिया—वकील को दुख हुआ! जैसे आज भी कुछ लोग समस्याओं के समाधान से अधिक, उनके बने रहने में ही अपना लाभ देखते हैं। मुलाहिजा फरमाइए;

‘एक यशी वकील अदालत का काम करते-करते बुड्ढा होकर अपने दामाद को वह सौंप के आप सुचित हुआ। दामाद कई दिन वह काम करके एक दिन आया ओ प्रसन्न होकर बोला हे महाराज आपने जो फलाने का पुराना ओ संगीन मोकद्दमा हमें सौंपा था सो आज फैसला हुआ यह सुनकर वकील पछता करके बोला कि तुमने सत्यानाश किया। उस मोकद्दमे से हमारे बाप बड़े थे तिस पीछे हमारे बाप मरती समय हमें हाथ उठा के दे गए ओ हमने भी उसको बना रखा ओ अब तक भली-भांति अपना दिन काटा ओ वही मोकद्दमा तुमको सौंप करके समझा था कि तुम भी अपने बेटे पाते तक पालोगे पर तुम थोड़े से दिनों में उसको खो बैठे।“

परंतु इतिहास का यह सूर्य अधिक दिनों तक नहीं चमक सका। यह साप्ताहिक पत्र पुस्तकाकार (12x8) छपता था और हर मंगलवार को निकलता था। इसके कुल 79 अंक ही प्रकाशित हो पाए थे कि इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा। 19 दिसंबर 1827—वह दिन, जब “उदंत मार्तंड” अस्त हो गया। अंतिम पंक्तियाँ—“ आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तण्ड उदन्त अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अन्त।यह केवल एक पत्र का अंत नहीं था, यह एक स्वप्न का विराम था। सरकारी सहायता नहीं मिली, पाठकों का सहयोग नहीं मिला—और सूरज डूब गया- मिति पौष बदी १ भौम संवत् १८८४ तारीख दिसम्बर सन् १८२७। उन्होंने अपने संपादकीय के अन्त में ग्राहकों एवं पाठकों से निवेदन किया था कि "हमारे कुछ कहे-सुने का मन में न लाइयो जो दैव और भूधर मेरी अन्तरव्यथा और गुण को विचार सुधि करेंगे तो मेरे ही हैं। शुभमिति ।"

पर क्या सचमुच डूब गया?

मैं उस गली में खड़ा था—टूटी दीवारों, बहते नलों, और खेलते बच्चों के बीच—और मुझे लगा, “उदंत मार्तंड” कहीं न कहीं अब भी उग रहा है। हर उस शब्द में, जो अपनी भाषा में लिखा जाता है। हर उस लेखक में, जो उपेक्षा के बावजूद लिखता है।

पर एक पीड़ा भी है—क्योंकि उस गली में, उस इतिहास का कोई नामोनिशान नहीं। जैसे जयशंकर प्रसाद की ‘ममता’ कहानी का वह वाक्य—राजाओं के नाम तो अमर हो जाते हैं, पर ममता कहीं खो जाती है।

“सातों देश के नरेश हुमायूँ ने एक दिन यहाँ विश्राम किया था। उनके पुत्र अकबर ने उनकी स्मृति में यह गगनचुंबी मन्दिर बनाया।" पर उसमें ममता का कहीं नाम नहीं था।

शायद अगली सरकार आए, तो इस गली का नाम बदल दे। शायद यहाँ पंडित जुगल किशोर शुक्ल की एक प्रतिमा लग जाए। शायद…

पर तब तक, यह गली यूँ ही रहेगी—अंधेरी, जर्जर, और स्मृतिहीन।

और मैं—एक लेखक—इस स्मृति को अपने शब्दों में सँजोकर लौट जाऊँगा, जैसे कोई पुराना यात्री, अपनी झोली में इतिहास की धूल भरकर ले जाता है… ताकि कहीं तो वह चमके।

हाँ, एक बात ओर है जो मैं इन पंक्तियों के पाठकों से कहना चाहूँगा। यदि उन्हें यह मौका दिया जाए कि वे हिंदी के इन संपादक महोदय पर कुछ लिख बोल सकें तो लिखना कि आचार्य शुक्ल जी ने अपने इतिहास में इन्हें ‘पं जुगल किशोर’ लिखा है और सच में तो ये ‘शुक्ल’ नहीं बकौल डॉ लक्ष्मी शंकर व्यास के ‘सुकुल’ थे।

जमाना मेरी दादी के जमाने से नाजुक ही चल रहा है, और मेरे मरहूम चचा मरने से पहले कहा करते थे कि भतीजे नाम में क्या रखा है, आज के जमाने में तो इनका नाम ‘जुगल किसोर’ ही काफी है। 200 साल, अरे बाप रे! 000

- प्रो. गोपाल शर्मा, अरवा मींच यूनिवर्सिटी, इथियोपिया

सोमवार, 18 मई 2026

अवधेश कुमार सिन्हा की पुस्तक "काली स्याही सूर्य शब्द" की समीक्षा





ग्लोबल साउथ की आवाज़ों का साहित्यिक दस्तावेज़ :

 काली स्याही सूर्य शब्द

- प्रवीण प्रणव


विश्व साहित्य के मानचित्र पर जब हम दृष्टि डालते हैं तो एक विचित्र असंतुलन दिखाई देता है। कुछ भाषाएँ और भूभाग केंद्र में हैं, जबकि एशिया और अफ्रीका जैसे विशाल महाद्वीपों की असंख्य आवाज़ें अब भी हाशिये पर खड़ी प्रतीत होती हैं। ‘काली स्याही सूर्य शब्द’ इसी मौन को स्वर देने वाली पुस्तक है। यह केवल साहित्यकारों का परिचय नहीं कराती, बल्कि उन भूगोलों, संघर्षों और मानवीय अनुभवों से भी हमारा साक्षात्कार कराती है, जिनसे होकर विश्व साहित्य की वास्तविक आत्मा निर्मित होती है। इस किताब का शीर्षक और कलेवर दोनों ही पाठकों के मन में इसके विषय-वस्तु के बारे में जिज्ञासा जगाने में सफल है। संभावना प्रकाशन और किताब के लेखक अवधेश कुमार सिन्हा दोनों ही इसके लिए बधाई के पात्र हैं। किताब के लेखकीय में जब लेखक, साहित्य के नोबेल पुरस्कारों की बात करते हुए लिखते हैं ‘दुनिया के 197 संप्रभु देशों में से 102 संप्रभु देशों में रहने वाली दुनिया की कुल 78 प्रतिशत आबादी में मात्र 13 साहित्यकार ही हैं, जबकि अकेले फ़्रांस के 16 साहित्यकार हैं। यदि भारत की बात की जाय तो इसके हिस्से में केवल रवीन्द्रनाथ टैगोर (ठाकुर) ही हैं। निश्चित ही यह पीड़ादायक आश्चर्य की बात लगती है।’ और तब यह स्पष्ट हो जाता है कि किताब एशिया और अफ्रीका के उन साहित्यकारों से हमें जोड़ती है जिनके शब्दों की आभा सूर्य के स्वर्णिम किरणों की तरह दमक रही है। किताब की भूमिका में वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. गोपाल शर्मा ने लिखा भी है ‘पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति इसकी विस्तृत विषय-वस्तु है। इसमें एशिया और अफ्रीका के उन प्रमुख लेखकों का समावेश है जिन्होंने न केवल अपने देशों की साहित्यिक परंपराओं को प्रभावित किया, बल्कि वैश्विक साहित्य को नई दिशा भी दिखाई। यह पाठक को केवल सूचनाएँ नहीं देती, बल्कि उसे विश्व साहित्य की आत्मा से परिचित कराती है।’

आठ-नौ वर्ष पूर्व जब हम हैदराबाद से निकलने वाली प्रतिष्ठिक साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका ‘पुष्पक’ को एक नया स्वरूप देने पर कार्य कर रहे थे तब ‘पुष्पक साहित्यिकी’ परिवर्तित नाम के साथ इस पत्रिका के स्थाई स्तंभ खण्ड में विश्व साहित्य लिखने की ज़िम्मेदारी कार्यकारी संपादक अवधेश कुमार सिन्हा को दी गई। अपने खोजी स्वभाव, गुणवत्ता से कोई समझौता न करने की ज़िद, और साहित्यिक जुनून से उन्होंने पत्रिका के हर अंक में एक बेहतरीन आलेख दिया जिसे पाठक वर्ग ने बहुत सराहा। यह स्वाभाविक ही था कि पत्रिका की प्रधान संपादक डॉ. अहिल्या मिश्र और कई और लोगों ने इन आलेखों को पुस्तकाकार लाने की माँग रखी। पत्रिका के लिए आलेख लिखते समय शब्दों की सीमा होती है। किताब की शक्ल में इन आलेखों को लाने के लिए लेखक को इन पर एक बार पुनः नए सिरे से काम करना पड़ा। पुष्पक साहित्यिकी पत्रिका का संपादक होने के नाते मैं इस यात्रा का और अवधेश कुमार सिन्हा के अथक परिश्रम का साक्षी रहा हूँ।

संग्रह में दो खण्ड हैं। पहले खंड में एशिया और अफ्रीका के वैसे साहित्यकार शामिल हैं, जिन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। इनमें रवीन्द्रनाथ टैगोर (भारत), अब्दुलराजाक गुरनाह (जंजीबार/इंग्लैंड), नाग़ीब महफूज़ (मिस्र), सैमुअल योसेफ़ एग्रॉन (इज़राइल), हान कांग (दक्षिण कोरिया), ओरहान पामुक (तुर्कीए), यासूनारी कवाबाता (जापान), वोले सोयिंका (नाइजीरिया), मो यान (चीन), नादिन गॉर्डिमर (दक्षिण अफ्रीका) शामिल हैं। दूसरे खण्ड में एशिया और अफ्रीका के वैसे साहित्यकार शामिल हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार तो नहीं मिला लेकिन जिनके साहित्य ने बहुत प्रभाव डाला। इस खण्ड में अदूनीस (लेबनान/फ्रांस), महमूद दरवेश (फ़िलीस्तीन), जीन अरसनायगम (श्रीलंका), क्वामे सेनु नेविल डॉवेस(घाना) शामिल हैं। एक आलेख ‘अफ़ग़ानी स्त्री कविताएँ’ नाम से भी शामिल है। किताब में शामिल इन साहित्यकारों के लिए वरिष्ठ साहित्यकार लाल्टू ने लिखा ‘चुने गए सभी अदीब वाक़ई विश्व-साहित्य में अव्वल दर्जे के हैं। पंद्रह रचनाकारों में विचार और शैली की व्यापकता लाज़िमी है, और इस तरह एक बेहतरीन और बड़े रचना-संसार से पाठक की वाक़फ़ियत होती है।’ पुरानी कहावत है कि एक चित्र, हज़ार शब्दों जितना प्रभावी होता है। किताब के हर लेख से पहले, साहित्यकार का चित्र उनके नाम, जन्म और मृत्यु तिथि (यदि साहित्यकार जीवित नहीं हैं) के साथ दिया गया है। पाठक के लिए यह लेख पढ़ने से पहले ही साहित्यकार के साथ एक तारतम्यता बिठाने का काम करता है।

नोबेल पुरस्कार विजेताओं में भारत के हिस्से सिर्फ़ रवीन्द्रनाथ ठाकुर ही हैं, अतः स्वाभाविक है कि किताब का पहला लेख उनके नाम का ही है। बांग्ला भाषी लोगों के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं लेकिन भारत में भी अन्य प्रांतों में उनके बारे में जानकारी का अभाव है। ऐसे में यह पुस्तक बड़े रोचक तरीक़े से संक्षिप्त में उनका जीवन परिचय पाठकों के सामने रखती है। सामाजिक सौहार्द की उनकी परिकल्पना उनके एक पत्र से स्पष्ट होती है जिसमें उन्होंने लिखा “हमें सारी संकीर्ण चारदीवारियों के पार जाना चाहिए और उस दिन का स्वप्न-संधान करना चाहिए जब बुद्ध, ईसा और मुहम्मद एक हो जाएँगे।” किताब में गीतांजलि के अनुवाद और इसे नोबेल पुरस्कार मिलने तक की घटनाओं का रोचक विवरण दिया गया है। रवीन्द्रनाथ ने पहली कविता मात्र आठ वर्ष की आयु में लिखी और सोलह-सत्रह वर्ष आते-आते उन्होंने कहानियाँ व नाटक लिखना भी आरंभ कर दिया था। 58 काव्य संग्रह, 85 से भी ज़्यादा लघु कथाएँ, 50 से अधिक संगीत नाटक/ गीतिनाट्य, कई निबंध और उनके द्वारा लिखी गई आत्मकथा - इतना विपुल साहित्य है जिस पर हर भारतीय को गर्व होना चाहिए। टैगोर को संगीत से अत्यधिक अनुराग था। उन्होंने प्रकृति, आध्यात्म, मानव प्रेम, विश्व बंधुत्व, देश प्रेम आदि पर दो हज़ार से ज़्यादा गीतों की रचना की जिनमें से अधिकतर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों में लयबद्ध होकर गेय हैं। यह रविंद्र संगीत, बांग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग है और उनकी विशाल साहित्यिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस किताब में उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘काबुली वाला’ और गीतांजलि से दो कविताएँ संकलित हैं।

अब्दुलराजाक गुरनाह के परिचय के साथ ही लेखक ने जंजीबार की राजनीतिक परिस्थिति और गुरनाह का मजबूरी में वहाँ से ब्रिटेन पलायन की पृष्ठभूमि को दर्शाया है। गुरनाह के साहित्य को समझने के लिए यह पृष्ठभूमि आवश्यक है तभी पलायन की पीड़ा और मिट्टी से बिछड़ने का दर्द समझ में आ सकता है। गुरनाह ने दस उपन्यास, कई लघु कथाएं, कथेतर साहित्य, आलेख आदि लिखे। उन्होंने संपादन का काम भी बहुत किया। उपन्यासकार अब्दुलराजाक गुरनाह को उपनिवेशवाद के प्रभावों और संस्कृतियों व महाद्वीपों के बीच की खाई में शरणार्थी की स्थिति के चित्रण के लिए साहित्य में 2021 नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लेखक ने गुरनाह के दो प्रसिद्ध उपन्यास ‘पैराडाइज़’ और ‘ग्रेवल हर्ट’ के चुनिन्दा अंश का हिंदी अनुवाद पाठकों से सम्मुख रखा है जिससे हिन्दी जगत के पाठक गुरनाह के लेखन से परिचित हो सकेंगे।

धार्मिक कट्टरता समाज में किस तरह का प्रभाव डालती है यह नाग़ीब महफ़ूज़ की जीवनी पढ़ने से ज्ञात होता है। नाग़ीब महफ़ूज़ जब सात साल के थे तभी मिस्र में नवंबर 1918 से जुलाई 1919 के बीच ब्रिटिश कब्जे के ख़िलाफ़ राष्ट्रव्यापी क्रांति हुई। उन्होंने अपने घर की खिड़कियों से ब्रिटिश सैनिकों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाते हुए देखा। इसका उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा और भविष्य में यह उनके लेखन में स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ। नाग़ीब महफ़ूज़ साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले एकमात्र मिस्री एवं अरबी लेखक हैं। हालांकि उनकी साहित्यिक यात्रा आसान नहीं रही। उनके उपन्यास ‘चिल्ड्रन ऑफ गेबेलावी’ पर ईशनिंदा का आरोप लगा। उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलीं और 1994 में कट्टरपंथी हमलावरों ने उन्हें उनके घर के बाहर चाकू मारकर घायल कर दिया जिससे उनकी दाहिनी हाथ की नसों को क्षति पहुंच और उनका लेखन प्रभावित हुआ। लेखक ने संक्षेप में महफ़ूज़ के साहित्य पर प्रकाश डाला है। नोबेल पुरस्कार मिलने पर महफूज ने कहा था ‘नोबेल पुरस्कार ने मुझे पहली बार यह एहसास दिलाया कि मेरी साहित्यिक रचनाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जा सकता है। अरब जगत ने भी मेरे साथ यह नोबेल जीता है। मुझे विश्वास है कि अब अतर्राष्ट्रीय दरवाज़े खुल गए हैं और अब से पढ़े-लिखे लोग अरब साहित्य को भी महत्व देंगे। हम उस पहचान के हक़दार हैं।”

नोबेल पुरस्कार के स्वीकृति संबोधन में महफ़ूज़ ने लिखा “यह बहुतों के लिए आश्चर्य का विषय हो सकता है कि तीसरी दुनिया से आने वाला एक व्यक्ति, कैसे कहानियाँ लिखने की मानसिक शांति पा सकता है? मैं उस दुनिया से आता हूँ को कर्ज़ों के बोझ तले दबी है, और उन्हें चुकाने की कोशिश में भुखमरी के कगार पर पहुँच जाती है। एशिया में कुछ लोग बाढ़ से मरते हैं, अफ़्रीका में अकाल से। दक्षिण अफ्रीका में लाखों लोग अस्वीकृति और मानवाधिकारों से वंचित हो कर टूट चुके हैं। वेस्ट बैंक और गाज़ा में लोग अपनी ही भूमि पर रहते हुए भी खोए हुए हैं। लेकिन सौभाग्यवश कला उदार और सहानुभूतिपूर्ण होती है। जैसे वह सुखी लोगों के साथ रहती है, वैसे ही वह दुखी लोगों को भी नहीं छोड़ती। यह दोनों को ही अपने हृदय की गहराइयों को अभिव्यक्त करने का माध्यम प्रदान करती है।” लेखक ने महफ़ूज़ की प्रसिद्ध कहानी ‘निस्फ़ याम’ जो अंग्रेजी में ‘हाफ़ ए डे’ नाम से प्रकाशित हुई, का हिंदी अनुवाद ‘आधा दिन’ के नाम से किया है। किताब की भूमिका में प्रो. गोपाल शर्मा ने ठीक ही लिखा है – ‘पुस्तक पढ़ते हुए बार-बार यह महसूस होता है कि साहित्य भौगोलिक सीमाओं से कहीं बड़ा होता है। लेखक ने यह दिखाया है कि चाहे अफ़्रीका का संघर्षमय इतिहास हो या एशिया की सांस्कृतिक जटिलताएं हों, साहित्य हर जगह मानव मन की पीड़ा, जिज्ञासा, संघर्ष और आशा को व्यक्त करता है। एक लेखक को पढ़ना, उसके समाज और समय को समझने का अवसर भी होता है।’

एक तरफ़ जहाँ संघर्ष है वहीं एक साहित्यकार के तौर पर प्रतिष्ठा भी देखने को मिलती है। इज़राइली साहित्यकार सैमुएल योसेफ़ एग्रॉन अपने देश में इतने प्रसिद्ध हुए कि जब उन्होंने नगरपालिका से यह शिकायत की कि उनके घर के नजदीक यातायात के शोरगुल से उनके काम में बाधा पहुंच रही है, तो शहर में उस सड़क को गाड़ियों के लिए बंद कर एक साइनबोर्ड लगा दिया गया जिस पर लिखा था - ‘किसी भी वाहन का प्रवेश वर्जित, लेखक काम कर रहे हैं।’ अवधेश कुमार सिन्हा ने उनकी कहानी ‘ऑर्केस्ट्रा’ का हिन्दी अनुवाद (अंग्रेजी से) किया है और पाठकों के लिए इस किताब में प्रस्तुत किया है। कोरिया एवं एशिया की पहली महिला साहित्यकार हान कांग को 2024 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया। इस किताब में लेखक ने उनके उपन्यास ‘द वेजेटेरियन’ के अंश का हिंदी अनुवाद दिया है। साथ ही हान कांग की दो कविताओं का हिंदी अनुवाद भी दिया गया है। अवधेश कुमार सिन्हा जो ख़ुद एक कवि और कहानीकार हैं, उनके अनुवाद में सरलता और प्रवाह दोनों है। जब वे कविता का अनुवाद करते हैं तो उस कविता में लयात्मकता होती है। कई बार अनूदित रचनाओं को पढ़ते हुए जिस सपाटबयानी का बोध होता है, उनसे यह अलग है। लेखक को इन प्रसिद्ध रचनाकारों के व्यक्तिगत और साहित्यिक परिचय को संक्षिप्त लेकिन प्रभावी प्रस्तुति के लिए तो धन्यवाद दिया जाना ही चाहिए लेकिन इनसे भी ज़्यादा उन्हें अनुवाद कार्य के लिए धन्यवाद दिया जाना चाहिए। अंग्रेजी से हिंदी में उन्होंने जिस निपुणता से उपन्यास, कहानी, कविता आदि का अनुवाद किया है, इस क्षेत्र में उनसे और योगदान की अपेक्षा पाठकों को अवश्य रहेगी।

ओरहान पामुक जो तुर्किए के सबसे ज़्यादा बिकने वाले साहित्यकारों में शुमार हैं, ने वैश्विक सौहार्द के संदर्भ में लिखा “मैं उस तरह का लेखक बनना चाहता हूँ कि वाज इस्तांबुल के रंगों को महसूस करे, उन्हें आत्मसात करे और देखे, लेकिन यह भी माने कि दुनिया के सारे लोग किसी न किसी अर्थ में एक जैसे ही हैं, भले संस्कृति अलग है, इसीलिए वे व्यवहार अलग करते हैं।” असहमति की आवाज़ के लिए उन्होंने कहा ‘यदि केंद्रीय अधिनायकवाद, राष्ट्रीय कट्टरवाद या धार्मिक कट्टरवाद, व्यक्तिगत स्वतंत्रता तो दबाने की कोशिश करता है तो कुचले जाने के भय से बिना डरे हुए ऐसे लोग अपनी बात कहेंगे तथा सारे परिदृश्य में एक संतुलन पैदा करेंगे।’ स्वतंत्र अभिव्यक्ति के हिमायती होने की वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा। किताब में लेखक ने उनके उपन्यास ‘माई नेम इज़ रेड’ के दो अंशों का हिंदी अनुवाद किया है।

एशिया और अफ्रीका के जिन साहित्यकारों ने अपनी कलम से अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज करवाया उनकी यात्रा आसान नहीं रही। जापान के यासुनारी कवाबाता का जीवन कठिन रहा। पिता की तरफ़ से सभी सदस्यों की मौत एक के बाद एक करके उनके बचपन में ही हो गई। उनकी रचनाओं में उनके जीवन में व्याप्त अलगाव देखने को मिलता है। उन्होंने कहा उनके लेखन पर युद्ध सबसे गहरा प्रभाव डालने वाले तत्वों में से एक था और जापान में युद्ध के बाद वह केवल शोकगीत ही लिख सकते थे। साहित्य का नोबेल पुरस्कार पाने वाले वे पहले जापानी थे। 1972 में गैस से हुई उनकी मृत्यु को कई लोग आत्महत्या मानते हैं और कई दूसरे लोग इसे एक दुर्घटना। लेखक ने कहानी संग्रह ‘तेनोहीरा नो शोसेत्सू’ से एक कहानी के अंग्रेजी संस्करण का हिंदी अनुवाद कर, इस किताब में दिया है। इसका एक अंश है – ‘आज रात मैंने अपनाया जीवनसंगिनी को/ जब मैंने उसका आलिंगन किया - स्त्री सुलभ कोमलता/ मेरी माँ भी एक स्त्री थी/ छलकते हुए आँसू, मैंने अपनी नवविवाहिता को कहा/ एक अच्छी माँ बनो/ एक अच्छी माँ बनो/ क्योंकि मैंने अपनी माँ के बारे में कभी नहीं जाना।’

वॉल सोयिंका, अफ़्रीका के महानतम लेखकों में शुमार हैं लेकिन उन्हें कई बार अपने विचारों की वजह से जेल यात्रा करनी पड़ी। मो यान को सबसे प्रसिद्ध, अक्सर प्रतिबंधित और व्यापक रूप से पायरेट किए गए चीनी लेखकों में से एक माना जाता है। ग़रीबी इतनी कि बचपन में अगला खाना मिलेगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता था। उनके भेड़ चराने से ले कर साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतने तक की यात्रा यह किताब बहुत रोचक ढंग से प्रस्तुत करती है। नादिन गॉर्डिमर, दक्षिण अफ्रीका की अपने समय की सबसे सम्मानित लेखिका और राजनीतिक कार्यकर्ता रही हैं। रंगभेद के ख़िलाफ़ उन्होंने लंबे समय तक कार्य किया। अदालत में नेल्सन मंडेला द्वारा दिए गए प्रसिद्ध भाषण ‘आई एम प्रीपेयर्ड टू डाई’ का संपादन करने में नादिन गॉर्डिमर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनकी कई रचनाओं पर दक्षिण अफ़्रीका में कई वर्षों तक प्रतिबन्ध लगाया गया। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अहिल्या मिश्र ने इस किताब के लिए लिखा – ‘यह संग्रह न सिर्फ़ संस्कृतियों के बीच संवाद का माध्यम बना है बल्कि इसने विश्व साहित्य की मूल आत्मा को पुनर्जीवित किया है। ‘काली स्याही सूर्य शब्द’ वैश्विक चेतना के उन झरोखों को खोलती है, जिनसे छनकर आती रोशनी अंतर्मन को छू लेती है।’

खण्ड दो में विश्व के कुछ अन्य ऐसे साहित्यकारों को लिया गया है जिनकी साहित्यिक उपलब्धियां और साहित्यिक स्वीकार्यता किसी नोबेल पुरस्कार विजेता से कम नहीं। इस खण्ड में सबसे पहले अदूनीस है जो सीरिया में जन्मे और बाद में लेबनान के नागरिक बने। वे अरब के सबसे ख्यातिलब्ध कवि, साहित्यिक आलोचक एवं समकालीन अरब कविता के आधुनिकतावादी आंदोलन के अग्रदूत हैं। वर्ष 1985 से अदूनीस पेरिस में रह रहे हैं। अदूनीस की कविता का हिंदी अनुवाद करते हुए लेखक ने लिखा है – ‘गुम हो गया है मेरा शहर/ इसके रास्तों को इसलिए मैंने ढूंढा हड़बड़ाहट में/ और देखा चारों और - केवल क्षितिज/ और महसूस किया मैंने कि/ जो छोड़ जाते है कल, या लौटते हैं कल/ उनकी यादों को मिटाता हूँ मैं अपने पृष्ठ पर।’ विश्व साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए महमूद दरवेश कोई अनजाना नाम नहीं है। फ़िलिस्तीनी कवि एवं लेखक महमूद दरवेश को वहाँ का राष्ट्रीय कवि माना जाता है। लेखक ने उनके व्यतित्व और कृतित्व का परिचय देते हुए उनकी चुनिंदा कविताओं का हिंदी में अनुवाद कर अपने पाठकों के लिए परोसा है। ऐसे ही श्रीलंका की साहित्यकार जीन अरसनायगम और घाना के क्वामे सेनु नेविल डॉज़ के व्यक्तित्व और कृतित्व की झलक भी इन से जुड़े आलेखों में मिलती है।

इस किताब में ‘अफ़ग़ानी स्त्री कविताएँ’ लेख एक अपवाद है। अपवाद इस मामले में कि सभी आलेख किसी एक साहित्यकार के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित हैं लेकिन यह आलेख एक नहीं, बल्कि चार अफ़ग़ानी कवयित्रियों से हमारा परिचय करवाता है। अफ़ग़ानिस्तान में संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। ऐसे में महिला साहित्यकारों के लिए अपनी जगह बनाना आसान नहीं। अपने वतन की हिंसा एवं धार्मिक रूढ़ियों से त्रस्त कई अफ़ग़ानी लेखिकाएं आज विदेशों में निर्वासन की ज़िंदगी बसर कर रही हैं। किताब में नादिया अंजुमन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर बात की गई है। 1980 में अफ़ग़ानिस्तान में जन्मी नादिया की पढ़ाई स्कूल बंद कर दिए जाने से बाधित हुई। तालिबानी शासन खत्म होने के बाद 2002 में उन्होंने साहित्य में स्नातक किया। शादी के बाद ससुराल वालों ने इन्हें साहित्यिक गतिविधियों से दूर रहने को कहा लेकिन नादिया सक्रिय रहीं। 2005 में उनका पहला कविता संग्रह ‘गुल-ए-दूदी’ (धुँए का फूल) प्रकाशित हुआ जो बहुत चर्चित रहा। कहा जाता है उनके पति ने 2005 में उनकी हत्या कर दी। उनकी एक कविता का हिंदी अनुवाद लेखक ने किया है। कविता के अंश हैं - ‘धन्य है यह दुनिया जहाँ/ मैं रोऊँ या हसूँ/ जीऊँ या मरूँ मैं/ नहीं है कोई साझा करने को मेरी व्यथा/ मैं और यह बंदीगृह/ धकेल दी गई है शून्य में अभिलाषा मेरी/ मेरा जन्म हुआ व्यर्थ/ जन्म केवल चुप रहने के लिए/ दिल! मैं जानती हूँ गुज़र गया है वसंत/ और इसकी ख़ुशी भी/ किंतु मैं उड़ूँ कैसे/ इन कटे पंखों से?/ पूरे समय रही हूँ चुप भले ही/ पर सुना है नज़दीक से मैंने/ दिल मेरा गुनगुनाता है अभी भी उसके गीत/ हर क्षण जन्म लेता है नया उसके लिए/ एक दिन तोड़ दूँगी यह कैदखाना/ इसका एकाकीपन/ पीऊँगी मदिरा आनंद का/ गाऊँगी जैसे चिड़िया गाती है वसंत में।’

परवीन पज़वाक की भी चर्चा किताब में की गई है। इनका जन्म (1967) काबुल में साहित्यिक परिवार में हुआ। सोवियत रूस द्वारा आक्रमण से समय दो वर्षों तक पाकिस्तान में शरणार्थी की तरह रहीं और इसके बाद कनाडा चली गईं। वर्तमान में कनाडा रह रही हैं। इनकी कविता ‘सूरज की मौत’ के अनुवाद का अंश - ‘आपने, जिसने उम्मीद की पेड़ से/ तोड़ा नहीं है एक भी पत्ता/ आप अंधकार के महासागर से क्या/ कभी बना पाएंगे/ रोशनी का एक पुल?/ ओह, अपनी ही दुनिया के आप सभी बंदी/ क्या कभी भी, क्या कभी भी/ दौड़ पाएंगे तेजी से रोशनी की ओर?’

ऐसे ही बहर सईद और मीना किश्वर कमाल का परिचय और इनकी रचना भी शामिल है। मीना किश्वर कमाल के पति की पहले हत्या कर दी गई और 31 वर्ष की आयु में इनकी हत्या भी कट्टरपंथियों द्वारा क्वेटा में कर दी गई। मीना किश्वर कमाल आज नहीं हैं लेकिन उनका कथन ‘अफ़ग़ान की औरतें सोये हुए शेरों की तरह हैं, वे जागने पर किसी भी सामाजिक क्रांति में एक आश्चर्यजनक भूमिका अदा कर सकती हैं’ आज भी उम्मीद की एक लौ बना हुआ है। मेरे लिए यह आलेख इस किताब का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। एक तो यह महिलाओं की आवाज़ को हमारे सामने लाता है और विशेषकर ऐसी महिलाओं की आवाज़ों को जिनकी स्याही से निकले शब्द अभी सूर्य नहीं बने, यानी जिन्हें अभी मंजिल नहीं मिली, जिनका संघर्ष अभी जारी है। वैश्विक पाठकों को ऐसी महिलाओं, ऐसे साहित्य, ऐसे संघर्ष से परिचित होना और उनके हक़ में आवाज़ उठाना ही चाहिए।

किताब के लेखक अवधेश कुमार सिन्हा की रुचि इतिहास में है। यही वजह है कि इनके आलेखों को पढ़ते हुए पाठक विश्व राजनीति से भी अवगत होता रहता है। लेखक ने इस किताब के लेखों में जो विधा चुनी है उसमें नदी के दो तटबंधों की तरह एक तरफ़ राजनीतिक परिदृश्य और दूसरी तरफ़ साहित्यकार के जीवन का संघर्ष चलता रहता है और बीच में मीठी जलधारा की तरह लेखक ने साहित्यकार के साहित्य को पाठकों के लिए सुलभ किया है। विश्व साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह एक ऐसी किताब है जो उनके संग्रह में होनी ही चाहिए। प्रसिद्ध साहित्यकार अरुण कमल ने ‘काली स्याही सूर्य शब्द, एक कल्पवृक्ष की तरह है।’ कहते हुए इसकी महत्ता को रेखांकित कर दिया है। आशा की जानी चाहिए कि यह किताब सुधि पाठकों तक पहुँचे और साहित्य जगत में इस पर चर्चा हो। किताब के लेखकीय में लेखक ने नोबेल पुरस्कारों में जिस क्षेत्रीय असमानता की बात उठाई है उसे शिक्षाविद और साहित्यकार प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने भी यह कहते हुए अपना समर्थन दिया है – ‘विश्व साहित्य के मानचित्र को अधिक न्यायपूर्ण बनाने और सदियों से दबी ग्लोबल साउथ की आवाज़ों को सुनने का आमंत्रण देती सर्वथा प्रासंगिक कृति। और एक सवाल भी : विश्व साहित्य का केंद्र आख़िर कब तक यूरोप रहेगा?’ ‘काली स्याही सूर्य शब्द’ केवल विश्व साहित्य के कुछ महत्वपूर्ण रचनाकारों का परिचय नहीं है; यह उन आवाज़ों की पुनर्खोज है जिन्हें लंबे समय तक विश्व साहित्य की मुख्यधारा में अपेक्षित स्थान नहीं मिला। यह पुस्तक पाठक को यह सोचने के लिए विवश करती है कि साहित्य का वास्तविक केंद्र कहाँ है? सत्ता के स्थापित भूगोलों में या संघर्ष, विस्थापन और मानवीय जिजीविषा से भरी उन आवाज़ों में जो सीमाओं के पार भी मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती हैं। हिंदी जगत में इस तरह की पुस्तकों का स्वागत होना चाहिए, क्योंकि वे हमारे साहित्यिक क्षितिज को अधिक व्यापक, अधिक मानवीय और अधिक वैश्विक बनाती हैं। O



मंगलवार, 12 मई 2026

पुस्तक समीक्षा : उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन


बेमिसाल हरिहरन

- आर्या झा (हैदराबाद)

ग़ज़ल के कहन की विविधता से भला कौन अनजान होगा यह तो कोमल मन को सहजता से छूकर ज़ेहन में उतरने में दक्ष होती हैं और उस पर मखमली मुलामियत लिए श्री हरिहरन जी की रुहानी आवाज़ हो तो कमाल होना तो बनता ही है।

हम बात कर रहे हैं सर्व भाषा ट्रस्ट से प्रकाशित कहकशां फाउंडेशन के अध्यक्ष श्री आनंद कक्कड़ द्वारा लिखित साहित्य आजतक के मंच पर स्वयं हरिहरन के हाथों विमोचित पुस्तक “उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन” की। 


उनके पचास वर्षों के अद्भुत योगदान को इस पुस्तक के ग्यारह अध्याय के अन्तर्गत समाहित किया गया है जो ग़ज़ल के विभिन्न घरानों से गुज़रते हुए हरिहरन घराने पर आकर रुकती है जिसमें हरिहरन के आरंभिक जीवन व उनके ग़ज़ल के प्रति अतिरिक्त रुझान के राज़ खोलती है और ताज्जुब की बात तो यह है कि आज इन ऊँचाइयों पर पहुँच कर भी वे विद्यार्थी समान सतत प्रयत्नशील रहते हैं शायद यही उनकी सफलता का राज़ भी है और वह बड़ी ही सादगी से इसका श्रेय अपने तीनों गुरुओं, माँ श्रीमती अलामेलु, उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान साहब एवं रुहानी गुरु जनाब मेंहदी हसन साहब को देते नहीं थकते हैं जो उन्हें और भी अनूठा बनाती है।

जिस तरह से उन्होंने अपने गीतों व ग़ज़लों के माध्यम से संपूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोया है उन्हें सांस्कृतिक राजदूत कहना पूर्णतया न्यायोचित है। जहाँ एक ओर पूरे विश्व में क्षेत्रवाद की लहर चरम पर है वहीं वह दिलों को जोड़ने की बात करते हैं।

इतना ही नहीं उनके गायन की तकनीकी विविधता ने हमेशा से जेनरेशन गैप को भी कम किया है। शायद ही कोई ऐसा हो जिसकी ज़ुबान पर “काय झाल” न चढ़ा हो। एक ओर मेंहदी हसन साहब की तर्ज़ पर बेमिसाल ग़ज़ल गायिकी तो दूसरी ओर कोलोनियल कजिंस, जैज़ और उर्दू ब्लूज और इस तरह से हर वर्ग हर क्षेत्र के लोगों को एक छत के नीचे लाने में सक्षम है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ हरिहरन ही कर सकते हैं। यहाँ तक कि स्वयं की गायन शैली में निरंतर बदलाव करते हुए जिस प्रकार पिछले पाँच दशकों से सतत क्रियाशील हैं वह एक पद्मश्री नहीं बल्कि अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित होने योग्य हैं!

इस किताब की उपयोगिता की बात करें तो जावेद अख़्तर साहब ने कहा है कि “ इस किताब की जो सबसे बड़ी अहमियत है,वह यह है कि आनन्द कक्कड़ ने इसमें हरिहरन की उन बातों को समेट कर बताया है जो 50 सालों से बिखरी हुई थीं।” आगे यह भी कहा कि उन्हें यक़ीन है कि इसे पढ़ते हुए पाठकों को हरिहरन का असली योगदान समझ में आएगा। उनकी बात से सौ फ़ीसदी ताल्लुक़ रखते हुए मुझे भी यह लगता है कि यह किताब करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बनेगी और परिस्थितियों को अपनी मेहनत के बल पर बदलने वाले हरिहरन एक सच्चे आदर्श के रूप में उभर कर सामने आएँगे।

सरोद सम्राट अमजद अली खान ने हरिहरन की संगीत सेवा को देखते हुए जिन तीन उपाधियों से नवाज़ा उनमें एक उस्ताद हरिहरन था तो उनके कहे का अमल करते हुए पुस्तक का नाम, “उस्ताद -ए-ग़ज़ल हरिहरन” रखा गया। हरिहरन साहब की एकदम साफ़ तलफ़्फ़ुज़ उर्दू ज़बान पर उन्होंने यह भी कहा कि “एक दक्षिण भारतीय होते हुए कोई ग़ज़ल गाए और उर्दू से डील करे यह अपने आप में बहुत बड़ा करिश्मा है, खुदा की देन है और एक बड़ी कामयाबी है।”

पुस्तक में सर्वप्रथम ग़ज़ल और उसके घरानों से होते पाठक जब हरिहरन घराने पर ठहरते हैं तो हरिहरन साहब के गुरु, उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान साहब के कुशल प्रशिक्षण, उनकी सलाहियत पर उर्दू ज़बान सीखने की कोशिश इत्यादि की जानकारी मिलती है। हरिहरन साहब के रियाज़ की निरंतरता एवं ग़ज़लों के कंपोज़िशन पर अथक परिश्रम के परिणामस्वरूप विश्वस्तरीय सफलताओं का ज़िक्र बेहद सुखद प्रतीत होता है । आगे लेखक एक श्रोता के तौर पर जब उस्ताद-ए-ग़ज़ल हरिहरन के साथ संवाद कर उनके जीवन के अनुभवों को कलमबद्ध करते हैं तो उनसे गुज़रते हुए पाठकों की जिज्ञासा शांत होती है।

इसके विभिन्न अध्यायों में लेखक ने हरिहरन के जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों एवं उपलब्धियों का उल्लेख किया है तथा गायिकी के सफ़र के प्रतिनिधि साथियों का उनके प्रति उद्गार को भी प्रस्तुत किया है जो हरिहरन के सम्पूर्ण व्यक्तित्व व कृतित्व के रेशे-रेशे से परिचित कराते हैं।

पुस्तक की एक विशेषता यह भी है कि इसे आज की पीढ़ी को मद्देनज़र रखते हुए लिखा गया है ताकि वह ग़ज़ल की गहराइयों में उतर सकें उन्हें महसूस कर सकें और उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतार सकें ।

अध्याय ‘रुबरु’ के दौरान रचयिता के प्रश्न यूँ प्रतीत होते हैं जैसे लंका पार करने के पूर्व हनुमान जी को उनकी शक्तियां याद दिलाई गईं हों जो इस बात का द्योतक है कि कुछ और बेहतरीन ग़ज़ल अल्बम अवश्यंभावी हैं और वे भी हमेशा की तरह कुछ नये प्रयोगों के साथ प्रस्तुत होगी ।

किताब शुरुआत से लेकर आख़िर तक बेहद रुचिकर बन पड़ी है जिसे पढ़ते हुए जाने-अनजाने हरिहरन के मधुर स्वर में गाई ग़ज़लें ज़ेहन में उतर आती हैं जो किताब पढ़ने की प्रक्रिया को सुर देती महसूस होती हैं और आख़िरी अध्याय में पचास सुपरहिट ग़ज़लों से गुज़रना बोनस साबित होता है।

अंत में यह किताब न केवल पठनीय है बल्कि संग्रहणीय भी है। मैं तो यह कहूँगी कि यह पुस्तक एक अनोखी अभिव्यक्ति है जो एक लीजेंड को एक प्रशंसक की ओर से भेंट किया गया फूलों का गुलदस्ता है जिसकी ख़ुशबू कभी कम न होगी।

आखिर में उस्ताद ए ग़ज़ल - हरिहरन पुस्तक हरिहरन जी के ग़ज़ल प्रेम और संगीत के लिए लिए अनवरत तपस्या का एक ऐसा जीवंत दस्तावेज़ है जो आज के श्रोताओं को आपका समग्र परिचय है। मौलिक ग़ज़ल कंपोजर और गायक के रूप में हरिहरन के लिए उन्हीं को ग़ज़ल का एक मतला समर्पित है:-

वो सरफिरी हवा थी संभलना पड़ा मुझे
मैं आखिरी चराग़ था जलना पड़ा मुझे। 000