बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

नई सदी की हिंदी कविता पर द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न


दीप प्रज्वलन के अवसर पर. गुरु संगनबसव महास्वामी जी, डॉ. ऋषभदेव शर्मा, डॉ.के.जी. पुजारी, डॉ. एस. जी. गणी,
डॉ. एस. जे. पवार, डॉ. एस. टी. मेरवाडे, डॉ. साहिबहुसैन जहागीरदार एवं अन्य.
विजयपुर (कर्नाटक) : 25 फरवरी 2015. 
बी.एल.डी.इ संस्था के एस.बी.कला एवं के.सी.पी. विज्ञान महाविद्यालय, विजयपुर(कर्नाटक) तथा रानी चन्नम्मा विश्वविद्यालय कॉलेज हिंदी प्राध्यापक संघ के तत्वावधान में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) के सहयोग से ‘नई सदी की हिंदी कविता : दशा और दिशा’ विषयक द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. यरनाल विरक्त मठ के संगनबसव महास्वामी जी ने दीप प्रज्वलित कर संगोष्ठी का उदघाटन किया. उन्होंने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि भाषाएँ मनुष्य से मनुष्य को जोड़ने का कार्य करती हैं, परंतु आज भाषाएँ राजनीति का शिकार हो रही हैं. राजनेता भाषा को अस्त्र बनाकर समाज को बाँट रहे हैं. भाषा-भेद भुलाकर सारे समाज को देश की उन्नति में योगदान देना चाहिए. इसी सत्र में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद के उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के विभागाध्यक्ष प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने अपने बीज वक्तव्य में कहा कि “भूमंडलीकरण के बाद बाजारवाद ने साहित्य को प्रभावित किया है. शब्द पर ‘अर्थ’(वित्त) हावी हुआ है. समाज में असहिष्णुता इतनी बढ़ गई है कि स्वतंत्र साहित्यकार को अपनी मृत्यु की घोषणा करनी पड़ रही है.” प्राचार्य डॉ.के.जी. पुजारी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की. संगोष्ठी के संयोजक डॉ. एस.टी. मेरवाडे ने अतिथियों का स्वागत किया तथा प्रो.एस.जे. जहागीरदार ने सूत्रसंचालन किया.

संगोष्ठी के प्रथम सत्र में हैदराबाद की कवयित्री डॉ. पूर्णिमा शर्मा ने नई सदी की कविता की प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालते हुए विशेष रूप से अनामिका के काव्य के संदर्भ अपने विचार प्रस्तुत किए. ‘स्रवंति’ मासिक पत्रिका की सहसंपादक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने ‘नई सदी के काव्य में दलित विमर्श’ पर प्रवर्तन व्याख्यान प्रस्तुत किया. प्रो. अमित चिंगले ने नई सदी की कविता में नीलेश रघुवंशी के योगदान को स्पष्ट किया. सत्र की अध्यक्षता प्रो. ॠषभदेव शर्मा ने की. द्वितीय सत्र मुक्त चिंतन का रहा, जिसमें वक्ता एवं श्रोताओं के बीच रोचक और विचारोत्तेजक संवाद हुआ. श्रोताओं के साहित्य और भाषा विषयक प्रश्नों का समाधान मंचासीन विद्वज्जनों ने किया. 

तृतीय सत्र में विभिन्न महाविद्यालयों से आए अध्यापकों तथा शोध छात्रों ने प्रपत्र-प्रस्तुत किए. इस सत्र की अध्यक्षता कर्नाटक विश्वविद्यालय, धारवाड़ के हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉ. एस.के. पवार ने की. चतुर्थ सत्र में गुलबर्गा विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष डॉ. काशीनाथ अंबलगे ने ‘हिंदी काव्य:सृजनशीलता और संभावनाएँ’ विषय पर अपना प्रपत्र प्रस्तुत किया. इसी सत्र में मुंबई विश्वविद्यालय के डॉ.दत्तात्रेय मुरुमकर ने नई सदी के हिंदी काव्य पर प्रकाश डालते हुए दलित विमर्श पर चर्चा की.

डॉ. मरवाडे और डॉ.आर.वी. पाटील की कन्नड़ कृति
'समालोचन' का लोकार्पण 
समारोप समारंभ की मुख्य अतिथि हिंदी की चर्चित कथाकार मधु कांकरिया ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज की कविता संवेदनहीन होती जा रही है, इसके कई उदाहरणों को उन्होंने प्रस्तुत किया. कविता अपनी पहचान खोती जा रही है, इसपर उन्होंने चिंता जताई. अध्यक्षता बी.एल.डी.इ संस्था के प्रशासन अधिकारी प्रो.एस.एच.लगळी ने की. मंच पर बी.एल.डी.इ विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ.बी.जी. मूलिमनी, प्राचार्य डॉ. के.जी. पुजारी उपस्थित थे. रानी-चन्नम्मा विश्वविद्यालय कालेज हिंदी प्राध्यापक संघ के सचिव डॉ.एस.जे. पवार ने धन्यवाद ज्ञापित किया. संगोष्ठी में तीन सौ से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया. 

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

कादम्बिनी क्लब हैदराबाद द्वारा ऋषभ देव शर्मा का सम्मान

हैदराबाद, 18 जनवरी 2015.
गत दिनों तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी, चेन्नै का 'साहित्य शिरोमणि' सम्मान/ पुरस्कार प्राप्त होने के उपलक्ष्य में कादंबिनी क्लब हैदराबाद द्वारा आज यहाँ हिंदी प्रचार सभा, नामपल्ली के सभाकक्ष में आयोजित नियमित बैठक के अवसर पर डॉ. ऋषभ देव शर्मा का भावपूर्ण सम्मान किया गया. 


वह दिन दूर नहीं जब विश्व के आँगन में हिंदी 'तुलसी चौरा' की तरह अवश्य स्थापित होगी - मृदुला सिन्हा

हैदराबाद, 12 जनवरी 2015.  


तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी, चेन्नै और युनाइटेड इंडिया इंश्यूरेंस कं. लि., चेन्नै के तत्वावधान में विश्व हिंदी दिवस, 10 जनवरी, के अवसर पर तृतीय अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक सम्मेलन तथा सम्मान समारोह का आयोजन नुंगंबाक्कम (चेन्नै) स्थित यूनाइटेड इंडिया लर्निंग सेंटर के परिसर में हुआ. 

इस अवसर पर हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा के लिए तेवरी आंदोलन के प्रवर्तक प्रो. ऋषभ देव शर्मा (आचार्य एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, हैदराबाद) को श्रीमती शकुंतलारानी चोपड़ा साहित्य शिरोमणि सम्मान (जीवनोपलब्धि सम्मान) से सम्मानित किया गया. उन्हें प्रशस्ति पत्र, शाल, स्मृति चिह्न और धनराशि (21,000 रु.) से सम्मानित किया गया. यह सम्मान मुख्य अतिथि के रूप में पधारीं गोवा की राज्यपाल महामहिम मृदुला सिन्हा ने प्रदान किया. अकादमी की ओर से देश विदेश के कुल 20 हिंदी सेवियों और साहित्यकारों को विभिन्न सम्मान और पुरस्कार प्रदान किए गए. जीवनोपलब्धि सम्मान प्राप्त करने वाले हिंदी सेवियों में डॉ. ऋषभ देव शर्मा के साथ डॉ. पी. के. बालसुब्रमण्यन और वी. जी. भूमा के नाम सम्मिलित हैं. 

इस अवसर पर डॉ. राज हीरामन (मॉरिशस) और आइरिश रू. यू. लून (चीनी प्राध्यापक) को विश्वजनीन सम्मान, प्रो. निर्मला एस. मौर्य, ईश्वर करुण, महेंद्र कुमार और प्रह्लाद श्रीमाली को मौलिक कृति सम्मान, राजवेल (दक्षिण भारत हिंदी प्रचार प्रकाशन) को सहस्रबाहु प्रकाशन सम्मान, डॉ. एम. गोविंदराजन, डॉ. वत्सला किरण, मोहन बजाज और डॉ. आनंद पाटिल को अनूदित कृति सम्मान, के. वी. रामचंद्रन, के. सुलोचना, पी. आर. सुरेश, रविता भाटिया, के. पद्मेश्वरी और डॉ. अब्दुल मलिक को हिंदी सेवी सम्मान से नवाज़ा गया. 

मुख्य अतिथि गोवा की राज्यपाल महामहिम मृदुला सिन्हा ने अत्यंत गद्गद होकर अपने संबोधन में कहा कि 'अंतरमन जब पूरी तरह से भींगता है तो शब्द नहीं फूटते. आज मैं पूरी तरह से भींग गई हूँ. अम्मा मिले तो खूब बतियाओ, गंगा मिले तो डूब के नहाओ और हिंदी मिले तो खूब दिल खोल के बतियाओ. हर भारतीय के हृदय को स्पंदित करने वाली भाषा है हिंदी. हिंदी जोड़ने वाली भाषा है. संवेदनशीलता की भाषा है. संवेदना हृदय का आभूषण है. इससे समाज को सुसज्जित होना चाहिए. संवेदना के अभाव में साहित्य का सृजन असंभव है. थोड़ी दूर से आई हूँ, विश्वास का तोहफा लाई हूँ, हिंदी बोलते रहिए, अभ्यास कीजिए, अपने घर-परिवार में हिंदी को प्रतिस्थापित करें, वह दिन दूर नहीं जब विश्व के आँगन में हिंदी 'तुलसी चौरा' की तरह अवश्य स्थापित होगी.' 

प्रस्तुति : डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा

रविवार, 21 दिसंबर 2014

रमेशचंद्र शाह और राचपालेम चंद्रशेखर रेड्डी सहित 22 साहित्यकारों को साहित्य अकादमी पुरस्कार


डॉ.रमेशचंद्र शाह 
डॉ.राचपालेम चंद्रशेखर रेड्डी 
देर आयद दुरुस्त आयद ! यह कहावत साहित्य अकादमी के इस वर्ष के पुरस्कारों की घोषणा पढ़ने सुनने पर अपने आप याद आ गई. संदर्भ था डॉ. रमेशचंद्र शाह को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किए जाने की घोषणा का. डॉ. रमेशचंद्र शाह का साहित्य लंबे समय से इस सम्मान का दावेदार और हकदार था. सूना तो यहाँ तक है कि इससे पहले उनकी औपन्यासिक कृतियाँ, कविता संग्रह और डायरी इस पुरस्कार के लिए छह बार शोर्ट लिस्ट हो चुकी हैं. अब सातवीं बार जाकर यह चिर प्रतीक्षित घोषणा सामने आई है. 

इसके साथ 2014 के साहित्य अकादमी पुरस्कार जिन कुल 22 साहित्यकारों को दिए जाने की घोषणा हुई है उनमें प्रमुख तेलुगु आलोचक राचपालेम चंद्रशेखर रेड्डी और लोकप्रिय उर्दू कवि मुन्नवर राणा के भी नाम शामिल हैं. 

अकादमी द्वारा जारी विज्ञप्ति को यहाँ साभार उद्धृत कर रहे हैं. 

सभी पुरस्कृत साहित्यकारों कि नववर्ष की पूर्व वेला में अनेकानेक बधाई!




गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

ऋषभ देव शर्मा को मिलेगा तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी का जीवनोपलब्धि सम्मान

ऋषभ देव शर्मा को मिलेगा जीवनोपलब्धि सम्मान

तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी, चेन्नै द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद परिसर में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत डॉ. ऋषभ देव शर्मा को हिंदी भाषा एवं साहित्य की उनकी सेवाओं के लिए जीवनोपलब्धि सम्मान (लाइफटाइम एचीवमेंट एवार्ड) से सम्मानित करने की घोषणा की गई है. 

यह सम्मान उन्हें विश्व हिंदी दिवस 10 जनवरी, 2015 को तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी के तृतीय अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन में दिया जाएगा. मृदुला सिन्हा (महामहिम राज्यपाल, गोवा) ने मुख्य अतिथि के रूप में आने की स्वीकृति दी है. विशेष अतिथि ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. साकेत कुशवाहा होंगे. 

इस वर्ष का जीवनोपलब्धि सम्मान डॉ पि. के. बालसुब्रमण्यम (तमिल-हिंदी साहित्यकार, चेन्नै), डॉ. ऋषभ देव शर्मा (साहित्यकार-समालोचक, हैदराबाद) एवं वी. जी. भूमा (शास्त्रीय तमिल अनुवादक, चेन्नै) को प्रदान किया जाएगा। इन्हें 21000 रुपए की राशि, अभिनंदन पत्र, स्मृति चिह्न आदि से सम्मानित किया जाएगा। 

हार्दिक बधाई!

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

[संगोष्ठी] मध्यकालीन भारतीय साहित्य की मुक्तक रचनाएँ






हैदराबाद, 1 दिसंबर, 2014.
आज यहाँ सेंट पायस क्रास स्नातक एवं स्नातकोत्तर महिला महाविद्यालय, नाचाराम और केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के संयुक्त तत्वावधान में ''मध्यकालीन भारतीय साहित्य की मुक्तक रचनाएँ'' विषयक दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी महाविद्यालय के प्रेक्षागृह में आरंभ हुई. संयोजक डॉ. राज्य लक्ष्मी ने सबका भावभीना स्वागत किया.

उद्घाटन समारोह ढाई बजे शुरू हुआ जिसमें डॉ. राधेश्याम शुक्ल और प्रो. शुभदा वांजपे ने अपने विचार रखे तथा डॉ. श्रीराम परिहार ने बीज वक्तव्य दिया. 

पहले विचार सत्र में डॉ. ऋषभ देव शर्मा ने मध्यकालीन मुक्तक साहित्य की प्रेरणा के रूप में विशेष रूप से संस्कृत के कवि ''भर्तृहरि'' के शतकों पर चर्चा की. डॉ. अश्वत्थ नारायण ने ''बिहारी''  के मुक्तक काव्य की विवेचना की. अध्यक्षता करते  हुए प्रो. वाई. वेंकट रमण राव ने कहा कि भारतीय कविता के आकर ग्रंथों के अंतर्गत रामायण और महाभारत के आख्यानों की ही भाँति भर्तृहरि की शतकत्रयी को भी गिना जाना चाहिए क्योंकि नीति, शृंगार और वैराग्य विषयक उनकी उक्तियों ने शताब्दियों से रचनाकारों को प्रभावित किया है.

कल तीन विचार सत्र और होंगे तथा समापन सत्र पौने तीन बजे होगा.

प्रो. एम. वेंकटेश्वर जी ने प्रथम विचार सत्र के फोटो मुहैया कराए हैं जो धन्यवाद सहित यहाँ दर्शित हैं.