शनिवार, 17 दिसंबर 2016
रविवार, 11 दिसंबर 2016
[पुस्तक समीक्षा] एक अध्यापक को छात्रों का तोहफा
- डॉ.बी.बालाजी
सहायक प्रबंधक (राजभाषा)
मिश्र धातु निगम लिमिटेड, हैदराबाद-500058
मो.: 08500920391
जिन व्यक्तियों के शुभकार्यों का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है, उनमें
अध्यापक का स्थान सर्वोपरि है. समाज का यह कर्तव्य है कि ऐसी विभूतियों के कार्यों
का सम्मान करे ताकि आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा प्राप्त हो सके. पश्चिमी
उत्तरप्रदेश के एक विशाल भौगौलिक क्षेत्र के लोगों के बीच ‘गुरुजी’ के रूप में
विख्यात, अपभ्रंश भाषा, जैन आगम और मध्यकालीन साहित्य के विशेषज्ञ आचार्य
प्रेमचंद्र जैन एक ऐसी ही विभूति हैं जिन्होंने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व द्वारा
केवल छात्रों ही नहीं बल्कि समाज पर भी व्यापक प्रभाव डाला है. लगभग अस्सी वसंत
देख चुके डॉ.प्रेमचंद्र जैन को उनके प्रिय शिष्य प्रो.देवराज (अधिष्ठाता, अनुवाद
एवं निर्वचन विद्यापीठ, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा)
के नेतृत्व में तैयार किया गया 448 पृष्ठों का ग्रंथ “निरभै होइ निसंक कहि के
प्रतीक” गत दिनों, 3 दिसंबर 2016 को, गलगोटिया विश्वविद्यालय, नोएडा में संपन्न एक
कार्यक्रम में समर्पित किया गया. इस ग्रंथ का संपादन डॉ.गुर्रमकोंडा नीरजा एवं
अन्य ने किया है तथा प्रधान संपादक डॉ.ऋषभ देव शर्मा हैं.
“निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक” की सामग्री पाँच खंडों में सुनियोजित रूप में
प्रस्तुत की गई है. पहले खंड में ‘प्रेम का अंत नहीं’ में सम्मानित विभूति के
अंतरंग मित्रों एवं शिष्यों के अत्यंत रोचक संस्मरण हैं, जबकि खंड-2 में स्वयं डॉ.
प्रेमचंद्र जैन की सृजनयात्रा के विविध पक्षों की बानगी प्रस्तुत की गई है. ‘कविता
में कहा बहुत कुछ’ में उनकी 44 कविताएँ संकलित हैं. ‘विमर्श से विमर्श तक’ में 8
शोधपत्र हैं. ‘अंतरिक्ष में भेजे हुए शब्द’ में 7 रेडियो वार्ताएं हैं. ‘मैं यहाँ
से बोल रहा हूँ’ में 2 व्याख्यान हैं. ‘निर्वचन के सीमांत’ में 15 पुस्तकों की
भूमिकाएं हैं तथा ‘कहानी’ में ‘बरगद ढह
गया’ शीर्षक एक कहानी दी गई है. यह सारी सामग्री ‘सृजनयात्रा’ खंड में शामिल है.
पुस्तक के तीसरे खंड का शीर्षक है ‘संवाद के सशक्त हस्ताक्षर’. इसमें प्रेमचंद्र
जैन को मुख्य रूप से डॉ. शिवप्रसाद सिंह और डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखे
गए पत्रों के साथ स्वयं डॉ. जैन द्वारा समय-समय पर लिखे गए पत्र संगृहीत किए गए
हैं. चौथे खंड ‘मेरा काबा मेरी काशी’ में डॉ. प्रेमचंद्र जैन की आत्मकथा का अंश
प्रकाशित किया गया है जो एक अध्यापक के सृजन और संघर्ष का जीवंत दस्तावेज है. पाँचवें
खंड में एक अभिनंदन पत्र उद्धृत किया गया है.
कुल मिलाकर, यह एक ऐसा संदर्भ ग्रंथ बन गया है जो एक ओर तो डॉ.प्रेमचंद्र जैन
के जीवन और रचना कर्म को पाठकों के सामने लाता है तथा दूसरी ओर अपभ्रंश भाषा और मध्यकालीन
साहित्य पर अत्यंत शोधपूर्ण एवं अन्यत्र दुर्लभ सामग्री को प्रस्तुत करता है. किसी
अध्यापक को अपने छात्रों की ओर से दिया जा सकने वाला यह उपहार निश्चय ही अत्यंत
श्लाघनीय है जिससे अनेक अध्यापकों और उनके शिष्यों को ईर्ष्या होनी चाहिए!
समीक्षित कृति : “निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक”,
संपादक : गुर्रमकोंडा नीरजा एवं अन्य, संपर्क :09849986346.
संपादक : गुर्रमकोंडा नीरजा एवं अन्य, संपर्क :09849986346.
प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन, वालिया मार्केट, निकट साहू जैन
कॉलेज, कोतवाली मार्ग, नजीबाबाद-246763,
पृष्ठ : 448 (सजिल्द),
मूल्य : 200/- रुपए.
शनिवार, 3 दिसंबर 2016
'निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक' डॉ. प्रेमचंद्र जैन
जैन दर्शन, हिंदी साहित्य और अपभ्रंश भाषा के प्रख्यात विद्वान और विचारक गुरुवर डॉ. प्रेमचंद्र जैन अगले महीने आज ही की तारीख को उन्यासीवें वर्ष में प्रवेश करेंगे. आज है 3 दिसंबर 2016. अर्थात गुरुजी का जन्म 3 जनवरी, 1939 ई. को हुआ. जन्म स्थान ग्राम नगला बारहा, जनपद बदायूँ, उत्तर प्रदेश.
पिता श्री शोभाराम जैन निष्ठावान अध्यापक थे. उन्होंने अपने पुत्र को शिक्षा की मूल्यवान विरासत सौंपी, जिसे गुरुजी ने स्याद्वाद महाविद्यालय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संस्थान और भगवान महावीर केंद्रीय संस्कृत विद्यापीठ में अध्ययन, स्वाध्याय और अनुसंधान द्वारा अनेकगुणित करके कृतार्थता प्राप्त की. साथ ही, आपके सारस्वत व्यक्तित्व के निर्माण में पंडित फूलचंद शास्त्री के पांडित्य, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के फक्कड़पन और डॉ. शिवप्रसाद सिंह की सर्जनात्मक मेधा का योगदान अविस्मरणीय है. यही कारण है कि आप इस गुरु-त्रिमूर्ति के गुण गाते नहीं थकते.
1962 में बीए, ’63 में सिद्धांत शास्त्री, ’64 में एमए, ’68 में शास्त्री के उपरांत गुरुजी ने 1969 में पीएचडी उपाधि अर्जित की. आपका शोधप्रबंध "अपभ्रंश कथाकाव्य एवं हिंदी प्रेमाख्यानक" 1975 में प्रकाशित हुआ जिससे आपको विद्वत्समाज में विशिष्ट ख्याति प्राप्त हुई. इस बीच 1972 में आपने नजीबाबाद, उत्तर प्रदेश के साहू जैन कॉलेज में हिंदी प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति पाई और उसे ही अपना काबा-काशी मानकर वहीं के होकर रह गए. वहीं रहते हुए आपने अध्यापन, शोध, साहित्य सृजन तथा हिंदी सेवा के क्षेत्र में अनेक कीर्तिमान स्थापित किए एवं शिष्यों से लेकर आम जन तक में अनन्य लोकप्रियता प्राप्त की. यदि यह कहा जाए कि आप ही के कारण नजीबाबाद को हिंदी की सार्वदेशिक गतिविधियों के मानचित्र पर स्थायी पहचान मिली, तो अतिशयोक्ति न होगी. निश्चय ही इस उपलब्धि के पीछे उनके अनेक समर्पित साथियों का अविचल सहयोग विद्यमान रहा, जिनकी गाथाएँ गुरुजी सदा उल्लसित होकर सुनाते हैं.
गुरुवर डॉ. प्रेमचंद्र जैन ने अनेक कविताओं, ललित निबंधों और कुछ कहानियों का भी प्रणयन किया है जिनमें उनका दिल धड़कता सुनाई देता है. लेकिन उनकी विशेष प्रसिद्धि जैन दर्शन, अपभ्रंश भाषा और मध्यकालीन हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ अध्येता और व्याख्याता के रूप में है. उनके मौलिक और संपादित ग्रंथों में - अपभ्रंश कथाकाव्य एवं हिंदी प्रेमाख्यानक, रहस्यवादी जैन अपभ्रंश काव्य का हिंदी पर प्रभाव, हिंदी संत साहित्य में श्रमण साहित्य का योगदान, हम तो कबहुँ न निज घर आए, पंडित जी, माता कुसुम कुमारी हिंदीतर भाषी हिंदी साधक सम्मान : अतीत एवं संभावनाएँ, बीहड़ पथ के यात्री – जैसी महत्वपूर्ण कृतियाँ शामिल हैं.
गुरुजी के भीतर-बाहर संत कबीर जैसी निर्भीकता और निःशंकता की सात्विक ऊर्जा लहराती है. यही कारण है कि अपने शिष्यों के लिए वे ‘’निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक’’ हैं.
[प्रस्तुति : डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, सह-संपादक, ‘स्रवंति’, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद-500004]
बुधवार, 30 नवंबर 2016
अन्वेषी : सम्मिलित लेखक
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अन्वेषी
संपादक : ऋषभदेव शर्मा/ गुर्रमकोंडा नीरजा
परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद
ISBN : 978-93-84068-36-3
2016
पृष्ठ : 240
मूल्य : रु. 250/-
|
प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद
वितरक : श्रीसाहिती प्रकशन, 303 मेधा टॉवर्स, राधाकृष्ण नगर, अत्तापुर रिंग रोड, हैदराबद - 500048
पुस्तक की प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र :
08121435033
09849986346
इस शोधपत्र संकलन में सम्मिलित सामग्री
पहला खंड : हाशिया विमर्श :
- हिंदी कहानी में वृद्ध मनोविज्ञान : अकेलापन (शिवकुमार राजौरिया)
- 'मुर्दहिया' : दलित बस्ती की जिंदगी (सुभाषिणी टी)
- कात्यायनी के साहित्य में स्त्री प्रश्न (पोलवरपु जयलक्ष्मी)
- अनामिका के काव्य में स्त्री विमर्श (सुरैया परवीन)
- शिवप्रसाद सिंह की कहानियों में स्त्री पात्रों का भाषिक वैशिष्ट्य (सुस्मिता घोष)
- 'छिन्नमस्ता' में स्त्री चेतना (उषा यादव)
- साहित्य में नारी का अभिव्यक्ति पक्ष (सुबोध कुमार सिंह)
- हिंदी के आंचलिक उपन्यासों में स्त्री चेतना (अर्पणा दीप्ति)
दूसरा खंड : भाषा विमर्श :
- हिंदी-मराठी सर्वनाम : रूप संरचना एवं प्रकार्य (मिलिंद पाटिल)
- भाषाविज्ञान का समाजभाषिक स्वरूप (जोराम यालाम नाबाम)
- दक्खिनी भाषा का उद्भव और विकास (जी. प्रवीणा)
तीसरा खंड : कविता विमर्श :
- भक्ति काव्य में प्रेम और सौंदर्य (सिरिपुरपु तुलसी देवी)
- हिंदी सूफी प्रेमाख्यानक काव्यों का वर्ण्य-विषय (इंद्रजीत सिंह)
- कविता, मार्क्सवाद और रामविलास शर्मा (नितिन पाटिल)
- अंधेरे के बिंब बनाती धूपधर्मी कविताओं का कवि - कुमार विकल (सुशील कुमार शैली)
- देवराज की राजनैतिक कविताएँ (अमन कुमार)
चौथा खंड : कहानी विमर्श :
- प्रेमचंद की कहानी 'सवा सेर गेहूँ' और किसान विमर्श (कोमल सिंह)
- मेहरुन्निसा परवेज की कहानियों में आंचलिकता (एन. ललिता)
- मेहरुन्निसा परवेज की कहानियों में समाज की आर्थिक संरचना और वर्गीय संबंध (अनुपमा तिवारी)
- रमेश पोखरियाल 'निशंक' की कहानियों में मानवाधिकार चेतना (संतोष विजय मुनेश्वर)
पाँचवा खंड : उपन्यास विमर्श :
- प्रेमचंद की वर्तमानता : 'रंगभूमि' और 'गोदान' (ऋषभदेव शर्मा)
- हिंदी उपन्यासों में व्यंग्य की परिपाटी (मोहम्मद माजीद मिया)
- इलाचंद्र जोशी के उपन्यासों का व्यक्तिवादी स्वरूप (समला देवी)
- मोहन राकेश कृत उपन्यास 'अंधेरे बंद कमरे' में पत्रकारिता विमर्श (विनोद चौरसिया)
- फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों में भाषण का पाठ (माधुरी तिवारी)
- मृदुला सिन्हा की स्त्री : संस्कृति की संरक्षक (आशा मिश्रा 'मुक्ता')
- हिंदी उपन्यास और सामाजिक यथार्थ (सुपर्णा मुखर्जी)
छठा खंड : मीडिया विमर्श :
- गुंजेश्वरी प्रसाद और उनकी पत्रकारिता (विराट व्यक्तित्व : एक मूल्याकंन) (अरविंद कुमार सिंह)
- हिंदी नवजागरण के विकास में बिहार की पत्रकारिता की भूमिका : रामवृक्ष बेनीपुरी के संदर्भ में (वर्षा कुमारी)
- तमिलनाडु में हिंदी पत्रकारिता का स्वरूप (सुनीता जाजोदिया)
सातवाँ खंड :विविधा :
- स्मृतिकालीन न्याय व्यवस्था (हर्षवर्धन सिंह)
- स्मृतिकालीन सामाजिक संगठन (हर्षवर्धन सिंह)
- वैदिक कालीन नीति और राजनीति (हर्षवर्धन सिंह)
- रामविलास शर्मा और कालजयी साहित्य परंपरा (आनंद कुमार यादव)
- भारतीय शिक्षा नीतियों में भाषा और संस्कृति (बनवारी लाल मीना, प्रभा कुमारी)
- प्रतिभा एवं विद्वत्ता का अनूठा संगम : जानकी वल्लभ शास्त्री (गहनीनाथ)
- आधुनिक तेलुगु साहित्य में रामकथा (गुर्रमकोंडा नीरजा)
मंगलवार, 29 नवंबर 2016
अन्वेषी : भूमिका
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| अन्वेषी संपादक : ऋषभदेव शर्मा/ गुर्रमकोंडा नीरजा परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद 2016 पृष्ठ : 240 मूल्य : रु. 250/- |
'अन्वेषी' शोधपत्र संकलन.
प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद
वितरक : श्रीसाहिती प्रकशन, 303 मेधा टॉवर्स, राधाकृष्ण नगर, अत्तापुर रिंग रोड, हैदराबद - 500048
पुस्तक की प्रतियाँ प्राप्त करने के लिए संपर्क सूत्र :
08121435033
09849986346
‘संकल्पना’ (2015) का सुधी पाठकों ने खुले मन से स्वागत किया। इस स्वीकृति से हमें प्रोत्साहन मिला। विद्वान मित्रों और शोधार्थियों के आग्रह ने उद्दीपन की भूमिका निभाई। ... और हम जुट गए एक नए संकलन के काम में। उसी की निष्पत्ति ‘अन्वेषी’ के रूप में आपके सामने है।
इक्कीसवीं शताब्दी को यदि सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और साहित्यिक क्षेत्रों के समान ही अनुसंधान के क्षेत्र में भी बहु-केंद्रीयता के उभार की शताब्दी कहें, तो शायद अनुचित न होगा। यह बहु-केंद्रीयता विभिन्न हाशियाकृत समुदायों के संदर्भ से जुड़कर शोध में चरितार्थ होती दिखाई दे रही हैं। इससे साहित्य अध्ययन की दृष्टियों का विस्तार हुआ है और अंतर्विद्यावर्ती शोधकार्यों को प्रोत्साहन मिला है। हमारे विचार से स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, वृद्धावस्था विमर्श, पर्यावरण विमर्श आदि मूलतः अंतर्विद्यावर्ती शोध के ही विषय हैं। ऐसे शोधकार्य एक बार फिर साहित्य को ज्ञान की अन्य शाखाओं से जोड़कर समाज के लिए उसकी उपादेयता को रेखांकित करते हैं। ‘अन्वेषी’ में वृद्ध मनोविज्ञान, दलित जीवन, आंचलिक परिवेश, स्त्री पाठ और स्त्री भाषा के अवलोकन बिंदुओं से कहानी साहित्य, दलित साहित्य, स्त्री आत्मकथा, काव्य और उपन्यास साहित्य पर जो अनुसंधान प्रस्तुत किया गया है, अंतर्विद्यावर्ती शोध के पाट को वह नया आयाम प्रदान करने वाला है।
इस पुस्तक के भाषा विमर्श विषयक खंड में जहाँ एक ओर हिंदी और मराठी के सर्वनामों की रूप संरचना और उनके प्रकार्य के विश्लेषण द्वारा तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध का एक नमूना प्रस्तुत किया गया है, वहीं समाजभाषाविज्ञान और दक्खिनी भाषा से संबंधित शोधपत्रों में क्रमशः समाजभाषिकी और ऐतिहासिक भाषाविज्ञानपरक दृष्टि सहज ही पहचानी जा सकती है।
सभ्यता चाहे जितनी संश्लिष्ट होती जाए, संस्कृति चाहे जितने नए-नए रूपों में ढलती जाए, कविकर्म चाहे कितना भी जटिल होता जाए साहित्य सृजन का उत्कृष्टतम और भाषा व्यवहरा का सबसे नाजुक रूप कल भी कविता थी, आज कविता है और कल भी कविता रहेगी। इतना ही नहीं, कविता को शोध का विषय बनाना आज भी चुनौतीपूर्ण माना जाता है। भक्ति काव्य और प्रेमाख्यानों से लेकर आधुनिक और समकालीन कविता तक को इस पुस्तक के कविता विमर्श विषयक खंड में शोधपूर्ण दृष्टि से एक बार फिर जाँचा-परखा गया है।
कहानी और उपन्यास संबंधी शोधपत्रों के अंतर्गत ‘अन्वेषी’ में एक बार फिर साहित्यिक दृष्टियों के साथ-साथ अंतर्विद्यावर्ती दृष्टियों का समावेश द्रष्टव्य है। मानवाधिकार, आर्थिक संरचना, वर्गीय संबंध, आंचलिकता, वर्तमानता, मनोविश्लेषण, पत्रकारिता, संस्कृति और सामाजिक यथार्थ यदि कथासाहित्य को इतर ज्ञान शाखाओं से जोड़कर नया पाठ रचते हैं तो व्यंग्य और भाषण पाठ-विश्लेषण को अलग-अलग दिशाएँ देते हैं।
कहा जाता है कि आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता का प्रवेश और प्रसार हमारे समाज में मुख्यतः मीडिया द्वारा संभव हुआ। पत्रकारिता के क्षेत्र में गुंजेश्वरी प्रसाद और रामवृक्ष बेनीपुरी के अवदान की पड़ताल जहाँ उत्तर प्रदेश और बिहार के परिप्रेक्ष्य में उभरकर सामने आती हैं, वहीं हिंदी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता के हाशिए पर अलग-थलग स्थित प्रतीत होने वाले तमिलनाडु में हिंदी पत्रकारिता के स्वरूप पर केंद्रित शोधपत्र निश्चित रूप से हिंदी के अक्षेत्रीय तथा सार्वदेशिक चरित्र को एक बार फिर रेखांकित करता है।
इस पुस्तक के अंतिम खंड विविधा में जहाँ एक ओर वैदिक और स्मृति कालीन नीति, न्याय और समाज को संक्षेप में सामने लाने का प्रयास किया गया है वहीं शिक्षा नीति की भी भाषा और संस्कृति के अवलोकन बिंदु से विवेचना की गई है। रामविलास शर्मा और जानकी वल्लभ शास्त्री पर केंद्रित शोधपत्र अपने विवेच्य साहित्यकारों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता प्रतिपादित करते हैं। इसी क्रम में, हिंदीतर भाषाओं के आधुनिक और उत्तर आधुनिक युगीन साहित्यकारों द्वारा रामकथा के नए-नए पाठों के अध्ययन की आवश्यकता की पूर्ति का एक बहुत छोटा और विनम्र-सा प्रयास ‘आधुनिक तेलुगु साहित्य में रामकथा’ विषयक शोधपत्र में किया गया है, जो इस दिशा में योजनाबद्ध विस्तृत शोधकार्य की आवश्यकाता जताता है।
हिंदी में चल रहे शोधकार्य की झलक प्रस्तुत करने वाले इस संग्रह को आप तक पहुँँचाने में हमें जिन मित्रों और शुभचिंतकों का मार्गदर्शन और सहयोग मिला है उनमें प्रो. देवराज (वर्धा), प्रो. एम. वेंकटेश्वर (हैदराबाद) और अमन कुमार त्यागी (परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद) के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। साथ ही, शोधार्थी संतोष विजय मुनेश्वर और टी. सुभाषिणी ने समय-समय पर जो श्रम किया है उससे भी ‘अन्वेषी’ की प्रस्तुति में सुविधा हुई है।
गांंधी जयंती - ऋषभदेव शर्मा
2 अक्टूबर, 2016 गुर्रमकोंडा नीरजा
रविवार, 27 नवंबर 2016
शनिवार, 12 नवंबर 2016
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