शुक्रवार, 1 मार्च 2019

'भाषा : राष्ट्रीयता, समन्वय और समरसता' पर व्याख्यान संपन्न


धारवाड़, 26 फरवरी, 2019।  

"भाषा किसी राष्ट्र की बुनियाद होती है। वही अलग-अलग समुदायों को इस तरह बाँध कर रख सकती है कि बड़े से बड़े हमले में भी देश की संरचना बिखरने न पाए। भाषा को यह शक्ति उसमें छिपे जन-संस्कृति के सूत्रों से मिलती है। इसलिए किसी भाषा को इस्तेमाल करना सीखना ही काफी नहीं होता। बल्कि उसमें निहित सांस्कृतिक तत्वों की पहचान भी ज़रूरी होती है। अनेक बोलियों और भाषाओं के बीच संपर्क का काम करते-करते संस्कृति की दृष्टि से हिंदी अत्यंत समृद्ध भाषा बन गई है तथा अपने विपुल मौलिक और अनूदित साहित्य के माध्यम से वह भारत की राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतिनिधित्व करती है। भक्ति साहित्य और नव जागरण काल के साहित्य द्वारा हिंदी ने राष्ट्रीय समन्वय और समरसता को पुष्ट किया था। वर्तमान में भी वह विघटनकारी ताकतों को पहचान कर जनता को सावधान कर रही है और सह-अस्तित्व के भाव को पुख्ता करने के लिए प्रयासरत है।"

ये विचार प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने कर्नाटक विश्वविद्यालय में विभिन्न भाषा-साहित्य और कला विषयों के प्राध्यापकों को संबोधित करते हुए प्रकट किए। वे विश्वविद्यालय के मानव संसाधन विकास केंद्र में संपन्न पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के तहत “भाषा : राष्ट्रीयता, समन्वय और समरसता” विषय पर दो-सत्रीय व्याख्यानमाला में बोल रहे थे। कार्यक्रम में कर्नाटक के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए 65 प्राध्यापकों ने भाग लिया। डॉ. साहिबहुसैन जहगीरदार के धन्यवाद के साथ व्याख्यानमाला का समापन हुआ। 

बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

डॉ. मंजु शर्मा की पुस्तक 'कथाकार नासिरा शर्मा का स्त्री विमर्श' लोकार्पित


मंजु शर्मा की पुस्तक 'नासिरा शर्मा का स्त्री विमर्श' लोकार्पित
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हैदराबाद, 20 फरवरी, 2019।
यहाँ हिंदी प्रचार सभा, नामपल्ली परिसर में कादंबिनी क्लब के तत्वावधान में आयोजित एक सादा समारोह में उस्मानिया विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉ. शुभदा वांजपे के हाथों चिरक इंटरनेशनल में कार्यरत डॉ. मंजु शर्मा की पुस्तक 'नासिरा शर्मा का स्त्री विमर्श' का लोकार्पण संपन्न हुआ। समारोह की अध्यक्षता हैदराबाद की वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अहिल्या मिश्र ने की। लेखिका की उपलब्धियों  और पुस्तक की विषयवस्तु पर प्रवीण प्रणव और अवधेश कुमार सिन्हा ने चर्चा की। पहली प्रति 'स्रवंति' की सहसंपादक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा को समर्पित की गई जिसे उनके प्रतिनिधि ने स्वीकार किया। डॉ. ऋषभदेव शर्मा और मुरली मनोहर भटनागर ने शुभकामनाएँ दीं। साथ ही, साहित्य मंथन और कादंबिनी क्लब की ओर से लेखिका का सारस्वत अभिनंदन किया गया। संचालन मीना मुथा ने किया।

                                - समीक्षा शर्मा, हैदराबाद


रविवार, 13 जनवरी 2019

डॉ. मंजु शर्मा श्रीनाथद्वारा में सारस्वत सम्मान से अलंकृत


हैदराबाद, 5 जनवरी, 2019. 
चिरेक इंटरनेश्नल स्कूल की हिंदी विभाग अध्यक्ष डॉ. मंजु शर्मा को श्रीनाथद्वारा में आयोजित विशाल सम्मान समारोह में श्रीनाथद्वारा साहित्य मंडल एवं केन्द्रीय हिंदी संस्थान के सयुंक्त तत्वावधान में ‘ललितशंकर दीक्षित स्मृति सम्मान’ से अलंकृत किया गया। यह सम्मान उन्हें दक्षिण भारत में रहकर हिंदी भाषा और साहित्य की उत्कृष्ट सेवा के लिए विनोद बब्बर और किशोर काबरा जैसे साहित्यकारों की उपस्थिति में डॉ. बीना शर्मा और श्यामजी देवपुरा ने प्रदान किया। सम्मान के अंतर्गत श्रीफल, प्रमाणपत्र, अंगवस्त्र, मेवाती पगड़ी और नकद धनराशि शामिल है | 

कार्यक्रम के अंतर्गत कुल 7 विचार सत्र संपन्न हुए जिनमें हिंदी भाषा और साहित्य के विविध पक्षों और समस्याओं पर गहन मंथन हुआ। डॉ. मंजु शर्मा ने ‘दक्षिण में हिंदी की स्थिति’ परअपना आलेख प्रस्तुत किया. उन्होंने यह सुझाव दिया कि दक्षिण में हिंदी की स्वीकार्यता को भावनात्मक स्तर पर बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है कि हिंदी भाषी प्रान्तों में बच्चों को प्राथमिक स्तर से ही एक दक्षिण भारतीय भाषा की शिक्षा दी जाए। उनके इस प्रस्ताव का उपस्थित विद्वानों ने खुले मन से स्वागत किया। 

तीन दिन के इस समारोह में देशभर से आए हिंदी सेवियों और साहित्यकारों ने भाग लिया जिनमें डॉ. विजय प्रकाश त्रिपाठी (कानपुर), अवधेश शुक्ल (सीतापुर), डॉ सविता चड्ढा(दिल्ली), हेमराज मीणा, कल्पना गवली (बड़ोदरा),अमरेंद्र पत्रकार (लोकसभा चैनल) आदि के नाम प्रमुख हैं। 

[प्रेषक : समीक्षा .manju.samiksha@gmail.com]

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

एलूरु में द्विदिवसीय त्रिभाषी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न

हिंदी भारतीय संस्कृति की संवाहक और दिल की भाषा है - को जोंग किम 

साहित्य यथार्थ की आलोचना करता है – ऋषभदेव शर्मा 

एलूरु (आंध्र प्रदेश, 15 दिसंबर)। 


प्रो. ऋषभदेव शर्मा 
साहित्य का मूल प्रयोजन लोक मंगल की साधना है, न कि मनोरंजन। समाज के लिए जो कुछ भी अशुभ और अमंगलकारी हो सकता है साहित्य उस यथार्थ की आलोचना करता है और मंगलकारी आदर्श की स्थापना करता है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं का भक्ति आंदोलन, नवजागरण आंदोलन और स्वतंत्रता आंदोलन के समय का साहित्य पूरी तरह सुधारात्मक दृष्टिकोण से प्रेरित है। इसी प्रकार समकालीन विमर्शों का साहित्य भी कर्मक्षेत्र के सौंदर्य को सामने लाते हुए सामाजिक परिवर्तन के लिए दिशा प्रदान कर सकता है।"

ये विचार सर सी.आर. रेड्डी (स्वायत्त) महाविद्यालय में आयोजित संस्कृत, तेलुगु और हिंदी के द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के हिंदी केंद्रित विचार-विमर्श के बीज भाषण के दौरान दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के पूर्व आचार्य डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने प्रकट किए। उन्होंने हर्ष व्यक्त किया कि भयंकर मूल्य विघटन और उपभोक्ता संस्कृति से ग्रसित वर्तमान परिस्थितियों में इस प्रकार एक सार्थक सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। उन्होंने कहा कि एक ठेठ तेलुगु प्रदेश में इतने बड़े पैमाने पर हिंदी में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन होना अपूर्व है। 

आंध्र प्रदेश के पूर्व सांसद और
फिल्म विकास निगम के अध्यक्ष अंबिका कृष्ण
भाषा और संस्कृति विभाग, आंध्र प्रदेश सरकार के सहयोग से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रायोजित तथा हिंदी, तेलुगु व संस्कृत विभागों के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में समाज पर भाषा एवं साहित्य के प्रभाव को लेकर कई महत्वपूर्ण चर्चाओं को स्थान मिला। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, पांडिच्चेरी आदि राज्यों के साथ-साथ अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, कोरिया और जापान से आए विद्वानों, हिंदी सेवियों और छात्रों ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर इस सम्मेलन को सफल बनाया। 

दक्षिण कोरिया से पधारे हिंदी लेखक और आलोचक डॉ. को जोंग किम ने कहा कि दक्षिण कोरिया और भारत के बीच बहुत प्राचीनकाल से अच्छे रिश्ते रहे हैं। उन्होंने हिंदी को भारतीय संस्कृति की संवाहक बताते हुए उसे ‘दिल की भाषा’ कहा। 

आंध्र प्रदेश के पूर्व सांसद और फिल्म विकास निगम के अध्यक्ष अंबिका कृष्ण ने अपने संबोधन में तेलुगु भाषा और साहित्य को संरक्षित करने की बता कही तथा उसके आंदोलनात्मक और सुधारवादी चरित्र पर प्रकाश डाला। 

प्रो.एस.वी.एस.एस.नारायण राजु 
हिंदी साहित्य संबंधी विचार सत्रों में समाज और भाषा के संबंध में आंध्र विश्वविद्यालय के प्रो. एन. सत्यनारायण, सैंट जोसेफ महिला महाविद्यालय की डॉ. पी.के.जयलक्ष्मी, नरसापुर के डॉ. कुमार नागेश्वर राव, तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. एस.वी.एस.एस.नारायण राजु, कांचीपुरम विश्वविद्यालय के डॉ. दंडिबोट्ला नागेश्वर राव, नागार्जुन विश्वविद्यालय के डॉ. काकानि कृष्ण, मानु के डॉ. डी. शेषुबाबु, काकिनाडा के डॉ. पी. हरिराम प्रसाद तथा हैदराबाद की डॉ. पूर्णिमा शर्मा सहित अनेक विद्वानों और शोधार्थियों ने शोधपत्र प्रस्तुत किए। 

सर सी.आर.रेड्डी शैक्षिक संस्थाओं के अध्यक्ष श्री कोम्मारेड्डि राम बाबू, महाविद्यालय के कॉरस्पॉन्डन्ट एवं अन्य पदाधिकारियों ने समारोह में भाषा के महत्व पर अपनी राय जताई। समापन समारोह में प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने तेलुगु में भाषण देकर श्रोताओं को अभिभूत कर दिया।


सर सी.आर. रेड्डी (स्वायत्त) महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ.आर.एन.वी.एस.राजाराव और प्राध्यापक के.शैलजा ने अतिथियों का स्वागत और धन्यवाद किया। साथ ही सम्मेलन के दौरान ही शोधपत्रों का संग्रह प्रकाशित करके अपनी कार्य-दीक्षा और लगन का परिचय दिया। 








प्रस्तुति 
डॉ. आर.एन.वी.एस. राजाराव 
सहायक आचार्य 
हिंदी विभाग, सर सी.आर. रेड्डी (स्वायत्त) महाविद्यालय
एलुरु, आंध्र प्रदेश - 5347007
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यहाँ भी....
http://hindimedia.in/hindi-is-the-language-of-indian-culture-and-heart-language-to-jong-kim/

http://www.hindikunj.com/2018/12/hindi-sammelan.html



रविवार, 14 अक्टूबर 2018

"ईश्वर करुण अभिनंदन ग्रंथ" : रचनाएँ 15 नवंबर तक आमंत्रित

चेन्नई निवासी वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार ईश्वर करुण (ईश्वर चंद्र झा) के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित हैदराबाद की साहित्य सेवी संस्था ‘साहित्य मंथन’ द्वारा शीघ्र प्रकाशनाधीन अभिनंदन ग्रंथ के लिए उनके शुभचिंतकों, मित्रों और प्रशंसकों से रचनाएँ आमंत्रित हैं। 

अभिनंदन ग्रंथ के प्रधान संपादक प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने बताया हैं कि देश भर के बहुत से लेखक इस ग्रंथ के लिए अपनी रचनाएँ उपलब्ध कराने वाले हैं। इसलिए त्यौहारों के मौसम की व्यस्थता को देखते हुए रचनाएँ भेजने की तिथि एक महीना आगे बढ़ा दी गई है। अब इस ग्रंथ के लिए रचनाएँ 15 नवंबर, 2018 तक भेजी जा सकती हैं। 

ये रचनाएँ rishabhadeosharma@yahoo.com, neerajagkonda@gmail.com, ishwarkarunchennai@gmail.com पते पर ईमेल द्वारा भेजी जा सकती है। 

- डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा 

शनिवार, 22 सितंबर 2018

"ईश्वर करुण अभिनंदन ग्रंथ" हेतु रचनाएँ आमंत्रित

ईश्वर करुण 
साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था 'साहित्य मंथन' के तत्वावधान में चेन्नै के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार और हिंदीसेवी ईश्वर करुण (ईश्वर चंद्र झा) के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित अभिनंदन ग्रंथ के प्रकाशन की योजना निश्चित हुई है। इस ग्रंथ का संपादन प्रो. ऋषभ देव शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा संयुक्त रूप से करेंगे। संपादकों ने ईश्वर करुण और उनके साहित्य से परिचित लेखकों से अनुरोध किया है कि लगभग 1000 शब्दों में ईश्वर करुण से संबंधित अपना संस्मरण या समीक्षात्मक आलेख अभिनंदन ग्रंथ के लिए उपलब्ध कराएँ। ग्रंथ की प्रकृति के अनुसार आलेख - ईश्वर करुण : जैसा मैंने देखा (अंतरंग संस्मरण), कवि सम्मेलनों का लाड़ला रचनाकार ईश्वर करुण, ईश्वर करुण और उनके गीत, हिंदी ग़ज़ल को ईश्वर करुण की देन, पत्रकार और संपादक ईश्वर करुण, राजभाषा अधिकारी के रूप में ईश्वर करुण की उपलब्धियाँ, ईश्वर करुण की कहानियों में समकालीन समाज, नई कविता और ईश्वर करुण की रचनाधर्मिता, ईश्वर करुण के साहित्य में मैथिल लोक, ईश्वर करुण के साहित्य में चेन्नई की धड़कन, इलेक्ट्रानिक जनसंचार : ईश्वर करुण की उपलब्धियाँ, ईश्वर करुण के काव्य में लालित्य आदि विषयों पर केंद्रित हो सकते हैं। 

यह सामग्री rishabhadeosharma@yahoo.com , neerajagkonda@gmail.com, ishwar_karun@yahoo.co.in पते पर ईमेल द्वारा भेजी जा सकती है। 

रविवार, 2 सितंबर 2018

मारीशस में रामकथा पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियाँ और सम्मान समारोह संपन्न


मुंबई।(प्रेस विज्ञप्ति)। 2 सितंबर,2018।

भारत और मारीशस का संबंध दुनिया के किन्हीं अन्य दो देशों से बिलकुल अलग किस्म का है। मारीशस अपनी पहचान और इतिहास की जड़ें खोजने के लिए भारत की ओर देखता है। हिंदी भाषा और रामकथा के मजबूत धागों से इन दोनों देशों के रिश्ते बुने हुए हैं। मारीशस की नई पीढ़ी को अपने पुरखों की ज़मीन से जोड़े रखने के लिए हमें हिंदी और राम की आज भी ज़रूरत है। 


 ये विचार पिछले दिनों विश्व हिंदी सम्मेलन के संदर्भवश मारीशस गए साहित्यिक-सांस्कृतिक शोध संस्था, मुंबई के प्रतिनिधिमंडल के सम्मान में महात्मा गांधी संस्थान, मारीशस के सुब्रह्मण्य भारती सभागार में वहाँ के हिंदी छात्रों के निमित्त आयोजित एक विशिष्ट परिसंवाद (एन इंटेरेक्टिव सेशन)का उदघाटन करते हुए महात्मा गांधी संस्थान की निदेशक डॉ. विद्योत्तमा कुंजल ने प्रकट किए। छात्रों को संबोधित करने वाले विद्वानों में मारीशस के प्रो. हेमराज सुंदर, प्रो. अलका धनपत और प्रो. प्रीति हरदयाल, रूस के डॉ. रामेश्वर सिंह और नादिया सिंह तथा भारत के प्रो. संतप्रसाद गौतम, प्रो. प्रदीप कुमार सिंह, प्रो. प्रदीप के. शर्मा और प्रो. हरिमोहन के नाम सम्मिलित है। 


दूसरे चरण में हिंदी प्रचारिणी सभा, मारीशस में “वैश्विक राम की कथायात्रा” पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह संपन्न हुआ। अध्यक्षता करते हुए सभा के वर्तमान प्रधान डॉ. यंतु देव बुधु ने मारीशस में हिंदी के इतिहास और हिंदीसेवियों के संघर्ष पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि के रूप में सभा के मंत्री धनराज शंभु और कोषाध्यक्ष टहल रामदीन ने संबोधित किया। विषयविशेषज्ञ के रूप में कुलपति प्रो. एसपी गौतम ने जिज्ञासाओं का समाधान किया। 



अवसर पर मारीशस, रूस और भारत के 50 हिंदी सेवियों को हिंदी प्रचारिणी सभा, मारीशस और साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था, मुंबई की ओर से “अंतरराष्ट्रीय हिंदीसेवी सम्मान” से अलंकृत किया गया तथा विभिन्न विधाओं की 12 पुस्तकें लोकार्पित की गईं। दोनों आयोजनों का संचालन प्रो. ऋषभदेव शर्मा और डॉ. सत्यनारायण ने किया। धन्यवाद प्रो. प्रदीप कुमार सिंह और डॉ. सतीश कनौजिया ने व्यक्त किया। 


प्रेषक- सतीश कनौजिया, 
प्रबंधक, साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था, 
उल्हासनगर, मुंबई, भारत