रविवार, 3 मार्च 2019

(पुस्तक) संपादकीयम् : आभार/अनुक्रम





आभार
संपादकीयम् पिछले कुछ महीनों में समसामयिक विषयों पर लिखी मेरी कुछ टिप्पणियों का संग्रह है। इन टिप्पणियों को हैदराबाद के प्रतिष्ठित और यशस्वी दैनिक समाचार पत्र डेली हिंदी मिलाप ने अपने संपादकीय पृष्ठ पर स्थान दियाइस हेतु संपादक महोदय सहित समस्त मिलाप’ परिवार के प्रति आभारी हूँ। साथ ही, इस दिशा में प्रेरित करने वाले रवि श्रीवास्तव जी के समक्ष शब्दहीन हूँ।

बिखरी हुई सामग्री को पुस्तक का रूप प्रदान करने के लिए सौभाग्यवती डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा को तो मेरा रोम-रोम असीसता है। 

26 जनवरी, 2019                                                               - ऋषभ




अनुक्रम
      खंड 1
1.       नोबेल शांति पुरस्कार : एक असाधारण वीरांगना को
2.      बोलने वाली औरतें बनाम पुरुष प्रधान समाज
3.      जबकि हर पुरुष स्वयं आयोग है
4.      विवाहेतर संबंध : निजता बनाम नैतिकता
5.      परंपरा के नाम पर भेदभाव कब तक
6.      समानता और पूजा-पद्धति के अधिकारों का टकराव
7.      सुपौल से बॉलीवुड तक पीड़ित बेटियाँ
8.      बेटियों के सामने शर्मिंदा एक महादेश
9.      सबसे खतरनाक जगह : घर?
10.   अमानुषिक है प्रथा के नाम पर औरत पर बर्बरता
11.    एक स्त्री-विरोधी कुप्रथा से मुक्ति
12.   मुस्लिम स्त्री के मानवाधिकार की खातिर
खंड 2
13.   भारतीय संविधान के बावजूद अन्य संविधान क्यों?
14.   उपेक्षित लद्दाख का दर्द
15.   रिश्ता वोट का शराब से
16.   मतदाता की उदासीनता का अर्थ
17.   राजनीति की भाषा में बढ़ती अशिष्टता
18.   जाति और गोत्र की वेदी पर लोकतंत्र
19.   क्या बदल रहा है भाजपा का भी चरित्र
20.  सवर्ण आरक्षण :  हल या छल?
21.   विरोध भी, समर्थन भी : खूबी लोकतंत्र की
22.  ज़ोर-आजमाइश से पहले शक्ति-प्रदर्शन
23.  चुनाव का मौसम और डांस बार
खंड 3
24.  सबका अन्नदाता हड़ताल पर है !?
25.  अन्नदाता से दिल्ली दूर क्यों ?
26.  कर्ज माफ करने की राजनीति
27.  आत्महत्याओं का इलाज़ कर्जमाफ़ी नहीं
खंड 4
28.  अब जिसे भी देखिए, उस पर गुलेलें हैं
29.  लोकतंत्र को कलंकित करता भीड़-न्याय
30.  अब  किसके पिता की बारी है?
31.   न्याय का शासन
32.  कैसे टूटेगा फेक न्यूज़ का चक्रव्यूह?
33.  ऊपरवाला देख रहा है
खंड 5
34.  अल्पसंख्यकों का स्वर्ग
35.  इंतज़ाम की पोल खोलती पहली बारिश
36.  ये मौत की सड़कें...
37.  बिन पानी सब सून
38.  ये सेप्टिक टैंक साफ करने वाले...
39.  हिंसा के महिमामंडन का दुष्परिणाम
खंड 6
40.  हिंसा और हताशा
41.   आधुनिक गुलामी और हम
42.  क्यों होती हैं बुराड़ी जैसी भीषण घटनाएँ
43.  तो शब्दकोश में नहीं रहेगा दलित ?
44. प्रणय की हत्या, प्रतिष्ठा के नाम पर !
45.  तुम्हारी जाति क्या है, डॉक्टर?
46.  मंदिर प्रवेश : समाज सुधार या राजनीति
खंड 7
47.  ये बच्चे भारत के नागरिक नहीं?
48.  सुरक्षित नहीं हैं हमारे बच्चे
49.  असहाय और असुरक्षित बुढ़ापा
50.  भुखमरी : सब पर अभिशाप !
51.   विकास बनाम भुखमरी
52.  धरती का बढ़ता बुखार
53.  ...तो क्या समुद्र में समा जाएँगे तटीय शहर?
54.  जलाओ पटाखे पर रहे ध्यान इतना...
खंड 8
55.  दुर्गा पूजा में विदेशी रुचि का अर्थ
56.  लद गए वैश्वीकरण के दिन ?
57.  आतंक बनाम सभ्य रिश्तों का पाखंड
58.  हथियार चमका रहा ड्रैगन!
59.  संयुक्त राष्ट्र की बंधक स्थिति
60.  अंतरिक्ष पर कब्जे की खातिर
61.   युद्ध करना नहीं, शांति लाना है बहादुरी
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छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘मोर दुलरुआ’ और बड़का दाई’ लोकार्पित



मैसूर, 28 फरवरी, 2019।

केंद्रीय हिंदी संस्थान के व्याख्यान कक्ष में संपन्न क्षेत्रीय निदेशक डॉ. राम निवास साहू के सेवा निवृत्ति समारोह के अवसर पर उनकी दो छत्तीसगढ़ी पुस्तकों 'मोर दुलरुआ' (जीवनीपरक उपन्यास) और 'बड़का दाई' (अनुवाद : डॉ. गीता शर्मा) का लोकार्पण किया गया। अध्यक्षता मैसूर विश्वविद्यालय की प्रो. प्रतिभा मुदलियार ने की। बतौर मुख्य अतिथि लोकार्पण प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने किया। एनसीईआरटी के डॉ. सर्वेश मौर्य और केंद्रीय हिंदी संस्थान के डॉ. परमान सिंह ने लोकार्पित पुस्तकों की समीक्षा प्रस्तुत की। वल्लभविद्यानगर से पधारे डॉ. योगेन्द्रनाथ मिश्र तथा हैदराबाद से पधारे चंद्रप्रताप सिंह ने शुभाशंसा व्यक्त की। इस अवसर पर आशा रानी साहू, शशिकांत साहू, श्रीकांत साहू और श्रीदेवी साहू ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। नराकास-मैसूर के प्रतिनिधियों के अलावा डॉ साहू के गृहनगर कोरबी-छत्तीसगढ़ से आए समूह के सदस्यों ने भी उत्साहपूर्वक भागीदारी निबाही।

शुक्रवार, 1 मार्च 2019

'भाषा : राष्ट्रीयता, समन्वय और समरसता' पर व्याख्यान संपन्न


धारवाड़, 26 फरवरी, 2019।  

"भाषा किसी राष्ट्र की बुनियाद होती है। वही अलग-अलग समुदायों को इस तरह बाँध कर रख सकती है कि बड़े से बड़े हमले में भी देश की संरचना बिखरने न पाए। भाषा को यह शक्ति उसमें छिपे जन-संस्कृति के सूत्रों से मिलती है। इसलिए किसी भाषा को इस्तेमाल करना सीखना ही काफी नहीं होता। बल्कि उसमें निहित सांस्कृतिक तत्वों की पहचान भी ज़रूरी होती है। अनेक बोलियों और भाषाओं के बीच संपर्क का काम करते-करते संस्कृति की दृष्टि से हिंदी अत्यंत समृद्ध भाषा बन गई है तथा अपने विपुल मौलिक और अनूदित साहित्य के माध्यम से वह भारत की राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतिनिधित्व करती है। भक्ति साहित्य और नव जागरण काल के साहित्य द्वारा हिंदी ने राष्ट्रीय समन्वय और समरसता को पुष्ट किया था। वर्तमान में भी वह विघटनकारी ताकतों को पहचान कर जनता को सावधान कर रही है और सह-अस्तित्व के भाव को पुख्ता करने के लिए प्रयासरत है।"

ये विचार प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने कर्नाटक विश्वविद्यालय में विभिन्न भाषा-साहित्य और कला विषयों के प्राध्यापकों को संबोधित करते हुए प्रकट किए। वे विश्वविद्यालय के मानव संसाधन विकास केंद्र में संपन्न पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के तहत “भाषा : राष्ट्रीयता, समन्वय और समरसता” विषय पर दो-सत्रीय व्याख्यानमाला में बोल रहे थे। कार्यक्रम में कर्नाटक के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए 65 प्राध्यापकों ने भाग लिया। डॉ. साहिबहुसैन जहगीरदार के धन्यवाद के साथ व्याख्यानमाला का समापन हुआ। 

बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

डॉ. मंजु शर्मा की पुस्तक 'कथाकार नासिरा शर्मा का स्त्री विमर्श' लोकार्पित


मंजु शर्मा की पुस्तक 'नासिरा शर्मा का स्त्री विमर्श' लोकार्पित
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हैदराबाद, 20 फरवरी, 2019।
यहाँ हिंदी प्रचार सभा, नामपल्ली परिसर में कादंबिनी क्लब के तत्वावधान में आयोजित एक सादा समारोह में उस्मानिया विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉ. शुभदा वांजपे के हाथों चिरक इंटरनेशनल में कार्यरत डॉ. मंजु शर्मा की पुस्तक 'नासिरा शर्मा का स्त्री विमर्श' का लोकार्पण संपन्न हुआ। समारोह की अध्यक्षता हैदराबाद की वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अहिल्या मिश्र ने की। लेखिका की उपलब्धियों  और पुस्तक की विषयवस्तु पर प्रवीण प्रणव और अवधेश कुमार सिन्हा ने चर्चा की। पहली प्रति 'स्रवंति' की सहसंपादक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा को समर्पित की गई जिसे उनके प्रतिनिधि ने स्वीकार किया। डॉ. ऋषभदेव शर्मा और मुरली मनोहर भटनागर ने शुभकामनाएँ दीं। साथ ही, साहित्य मंथन और कादंबिनी क्लब की ओर से लेखिका का सारस्वत अभिनंदन किया गया। संचालन मीना मुथा ने किया।

                                - समीक्षा शर्मा, हैदराबाद


रविवार, 13 जनवरी 2019

डॉ. मंजु शर्मा श्रीनाथद्वारा में सारस्वत सम्मान से अलंकृत


हैदराबाद, 5 जनवरी, 2019. 
चिरेक इंटरनेश्नल स्कूल की हिंदी विभाग अध्यक्ष डॉ. मंजु शर्मा को श्रीनाथद्वारा में आयोजित विशाल सम्मान समारोह में श्रीनाथद्वारा साहित्य मंडल एवं केन्द्रीय हिंदी संस्थान के सयुंक्त तत्वावधान में ‘ललितशंकर दीक्षित स्मृति सम्मान’ से अलंकृत किया गया। यह सम्मान उन्हें दक्षिण भारत में रहकर हिंदी भाषा और साहित्य की उत्कृष्ट सेवा के लिए विनोद बब्बर और किशोर काबरा जैसे साहित्यकारों की उपस्थिति में डॉ. बीना शर्मा और श्यामजी देवपुरा ने प्रदान किया। सम्मान के अंतर्गत श्रीफल, प्रमाणपत्र, अंगवस्त्र, मेवाती पगड़ी और नकद धनराशि शामिल है | 

कार्यक्रम के अंतर्गत कुल 7 विचार सत्र संपन्न हुए जिनमें हिंदी भाषा और साहित्य के विविध पक्षों और समस्याओं पर गहन मंथन हुआ। डॉ. मंजु शर्मा ने ‘दक्षिण में हिंदी की स्थिति’ परअपना आलेख प्रस्तुत किया. उन्होंने यह सुझाव दिया कि दक्षिण में हिंदी की स्वीकार्यता को भावनात्मक स्तर पर बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है कि हिंदी भाषी प्रान्तों में बच्चों को प्राथमिक स्तर से ही एक दक्षिण भारतीय भाषा की शिक्षा दी जाए। उनके इस प्रस्ताव का उपस्थित विद्वानों ने खुले मन से स्वागत किया। 

तीन दिन के इस समारोह में देशभर से आए हिंदी सेवियों और साहित्यकारों ने भाग लिया जिनमें डॉ. विजय प्रकाश त्रिपाठी (कानपुर), अवधेश शुक्ल (सीतापुर), डॉ सविता चड्ढा(दिल्ली), हेमराज मीणा, कल्पना गवली (बड़ोदरा),अमरेंद्र पत्रकार (लोकसभा चैनल) आदि के नाम प्रमुख हैं। 

[प्रेषक : समीक्षा .manju.samiksha@gmail.com]

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

एलूरु में द्विदिवसीय त्रिभाषी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न

हिंदी भारतीय संस्कृति की संवाहक और दिल की भाषा है - को जोंग किम 

साहित्य यथार्थ की आलोचना करता है – ऋषभदेव शर्मा 

एलूरु (आंध्र प्रदेश, 15 दिसंबर)। 


प्रो. ऋषभदेव शर्मा 
साहित्य का मूल प्रयोजन लोक मंगल की साधना है, न कि मनोरंजन। समाज के लिए जो कुछ भी अशुभ और अमंगलकारी हो सकता है साहित्य उस यथार्थ की आलोचना करता है और मंगलकारी आदर्श की स्थापना करता है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं का भक्ति आंदोलन, नवजागरण आंदोलन और स्वतंत्रता आंदोलन के समय का साहित्य पूरी तरह सुधारात्मक दृष्टिकोण से प्रेरित है। इसी प्रकार समकालीन विमर्शों का साहित्य भी कर्मक्षेत्र के सौंदर्य को सामने लाते हुए सामाजिक परिवर्तन के लिए दिशा प्रदान कर सकता है।"

ये विचार सर सी.आर. रेड्डी (स्वायत्त) महाविद्यालय में आयोजित संस्कृत, तेलुगु और हिंदी के द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के हिंदी केंद्रित विचार-विमर्श के बीज भाषण के दौरान दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के पूर्व आचार्य डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने प्रकट किए। उन्होंने हर्ष व्यक्त किया कि भयंकर मूल्य विघटन और उपभोक्ता संस्कृति से ग्रसित वर्तमान परिस्थितियों में इस प्रकार एक सार्थक सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। उन्होंने कहा कि एक ठेठ तेलुगु प्रदेश में इतने बड़े पैमाने पर हिंदी में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन होना अपूर्व है। 

आंध्र प्रदेश के पूर्व सांसद और
फिल्म विकास निगम के अध्यक्ष अंबिका कृष्ण
भाषा और संस्कृति विभाग, आंध्र प्रदेश सरकार के सहयोग से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रायोजित तथा हिंदी, तेलुगु व संस्कृत विभागों के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में समाज पर भाषा एवं साहित्य के प्रभाव को लेकर कई महत्वपूर्ण चर्चाओं को स्थान मिला। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, पांडिच्चेरी आदि राज्यों के साथ-साथ अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, कोरिया और जापान से आए विद्वानों, हिंदी सेवियों और छात्रों ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर इस सम्मेलन को सफल बनाया। 

दक्षिण कोरिया से पधारे हिंदी लेखक और आलोचक डॉ. को जोंग किम ने कहा कि दक्षिण कोरिया और भारत के बीच बहुत प्राचीनकाल से अच्छे रिश्ते रहे हैं। उन्होंने हिंदी को भारतीय संस्कृति की संवाहक बताते हुए उसे ‘दिल की भाषा’ कहा। 

आंध्र प्रदेश के पूर्व सांसद और फिल्म विकास निगम के अध्यक्ष अंबिका कृष्ण ने अपने संबोधन में तेलुगु भाषा और साहित्य को संरक्षित करने की बता कही तथा उसके आंदोलनात्मक और सुधारवादी चरित्र पर प्रकाश डाला। 

प्रो.एस.वी.एस.एस.नारायण राजु 
हिंदी साहित्य संबंधी विचार सत्रों में समाज और भाषा के संबंध में आंध्र विश्वविद्यालय के प्रो. एन. सत्यनारायण, सैंट जोसेफ महिला महाविद्यालय की डॉ. पी.के.जयलक्ष्मी, नरसापुर के डॉ. कुमार नागेश्वर राव, तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. एस.वी.एस.एस.नारायण राजु, कांचीपुरम विश्वविद्यालय के डॉ. दंडिबोट्ला नागेश्वर राव, नागार्जुन विश्वविद्यालय के डॉ. काकानि कृष्ण, मानु के डॉ. डी. शेषुबाबु, काकिनाडा के डॉ. पी. हरिराम प्रसाद तथा हैदराबाद की डॉ. पूर्णिमा शर्मा सहित अनेक विद्वानों और शोधार्थियों ने शोधपत्र प्रस्तुत किए। 

सर सी.आर.रेड्डी शैक्षिक संस्थाओं के अध्यक्ष श्री कोम्मारेड्डि राम बाबू, महाविद्यालय के कॉरस्पॉन्डन्ट एवं अन्य पदाधिकारियों ने समारोह में भाषा के महत्व पर अपनी राय जताई। समापन समारोह में प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने तेलुगु में भाषण देकर श्रोताओं को अभिभूत कर दिया।


सर सी.आर. रेड्डी (स्वायत्त) महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ.आर.एन.वी.एस.राजाराव और प्राध्यापक के.शैलजा ने अतिथियों का स्वागत और धन्यवाद किया। साथ ही सम्मेलन के दौरान ही शोधपत्रों का संग्रह प्रकाशित करके अपनी कार्य-दीक्षा और लगन का परिचय दिया। 








प्रस्तुति 
डॉ. आर.एन.वी.एस. राजाराव 
सहायक आचार्य 
हिंदी विभाग, सर सी.आर. रेड्डी (स्वायत्त) महाविद्यालय
एलुरु, आंध्र प्रदेश - 5347007
....
यहाँ भी....
http://hindimedia.in/hindi-is-the-language-of-indian-culture-and-heart-language-to-jong-kim/

http://www.hindikunj.com/2018/12/hindi-sammelan.html