सोमवार, 13 जुलाई 2015

उत्तर आधुनिकता, साहित्य और मीडिया पर एक उपयोगी पुस्तक

पुस्तक : ''उत्तरआधुनिकता : साहित्य और मीडिया''
संपादक : ऋषभदेव शर्मा, गुर्रमकोंडा नीरजा 
प्रकाशक : जगत भारती प्रकाशन , सी-3, 77 दूरवाणी नगर, 
एडीए, नैनी, इलाहाबाद-211008 / मो. 09936079167.
संस्करण : 2015.
ISBN : 978-93-5104-236-5.
पृष्ठ : 135.
मूल्य : 295 रुपए (हार्ड बाउंड).




पुस्तक समीक्षा

उत्तर आधुनिकता, साहित्य और मीडिया पर एक उपयोगी पुस्तक 

यों तो उत्तर आधुनिक विमर्श पर केंद्रित अनेक पुस्तकें बाजार में उपलब्ध हैं जो विद्वत्तापूर्ण सामग्री से लबरेज हैं, किंतु उनकी एक बड़ी सीमा यह है कि प्रायः विद्वत्ता के बोझ के कारण विषय की संप्रेषणीयता खतरे में पड़ जाती है और सामान्य पाठक कोई दिशा प्राप्त करने के बजाय फतवेबाजी के भवंरजाल में फँसकर रह जाता है. ऐसी क्लिष्ट पांडित्यपूर्ण पुस्तकों के नीचे दबे पाठक को ऋषभदेव शर्मा और गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा संपादित ‘उत्तर आधुनिकता : साहित्य और मीडिया’ (2015) को देख-पढ़कर अवश्य ही ताजी हवा के झोंके का अहसास होगा. इसमें दो राय नहीं कि हिंदी साहित्य और समसामयिक मीडिया की विभिन्न विधाओं और धाराओं को कथ्य, रूप, भाषा और प्रस्तुती के स्तर पर उत्तर आधुनिक विमर्श ने गहराई तक प्रभावित किया है. ख़ासतौर से हाशिए के समुदायों की अधिकारचेतना की जो अभिव्यक्ति लिखित और मौखिक शब्द के माध्यम से पिछले दशकों में निरंतर तीव्रतर होती गई है, वह उत्तर आधुनिकता का ही प्रताप है – भले ही हम उसे दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श, पर्यावरण विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, किन्नर विमर्श, समलैंगिक विमर्श, मीडिया विमर्श जैसे अनेकानेक बहुकेंद्रीयता सूचक नाम देते रहें. दरअसल यह लोतांत्रिक बहुकेंद्रीयता ही उत्तर आधुनिक विमर्श की पहचान और उपलब्धी है. इसे सरल-सहज ढंग से रेखांकित करने में प्रस्तुत पुस्तक पूर्णतः सफल है. इस हेतु संपादकद्वय और पुस्तक में सम्मिलित लेखकगण साधुवाद के पात्र हैं. 

उत्तर आधुनिक विमर्श को पाठ, संरचना और उत्तर संरचना के संदर्भ में नए आयाम प्रादान करेने वाला प्रो. दिलीप सिंह का आलेख ‘उत्तर आधिनिक विमर्श : एक बहस’ इस पुस्तक का घोषणापत्र कहा जा सकता है जिसमें यह दर्शाया गया है कि ‘भाषा और साहित्य के स्तर पर हिंदी में उत्तर आधुनिकता के लक्ष्ण भारतेंदु युग से ही दिखाई देने लगते हैं तथा आज समाज और संस्कृति को प्रभावित करने वाले तमाम ज्वलंत मुद्दे उत्तर आधुनिक हैं.’ इसके अतिरिक्त प्रो. एम. वेंकटेश्वर का ‘उत्तर आधुनिक विमर्श का स्वरूप’ और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा का ‘विभिन्नता की बुनियाद पर उत्तर आधुनिक विमर्श’ भी उत्तर आधुनिकता की सैद्धांतिकी की सरल शब्दों में व्याख्या करने वाले आलेख हैं. डॉ. मृत्युंजय सिंह के ‘मत कहो आकाश में कुहरा घना है’ और डॉ. बलविंदर कौर के ‘उत्तर आधुनिक विमर्श और पहचान का संकट’ शीर्षक आलेखों में भी इस विमर्श को खोलने की खोशिश दिखाई देती है जबकि डॉ. पेरिसेट्टि श्रीनिवास राव और डॉ. भीम सिंह ने अपने आलेखों में क्रमशः स्त्री और दलित लेखन के सवाल उठाए हैं. आदिवासी संदर्भ डॉ. घनश्याम और डॉ. प्रणव कुमार ठाकुर के आलेखों में बखूबी विवेचित है. डॉ. करन सिंह ऊटवाल का लेख नाटक और रंगमंच की उत्तर आधुनिकता को खोजता है तो डॉ. विष्णु भगवान शर्मा उत्तर आधुनिक भाषा संकट के संदर्भ में राजभाषा हिंदी से जुड़े विचारोत्तेजक प्रश्न उठाते दिखाई देते हैं. 

यह तो हुई उत्तर आधुनिकता की सैद्धांतिकी तथा साहित्य और भाषा पर पड़ रही उसकी छाया की बात. प्रो. गोपाल शर्मा इनसे आगे बढ़कर समकालीन मीडिया लेखन और उत्तर आधुनिक मीडिया विमर्श की पड़ताल करते हैं जबकि डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा प्रयोजनमूलक हिंदी और प्रिंट मीडिया पर दैनिक पत्रों के संदर्भ में प्रकाश डालते हुए यह दर्शाती है कि उत्तर आधुनिकता के विस्फोट के कारण हिंदी में नई नई प्रयुक्तियों तथा उप-प्रयुक्तियों का विकास अत्यंत शुभलक्ष्ण है. 

डॉ. ऋषभदेव शर्मा के इस पुस्तक में चार आलेख हैं. एक आलेख में उन्होंने भूमंडलीकरण की चुनौतियों के साथ जोड़कर मीडिया के रूपों और हिंदी के स्वरूप पर चर्चा की है तो दूसरे में उत्तर आधुनिक मीडिया और साहित्य के संबंधों की पड़ताल की है. उनका तीसरा आलेख कुछ हटकर है – ‘स्त्री और उपभोक्ता संस्कृति’. इसमें यह प्रतिपादित किया गया है कि उपभोक्तावाद और उपभोक्ता संस्कृति दो भिन्न चीजें हैं तथा स्त्री समूह उपभोक्ता संस्कृति के निर्माण में रचनात्मक भूमिका निभाकर स्त्री को ‘भोग्या’ छवि से निकालकर ‘नारी से नागरिक’ बनाने की क्षमता रखते हैं. डॉ. शर्मा का अंतिम आलेख ‘हिंदी सिनेमा की उत्तर आधुनिकता’ अपने आप में एक पूरे शोधप्रबंध की रूपरेखा सरीखा है जिसमें उत्तर आधुनिक कला के बारह लक्षणों का प्रतिपादन करते हुए हिंदी सिनेमा की विवेचना की गई है. कहना न होगा कि यह शोधपूर्ण आलेख इस पुस्तक को अत्यंत मूल्यवान बनाने में समर्थ है. 

कुलमिलाकर ‘उत्तर आधुनिकता : साहित्य और मीडिया’ संदर्भित विषय पर एक ऐसी पुस्तक है जिसे छात्र और शोधार्थी तो उपयोगी पाएँगे ही सामान्य जिज्ञासु पाठक भी रोचक और जानकारीपूर्ण पाएँगे. 

- अमन कुमार 
सह-संपादक ‘मनमीत’ और ‘शार्प रिपोर्टर’ 
 ए 7, आदर्श नगर, नजीबाबाद – 246763 
मोबाइल – 09897742814 
ईमेल - amankumarnbd@gmail.com 

शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

25 वें आनंदऋषि साहित्य पुरस्कार हेतु डॉ. एम. रंगय्या चयनित

25 वां आनंदऋषि  साहित्य पुरस्कार 78 वर्षीय तेलुगुभाषी कवि डॉ. एम. रंगय्या को हिंदी में उनके मौलिक साहित्य सृजन के लिए प्रदान किए जाने की घोषणा की गई है. 

शुक्रवार, 22 मई 2015

अंडमान निकोबार की लेखिका डॉ. एन. लक्ष्मी के ग्रंथ का लोकार्पण 25 को

हैदराबाद, 22 मई (मीडिया विज्ञप्ति).

‘साहित्य मंथन’ के तत्वावधान में पोर्ट ब्लेयर (अंडमान निकोबार द्वीप समूह) से पधारी युवा लेखिका डॉ. एन. लक्ष्मी के ग्रंथ ‘कथाभाषा और काव्यभाषा का समाजभाषिक संदर्भ’ का लोकार्पण दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के खैरताबाद स्थित सभाकक्ष में आगामी सोमवार दिनांक 25 मई को सायं 4.30 बजे प्रो. ऋषभदेव शर्मा के हाथों संपन्न होगा. लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. एम. वेंकटेश्वर करेंगे. कादंबिनी क्लब की अध्यक्ष डॉ. अहिल्या मिश्र तथा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, आंध्र के सचिव सी. एस. होसगौडर के सान्निध्य में संपन्न होने वाले इस कार्यक्रम में ‘मनमीत’ के संपादक अमन कुमार त्यागी, शार्प रिपोर्टर के संपादक अरविंद कुमार सिंह, डॉ. अर्पणा दीप्ति, डॉ. शिवकुमार राजौरिया और के. नागेश्वर राव विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे. 

‘साहित्य मंथन’ की संयोजक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने बताया कि ‘कथाभाषा और काव्यभाषा का समाजभाषिक संदर्भ’ शीर्षक पुस्तक में डॉ. एन. लक्ष्मी ने समाजभाषाविज्ञान और शैलीविज्ञान के सिद्धांतों का समन्वय करते हुए प्रेमचंद से लेकर संजीव तक के उपन्यासों व कहानियों तथा मैथिलीशरण गुप्त से लेकर जितेंद्र श्रीवास्तव तक की कविताओं की भाषाशैली के सामाजिक संदर्भ का पहली बार गहन विश्लेषण किया है. उल्लेखनीय है कि यह पुस्तक प्रसिद्ध समाज शैलीवैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह को समर्पित है. संयोजक डॉ. जी. नीरजा ने सभी साहित्य प्रेमियों और शोधार्थियों से कार्यक्रम में उपस्थित होने का अनुरोध किया है. 

डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा
संयोजक ‘साहित्य मंथन’

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

साहित्य गरिमा पुरस्कार-2014 महिला रचनाकार की ''मौलिक सृजनात्मक कथेतर गद्य विधा की रचना '' पर





हैदराबाद, 12 अप्रैल 2015 [रविवार]. 

साहित्य गरिमा पुरस्कार समिति -2014 के संबंध में आयोजित बैठक में तय किया गया कि -
1. हर वर्ष की भाँति इस पुरस्कार के लिए केवल 'महिला रचनाकार' ही पात्र होंगी तथा पुरस्कार उनकी किसी 'एक' प्रकाशित पुस्तक पर प्रदान किया जाएगा.
2. पुरस्कार के लिए केवल हिंदी की  निर्धारित विधा की पुस्तकें ही विचारणीय होंगी.
3. प्रत्याशी रचनाकार को  ''तेलंगाना/ आंध्र प्रदेश/ तमिलनाडु/ कर्नाटक/  केरल/ महाराष्ट्र/ गुजरात/ पांडिचेरी/ गोवा''  का निवासी होना चाहिए.
4. इस वर्ष के पुरस्कार के लिए 2010 से 2014 की अवधि में प्रकाशित पुस्तकें ही विचारार्थ स्वीकार की जाएंगी.
5. इस वर्ष का साहित्य गरिमा पुरस्कार ''मौलिक सृजनात्मक कथेतर गद्य विधा की रचना '' पर दिया जाएगा जिसके अंतर्गत आलोचना/समीक्षा सम्मिलित नहीं हैं.