रविवार, 14 अगस्त 2016
मंगलवार, 5 जुलाई 2016
मंगलवार, 21 जून 2016
‘वृद्धावस्था विमर्श’ तथा ‘संकल्पना’ लोकार्पित
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| ‘संकल्पना’ का लोकार्पण करते हुए डॉ. अहिल्या मिश्र. साथ में, डॉ. मंजु शर्मा, डॉ. एम. वेंकटेश्वर, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, राजेश प्रसाद, प्रो. आनंद राज वर्मा, प्रो. ऋषभदेव शर्मा एवं आलोक राज सक्सेना. |
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| सुधी श्रोता-समुदाय : विनीता शर्मा, डॉ. रमा द्विवेदी, मीना मुथा, नरेंद्र राय, डॉ. बी. सत्यनारायण एवं अन्य |
हैदराबाद, 18 जून 2016 (प्रेस विज्ञप्ति).
साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘साहित्य मंथन’ के तत्वावधान में आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के नामपल्ली स्थित सभाकक्ष में स्व. चंद्रमौलेश्वर प्रसाद कृत ‘वृद्धावस्था विमर्श’ तथा ऋषभदेव शर्मा और गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा संपादित ‘संकल्पना’ शीर्षक दो पुस्तकों का लोकार्पण समारोह भव्यतापूर्वक संपन्न हुआ जिसमें उपस्थित विद्वानों ने हिंदी साहित्य और विमोचित पुस्तकों पर विचार व्यक्त किए.
अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के भारत अध्ययन विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए निरंतर बढ़ती जा रही वृद्धों की आबादी के पुनर्वास को इक्कीसवीं शताब्दी की एक प्रमुख चुनौती बताया और विमोचित कृति ‘वृद्धावस्था विमर्श’ को सामयिक तथा प्रासंगिक पुस्तक माना. उन्होंने अनुसंधान के स्तर की गिरावट पर चिंता जताते हुए इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि ‘संकल्पना’ में प्रकाशित ज़्यादातर शोधपत्र अभिनव, मौलिक और उच्च कोटि के हैं.
स्त्रीविमर्श की पैरोकार और आथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के हैदराबाद अध्याय की संयोजक डॉ. अहिल्या मिश्र ने अध्यक्षीय भाषण में प्राचीन भारतीय समाज में वृद्धों की सम्मानजनक स्थिति की तुलना उनकी वर्तमान हीन दशा से करते हुए विश्वास प्रकट किया कि चंद्रमौलेश्वर प्रसाद की पुस्तक समाज को इस दिशा में नए चिंतन और वृद्धावस्था-नीति के निर्माण की प्रेरणा दे सकती है. दूसरी लोकार्पित पुस्तक ‘संकल्पना’ को उन्होंने शोधार्थियों और शोध निर्देशकों के लिए उपयोगी प्रतिमान की संज्ञा दी.
‘वृद्धावस्था विमर्श’ की प्रथम प्रति स्व. चंद्रमौलेश्वर प्रसाद के पुत्र राजेश प्रसाद तथा वरिष्ठ शिक्षाविद प्रो. आनंद राज वर्मा ने स्वीकार की. इस अवसर पर डॉ. वर्मा ने चंद्रमौलेश्वर प्रसाद के व्यक्तिगत गुणों और साहित्यिक देन की चर्चा करते हुए बताया कि उन्होंने उर्दू साहित्यकारों पर केंद्रित समीक्षात्मक लेखन के अलावा विश्व साहित्य की अनेक अमर कहानियों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया था.
समारोह की समन्वयक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने अतिथियों और विमोच्य कृतियों का परिचय देते हुए बताया कि ‘वृद्धावस्था विमर्श’ विश्वविख्यात अस्तित्ववादी स्त्रीविमर्शकार सिमोन द बुवा के ग्रंथ ‘द ओल्ड एज’ का हिंदी सारानुवाद है तथा ‘संकल्पना’ में दक्षिण भारत के 39 शोधार्थियों के शोधपरक आलेख सम्मिलित हैं जिनका सबंध विविध समकालीन विमर्शों से है. डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने यह जानकारी भी दी कि यथाशीघ्र चंद्रमौलेश्वर प्रसाद द्वारा अनूदित कहानियों को भी पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाएगा और ‘संकल्पना’ की अगली कड़ी के रूप में शोधपत्रों का दूसरा संकलन ‘अन्वेषी’ शीर्षक से प्रस्तुत किया जाएगा.
आरंभ में टी. सुभाषिणी ने सरस्वती-वंदना की और डॉ. पूर्णिमा शर्मा, वर्षा कुमारी, मोनिका शर्मा एवं वी. कृष्णा राव ने उत्तरीय प्रदान कर अतिथियों का स्वागत किया. संतोष विजय मुनेश्वर ने स्वागत-गीत और अर्चना पांडेय ने वर्षा-गीत सुनाकर समां बाँध दिया. संचालन डॉ. मंजु शर्मा ने किया.
समारोह में नाट्यकर्मी विनय वर्मा, वैज्ञानिक डॉ. बुधप्रकाश सागर, राजभाषा अधिकारी लक्ष्मण शिवहरे, सामाजिक कार्यकर्ता द्वारका प्रसाद मायछ, रोहित जायसवाल, राजेंद्र परशाद, गुरु दयाल अग्रवाल, विनीता शर्मा, नरेंद्र राय, कुमार लव, संपत देवी मुरारका, डॉ. करन सिंह ऊटवाल, डॉ. सीमा मिश्र, डॉ. बनवारी लाल मीणा, डॉ. जी. प्रवीणा, डॉ. रमा द्विवेदी, डॉ. वेमूरि हरि नारायण शर्मा, डॉ. बी. सत्य नारायण, डॉ. मिथलेश सागर, डॉ. रियाज़ अंसारी, डॉ. सुमन सिंह, डॉ. श्री ज्ञानमोटे, डॉ. महादेव एम. बासुतकर, डॉ. अर्पणा दीप्ति, डॉ. बी. बालाजी, वी. देवीधर, मोहम्मद आबिद अली, पी. पावनी, अशोक कुमार तिवारी, पूनम जोधपुरी, भंवर लाल उपाध्याय, जी. परमेश्वर, सरिता सुराणा, सुस्मिता घोष और गौसिया सुल्ताना सहित विविध विश्वविद्यालयों और साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े शताधिक विद्वान, लेखक, शोधार्थी और हिंदीसेवी सम्मिलित हुए.
अंत में प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने ‘प्रेम बना रहे!’ कहते हुए आयोजन में सहयोग के लिए सबका आभार व्यक्त किया।
प्रस्तुति : डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, सह संपादक : ‘स्रवंति’,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद -500 004 (तेलंगाना)
गुरुवार, 16 जून 2016
बुधवार, 15 जून 2016
शोधपत्र प्रस्तुति को समर्पित ग्रंथ "संकल्पना" प्रकाशित
(विभिन्न विद्वानों एवं शोधकर्ताओं के 39 शोधपत्रों से सुसज्जित आलोचना-ग्रंथ).
संपादक- डॉ.गुर्रमकोंडा नीरजा और डॉ. ऋषभदेव शर्मा.
ISBN - 978-9384068-21-9.
प्रकाशक - परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद.
वितरक - श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद.
पहला खंड : भाषा विमर्श : सम्मिलित लेखक :
डॉ शिव कुमार राजौरिया, संतोष विजय मुनेश्वर, जी संगीता, डॉ मंजु शर्मा, डॉ सुरैया परवीन, अर्चना पांडेय
डॉ शिव कुमार राजौरिया, संतोष विजय मुनेश्वर, जी संगीता, डॉ मंजु शर्मा, डॉ सुरैया परवीन, अर्चना पांडेय
दूसरा खंड : स्त्रीविमर्श : सम्मिलित लेखक :
डॉ अर्पणा दीप्ति,अंजूपांडेय, गौसिया, नीलोफर, मोनिकादेवी.
डॉ अर्पणा दीप्ति,अंजूपांडेय, गौसिया, नीलोफर, मोनिकादेवी.
तीसरा खंड : दलित विमर्श : सम्मिलित लेखक :
सरला सिंह, सुभाषिणी टी.
सरला सिंह, सुभाषिणी टी.
चौथा खंड : जनजाति विमर्श : सम्मिलित लेखक :
डॉ. अनुपमा तिवारी, अनु कुमारी, विजय लक्ष्मी, विजया चांदावत.
डॉ. अनुपमा तिवारी, अनु कुमारी, विजय लक्ष्मी, विजया चांदावत.
पांचवाँ खंड : संस्कृति विमर्श : सम्मिलित लेखक :
डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह, आलोक राज.सक्सेना, बृजवासी गुप्ता, मीनाक्षी प्र आर के, अर्चना.
डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह, आलोक राज.सक्सेना, बृजवासी गुप्ता, मीनाक्षी प्र आर के, अर्चना.
छठा खंड : पर्यावरण विमर्श : सम्मिलित लेखक :
हेमंता बिष्ट.
हेमंता बिष्ट.
सातवाँ खंड : मीडिया विमर्श : सम्मिलित लेखक :
अमन कुमार.त्यागी, अरविंद कुमारसिंह, विनोद चौरसिया.
अमन कुमार.त्यागी, अरविंद कुमारसिंह, विनोद चौरसिया.
आठवाँ खंड : बालसाहित्य विमर्श : सम्मिलित लेखक :
सुनीताआचार, बी. नवीन, वी. ममता..
सुनीताआचार, बी. नवीन, वी. ममता..
नौवाँ खंड : अनुवाद विमर्श : सम्मिलित लेखक :
पी. पावनी..
पी. पावनी..
दसवाँ खंड :विविधा : सम्मिलित लेखक :
पेरिके झांसी लक्ष्मीबाई, माधुरी तिवारी, प्रभा कुमारी, राम बदन सिंह यादव, नर्मदा आकारपु,
पेरिके झांसी लक्ष्मीबाई, माधुरी तिवारी, प्रभा कुमारी, राम बदन सिंह यादव, नर्मदा आकारपु,
वैजीनाथ, अंजुषा चौहान, यू. सुनीता, अजय कुमार मौर्य.
पुस्तक लोकार्पण समारोह
18 जून 2016 (शनिवार) को
समय : सायं 5.00 बजे
समारोह स्थल : आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी, नामपल्ली, हैदराबाद.
आपकी उपस्थिति सादर प्रार्थित है!!!!!
बुधवार, 24 फ़रवरी 2016
अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान पर गुर्रमकोंडा नीरजा की पुस्तक लोकार्पित
चित्र परिचय :
साहित्य मंथन के तत्वावधान में 19 फरवरी 2016 को दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद में आयोजित समारोह में 'स्रवंति' की सह-संपादक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की पुस्तक
‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ का लोकार्पण करते हुए
अरबामिंच विश्वविद्यालय, इथियोपिया के भाषाविज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. गोपाल शर्मा.
साथ में, प्रो. ऋषभदेव शर्मा, प्रो. मन्नार वेंकटेश्वर,
डॉ. जी. नीरजा एवं ज्योति नारायण.
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‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ का लोकार्पण संपन्न
हैदराबाद, 19 फरवरी
2016.
‘’अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की चर्चा पश्चिम में 1920 ई. के आसपास तब शुरू हुई जब एक देश के सैनिकों को शत्रु देश के सैनिकों की भाषा सीखने की आवश्यकता पड़ी. उस कार्य में ब्लूमफील्ड का विशेष योगदान रहा. 1964 में हैलिडे, मैकिंटोश और स्ट्रीवेंस ने ‘लिंग्विस्टिक साइंस एंड लैंग्वेज टीचिंग’ शीर्षक पुस्तक का सृजन किया. 1999 में विड्डोसन ने ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान’ और ‘भाषाविज्ञान का अनुप्रयोग’ के बीच निहित भेद को स्पष्ट किया. ‘संप्रेषणपरक भाषाशिक्षण’ के आगमन के साथ-साथ अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान को ‘भाषा शिक्षण’ के अर्थ में रूढ़ माना जाने लगा. हिंदी की बात करें तो रवींद्रनाथ श्रीवास्तव ‘हिंदी अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान’ के जनक हैं. उन्होंने अपने समकालीनों के साथ मिलकर इसके अनुवाद विज्ञान, शैलीविज्ञान, पाठ विश्लेषण, समाजभाषाविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान और कम्प्यूटेशनल भाषाविज्ञान जैसे अन्य विविध पक्षों को भी हिंदी में उद्घाटित किया. डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की वाणी प्रकाशन से आई पुस्तक ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ को इस परंपरा की तीसरी पीढ़ी में रखा जा सकता है.”
ये विचार यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के खैरताबाद स्थित
सम्मलेन-कक्ष में ‘साहित्य मंथन’ द्वारा आयोजित
समारोह में ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’
नामक पुस्तक को लोकार्पित करते हुए अरबामिंच विश्वविद्यालय, इथियोपिया के भाषाविज्ञान के विभागाध्यक्ष प्रो. गोपाल शर्मा ने व्यक्त
किए. उन्होंने लोकार्पित पुस्तक की लेखिका गुर्रमकोंडा नीरजा को साधुवाद देते हुए
कहा कि यह पुस्तक इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि इसमें भाषिक अनुप्रयोग
की पड़ताल के अनेक व्यावहारिक मॉडल उपलब्ध हैं. उन्होंने इस बात पर संतोष व्यक्त
किया कि इस पुस्तक में विभिन्न विमर्शों की भाषा के विवेचन द्वारा ‘उत्तरआधुनिक अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान’ को भी पुष्ट
किया गया है. उन्होंने अपील की कि आम आदमी के दैनंदिन जीवन से जुड़ी समस्याओं को
लेकर भी अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की दृष्टि से काम होना चाहिए.
अपने अध्यक्षीय भाषण में इफ्लू के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो.
एम. वेंकटेश्वर ने आर्येंद्र शर्मा, कृष्णमूर्ति और श्रीराम शर्मा
जैसे भाषावैज्ञनिकों को याद करते हुए कहा कि समय और स्थान के ग्राफ के साथ भाषा के
परिवर्तनों को देखना-परखना आज की आवश्यकता है तथा लोकार्पित पुस्तक इस दिशा में
उठाया गया एक सही कदम है. उन्होंने कहा कि यह पुस्तक भाषा के अध्येता छात्रों,
अध्यापकों, शोधार्थियों और समीक्षकों के लिए
समान रूप से उपयोगी है क्योंकि इसमें सैद्धांतिक पिष्टपेषण से बचते हुए लेखिका ने
हिंदी भाषा-व्यवहार विषयक प्रयोगात्मक कार्य के परिणामों को प्रस्तुत किया है.
आरंभ में वुल्ली कृष्णा राव ने अतिथियों का सत्कार किया तथा लेखिका गुर्रमकोंडा
नीरजा ने विमोच्य पुस्तक की रचना प्रक्रिया के बारे में चर्चा की. वाणी प्रकाशन के
निदेशक अरुण माहेश्वरी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए उन्होंने यह भी बताया कि
यह पुस्तक प्रसिद्ध हिंदी-भाषावैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह को समर्पित है जिन्होंने
प्रत्यक्ष रूप से इस पुस्तक के प्रणयन की प्रेरणा दी है. इस अवसर पर प्रो. दिलीप
सिंह ने भी दूरभाष के माध्यम से सभा को संबोधित किया और लेखिका को शुभकामनाएं दीं.
‘भास्वर
भारत’ के संपादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल, ‘साहित्य मंथन’ की परामर्शक ज्योति नारायण, ‘विश्व वात्सल्य मंच’ की संयोजक संपत देवी मुरारका और
शोधार्थी प्रेक्के पावनी ने लेखिका का सारस्वत सम्मान किया.
कार्यक्रम के संयोजक प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि लोकार्पित पुस्तक
अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अनेक आयामों की व्यावहारिकता को उद्घाटित करने के
साथ-साथ उनका परीक्षण एवं मूल्यांकन भी करती है जिसमें लेखिका का गहरा स्वाध्याय
और शोधपरक रुझान झलकता है.
इस समारोह में डॉ. बी. सत्यनारायण,डॉ. एम. रंगय्या, डॉ. राजकुमारी सिंह, डॉ. सुनीला सूद, डॉ. बालकृष्ण शर्मा ‘रोहिताश्व’, डॉ. के. श्याम सुंदर, डॉ. मंजुनाथ एन. अंबिग, डॉ. बलबिंदर कौर, डॉ. मिथिलेश सागर, डॉ. गोरखनाथ तिवारी, डॉ. करन सिंह ऊटवाल, डॉ. बी. एल. मीणा, डॉ. ए. श्रीराम, गुरुदयाल अग्रवाल, लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, वेमूरि ज्योत्स्ना कुमारी,
मटमरि उपेंद्र, जी. परमेश्वर, भंवरलाल उपाध्याय, वुल्ली कृष्णा राव, मनोज शर्मा, संतोष विजय मुनेश्वर, टी. सुभाषिणी, संतोष काम्बले, के.
नागेश्वर राव, किशोर बाबू, इंद्रजीत
कुमार, आनंद, वी. अनुराधा, जूजू गोपीनाथन, गहनीनाथ, झांसी
लक्ष्मी बाई, माधुरी तिवारी, सी.एच.
रामकृष्णा राव, प्रमोद कुमार तिवारी, रामकृष्ण,
दुर्गाश्री, जयपाल, अरुणा,
नागराज, जूडे लेसली आदि भाषा-प्रेमियों और
शोधार्थियों ने उत्साहपूर्वक भागीदारी निबाही.
सोमवार, 15 फ़रवरी 2016
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