शनिवार, 27 मई 2017
मंगलवार, 18 अप्रैल 2017
रविवार, 2 अप्रैल 2017
हिंदी और उर्दू की साझी विरासत : अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न
हिंदी और
उर्दू की साझी विरासत : अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न
30 और 31 मार्च, 2017 को मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी,
हैदराबाद में ‘’हिंदी और उर्दू की साझी विरासत’’ विषयक दो-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय
संगोष्ठी संपन्न हुई। आज के संदर्भ में जहां धर्म और मज़हब के नाम पर देश को
बांटने की बात हो रही है, यह संगोष्ठी एकता के बिंदुओं को उजागर करने के संकल्प के
साथ आरंभ हुई । प्रतिष्ठित कथाकार नासिरा
शर्मा ने रिबन काटकर संगोष्ठी का उद्घाटन किया । आरंभ में सांप्रदायिक सद्भाव पर आधारित कुछ फिल्मों की क्लिपिंग प्रदर्शित की
गई और मानू का तराना पेश किया गया। हिंदी विभाग के प्रभारी अध्यक्ष मो.खालिद
मुबश्शीर उज़-ज़फ़र ने मेहमानों का स्वागत किया। संयोजक डॉ. करन सिंह ऊटवाल
ने संगोष्ठी का परिचय देते हुए कहा कि भाषा और मज़हब को तोड़ने वालों की बात का
जिक्र न करें, उनको तवज्जो न दें क्योंकि हमें जोड़ने वालों की बात करनी है । यूनिवर्सिटी
ऑफ नार्थ कैरोलिना, चैपल हिल्स, अमेरिका के एशियाई अध्ययन विभाग के प्राध्यापक डॉ.जॉन
शील्ड कॉल्डवेल ने कहा कि दोनों
भाषाओं को शुद्धता की ओर ले जाना, उन्हें अशुद्ध करना है । उसी विश्वविद्यालय के डॉ. अफरोज ताज ने कहा कि भारत और
पाकिस्तान से बाहर निकलें तो हिंदी उर्दू एक ही भाषा है । जेएनयू के प्रोफेसर
नसीर अहमद खान ने कहा कि हिंदी उर्दू को अलग करने की साजिश फोर्ट विलियम कॉलेज
में रची गई थी । आज इन दोनों भाषाओं के मिले-जुले रूप में इतनी शक्ति है कि हम एक
हो जाएँ तो यह सार्क देशों की संपर्क भाषा बन सकती है । नासिरा शर्मा ने कहा
कि हिंदी और उर्दू मेरी दो माँ हैं । हिंदी की ओर हिंदी टीचर ने आकर्षित किया और
पिताजी की विरासत को समझने के लिए बाद में मैंने उर्दू सीखी । प्रो. असगर वजाहत
ने कहा कि हालांकि भारत का संविधान हिंदी और उर्दू को अलग-अलग भाषाएं मानता हैं,
लेकिन भाषावैज्ञानिक मानते हैं कि ये 2 भाषाएं अलग-अलग लिपियों
में लिखी जाने वाली एक ही भाषा है जिसका व्याकरण
एक है । मानू के कुलपति प्रो. मोहम्मद असलम परवेज़ ने कहा कि हिंदी और
उर्दू अलग नहीं हैं बल्कि मिलकर उसे आगे बढ़ना है ,तभी वह अपने उद्देश्यों को पूरा
कर सकती है ।उन्होंने दोनों लिपियों में लिखी गई रचनाओं के अनुवाद को एक अभियान के रूप में
चलाने पर जोर दिया।
हिंदी
साहित्य के मुस्लिम लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब
उद्घाटन
सत्र के पश्चात मुख्य सत्र के साथ-साथ दो समानांतर सत्रों का भी आयोजन किया गया। प्रथम
मुख्य सत्र का विषय था हिंदी साहित्य के मुस्लिम लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब जिसकी अध्यक्षता प्रो.
ऋषभदेव शर्मा ने की। प्रमुख वक्ता थे
डॉ. अलीम अशरफ जायसी, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, डॉ .समीना ताबिश, डॉ. चंदू खंडारे,
डॉ.सोनाली मेहता और डॉ. शेषु बाबु आदि। साथ ही तीन समानांतर सत्र चले जिनकी
अध्यक्षता प्रो. मोहन सिंह, प्रो.शकीला
खानम और डॉ. प्रभाकर त्रिपाठी ने
की। वक्ता रहे डॉ.सुषमा देवी ,डॉ. सुभाष कुमार शर्मा ,डॉ. कामेश्वरी, प्रियंका
कुमारी, हरबंस कौर ,डॉ. अली, डॉ. अर्चना झा, अपर्णा चतुर्वेदी, गीतांजलि साहू, थे
डॉ. अफसर उन्निसा बेगम, डॉ. जमील अहमद तथा
अनिल आदि।
उर्दू
साहित्य के गैरमुस्लिम लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब
दूसरे
मुख्य सत्र का विषय रहा उर्दू साहित्य के गैरमुस्लिम लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब।
इसकी अध्यक्षता प्रो.असगर वजाहत ने की और प्रमुख वक्ता थे डॉ.महमूद काज़मी, अमरनाथ, मोहम्मद शाहिद आदि। समानांतर
सत्र की अध्यक्षता प्रो. अबुल कलाम ने की जिसके प्रमुख वक्ता थे अंसार
अहमद, सुभाष कुमार, मोहम्मद नेहाल अफरोज़ तथा रुकैया नबी आदि ।
कविसम्मलेन-मुशायरा
पहले
दिन की शाम कवि सम्मेलन और मुशायरे के नाम रही। इसकी अध्यक्षता डॉ. अहिल्या
मिश्र ने की। प्रो. ऋषभदेव शर्मा, प्रवीण प्रणव, नरेंद्र राय, डॉ. महमूद काज़मी,
डॉ. अफरोज़ ताज, डॉ.अक़ील हाशमी, सरदार सलीम, कोकब ज़क़ी. समी सिद्दीकी, इबरार खान,
आसिफ चिराग राजा ने सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता पर केंद्रित कवितायेँ प्रस्तुत
कर श्रोताओं को मुग्ध कर दिया।
दोनों
भाषाओं में लिखने वाले लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब
दूसरे
दिन चले संगोष्ठी के तीसरे प्रमुख सत्र का केंद्रीय विषय रहा- दोनों भाषाओं में
लिखने वाले लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब। इसकी अध्यक्षता नासिरा शर्मा
ने की और प्रमुख वक्ता थे डॉ.अफरोज ताज
नकवी, जॉन शील्ड काल्डवेल, डॉ. शम्शुल हूदा, डॉ.जी.वी. रत्नाकर, डॉ.पठान रहीम खान,
डॉ.असलम परवेज, एफ.एम. सलीम तथा कहकशाँ लतीफ। समानांतर सत्रों की अध्यक्षता प्रो.नसीमुद्दीन फरीस और डॉ
वसीम बेगम ने की । वक्ता थे डॉ. मंजु शर्मा, डॉ.प्रोमिला, डॉ.निखत जहां ,अजय ,खुशबू,
डॉ.तबस्सुम बेगम ,डॉ.वाजदा इशरत, डॉ. हिना कौसर, शेख अब्दुल गनी, डॉ. पी.
जयलक्ष्मी तथा चिराग राजा आदि ।
गंगा-जमुनी
तहज़ीब पर प्रमुख विद्वानों के विचार
चौथा
सत्र था- गंगा-जमुनी तहज़ीब पर प्रमुख विद्वानों के विचार। इस सत्र की
अध्यक्षता प्रो.रोहिताश्व ने की। चर्चा
आरंभ करते हुए डॉ. अनीस आज़मी ने कहा कि शब्दों में सबसे अधिक ताकत होती है
तथा मिली-जुली संस्कृति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आजमगढ़ में किसी घर में बच्चे
का जन्म होता तो कन्हैया जी जन्म लेले जैसा गाना गाया जाता था । उन्होंने मिली-जुली संस्कृति के लिए नाटक तथा थिएटर के योगदान पर प्रकाश डाला । प्रो. वहाब क़ैसर ने मौलाना आज़ाद के
व्यक्तित्व को केंद्र में रखकर हिंदू मुस्लिम एकता पर प्रकाश डाला तथा भाषा की
महत्ता को बताते हुए राष्ट्रीय एकता और संस्कृति पर अपने विचार रखे। डॉ. आनंद
राज वर्मा ने दक्कन की गंगा-जमुनी तहज़ीब पर प्रकाश डाला। जिंदगी के अपने
तजुर्बों को साझा करते हुए मिली जुली संस्कृति से अवगत कराया तथा हैदराबादी संस्कृति
के माध्यम से मिली-जुली संस्कृति पर प्रकाश डाला। लक्ष्मी देवी राज ने मज़हब
से बढ़कर इंसानियत को तवज्जो दी। अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए हिंदू
मुस्लिम साझी संस्कृति पर प्रकाश डाला और मातृभाषा की अहमियत को बताया । डॉ.
असलम फरशोरी ने गंभीरता से बात करते
हुए कहा कि आज के राजनीतिक हालात में हमारी सांप्रदायिक सद्भाव से बनी तहज़ीब कहीं
खो गई है जिसमें हम हर स्तर पर एक साथ
मिलकर रहते थे। प्रो. रोहिताश्व ने अध्यक्षीय भाषण में विस्तारपूर्वक विभिन्न
लेखकों तथा उनकी रचनाओं के उदाहरण देते हुए गंगा-जमुनीतहज़ीब पर प्रकाश डाला और
ज्ञानवर्धक चर्चा करके विषय अनुकूल ज्ञान की सीमा का परिष्कार किया ।
समापन
समारोह
मानू
के अकादमिक डीन प्रो. रवींद्रन की अध्यक्षता में समापन सत्र संपन्न हुआ। इसके आरंभ में अमेरिका से आए अफरोज ताज नकवी ने
अपने गीत तथा जॉन शील्ड कॉल्डवेल ने अपने
हारमोनियम से महफिल में समा बांध दिया । प्रो असगर वजाहत, प्रो. नसीर अहमद खान तथा
नासिरा शर्मा ने संगोष्ठी पर सकारात्मक
प्रतिक्रिया व्यक्त की। संगोष्ठी की रिपोर्ट संयोजक डॉ .करन सिंह ऊटवाल ने
पेश की तथा धन्यवाद ज्ञापन सह-संयोजक डॉ.शम्शुल
हुदा ने प्रस्तुत किया। सामूहिक जन-गण-मन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
[रिपोर्ट
एवं चित्र सौजन्य : डॉ. करन सिंह ऊटवाल ]
मंगलवार, 7 मार्च 2017
डॉ. ऋषभदेव शर्मा ‘अंतरराष्ट्रीय साहित्य गौरव सम्मान’ से अलंकृत
रूसी-भारतीय मैत्री संघ – दिशा (मास्को), हिंदी संस्थान – कुरुनेगल (श्रीलंका), सामाजिक संस्था – पहल (दिल्ली) और साहित्यक-सांस्कृतिक शोध संस्था (मुंबई) के संयुक्त तत्वावधान में दीनदयाल मार्ग, दिल्ली स्थित राजेंद्र भवन न्यास के सभाकक्ष में ‘अंतरराष्ट्रीय सम्मान समारोह’ का संक्षिप्त लेकिन भव्य आयोजन संपन्न हुआ. समारोह की अध्यक्षता जे. एस. विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश के कुलपति प्रो. हरिमोहन ने की तथा संचालन उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, हैदराबाद के पूर्व अध्यक्ष प्रो.ऋषभदेव शर्मा ने किया.
![]() |
![]() |
इस अवसर पर अलंकृत विभूतियों के सम्मान में देशी-विदेशी सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए. विशेषतः रूस से आई हुईं किशोर नृत्यांगनाओं मारिया और वोल्गा द्वारा दो रूसी लोक नृत्य-गीतों की जीवंत प्रस्तुति ने सभी आगंतुकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. मगध विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. विनय कुमार के धन्यवाद-ज्ञापन और सामूहिक राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ.
सोमवार, 20 फ़रवरी 2017
डॉ. रामनिवास साहू की आत्मकथा 'मुझे कुछ कहना है' लोकार्पित
हैदराबाद, 19 फरवरी, 2017.
कादंबिनी क्लब के तत्वावधान में रविवार को श्रीकृष्णदेवराय सभागार में प्रो. ऋषभ देव शर्मा की अध्यक्षता में क्लब की 295वीं मासिक गोष्ठी आयोजित की गई जिसमें मैसूर से पधारे डॉ. रामनिवास साहू की आत्मकथा ‘मुझे कुछ कहना है’ के प्रथम भाग तथा क्लब द्वारा प्रकाशित 'पुष्पक -33’ का लोकार्पण संपन्न हुआ.
क्लब अध्यक्षा डॉ. अहिल्या मिश्र एवं कार्यकारी संयोजिका मीना मुथा ने प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि इस अवसर पर डॉ. गोपाल शर्मा (मुख्य अतिथि एवं पुस्तक लोकार्पणकर्ता ), डॉ. शकुंतला रेड्डी (विशेष अतिथि), डॉ. रामनिवास साहू (लेखक, क्षेत्रीय निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान, मैसूर) और डॉ. अहिल्या मिश्र मंचासीन हुए. सर्वप्रथम दीप प्रज्वलन कर माँ शारदा का आशीष लिया गया. शुभ्रा महंतो ने निराला रचित सरस्वती वन्दना ‘वर दे वीणावादिनी वर दे’ की सुमधुर प्रस्तुति दी. डॉ. मिश्र ने स्वागत भाषण में संस्था की संक्षिप्त जानकारी व अतिथियों का परिचय दिया तथा मैसूर के रचनाकार डॉ. साहू का इस मंच पर आना क्लब के लिए गौरव की बार बताया. इस अवसर पर मंचासीन अतिथियों का क्लब की ओर से सम्मान किया गया. डॉ. रमा द्विवेदी और सरिता सुराणा ने व्यवस्था में सहयोग प्रदान किया.
प्रथम सत्र में महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के रचना संसार पर केंद्रित चर्चा सत्र में अपने विचार रखते हुए प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने कहा कि निराला का जन्म बंगाल के मेदिनीपुर जिले में हुआ तथा बसंत पंचमी को अपनी जन्मतिथि मनाना उन्होंने खुद ही तय किया. गुलामी के युग में अपनी संस्कृति के प्रति गहरा लगाव जगाने का कार्य निरालाजी ने किया. उन्होंने विषयवस्तु और शिल्प दोनों ही दृष्टि से हिंदी कविता को एक नया आयाम दिया. हालांकि अधिक प्रसिद्धि उन्हें अपनी कविताओं से मिली लेकिन उनके लिखे उपन्यास और कहानियाँ भी हिंदी साहित्य में उतने ही महत्वपूर्ण हैं. ‘वर दे वीणावादिनी वर दे’ के अलावा उन्होंने कई और भक्ति गीत और प्रभातगीत लिखे. अध्यात्म से भी उनका जुड़ाव रहा, वे रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद से प्रभावित थे. प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने नौचंदी मेले में आयोजित कविसम्मेलन का जिक्र करते हुए निराला की पंक्तियों को उद्धृत किया.
डॉ. अहिल्या मिश्र ने कहा कि निराला ऐसे कवि हैं जिनकी रचनाओं को समेटते हुए 3 खंडों की पहले ग्रंथावली निकली और बाद में 13 खंडों में रचनावली निकली है. स्वाभिमानी निराला ने स्त्री विमर्श पर प्रमुखता से लेखन किया है. उनकी रचना ‘भिक्षुक’ और ‘वह तोड़ती पत्थर’ का डॉ. मिश्र ने पाठ किया.
डॉ. मदनदेवी पोकरणा ने ‘पुष्पक-33’ का परिचय देते हुए कहा कि सशक्त संपादकीय के साथ साथ विभिन्न साहित्य विधाओं से यह अंक सुसज्जित है. रचनाकारों का उल्लेख करते हुए उनकी कृतियों की संक्षिप्त समीक्षा करते हुए उन्होंने संपादक मंडल को साधुवाद दिया. डॉ रामनिवास साहू ने ‘पुष्पक-33’ को लोकार्पित किया.
द्वितीय सत्र में डॉ. रामनिवास साहू की आत्मकथा ‘मुझे कुछ कहना है’ [प्रथम भाग] को लोकार्पित करते हुए मुख्य अतिथि डॉ. गोपाल शर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि इस किताब को पढ़ते समय पाठक सहसा इस कहानी में अपने आपको ढूंढने लगता है. यह उपन्यास अनेक विमर्शों का जाल है जो एक नहीं अपितु अनेक दृष्टियाँ ले कर चलता है. यहाँ बनवासी विमर्श पर प्रमुखता से बात की गई है. लेखक आज लिखते हुए पीछे मुड़कर देखता है तो पाता है कि आज भी कुछ भी नहीं बदला है. यह किताब बार-बार पढ़ने योग्य है.
‘मुझे कुछ कहना है’ की समीक्षा करते हुए लक्ष्मी नारायण अग्रवाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा की आंचलिकता, बनवासी प्रथा, बनवासियों की जीवन शैली, उस कालखंड की परिस्थितियाँ आदि का सशक्त चित्रण इस पुस्तक में मौजूद है. इस रचना में चित्रित चरवाहे के पात्र को लक्ष्मी नारायण अग्रवाल ने सराहते हुए कहा कि अपने मैनेजमेंट और अर्थशास्त्री गुणों के बल पर उसने अपने गाँव को जिस तरह से सूखा पीड़ित होने से बचाया वह प्रेरणास्पद है. लेखक ने अपनी स्मरण शक्ति के बल पर काफी कुछ लिखा है और इस कृति को कहीं भी क्लिष्ट नहीं होने दिया है. ठाकुर, मुखिया, सौतेला व्यवहार, षड्यंत्र, शादी-ब्याह के समय होने वाले छल-कपट, प्रथा-कुप्रथा सब इस आत्मकथा में मौजूद हैं. आत्मकथा केवल मैं पर केन्द्रित नहीं है बल्कि इर्द गिर्द घूमते सभी किरदारों को भी उतना ही महत्त्व दिया गया है. ऐसा लेखन बहुत कम पढ़ने को मिलता है. अंग्रेजी शासन काल में जो स्थितियां थी आज भी उनमे कुछ ज्यादा बदलाव नहीं आया है. डॉ. साहू ने आत्मकथा विधा की सीमाओं में रहकर जो भी लिखा है, सराहनीय है, साहसिक है.
डॉ. शकुंतला रेड्डी ने संस्था एवं डॉ. साहू को साधुवाद दिया. प्रवीण प्रणव ने कहा कि यह आत्मकथा आदि से अंत तक पाठकों को बांधे रखती है. कुछ प्रसंग बेहद ही भावपूर्ण लिखे गए हैं. डॉ.अहिल्या मिश्र ने कहा कि बहुत आसान है दूसरों पर हँसना पर बहुत कठिन है खुद पर हँसना, बहुत आसान है दूसरों पर लिखना पर बहुत कठिन है खुद पर लिखना. मेले, बाइस्कोप की यादों को टटोलते हुए स्त्री विमर्श पर सुन्दर बातें रखी गई है. यह आत्मकथा हर भारतीय की आम कहानी है. डॉ. साहू के लेखन ने फणीश्वरनाथ रेणु की याद दिला दी. लालटेन, दलदल, कीचड़, पहाड़ आदि का सुन्दर वर्णन है तथा पात्रों के सजीव वर्णन से सत्यता का जुड़ाव नज़र आता है.
आत्म्कथाकार डॉ. रामनिवास साहू ने कहा कि मैं एक ऐसे बनवासी गाँव से आया हूँ जहाँ से पढ़कर कोई इस मुकाम पर पहुँचता है तो बहुत दुर्लभ उदाहरण के रूप में यह देखा जाएगा. इस सफ़र में मार्गदर्शन दे रहे सभी गुरुओं को वंदना. 238 देशों में हमारी भारतीयता फैली है परन्तु दुर्भाग्य है कि दिया तले अँधेरा. 'जिओ और जीने दो' का संदेश पहले भी हुआ करता था, आज भी है, लेकिन हालात सुधरने की बजाय बिगड़ते जा रहे हैं.
प्रो० ऋषभ देव ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि मैंने डॉ. साहू से कहा था कि आप जिस अंचल से आते हैं उस पर कोई प्रामाणिक साहित्य उपलब्ध नहीं है और आपको अपनी आत्मकथा आंचलिक संस्कृति और आंचलिक जीवन के संघर्षों को उभारते हुए लिखनी चाहिए. डॉ. साहू ने इस चुनौती के अनुरूप बहुत स्पष्टता के साथ विशिष्ट देश-काल की घटनाओं का बहुत बेबाकी से चित्रण किया है. डॉ. शर्मा ने पुस्तक से कुछ अंशों पर प्रकाश डाला और इस आत्मकथा के 4 और भागों के प्रकाशन की योजना की सूचना दी. प्रो. शर्मा ने कहा कि वनवासी गाँवों का कोई लिखित इतिहास नहीं होता. मौखिक परंपरा के आधार पर यह खड़ा होता है. मेरा ‘मैं’ सबका ‘मैं’ बन जाए, यह रचनाकार की सफलता है जिस पर डॉ. साहू खरे उतरते हैं. अंचल के निर्माण, विकास और इस दौरान मनुष्य के संघर्ष का पुस्तक में बेहतर चित्रण है. आगे के खण्डों को पढ़ने की उत्सुकता बनी रहेगी.
इस अवसर पर डॉ. साहू ने मंचासीन विद्वानों को स्मृतिचिह्न के रूप में छात्रकोष की प्रति भेंट की. प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने डॉ. साहू का व ज्योतिनारायण ने डॉ. गोपाल शर्मा का व्यक्तिगत तौर पर सम्मान किया. लोकार्पण समारोह का संचालन प्रवीण प्रणव और मीना मुथा ने किया, डॉ. रमा द्विवेदी ने धन्यवाद ज्ञापित किया.
समापन सत्र में ऋतुराज वसंत पर आधारित कवि गोष्ठी नरेंद्र राय की अध्यक्षता में हुई. प्रो० ऋषभदेव शर्मा, डॉ. रामनिवास साहू, अजित गुप्ता और डॉ.अहिल्या मिश्र मंचासीन हुए. भंवरलाल उपाध्याय के संचालन में भावना पुरोहित, सरिता गर्ग, डॉ. गीता जांगिड़, मंगला अभ्यंकर, सुषमा वैद्य, जी० परमेश्वर, दर्शन सिंह, सूरज प्रसाद सोनी, उमा सोनी, प्रवीण प्रणव, देविदास घोडके, ज्योति नारायण, श्रीमन्नारायण चारी ‘विराट’, एल. रंजना, दीपा ठाकर, डॉ. साहू, अजित गुप्ता, प्रो० ऋषभ देव शर्मा, डॉ. अहिल्या मिश्र और मीना मुथा ने काव्यपाठ किया. नरेन्द्र राय ने अध्यक्षीय काव्यपाठ किया. सुरेश जैन, देवा प्रसाद मायला, जुगल बंग जुगल, डॉ. जी० नीरजा, जी० कृष्णा राव, श्रीसाहिती, मधुकर मिश्र, भूपेंद्र मिश्र, डॉ. बुधप्रकाश सागर, डॉ. मिथिलेश सागर, डॉ. अनीता गांगुली, पवित्रा अग्रवाल, चन्द्र प्रताप सिंह, श्रुतिकांत भारती, शोभा महाबल आदि की उपस्थिति रही. मीना मुथा के आभार एवं सामूहिक राष्ट्रगान के साथ समारोह का समापन हुआ.
[प्रस्तुति : कादंबिनी क्लब, हैदराबाद]
शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017
‘मुझे कुछ कहना है’ का लोकार्पण 19 फरवरी को ‘कादंबिनी क्लब’ में
हैदराबाद, 17 फरवरी, 2017.
कादंबिनी क्लब, हैदराबाद के तत्वावधान में रविवार दिनांक 19 फरवरी, 2017 को प्रातः 11.30 बजे सुलतान बाज़ार, हैदराबाद में दिलशाद प्लाजा के समीप स्थित श्रीकृष्णदेव राय सभागार में क्लब की 295वीं मासिक गोष्ठी एवं पुस्तक लोकार्पण समारोह का आयोजन किया जा रहा है.
इस अवसर पर अरबामिंच विश्वविद्यालय, इथियोपिया (पूर्वी अफ्रीका) के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. गोपाल शर्मा बतौर मुख्य अतिथि मंचासीन होंगे तथा केंद्रीय हिंदी संस्थान, मैसूर के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. राम निवास साहू की औपन्यासिक आत्मकथा ‘मुझे कुछ कहना है’ (प्रथम भाग) को लोकार्पित करेंगे. साथ ही, कादंबिनी क्लब द्वारा प्रकाशित ‘पुष्पक-33’ का लोकार्पण डॉ. राम निवास साहू के हाथों संपन्न होगा. लोकार्पित कृतियों का परिचय क्रमशः लक्ष्मी नारायण अग्रवाल और डॉ. मदनदेवी पोकरणा द्वारा दिया जाएगा. डॉ. अहिल्या मिश्र आशीर्वचन देंगी तथा डॉ. ऋषभ देव शर्मा अध्यक्षता करेंगे.
आरंभ में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ पर संक्षिप्त चर्चा के साथ उनकी कविता का पाठ किया जाएगा तथा अंत में ऋतुराज वसंत के संदर्भ में विशिष्ट कविगोष्ठी होगी. विभिन्न सत्रों का संयोजन प्रवीण प्रणव, अवधेश कुमार सिन्हा, डॉ. रमा द्विवेदी, मीना मुथा एवं मंगला अभ्यंकर द्वारा किया जाएगा.
सभी साहित्यप्रेमियों से अनुरोध है कि समय पर उपस्थिति प्रदान कर समारोह को सफल बनाएँ.
[प्रस्तुति : कादंबिनी क्लब, हैदराबाद]
[पुस्तक] 'मुझे कुछ कहना है' : डॉ. राम निवास साहू
सदस्यता लें
संदेश (Atom)












