अमरतल्ला की अंधेरी गली में ‘समाचार-सूर्य’ की खोज
- प्रो. गोपाल शर्मा
आज बृहस्पतिवार है—गुरुवार। देवताओं का दिन, ज्ञान का दिन, और लोकतंत्र में—वोट का दिन। संयोग देखिए, बंगाल में आज मतदान था और मैं, जो अपने मताधिकार का ऋणी नागरिक हूँ, उस पवित्र कर्म से कोसों दूर, अपनी ही एक अप्रकाशित पुस्तक की धूल झाड़ने निकला था। यह भी एक व्यंग्य ही है—देश वोट दे रहा हो और वह अपने पात्रों से मिलने निकल पड़े!
मैं गोहाटी पहुँचा था, अपने कथानायक से मिलने—सोचा था, वह मुझे गले लगाएगा, दो-चार गंभीर वाक्य कहेगा, और मेरी पांडुलिपि को पुनर्जीवित कर देगा। परंतु वह तो BBC के संवाददाता को पेड़ा खिलाने में व्यस्त था—जैसे इतिहास नहीं, मिठाई बन रहा हो! मैंने समझ लिया—यहाँ मेरी दाल नहीं गलने वाली। सो, लेखक की आत्मा और जेब दोनों को समेटते हुए, मैं दुम दबाकर कलकत्ता—माफ़ कीजिए, Kolkata—आ पहुँचा।
और फिर, जैसे किसी भूली-बिसरी स्मृति की खोज में भटकता हुआ पुराना प्रेमी, मैं जा पहुँचा—छत्तीस, चौरंगी लेन। नहीं, सच तो यह है कि मैं निकला था एक और तीर्थ की खोज में—हिंदी पत्रकारिता के आद्य सूर्य, उदंत मार्तंड के उद्गम स्थल की तलाश में। और उसके साथ जुड़े उस भूले-बिसरे नाम की खोज में—पंडित जुगल किशोर शुक्ल।
अमरतल्ला लेन… नाम में ही एक अमरत्व का वादा था, पर गली में प्रवेश करते ही लगा—यहाँ तो स्मृतियाँ भी जर्जर होकर गिरने की प्रतीक्षा में हैं। एक टूटा-फूटा मकान—जैसे इतिहास का कंकाल खड़ा हो, और उसके भीतर अंधेरा—इतना गहरा कि उसमें अतीत की आवाज़ भी रास्ता भूल जाए। मैंने सोचा—क्या यही वह स्थान होगा जहाँ कभी छपाई की मशीनें खटर-पटर करती होंगी? जहाँ शब्द जन्म लेते होंगे, जैसे सूर्योदय होता है?
गली में बहुमंजिला इमारतें हैं—नई उम्र की, पर स्मृति-विहीन। एक पुराना अहाता दिखा—दो सौ वर्षों का साक्षी, पर मौन। जैसे उसने सब देखा हो, पर अब बोलने से इंकार कर दिया हो। गली के मोड़ से 26 नंबर का भवन दिखता है—पर वहाँ भी शुक्ल जी का कोई नामोनिशान नहीं। चारों ओर गहमा-गहमी है—व्यापार, लेन-देन, सौदेबाज़ी—पर इतिहास? वह तो जैसे यहाँ से बेदखल कर दिया गया है।
कुछ मारवाड़ी, कुछ जैन व्यापारी दिखे—व्यस्त, जैसे समय को भी मुनाफे में बदल देना चाहते हों। गली के बाहर एक भव्य मस्जिद खड़ी है—समय की तरह स्थिर, और भीतर गली में समय जैसे बिखरा हुआ। एक पोस्टर दिखा—“भरत राम तिवारी को वोट देकर सफल बनाइए।” उसके ठीक नीचे एक सरकारी नल—सरकारी वादों की तरह—अनवरत बहता हुआ। पानी भी जैसे कह रहा हो—“मुझे रोकोगे नहीं, तो मैं बहता रहूँगा; जैसे स्मृतियाँ, जिन्हें कोई रोकने वाला नहीं।” और तभी मन में एक तीखा विचार कौंधा—जिस तरह “उदंत मार्तंड” बंद हो गया, वैसे ही उसके संपादक की स्मृति भी यहाँ से लुप्त हो गई है। बच्चे इन जर्जर इमारतों के नीचे क्रिकेट खेल रहे हैं—इतिहास की नींव पर वर्तमान की पिच। उन्हें क्या पता, इसी जमीन पर कभी शब्दों की गेंदें उछली होंगी!
मैंने लोगों से पूछा—“भाई, यहाँ कहीं पंडित जुगल किशोर शुक्ल का घर…?” वे मुझे ऐसे देखने लगे, जैसे मैंने किसी प्राचीन ग्रह का पता पूछ लिया हो। किसी को कुछ पता नहीं। व्यापार के इस केंद्र में ‘शुक्ल’ नाम का कोई खाता नहीं खुला—और शायद यही सबसे बड़ा व्यंग्य है।
सोचता हूँ—यह गली तब कितनी अंधेरी रही होगी, जब उदंत मार्तंड का जन्म हुआ था। तब भी प्रकाश कम था, पर भीतर एक सूरज उग रहा था। आज रोशनी बहुत है, पर सूरज कहीं खो गया है।
पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने जब “उदंत मार्तंड” निकाला, तो वह केवल एक अखबार नहीं था—वह एक घोषणा थी कि हिंदी भी बोलेगी, लिखेगी, और सुनी जाएगी। उन्होंने लिखा था—हिंदुस्तानियों के लिए, उनकी भाषा में समाचार का कागज—क्योंकि पराई भाषा में सुख भी पराया लगता है। कितना सरल, कितना गहरा सत्य! अज्ञान तथा रूढ़ियों के अँधेरों में जकड़े हुए हिन्दुस्तानी लोगों की प्रतिभाओं पर प्रकाश डालने और 'उदंत मार्तण्ड' द्वारा ज्ञान के प्रकाशनार्थ' इस पत्र का श्री गणेश हुआ था। और, 'हिन्दुस्तान और नेपाल आदि देशों के लोगों, महाजनों तथा इंगलैंड के साहबों के बीच वितरित हुआ । इस समाचार पत्र में विभिन्न नगरों के सरकारी क्षेत्रों की विभिन्न गतिविधियाँ प्रकाशित होती थीं और उस वक्त की वैज्ञानिक खोजों तथा आधुनिक जानकारियों को भी महत्त्व दिया जाता था। इसके उद्देश्य के सम्बन्ध में बांग्ला साप्ताहिक ‘समाचार चंद्रिका' ने लिखा था कि 'नासमझी तथा रूढ़ियों के अँधेरों में जकड़े हुए हिन्दुस्तानी लोगों की प्रतिभाओं पर प्रकाश डालने और 'उदंत मार्त्तण्ड' द्वारा ज्ञान के प्रकाशनार्थ' इस पत्र का श्री गणेश हुआ था। और, 'हिन्दुस्तान और नेपाल आदि देशों के लोगों, महाजनों तथा इंगलैंड के साहबों के बीच वितरित हुआ और हो रहा है।' लगता है, खरीद कर पढ़ने वालों की संख्या उस समय (भी) कम रही होगी। इसलिए ग्राहकों की (पाठकों की नहीं) संख्या कम होने के कारण आज की लघु पत्र-पत्रिकाओं की तरह ही इसको भी दम तोड़ना पड़ा होगा। शायद यह कुछ वक्त तक और बची रहती अगर मिशन के काम में मिशनरियों का हाथ बँटाने लगती। तब इस पत्रिका को डाक महसूल में छूट मिलती। पर पहले के संपादक ठहरे ‘मिशनरी’। अब भुगतो!
इस पत्र की प्रारंभिक विज्ञप्ति इस प्रकार थी -यह "उदन्त मार्तण्ड" अब पहले-पहल हिंदुस्तानियों के हित के हेतु जो आज तक किसी ने नहीं चलाया पर अंग्रेजी ओ पारसी ओ बंगाल में जो समाचार का कागज छपता है उनका सुख उन बोलियों के जानने और पढ़ने वालों को ही होता है। और सब लोग पराए सुख से सुखी होते हैं। जैसे पराए धन धनी होना और अपनी रहते परायी आंख देखना वैसे ही जिस गुण में जिसकी पैठ न हो उसको उसके रस का मिलना कठिन ही है और हिंदुस्तानियों में बहुतेरे ऐसे हैं। इससे सत्य समाचार हिंदुस्तानी लोग देख आप पढ़ ओ समझ लेयँ ओ पराई अपेक्षा न करें ओ अपने भाषे की उपज न छोड़े। इसलिए दयावान करुणा और गुणनि के निधान सब के कल्यान के विषय गवरनर जेनेरेल बहादुर की आयस से ऐसे साहस में चित्त लगाय के एक प्रकार से यह नया ठाट ठाटा...
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पहले तो आप इनके पत्र की प्रकृति और प्रवृत्ति उनके ही शब्दों में सुनें ;
'दिनकर कर प्रगटत दिनहि यह प्रकाश अठयाम
ऐसो रवि अब उग्यो नहि, जेहि-जेहि सुख को धाम ।
उत कमलनि विकसित करत बढ़त चाव चितवाम,
लेत नाम या पत्र का, होत हर्ष अरु काम ।
और उनका व्यंग्य—अरे, वह तो आज भी ताज़ा है। वह बूढ़ा वकील, जो मुकदमे को अपनी पीढ़ियों की जीविका बना चुका था, और दामाद ने उसे जल्दी निपटा दिया—वकील को दुख हुआ! जैसे आज भी कुछ लोग समस्याओं के समाधान से अधिक, उनके बने रहने में ही अपना लाभ देखते हैं। मुलाहिजा फरमाइए;
‘एक यशी वकील अदालत का काम करते-करते बुड्ढा होकर अपने दामाद को वह सौंप के आप सुचित हुआ। दामाद कई दिन वह काम करके एक दिन आया ओ प्रसन्न होकर बोला हे महाराज आपने जो फलाने का पुराना ओ संगीन मोकद्दमा हमें सौंपा था सो आज फैसला हुआ यह सुनकर वकील पछता करके बोला कि तुमने सत्यानाश किया। उस मोकद्दमे से हमारे बाप बड़े थे तिस पीछे हमारे बाप मरती समय हमें हाथ उठा के दे गए ओ हमने भी उसको बना रखा ओ अब तक भली-भांति अपना दिन काटा ओ वही मोकद्दमा तुमको सौंप करके समझा था कि तुम भी अपने बेटे पाते तक पालोगे पर तुम थोड़े से दिनों में उसको खो बैठे।“
परंतु इतिहास का यह सूर्य अधिक दिनों तक नहीं चमक सका। यह साप्ताहिक पत्र पुस्तकाकार (12x8) छपता था और हर मंगलवार को निकलता था। इसके कुल 79 अंक ही प्रकाशित हो पाए थे कि इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा। 19 दिसंबर 1827—वह दिन, जब “उदंत मार्तंड” अस्त हो गया। अंतिम पंक्तियाँ—“ आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तण्ड उदन्त अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अन्त।यह केवल एक पत्र का अंत नहीं था, यह एक स्वप्न का विराम था। सरकारी सहायता नहीं मिली, पाठकों का सहयोग नहीं मिला—और सूरज डूब गया- मिति पौष बदी १ भौम संवत् १८८४ तारीख दिसम्बर सन् १८२७। उन्होंने अपने संपादकीय के अन्त में ग्राहकों एवं पाठकों से निवेदन किया था कि "हमारे कुछ कहे-सुने का मन में न लाइयो जो दैव और भूधर मेरी अन्तरव्यथा और गुण को विचार सुधि करेंगे तो मेरे ही हैं। शुभमिति ।"
पर क्या सचमुच डूब गया?
मैं उस गली में खड़ा था—टूटी दीवारों, बहते नलों, और खेलते बच्चों के बीच—और मुझे लगा, “उदंत मार्तंड” कहीं न कहीं अब भी उग रहा है। हर उस शब्द में, जो अपनी भाषा में लिखा जाता है। हर उस लेखक में, जो उपेक्षा के बावजूद लिखता है।
पर एक पीड़ा भी है—क्योंकि उस गली में, उस इतिहास का कोई नामोनिशान नहीं। जैसे जयशंकर प्रसाद की ‘ममता’ कहानी का वह वाक्य—राजाओं के नाम तो अमर हो जाते हैं, पर ममता कहीं खो जाती है।
“सातों देश के नरेश हुमायूँ ने एक दिन यहाँ विश्राम किया था। उनके पुत्र अकबर ने उनकी स्मृति में यह गगनचुंबी मन्दिर बनाया।" पर उसमें ममता का कहीं नाम नहीं था।
शायद अगली सरकार आए, तो इस गली का नाम बदल दे। शायद यहाँ पंडित जुगल किशोर शुक्ल की एक प्रतिमा लग जाए। शायद…
पर तब तक, यह गली यूँ ही रहेगी—अंधेरी, जर्जर, और स्मृतिहीन।
और मैं—एक लेखक—इस स्मृति को अपने शब्दों में सँजोकर लौट जाऊँगा, जैसे कोई पुराना यात्री, अपनी झोली में इतिहास की धूल भरकर ले जाता है… ताकि कहीं तो वह चमके।
हाँ, एक बात ओर है जो मैं इन पंक्तियों के पाठकों से कहना चाहूँगा। यदि उन्हें यह मौका दिया जाए कि वे हिंदी के इन संपादक महोदय पर कुछ लिख बोल सकें तो लिखना कि आचार्य शुक्ल जी ने अपने इतिहास में इन्हें ‘पं जुगल किशोर’ लिखा है और सच में तो ये ‘शुक्ल’ नहीं बकौल डॉ लक्ष्मी शंकर व्यास के ‘सुकुल’ थे।
जमाना मेरी दादी के जमाने से नाजुक ही चल रहा है, और मेरे मरहूम चचा मरने से पहले कहा करते थे कि भतीजे नाम में क्या रखा है, आज के जमाने में तो इनका नाम ‘जुगल किसोर’ ही काफी है। 200 साल, अरे बाप रे! 000
- प्रो. गोपाल शर्मा, अरवा मींच यूनिवर्सिटी, इथियोपिया

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