रविवार, 12 नवंबर 2023
शोध में नवाचारी प्रवृत्तियाँ और भारत : [देवराज]
मंगलवार, 24 अक्टूबर 2023
ऋषभदेव शर्मा का संक्षिप्त जीवनवृत्त Rishabha Deo Sharma_Biodata
डॉ. ऋषभदेव शर्मा
(Dr. Rishabha Deo Sharma)
जन्म : 4 जुलाई, 1957।
ग्राम गंगधाड़ी, जिला मुजफ्फर नगर, उत्तर प्रदेश।
शिक्षा : एमए (हिंदी), पीएचडी ( हिंदी : 1970 के पश्चात की हिंदी कविता का अनुशीलन)।
कार्य:
1. खुफिया अधिकारी, इंटेलीजेंस ब्यूरो, भारत सरकार (1983-1990)।
2. प्रोफेसर, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास (सेवानिवृत्त : 2015)।
3. परामर्शी (हिंदी), दूरस्थ शिक्षा निदेशालय, मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद (2019-वर्तमान)।
शोध निर्देशन: डीलिट-2; पीएचडी-34; एमफिल-106.
14 काव्य संग्रह:
तेवरी (1982), तरकश (1996), ताकि सनद रहे (2002), देहरी (स्त्रीपक्षीय कविताएँ, 2011), प्रेम बना रहे (2012), प्रेमा इला सागिपोनी (2013: तेलुगु अनुवादक- जी. परमेश्वर), प्रिये चारुशीले (2013: तेलुगु अनुवादक- डॉ. भागवतुल हेमलता), सूँ साँ माणस गंध (2013), धूप ने कविता लिखी है (2014), ऋषभदेव शर्मा का कविकर्म (2015, 2021: संपादक/समीक्षक- डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह), देहरी (2021: राजस्थानी अनुवादक- डॉ. मंजु शर्मा), IN OTHER WORDS (2021: अंग्रेज़ी अनुवादक/संपादक/समीक्षक- प्रो. गोपाल शर्मा), इक्यावन कविताएँ (2022), मलंग बानी (मुद्रणस्थ-2023)।
12 आलोचना ग्रंथ:
तेवरी चर्चा (1987), हिंदी कविता: आठवाँ-नवाँ दशक (1994), साहित्येतर हिंदी अनुवाद विमर्श (2000), कविता का समकाल (2011), तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ (2013), तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय (2015), हिंदी भाषा के बढ़ते कदम (2015), कविता के पक्ष में (2016), कथाकारों की दुनिया (2017), साहित्य, संस्कृति और भाषा (2021), हिंदी कविता: अतीत से वर्तमान (2021), रामायण संदर्शन (2022)।
7 वैचारिक निबंध संग्रह:
संपादकीयम् (2019), समकाल से मुठभेड़ (2019), सवाल और सरोकार (2020), इलेक्शन गाथा (ऑनलाइन: 2020)/ लोकतंत्र के घाट पर (ऑनलाइन; किंडल: 2020), कोरोना काल की डायरी (ऑनलाइन; किंडल: 2020), खींचो न कमानों को (ऑनलाइन; किंडल: 2022), और न खींचो रार (ऑनलाइन; किंडल: 2022)।
संपादन:
पदचिह्न बोलते हैं (1980), शिखर-शिखर (डॉ. जवाहर सिंह अभिनंदन ग्रंथ, 1994), कच्ची मिट्टी–2 (1994), माता कुसुमकुमारी हिंदीतरभाषी हिंदी साधक सम्मान : अतीत एवं संभावनाएँ (1996), अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य (1999, 2009), भारतीय भाषा पत्रकारिता (2000), अनुवाद : नई पीठिका, नए संदर्भ (2003), हिंदी कृषक (काजाजी अभिनंदन ग्रंथ, 2005), पुष्पक–3 (2003), पुष्पक–4 (2004), स्त्री सशक्तीकरण के विविध आयाम (2004), प्रेमचंद की भाषाई चेतना (2006), भाषा की भीतरी परतें (भाषाचिंतक प्रो.दिलीप सिंह अभिनंदन ग्रंथ, 2012), मेरी आवाज (2013, सदस्य- संशोधक मंडल), उत्तरआधुनिकता: साहित्य और मीडिया (2015), संकल्पना (2015), वृद्धावस्था विमर्श (2016), अन्वेषी (2016), निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक (डॉ. प्रेमचंद्र जैन रचनावली, 2016), ‘अँधेरे में’ : पुनर्पाठ (2017), समकालीन सरोकार और साहित्य (2017), अस्तित्व (तेलंगाना की तेलुगु कहानियाँ, 2019), तत्वदर्शी निशंक (डॉ. रमेश पोखरियाल 'निशंक’ के साहित्य पर एकाग्र ग्रंथ, 2021), साहित्य सृजन की समकालीनता (ईश्वर करुण अभिनंदन ग्रंथ, 2022)।
विशेष:
★ 1981 में 'तेवरी काव्यांदोलन' का प्रवर्तन किया।
★अनंग प्रकाशन, दिल्ली ने 2022 में ‘धूप के अक्षर’ शीर्षक से दो भागों में 700 पृष्ठ का 'प्रो. ऋषभदेव शर्मा अभिनंदन ग्रंथ' प्रकाशित किया (संपादक- डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा)।
★'शोधादर्श' पत्रिका ने नजीबाबाद (उत्तर प्रदेश) से फरवरी 2023 में 134 पृष्ठ का 'प्रो. ऋषभदेव शर्मा विशेषांक' प्रकाशित किया (संपादक- अमन कुमार त्यागी)।
सम्मान:
शब्दाक्षर, तेलंगाना द्वारा 'दिनकर सम्मान' (2023)। उपमा-कैलिफोर्निया द्वारा ‘विश्व राम संस्कृति सम्मान’ (2021)। भानु प्रतिष्ठान, नेपाल द्वारा ‘भानु साहित्य सम्मान’ (2020)। संपादक रत्न सम्मान (2020)। अंतरराष्ट्रीय हिंदी सेवी सम्मान (2018)। आचार्य चाणक्य सम्मान (2018)। विवेकी राय स्मृति साहित्य सम्मान (2018)। अंतरराष्ट्रीय साहित्य गौरव सम्मान (2017)। वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक पुरस्कार-हैदराबाद (2015)। तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा ‘जीवनोपलब्धि सम्मान’ (2015)। सुगुणा साहित्य सम्मान-हैदराबाद (2015)। रमादेवी गोइन्का हिंदी साहित्य सम्मान (2013)। आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी द्वारा ‘हिंदीभाषी हिंदी लेखक पुरस्कार’ (2010)। रामेश्वर शुक्ल अंचल सम्मान-जबलपुर (2003)।
संपर्क : 208 ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद– 500013 (तेलंगाना)।
मोबाइल : 8074742572.
ईमेल: rishabhadeosharma@yahoo.com
सोमवार, 2 अक्टूबर 2023
गांधी जयंती पर सादर नमन
गांधी जयंती के अवसर पर
1 बाल-कविता : महात्मा का स्मरण
भारत माता ने महानतम पुत्र अनेक जने हैं।
‘बापू’ पद के अधिकारी बस मोहनदास बने हैं।।
हम सब उनको आज महात्मा गांधी कहते हैं।
भारत के जन गण के मन में सचमुच रहते हैं।।
वे अपने जीवन में सबको प्रेम सिखाते थे।
सत्य, अहिंसा में निष्ठा का मार्ग दिखाते थे।।
सविनय सत्याग्रह से अत्याचारी रुक जाते थे।
देख हौसला बलिदानों का दुश्मन झुक जाते थे।।
नमक बनाकर निर्भयता का जन संदेश दिया था।
‘भारत छोडो’ का अंगेजों को निर्देश दिया था।।
स्वाभिमान की ऐसी घुट्टी जनता को पिलवा दी।
रक्तपात के बिना ब्रिटिश से आज़ादी दिलवा दी।।
अपनी भाषा, अपनी भूषा अपनाना सिखलाया।
है स्वराज्य का मार्ग स्वदेशी, चल कर दिखलाया।।
ईश्वर-अल्ला के अभेद को दुनिया को समझाया।
महिला और दलित लोगों को सब सम्मान दिलाया।।
जन्मदिवस दो अक्टूबर यों नई शक्ति भरता है।
ऐसे अपने राष्ट्रपिता को देश नमन करता है।। 000
12 दोहे : सत्य-अहिंसा प्यार
1.
दुनिया कब से लड़ रही,
भर प्राणों में क्रोध।
नया युद्ध तुमने लड़ा,
सविनय किया विरोध।।
2 .
दुनिया लडती क्रोध से,
करती अत्याचार।
भारत लड़ता सत्य ले,
बाँट बाँट कर प्यार।।
3 .
उनके हाथों में रहे,
सब खूनी हथियार।
पर तुमने त्यागे नहीं,
सत्य-अहिंसा-प्यार।।
4 .
अड़े सत्य पर तुम सदा,
दिया न्याय का साथ।।
सत्ता-बल के सामने,
नहीं झुकाया माथ।।
5 .
निर्भय होने का दिया,
तुमने ऐसा मंत्र।
जगा देश का आत्म-बल,
होकर रहा स्वतंत्र।।
6 .
मिले प्रेम के युद्ध में,
भले जीत या हार।
तुमने सिखलाया हमें,
शस्त्रहीन प्रतिकार।।
7.
सत्ता,प्रभुता,राजमद,
शोषण के पर्याय।
नमक बना तुमने दिया,
जन-संघर्ष उपाय।।
8 .
क्या न किया अंग्रेज़ ने,
क्या न गिराई गाज।
मगर न कुचली जा सकी,
जनता की आवाज़।।
9
सच्चा नायक तो वही,
कथनी-करनी एक।
वरना तो झूठे यहाँ,
नेता फिरें अनेक।।
10 .
दौड़ रहे पागल हुए,
महानगर की ओर।
गांधी की वाणी सुनो,
चलो गाँव की ओर।।
11 .
अगर कहीं कोई मरे,
ऋण से दबा किसान।
यह गांधी के देश में,
उचित नहीं, श्रीमान।।
12 .
दुनिया बनती जा रही,
मंडी औ' बाज़ार।
इसे बनाओ, मित्रवर,
प्रेमपूर्ण परिवार।। 000
ऋषभदेव शर्मा
गुरुवार, 13 जुलाई 2023
【श्रद्धांजलि लेख】 हल्का होने का अहसास : मिलान कुंदेरा ◆ प्रो. गोपाल शर्मा
श्रद्धांजलि लेख
हल्का होने का अहसास : मिलान कुंदेरा
प्रो. गोपाल शर्मा
“और जल्दी ही युवती सिसकी लेने के बजाय ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी और वह यह करुणाजनक पुनरुक्ति दोहराती चली गई, ”मैं मैं हूँ, मैं मैं हूँ, मैं मैं हूँ ....”
आज जब अचानक मिलान कुंदेरा (1929-2023) के निधन का समाचार सुना तो उनकी एक कहानी के अनुवाद की ये अंतिम पंक्तियाँ याद आ गईं। ‘लिफ्ट लेने का खेल’ नामक यह कहानी मैंने पिछले ही दिनों ‘समालोचन’ में पढ़ी थी। न्यूयॉर्क टाइम्स में 11 जुलाई, 2023 को श्रद्धांजलि-स्वरूप समाचार प्रकाशित हुआ, “अपने मूल चेकोस्लोवाकिया के श्रमिकों के स्वर्ग में जीवन की दमघोंटू गैरबराबरी को दर्शाने वाले मार्मिक, यौन आधारित उपन्यासों से वैश्विक साहित्यिक सितारे बन गए कम्युनिस्ट पार्टी से निष्कासित नेता मिलान कुंदेरा का मंगलवार को पेरिस में निधन हो गया। वह 94 वर्ष के थे।”
लेखक होने की असहनीय शिथिलता ढोनेवाले इस मजाकिया मिलान का अब ‘मैं’ नहीं रहा; ‘अहं’ समाप्त हुआ; ‘वयं’ रह गया। उनकी ही पंक्ति है,“आदमी सोचता है, भगवान हँसता है।“और कुंदेरा का खुद-ब-खुद लगाया गया कुंदेरी ठहाका यूट्यूब पर रह गया, “लेकिन भगवान क्यों हँसते हैं? क्योंकि मनुष्य सोचता है, और सत्य उससे दूर हो जाता है। क्योंकि जितना अधिक मनुष्य सोचते हैं, उतना ही अधिक एक मनुष्य के विचार दूसरे से भिन्न होते हैं। और अंततः सब समाप्त हो जाता है क्योंकि मनुष्य कभी भी वैसा नहीं होता जैसा वह सोचता है कि वह है।” चेक भाषा में कहे गए गए फ्रेंच से अंग्रेजी में आए और फिर मेरे द्वारा हिंदी में लाए गए इस महान साहित्यकार के ये शब्द ही तो अब बचे हैं।
मैंने मिलान कुंदेरा का नाम पहले पहल हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के मुखारविंद से कई दशक पहले सुना था और तब उनकी विद्वत्ता से और भी प्रभावित हो कर रह गया था। मैं उन्हें न जानता था। फिर उन्हें जानने लगा और इस जानने की इतिश्री न हो इसलिए यह लेख आज उनके नश्वर शरीर के अंत होने के समाचार सुनने के तुरंत बाद लिख रहा हूँ। मिलान कुंदेरा के द्वारा लिखित पुस्तकें हिंदी में आम आदमी को चाहे आसानी से उपलब्ध न भी हों फिर भी वे विद्वत-चर्चा में रहते चले जा रहे हैं। इस साहित्यकार का नाम शहर "मिलान" के नाम पर नहीं है जो रोमन नाम "मेडियोलेनम" ("मैदान के बीच में") से आया है। व्यक्ति "मिलान" स्लाव मूल "मिल" से बनकर आया है जिसका अर्थ "दया" और “प्यार” या ऐसा ही कुछ होता है। समझ लें ‘प्रेम कुमार’ या ‘दया कुमार’ जैसा ही कुछ इनका नाम है।
मिलान कुंदेरा एक चेक उपन्यासकार, नाटककार, निबंधकार और कवि थे। उनका जन्म 1929 में ‘ब्रनो’ (चेकोस्लोवाकिया) में हुआ था और उन्होंने प्राग विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र का अध्ययन किया था। एक प्रसिद्ध कॉन्सर्ट पियानोवादक और संगीतज्ञ, लुडविक कुंदेरा के पुत्र युवा कुंदेरा ने संगीत का अध्ययन किया, लेकिन धीरे-धीरे लेखन की ओर रुख किया। उन्होंने 1952 में प्राग में संगीत और नाटकीय कला अकादमी में साहित्य पढ़ाना शुरू कर दिया और कई कविता-संग्रह प्रकाशित किए। 1950 के दशक में ‘पॉस्लेडनी माज’ (1955; "द लास्ट मे"), और ‘मोनोलॉजी’ (1957; "मोनोलॉग्स") अपने व्यंग्यपूर्ण और कामुकता के अतिरेकी स्वर के कारण चेक राजनीतिज्ञों और अधिकारियों द्वारा बेकार बता दिए गए।
अपने शुरुआती करियर के दौरान वे कम्युनिस्ट पार्टी में आते-जाते रहे थे। 1948 में शामिल हुए, 1950 में निष्कासित कर दिए गए, और 1956 में फिर से शामिल हुए। कुंदेरा ने 1967-68 में चेकोस्लोवाकिया में हो रहे कुछ उदारवादी आंदोलनों में भाग लिया था। देश पर सोवियत कब्जे के बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक गलतियों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और परिणामस्वरूप अधिकारियों के कोपभाजन बने। उनके सभी कार्यों और लेखन की भरपूर निंदा हुई और उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। यही नहीं उन्हें उनके सभी पदों और कम्युनिस्ट पार्टी से बाहर भी कर दिया गया। दैवयोग से 1975 में कुंदेरा को फ्रांस में रेन्नेस विश्वविद्यालय (1975-78) में अध्ययन-अध्यापन का अवसर मिल गया और वे चेकोस्लोवाकिया से अपनी पत्नी वेरा ह्राबनकोवा के साथ फ्रांस में जा बसे। 1979 में चेक सरकार ने उनसे उनकी चेक नागरिकता भी छीन ली। वैसे 40 वर्ष तक मातृभूमि से बेदखल रहने के बाद मृत्यु से कुछ वर्ष पूर्व 2019 में बहाल कर दी गई थी। अगले वर्ष 2020 में उन्हें नागरिकता का प्रमाणपत्र भी दे दिया गया। पर जीवन के अंतिम कुछ महीनों में वे उसका करते भी क्या ? बस उसे लेकर शून्य की ओर ताकते हुए आभार के दो शब्द भर बोले , “ डेकूजी’ (“थैंक यू!”)। मिलान का देहावसान अपने देश में नहीं, फ्रांस में हुआ। यूरोप में हुआ जिसे वे ताउम्र ‘न्यूनतम स्पेस में अधिकतम विविधता’ वाला स्थान कहते रहे और खुद के ‘अन्यत्र’ (एल्सवेयर) होने का संताप झेलते रहे।
उनका पहला उपन्यास, ‘द जोक’, 1967 में प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास का प्रकाशन एक महत्वपूर्ण और व्यावसायिक सफलता थी, और इसने कुंदेरा को एक प्रमुख साहित्यकार के रूप में स्थापित किया। ‘जोक’ उपन्यास चेकोस्लोवाकिया में कम्युनिस्ट शासन पर एक करारा व्यंग्य है और 1968 के सोवियत आक्रमण के बाद उनके देश में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। कुंदेरा 1975 से 11 जुलाई, 2023 को अपनी मृत्यु तक फ्रांस में निर्वासन में रहे, साथ ही उनके लेखन पर चेकोस्लोवाकिया में बहुत समय तक प्रतिबंध जारी रहा। लेकिन कुंदेरा पश्चिम में खूब प्रकाशित होते रहे।
1970 और 80 के दशक में उनके उपन्यास, जिनमें ‘वाल्सिक ना रोज़्लौसेनौ’ (1976; "फेयरवेल वाल्ट्ज"; द फेयरवेल पार्टी), ‘निहा स्मिचू ए जैपोम्नेनी’ (1979; द बुक ऑफ लाफ्टर एंड फॉरगेटिंग), और ‘नेस्नेसिटेलना लेहकोस्ट बायटी’ ( 1984; द अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग), आदि प्रकाशित हुए। कुंदेरा की प्रतिभा के व्यापक चिह्न हमें ‘एल'आर्ट डू रोमन’ (1986; द आर्ट ऑफ द नॉवेल), ‘लेस टेस्टामेंट्स ट्रैहिस’ (1993; टेस्टामेंट्स बेट्रेयड), ले रिड्यू (2005; द कर्टेन), और यूने रेनकॉन्ट्रे (2009; एनकाउंटर) आदि रचनाओं में भी दिखाई देते हैं। उन्होंने अपना अंतिम उपन्यास, "द फेस्टिवल ऑफ इनसिग्निफिसेंस" (2015) पेरिस में रहते हुए पूरा किया। कुंदेरा के लेखन का हिंदी सहित 40 से अधिक भाषाओं में अनुवाद किया गया है। उन्होंने फ्रांज काफ्का पुरस्कार और जेरूसलम पुरस्कार सहित कई पुरस्कार जीते हैं। उन्हें 20वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण लेखकों में से एक माना जाता है। हालांकि उन्हे साहित्य का नोबेल पुरस्कार न मिल सका, यह अजीब लगता है।
कुंदेरा के सबसे प्रसिद्ध उपन्यासों में ‘द अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग’, ‘द बुक ऑफ लाफ्टर एंड फॉरगेटिंग’ और ‘आइडेंटिटी’ शामिल हैं। ‘द अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग’ कुंदेरा का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है। यह 1984 में प्रकाशित हुआ था और आज तक एक अंतरराष्ट्रीय बेस्टसेलर है। उपन्यास प्रेम, क्षति और जीवन के अर्थ की प्रकृति पर एक दार्शनिक चिंतन है। ‘द बुक ऑफ लाफ्टर एंड फॉरगेटिंग’ निबंधों और कहानियों का एक संग्रह है। यह 1978 में प्रकाशित हुआ था और चेकोस्लोवाकिया में प्रतिबंधित कर दिया गया था। पुस्तक के निबंध स्मृति, इतिहास और शब्दों की शक्ति के विषयों का पता देते हैं। यह रचना मानव स्मृति और ऐतिहासिक सत्य को नकारने और मिटाने की आधुनिक राज्य की प्रवृत्ति पर व्यंग्यपूर्ण कटाक्ष है। ‘आइडेंटिटी’ कुंदेरा का एक दूसरा उपन्यास है। यह 1991 में प्रकाशित हुआ था और यह पहचान की प्रकृति और हमारे आत्मबोध को आकार देने में स्मृति की भूमिका पर एक सघन चिंतन है। 2014 में उनके अंतिम उपन्यास ‘द फेस्टिवल ऑफ इनसिग्निफिसेंस’ को "आशा और ऊब के बीच की ऊहापोह" के रूप में देखा गया।
वस्तुतः कुंदेरा का जीवन, लेखन और उनके विचार सब अजीब से ही हैं। इनका उद्देश्य क्या है? ठीक से पता नहीं चलता। 1980 में न्यूयॉर्क टाइम्स बुक रिव्यू में भी इसी ओर संकेत देकर कहा गया था कि "इस लेखक का असली काम अपने जीवनकाल में अपने देश के विनाशकारी इतिहास की छवियां ढूंढना है।” न्यूयॉर्क टाइम्स के ही अपने एक मित्र फिलिप रोथ से कुंदेरा ने एक बार कहा था, “"मुझे ऐसा लगता है कि आजकल पूरी दुनिया में लोग समझने के बजाय निर्णय करना पसंद करते हैं, पूछने के बजाय जवाब देना पसंद करते हैं।”
कुंदेरा अपने लेखन के माध्यम से अपने विचार व्यक्त करते हैं और उनकी विचारधारा सदा पहले जैसी ही रहती है। उन्होंने एक बार लिखा था, “ मेरे हर उपन्यास का शीर्षक “द अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग” या “द जोक” या “लाफेबल लव्स” हो सकता है; शीर्षक परस्पर परिवर्तनशील हो सकते हैं, वे उन सभी मुद्दों की छोटी संख्या को दर्शाते हैं जो मुझ पर सदा हावी रहते चले आए हैं, मुझे परिभाषित करते हैं, और, दुर्भाग्य से, मुझे प्रतिबंधित भी करते हैं। इन विषयों के अलावा, मेरे पास कहने या लिखने के लिए और कुछ नहीं है।”
सही बात है कि इनकी रचनाओं में डिकोड करने के लिए कोई प्रतीक नहीं हैं, इकट्ठा करने के लिए कोई वैकल्पिक अर्थ नहीं हैं। लेखक पहले से ही समझाए गए, पहले से ही डिकोड किए गए उपन्यास को प्रस्तुत करता है। यह एक वास्तविक संभावना को दर्शाता है जिसमें हर उपन्यास पूरी तरह से सक्षम है। कुंदेरा का हर उपन्यास उपन्यास की अनंत क्षमताओं का बचाव करने और इसे अज्ञात क्षेत्र में ले जाने के बारे में होता है। ‘द आर्ट ऑफ़ द नॉवेल’ या उनके बाद के उपन्यासेतर रचना संसार में से भी यदि आप किसी दूसरी रचना को पढ़ते हैं तो कोई खास फ़र्क़ नहीं पड़ता। कुंदेरा का समस्त लेखन एक ही आधार पर स्थित है ।
कुंदेरा अपने उपन्यासों के महिला चरित्रों के चित्रण में विशेष रूप से इतने निर्लज्ज और निर्दयी रहे हैं कि ब्रिटिश नारीवादी जोन स्मिथ ने अपनी 1989 की पुस्तक "मिसोजिनीज़" में घोषणा की थी कि "महिलाओं के बारे में कुंदेरा का समस्त लेखन शत्रुता से भरा प्रतीत होता है। जब वे अपने पुरुष पात्रों का चित्रण करते हैं, तो वह दुनिया को उनके नजरिए से देखते हैं; और जब वह अपनी स्त्रियों का चरित्र गढ़ते है, तो वे उन्हें दर्पण के सामने रखकर उनसे कहते हैं है कि वे सामने देखते हुए अपने कपड़े उतार दें।” एक फिनिश फेमनिस्ट कटीज कैल के अनुसार, “ऐसा प्रतीत होता है कि कुंदेरा अपने महिला पात्रों का उपयोग मुख्य रूप से अपने दार्शनिक मत को प्रतिपादित करने के लिए करते हैं, और फिर उस विचार और दर्शन को अपने पुरुष-पात्रों का वर्णन करने के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करते हैं।”
“द अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग’ एक युवा जोड़े और उनके कुत्ते की कहानी है जो सोवियत आक्रमण के दौरान रह रहे थे। 'अस्तित्व का हल्कापन' नीत्शे की उस अवधारणा पर ठोस प्रतिक्रिया है कि ब्रह्मांड एक लूप में अंतहीन रूप से विद्यमान है, जिसमें सब कुछ पहले से ही उसी तरह घटित हो रहा है जैसा वह है। कुछ पात्र नीत्शे के विचारों के बोझ तले संघर्ष करते हैं, जबकि कुछ यह मानकर चलते हैं कि सब कुछ केवल एक बार होता है - इसलिए अस्तित्ववाद का बोझ असहनीय नहीं रहता। मिलान अपने इस प्रतिनिधि उपन्यास (दि अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग) के कुछ पात्रों जैसे टॉमस (एक चेक सर्जन और बुद्धिजीवी), टेरेज़ा (टॉमस की युवा पत्नी), सबीना (टॉमस की तथाकथित प्रेमिका और सबसे करीबी दोस्त), फ्रांज (सबीना का प्रेमी और जिनेवा का आदर्शवादी प्रोफेसर), कारेनिन (टॉमस और टेरेज़ा का कुत्ता), और सिमोन (टॉमस का पिछली शादी से हुआ पुत्र) के माध्यम से 60 के दशक का चित्रण करते हैं। 1968 के प्राग वसंत से लेकर सोवियत संघ और तीन अन्य वारसा संधि वाले देशों द्वारा चेकोस्लोवाकिया पर आक्रमण के दौरान चेक समाज के कलात्मक और बौद्धिक जीवन की पड़ताल करती यह रचना प्रेम और सेक्स के हल्केपन को दिखाती है। वे प्यार को क्षणभंगुर, बेतरतीब और उलझाव भरा बताते हुए कहते हैं –
जितना अधिक बोझ होगा, हमारा जीवन उतना ही अधिक पृथ्वी के करीब आएगा, उतना ही अधिक वास्तविक और सच्चा हो जाएगा। इसके विपरीत, बोझ की पूर्ण अनुपस्थिति के कारण मनुष्य हवा से भी हल्का हो जाता है, ऊंचाइयों पर चढ़ जाता है, पृथ्वी और उसके सांसारिक अस्तित्व को छोड़ देता है, और केवल आधा वास्तविक बन जाता है, उसकी गतिविधियां जितनी स्वतंत्र होती हैं उतनी ही महत्वहीन होती हैं। तो फिर हम क्या चुनें? भारीपन या हल्कापन? ...जब हम अपने जीवन में किसी नाटकीय स्थिति को अभिव्यक्ति देना चाहते हैं, तो हम भारीपन के रूपकों का उपयोग करते हैं। हम कहते हैं कि कोई चीज़ हमारे लिए बहुत बड़ा बोझ बन गई है। हम या तो बोझ उठाते हैं या असफल होते हैं और इसके साथ नीचे चले जाते हैं, हम इसके साथ संघर्ष करते हैं, जीतते हैं या हारते हैं। और सबीना- उसके ऊपर क्या आ गया था? कुछ नहीं। उसने एक आदमी को छोड़ दिया था क्योंकि उसे ऐसा लग रहा था कि वह उसे छोड़ रही है। क्या उसने उस पर अत्याचार किया था? क्या उसने उससे बदला लेने की कोशिश की थी? नहीं, उनका नाटक भारीपन का नहीं बल्कि हल्केपन का नाटक था। जो कुछ उसके हिस्से में आया वह बोझ नहीं था, बल्कि अस्तित्व का असहनीय हल्कापन था। (पृष्ठ 364)
यदि कुछ भारी भारी सा लग रहा है और आप कुछ हल्का होना चाहते हैं तो ‘नेटफ़िलस्क’ पर इस कहानी पर आधारित फिल्म देखें। अच्छा रहेगा। ■
● प्रो. गोपाल शर्मा, पूर्व प्रोफेसर, भाषा अध्ययन विभाग, अरबा मींच विश्वविद्यालय, इथियोपिया (पूर्व अफ्रीका)
व्हाट्सएप्प- +91 89783 72911.
शनिवार, 25 मार्च 2023
शोधादर्श' का विशेषांक : प्रेम बना रहे ✍️समीक्षक : डॉ. चंदन कुमारी
पुस्तक समीक्षा
'शोधादर्श' का विशेषांक : प्रेम बना रहे
✍️समीक्षक : डॉ. चंदन कुमारी
गन्ने के गाँव खतौली से मोतियों के शहर हैदराबाद तक की संघर्ष और कामयाबी भरी अपनी यात्रा के विविध पड़ावों में जन-जन से संपर्क सूत्र साधते; सहज गति से अविराम मनःस्थिति के साथ निरंतर साहित्य सृजन में लीन और संगोष्ठियों में सदैव तत्पर रहनेवाले प्रो. ऋषभदेव शर्मा (1957) के व्यक्तित्व में अपनत्व की मिठास और वैदुष्य की कांति बड़ी ही सहज भाव से भासती है। अपनी इस सहजता के कारण ही आज यह व्यक्तित्व न सिर्फ भारतवर्ष की भूमि पर ही, वरन हिंदी के वैश्विक पटल पर भी अपनी सशक्त पहचान रखता है। मित्र के रूप में वे अपनी मित्रमंडली की आभा हैं, गुरु के रूप में अपने छात्रों के पथ-प्रदर्शक हैं, एक साहित्यकार के रूप में वे निरंतर साहित्य सेवा में रत हैं और अपने अग्रजों के प्रति परम विनीत हैं। जहाँ ‘प्रेम बना रहे’ का सूत्रवत प्रयोग इनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग है, वहीं एक प्रखर आलोचक की दृष्टि रखने वाले ऋषभदेव शर्मा समाज पर अपनी तीक्ष्ण दृष्टि रखते हुए तेवरी काव्य विधा के एक प्रवर्तक के रूप में भी सुविख्यात हैं। इस व्यक्तित्व के अंतरंग और बहिरंग को समग्रता में आँकने के प्रयास के फलस्वरूप ही नजीबाबाद (उत्तर प्रदेश) से निकलने वाली त्रैमासिक शोध पत्रिका 'शोधादर्श' ने अपना दिसंबर2022 - फरवरी2023 का अंक ‘प्रेम बना रहे’ विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया है। इसके लिए संपादक अमन कुमार बधाई के पात्र हैं। पत्रिका के पक्ष में अतिथि संपादक डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह ने यह आशा व्यक्त की है कि “यह अंक उत्तरप्रदेश के खतौली गाँव से हैदराबाद एवं संपूर्ण दक्षिण भारत तक प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा की व्यक्तिगत एवं साहित्यिक यात्रा का दिग्दर्शन कराने में पूर्णतः सफल होगा।”
यह अंक इस व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द विद्यमान एक आभामंडल को भली प्रकार उजागर करता है। इस आभामंडल में उनकी साहित्यिकता और आंतरिकता दोनों ही स्वर्णरश्मियों की भांति विकीर्ण प्रतीत होती हैं। उनकी आंतरिकता के एक पक्ष को उद्घाटित करते हुए संपादकीय में लिखा गया है कि आपको ऐसे पर्यावरण को बचाने की चिंता है जो झूठ और मक्कारी से दूषित किया जा रहा है। कहना ही होगा कि यह आभामंडल आभासी नहीं है और आकाशी भी नहीं है। यह यथार्थ के ठोस भूतल पर, इस व्यक्तित्व के नैकट्य में रहे अथवा सान्निध्य प्राप्त साहित्यिक रुचि संपन्न व्यक्तियों की स्वानुभूत की गई अनुभूति एवं ऋषभ-साहित्य के स्वाध्याय से गृहीत निष्कर्षों के संयोजन के फलस्वरूप सामने आया हुआ आभामंडल है। इसकी निर्मिति आकृष्ट करती है। इस आकर्षण में स्वाभाविकता तो है पर उससे कहीं अधिक अपनत्व की प्रगाढ़ता है जो इस विशेषांक के शीर्षक की तथता का द्योतक भी है।
पत्रिका में समस्त आलेखों को विषयानुसार पाँच खंडों में वर्गीकृत किया गया है। वे खंड हैं- 1. आँखिन की देखी, 2. कागद की लेखी, 3. गहरे पानी पैठ, 4. चकमक में आग और 5. कबहूँ न जाइ खुमार। इन खंडों में ऋषभदेव शर्मा के जीवन एवं साहित्य के अंतरंग पहलुओं को छूने की चेष्टा की गई है। हाल ही में डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा दो भागों में संपादित लगभग 700 पृष्ठ का बृहत अभिनंदन ग्रंथ “धूप के अक्षर” (2022) लोकार्पित हुआ; और उसके बाद यह विशेषांक ‘प्रेम बना रहे’ आपके समक्ष प्रस्तुत है। अगर इसे उसका परिपूरक भी कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
विशेषांक में सम्मिलित लेखकों ने ऋषभदेव शर्मा के व्यक्तित्व के जिन अंतरंग पहलुओं का साक्षात किया और उसे यहाँ शब्दरूप दिया, उसकी बानगी देखते चलें-
“नए लेखकों को प्रोत्साहित किया ही जाना चाहिए।...अपनी आलोचना को भी इस तरह अपनाने की कला और छोटी-छोटी बातों में भी दूसरों के नाम को आगे बढाने की प्रवृत्ति- दोनों ही विशेषताएँ आज के ज़माने में विरल हैं। निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं।।” (प्रवीण प्रणव)
“उत्तर से आकर सुगंधित हवा का एक झोंका/ दक्खिनी भाषा में घुलमिल गया। आपकी वाणी से/ महीन तराश वाले शब्द निकलते हैं। आपका गंभीर स्वर/ चित्ताकर्षक लगता है|/ आपको सुनना धारोष्ण दूध पीने जैसा है|” (कविता: धन्य पुरुष, प्रो. एन.गोपि)
"विद्वान होते हुए भी विद्वत्ता के आभामंडल से गर्वित न होकर सहजता और अल्हड़पन से सभी के साथ सामंजस्य बना लेना उनकी विशिष्टता है। वे देश के एक बड़े साहित्यकार हैं, यह सभी जानते हैं लेकिन वे एक अच्छे और व्यापक दृष्टिबोध वाले पत्रकार और मीडिया लेखक भी हैं, इसे कम लोग ही जानते हैं।" (अरविंद सिंह)
"ऋषभदेव जी मँजे हुए पत्रकार और समसामयिक विषयों को लेकर लिखने वाले फीचर लेखक भी हैं।" (प्रो. अश्विनीकुमार शुक्ल)
प्रो. संजीव चिलूकमारि ने अपने आलेख में उन्हें ‘ज्ञान तापस’ की संज्ञा से विभूषित किया है।
डॉ. मंजु शर्मा ने इनके व्यक्तित्व के लिए लिखा है ‘कबीर जैसा मन और तुलसी जैसा भाव’।
इन अभिव्यक्तियों में अपनत्व विशेष प्रभावी हुआ है। यथार्थ की ये अभिव्यक्तियाँ उन्हें अतिशयोक्ति लग सकती हैं जो इनके व्यक्तित्व एवं साहित्य से सर्वथा अनजान हैं। इसलिए भी यह विशेषांक पठनीय और शोधोपयोगी है। प्रो. देवराज का ‘खतौली का औचक दौरा’ आलेख विशेष रूप से मर्मस्पर्शी है। इस यांत्रिक, भावहीन और मतलबी दुनिया में आत्मीय स्नेह का स्पर्श पाकर मन अभिभूत हो, कुछ पल को ठिठक जाता है। विद्वत्ता अंतःप्रकाश भले हो पर इसे प्रकाशित करने वाले दीये की घी-बाती तो स्नेह ही है। स्नेह की अभिव्यंजना का प्रतिफल ही ‘प्रेम बना रहे’ है। यानी ये आलेख रस्मी-रिवायती नहीं हैं, बल्कि उस प्रेम का प्रमाण हैं जो दक्षिण में हिंदी-सेवा करते हुए डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने कमाया है!
‘कविता के पक्ष में’ पुस्तक का संदर्भ लेते हुए डॉ. जी नीरजा ने लेखकद्वय (ऋषभदेव शर्मा और पूर्णिमा शर्मा) द्वारा चिह्नित कविता के लोकतांत्रिक दायित्व का उल्लेख किया है जो इस प्रकार है – “युग जीवन को अपने में समेटना, समय के साथ सत्य को पकड़ना, मनुष्य को बिना किसी लागलपेट के संबोधित करना, प्रकाश और उष्णता की संघर्षशील संस्कृति की स्थापना करना और प्रत्येक व्यक्ति के भीतर दायित्व बोध का विकास करके क्रांति की भूमिका तैयार करना।” युगों-युगों से मनुष्यता और लोकतंत्र को जीवित रखने का दायित्व कविता ने सँभाला है। कविता के जिन लोकतांत्रिक दायित्वों को कवि ऋषभदेव शर्मा ने गिनाया है स्वयं को भी उन्होंने इन दायित्वों से बाँधे रखा है। युग की विषमता और भेदभरी दृष्टि जो हर संवेदनशील हृदय में शूल चुभाती है, वह इनके लिए भी शूल है और स्वतंत्रता के अमर बलिदानियों के बलिदान की व्यर्थता को महसूस कर यह कवि कहता है- ‘मेरे भारत में सर्वोदय खंडित स्वर्णिम स्वप्न हो गया।'
पत्रिका के आरंभिक 3 खंड जहाँ डॉ. ऋषभदेव शर्मा के व्यक्तित्व के निरूपण और कृतित्व के मूल्यांकन को समर्पित हैं, वहीं चौथे खंड में "विचार कोश" के रूप में उनके 108 विचारों की माला तथा पाँचवें खंड में 51 चयनित कविताओं की प्रस्तुति ने इस 140 पृष्ठीय विशेषांक को और भी संग्रहणीय बना दिया है। ★
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समीक्षक : डॉ. चंदन कुमारी, संकाय सदस्य, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर विश्वविद्यालय सामाजिक विज्ञान, अम्बेडकर नगर (महू)। संपर्क: संजीव कुमार, आई एफ ए ऑफिस, द्वारा इन्फैंट्री स्कूल, महू (मध्यप्रदेश) 453441. मोबाइल 8210915046. ईमेल- chandan82hindi@gmail.com
साहित्यकार ऋषभ के व्यक्तित्व और कृतित्व का समग्र आकलन● डॉ. सुषमा देवी
नजीबाबाद (उत्तर प्रदेश) से प्रकाशित त्रैमासिक शोध पत्रिका ‘शोधादर्श’ द्वारा हिंदी भाषा-साहित्य के चर्चित हस्ताक्षर प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा के रचना संसार पर आधारित विशेषांक ‘प्रेम बना रहे’ को पाँच खंडों में विभाजित करते हुए प्रकाशित किया गया है। प्रथम खंड ‘आखिन की देखी’ में प्रो. ऋषभदेव शर्मा के सान्निध्य में आए विभिन्न साहित्यकारों, मित्रों और छात्रों के स्वानुभूतिमय क्षणों का अंकन रोचक और जानकारीपूर्ण है। ‘प्रसन्नवदनं ध्यायेत सर्वविघ्नोशांतये’ लेख में प्रवीण प्रणव ने अपनी साहित्यिक यात्रा की दृढ़ता का श्रेय ऋषभदेव शर्मा को देते हुए कहा है कि न जाने कितने ही नवांकुरों का इन्होंने मार्गदर्शन किया और उन्हें साहित्य की मुख्यधारा से जोड़ा है (पृष्ठ-5)। उन्होंने लिखा है कि भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा की अबाध धारा प्रोफेसर शर्मा के माध्यम से निरंतर बहती रही है। प्रो. शर्मा की अहर्निश साहित्य साधना को देखते हुए उनकी समक्ष व्यस्तताओं का पिटारा खोलना अत्यंत कठिन कार्य है। विविध साहित्य-अनुष्ठानों में संलग्न प्रो. शर्मा संवाद में विश्वास करते हैं और स्वयं को वाद-प्रतिवाद से बचा कर रखते हैं। प्रो. शर्मा का पचासों किताबों का लेखन कार्य हो अथवा वक्तव्य, सतसइया के दोहरे से प्रतीत होते हैं। वरिष्ठ तेलुगु साहित्यकार आचार्य एन.गोपि ने ‘धन्य पुरुष’ नामक अपनी कविता के माध्यम से प्रो. शर्मा के व्यक्तित्व को निरूपित किया है। डॉ. अरविंद कुमार सिंह ने ‘यूँ ही नहीं कोई उत्तर और दक्षिण का संबंध सेतु बन जाता है’ नामक लेख में प्रो. शर्मा के व्यक्तित्व को चित्रित करते हुए लिखा है, ‘मल्टी डाइमेंशनल प्रतिभा और विराट मेधा बहुत कम लोगों में होती है। आप उन्हें जिस भी एंगल से देखेंगे कवि, आलोचक, गद्यकार, मीडिया लेखक या एकेडेमियन वैसे ही दिखने लगेंगे।’ (पृष्ठ-8)। उन्होंने प्रो. शर्मा के तेवरीकार रूप को उद्घाटित करते हुए उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को चित्रित किया है। डॉ. अरविंद कुमार सिंह ने प्रो. शर्मा को स्वयं के लिए दक्षिण का प्रवेश द्वार कहा है | डॉ अश्विनी कुमार शुक्ल प्रो. ऋषभदेव शर्मा के जन्मोत्सव के अवसर पर प्रकाशित ‘धूप के अक्षर’ अभिनंदन ग्रंथ की ‘प्रेम पगे -धूप के अक्षर’ में विवेचना करते हुए कहते हैं, ‘धूप के अक्षर सुनहरे/ न कभी पल भर को ठहरे/ राज इनके बहुत गहरे/ दे रहे संसृति पर पहरे।’ (पृष्ठ-10)। उन्होंने प्रो. शर्मा के साथ व्यतीत किए आत्मीय क्षणों को साझा किया है। प्रथम पंडित अपने दादाजी प्रो. ऋषभदेव शर्मा को एक दिलचस्प व्यक्तित्व का धनी मानते हैं। प्रसिद्ध गजलकार संतोष रज़ा गाजीपुरी प्रो. शर्मा के बारे में कुछ भी बोलना सूरज को दीया दिखाने के समान मानते हैं। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आलोक पांडे ने ‘शर्मा जी, मेरे वाले’ लेख में कहा है कि 'कितना सारा कुछ उन्होंने लिखा और संपादित भी किया है। और अच्छा लिखा है। नई बातें कही हैं। नए विषयों पर लिखा है। सिनेमा पर चकित करने वाला लेख तो मेरी ही किताब के लिए लिखा है।’ (पृष्ठ-15)। उनके ऊर्जावान, प्रखर व्यक्तित्व की प्रशंसा में प्रो. आलोक पांडे पूर्णतः निमग्न हो जाते हैं। डॉ. सीमा मिश्र ने प्रो. शर्मा को 'ज़िंदादिल प्रेरक विभूति’ कहा है।
भारतीय साहित्य-कला-संस्कृति संस्थान के संस्थापक वरिष्ठ गीतकार इंद्रदेव ‘भारती’ ने ‘डॉ ऋषभ देव शर्मा: जीवन वृत्त’ नामक लेख में प्रो. शर्मा के जीवन को संक्षेप में चित्रित किया है। डॉ. संजीव चिलुकमारि ने 'एक आत्मीय मुलाकात' में प्रो. शर्मा को साधु स्वभाव वाला कहा है। हरिद्वार से गुरुकुल ज्वालापुर महाविद्यालय के डॉ. सुशील कुमार त्यागी ने 'हिंदी साहित्य के प्रख्यात विद्वान प्रो. ऋषभदेव शर्मा' लेख में लिखा है कि गद्य-पद्य तथा संपादन कला में प्रो. शर्मा की लेखनी स्वयं में उल्लेखनीय है। हेमा शर्मा ने अपने ननदोई प्रो. शर्मा के लेखन संसार पर अपने आत्मीय उद्गार व्यक्त किए हैं। न्यू जर्सी से देवी नागरानी ने प्रो. शर्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला है। वे कहती हैं, 'प्रो. शर्मा के साहित्य संसार के बिंब देखे जा सकते हैं। उनके ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न परिचायक उनके शब्द संसार के अदृश्य में दृश्य स्वरूप मिलेंगे । गद्य-पद्य, शोध क्षेत्र में वे एक अलग पहचान रखते हैं।' (पृष्ठ- 19)। बिजनौर से इ. हेमंत कुमार जी 'अपनी बात' में प्रो. शर्मा की प्रशंसा करते हैं ।
वर्धा के महात्मा गांधी अनुवाद विद्यापीठ के पूर्व अधिष्ठाता प्रोफेसर देवराज ने 'प्रो. देवराज की डायरी : खतौली का औचक दौरा' में प्रो. शर्मा के साथ व्यतीत अपने संस्मरणात्मक क्षणों को साझा किया है। डॉ. हेतराम भार्गव ने 'साहित्य नक्षत्र ऋषभदेव शर्मा' कविता में अपने मनोद्गार व्यक्त किए हैं। डॉ मंजु शर्मा ने 'सब हो लिए जिनके साथ....' लेख में साहित्य शास्त्र की बारीकियों से लेकर सिलाई मशीन और साइकिल के पुर्जों तक अनेक लौकिक विषयों का साधिकार ज्ञान रखने वाले प्रो. शर्मा के प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया है।
खंड-दो 'कागज की लेखी' में इस पत्रिका की संयुक्त संपादक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने 'कविता का पक्ष: मनुष्यता का पक्ष' में कविता के इतिहास, विकास एवं उद्देश्य को प्रो. ऋषभदेव शर्मा एवं उनकी अर्द्धांगिनी डॉ पूर्णिमा शर्मा की दृष्टि से विवेचित किया है। डॉ. सुपर्णा मुखर्जी के 'कविता है सतत कालयात्री' लेख में प्रो. शर्मा की कृति 'हिंदी कविता: अतीत से वर्तमान' की प्रासंगिकता को निरूपित किया गया है। डॉ. अर्पणा दीप्ति का 'कविता के पक्ष में बहस और गवाही' लेख तथा प्रो. गोपाल शर्मा के गहन लेख 'शब्दहीन का बेमिसाल सफर' में उनकी कलम के कमाल को बखूबी सिद्ध किया गया है। डॉ. जयप्रकाश नागला ने 'संपादकीय के सशक्त हस्ताक्षर: ऋषभदेव शर्मा' लेख में लोकतंत्र पर प्रो. शर्मा की बेबाक टिप्पणी को सराहा है। अवधेश कुमार सिन्हा ने 'कोरोना काल का मुकम्मल ऐतिहासिक दस्तावेज' लेख में प्रो. शर्मा के दिन-प्रतिदिन के लेखन-निखार को विवेचित किया है। प्रो. गोपाल शर्मा ने 'चाँदी के वर्क लगा आँवले का मुरब्बा' तथा 'लोकतंत्र के घाट पर नेताओं की भीड़' में, डॉ चंदन कुमारी ने 'जागरूक और बेबाक पत्रकारिता की मिसाल' में तथा डॉ. मिलन बिश्नोई ने 'सवाल और सरोकार में आमजन के प्रश्नोत्तर' लेख में पत्रकार के रूप में ऋषभदेव शर्मा की संवेदनशीलता तथा साफगोई का सटीक प्रतिपादन किया है। डॉ. रामनिवास साहू का 'पठनीयता के उच्च शिखर', डॉ सुषमा देवी का 'विचार और संवाद का सतत प्रवाह', आचार्य प्रताप का 'लोकतंत्र की विसंगतियों पर प्रहार', प्रो. देवराज का 'कथाकारों की दुनिया में विचरता एक कवि' और डॉ. सुषमा देवी का 'चुनावी राजनीति पर बेवाक टिप्पणियाँ' आदि लेख संदर्भोचित एवं सटीक बन पड़े हैं। डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा का 'समानांतर दुनिया रचते हैं लेखक', डॉ. सुपर्णा मुखर्जी का 'सैर कथाकारों की दुनिया की' डॉ.सुषमा देवी का 'तेवरीकार की आलोचना दृष्टि: कथाकारों की दुनिया', डॉ. सुष्मिता घोष का 'अंतरंग प्रणय दशाओं की समग्र अभिव्यंजना', द्विवागीश गुडला परमेश्वर का 'प्रेम बना रहे में प्रेम निरूपण' जैसे लेख प्रो. शर्मा के लेखन की सूक्ष्मता का परिचय कराते हैं। अतुल कनक के 'स्त्रीपक्षीय कविताओं का राजस्थानी पाठ', डॉ बनवारी लाल मीना तथा डॉ. इबरार खान के 'प्रेम बना रहे में अभिव्यक्त प्रेम', डॉ. इसपाक अली के 'दार्शनिकता, लोकग्रंथ और लोकगंध: सूँ साँ माणस गंध' में कवि ऋषभ की स्त्रीपक्षीय और मानवीय चेतना को उजागर किया गया है। डॉ. सुपर्णा मुखर्जी की समीक्षा 'प्रेम कविताओं का अनूठा संग्रह है प्रेम बना रहे' में प्रेम में पूर्णता की कवि दृष्टि को निरूपित किया गया है। डॉ. योगेंद्र नाथ शर्मा 'अरुण' ने 'हिंदी महत्ता और इयत्ता की पहचान' प्रो. शर्मा के रूप में कराई है। डॉ. रामनिवास साहू का 'धूप के अक्षर' बोले तो????', डॉ चंदन कुमारी का 'तुलसी, राम और रामायण का नाता', डॉ. सुपर्णा मुखर्जी का 'कोमलता के परे माणस गंध', डॉ. संगीता शर्मा का 'पीड़ा, आक्रोश और उनके पार' तथा डॉ. गोपाल शर्मा का 'गुड़ की भेली-सा इकसार स्वाद' में प्रो. ऋषभ की विश्व दृष्टि से परिचित कराया गया है। कहा जा सकता है कि इस खंड में उनकी सभी प्रमुख पुस्तकों की परीक्षा और विवेचना सम्मिलित है।
खंड-तीन 'गहरे पानी पैठ' में प्रो. गोपाल शर्मा ने अपने विस्तृत और गवेषणापूर्ण आलेख 'जैसे कि बीते दिनों का कबीर वापस आ गया हो' में कवि ऋषभ की कविताओं को सशक्त, गुंजायमान तथा मनोरंजक कहा है। डॉ. अनीता शुक्ल के 'रिचर्ड्स के मूल्य सिद्धांत की तुला पर 'देहरी' (स्त्रीपक्षीय कविताएँ) का आकलन' में उनके सामाजिक, साहित्यिक तथा मानवीय सरोकार को बताया गया है। रश्मि अग्रवाल के लेख में प्रो. ऋषभदेव शर्मा एक वृद्धावस्था-विमर्शक के रूप में दिखाई देते है। डॉ.योगेंद्रनाथ मिश्र के 'फर्क तो पड़ता है जी नाम से भी' में उनकी अभिव्यंजना की गहराई और कथन की वक्र भंगिमा का गहन विवेचन निहित है। डॉ अंजु बंसल के 'हिंदी साहित्य के तिलक', हुडगे नीरज के 'वैश्विक आतंकवाद पर कलम की चोट', पुनीत गोयल के 'आपसे मिलती है हमें प्रेरणा', डॉ. चंदन कुमारी के 'एक स्तंभकार का सामयिक चिंतन', मीनू कौशिक 'तेजस्विनी' के 'दीवाना हुआ ऋषभ', डॉ. सुपर्णा मुखर्जी के 'प्रेम और मुठभेड़' तथा डॉ. चंदन कुमारी के 'अखंडता, प्रेम और आक्रोश के कवि ऋषभ' नामक लेखों में प्रो. शर्मा की प्रेम के प्रति समर्पित एवं उदार दृष्टि से लेकर समसामयिक प्रश्नों पर बेबाक राय का गहन विश्लेषण किया गया है। डॉ. महानंदा बी. पाटिल के 'ऋषभदेव शर्मा की कविता में स्त्री विमर्श', प्रवीण प्रणव के 'शिल्प की सीमा से बाहर लिखना कठिन होता है', डॉ. अरविंद कुमार सिंह के 'धूप के अक्षर- समीक्षा के बहाने' आदि में भी बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रो. शर्मा के लेखन की परिपूर्ण मीमांसा की गई है ।
खंड-4: 'चकमक में आग' में डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने अत्यंत परिश्रम और धैर्य से 'ऋषभदेव शर्मा विचार कोश' प्रस्तुत किया है। इसमें अंग्रेजी-हिंदी-मिथ, अनुवाद-भाषा के दो रूप, अस्मितावादी विमर्श, आक्रोश-अगीत, आधुनिकता बोध, उत्तर आधुनिक भाषा संकट, उपभोक्तावाद: बाजार की संस्कृति, कविता - प्रेम बनाम बाजार , कविता - राजनीति, राष्ट्रीयता, लोक संपृक्ति: रिश्ते-नाते, व्यक्ति बनाम समाज, समकालीन लोक संपृक्ति, काव्य प्रयोजन - जन जागरण, काव्य प्रयोजन- शिवेतरक्षतये, काव्य प्रयोजन - साहित्य का उद्देश्य, चेतना - राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय, जनसंचार: भाषा रूप का सामर्थ्य, जिजीविषा, ज्ञान - विज्ञान की भाषा, पत्रकारिता की भाषा आदि विभिन्न विषयों पर प्रो. शर्मा के 108 चिंतनपरक उद्धरण संदर्भ सहित संकलित किए हैं, जो सामान्य पाठकों से लेकर शोधार्थियों तक के लिए बेहद उपयोगी हैं।
खंड-5: 'कबहूँ न जाइ खुमार' नामक भाग में अमन कुमार त्यागी ने प्रो.ऋषभदेव शर्मा के समग्र काव्य से चुनी हुई 53 कविताएँ और 32 मुक्तक संग्रहित किए हैं।
'शोधादर्श' के इस विशेषांक के अंत में प्रो. ऋषभदेव शर्मा के सूक्त वाक्य पर आधारित कविता 'प्रेम बना रहे' भी संकलित है। कुल मिलाकर यह विशेषांक प्रो. ऋषभदेव शर्मा के बहुआयामी साहित्यिक रूप से पाठकों को परिचित कराने में पूर्णतया सफल है।
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डॉ सुषमा देवी,
असिस्टेंट प्रोफेसर(हिंदी),
भाषा विभाग,
भवंस विवेकानंद कॉलेज
सैनिकपुरी-500094.
मो. 99635 90938.







