शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

(डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा) और जितने दीप हैं, मैं सभी में हूँ!

और जितने दीप हैं, मैं सभी में हूँ!

  • गुर्रमकोंडा नीरजा  

                    [1]

“मैं चला नजीबाबाद -

नसीबाबाद समझकर आया 

सर्वत्र प्रेम ही पाया 

'गर मिलता भी है गरल 

उसे जगदीश निगल जाते हैं।” (प्रेमचंद्र जैन, गरल जगदीश निगल जाते हैं)।


सच में नजीबाबाद धन्य है। धन्य क्यों नहीं होगा, उसने ‘गुरु जी’ का असीम प्रेम जो पाया! ‘गुरु जी’! हाँ, इसी नाम से जाने जाते हैं डॉ. प्रेमचंद्र जैन जी - मेरे गुरु के गुरु के गुरु। इस अर्थ में वे मेरे परदादा गुरु हुए। इस गुरु-शिष्य परंपरा के कारण ही मुझे परदादा गुरु का अहेतुक स्नेह और आशीर्वाद प्राप्त हुआ।  

जब 2015 में गुरु जी के सम्मान में ‘निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक’ ग्रंथ की तैयारी हो रही थी, तो मुझे भी उस सारस्वत यज्ञ में गिलहरी के समान सहयोग करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 2016 में जब ग्रंथ प्रकाशित होकर आया, तो उन्हें समर्पित करने का निश्चय किया गया था। 3 दिसंबर, 2016 को अभिनंदन समारोह का आयोजन दिल्ली में हुआ था। सुबह 8 बजे दिल्ली पहुँचना था। लेकिन मेरा भाग्य का खेल कि गाड़ी रात को 8 बजे दिल्ली स्टेशन पहुँची। मैं विचलित होती रही कि गुरु जी से मिले बिना ही मुझे वापस लौटना पड़ेगा। लेकिन देवराज जी और ऋषभदेव शर्मा जी ने मुझे हिम्मत नहीं हारने दी। जब आयोजन स्थल पहुँची तो देखा, गद्दी बिछे हुए मंच पर गुरु जी शांत मुद्रा में बैठे हुए थे, लेकिन चेहरे पर थोड़ी सी परेशानी दिखाई दी। मेरे कारण गुरु जी को परेशानी जो झेलनी पड़ी। पहली बार गुरु जी का साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ। (अखण्डमण्डलाकारम् व्याप्तम् येन चराचरम्। तत्पदम् दर्शितम् येन तस्मै श्रीगुरुवे नमः॥)

गुरु जी का भरपूर आशीर्वाद बटोरकर मैं वापस हैदराबाद लौटी। उसके बाद से समय-समय पर गुरु जी से फोन पर बात हो ही जाती थी। त्योहार के दिन तो गुरु जी के फोन से नींद खुलती थी। उनके आशीर्वाद और स्नेह की वर्षा में मैं भीग चुकी हूँ। (कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आइ।/ अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराइ।) आज भले ही गुरु जी भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आत्मा हमारे साथ है और हमें असीसती रहती है। पग-पग पर उनकी उपस्थिति का अहसास होता है, क्योंकि गुरु जी के साथ आत्मिक रिश्ता जो बन गया था- जो अटूट है। गुरु जी के शब्दों में कहूँ तो -

‘भावनाओं से जुड़ा प्रेम

अटूट होता है’ (प्रेमचंद्र जैन, प्रेम) 

                   [2]

प्रेम के पीर   

डॉ. प्रेमचंद्र जैन स्वाभिमानी, कर्मठ और अदम्य साहसी थे। उनके स्वभाव के संबंध में डॉ. देवराज का यह कथन उल्लेखनीय है- “स्वभाव से खिलंदड़ और हँसोड़।” (शर्मा:2016:61)। नित्यानंद मैठाणी कहते हैं कि शरीर से तो वे दुबले-पतले थे किंतु उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि सभी उनसे डरते थे। उनसे एक बार यदि कोई मिलते तो उन्हें आजीवन भूल नहीं सकते। ऐसे थे गुरु जी। अपरिचित व्यक्ति से भी ऐसे मिलते जैसे उन्हें बरसों से जानते हों। उनके व्यक्तित्व में विद्वत्ता और वत्सलता के संगम को देखा जा सकता है। उन्हें यदि प्रेम का 'पीर’ कहें तो अतिशयोक्ति नहीं।   

जैन परंपरा के मर्मज्ञ विद्वान थे डॉ. प्रेमचंद्र जैन। जैन धर्म अपनी मान्यताओं, स्थापनाओं, कर्मकांड और रूढ़ियों के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन वे इस धर्म में घुस आए पाखंडों और रूढ़ियों का खुलकर विरोध करते थे। इतना ही नहीं, वे जैन लोगों के जीवन में जमी कुरीतियों की धज्जियाँ भी उड़ाते थे। वे धर्म को लोकहित-कारक के अर्थ में स्वीकारते थे। उनके अनुसार धर्म कर्तव्य है। वे बार-बार यही कहते थे कि “धर्म का लोकहित-कारक अर्थ ‘कर्तव्य’ को ही स्वीकार करना चाहिए। हिंदू-मुस्लिम-ईसाई आदि संप्रदाय या मत मानने से विवादों को विराम देने का मार्ग प्रशस्त नहीं होता है। मेरा इसी प्रकार का विश्वास है। कर्तव्य और धर्म शब्द प्रायः एक ही संदर्भ में प्रयुक्त करने से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।... मैं अपने अनुभव के आधार पर कहूँगा कि वर्तमान में धर्म और कर्तव्य की व्याख्या ही बदल गई। इसी के कारण व्यक्ति अपने पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति घनघोर उपेक्षा के लिए लेशमात्र शर्मसार होने को तैयार नहीं है।” (शर्मा:2016:406)    

प्रेमचंद्र जैन जीवन भर ढाई आखर प्रेम को ही महत्व देते रहे। उनके अनुसार “प्रेम सदैव अनुभूति परक रहा है, अतएव प्रेम को किसी परिभाषा के घेरे में अनुकूलित नहीं किया जा सकता। प्रेम मानव-स्वभाव की ही संपत्ति हो ऐसी बात नहीं है। वह तो पशु-पक्षियों में भी विद्यमान है और यदि प्रेम की सत्ता को प्राणिमात्र में भी स्वीकार किया जाए तो वह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।” (शर्मा:2016:139)। उनके अनुसार जिस व्यक्ति में प्रेम की पीर जागृत हो गई, उसका जीवन सार्थक है। वे भावनाओं से जुड़े हुए प्रेम को ही महत्व देते थे।   

डॉ. प्रेमचंद्र जैन मानवता के पक्षधर थे। धर्म और संप्रदाय के कटघरे में वे फिट ही नहीं होते। वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे। वे सही अर्थों में सामाजिक थे। उनके गुणों के बारे में उन्हीं के शब्दों से जान लें - “ज़मीन का आदमी था, समाज से जुड़ा था। तमाम सारे छात्र-छात्राओं की समस्याएँ, उनके निदान और दूर करने के उपाय; विविध शैक्षणिक सामाजिक संस्थाओं में होने वाले समारोहों-आयोजनों में शिरकत करने के लिए; अपने अध्ययन-अध्यापन के उत्तरदायित्व को मनसा-वाचा-कर्मणा निभाते हुए समय देना - हर किसी के लिए संभव नहीं होता। मुझमें इसी प्रकार के बहुचर्चित गुण-दोष थे।” (शर्मा:2016:404)। अपने इन्हीं गुण-दोषों के कारण वे अपने विद्यार्थियों और नजीबाबाद वासियों के निकट थे और उन्हें बहुत प्रिय थे। नजीबाबाद में न ही उनका जन्म हुआ और न ही शिक्षा-दीक्षा। यह तो उनकी कर्मभूमि थी। लेकिन वे नजीबाबाद के ही होकर रह गए - उनका काबा और काशी यही नजीबाबाद था। उन्होंने इस बात को स्पष्ट किया कि “यहाँ मेरे बस जाने या रुक जाने के निजी कारण हैं और पूर्णतः स्वांतः सुखाय हैं।” (शर्मा:2016:406) 

                   [3]

सदैव तत्परता 

डॉ. प्रेमचंद्र जैन एक ऐसे व्यक्ति थे जिनमें अदम्य जिजीविषा और कुछ करके दिखाने की भरपूर इच्छा शक्ति थी। यह बात उनके गुरु डॉ. शिवप्रसाद सिंह के कुछ पत्रों से भी स्पष्ट होती है- “तुम संकल्प को यथासमय सही ढंग से पूरा करने में सदैव तत्पर रहे हो।” (शर्मा:2016:330)। प्रेमचंद्र जैन कहते तो कुछ नहीं, बल्कि करके अवश्य दिखा देते थे। वे बहुत ही साहसी थे। वे जो कार्य हाथ में लेते थे, उसे पूरा करने तक दिन-रात एक कर देते थे। शिवप्रसाद सिंह के अभिनंदन ग्रंथ के लिए आलेख संग्रहीत करते समय उन्हें बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ा होगा। गुरु अपने शिष्य को परेशान होते नहीं देख सकते, इसीलिए शायद शिवप्रसाद सिंह ने उन्हें एक पत्र (8.8.88) लिखा था- “तुम इतना अस्वस्थ रहते हुए भी शिवप्रसाद नामक व्यक्ति के लिए क्यों छटपटा रहे हो? क्या किया शिवप्रसाद सिंह ने? पूरी ज़िंदगी बस एक अपढ़ गँवार व्यक्ति के अनुभव ही तो मिले- वह भी सिर्फ उन्हें जो अपने को पाठक कहते हैं।” (शर्मा:2016:331)। लेकिन प्रेमचंद्र जैन जिद्दी भी कम नहीं थे। उसी जिद के परिणाम स्वरूप हिंदी साहित्य जगत को शिवप्रसाद सिंह का अभिनंदन ग्रंथबीहड़ पथ के यात्री’ प्राप्त हुआ। (जेहि का जेहि पर सत्य सनेहू, सो तेहि मिलहिं न कछु संदेहू। - मानस)

                   [4] 

गुरु बिन भवनिधि तरहिं न कोई 

प्रेमचंद्र जैन शिष्य वत्सल गुरु थे। माता-पिता से प्राप्त सुलभ संस्कारों के साथ-साथ गुरुजनों द्वारा प्रदत्त ज्ञानराशि से वे आजीवन बँधे रहे। उन्होंने स्वयं यह स्वीकृत और घोषित किया कि “गुरुवर डॉ. शिवप्रसाद सिंह और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व और कृतित्व के नैकट्य से जो मूल मंत्र ग्रहण किए थे, वे मेरे अंतिम समय तक साथ रहेंगे।” (शर्मा:2016:406)। इन मंत्रों में एक मूल मंत्र है- “अपने आपको दलित द्राक्षा की भाँति निचोड़कर जब तक सर्व के लिए निछावर नहीं कर दिया जाता, तब तक स्वार्थ खंड सत्य है, मोह को बढ़ावा देता है, तृष्णा को उत्पन्न करता है और मनुष्य को दयनीय कृपण बना देता है। कार्पण्य दोष से जिसका स्वभाव उपहृत हो गया है, उसकी दृष्टि म्लान हो जाती है, वह स्पष्ट नहीं देखा पाता, वह स्वार्थ भी नहीं समझ पाता, परमार्थ तो दूर की बात है।” (शर्मा:2016:406)। इन मंत्रपूत वाक्यों से प्रेमचंद्र जैन हमेशा ही सामाजिक उत्तरदायित्वों को पूरा करने की शक्ति प्राप्त करते रहे। इसीलिए शिष्यों के लिए दलित द्राक्षा की तरह अपने आपको निचोड़कर प्रस्तुत कर सके। वे शिक्षकों से यह प्रश्न करते थे कि “यदि वे स्वयं गहन अध्ययन पूर्वक कृपणता और पक्षपातयुक्त व्यवहार छोड़कर अपने उत्तरदायित्व का ईमानदारी से पालन करेंगे तो उन्हें उनके कार्य में क्यों बाधा आएगी?” (शर्मा:2016:407)। उनका मानना था कि शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच शिष्टाचार के मर्यादित आचरण के अतिरिक्त अन्य दूरियाँ नहीं होनी चाहिए। तभी एक स्वस्थ परंपरा पनपेगी। 

प्रेमचंद्र जैन की कथनी और करनी में कहीं कोई अंतर नहीं दीखता। अपने शिष्यों के लिए वे कैसे गुरु थे, यह तो उन लोगों के वक्तव्यों से ही जाना जा सकता है। “गुरु जी के अध्यापन के समय कक्षा का वातावरण कभी बोझिल या उबाऊ नहीं रहता था। विषय को इतना रोचक बना देते थे कि कोई छात्र विषय से भटक नहीं सकता था। ... सारा ज्ञान छात्रों के मस्तिष्क में उड़ेलने का प्रयत्न करते थे और छात्र भी पूरे मनोयोग के साथ ज्ञान प्राप्त करना चाहते थे। छात्र दूसरे अध्यापकों की कक्षा अवश्य छोड़ देते थे किंतु गुरु जी की कक्षा छोड़ने का दुःसाहस कभी नहीं करते थे। दूसरी कक्षा के छात्र भी गुरु जी की कक्षा में बैठने का प्रयास करते थे।” (डॉ. निर्मल शर्मा)। “मैंने गुरु जी को कभी गुरु जी नहीं कहा, एक इकलौती शिष्या मैं ही हूँ, जिसने हमेशा उन्हें अंकल कहा।” (डॉ. हेमलता राठौर)। देवराज जी और गुरु जी तो हमेशा एक साथ ही पाए जाते थे। “नजीबाबाद के लोग बरसों यह विश्वास करते हुए रहे कि देवराज का पता करना है, तो गुरु जी से पूछो और गुरु जी के बारे में कुछ जानना है, तो देवराज से पूछो।” प्रेमचंद्र जैन की इस शिष्य वत्सलता को गुरु मंत्र की तरह डॉ. देवराज जैसे उनके शिष्यों ने भी अर्जित किया है। (गुरु बिन भवनिधि तरहिं न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥)

प्रेमचंद्र जैन माता-पिता और गुरुओं से प्राप्त संस्कारों का पालन आजीवन करते रहे। वे भविष्य की चिंता नहीं करते थे। शिष्यों की समस्याओं को सुलझाने में व्यस्त गुरु के पास भविष्य के संबंध में सोचने का अवसर कहाँ होता! “अध्यापन में भी तीनों कालों में वर्तमान को सँवारने के लिए अधिकतम क्षमताओं का उपयोग करने पर बल दिया। मजबूत नींव, भूतकाल में तलाशने के बाद ही वर्तमान पर ध्यान केंद्रित कर लिया जाए तो भविष्य की चिंताओं को लादे रखना बुद्धिमत्ता नहीं है।” (शर्मा:2016:404)। यह उनकी दृढ़ मान्यता थी। 

                    [5]

चश्म नम हैं मुफ़लिसों को देखकर   

प्रेमचंद्र जैन परिवार और रिश्तों को महत्व देते थे। उनकी मान्यता है कि जब व्यक्ति आत्मिक स्तर पर एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं तो किसी भी तरह की समस्याएँ नहीं होतीं। एक समय ऐसा था जब भारत भर में संयुक्त परिवार की परंपरा को सामाजिक मान्यता मिली थी। लेकिन “अब उसके समाप्तप्राय हो जाने से पारिवारिक, कौटुंबिक, यहाँ तक कि वैयक्तिक समस्याएँ दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं। उधार ली गई व्यक्तिवादी संस्कृति स्वार्थपरता, असहिष्णुता, हिंसा तथा पाशविक आचरण को बढ़ावा देने में सहायक ही हुई है।” (शर्मा:2016:405)। 

व्यक्ति स्वार्थलोलुप होता जा रहा है। मोह-माया में पड़कर इतना अंधा होता जा रहा है कि वह सही और गलत की पहचान ही नहीं कर पा रहा है। काला धन, चोर बाजारी, रिश्वत, महंगाई, बलात्कारियों की दुनिया है चारों ओर। प्रेमचंद्र जैन इस दुनिया को छोड़ आने की बात करते हैं। आदमी को आदमी की तरह जीने पर बल देते हैं। उनका मन विद्रूपताओं को देखकर व्यथित हो जाता है। उनकी दृष्टि में कोई हिंदू-मुस्लिम-ईसाई-जैन नहीं है, बल्कि सब केवल मनुष्य हैं। जब इन पर विपत्ति आती है, तो उनका मन द्रवित हो जाता है। राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद के बाद जब अयोध्या में मंदिर तोड़ने की अघटनीय घटना हुई, तब नजीबाबाद में भी नाजुक स्थितियाँ पैदा हुईं। गुरु जी ने अपनी सूझबूझ से वहाँ शांति का वातावरण कायम किया। “फिरकापरस्त और सांप्रदायिक ताकतों को अहसास हो गया कि इस नगर में दंगा करवाना आसान काम नहीं है। .... नजीबाबाद हिंदू- मुस्लिम सांप्रदायिक दंगों की आग में बरबाद होने से बच गया।” (शर्मा:2016:66)। वे आदमी को इनसान के रूप में बदलने के लिए आग्रह करते हैं। हैवानियत छोड़कर इनसानियत को अपनाने की अपील करते हैं। (शर्मा:2016:127)           

[6]

इष्ट फल 

डॉ. प्रेमचंद्र जैन अपने दायित्व को बखूबी जानते थे। उन्होंने न ही अपने दायित्वों से मुँह मोड़ा और न ही पलायन का रास्ता अपनाया। शिक्षक- शिक्षार्थियों के बिगड़ते रिश्तों के बात जब आती, तो वे डंके की चोट पर कहते थे कि “हम सबको मिलकर इन परिवर्तनों पर गंभीरता से सोचने- विचारने और चर्चा करने की आवश्यकता है। साथ ही जागरूक होना और जागरूक करना है। अब भी बिगड़ा कुछ नहीं है। अलबत्ता अपनी- अपनी स्वार्थपरता एवं प्रलोभन का नियंत्रण करना है। अपने सामाजिक तथा व्यक्तिगत दायित्वों को ईमानदारी से निभाने की आवश्यकता है। हमें राष्ट्रीय भावनाओं को शून्य होते देख वेदना होनी चाहिए और एक नागरिक के कर्तव्यों से विमुख नहीं होना चाहिए। विद्यार्थी, अभिभावक और शिक्षक का आपसी संबंध निकटता का रहेगा और वे अपने- अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहेंगे तो समस्याएँ स्वतः नज़र नहीं आएँगी। निःसंदेह शिक्षकों का उत्तरदायितव अपेक्षाकृत बड़ा है। प्रथमतः उन्हें कर्तव्यनिष्ठ, कर्मठ एवं सच्चरित्र होने की अनिवार्यता है।” (शर्मा:2016:434)। यदि कहीं भी कभी भी एक शिक्षक दुराचार में लिप्त पकड़ा जाएगा, तो समाज की निगाहें संपूर्ण शिक्षक जगत पर ही उठती हैं।   

साहित्यकारों के दायित्व के संबंध में भी प्रेमचंद्र जैन का यह कथन उल्लेखनीय है कि 'जो उपेक्षित है, वह साहित्य का विषय होना ही चाहिए।' उनकी मान्यता थी कि “संवेदना ही कविता की जननी है। अपनी रचना को कवि संतानवत सँवारता, दुलारता और सहेजता है। न केवल इतना ही बल्कि उन्हें संरक्षित करना भी निजधर्म मानता है।” (शर्मा:2016:389)। शोषक की व्यथा से शोषित की व्यथा भिन्न और विकट होती है। इसलिए प्रेमचंद्र जैन सहृदयों से यह अपील करते हैं कि “इसी विकटता का, दो टूक उत्तर - / साहित्यकार का दायित्व है।” (प्रेमचंद्र जैन, अहसास)। 

संवेदनाओं के अभाव में तो रचनाएँ जन्म ले ही नहीं सकतीं। संवेदना से ही साहित्यकार का अनुभूति कोश समृद्ध होगा। प्रेमचंद्र जैन का अनुभूति कोश बहुत समृद्ध था। वे कोरे भाग्यवाद में विश्वास नहीं रखते थे। उनकी माँ की सीख उनके साथ चलती थी- ‘होकर सुख में मगन न फूले, दुख में कभी न घबरावे।’ वे अकेले चलते गए और लोग उनके साथ चलते गए और कारवां बनता गया -

    आएगा सवेरा 

    अब नहीं हूँ मैं अकेला 

    और जितने दीप हैं 

    मैं सभी में हूँ 

    पी रहा हूँ सब अँधेरा 

    थको तुम मत मीत 

    मृत्यु से भयभीत 

    अमरत्व की श्रम की - 

    सदा ही जीत। (नेह बाती चुक रही है)   

‘गुरु जी’ अपने गुरु शिवप्रसाद सिंह द्वारा प्राप्त गुरुमंत्र को हमें विरासत में दे गए- “चिंताएँ छोड़कर नियति से लड़ो ... लड़ना ही धर्म है। सारा जीवन बन जाए युद्ध। ... तभी मृत्यु का भय भाग जाता है।”   000

संदर्भ ग्रंथ-

शर्मा, ऋषभदेव सं. (2016). निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक. नजीबाबाद : परिलेख         


- डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, सह-संपादक ‘स्रवंति’, असिस्टेंट प्रोफेसर, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, खैरताबाद, हैदराबाद- 500004, ईमेल: neerajagkonda@gmail.com 

द्रष्टव्यइतिहास हुआ एक अध्यापक/ संपादक- दानिश सैफ़ी/ अविचल प्रकाशन, ऊँचा पुल हल्द्वानी-263139/ 2022/ पृष्ठ 334-340.


गुरुवार, 14 अप्रैल 2022

(प्रो. गोपाल शर्मा) पुरुष कहाणी हौं कहौं जसु पत्थावे पुन्नु

पुरुष कहाणी हौं कहौं जसु पत्थावे पुन्नु 

(अपभ्रंश कथाकाव्य से हिंदी प्रेमाख्यानक तक)

  • गोपाल शर्मा 

“सिद्ध, नाथों और जैन कवियों, रासउ रचनाकारों आदि के कृतित्व में आदिकाल हिंदी क्षेत्र के रचनात्मक वैविध्य को यौं अपनी सच्ची प्रस्तावना प्रस्तुत करता है।” यदि मेरी तरह आपको भी आचार्य रामस्वरूप चतुर्वेदी के द्वारा अनुत्तरित छोड़ दिये गए  ‘यौं’ का निहितार्थ जानने की इच्छा है तो  उस कालावधि में जाना होगा जब हिंदी साहित्य बनना शुरू हुआ था। भारतीय पांडित्य ईसा की एक सहस्राब्दी के पश्चात आचार-विचार और भाषा के क्षेत्र में लोक की ओर झुकता चला गया था । इसका परिचय अपभ्रंश या लोकभाषा की कविता में मिल सकता है। अपभ्रंश के पाणिनी जर्मन वैयाकरण  रिचर्ड पिशेल (1849-1908) ने ‘माटेरियालियन सुर केंटिश डेस अपभ्रंश’(1902) में इस भाषा की अनेक रचनाओं का उल्लेख करते समय यह चिंता व्यक्त की थी कि अपभ्रंश का साहित्य एकदम खो गया सा लगता है । फिर डॉ. हरमन याकोबी ने 1912 में अनेक ग्रन्थों को प्राप्त किया  और स्वतन्त्रता के मिलते मिलते तो अनगिनत  पांडुलिपियाँ मिलती चली गईं । एक नए आख्यान से साक्षात्कार हुआ जिसका सघन पाठ विद्वानों के द्वारा ज्ञान के नए आगार खोलता चला गया। 

इक्कीसवीं  शताब्दी के चार चरणों में से एक के लगभग बीत जाने पर  भी आज के गंभीर अध्येता के लिए प्रेमाख्यान के प्रति बालसुलभ उत्सुकता होना स्वाभाविक है। कथाकाव्य के प्रति तो जिज्ञासा रहती ही है । किन्तु जैसे ही इन दोनों पदों से पूर्व ‘अपभ्रंश’ आकर पसर  जाता  है तो कोई नामवर ही टिक सकता है । अब तो इस विषय को जाँचने वाले परीक्षक तक न मिल सकेंगे। यदि कोई जिज्ञासावश या ज्ञानार्जन हेतु इन तीन बीज शब्दों को ‘गूगलार्पित’ करे तो उसे एक पुस्तक दिखाई देगी जिसका प्रथम पृष्ठ गायब होगा । यह भी पता चल सकेगा कि 16 एम बी स्थान घेरने वाली 382 पृष्ठ की इन बीज शब्दों के द्वारा उपलब्ध  पुस्तक बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी द्वारा पीएच. डी. की उपाधि के लिए स्वीकृत शोध प्रबंध है  (Digital Library of India Item 2015.347734) और इसके लेखक डॉ. प्रेमचन्द्र जैन हैं । डॉ. जैन ने “रहस्यवादी जैन अपभ्रंश काव्य का हिंदी पर प्रभाव” (वाणी प्रकाशन से 1991 में प्रकाशित) एम. ए. लघु शोध प्रबंध लिखकर अपने गुरु से कहलवाया था  कि ‘इस कार्य के  पीछे एक अद्भुत निष्ठा और फलाकांक्षा बिना निरंतर कार्य करते जाने की निष्कामता विद्यमान रही’ और फिर उन्हें ‘इस अभियान के प्रथम सेनानी’ होने का विरुद प्राप्त हुआ। डॉ. प्रेमचंद जैन ने अपने शिक्षा गुरु डॉ. शिव प्रसाद सिंह और उन्होंने अपने गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के सपनों को ‘तटस्थ भाव से’  पूरा किया और होते देखा। 

उनकी  यह  कृति  पाठक को उस काल में ले जाती  है जिसे हिंदी साहित्य के इतिहास में आदि काल, आरंभिक काल,  वीरगाथा काल, वीर काल, चारण काल, बीजवपन काल, सिद्ध सामंत काल आदि कई नामों से पुकारा जाता है । इस समय का साहित्य मुख्यतः सिद्ध-साहित्य तथा नाथ-साहित्य, जैन-साहित्य, चारणी साहित्य, रासो साहित्य  और प्रकीर्णक साहित्य रूपों में मिलता है। यह काल अपभ्रंश काल का विकास ही है, पर भाषा की दृष्टि से यह परिनिष्ठित- अपभ्रंश से आगे बढ़ी हुई भाषा की सूचना भी  देता है।

इस विवेचनापूर्ण ग्रंथ के पारायण का नवनीत-प्रसाद यह आलेख है । यह डॉ. प्रेमचंद जैन का पाठ इस दृष्टि से है कि इसमें एक ओर तो इस लुप्त होते जा रहे विषय पर प्रामाणिक शोधपरक सामग्री का उपयोग है, दूसरी ओर इस आलेख के पाठक के लिए भविष्य में अध्ययन के लिए दिग्दर्शन और दिशाबोध  है। शोधार्थी की गवेषणात्मक दृष्टि का कायल होने के लिए आपको यह जानने की आवश्यकता चाहे न भी हो कि यह कार्य किसके निर्देशन में सम्पन्न हुआ और इस शोध प्रबंध का शीर्षक क्या था , फिर भी यह ज्ञान आपको हो ही जाएगा । 

     कुछ  हिचकिचाहट से ही सही किन्तु बहुत से विद्वान यह मानते हैं कि अपभ्रंश कथाकाव्यों की परंपरा का विकास ही हिंदी के प्रेमाख्यानक काव्य हैं।  परंतु अपभ्रंश के कथा-काव्य   अधिकतर जैन कवियों के द्वारा लिखे जाने के कारण उन्हें बहुत समय तक ‘धार्मिक’ ग्रंथ माना जाता रहा था। अनेक मुसलमान कवियों द्वारा फारसी कविता परंपरा को अपनाते हुए लिखे गए ग्रन्थों को भी ‘सूफी’ मत से जोड़कर देखते रहे । इन परम्पराओं से हट कर भी कई प्रेमाख्यानक काव्य मिले किन्तु उन पर शोधपरक दृष्टि डालने वाले विद्वानों ने सावधानी से सतर्क दृष्टि प्रायः नहीं ही डाली। इस कार्य का सफल निष्पादन डॉ. प्रेमचंद्र जैन द्वारा हुआ। वे लगभग 5 वर्ष तक तो शोध कार्य ही करते रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि वे एक लंबी परंपरा का संधान कर सके। इस परंपरा के संधान का संधान मेरा लक्ष्य नहीं, मेरा लक्ष्य है ‘प्रेम’ के प्रति आपकी सहजात जिज्ञासा और ‘प्रेम’चंद्र के प्रति आपकी सहज श्रद्धा को समझते हुए यह जानकर सुख प्राप्त कर लूँ कि क्या हिंदी का प्रेमाख्यान साहित्य भी पूर्व प्रेमाख्यानों की शृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी है । क्या विश्व साहित्य में जिस प्रकार प्रेमाधारित ‘रोमांस’ का जिक्र होता है , वैसा ही कुछ यहाँ भी द्रष्टव्य है ? 

‘अर्धकथानक’ (1641) के प्रणेता बनारसी दास ने अपने जमाने में मनोरंजन के व्यक्तिगत साधनों का वर्णन करते हुए संकेत किया था कि कुछ लोग प्रेमकथाओं को बाँचकर अथवा दूसरों से सुनकर भी अपना समय बिताया करते थे । 

तब घर में बैठे रहें , जांहि न हाट  बाज़ार । 

मधुमालति मिरगावति, पोथी दोई उदार ॥ 335 ॥ 

इन कथाओं की सत्रहवीं शताब्दी में जब मांग इतनी थी तभी तो  श्रीमाल जैन परिवार के आगरा निवासी बनारसीदास  जिन्हें कम उम्र में ही ‘आसिखी’ अर्थात इश्कबाज़ी और ‘लिखत-पढ़त’ का शौक लग गया था उन्होंने एक के बाद एक चार किताबें लिखकर दिखाईं ।  यह वह लेखन परंपरा थी जिसका संधान करने के लिए डॉ. जैन संस्कृत की कथा-आख्यायिकाओं से शुरू करके जैन-ग्रन्थों से होते हुए और सूफी मत से प्रभावित कथानकों के गुजरते हुए  ‘अर्धकथानक’ तक आते हैं या यह भी कह सकते हैं कि ‘अर्धकथानक’ से शुरू करके अतीत के व्यतीत  से वर्तमान की गति तक आते हैं । 

हिंदी प्रेमाख्यानों की वर्णन परिपाटी की लीक पर चलकर लिखे गए अपभ्रंश कथाकाव्यों की कथानक रूढ़ियों को पढ़ने का अभ्यस्त हुए पाठक स्त्री के नख शिख वर्णन और पुरुष के शौर्य युक्त क्रिया कलापों को पढ़कर मुग्ध होता रहा है । वेश्यागामी के शब्द चित्र उसे लुभाते रहे हैं । डॉ. जैन ने सही कहा है, “हिंदी प्रेमाख्यानक अपनी सम्पूर्ण आत्मा और कलेवरगत विशिष्टताओं के कारण हमारे साहित्य की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है । इस काव्य रूप के भीतर प्राचीन और नवीन अनेक प्रकार के तत्वों का मिश्रण हुआ है । यह मिश्रण इस काव्य रूप को पुराने काव्यरूपों के जोड़-तोड़ से बना एक अलग काव्य रूप ही नहीं बनाता बल्कि इस मिश्रण की रासायनिक प्रक्रिया ने हिंदी प्रेमाख्यानक के रूप में एक ऐसी विधा (फॉर्म) को जन्म दिया जो किंचित पुराने उपदानों को स्वीकार करते हुए भी नई लोकात्मक भाव-भूमियों का स्पर्श करने वाली बिल्कुल विलक्षण शिल्पभंगिमा वाली वस्तु बन गई “ (पृष्ठ 344)। 

“अपभ्रंश कथाकाव्यों का हिन्दी प्रेमाख्यानों के शिल्प पर प्रभाव” शीर्षक द्वारा शोधोपाधि के निमित्त प्रस्तुत डॉ प्रेमचंद्र जैन के इस प्रबंध के सात अध्यायों में शिल्पगत अध्ययन से “उनमें पायी जाने वाली कथानकगत एवं काव्यगत रूढ़ियों का, विभिन्न श्रेणियों के अभिप्रायों का तथा प्रतीकों का बहुत अच्छा विश्लेषण किया है और एक लंबी परंपरा का संधान पाया है” हजारी प्रसाद द्विवेदी (पुस्तक का प्राक्कथन, वाराणसी, 16-6-73)। वस्तुतः भारतीय साहित्य में ही नहीं अपितु विषय साहित्य में प्रेम प्रसंग अधिकांश काव्यों की विषय वस्तु रहा है। भारतीय साहित्य में वैदिक काल से अब तक प्रेम को लेकर अबाध गति से चर्चा हुई है । आख्यानक, चरित, चंपू एवं कथा काव्यों से लेकर उपन्यास , कहानी और वार्ताएं तक लिखी गईं। हिंदी का प्रेमाख्यानक साहित्य भी पूर्व प्रेमाख्यानकों के साथ जोड़ा जाता है । इन प्रेम-कथानकों में कथा का आधार लोक से मिलता रहा है। हिंदी के आम पाठकों को लगता है कि हिंदी प्रेमाख्यानों का प्रारम्भ हिंदी के रासो ग्रन्थों से हुआ होगा और पृथ्वीराज रासो इस परंपरा का मुखर वक्तव्य है। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी (हिंदी साहित्य , पृष्ठ 261) ने भी यही माना है, “ मूलतः ये सभी प्रेम कथानक हैं। इनमें प्रेम कथानकों की सभी विशेषताएँ प्राप्त होती हैं। अंतर इतना ही है  कि यहाँ नायक की युद्धपटुता और शौर्य प्रदर्शन मुख्य हो गया है और प्रेम व्यापार गौण।” यह ठीक वैसा ही है जैसा पाश्चात्य  जगत में ‘रोमांस’ (आम लोगों के लिए उनकी ही अपरिष्कृत बोली में लिखा गया कथा साहित्य)  साहित्य बारहवीं शताब्दी में फ्रांस से आरंभ होकर यूरोप भर में फैला और जिसका उत्स प्राचीन ग्रीक रोमांसों में ढूंढा गया। वहाँ  कालांतर से रोमांस का अर्थ ही कल्पना और वीरता  से भरी पर यथार्थ से दूर कथा से लिया जाने लगा ।पहली शताब्दी के ग्रीक भाषा में लिखे गए ‘नीनस रोमांस’ से लेकर मिडिल इंग्लिश के स्पेन्सेरियन रोमांसों तक लगभग वही ‘प्रेमाख्यान’ है जो संस्कृत के ‘पुरुरवा-उर्वशी’ से लेकर ‘चन्दप्पहचरिउ’ तक में  है।

हिंदी प्रेमाख्यानों की विशुद्ध भारतीय या हिंदू प्रेमाख्यान और सूफी प्रेमाख्यानक दोनों धाराएँ डॉ. जैन के शोध का आधार रही हैं। साथ ही वे जैन धार्मिक रचनाओं को भी अपने अध्ययन क्षेत्र में लेते हैं। उनका स्पष्ट मत है, “संस्कृत कथाकाव्यों की भांति हिंदी प्रेमाख्यानकों को किसी एक परिभाषा के वृत्त में नहीं घेरा जा सकता। हिंदी प्रेमाख्यान अपनी पृष्ठभूमि में जहां एक ओर भारतीय प्राचीन परंपरा को सुरक्षित रखे हुए हैं, वहाँ दूसरी ओर अभारतीय विशेषकर सूफी परंपरा के प्रभाव  से अछूते नहीं रह सके हैं।”(पृष्ठ 16) । 

‘हिंदी प्रेमाख्यानों का अपना एक निजी और नया काव्यरूप है” मानते हुए वे इनके अध्ययन के लिए ‘अपभ्रंश’ भाषा के ज्ञान की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं । यह वांछनीय भी है क्योंकि हिंदी कविता के खड़ी बोली रूप के चलन से पूर्व उसके मुखयतः छह अंग थे –डिंगल कवियों की वीर गाथाएँ , निर्गुणिया संतों की वाणियाँ , कृष्ण भक्त या रागानुरागा भक्ति मार्ग के साधकों के पद, राम भक्त या वैधी भक्ति मार्ग के उपासकों की कविताएँ, सूफी साधना से पुष्ट मुसलमान कवियों के तथा ऐतिहासिक हिन्दू कवियों के रोमांस और रीति काव्य। इन सभी धाराओं में अपभ्रंश कविता का स्वाभाविक विकास है, ऐसा आचार्य द्विवेदी ने हिंदी साहित्य की भूमिका (1948) में उल्लेख किया है ।आचार्य शुक्ल भी अपने इतिहास के पहले प्रकरण के पहले वाक्य में यही बयान करते हैं – प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिंदी साहित्य का आविर्भाव माना जाता है। वे उसे ‘प्राकृताभास’ कहते हैं। इसी तरह राम स्वरूप चतुर्वेदी भी अपने इतिहास ‘हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास’ की शुरुआत में ही लिख डालते हैं, ‘कई अपभ्रंशों और कई जनपदों का संस्कार हिंदी काव्य भाषा में अंतर्भुक्त हुआ है।’

डॉ. जैन की मान्यता है कि हिंदी प्रेमाख्यानों के शिल्पगठन पर वास्तविक प्रभाव अपभ्रंश कथा काव्यों का पड़ा। वे शिल्प को सिर्फ शैली नहीं मानते बल्कि इसमें कथा की गठन (स्ट्रक्चर) , रूढ़ियाँ (मोटिफ), वस्तुवर्णन, साजसज्जा तथा कथा काव्यों के  पूरे  रचाव को भी शामिल करते हैं । वे प्रभाव को भी व्यापक अर्थ में लेते हुए उसे योगदान से जोड़ते हैं। साथ ही यह भी जोड़ देते हैं कि यह प्रभाव या योगदान "हू –ब –हू उन्हीं की नकल नहीं हैं” (पृष्ठ 97)। डॉ. जैन ने शिल्प का विस्तृत विवेचन करते हुए जो सूत्र रूप में कहा है, वह एक ओर तो उनके पाश्चात्य और भारतीय ‘स्टाइल, टेकनीक, रीति, वृत्ति, स्थापत्य’ आदि पारिभाषिक शब्दों की समझ से आगे की बात है, दूसरे उनके देरिदीय अंतर (differance- यह वर्तनी की भूल नहीं है, पारिभाषिक शब्द है ) को भी रेखांकित करती है । 

शिल्प एक व्यापक शब्द है जिसमें वस्तु के मूल गठन, स्थापन -संगठन, विधा-आकृति, तथा शैली सभी का समावेश हो जाता है। चूंकि यह शब्द केवल कथ्य वस्तु की अभिव्यक्ति– प्रणाली से ही सीमित नहीं है , इसलिए इसे साहित्यिक कोटियों में विभक्त करना भी पूर्णतः संगत न होगा। शिल्प में किसी भी जाति का पूर्णा प्रतिबिंब देखा जा सकता है। भारतीय साहित्य में कथा साहित्य का शिल्प भारतीय मानस की मनोवृत्ति का परिचायक है । सूफी आख्यानों में इसी कारण शुद्ध भारतीय शिल्प से किंचित भिन्न मनोवृत्ति का रूप दिखाई पड़ता है। (पृष्ठ 109)

आज के पाठक को शिल्प की ठीक-ठाक   समझ हो, इससे तो किसी को इंकार न हो सकेगा । डॉ. जैन ने शिल्प के व्यापक अर्थ को ग्रहण करने की चेष्टा करते हुए अनुशंसा की है – 

शिल्प के अंतर्गत शैली, काव्यरूप, कथाविन्यास और कथातत्वों को भी समाविष्ट करना चाहिए। यद्यपि वट वृक्ष का बीज़ अत्यधिक सूक्ष्म होता है तथापि उसके अंदर एक विशाल वट वृक्ष का रूप छिपा रहता है। ठीक वैसे ही ‘शिल्प’ शब्द के उल्लेख मात्र से रचना (कथा वार्ता, चरित, आख्यान, आदि) की रचना प्रक्रिया का – भाव से अभिव्यक्ति और उसके माध्यम तक की रचना प्रक्रिया का बोध होता है। मानव शरीर पृथ्वी, जल , वायु और आकाश पाँच तत्वों से निर्मित होता है, हाथ पैर, आँख, कान आदि उसके अंग-प्रत्यंग होते हैं, यदि शरीर का एक भी अंग-भंग है तो वह पूर्ण सुख से वंचित रहेगा। कथा का निर्माण भी अलग अलग तत्वों के मेल से होता है। कथा के उन तत्वों में से यदि किसी तत्व का शिल्प गठन कमजोर हुआ तो वही कथा का दोष बन जाएगा। दूसरे शब्दों में यह कि कथा के विभिन्न अंगों में सामंजस्य ही कथा को प्रभावोत्पादक और ग्राह्य बनाता है। कथा को विभिन्न तत्वों के माध्यम से उसकी पूर्णता को समझने का एक शिल्प होता है (पृष्ठ 117)। 

एक महत्वपूर्ण बात जो डॉ. जैन ने कही है वह प्रतीकों के प्रयोग के संबंध में है। प्रतीक भारतीय दर्शन , धर्म, और शास्त्रों के बहुपरिचित तत्व हैं जिनका उपयोग हमारे देश में ऋग्वेद से लेकर आज तक अनेक रूपों में होता रहा है। हाँ, दार्शनिक प्रतीकों को काव्य का अनिवार्य उपादान बनाने की सायास कोशिश नहीं की गई। वे इस बात को कहते ही नहीं  ज़ोर देकर दुहराते  हैं  कि प्रतीकों  की अपनी एक भारतीय परंपरा थी जो वैदिक  काल से सूफी काव्यों के समय तथा उसके बाद यानी आज तक चली आ रही है। उन्हीं के शब्द हैं – पुनः मैं इस बात को दोहराना चाहूँगा कि सूफियों की रचनाओं पर भारतीयता की छाप विदेशीपन की अपेक्षा कहीं अधिक है।  ...यदि बिना आयस के हमें वेदों में भी अपनी बात की पुष्टि मिलती है और उससे हमारी शृंखला विघटित होने से बच जाती है तो निरर्थक क्या है? हाँ , हमें तथ्यों को नकारने भर का दुःसाहस नहीं करना चाहिए। (पृष्ठ 194)। 

वे यह बात एक ओर तो डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल जैसे मूर्धन्य विद्वानों के विवेचन (कादम्बरी : एक सांस्कृतिक अध्ययन) को आधार और प्रमाण मानते हैं दूसरी ओर स्वयं ‘मयणपराजयचरिउ’ आदि ग्रन्थों से प्रमाण प्रस्तुत करते हुए सूफी कथाकाव्यों की प्रतीक पद्यति को अपभ्रंश कथा काव्यों की प्रतीक पद्धति से जोड़ते हैं। 

कथा-विन्यास , चरित, कथा के उद्देश्य, वस्तु वर्णन, कथाभिप्राय (मोटिफ), निजंधरी तत्व, मंगलाचरण, सर्गनिबंध, ऋतु वर्णन, छन्दप्रयोग तथा  कथा को भराव देने वाले जीवन के विभिन्न तत्व, खेल-क्रीडा, मनोरंजन आदि सांस्कृतिक मनबहलाव के साधनों के वर्णन में अपभ्रंश और हिंदी प्रेमाख्यानों में बहुतेरी समानताएं हैं। दोनों के बीच समानधर्मा प्रवृत्तियों के उदघाटन के इस अनुष्ठान के पाठ से कुछ नए क्षितिज तो उद्घाटित होते ही हैं यह भी रेखांकित होता है कि भारतीय प्रेमाख्यानक सम्पूर्ण एशियाई संस्कृति की प्रतिफलन पीठिका हैं। और जैसा डॉ जैन के सुयोग्य शोध निर्देशक डॉ शिवप्रसाद सिंह ने अपनी पुस्तक ‘रसरतन की भूमिका’ (पृष्ठ 73) में लिखा है और जिसे डॉ जैन ने अपने प्रबंध की ‘प्रास्ताविक’ में उद्धृत किया है वह कथन इस ग्रंथ के लेखक के लिए तो मार्ग दर्शक रहा ही , आज के पाठक को भी गर्व से भर देगा, “भारतीय प्रेमाख्यानक में अनुस्यूत तत्वों के समाजशास्त्रीय, पुरातात्विक और ऐतिहासिक अध्ययन का अभी आरंभ ही हुआ है । यह विपुल गईं राशि अनेकानेक सुधीजनों  के श्रम और शक्ति का आह्वान करती है।” (पृष्ठ 5)।   

किन्तु वह ‘श्रम और शक्ति’ जिसकी दरकार इस लेखन के लिए है, वह अब कहाँ है? क्योंकि जो यहाँ है वह केवल सहेज कर अलमारी में रखने या स्कैन करके  ‘क्लाउड’ में रखने मात्र के लिए नहीं है। यह कृति पारायण मांगती है , पाठ की अभिलाषा रखती है । क्योंकि इस पाठ से ही ज्ञात होता है कि कहाँ क्या रहा  है और है।  पाश्चात्य जगत में अँग्रेजी के प्रसिद्ध कवि टी एस एलियट ने भोक्ता और रचयिता के अलगाव को श्रेष्ठ काव्य रचना के लिए एक जरूरी शर्त माना है किन्तु भारतीय परंपरा के जैन कवियों ने अपभ्रंश कथाकाव्यों में जैन धर्म के निवृत्ति मार्ग की अपेक्षा लोक पक्ष और परलोक पक्ष का संतुलन और समन्वय है। डॉ जैन के शब्दों में, “अपभ्रंश काव्यों में लौकिक आनंद की दृष्टि से एक ओर शृंगारी पक्ष का चमत्कार मिलेगा तो दूसरी ओर संयम की यथार्थता का बयान भी” (पृष्ठ 214)। डॉ जैन ने महापंडित राहुल सांकृत्यायन आदि के खोजपूर्ण कार्य को आगे बढ़ाया। अनेक अन्य विद्वानों के निष्पक्ष वक्तव्यों से अपभ्रंश साहित्य की प्रतिष्ठा की। यह तर्क भी दिया कि यदि जैनेतर कहानियों की धार्मिक रचनाएँ कथा-कोटि में रखी जा सकती हैं तो न्यायोचित यही है कि हमें पक्षपात रहित होकर अपभ्रंश कथाकाव्यों की धार्मिक रचनाओं पर विचार करना चाहिए। आचार्य शुक्ल ने अपने इतिहास में कुछेक रचनाओं को धार्मिक कहकर परे सरका दिया था किन्तु आचार्य द्विवेदी ने ऐसी मनोभावना को व्यर्थ मानते हुए कहा कि धार्मिक प्रेरणा या आध्यात्मिक उपदेश होना काव्यत्व का बाधक नहीं समझा जाना चाहिए। इसी मत को डॉ जैन ने पल्लवित किया। उनका मानना है कि कथाकाव्य के अंतर्गत रास, चरित, पुराण, के अतिरिक्त धर्म कथाओं तथा कथात्मक काव्यों का भी समावेश किया जाना चाहिए। उन्ही के शब्दों में- असल में जो लोग सिर्फ इतना जानते हैं कि जैन धर्म निवृत्ति मार्ग का पोषक है, वे ही जैन धर्म की अपूर्ण जानकारी होने के कारण धर्म एवं साहित्य पर अनेक दोषारोपण थोपते हैं। जैन साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि उसमें भारतीय कला, विद्या एवं अन्य लोक पक्ष अथवा परलोक पक्ष आदि विषयों के अंतर्गत एक व्यवस्थित अध्ययन प्रस्तुत किया गया है (पृष्ठ 213)। कथा और प्रबंध को किस प्रकार छंदोबद्ध करके प्रस्तुत किया गया इसका उल्लेख समयसुंदर( सीताराम चउपइ) की पंक्तियाँ देकर डॉ. जैन ने संकेत में ही बता दिया है - 

साँव पजुनक कथा सरस प्रत्येक बुद्ध प्रबंध । 

नलदमयंती मृगावती चउपई चार संबंध ॥ 

डॉ. जैन ने हिंदी प्रेमाख्यानकों की कथानक रूढ़ियों और अपभ्रंश काव्यों की रूढ़ियों का विस्तार से वर्णन विवेचन और विश्लेषण किया है । यह तो रेखांकित किया ही गया है कि अनेक कथानक रूढ़ियाँ संस्कृत साहित्य से ज्यों की त्यों पहले अपभ्रंश में और फिर हिंदी  में आ गईं। यह भी बताया कि अनेक तत्कालीन लोक मानस की उपज हैं। एक उदाहरण देना मेरी चपलता न समझी जाए तो मैं ‘दोहद’ का उदाहरण  दूंगा। भारतीय मान्यता में ‘दोहद’ किसी गर्भिणी स्त्री की इच्छा है। इस संकेत को समझते हुए डॉ. जैन के उस कथन की ओर दृष्टिपात करना श्रेयष्कर है, “हिंदी प्रेमाख्यानकों की वर्णन परिपाटी अपभ्रंश कथाकाव्यों की नींव पर ही खड़ी हुई। कुछ कथानकों को उदाहरण स्वरूप सामने रखकर विचार करने पर वर्णन परिपाटी का प्रश्न और भी  स्पष्ट हो जाएगा। हिंदी प्रेमाख्यानकों का शिल्प अपभ्रंश कथा काव्यों के शिल्प का ही ऐतिहासिक विकास है (पृष्ठ 342)। 

अपभ्रंश और हिन्दी के प्रेमाख्यानकों के इस अध्ययन के पाठ से यह समझ में आता है कि हिंदी की जननी भाषा अपभ्रंश ने लोकभाषा के रूप में अपना स्थान ही नहीं बनाया था बल्कि सर्जनात्मक रूप से भी इसे समृद्ध किया । पालि, प्राकृत, और संस्कृत की तुलना में अपभ्रंश भाषा कहीं अधिक लोकजीवनसंपृक्त भाषा रही। इसका पूरा कथा-साहित्य विशेषकर प्रेमाश्रित कथा-साहित्य इसी लोकमानस की देन है। अपभ्रंश कथा में ग्रहीत लक्षण आगे चलकर हिंदी के प्रेमाख्यानकों में पूरी तरह विकसित और पल्लवित हुए। अपभ्रंश के काव्यरूपों ने हिंदी में विकास पाया । 

संदर्भ –

अपभ्रंश कथाकाव्य एवं हिंदी प्रेमाख्यानक (1973) 

लेखक –डॉ प्रेमचंद्र जैन , एम ए पी-एच.डी. 

प्रकाशक – सोहनलाल जैनधर्म प्रचारक समिति, अमृतसर 

प्राप्ति-स्थान -  पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संस्थान, वाराणसी -5 

  • प्रो. गोपाल शर्मा, अरबा मींच यूनिवर्सिटी, इथोपिया prof.gopalsharma@gmail.com 

द्रष्टव्य- 

इतिहास हुआ एक अध्यापक/ संपादक- दानिश सैफ़ी/ अविचल प्रकाशन, ऊँचा पुल हल्द्वानी-263139/ 2022/ पृष्ठ 135-142.

(प्रवीण प्रणव) शायद पता चले, शायद नहीं भी

शायद पता चले, शायद नहीं भी 

(डॉ. प्रेमचंद्र जैन की कविताओं का अंतरंग पाठ)

-प्रवीण प्रणव

गोस्वामी जी ने रामचरितमानस में लिखा “सोइ जानइ जेहि देहु जनाई” यानि ईश्वर के प्रभाव और प्रभुत्व को  वही जान पाता है, जिसे ईश्वर खुद चाहते हैं कि वह इसे जान ले। अंतरिक्ष में कई तारे हैं जिनका आकार सूरज से कई गुणा बड़ा है लेकिन दूरी की वजह से हमें सूरज, सभी तारों से ज्यादा बड़ा प्रतीत होता है; जब तक वैज्ञानिक आधार पर हम यह न जान लें कि सूरज और तारों का वास्तविक आकार क्या है और हमसे इनकी दूरी कितनी है। डॉ. प्रेमचंद्र जैन एक ऐसे ही समृद्ध साहित्यकार हुए हैं जिन्हें छपास की बीमारी ने ग्रसित नहीं किया और इस वजह से उनकी प्रकाशित पुस्तकों की संख्या कम ही रही लेकिन उनकी शिष्य परंपरा में इतने प्रबुद्ध बुद्धिजीवी और साहित्यकार हुए हैं जिनकी सूची को देखते हुए ‘को बड़ छोट कहत अपराधू’ की स्थिति हो जाती है। इंटरनेट की आज की दुनिया में डॉ. प्रेमचंद्र जैन का साहित्य ऑनलाइन भी उपलब्ध नहीं है जिसे आज का पाठक वर्ग पढ़कर इनके साहित्य से परिचित हो सके। ऐसे में प्रशंसा की जानी चाहिए प्रो. ऋषभदेव शर्मा, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा और निर्मल शर्मा की जिन्होंने डॉ. प्रेमचंद्र जैन के व्यक्तित्व और कृतित्व को ‘निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक’ नामक पुस्तक में संकलित कर पाठकों का परिचय उनसे करवाया। 

 डॉ. प्रेमचंद्र जैन ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से उच्च शिक्षा प्राप्त की। संस्कृत, पालि, अपभ्रंश एवं हिंदी भाषाओं पर इनका पूर्ण अधिकार रहा। सन् 1969 में ‘अपभ्रंश कथा काव्य एवं हिंदी प्रेमाख्यानक’ विषय पर शोध प्रस्तुत करके इन्होंने काशी विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। शिक्षा समाप्त करने के बाद इन्होंने एक वर्ष तीन माह तक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निर्देशन एवं शोधाधिकार के अंतर्गत हिंदी के ऐतिहासिक व्याकरण विभाग में तथा एक वर्ष चार माह तक ‘भगवान महावीर केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, दिल्ली’ में कार्य किया। दिसंबर 1972 में डॉ. जैन ने साहु जैन कॉलेज में अपनी सेवा शुरू की और यहीं से सेवानिवृत्त हुए। डॉ. जैन समाजसेवी रहे, साहित्यकार रहे, शिक्षाविद रहे लेकिन इन सबसे बढ़कर ‘साहू जैन महाविद्यालय, नजीबाबाद’ में  शिक्षक के तौर पर कार्य करते हुए इन्होंने अपने शिष्यों के प्रति जो प्रेम दर्शाया, शिष्यों की समस्याओं के निवारण के लिए जिस तरह व्यवस्था से टकराते रहे; इन सब ने डॉ. प्रेमचंद्र जैन को न केवल उनके शिष्यों की तरफ से बल्कि अभिभावकों और नजीबाबाद की आम जनता की तरफ से भी ‘गुरुजी’ की उपाधि प्रदान की और यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि रही। यूं तो साहित्य के क्षेत्र में डॉ. जैन ने कविता, कहानी, आलेख, दर्शन, डायरी, पत्र आदि विधाओं में अपना योगदान दिया लेकिन इस आलेख के लिए बात डॉ. जैन की कविताओं की। 

कविताओं की बात करने से पहले यह स्पष्टीकरण आवश्यक है कि डॉ. प्रेमचंद्र जैन के व्यक्तित्व या कृतित्व से मेरे परिचय का जरिया सिर्फ ‘निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक’ पुस्तक है। ऐसे में बहुत हद तक संभव है कि अपने सीमित ज्ञान और सूचनाओं की वजह से डॉ. जैन के कृतित्व आकलन में कमी रह जाय। यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी नेत्रहीन व्यक्ति द्वारा हाथी के सिर्फ पैर या सूंड को छू कर हाथी के बारे में बात की जाय। अतः डॉ. जैन के पाठकों और प्रशंसकों से अग्रिम क्षमा प्रार्थी हूँ। ‘निरभै होइ निसंक कहि के प्रतीक’ में डॉ. जैन की कुल 44 कविताएं संकलित हैं और इनके लिखे जाने के वर्ष को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि साहित्य सृजन के लिए कविता डॉ. जैन के लिए मुख्य विधा नहीं रही। कविता इन्होंने मुख्यतः स्वांतः सुखाय ही लिखी होगी। सात कविताओं के लेखन का वर्ष उल्लिखित नहीं है, 1963 में एक, 1965 में एक, 1971 में आठ, 1972 में दो, 1974 में एक, 1975 में दो, 1977 में सात, 1978 में एक,1979 में एक, 1981 में दो,1982 में दो, 1984 में एक,1986 में एक, 1994 में एक, 1995 में दो, 2006 में दो और 2008 में लिखी दो कविताएं इस किताब में संकलित हैं। संख्या की दृष्टि से डॉ. जैन ने भले ही कम कविताएं लिखीं हों, लेकिन इनके विषय बहुआयामी हैं। शब्द सरल हैं लेकिन भाव गहरे हैं। व्यंग्य कविताओं में कटाक्ष की धार तीक्ष्ण है, जहाँ आम आदमी या कृषकों के कष्ट की बात कही गई है, वह हृदय तक उतरती है, जब बात हिम्मत न हारने और संघर्ष की होती है तब पाठक अपने-आप को इस मुहिम से जुड़ा हुआ पाते हैं। एक शिक्षक होने के नाते इनकी कविताओं में शिक्षा पर जोर, सामाजिक समरसता का आग्रह और सरल शब्दों में गूढ़ दर्शन की सहज व्याख्या मिलती है। डॉ. जैन की कविताओं में हर उम्र और हर वर्ग के पाठकों के लिए बहुत कुछ है जिसे ग्राह्य किया जा सकता है। इन कविताओं में प्रेम, रूप, सौन्दर्य की बातें कम ही हैं।  ‘प्रेम’ शीर्षक एक कविता में डॉ. जैन लिखते हैं  ‘शारीरिक संबंधों के रिश्ते/ टूट ही जाते है एक दिन/ भावनाओं से जुड़ा प्रेम/ अटूट होता है/ लेकिन -/ यह तुम्हें दर्शन की बात लगती है/ क्योंकि/ तुम्हारे निकट भावना निर्मूल्य है।‘ इन पंक्तियों को पढ़ते ही हस्तीमल हस्ती का लिखा शेर जगजीत सिंह की मखमली आवाज़ में हमारे ज़ेहन में गूंजने लगता है 'जिस्म की बात नहीं थी उन के दिल तक जाना था / लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है।'  फूलों की क्यारियों में खिले कई रंग के सुंदर फूलों को देख ‘गुदगुदी घास’ शीर्षक कविता में डॉ. जैन ने लिखा ‘पीला रंग भी कोई रंग है/ हरे नीले सभी व्यर्थ/ मुझे खूनी गुलाब पसंद है।’ यहाँ ‘खूनी गुलाब’ का संदर्भ आते ही निराला की कुकुरमुत्ता कविता आती है जिसमें निराला ने लिखा 'अब, सुन बे, गुलाब,/ भूल मत जो पायी खुशबु, रंग-ओ-आब,/ खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,/ डाल पर इतरा रहा है केपीटलिस्ट!' लेकिन डॉ. जैन इसी कविता के अंत में लिखते हैं ‘गुलाब ही नहीं – वैसे/ खिले सब फूल पसंद हैं/ हीः हीः हीः हीः हीःअ s हैं हैं हैं ss / (मैं मौन मालिक के सामने.. )’

आज़ादी के बाद लोगों की सरकार से जो आकांक्षाएं थीं, वह पूरी नहीं हुई और उत्साह, असंतोष में बदलने लगा। यदा-कदा सरकार के कुछ कदमों से लगा कि कालाबाजारी, चोर बाजारी जैसी समस्याओं पर नकेल लगेगी और यह उम्मीद कविता में भी दिखी। 26 जनवरी 1975 को ‘ओ छब्बीस जनवरी’ शीर्षक कविता में डॉ. जैन ने लिखा – जहाँ भी पूछते थे दाल-चावल-आटा/ लाला कहते थे – ‘क्या करें साब पड़ता है घाटा -/ इससे लाते नहीं माल, ऐसा आया नहीं साल’/ दुखी खरीददार कहते, - ‘लाला कही से होगा -/ बंदोबस्त?’  लाला ने बाल खुजलाकर रहस्यभरी/  मुस्कान भरकर इधर-उधर झाँका और कहा -/ अच्छा, तुम तो अपने आदमी हो/ देखो!/ अंधेरे में आना -  चुप चाप ले जाना/ दाम दूने दे जाना।/  गेहूं-दाल-चावल दुकानों में नहीं/ गोदामों में मिलने लगा/ कौवे विपक्षियों ने काँव-काँव की/ फिर भी/ अभावों की दुनिया बढ़ती गई/ धन्य हो आज के गणतंत्र/ रक्षित है लोकतंत्र/ अभाव सद्भाव बन गया है/ बड़बडि़यों के मुख पर ताला है/ बाहर आ गया धन काला है/ रिश्वत, चोर बाजारी आज भी/ भले हों न हों बंद/ लेकिन आज कुछ राहत है/ छब्बीसवें गणतंत्र तेरा स्वागत है।‘  लेकिन इसके बाद आपातकाल आया और परिस्थितियाँ बदल गईं। आपातकाल के बाद नई सरकार बनी जिसे समाजवादी सरकार कहा गया लेकिन सरकार ज्यादा दिनों तक नहीं चली और अगले चुनाव में कांग्रेस की वापसी हो गई। डॉ. जैन ने ‘जनतंत्र’ शीर्षक कविता में लिखा ‘नारा समाजवाद का/ दूध : गाय-बछड़े का/ वोट हिन्दुस्तानी का/ नहीं पड़ा जहाँ पड़ना था/ और - / वही हुआ जो होना था/ जातिवाद, भाई-भतीजावाद/ खंड-खंड बिखर गए/ समय की करवट से/ फिर पिसेगी जनता/ सुबह तक नई कांग्रेस और बढ़ेगी सर्वत्र/ जीत-हार, हार-जीत का जनतंत्र।‘   छब्बीसवें गणतंत्र के बाद इकत्तीसवें गणतंत्र पर भी डॉ. जैन ने कविता लिखी और इन दोनों कविताओं को पढ़ने से लगता है कि इस दौरान घटनाएं तो बहुत हुईं लेकिन आम आदमी की समस्या ज्यों-की-त्यों बनी रही ‘गेहूं, दाल, चावल, तेल/ खूब दिखा रहे हैं खेल/ विपक्षी कौवे करते काँव-काँव/ टुकड़ा मिलते ही लेते राम नाम/ धन्य हो आज के गणतंत्र/ जिंदा है लोकतंत्र - बस इतना काफी है/ बाकी तो -/अभाव ही अभाव है/ जहाँ तक नजर जाती है - / सर्वत्र/ रिश्वत, चोर बाजारी का सद्भाव है/ और क्या कहें?/ हम तो देखते है – सब ओर/ आफत ही आफत है/ फिर भी राष्ट्रपर्व होने के नाते/ इकत्तीसवाँ गणतंत्र दिवस तेरा स्वागत है।‘

गांधी, जिन्हें राष्ट्र ने राष्ट्रपिता माना, जिनके आदर्शों पर चलकर सर्व जन हिताय, सर्व जन सुखाय सरकार की परिकल्पना हुई; कुछ ही वर्षों में राजनेताओं ने गांधी के आदर्शों को बस चेहरा बना कर अपने काले करतूत ढंकने शुरू कर दिए। ‘बापू के नाम चिट्ठी-1’ शीर्षक कविता में डॉ. जैन ने लिखा ‘बापू/ बताओ तो सही कैसा है यह लोक/  तुम इसे देखकर हंसते होंगे/ अथवा रोते होंगे/ मुझे क्या पता/ मैं तो इन्हीं में से एक हूँ/ तुम्हारे तीनों बंदरों वाली शिक्षाओं में से/ एक भी नहीं भाती/ मुँह पर हाथ रखा देख हंसता हूँ/ कानों पर हाथ रखा देखकर चीखता हूँ/ आँखों पर हाथ रखा देख चश्मा लगा लेता हूँ/ फिर भी मुझे शर्म नहीं आती/ चूँकि / दूसरों को उपदेश देना आता है/ ठकुर सुहाती से नाता है/ सभी बैंको में खाता है/ ‘सत्यमेव जयते’ का बोर्ड लगा रखा है/ वह इसी में सब छिप जाता है।‘ आंदोलन के नाम पर रेलवे की पटरी से फिश-प्लेट हटा दिए जाने की वजह से हुई रेल दुर्घटना से व्यथित हो कर डॉ. जैन ने व्यंग्य कविता ‘हम अहिंसक हैं’ में लिखा पटरी से फिश-प्लेट खींच कर/ गाड़ियों को उलट देना/ और/ प्रकाशवीर शास्त्री जैसे अनगिनत लोगों के/ प्राण हर लेना -/ हमारे बाएं हाथ का काम है/ सीधा हाथ हमने सदा सुरक्षित रखा है/ बापू!/ नहीं समझे?/ अरे! वही राष्ट्रपिता गांधी/ जो अंधे हो गए हैं/ उनको लाठी पकड़ा दी है/ वे पीछे-पीछे आ रहे हैं/ जहाँ भी रुकना होता है/ उन्हें खड़ा कर देता हूँ/ स्वयं चीखता हूँ/ बापू की जय – महात्मा गांधी की जय/ अहिंसा जिंदाबाद / नेहरू जिंदाबाद/ हैं हैं हैं, हीः हीः हीः / हम अहिंसक हैं।‘  यहाँ कविता के अंत में जो हंसी है वह एक बेशर्म हंसी है जो व्यंग्य की धार  को कई गुणा बढ़ा देती है।     

आज किसान आंदोलन की वजह से किसान चर्चा का विषय बना हुआ है लेकिन दशकों से यह मेहनतकश वर्ग उपेक्षा और बदहाली का शिकार रहा है। ‘कवि छोड़ो’ शीर्षक कविता में डॉ. जैन ने लिखा ‘कवि छोड़ो कुंठा-कन्था:/ नव-नव रस कूप भरे हैं/ खाली घट को डुबकी दें/ ये कूप बहुत गहरे हैं/ कृषि करते कृषक थका है/ श्रमिकों पर भी पहरे हैं/ न्याय की करते रहो पुकार/ यहाँ शासन सत्ता बहरे हैं।‘ कृषकों के समर्थन में आह्वान करते हुए ‘कृषक मेले के अवसर पर’ कविता में उन्होंने लिखा ‘भूख हूलती है जब हम को/ अन्न याद आ जाता है/ मत भूलो इस कृषक वर्ग को/ जिससे सीधा नाता है/.. / जो सब के लिए जान देता/ उसको तो मत चूसो लोगों/ तुम लूट-लूट घर भरते हो/ वह आर्थिक नीति विधाता है।‘  

इस देश में आम आदमी की कोई बहुत बड़ी आकांक्षा नहीं होती, बहुत बड़े सपने नहीं होते। सामान्य रूप से घर परिवार गृहस्थी चल जाय यही काफी है। आम आदमी के जीवन को डॉ. जैन ने ‘मैं आदमी’ शीर्षक कविता में यूं लिखा ‘नौकरी करता हूँ/ ऑफिस के नाम से नहीं/ घर के नाम से डरता हूँ/ मरने को है नौकरी/ या/ नौकरी के लिए मरना है/ कौन जाने - एक साथ/ इसलिए कहता हूँ - /मैं जानवर हूँ/ खटता हूँ/ टेबलेट सुलाती है/ चक्की जगाती है/ भूख चलाती हैं/ सबकी अपनी -/ अपनी कहानी है।‘ लेकिन जब शासन और सरकार इस सामान्य दिनचर्या में भी दखल देने लगे तो आक्रोश और विद्रोह स्वाभाविक है। ‘खेल-खेल का चित्र’ कविता में डॉ. जैन ने लिखा ‘खेल-खेल में मैंने/ एक चित्र बना डाला/ मुझे क्या पता था/ इसे सजाने-संवारने को/ रंग-तूलिका और रख-रखाव को/ दीवाल की आवश्यकता होगी/ चित्र जानकारी से परे नहीं रहा/ लेकिन दमघोंट अफसरशाही में/ स्वतंत्र रंग भरने का मौका नहीं था/ तो क्या चित्र मिटा दूँ?’ ऐसी ही परिस्थिति के लिए बशीर बद्र ने लिखा था ‘बड़े शौक़ से मिरा घर जला कोई आँच तुझ पे न आएगी/ ये ज़बाँ किसी ने ख़रीद ली ये क़लम किसी का ग़ुलाम है।‘ लेकिन डॉ. जैन यूं ही हार मान जाने वालों में नहीं, इसी कविता में उन्होंने लिखा ‘न मैंने कहने से चित्र बनाया/ और/ न सही रंग/ इसका ढांचा बिना रंग ही चमकेगा -/ रंग लाएगा/ मेरा विश्वास कभी नहीं डिगा/ परती धरती जोतूँगा, बोऊँगा, सिंचूँगा/ चित्र तो संभलेगा/ मुझसे नहीं तो -/मेरे साथी से।‘  फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने भी ऐसी परिस्थिति में खामोशी तोड़ने की बात करते हुए लिखा था ‘बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे/ बोल ज़बाँ अब तक तेरी है/ तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा/ बोल कि जाँ अब तक तेरी है।‘  किसी भी अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष का आह्वान करते हुए डॉ.  जैन ने ‘अब शेष हूँ मरता नहीं’ कविता में लिखा ‘हम बढ़े हैं/ और/ बढ़ते ही रहेंगे/ हम न मरते हैं/ न/ मरने से डरेंगे/ एक मैं मरने से डर जाऊंगा/ तो/ दस खड़े हैं/ दैवा, दीस्सू, मना, मनसुखा/ कौसी, गंगा, पावन, पुरवा/ सभी बढ़ेंगे/ नभ चूमेंगे/ दर्द पियेंगे/ टीस भखेंगे/ पर उदास माँ की आँखों में/ ज्योति जगेगी/ सूर्य उगेगा/ हमीं उगेंगे/ श्रमिक जगेंगे/ कंस भगेंगे।‘ पाश ने भी इसी संघर्ष की बात करते हुए 'हम लड़ेंगे साथी' कविता में लिखा 'हम लड़ेंगे साथी/ हम लड़ेंगे/ कि लड़े बग़ैर कुछ नहीं मिलता/ हम लड़ेंगे/ कि अब तक लड़े क्यों नहीं/ हम लड़ेंगे/ अपनी सज़ा कबूलने के लिए/ लड़ते हुए मर जाने वाले की/ याद ज़िन्दा रखने के लिए/ हम लड़ेंगे।‘ संघर्ष का रास्ता आसान नहीं होता विशेषकर जब संघर्ष सत्ता पक्ष या समर्थ लोगों के साथ हो। किसी भी अनहोनी की आशंका बनी ही रहती है। लेकिन डॉ. जैन, इस डर से आगे एक नई सुबह, एक नई उम्मीद का सपना देखते हैं। ‘नेह बाती चुक रही है’ शीर्षक कविता में उन्होंने लिखा ‘तुम बड़े ही भीरु हो दिल/ हर समय धक-धक, धका-धक/ कुछ करो विश्राम/ सूरज फिर उगेगा/ और/ आएगा सवेरा/ अब नहीं हूँ मैं अकेला/ और जीतने दीप हैं/ मैं सभी में हूँ/ पी रहा हूँ सब अंधेरा/ थको मत तुम मीत/ मृत्यु से भयभीत/ अमरत्व की श्रम की/ सदा ही जीत।‘ पाश ने भी इस संघर्ष में अंतिम जीत श्रमिकों की होने की बात करते हुए ‘घास’ कविता में लिखा ‘बम फेंक दो चाहे विश्‍वविद्यालय पर/ बना दो होस्‍टल को मलबे का ढेर/ सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर/ मेरा क्‍या करोगे/ मैं तो घास हूँ हर चीज़ पर उग आऊँगा।‘  आज के युवाओं का भी इस संघर्ष में आह्वान करते हुए डॉ. जैन ‘चूँकि युवा हो’ कविता में लिखते हैं ‘पर न भूलो ये जवानी ही जवानी का नशा है/ इस नशे को होश की बूटी से जोड़ो/ तब कहीं अवरोध आए उनको तोड़ो/  क्या कहीं बहिनों की अस्मत लूट रही हो तुम चलोगे?/ क्या कहीं हिंदी की बिंदी मिट रही हो/ तुम चलोगे?/ इन दहेजी शादियों को रोकने/ क्या तुम बढोगे?/ तुम बढोगे आग-पानी राष्ट्र-विपदा रोकने क्या?/ राष्ट्र-व्यापी हैं समस्याएं -/ देखो बढ़ो, चूँकि युवा हो/ यदि बढ़ो तो खुशी से चूमूँगा माथा/ और अपनी/ अर्थी का कंधा भी लूँगा।‘  

डॉ. प्रेमचंद्र जैन की विद्वत्ता हालांकि संस्कृत, पालि, अपभ्रंश एवं हिंदी भाषाओं में रही लेकिन इसे नजीबाबाद का असर ही कहा जाना चाहिए कि उनकी कविताओं में उर्दू के रंग भी उसी खूबसूरती से निखरते हैं जितने की हिंदी के। ‘सर सैयद अहमद खाँ के जन्मदिन के अवसर पर’ शीर्षक से लिखी कविता में उर्दू के शब्दों जैसे ‘पुरनूर हुनर बख्श’, ‘तालीम’, ‘गुरबत’, ‘तदबीर’, ‘रहमतों’, ‘कुरबान’, ‘तालीम ओ’ इल्म’, ‘शमा रोशन’, ‘जहालत’ आदि का प्रयोग कविता के सौन्दर्य को बढ़ाता है। खुद एक शिक्षक रहे डॉ. जैन, शिक्षा के महत्व को भली-भांति जानते थे और इसीलिए सर सैयद अहमद खाँ को याद करते हुए और शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए लिखते हैं - तालीम ओ’ इल्म की शमा रोशन करेंगे हम/ हर घर से जहालत को भगा के ही लेंगे दम/ सैयद के जन्म-दिन पर सबक सीख कर जाएं/ हर अनपढे को पढ़ने की सौगात दिलाएं। 

नजीबाबाद जैसे जगह में जहाँ बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों ही समुदायों के लोग प्रेम और सौहार्द के साथ रहते हैं लेकिन जरा सी गलतफ़हमी की वजह से किसी अनहोनी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में डॉ. प्रेमचंद्र जैन जैसे लोगों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है जो अपनी परवाह न करते हुए भाईचारा बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हों। कबीर ने अपने दोहों में दोनों समुदायों को आईना दिखाया। एक तरफ उन्होंने लिखा “कंकर-पत्थर जोरि के  मस्जिद लई बनाय, ता चढ़ि मुल्ला बांग दे का बहरा भया खुदाय।“ तो दूसरी तरफ ये भी लिखा “पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूनँ पहार।ताते ये चाकी भली, पीस खाय संसार।“ डॉ. जैन ने भी दीवाली के नाम पर बढ़ती धन-पिपासा और घटती मानवीय संवेदनाओं पर कटाक्ष करते हुए ‘आज दीवाली हैशीर्षक कविता में लिखापड़ोसी की आवाज फिर आई-/ चुपो बदतमीजों!/ दीवाली का सारा मज़ा किरकिरा कर दिया/ राहगीर ने कहा/ देखते नहीं उसका लड़का मरा पड़ा है?/ मैं क्या करूँ?/ मेरे घर के पास चिल्लाए नहीं/ आज लक्ष्मी पूजन है/ हे भगवान! राहगीर बुदबुदाया/ और ढेर हो गया/ एक और मरा/ मरने दो -टीकू-पीकू-छुई-लुई/ कैसी सुन्दर हैं फुलझड़ियां/ धाँय-धाँय, धड़ाम-धड़ाक/ हा हा हा हाँ/ जगमगा रहा है घर।“  इसी तरह वर्ष में ईदुल-फितर के दिन सिर्फ एक दिन खैरात बांटने के बाद साल भर धन कमाने की लालसा रखने वालों पर भी कटाक्ष करते हुए लिखा – “मुझे ईदुल-फितर भाता है/ ये वर्ष में एक बार आता है/ खुदा के नाम पर खैरात बंटती है/ सभी गुण गाते हैं/ खुशियां मनाते हैं/ नए रंग लाते हैं/ काश!/ यह भावना उसके अगले दिन भी कायम रहती/ दूसरे दिन से ही/ गले लगाने वाला अपना अमीर भाई/ बनाने लगता है मुझे फकीर/ नौकर रखता है/ रिक्शा चलवाता है/ हलाल कर डालता है मेरा शरीर/ मेरे मन में आया है विचार/ सच-सच बतलाना परवरदिगार/ उनका रोजा भी कबूल होता है?” एक शिक्षक हमारी ग़लतियों पर हमें डांटते तो हैं लेकिन अगले ही पल हमें समझाते भी हैं और हमारा उत्साह वर्धन भी करते हैं। डॉ. जैन भी अपने इस दायित्व का भली-भांति निर्वहन करते हैं। ‘चश्म नम हैं मुफ़लिसों को देखकर’ शीर्षक कविता में आपसी सद्भाव की आवश्यकता पर बल देते हुए लिखा हम को मालूम है ज़कातों का/  सिला अब खत्म है/ चश्म नम हैं/ मुफ़लिसों को देखकर/ हम अमीरी को दफ़न/ करके मिलें/ हम मिलन की ले मशालें/ बढ़ चलें/ इस मिलन से जो कुढ़ें/ कुढ़ते रहें/....../हमने अपने बीच की/ दूरी बढ़ाकर देख ली/ देश को पीछे धकेला/ और/ अस्मत बेच दी/ हो गए इतने घुटाले/ छिन गए मुँह के निवाले/ सोचने का वक्त है, मिल-बैठने का दौर है।‘  ‘रंग में सराबोर’ शीर्षक कविता में वसंत का बहुत ही मनोहारी वर्णन है लेकिन इसके साथ ही यह आह्वान भी है कि आपसी भाईचारे के बीच किसी तरह की ग़लतफ़हमी पनपने नहीं देनी चाहिए – देख मधुमास अमराई बौरा गई/ नव नवेली चमेली भी झबरा गई/ विरही टेसू कलेजे को दहका रहा/ फाल्गुनी अनंग सबको भरमा रहा/....../देखना फिर भी झांकेगा कालिख का तन/ वह उठाएगा सिर, वह उगाएगा पर/ वह न सर-सब्ज़ हो कोई सोचो जतन/ उस पर डालो कफ़न - उस पर डाला कफ़न।“ इस कविता की पंक्ति में ‘डालो कफ़न’ बताती है कि क्या किया जाना चाहिए और ‘डाला कफ़न’ बताती है कि यह हो चुका और अब किसी वैमन्यस्यता की गुंजाइश नहीं बची। यही एक अच्छे शिक्षक की पहचान है कि वह अपने निर्देशन में कार्य का समापन सुनिश्चित करे।    

आत्ममुग्धता के इस दौर में जहाँ हर आदमी अपनी ही प्रशंसा का आकांक्षी हो, डॉ. जैन जैसे लोग विरले ही हैं जो दूसरों की खुशी में अपनी खुशी पाते हैं। एक शिक्षक का भी अपने छात्रों से स्नेह संबंध सामान्यतः शिक्षण के दौर तक ही रहता है, कम ही शिक्षक हैं जो अपने पूर्ववर्ती छात्रों से भी स्नेह बनाए रखते है और उनकी उपलब्धियों से ऐसे प्रसन्न  होते हैं जैसे यह उनकी स्वयं की उपलब्धि हो। ‘अलिंद उपाध्याय की रचनाओं के बहाने’ शीर्षक कविता में डॉ. जैन ने लिखा है – ‘नामी कवियों मध्य छपी है / जिसकी रचनाएं / कवि ‘अलिंद’ है ‘छोटू’ अपना / अन्तःकरण प्रफुल्लित इतना / कैसे बताऊँ कितना / वैचारिक चिंतक की साक्षी / ये यथार्थ रचनाएं / कवि-मुख से सुनने का / अवसर मिला / आज फिर / बहुत दिनों के बाद।‘  गोस्वामीजी ने रामचरितमानस में लिखा ‘जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा।‘ जो स्वयं दुख सह कर दूसरों की कमियों को ढँकते हैं वैसे लोग जगत में वंदनीय होते है। डॉ. जैन की कई कविताओं में यह भाव निहित है। ‘इष्ट फल’ कविता में डॉ. जैन लिखते हैं ‘जागते-सोते/ सदा ‘शिव’ हो/ तुम्हारा और -/ सबका / साध्य -/ साधन -/इष्ट फल।‘  

अपने सीमित संसाधनों से संतुष्ट और किसी सांसारिक सुख-सुविधाओं की आकांक्षा न होने की बात करते हुए ‘रे कलियुग के देव’ कविता में उन्होंने लिखा ‘यह है जग देखी रीति/ शक्ति के मीत सभी भाई/ न धन की शक्ति/ कर्म की - / मन की शक्ति है/ इसी को सोता-खाता हूँ/ इसी को रोज बजाता हूँ/ मुझे पर्वत की इच्छा नहीं/ बस यह शेष रहे राई।‘  अपने बारे में बात करते हुए ‘मैं सन्यासी; कविता में उन्होंने लिखा ‘और नहीं अब भीड़ भरी -/ भटकान सुहाती/ काश! कि मैं होता एकाकी/ बिन बैराग लिए ही बनता/ मैं सन्यासी।‘ इसी कविता में उनका बुरा चाहने वालों के प्रति भी प्रेम का भाव रखने की बात करते हुए उन्होंने लिखा ‘मेरे मर्यादा के चिराग़ को -/ लेकर/ बेशक मुझे जलाओ/ पर बाती खसकाने में/ हाथ जलेगा/ यह भी मुझको सह्य नहीं है/ मन बिलखेगा/ और/ जले पर नमक नहीं/ ओस के बिंदु धरूँगा।‘ अपने साहित्यकार होने के दायित्व को उन्होंने ‘अहसास’ शीर्षक कविता में लिखा ‘दूसरों की व्यथा के अहसास से-/ निज मन का व्यथित हो जाना/ अहेतुक द्रवित होना भी;/ शोषक की व्यथा से/ शोषित की व्यथा भिन्न है और विकट भी/ इस विकटता का दो टूक उत्तर -/साहित्यकार का दायित्व है।‘  डॉ. जैन ने अपने साहित्य और अपनी समाज सेवा से बहुत बड़ा मुकाम हासिल किया लेकिन इससे वे संतुष्ट नहीं रहे। उन्होंने लिखा ‘आज की दैनंदिनी का पृष्ठ भी पूरा हुआ लो/ और -/ मैं रीता था, रीता रह गया/ इसके-उसके प्रश्न कर्ताओं के उत्तर देते-देते/ मेरे अपने प्रश्न यों उलझे पड़े हैं/ जैसे बुनकर का कहीं हो सूत उलझा।‘ 

डॉ. जैन ने लिखा ‘ये सब कविताएँ मेरे मरने के बाद/ मेरे मरने के पहले की मनःस्थिति पर/ प्रकाश डाल सकेंगी/ जीवन का मूल्य अभाव में है/ अतः मेरे अभाव के बाद/ मेरी उपयोगिता शायद पता चले/ शायद नहीं भी।‘ लेकिन आज उनकी कविताओं को पढ़ते हुए हम उस अभाव को महसूस कर सकते हैं जो उनके न रहने से है। उनकी रचनाओं और उनके दर्शन की आवश्यकता आज पहले से कहीं ज्यादा है ऐसे में डॉ. जैन के उन सभी हितैषियों और शिष्यों का धन्यवाद किया जाना चाहिए जो हमें डॉ. जैन के व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न आयामों से हमारा परिचय करवा रहे हैं।     000

  • प्रवीण प्रणव, 

डाइरेक्टर, प्रोग्राम मैनेजमेंट, माइक्रो सोफ्ट, बी - 415, गायत्री क्लासिक्स, लिंगमपल्ली, हैदराबाद - 500019  

द्रष्टव्य

इतिहास हुआ एक अध्यापक/ संपादक- दानिश सैफ़ी/ अविचल प्रकाशन, ऊँचा पुल हल्द्वानी-263139/ 2022/ पृष्ठ 159-167.                                               

सोमवार, 11 अप्रैल 2022

"इतिहास हुआ एक अध्यापक" पर पुस्तक-चर्चा संपन्न






"इतिहास हुआ एक अध्यापक" पर पुस्तक-चर्चा संपन्न

हैदराबाद, 11 अप्रैल 2022।


    साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था 'साहित्य मंथन' के तत्वावधान में सिद्धार्थ अपार्टमेंट, रामंतापुर में पुस्तक-चर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। प्रत्यक्ष और आभासी माध्यम से संपन्न इस संयुक्त कार्यक्रम में अपभ्रंश भाषा और जैन साहित्य के विद्वान, कवि और अध्यापक डॉ. प्रेमचंद्र जैन की स्मृति में प्रकाशित महाकाय ग्रंथ "इतिहास हुआ एक अध्यापक" के विविध पक्षों पर व्यापक विचार विमर्श हुआ। 

       बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व अधिष्ठाता प्रो. देवराज ने डॉ. प्रेमचंद्र जैन के व्यक्तित्व, कृतित्व, सामाजिक सक्रियता और विचारों की विवेचना के सिलसिले में कहा कि अध्यापक हो या कवि, दोनों का सामाजिक दायित्व कक्षा और किताब के बाहर व्यापक जन-गण से जुड़े बिना पूरा नहीं माना जा सकता। विवेच्य ग्रंथ इस बात का गवाह है कि स्वर्गीय प्रेमचंद्र जैन सामाजिक और राष्ट्रीय एकता के कार्यों भी उसी तरह सक्रिय रहे, जिस तरह व्याख्यान और लेखन में। समाज ही विद्या और साहित्य की प्रयोगशाला है, इसे इस ग्रंथ में चरितार्थ होते दिखाया गया है। 

      ग्रंथ की समीक्षा करते हुए जामनगर (गुजरात) से डॉ. चंदन कुमारी ने बताया कि इसमें डॉ.प्रेमचंद्र जैन के समस्त अप्रकाशित साहित्य के अलावा देश भर के 45 लेखकों के संस्मरण और आलोचनात्मक आलेख शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि इनमें से 8 लेखक हैदराबाद से हैं, जिन्हें इस अवसर पर ग्रंथ की लेखकीय प्रतियाँ 'साहित्य मंथन' की अध्यक्ष डॉ. पूर्णिमा शर्मा के हाथों सादर भेंट की गईं। 

      कार्यक्रम का संचालन डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने किया। आरंभ में डॉ. बी. बालाजी ने गुरु-वंदना की तथा अंत में प्रवीण प्रणव ने एक सामयिक ग़ज़ल सुनाई। अवसर पर डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, डॉ. सुपर्णा मुखर्जी, डॉ. मंजु शर्मा और शीला बालाजी ने भी ग्रंथनायक के बारे में अपने विचार प्रकट किए। संपादक दानिश सैफ़ी के अलावा प्रो. गोपाल शर्मा, समीक्षा शर्मा,लिपि भारद्वाज और ध्रुवी ने कार्यक्रम की सफलता में सराहनीय भूमिका निभाई। 000



https://youtu.be/3VAW_Ae89yI